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हनुमान चालिसा के दो श्लोक श्री हरि रामस्वरुप के भक्तो के मार्गदर्शन की दृष्टि से बहुमूल्य है।


हनुमान चालिसा के दो श्लोक श्री हरि रामस्वरुप के भक्तो के मार्गदर्शन की दृष्टि से बहुमूल्य है।

राम दुआरे तुम रखवारे
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥
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हिंदी अर्थ- श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप रखवाले है, जिसमें आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नहीं मिलता
अर्थात् आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।

तुम्हरे भजन राम को पावै
जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥
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हिंदी अर्थ- आपका भजन करने से श्री राम जी प्राप्त होते है और जन्म जन्मांतर के दुख दूर होते है।

और ये समूह श्री हरि का समूह है तो उनके परम भक्त हनुमानजी के बिना अधूरा है।

🙏आज तो उनका अवतरण दिवस भी है।तो समूह के सभी आदरणीय वरिष्ठ जनो और प्रिय अनुजो को #हनुमान #जी #के #अवतरण #दिवस #की #शुभकामनाएँ🙏

🌸श्रीकृष्ण और हनुमान जी : (द्वापरयुग)🌸

एक बार सुदर्शन चक्र को स्वयं की शक्ति पर अभिमान हो गया था और भगवान श्री कृष्ण ने उनके अभिमान को दूर करने के लिए श्री हनुमान जी की सहायता ली थी। सुदर्शन चक्र को यह अभिमान हो गया था कि उसने इंद्र के वज्र को निष्क्रिय किया था। वह लोकालोक के अंधकार को दूर कर सकता है। भगवान श्री कृष्ण अतंत उसकी ही सहायता लेते हैं।✳️

भगवान अपने भक्तों का सदा कल्याण करते हैं इसलिए उन्होंने हनुमान जी का स्मरण किया तत्काल हनुमान जी द्वारिका आ गए। जान गए कि श्री कृष्ण ने क्यों बुलाया है। श्री कृष्ण और श्री राम दोनों एक ही हैं, वह यह भी जानते थे इसलिए सीधे राजदरबार नहीं गए कुछ कौतुक करने के लिए उद्यान में चले गए। वृक्षों पर लगे फल तोड़ने लगे, कुछ खाए, कुछ फेंक दिए, वृक्षों को उखाड़ फेंका, कुछ को तोड़ डाला तथा वाटिका को वीरान बना दिया। फल तोड़ना और फेंक देना, हनुमान जी का मकसद नहीं था, वह तो श्री कृष्ण के संकेत से कौतुक कर रहे थे। बात श्री कृष्ण तक पहुंची, किसी वानर ने राजोद्यान को उजाड़ दिया है। ✳️

श्री कृष्ण ने सेनाध्यक्ष को बुलाया। “कहा, आप सेना के साथ जाएं तथा उस वानर को पकड़कर लाएं।”

श्री कृष्ण मन ही मन मुस्करा रहे थे। सेनाध्यक्ष सेना सहित तत्काल वाटिका पहुंचे तथा उन्होंने हनुमान जी को ललकार कर कहा, “बाग क्यों उजाड़ रहे हो? फल क्यों तोड़ रहे हो? चलो, तुम्हें श्री कृष्ण बुला रहे हैं।”

हनुमान जी ने सेनाध्यक्ष से कहां, “मैं किसी कृष्ण को नहीं जानता। मैं तो श्री राम का सेवक हूं। जाओ, कह दो, मैं नहीं आऊंगा।”

सेनाध्यक्ष क्रोधित होकर बोले, “तुम नहीं चलोगे तो मैं तुम्हें पकड़कर ले जाऊंगा।”

हनुमानजी ने सेनाध्यक्ष को पूंछ में दबोच कर दूर राजमहल की तरफ फैंक दिया। सेनाध्यक्ष ने दरबार में पहुंचकर भगवान को बताया, “वह कोई साधारण वानर नहीं है। मैं उसे पकड़कर नहीं ला सकता।”

श्री कृष्ण ने हनुमान जी को कहलवा भेजा की आपको श्री राम बुला रहे हैं तथा सुदर्शन चक्र को आदेश दिया,” हे सुदर्शन जी! द्वार पर रहना।”

कोई बिना आज्ञा अंदर न आने पाए तथा अगर कोई बिना आज्ञा के अंदर आने का प्रयास करें तो आप उनका वध कर दें। श्री कृष्ण समझते थे कि श्री राम का संदेश सुनकर तो हनुमान जी एक पल भी रुक नहीं सकते। दरबार के द्वार पर सुदर्शन ने उन्हें रोक कर कहा, “बिना आज्ञा अंदर जाने की मनाही है।”

जब श्री राम बुला रहे हों तो हनुमान जी विलंब सहन नहीं कर सकते। हनुमान जी ने सुदर्शन को पकड़ा और ईलायची की भांति दाड़़ में दबाकर मुंह में रख लिया। भगवान राम के स्वरुप में श्री कृष्ण जी सिंहासन पर बैठ गए। सिंहासन पर बैठे श्री राम को देखकर हनुमान जी श्री कृष्ण के चरणों में नतमस्तक हो गए। श्री कृष्ण ने हनुमान जी को गले लगा लिया। श्री कृष्ण ने हनुमान जी से पूछा, “हनुमान! तुम अंदर कैसे आ गए? किसी ने रोका नहीं?”

हनुमानजी से उत्तर दिया “रोका था भगवन, सुदर्शन ने, मैंने सोचा आपके दर्शनों में विलंब होगा, इसलिए उनसे उलझा नहीं, उसे मैंने अपने मुंह में दबा लिया।”

यह कहकर हनुमान जी ने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के चरणों में डाल दिया। सुदर्शन चक्र का घमंड चूर हो चुका था। श्री कृष्ण यही चाहते थे। श्री कृष्ण ने हनुमान जी को हृदय से लगा लिया, हृदय से हृदय की बात हुई और श्री कृष्ण ने हनुमान जी को विदा कर दिया।

परमात्मा अपने भक्तों में अपने निकटस्थों में अभिमान रहने नहीं देते। अगर श्री कृष्ण ने हनुमान जी की साहयता से सुदर्शन चक्र का घमंड दूर न करते तो सुदर्शन जी परमात्मा के निकट रह नहीं सकते थे। परमात्मा के निकट रह ही वह सकता है जो ”मैं” से रहित होकर “न मैं” जान लेता है अर्थात “नमः” को जान जाता है। नमः का अर्थ ही है की मैं कुछ नही हूं वरण परमेश्वर ही सर्वत्र है तथा उन्हीं परमेश्वर को मैं बारंबार नमन करते हूं। अतः भक्ति मार्ग का पहला कदम है अहम और अभिमान रहित जीवन।

🙏जय जय हनुमान….जय जय श्री राम🙏

 

श्रीमद् भगवद्गीता चिंतन

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आदित्य हृदय स्तोत्र हिन्दी अनुवाद सहित
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वाल्मीकि रामायण के अनुसार “आदित्य हृदय स्तोत्र” अगस्त्य ऋषि द्वारा भगवान् श्री राम को युद्ध में रावण पर विजय प्राप्ति हेतु दिया गया था. आदित्य हृदय स्तोत्र का नित्य पाठ जीवन के अनेक कष्टों का एकमात्र निवारण है. इसके नियमित पाठ से मानसिक कष्ट, हृदय रोग, तनाव, शत्रु कष्ट और असफलताओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है. इस स्तोत्र में सूर्य देव की निष्ठापूर्वक उपासना करते हुए उनसे विजयी मार्ग पर ले जाने का अनुरोध है. आदित्य हृदय स्तोत्र सभी प्रकार के पापों , कष्टों और शत्रुओं से मुक्ति कराने वाला, सर्व कल्याणकारी, आयु, उर्जा और प्रतिष्ठा बढाने वाला अति मंगलकारी विजय स्तोत्र है.
विनियोग
ॐ अस्य आदित्यह्रदय स्तोत्रस्य अगस्त्यऋषि: अनुष्टुप्छन्दः आदित्यह्रदयभूतो
भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्माविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः
पूर्व पिठिता
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥1॥
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् । उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥
राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम् । येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् । जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥4॥
सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम् । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥5॥
मूल -स्तोत्र
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् । पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥6॥
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: । एष देवासुरगणांल्लोकान् पाति गभस्तिभि: ॥7॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥
पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: । वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥
आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान् । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥
हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान् । तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान् ॥11॥
हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: । अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥
आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥15॥
नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: । नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: । नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥
तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥
नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: । एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥23॥
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन् पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम् । एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि । एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥27॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा ॥ धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान् ॥28॥
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् । त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥29॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम् । सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् ॥30॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥
।।सम्पूर्ण ।।

हिंदी अनुवाद
🔸🔸🔹🔹
1,2 उधर श्रीरामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिंता करते हुए रणभूमि में खड़े हुए थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख भगवान् अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले।

3 सबके ह्रदय में रमन करने वाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो ! वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे।

4,5 इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है ‘आदित्यहृदय’ यह परम पवित्र और संपूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय कि प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है। सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है। इससे सब पापों का नाश हो जाता है । यह चिंता और शोक को मिटाने तथा आयु का बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।

6 भगवान् सूर्य अपनी अनंत किरणों से सुशोभित हैं। ये नित्य उदय होने वाले, देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान नाम से प्रसिद्द, प्रभा का विस्तार करने वाले और संसार के स्वामी हैं। तुम इनका रश्मिमंते नमः, समुद्यन्ते नमः, देवासुरनमस्कृताये नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराये नमः इन मन्त्रों के द्वारा पूजन करो।

7 संपूर्ण देवता इन्ही के स्वरुप हैं। ये तेज़ की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं। ये अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित समस्त लोकों का पालन करने वाले हैं।

8,9 ये ही ब्रह्मा, विष्णु शिव, स्कन्द, प्रजापति, इंद्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण, पितर , वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रकाश के पुंज हैं।

10,11,12,13,14,15 इनके नाम हैं आदित्य(अदितिपुत्र), सविता(जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य(सर्वव्यापक), खग, पूषा(पोषण करने वाले), गभस्तिमान (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश्य, भानु(प्रकाशक), हिरण्यरेता(ब्रह्मांड कि उत्पत्ति के बीज), दिवाकर(रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले), हरिदश्व, सहस्रार्चि(हज़ारों किरणों से सुशोभित), सप्तसप्ति(सात घोड़ों वाले), मरीचिमान(किरणों से सुशोभित), तिमिरोमंथन(अन्धकार का नाश करने वाले), शम्भू, त्वष्टा, मार्तण्डक(ब्रह्माण्ड को जीवन प्रदान करने वाले), अंशुमान, हिरण्यगर्भ(ब्रह्मा), शिशिर(स्वभाव से ही सुख प्रदान करने वाले), तपन(गर्मी पैदा करने वाले), अहस्कर, रवि, अग्निगर्भ(अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले), अदितिपुत्र, शंख, शिशिरनाशन(शीत का नाश करने वाले), व्योमनाथ(आकाश के स्वामी), तमभेदी, ऋग, यजु और सामवेद के पारगामी, धनवृष्टि, अपाम मित्र (जल को उत्पन्न करने वाले), विंध्यवीथिप्लवंगम (आकाश में तीव्र वेग से चलने वाले), आतपी, मंडली, मृत्यु, पिंगल(भूरे रंग वाले), सर्वतापन(सबको ताप देने वाले), कवि, विश्व, महातेजस्वी, रक्त, सर्वभवोद्भव (सबकी उत्पत्ति के कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन(जगत कि रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी और द्वादशात्मा हैं। इन सभी नामो से प्रसिद्द सूर्यदेव ! आपको नमस्कार है।

16 पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है।

17 आप जयस्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता हैं । आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारबार नमस्कार है। सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान् सूर्य ! आपको बारम्बार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से भी प्रसिद्द हैं, आपको नमस्कार है।

18 उग्र, वीर, और सारंग सूर्यदेव को नमस्कार है । कमलों को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तण्ड को प्रणाम है।

19 आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी है।सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाली अग्नि आपका ही स्वरुप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है।

20 आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं । आपका स्वरुप अप्रमेय है । आप कृतघ्नों का नाश करने वाले, संपूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।

21 आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरी और विश्वकर्मा हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं, आपको नमस्कार है।

22 रघुनन्दन ! ये भगवान् सूर्य ही संपूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं । ये अपनी किरणों से गर्मी पहुंचाते और वर्षा करते हैं।

23 ये सब भूतों में अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं।

24 देवता, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं। संपूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं।

25 राघव ! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता।

26 इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर कि पूजा करो। इस आदित्यहृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में विजय पाओगे ।

27 महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे । यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे वैसे ही चले गए ।

28,29,30 उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी का शोक दूर हो गया । उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान् सूर्य की और देखते हुए इसका तीन बार जप किया । इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ । फिर परम पराक्रमी रघुनाथ जी ने धनुष उठाकर रावण की और देखा और उत्साहपूर्वक विजय पाने के लिए वे आगे बढे । उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावण के वध का निश्चय किया ।

31 उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान् सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की और देखा और निशाचरराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा – ‘रघुनन्दन ! अब जल्दी करो’ ।

इस प्रकार भगवान् सूर्य कि प्रशंसा में कहा गया और वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड में वर्णित यह आदित्य हृदयम मंत्र संपन्न होता है ।
🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

देव शर्मा

Posted in हिन्दू पतन

“`
अमेरिका को English में America
ही बोलते.

जापान को भी English में Japan बोलते

भूटान को भी English में Bhutan ही बोलते

श्रीलंका को भी English में
Sri Lanka ही बोलते.

बांग्लादेश को भी English में Bangladesh ही बोलते

नेपाल को भी English में Nepal ही बोलते.

इतना ही नहीं अपने पडोसी मुल्क पाकिस्तान को भी
English में Pakistan ही बोलते.

फिर सिर्फ भारत को ही English में India क्यों बोलते ?

तो

Oxford Dictionary के अनुसार

India यह शब्द कैसे आया यह ९९% लोगो को भी पता तक नहीं होगा…
*
I – Independent

N- Nation

D- Declared

I – In

A- August

इसीलिए इंडिया (India)

दोस्तों

इस पोस्ट को कृपया इतना शेयर करो की, ज्यादा से ज्यादा भारतीयों को यह पता चल सके…“`

👌👍👏👏👏👏👏👏👏

Posted in हास्यमेव जयते

[09/04, 6:42 p.m.] Rashminbhai: ટીચર: મન્કી નો સ્પેલીંગ બોલ.

સ્ટુડન્ટ: એમ. ઓ. એન. કે. ઈ. વાય.

ટીચર: ચોપડીમાંથી જોઈને બોલ્યો?

સ્ટુડન્ટ: ના, સર, તમારી સામે જ જોઈને બોલ્યો…..

(બંને જવાબો સાવ સાચા હોવા છતાં ટીચરે એને આખો પીરીયડ ઉભો રાખ્યો…!!!).
🤣😜🤣😜🤣
[09/04, 6:43 p.m.] Rashminbhai: 👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂
આજકાલ લગન ગાળામાં સાફા બંધાવાની ફેશન વધી છે.
પુરુષોમાં તો હતું જ..👳🏻‍♂👳🏻‍♂
પણ
આજકાલ મહિલાઓમાં પણ ફૅટો બાંધવાનું ચલણ કેમ વધ્યું? 👳🏻‍♀👳🏻‍♀
તે બાબતે તપાસ કરતાં જાણવા મળ્યું કે,
બ્યુટી પાર્લરમાં હેર સ્ટાઈલના રૂ.3000 આપવા
તેના કરતાં
રૂ.200 કે 250 ના સાફાથી
વટ પણ પડે ને સસ્તુ પણ પડે!!!!!
👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀
[09/04, 6:43 p.m.] Rashminbhai: એક મહિલા તેની ફ્રેન્ડને કહેતી હતી કે –

બધા દોરા ધાગા પેહરી જોયા, પણ સાચી શાંતિ તો પતિ સાથે જગડ્યાં પછી જ મળે છે .
🤣🤣🤣🤣🤣🤣
[09/04, 7:56 p.m.] Varsha Ashodiya: आज की नारी ….

पति:- अजी सुनती हो. 💁🏻‍♀
पत्नी:- नहीं सिर्फ बोलती हूँ…. 💁🏻‍♀

😆😄😂🤣😜😜😅😂😆
[09/04, 7:56 p.m.] Varsha Ashodiya: पहले महिलाओं को अबला इसलिए कहते थे, जब पैसे खत्म हो जाते थे तो बस ज़रूरत भर रकम के लिए पति से कहती थी अब_ला

आज कल की तेज तर्रार सबला है, पति का वेतन मिलते ही बोलती है सब_ला

🤣🤣🤣🤣
[09/04, 10:48 p.m.] Rashminbhai: Q.दुनिया का सबसे बड़ा त्यौहार कौन सा है?

Ans. घरवाली

Q.कैसे?

Ans. हफ्ते में 3-4 बार मनाना ही पड़ता है🤣🤣🤣😅😅🙏🙏😁
[10/04, 8:07 a.m.] Rajubhai Car Mechanic: ગુજરાતીઓ ખાવાના બોવ શોખીન…

નવરા બેઠા બગાસા ખાય, ફરવા જાય તો હવા ખાય
ઊંઘ આવેતો ઝોંકા ખાય, માંદા પડે તો ઉધરસ/છીંક ખાય
બાળકો હીંચકા ખાય, મોટા માન ખાય
છોકરીઓ ભાવ ખાય, છોકરા માર ખાય
ઇમાનદાર ધક્કા ખાય, બેઇમાન પૈસા ખાય
વાંઢા માથુ ખાય અને પરણેલા ખોટ ખાય
અને જે બાકી રહી ગયા એ માવા ખાય. 😩😩😩😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😜
[10/04, 5:31 p.m.] Sachinbhai Maniyar: क्या आप जानते हैं….?

ओलंपिक्स में पदक जीतने वाली सभी महिला खिलाड़ियों के कोच पुरुष हैं।

इससे ये साबित होता है कि,

जो औरतें पुरुषों की बातें सुनती और मानती हैं,
उन्हें जीवन में सफलता प्राप्त होती है !
और उनकी कीर्ति पूरे विश्व में फैलती है।

ये बात अपनी पत्नी को

नाश्ता करनेके बाद ही बताएं ….

औऱ फिर….

…तुरंत दफ्तर निकल जायें ।।
😂😂😜😜🤣🤣

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पिता की परम इच्छा


https://wp.me/p75i7L-2su

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

प्रसंग है___

एक नवयुवती छज्जे पर बैठी है,

केश खुले हुए हैं और चेहरे को देखकर लगता है की वह उदास है। उसकी मुख मुद्रा देखकर लग रहा है कि जैसे वह छत से कूदकर आत्महत्या करने वाली है।

विभिन्न कवियों से अगर इस पर लिखने को कहा जाता तो वो कैसे लिखते…..

😀😀😀😀😀😀😀😀😀

मैथिली शरण गुप्त

अट्टालिका पर एक रमणी अनमनी सी है अहो
किस वेदना के भार से संतप्त हो देवी कहो ?
धीरज धरो संसार में, किसके नहीं है दुर्दिन फिरे
हे राम! रक्षा कीजिए, अबला न भूतल पर गिरे।😀

काका हाथरसी

गोरी बैठी छत पर, कूदन को तैयार
नीचे पक्का फर्श है, भली करे करतार
भली करे करतार, न दे दे कोई धक्का
ऊपर मोटी नार, नीचे पतरे कक्का
कह काका कविराय, अरी मत आगे बढ़ना
उधर कूदना मेरे ऊपर मत गिर पड़ना।😊

गुलजार

वो बरसों पुरानी ईमारत
शायद
आज कुछ गुफ्तगू करना चाहती थी
कई सदियों से
उसकी छत से कोई कूदा नहीं था।
और आज
उस
तंग हालात
परेशां
स्याह आँखों वाली
उस लड़की ने
ईमारत के सफ़े
जैसे खोल ही दिए
आज फिर कुछ बात होगी
सुना है ईमारत खुश बहुत है…😀

हरिवंश राय बच्चन

किस उलझन से क्षुब्ध आज
निश्चय यह तुमने कर डाला
घर चौखट को छोड़ त्याग
चढ़ बैठी तुम चौथा माला
अभी समय है, जीवन सुरभित
पान करो इस का बाला
ऐसे कूद के मरने पर तो
नहीं मिलेगी मधुशाला 😊

प्रसून जोशी

जिंदगी को तोड़ कर
मरोड़ कर
गुल्लकों को फोड़ कर
क्या हुआ जो जा रही हो
सोहबतों को छोड़ कर 😄

रहीम

रहिमन कभउँ न फांदिये, छत ऊपर दीवार
हल छूटे जो जन गिरि, फूटै और कपार 😀

तुलसी

छत चढ़ नारी उदासी कोप व्रत धारी
कूद ना जा री दुखीयारी
सैन्य समेत अबहिन आवत होइहैं रघुरारी 😟

कबीर

कबीरा देखि दुःख आपने, कूदिंह छत से नार
तापे संकट ना कटे , खुले नरक का द्वार” 😃

श्याम नारायण पांडे

ओ घमंड मंडिनी, अखंड खंड मंडिनी
वीरता विमंडिनी, प्रचंड चंड चंडिनी
सिंहनी की ठान से, आन बान शान से
मान से, गुमान से, तुम गिरो मकान से
तुम डगर डगर गिरो, तुम नगर नगर गिरो
तुम गिरो अगर गिरो, शत्रु पर मगर गिरो।😃

गोपाल दास नीरज

हो न उदास रूपसी, तू मुस्काती जा
मौत में भी जिन्दगी के कुछ फूल खिलाती जा
जाना तो हर एक को है, एक दिन जहान से
जाते जाते मेरा, एक गीत गुनगुनाती जा 😀

राम कुमार वर्मा

हे सुन्दरी तुम मृत्यु की यूँ बाट मत जोहो।
जानता हूँ इस जगत का
खो चुकि हो चाव अब तुम
और चढ़ के छत पे भरसक
खा चुकि हो ताव अब तुम
उसके उर के भार को समझो।
जीवन के उपहार को तुम ज़ाया ना खोहो,
हे सुन्दरी तुम मृत्यु की यूँ बाँट मत जोहो।😀

हनी सिंह

कूद जा डार्लिंग क्या रखा है
जिंजर चाय बनाने में
यो यो की तो सीडी बज री
डिस्को में हरयाणे में
रोना धोना बंद कर
कर ले डांस हनी के गाने में
रॉक एंड रोल करेंगे कुड़िये
फार्म हाउस के तहखाने में..

😄😄😄😄😄😄😄😄😄

5 मिनट के बाद वो उठी और बोली —
चलो बाल तो सूख गए अब चल के नाश्ता कर लेती हूं..

😀 हिन्दी प्रेमियों के लिए 😀

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मित्रो पिछली पोस्ट में हम देवी उर्मिलाजी के चरित्र पर चर्चा कर रहे थे, उर्मिलाजी का चरित्र प्रत्येक भारतीय नारी का चरित्र है, भारत की प्रत्येक नारी में उर्मिला जैसा दिव्य चरित्र है लेकिन फर्क है तो केवल जीने का, एक और प्रसंग की चर्चा करते हैं, सज्जनों! जब लक्ष्मणजी को मेघनाथ की शक्ति से बेसुध हो गये तब वैधजी सुमंतजी की सलाह से संजीवनी लेने पहुंचे।

लेकिन संजीवनी बूटी की परख न होने से पूरा पर्वत ही उठाकर जब अयोध्या के ऊपर से जा रहे थे तब भरतजी ने किसी राक्षस होने की आशंका से हनुमानजी पर बाण चला दिया, बाण हनुमानजी को लगा और हनुमानजी घायल अवस्था में “जय श्री राम” के उद्घोष के साथ पृथ्वी पर आ गये, भरतजी को रामजी के नाम का उद्घोष से भरतजी हनुमानजी के पास पहुंचे और रामजी के नाम का उल्लेख करते हुए कहाँ कि आप कौन है? और रामजी से आपका क्या संबंध है?

तब हनुमानजी ने खुद को रामजी का सेवक बताते हुए लक्ष्मणजी की स्थिति का वर्णन किया, तब तक सभी माताओं के साथ उर्मिलाजी भी हनुमानजी से मिलने पहुंची, हनुमानजी से लक्ष्मणजी के घायल होने की अवस्था का वर्णन किया, तब उर्मिलाजी ने हनुमानजी से कहा कि आपको चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है, मैरे पति को कुछ नहीं होगा? हनुमानजी ने कहा कि आप को कैसे मालूम?

उर्मिलाजी बोली, मेरा दीपक मुझे बता रहा है, दीपक जल रहा है तो इसका मतलब कि मेरे पति जीवित हैं, और सुनो मैं तो लंका नहीं गयी थी, आप तो लंका से आए हो? यह बताओ इस समय मेरे पति कहाँ हैं, हनुमानजी बोले भगवान् की गोद में है, उर्मिलाजी ने कहा भैया! अगर मेरे पति भोग की गोद में होते तो काल उनको मार देता पर जो भगवान की गोद में लेटा है उसको काल छू भी नहीं सकता है।

हनुमानजी आपको मालूम होना चाहिये कि जो भगवान् की गोद में है वे हमेशा चिरंजीवी रहते है, मेरे पति भगवान् की गोद में लेटे हैं और मैं भगवान के करूणामयी स्वभाव से परिचित हूँ, मुझे यह मालूम है और भगवान को यह जानकारी है कि लखन जागने का चौदह वर्ष का संकल्प माँ से लेकर आया है जो सोयेगा नहीं और प्रभु का स्वभाव बहुत ही कोमल हैं।

अति कोमल रघुवीर सुभाऊ। जधपि अखिल लोक कर राऊ।।

प्रभु को लगता है मेरा छोटा भाई लखन दिनभर इतने बडे बडे राक्षसों से लडता है, थककर चूर हो जाता है और फिर सन्ध्या समय माँ के संकल्प को याद करता है और सोता नहीं, इसको विश्राम कैसे दिलाये, भगवान् ने मेघनाथ के बाण के बहाने से पतिदेव को अपने गोद में विश्राम के लिए लिटाया है, जो रामजी की चरण में रहता है वह विश्राम के लिए रहता है, वह कभी मरण की चरण में नहीं जाता।

जो आनन्द सिंधु सुख रासी । सीकर तें त्रैलोक सुपासी ।।
सो सुखधाम राम अस नामा । अखिल लोक दायक विश्रामा ।।

जो भगवान श्रीराम की गोद में होगा वो विश्राम में होगा, आराम में होगा, सज्जनों! हमने संतो के श्रीमुख से सुना है कि जब लक्ष्मणजी ने चौदह वर्ष जागरण का संकल्प लें लिया, तब हमने सुना, नींद लक्ष्मणजी के पास आयी और नींद ने लक्ष्मणजी से कहा कि आज तक हमको कोई नहीं जीत पाया और आज आपने हमको जीत लिया है, हमसे कोई वरदान मांगिये।

तो लक्ष्मणजी ने कहा मुझे तो कोई आवश्यकता नहीं है मगर तुम उर्मिलाजी के पास चली जाओ, नींद उर्मिलाजी के पास आई और उर्मिलाजी से कहा आप हमसे कोई वरदान मांगिए, पूछा आपको किसने भेजा है तो बोली आपके पतिदेव ने भेजा है, बोली उन्होंने हमें जीत लिया है हम उन्हें वरदान देना चाहती थीं तो उन्होंने कहा जाओ, उर्मिलाजी के पास अतः आप कोई मांगो वरदान मांगो।

उर्मिलाजी ने कहा अगर आप वरदान देना चाहती हो तो एक वरदान दो कि चौदह वर्ष जब तक मेरे पति भगवान् के चरणों की सेवा में लगे हैं उनको मेरी याद न आयें, पत्नी कहती हैं परमात्मा की सेवा में उनको भोग की याद न आयें, उनको काम की याद न आयें, जो रघुवर की सेवा में बैठे हैं उनको घर की याद न आयें, धन्य हैं भारत की भूमि जहाँ उर्मिलाजी जैसी वीरांगनाओं ने जन्म लिया।

शिवाजी महाराज ऐसे ही पैदा नहीं हुयें, शिवाजी का निर्माण जीजाबाई माँ के द्वारा हुआ, जिस समय जीजाबाई दूध पिलाती थी और दूध पिलाती-पिलाती थपकी देती जाती थीं और भगवान् राम और हनुमानजी की कथायें सुनाती थीं, सज्जनों! भगवान् की कथाओं को सुनकर धर्म की स्थापना हुई है, धर्म संस्थापनाथारय हिन्दू पद पादशाही की स्थापना शिवाजी कर पायें, इतना बडा औरंगजेब का साम्राज्य सारे भारत में फैलने वाला साम्राज्य महाराष्ट्र में जाकर रूक गया।

आजु मोहि रघुबर की सुधि आई। सीय बिना मैरी सूनी रसोई।।
लखन बिना ठकुराई। आजु मोहि रघुबर की सुधि आई।।

हमारे यहाँ ऐसी बूढी मातायें हुई है जिनको कुछ नहीं आता था, वे प्रातःकालीन चक्की (चाकी) पीसा करती थीं तो बालक उनकी गोद में लेटा होता था, चाकी पीसते-पीसते वीर रस के गीत गाया करती थीं, लेकिन आज स्थिति बिल्कुल विपरीत है, न प्रात काल की वह चक्की है न वीर रस की गाथायें गाती ऐसी मातायें, मेरी समस्त भारत की बहनों से गुजारिश है कि आने वाली पीढ़ी को अपने भारतीय संस्कृति से रूबरू करवायें, माँ बहनों को नमन् करते हुए आज के इस आर्टिकल को यही विराम देता हूंँ।

जय माँ भारती!
जय भारत की नारी शक्ति!
जय माँ अम्बे!

संजय गुप्ता

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हनुमानजी जी की अति ऊतम कथा का वर्णन किया है राम भक्त की कथा का आनंद सब उठाइये
आज आपको एक ऐसे कथा के बारे में बताने जा रहा हूँ,,

जिसका विवरण संसार के किसी भी पुस्तक में आपको नही मिलेगा,,
और ये कथा सत प्रतिशत सत्य कथा है,,

#जयश्रीराम जय श्री राम, जय श्री राम
कथा का आरंभ तब का है

जब बाली को ब्रम्हा जी से ये वरदान प्राप्त हुआ,,
की जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगा,,
उसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगी,,

और इससे बाली हर युद्ध मे अजेय रहेगा,,

सुग्रीव, बाली दोनों ब्रम्हा के औरस ( वरदान द्वारा प्राप्त ) पुत्र हैं,,

और ब्रम्हा जी की कृपा बाली पर सदैव बनी रहती है,,

बाली को अपने बल पर बड़ा घमंड था,,
उसका घमंड तब ओर भी बढ़ गया,,
जब उसने करीब करीब तीनों लोकों पर विजय पाए हुए रावण से युद्ध किया और रावण को अपनी पूँछ से बांध कर छह महीने तक पूरी दुनिया घूमी,,

रावण जैसे योद्धा को इस प्रकार हरा कर बाली के घमंड का कोई सीमा न रहा,,

अब वो अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था,,

और यही उसकी सबसे बड़ी भूल हुई,,

अपने ताकत के मद में चूर एक दिन एक जंगल मे पेड़ पौधों को तिनके के समान उखाड़ फेंक रहा था,,

हरे भरे वृक्षों को तहस नहस कर दे रहा था,,

अमृत समान जल के सरोवरों को मिट्टी से मिला कर कीचड़ कर दे रहा था,,

एक तरह से अपने ताक़त के नशे में बाली पूरे जंगल को उजाड़ कर रख देना चाहता था,,

और बार बार अपने से युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था- है कोई जो बाली से युद्ध करने की हिम्मत रखता हो,,
है कोई जो अपने माँ का दूध पिया हो,,
जो बाली से युद्ध करके बाली को हरा दे,,

इस तरह की गर्जना करते हुए बाली उस जंगल को तहस नहस कर रहा था,,

संयोग वश उसी जंगल के बीच मे हनुमान जी,, राम नाम का जाप करते हुए तपस्या में बैठे थे,,

बाली की इस हरकत से हनुमान जी को राम नाम का जप करने में विघ्न लगा,,

और हनुमान जी बाली के सामने जाकर बोले- हे वीरों के वीर,, हे ब्रम्ह अंश,, हे राजकुमार बाली,,
( तब बाली किष्किंधा के युवराज थे) क्यों इस शांत जंगल को अपने बल की बलि दे रहे हो,,

हरे भरे पेड़ों को उखाड़ फेंक रहे हो,
फलों से लदे वृक्षों को मसल दे रहे हो,,
अमृत समान सरोवरों को दूषित मलिन मिट्टी से मिला कर उन्हें नष्ट कर रहे हो,,
इससे तुम्हे क्या मिलेगा,,

तुम्हारे औरस पिता ब्रम्हा के वरदान स्वरूप कोई तुहे युद्ध मे नही हरा सकता,,

क्योंकि जो कोई तुमसे युद्ध करने आएगा,,
उसकी आधी शक्ति तुममे समाहित हो जाएगी,,

इसलिए हे कपि राजकुमार अपने बल के घमंड को शांत कर,,

और राम नाम का जाप कर,,
इससे तेरे मन में अपने बल का भान नही होगा,,
और राम नाम का जाप करने से ये लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाएंगे,,

इतना सुनते ही बाली अपने बल के मद चूर हनुमान जी से बोला- ए तुच्छ वानर,, तू हमें शिक्षा दे रहा है, राजकुमार बाली को,,
जिसने विश्व के सभी योद्धाओं को धूल चटाई है,,

और जिसके एक हुंकार से बड़े से बड़ा पर्वत भी खंड खंड हो जाता है,,

जा तुच्छ वानर, जा और तू ही भक्ति कर अपने राम वाम के,,

और जिस राम की तू बात कर रहा है,
वो है कौन,

और केवल तू ही जानता है राम के बारे में,

मैंने आजतक किसी के मुँह से ये नाम नही सुना,

और तू मुझे राम नाम जपने की शिक्षा दे रहा है,,

हनुमान जी ने कहा- प्रभु श्री राम, तीनो लोकों के स्वामी है,,
उनकी महिमा अपरंपार है,
ये वो सागर है जिसकी एक बूंद भी जिसे मिले वो भवसागर को पार कर जाए,,

बाली- इतना ही महान है राम तो बुला ज़रा,,
मैं भी तो देखूं कितना बल है उसकी भुजाओं में,,

बाली को भगवान राम के विरुद्ध ऐसे कटु वचन हनुमान जो को क्रोध दिलाने के लिए पर्याप्त थे,,

हनुमान- ए बल के मद में चूर बाली,,
तू क्या प्रभु राम को युद्ध मे हराएगा,,
पहले उनके इस तुच्छ सेवक को युद्ध में हरा कर दिखा,,

बाली- तब ठीक है कल के कल नगर के बीचों बीच तेरा और मेरा युद्ध होगा,,

हनुमान जी ने बाली की बात मान ली,,

बाली ने नगर में जाकर घोषणा करवा दिया कि कल नगर के बीच हनुमान और बाली का युद्ध होगा,,

अगले दिन तय समय पर जब हनुमान जी बाली से युद्ध करने अपने घर से निकलने वाले थे,,
तभी उनके सामने ब्रम्हा जी प्रकट हुए,,

हनुमान जी ने ब्रम्हा जी को प्रणाम किया और बोले- हे जगत पिता आज मुझ जैसे एक वानर के घर आपका पधारने का कारण अवश्य ही कुछ विशेष होगा,,

ब्रम्हा जी बोले- हे अंजनीसुत, हे शिवांश, हे पवनपुत्र, हे राम भक्त हनुमान,,
मेरे पुत्र बाली को उसकी उद्दंडता के लिए क्षमा कर दो,,

और युद्ध के लिए न जाओ,

हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु,,
बाली ने मेरे बारे में कहा होता तो मैं उसे क्षमा कर देता,,
परन्तु उसने मेरे आराध्य श्री राम के बारे में कहा है जिसे मैं सहन नही कर सकता,,
और मुझे युद्ध के लिए चुनौती दिया है,,
जिसे मुझे स्वीकार करना ही होगा,,
अन्यथा सारी विश्व मे ये बात कही जाएगी कि हनुमान कायर है जो ललकारने पर युद्ध करने इसलिए नही जाता है क्योंकि एक बलवान योद्धा उसे ललकार रहा है,,

तब कुछ सोंच कर ब्रम्हा जी ने कहा- ठीक है हनुमान जी,,
पर आप अपने साथ अपनी समस्त सक्तियों को साथ न लेकर जाएं,,
केवल दसवां भाग का बल लेकर जाएं,,
बाकी बल को योग द्वारा अपने आराध्य के चरणों में रख दे,,
युद्ध से आने के उपरांत फिर से उन्हें ग्रहण कर लें,,

हनुमान जी ने ब्रम्हा जी का मान रखते हुए वैसे ही किया और बाली से युद्ध करने घर से निकले,,

उधर बाली नगर के बीच मे एक जगह को अखाड़े में बदल दिया था,,

और हनुमान जी से युद्ध करने को व्याकुल होकर बार बार हनुमान जी को ललकार रहा था,,

पूरा नगर इस अदभुत और दो महायोद्धाओं के युद्ध को देखने के लिए जमा था,,

हनुमान जी जैसे ही युद्ध स्थल पर पहुँचे,,
बाली ने हनुमान को अखाड़े में आने के लिए ललकारा,,

ललकार सुन कर जैसे ही हनुमान जी ने एक पावँ अखाड़े में रखा,,

उनकी आधी शक्ति बाली में चली गई,,

बाली में जैसे ही हनुमान जी की आधी शक्ति समाई,,

बाली के शरीर मे बदलाव आने लगे,
उसके शरीर मे ताकत का सैलाब आ गया,
बाली का शरीर बल के प्रभाव में फूलने लगा,,
उसके शरीर फट कर खून निकलने लगा,,

बाली को कुछ समझ नही आ रहा था,,

तभी ब्रम्हा जी बाली के पास प्रकट हुए और बाली को कहा- पुत्र जितना जल्दी हो सके यहां से दूर अति दूर चले जाओ,

बाली को इस समय कुछ समझ नही आ रहा रहा,,
वो सिर्फ ब्रम्हा जी की बात को सुना और सरपट दौड़ लगा दिया,,

सौ मील से ज्यादा दौड़ने के बाद बाली थक कर गिर गया,,

कुछ देर बाद जब होश आया तो अपने सामने ब्रम्हा जी को देख कर बोला- ये सब क्या है,

हनुमान से युद्ध करने से पहले मेरा शरीर का फटने की हद तक फूलना,,
फिर आपका वहां अचानक आना और ये कहना कि वहां से जितना दूर हो सके चले जाओ,

मुझे कुछ समझ नही आया,,

ब्रम्हा जी बोले-, पुत्र जब तुम्हारे सामने हनुमान जी आये, तो उनका आधा बल तममे समा गया, तब तुम्हे कैसा लगा,,

बाली- मुझे ऐसा लग जैसे मेरे शरीर में शक्ति की सागर लहरें ले रही है,,
ऐसे लगा जैसे इस समस्त संसार मे मेरे तेज़ का सामना कोई नही कर सकता,,
पर साथ ही साथ ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर अभी फट पड़ेगा,,,

ब्रम्हा जो बोले- हे बाली,

मैंने हनुमान जी को उनके बल का केवल दसवां भाग ही लेकर तुमसे युद्ध करने को कहा,,
पर तुम तो उनके दसवें भाग के आधे बल को भी नही संभाल सके,,

सोचो, यदि हनुमान जी अपने समस्त बल के साथ तुमसे युद्ध करने आते तो उनके आधे बल से तुम उसी समय फट जाते जब वो तुमसे युद्ध करने को घर से निकलते,,

इतना सुन कर बाली पसीना पसीना हो गया,,

और कुछ देर सोच कर बोला- प्रभु, यदि हनुमान जी के पास इतनी शक्तियां है तो वो इसका उपयोग कहाँ करेंगे,,

ब्रम्हा- हनुमान जी कभी भी अपने पूरे बल का प्रयोग नही कर पाएंगे,,
क्योंकि ये पूरी सृष्टि भी उनके बल के दसवें भाग को नही सह सकती,,

ये सुन कर बाली ने वही हनुमान जी को दंडवत प्रणाम किया और बोला,, जो हनुमान जी जिनके पास अथाह बल होते हुए भी शांत और रामभजन गाते रहते है और एक मैं हूँ जो उनके एक बाल के बराबर भी नही हूँ और उनको ललकार रहा था,,
मुझे क्षमा करें,,

और आत्मग्लानि से भर कर बाली ने राम भगवान का तप किया और अपने मोक्ष का मार्ग उन्ही से प्राप्त किया,,

तो बोलो,
पवनपुत्र हनुमान की जय,
जय श्री राम जय श्री राम,

कृपया ये कथा जन जन तक पहुचाएं,
और पुण्य के भागी बने,,
जय श्री राम जय हनुमान,
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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पिता की परम इच्छा


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April 4, 2017

एक पिता थे । उनका एक पुत्र था । पिता बहुत आध्यात्मिक थे । उच्च ज्ञानी , पण्डित, भक्त , सेवक। सब । अब उनका उद्देश्य था कि उनका बच्चा भी जीवन की यथार्थता अच्छे से समझ ले । सो बचपन से सत्संग लेकर जाते ।

छोटे पन से ही अपने साथ सैर पर लेकर जाते और पूछते , बेटा क्या दिख रहा है ? बच्चा कहता बादल, आकाश, फूल, पेड़ इत्यादि इत्यादि !

पिता पूछते और ??

बच्चा और चीज़ें गिना देता …

पिता चुप हो जाते।

बच्चा बड़ा हुआ । स्वाध्याय कर रहा था । पिता ने पूछा – बेटा ! क्या दिख रहा है ? बेटा बोला – पिता जी , शब्द, किताब, पन्ने, चित्र ।

पिता ने पूछा और ?

बच्चा कहता – बस यही पिता जी ।

बच्चा और बड़ा हुआ । सत्संग से वापिस आ रहे थे । पिता ने पूछा – बेटा ! सत्संग में क्या देखा ?

बेटा बोला – पिताजी , गुरूमहाराज, संगीतज्ञ, सत्संगी, चित्र, सुंदर सजावट, विभिन्न तरह के लोग ….

पिता ने लम्बी सांस ली । और चुप हो गए ।

बेटा और बड़ा हुआ । पिता अब वृद्ध हो चले थे । क्प्यूटर व फ़ोन का ज़माना आया । पिता ने देखा बेटा फ़ोन पर स्वाध्याय इत्यादि चर्चा करता है । पिता ने पूछा – बेटा , फ़ोन पर क्या देखा । बेटे ने कहा – यहाँ तो बहुत कुछ है पिता जी । देश विदेश के ग्रंथ । गुरू महाराज के वचन, विभिन्न रोमांचकारी प्रवचन !बहुत है !!

पिता के अांखों से अश्रु की धारा बह गई । और चुप चाप कमरे में चले गए । पिता बिमार रहने लगे पर उदास ज्यादा ।

बेटा अच्छा था । भाँप रहा था कि पिता जी परेशान हैं ।

एक दिन पिता सो रहे थे । आँखों पर सूखे आंसु थे । उसने प्यार से पिता जी के सिर पर हाथ रख कर फेरा । उसकी आँखें भरी हुई थी । एक आंसु टपक कर नीचे गिरा ! और पिता जी की जाग खुल गई । पिताजी बोले – क्या हुआ ? तू यहाँ क्या कर रहा है ?

वह बोला – आप बचपन से मुझ से पूछते आए हैं कि क्या देखा ? हैं न ?

पिताजी सजग हुए ! कि यह क्या ?

बेटा बोला – बाबा ! बादल मे , पक्षी में, फलों में राम ही थे ।व राम से ही सब थे । किताब के, ग्रंथ के पन्नों में,शब्दों में, चित्रों में राम ही थे व राम से ही सब हैं , सत्संग मे केवल राम ही थे बाबा ! फ़ोन में राम के ही शब्द । आप में व मुझ मे बस राम ही है !

यही सुनना चाहते थे न आप?

पिताजी के अश्रुओं की धारा बहती गई । बोले – जब तुझे पता तो बोला क्यो नहीं ?

बेटा बोला – पता था । पर समझ नहीं थी । पता था पर अनुभव नहीं था ! अभी भी पता है पर प्रबुद्धता नहीं है, सो कैसे कहता कि सब राम है सब राम ही से है ?

पिताजी प्यार से बोले – कोंई बात नहीं । सब हो जाएगा ।

पिताजी ने करवट बदली और आज बहुत वर्षों बाद मुस्कुराते हुए सोए …

श्री श्री चरणों में 🙏🙏🙏

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संजय सिंह, भारतीय खिलाड़ी, दूध के कर्ज का सम्मान करते हुए।
जिस गाय के दूध ने उन्हें 3 गोल्ड मैडल लाने के लिए सक्षम बनाया।
उसी गाय को नमन करते हुए।
ये है,वो भारतीय संस्कृति, जिसे गौ हत्यारे कभी नही समझ सकते। कोई संस्कार इनसे सीखे।….जय माँ भारती।