Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

व्रज के भक्त…
(((( जीवन ठाकुर ))))
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जीवन ठाकुर बड़े धर्मात्मा व्यक्ति थे। पर उनका सारा जीवन दरिद्रता से जूझते बीता था।
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अब वृद्धावस्था में उससे जूझते नहीं बन रहा था। हारकर एक दिन उन्होंने विश्वनाथ बाबा से प्रार्थना की-
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बाबा, अब कृपा करो। दारूण दरिद्रता के थपेड़े झेलने में मैं अब बिलकुल असमर्थ हूँ। ऐसी कृपा करो जिससे दरिद्रता का मुख मुझे और न देखना पड़े।
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विश्वनाथ बाबा ने प्रार्थना सुन ली। स्वप्न में आदेश दिया- तू व्रज जाकर सनातन गोस्वामी की शरण ले। उनकी कृपा से तेरा सब दु:ख दूर हो जायगा।
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जीवन ठाकुर ने व्रज जाकर सनातन गोस्वामी से अपना रोना रोया। सनातन गोस्वामी को उनकी सब बात सुनकर बड़ा विस्मय हुआ।
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वे सोचने लगे-मैं स्वयं, डौर-कौपीनधारी कंगाल वैष्णव हूँ। एक कंगाल दूसरे कंगाल की क्या सहायता कर सकता है ?
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फिर विश्वनाथ बाबा ने उसे आश्वासन दे मेरे पास क्यों भेजा ? हठात् उनके स्मृति-पटल पर जाग गयी एक पुरानी घटना।
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एक बार भावमग्न अवस्था में जमुनातट पर टहलते समय उनके पैर से टकरा गया था एक स्पर्शमणि।
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उसे उन्होंने अपने भजन –पथ में विघ्न जान जमुना में फेंक देना चाहा थां पर यह सोचकर कि शायद कभी किसी दरिद्र व्यक्ति के काम आये वहीं एक गुप्त स्थान में रख दिया था।
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जीवन ठाकुर को उस गुप्त स्थान का संकेत करते हुए उन्होंने कहा- तुम जाकर उस मणि को ले लो। तुम्हारा दारिद्रय दूर हो जायगा।
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जीवन ठाकुर वहाँ गये। स्पर्शमणि को प्राप्त कर उनके आनन्द की अवधि न रही। आनन्दाश्रु से नेत्र भर आये। मन तरह-तरह की उड़ाने भरने लगा। वे अब दरिद्र नहीं रहे।
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अब वे स्पर्शमणि के सहारे इतना धन प्राप्त कर लेंगे कि राजा भी उनके ईर्षा करने लग जायेंगे।
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मन ही मन विश्वनाथ बाबा की जय बोलते हुए और सनातन गोस्वामी के प्रति कृतज्ञता अनुभव करते हुए वे आनन्दाम्बुधि में तैरते चले जा रहे थे।
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हठात् एक नयी तरंग उनके मस्तिष्क से जा टकराई। बिजली-की सी एक करेंट ने उनकी चेतना को झकझोर दिया। विस्मय के साथ लगे सोचने-
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जिस धन के लोभ से काशी से पैदल भागता आया हूँ, उसके प्रति सनातन गोस्वामी की ऐसी उदासीनता !
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इतने दिन से उसे एक जगह पटककर ऐसे भूल जाना, जैसे वह कोई वस्तु ही नहीं।
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जिस रत्न का लोभ राजाओं तक को उन्मत्त कर दे, उसका उनके द्वारा ऐसा तिरस्कार !
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निश्चय ही वे किसी ऐसे धन के धनी हैं, जिसकी तुलना में यह राजवाञ्छित रत्न इतना तुच्छ है। तभी तो वे इतना वैभव और राज-सम्मान त्याग कर करूआ-कंथाधारी त्यागी बाबाजी बने हैं।
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और एक मैं हूँ, जो उस तुच्छ वस्तु को प्राप्त कर अपने को धन्य मान रहा हूँ।
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जिस वैषयिक जीवन को त्यागकर वे इस प्रकार आप्तकाम और आनन्दमग्न हैं, उसी में मैं एक विषयकीट के समान और अधिक लिप्त होता जा रहा हूँ। धिक्कार है मुझे और मेरी विषयलिप्सा को।
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मैंने जब विश्वनाथ बाबा की कृपा से ऐसे महापुरुष का सान्निध्य नाभ किया है, तो क्यों न उनसे उस परमधन को प्राप्तकर अपना जीवन सार्थक करूँ, जिसे प्राप्त कर वे इतना सुखी हैं ?
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सनातन गोस्वामी के क्षणभर के संग से जीवन ठाकुर के जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ।
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वह अमूल्य रत्न, जो अभी थोड़ी देर पहले उनके मृतदेह में नयी जान डालता लग रहा था, अब उन्हें साँप-बिच्छू की तरह काटने लगा।
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उसे जमुना में फेंक उन्होंने उस यंत्रणा से अपने को मुक्त किया। फिर तुरन्त सनातन गोस्वामी के पास जाकर उनके प्रति आत्म-समर्पण करते हुए आर्त स्वर से प्रार्थना की-
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प्रभु, आपकी अहैतुकी कृपा से मेरा मोहाधंकार जाता रहा। अब आप मुझे लौकिक धन के बजाय उस अलौकिक धन का धनी बनने की कृपा करें, जिसके आप स्वयं धनी हैं।
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मैं आज से आपके चरणों में पूर्णरूप से समर्पित हूँ।
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सनातन गोस्वामी से दीक्षा लेकर जीवन ठाकुर ने आरम्भ किया अपने जीवन का एक नया अध्याय और उनके द्वारा निर्दिष्ट पथ पर चलकर प्राप्त किया वह अलौकिक धन।
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इन्हीं जीवन ठाकुर के वंशज हुए हैं काठ-मागुण के प्रसिद्ध गोस्वामी परिवार के गोस्वामीगण।
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प्रवाद है कि जीवन ठाकुर ने जब स्पर्शमणि जमुना में फेंक दिया, तो दिल्ली के बादशाह को इसका पता चला।
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उसने अपने आदमियों को भेजा उसकी खोज करने। उन्होंने हाथियों को जमुना में उतारकर उसकी खोज आरम्भ की।
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मणि तो उन्हें मिला नहीं। पर दैवयोग से एक हाथी के पैर की जंजीर मणि से टकराकर सोने की हो गयी।

संजय गुप्ता

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