Posted in रामायण - Ramayan

रामचरितमानस का एक अत्यंत भावुक प्रसंग राम भरत मिलाप की कथा,,,,,,

  • परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू॥
    हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥

भरतजी का परम पवित्र आचरण (चरित्र) मधुर, सुंदर और आनंद-मंगलों का करने वाला है। कलियुग के कठिन पापों और क्लेशों को हरने वाला है। महामोह रूपी रात्रि को नष्ट करने के लिए सूर्य के समान है॥

हिंदु पौराणिक कथाओं में रामायण और महाभारत का नाम सबसे पहले लिया जाता हैं। सबसे पहले युग आया था – रामायण का, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का युग और उसे ही कहा जाता था – “राम राज्य”

रामायण में वैसे तो कई ऐसे प्रसंग हैं, जो बड़े ही मार्मिक हैं और आपकी आँखों से अश्रुधारा बहा सकते थे, जैसे -: माता सीता का अपहरण, उनकी अग्नि परीक्षा, लव कुश का बाल पण, आदि।

इन प्रसंगों की ही तरह एक बहुत ही चर्चित प्रसंग रहा हैं –राम भरत मिलाप का।यह प्रसंग इतना चर्चित हैं कि आज भी कोई बहुत समय बाद बड़ी ही प्रेम भावना से मिलता हैं तो लोग इसे राम भरत मिलाप की ही उपमा देते हैं।

रघुकुल वंश के महाराज दशरथ के चारों पुत्र– राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न अपनी शिक्षा – दीक्षा पूर्ण करके अयोध्या लौट आते हैं, उसके पश्चात् चारों भाइयों का विवाह महाराज जनक की पुत्रियों से हो जाता हैं। ये सभी शुभ प्रसंग चलते रहते हैं और महाराज दशरथ अपने सबसे बड़े पुत्र राम को राजा बनाने का निर्णय लेते हैं।

इस निर्णय से सभी प्रसन्न होते हैं।परन्तु महारानी कैकयी की दासी मंथरा इस संबंध में कैकयी के मन में विष घोलती हैं और राम को राजा न बनने देने के लिए कैकयी को उकसाती हैं। वैसे तो महारानी कैकयी राम से बहुत प्रेम करती थी, परन्तु वे उस समय मंथरा की बातों में आ जाती हैं और इसी कारण उन्होंने महाराज दशरथ को विवश कर दिया कि वे भगवान राम को 14 वर्षों का वनवास दें और भरत को राज्य दे। महाराज दशरथ को भी विवशता में इस बात के कारण ये निर्णय लेनें पड़े और राम अपनी धर्मपत्नि सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वन की ओर चल दिए।

जब ये सब घटनाएँ हो रही थी, तब राजकुमार भरत और राजकुमार शत्रुघ्न अपने नानाजी के घर गये हुए थे। उन्हें इन सब घटनाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। अपने पुत्र राम के वियोग में महाराज दशरथ की मृत्यु हो गयी और ये दुखद समाचार सुनकर जब राजकुमार भरत और राजकुमार शत्रुघ्न वापस आए, तो उन्हें अपने बड़े भाई भगवान राम के साथ घटित हुई इस घटना के बारे में पता चला।

उनके ऊपर मानो दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा हो क्योंकि एक ओर पिता की अकस्मात मृत्यु हो गयी, तो दूसरी ओर जहाँ ये आशा थी कि पिता की मृत्यु के बाद पिता समान बड़े भाई राम की छत्रछाया में रहने की शांति भी उनसे छिन चुकी थी।

साथ ही साथ राज्य को कुशलता पूर्वक चलने की जिम्मेदारी भी अब राजकुमार भरत पर आ चुकी थी और इस जिम्मेदारी को वे कतई नहीं निभाना चाहते थे क्योंकि वे ये जानते और समझते थे कि अयोध्या राज्य पर अधिकार उनके बड़े भाई राम का हैं और उनसे यह अधिकार छीनकर माता कैकयी ने उन्हें यह अधिकार दिलाया हैं।

इस ग्लानि भाव से राजकुमार भरत भरे हुए होते हैं. साथ ही साथ वे अपने माता कैकयी से भगवान राम के प्रति किये गये उनके दुर्व्यवहार के लिए रुष्ट भी हैं।इन सभी भावनाओं से घिरे होने के कारण और भगवान राम को वापस अयोध्या लाने के लिए वे अपने बड़े भाई भगवान राम से मिलने का निश्चय करते हैं।

राजकुमार भरत का वन आगमन ,,,

राजकुमार भरत को यह पता चलता है कि प्रभु श्री राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नि सीता के साथ चित्रकूट में ठहरे हुए हैं, तब राजकुमार भरत तुरंत ही उनसे मिलने के लिए चित्रकूट की ओर प्रस्थान करते हैं। उनके साथ उनका सैन्य दल भी होता हैं क्योंकि वे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि कहीं बड़े भाई श्री राम को कोई क्षति न पहुंचा सकें, इसीलिए उनकी सुरक्षा हेतु वे सैनिकों के साथ जाते हैं।

वहीं दूसरी ओर चित्रकूट में भगवान श्री राम, लक्ष्मणजी और माता सीता अपनी कुटिया के बाहर शांति पूर्वक बैठे हुए हैं। तभी उन्हें कहीं से पदचाप और इस कारण धूल उड़ती हुई दिखाई देती हैं। कुछ ही समय में यह ध्वनि तीव्र हो जाती हैं और तभी कोई वनवासी उन्हें यह समाचार देता हैं कि “राजकुमार भरत अपनी सेना के साथ चित्रकूट पधार रहे हैं और जल्दी ही वे यहाँ पहुँच जाएँगे।

यह समाचार सुनकर लक्ष्मणजी बहुत क्रोधित हो जाते हैं और प्रभु श्री राम से कहते हैं कि “जैसी माता, वैसा पुत्र”. राजकुमार भरत अपनी सेना के साथ आप पर [बड़े भाई राम पर] हमला करने आ रहे हैं, वे यह सोचते हैं कि आप वन में अकेले हैं, हमारे पास कोई सैन्य शक्ति नहीं हैं तो वे आसानी से हमें मारकर अयोध्या का राज्य हड़प लेंगे।

तब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम लक्ष्मणजी को समझाते हुए कहते हैं कि “शांत हो जाओ लक्ष्मण, भरत ऐसा नहीं हैं, उसके विचार बहुत ही उच्च हैं और उसका चरित्र बहुत ही अच्छा हैं, बल्कि वो तो स्वप्न में भी अपने भाई के साथ ऐसा कुछ नहीं कर सकता”. इस पर भी लक्ष्मणजी का क्रोध शांत नहीं होता और वे कहते हैं कि राजकुमार भरत अपने उद्देश्य में कभी सफल नहीं होंगे और जब तक लक्ष्मण जीवित हैं, ऐसा नहीं होगा।

राम भरत मिलाप ,,राजकुमार भरत अपने बड़े भाई राम से मिलने को आतुर हैं और इसी कारण वे अपनी सेना में सबसे आगे चल रहे हैं और उनके साथ तीनों माताएँ, कुल गुरु, महाराज जनक और अन्य श्रेष्ठी जन भी हैं. ये सभी मिलकर प्रभु श्री राम को वापस अयोध्या ले जाने के लिए आये हैं।

जैसे ही राजकुमार भरत अपने बड़े भाई श्री राम को देखते हैं, वे उनके पैरों में गिर जाते हैं और उन्हें दण्डवत प्रणाम करते हैं, साथ ही साथ उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बहती हैं। भगवान राम भी दौड़ कर उन्हें ऊपर उठाते हैं और अपने गले से लगा लेते हैं, दोनों ही भाई आपस में मिलकर भाव विव्हल हो उठते हैं, अश्रुधारा रुकने का नाम ही नहीं लेती और ये दृश्य देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग भी भावुक हो जाते हैं।

तब राजकुमार भरत पिता महाराज दशरथ की मृत्यु का समाचार बड़े भाई श्री राम को देते हैं और इस कारण श्री राम, माता सीता और छोटा भाई लक्ष्मण बहुत दुखी होते हैं. भगवान राम नदी के तट पर अपने पिता महाराज दशरथ को विधी – विधान अनुसार श्रद्धांजलि देते हैं और अपनी अंजुरी में जल लेकर अर्पण करते हैं।

अगले दिन जब भगवान राम, भरत, आदि पूरा परिवार, महाराज जनक और सभासद, आदि बैठे होते हैं तो भगवान राम अपने अनुज भ्राता भरत से वन आगमन का कारण पूछते हैं. तब राजकुमार भरत अपनी मंशा उनके सामने उजागर करते हैं कि वे उनका वन में ही राज्याभिषेक करके उन्हें वापस अयोध्या ले जाने के लिए आए हैं और अयोध्या की राज्य काज संबंधी जिम्मेदारी उन्हें ही उठानी हैं, वे ऐसा कहते हैं।

महाराज जनक भी राजकुमार भरत के इस विचार का समर्थन करते हैं. परन्तु श्री राम ऐसा करने से मना कर देते हैं, वे अयोध्या लौटने को सहमत नहीं होते क्योंकि वे अपने पिता को दिए वचन के कारण बंधे हुए हैं. राजकुमार भरत, माताएँ और अन्य सभी लोग भगवान राम को इसके लिए मनाते हैं, परन्तु वचन बद्ध होने के कारण भगवान श्री राम ऐसा करने से मना कर देते हैं।

तब राजकुमार भरत बड़े ही दुखी मन से अयोध्या वापस लौटने के लिए प्रस्थान करने की तैयारी करते हैं, परन्तु प्रस्थान से पूर्व वे अपने भैया राम से कहते हैं कि “अयोध्या पर केवल श्री राम का ही अधिकार हैं और केवल वनवास के 14 वर्षों की समय अवधि तक ही मैं उनके राज्य का कार्यभार संभालूँगा और इस कार्य भार को सँभालने के लिए आप मुझे आपकी चरण – पादुकाएं मुझे दे दीजिये, मैं इन्हें ही सिंहासन पर रखकर, आपको महाराज मानकर, आपके प्रतिनिधि के रूप में 14 वर्षों तक राज्य काज पूर्ण करूंगा, परन्तु जैसे ही 14 वर्षों की अवधि पूर्ण होगी, आपको पुनः अयोध्या लौट आना होगा अन्यथा मैं अपने प्राण त्याग दूंगा.”

राजकुमार भरत के ऐसे विचार सुनकर और उनकी मनःस्थिति को देखकर राजकुमार लक्ष्मण को भी उनके प्रति अपने क्रोध पर पश्चाताप होता हैं कि उन्होंने इतने समर्पित भाई पर किस प्रकार संदेह किया और उन्हें इन दुखी घटनाओं के घटित होने का कारण समझा।

भगवान श्री राम भी अपने छोटे भाई भरत का अपार प्रेम, समर्पण, सेवा भावना और कर्तव्य परायणता देखकर उन्हें अत्यंत ही प्रेम के साथ अपने गले से लगा लेते हैं।वे अपने छोटे भाई राजकुमार भरत को अपनी चरण पादुकाएं देते हैं और साथ ही साथ भरत के प्रेम पूर्ण आग्रह पर ये वचन भी देते हैं कि जैसे ही 14 वर्षों की वनवास की अवधि पूर्ण होगी, वे अयोध्या वापस लौट आएंगे।

अपने बड़े भाई श्री राम के इन वचनों को सुनकर राजकुमार भरत थोड़े आश्वस्त होते हैं और उनकी चरण पादुकाओं को बड़े ही सम्मान के साथ अपने सिर पर रखकर बहुत ही दुखी मन से अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं. अन्य सभी परिवार जन भी एक – दूसरे से बड़े ही दुखी मन से विदा लेते हैं।

राजकुमार भरत का अयोध्या पुनः आगमन ,,,
जब राजकुमार भरत अपने राज्य अयोध्या लौटते हैं तो प्रभु श्री राम की चरण पादुकाओं को राज्य के सिंहासन पर सुशोभित करते हैं और वे स्वयं अपने बड़े भाई श्री राम की ही तरह सन्यासी वस्त्र धारण करके उन्हीं की तरह जीवन यापन करने का निश्चय करते हैं।

वे अयोध्या के पास स्थित नंदीग्राम में एक साधारण सी कुटिया में रहते हैं और यहीं से प्रभु श्री राम के प्रतिनिधि के रूप में संपूर्ण राज – काज सँभालते हैं और अपने भाई श्री राम के राज्य की रक्षा करते हैं.

इस प्रकार श्री राम और भरत का मिलाप का यह भ्रातृत्व प्रेम से भरा प्रसंग समाप्त होता हैं।

शिक्षा -:इस प्रसंग का सबसे महत्व पूर्ण सन्देश हैं -: भ्रातृत्व प्रेम.यहाँ भगवान राम के आचरण से उनके उत्तम चरित्र और वचन बद्धता की प्रेरणा मिलती हैं।

यह कथा राजकुमार भरत का अपने भाई के प्रति अपार प्रेम, समर्पण, सेवा भावना का ज्ञान कराती हैं साथ ही साथ उनकी कर्तव्य परायणता को भी उजागर करती हैं।

लक्ष्मणजी के क्रोध में भी अपने बड़े भाई के प्रति प्रेम दिखता हैं, परन्तु राजकुमार भरत के प्रति बिना सोचे समझे विचार करने की भूल से यह शिक्षा मिलती हैं कि पूरी बात जाने बिना हम किसी विचार को सत्य न माने।

  • भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं।
    सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति॥

भावार्थ:-तुलसीदासजी कहते हैं- जो कोई भरतजी के चरित्र को नियम से आदरपूर्वक सुनेंगे, उनको अवश्य ही श्रीसीतारामजी के चरणों में प्रेम होगा और सांसारिक विषय रस से वैराग्य होगा॥

संजय गुप्ता

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