Posted in रामायण - Ramayan

रामचरितमानस के दो पात्र माता सुमित्रा ओर लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला एक विवेचन,,,,,,

मित्रो बात उस समय की है जब भगवान् श्री रामजी वनवास को जा रहे है, तब लक्ष्मणजी भी जाने को तैयार हुए, तब प्रभु रामजी ने लक्ष्मणजी को माता सुमित्राजी से आज्ञा लेने के लिये भेजते है, उस समय माता के भावों को दर्शाने की कोशिश करूँगा, साथ ही उर्मिलाजी जैसे नारी शक्ति के शौर्य के दर्शन भी कराऊँगा, आप सभी इस पोस्ट को ध्यान से पूरा पढ़े, और भारतीय नारी शक्ति की महानता के दर्शन करें।

लक्ष्मणजी माँ से वनवास में भगवान् के साथ जाने की आज्ञा मांगते है तब माता सुमीत्राजी ने कहा, लखन बेटा! मैं तो तेरी धरोहर की माँ हूँ, केवल गर्भ धारण करने के लिये भगवान् ने मुझे माँ के लिये निमित्त बनाया है, “तात तुम्हारी मातु बैदेही, पिता राम सब भाँति सनेही” सुमित्राजी ने असली माँ का दर्शन करा दिया।

अयोध्या कहाँ हैं? अयोध्या वहाँ है जहाँ रामजी है, और सुनो लखन “जौं पै सीय राम बन जाहीं अवध तुम्हार काज कछु नाहीं” अयोध्या में तुम्हारा कोई काम नहीं है, तुम्हारा जन्म ही रामजी की सेवा के लिये हुआ है और शायद तुमको यह भ्रम होगा कि भगवान् माँ कैकयी के कारण से वन को जा रहे हैं, इस भूल में मत रहना, लक्ष्मणजी ने पूछा फिर जा क्यो रहे हैं, माँ क्या बोली?

तुम्हरेहिं भाग राम बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं ।।

दूसरा कोई कारण नहीं है, आश्चर्य से लक्ष्मणजी ने कहा, माँ मेरे कारण क्यो वन जा रहे हैं? माँ ने कहा, तू जानता नहीं है अपने को, मैं तुझे जानतीं हूँ, तू शेषनाग का अवतार है, धरती तेरे शीश पर है और धरती पर पाप का भार इतना बढ गया है कि तू उसे सम्भाल नहीं पा रहा है, इसलिये राम तेरे सर के भार को कम कर रहे हैं “दूसर हेतु तात कछु नाहीं” और कोई दूसरा कोई कारण नहीं है।

जब भगवान् केवल तेरे कारण जा रहे हैं तो तुझे मेरे दूध की सौगंध है कि चौदह वर्ष की सेवा में स्वपन में भी तेरे मन में कोई विकार नहीं आना चाहियें, लक्ष्मणजी ने कहा माँ अगर ऐसी बात है तो सुनो जब आप स्वप्न की शर्त दे रही हो तो मै चौदह वर्ष तक सोऊँगा ही नहीं और जब सोऊँगा ही नहीं तो कोई विकार ही नहीं आयेगा।

सज्जनों! ध्यान दिजिये जब जगत का अद्वितीय भाई लक्ष्मणजी जैसा है जो भैया और भाभी की सेवा के लिये चौदह वर्ष जागरण का संकल्प लें रहा है, अगर छोटा भाई बडे भाई की सेवा के लिए चौदह वर्ष का संकल्प लेता है तो बडा भाई पिता माना जाता है, उन्हें भी पिता का भाव चाहिये, जैसे पिता अपने पुत्र की चिंता रखता है, ऐसे ही बडा भाई अपने छोटे भाई की पुत्रवत चिंता करें, लेकिन भगवान् श्री रामजी तो जगत के पिता हैं।

ऐसी सुमित्राजी जैसी माताओं के कारण ऐसे भक्त पुत्र पैदा हुयें, सेवक पैदा हुए, महापुरूष पैदा हुए, कल्पना कीजिये “अवध तुम्हार काज कछु नाहीं” जाओ भगवान् की सेवा में, यहाँ तुम्हारा कोई काम नहीं है और अब हम अपने ऊपर विचार करे, अनुभव क्या कहता है? लडका अगर शराबी हो जाए परिवार में चल सकता है, लडका अगर दुराचारी हो जाए तो भी चलेगा, जुआरी हो जाये तो भी चलेगा, बुरे से बुरा बन जाये तो भी चलेगा।

लेकिन लडका साधु हो जाये, संन्यासी हो जाये, समाजसेवक बन जाये, तो नहीं चलेगा, अपना-अपना ह्रदय टटोलो कैसा लगता है? सारे रिश्तेदारों को इकट्ठा कर लेते हैं कि भैया इसे समझाओ, सज्जनों! हम चाहते तो है कि इस देश में महापुरुष पैदा हो, हम चाहते तो है कि राणा और शिवाजी इस देश में बार-बार जन्म लें लेकिन मैरे घर में नहीं पडौसी के घर में।

क्या इससे धर्म बच सकता है? क्या इससे देश बच सकता है? कितनी माँओं ने अपने दुधमुंहे बच्चों को इस देश की रक्षा के लिए दुश्मनों के बंदुक की गोलियाँ खाकर मरते हुयें अपनी आखों के सामने देखा है, आप कल्पना कर सकते हो कि माँ के ऊपर क्या बीती होगी? तेरह साल का बालक माँ के सामने सिर कटाता है, माँ ने आँखें बंद कर लीं, कोई बात नहीं जीवन तो आना और जाना है, देह आती है और जाती है, धर्म की रक्षा होनी चाहिये।

जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उनकी रक्षा करता है, “धर्मो रक्षति रक्षितः” इस देश की रक्षा के लिए कितनी माताओं की गोद सूनी हुई, कितनी माताओं के सुहाग मिटे, कितनों की माथे की बिंदी व सिन्दूर मिट गयें, कितनो के घर के दीपक बुझे, कितने बालक अनाथ हुये, कितनो की राखी व दूज के त्यौहार मिटे, ये देश, धर्म, संस्कृति तब बची है, ये नेताओं के नारो से नहीं बची, ये माताओं के बलिदान से बची, इस देश की माताओं ने बलिदान किया।

सज्जनों! हमने संतो के श्रीमुख से सुना है जब लक्ष्मणजी सुमित्रामाताजी के भवन से बाहर आ रहे हैं और रास्ते में सोचते आ रहे हैं कि उर्मिला से कैसे मिलुं इस चिन्ता में डूबे थे कि उर्मिला को बोल कर न गये तो वह रो-रो कर प्राण त्याग देगी, और बोल कर अनुमति लेकर जाएंगे तो शायद जाने भी न दे और मेरे साथ चलने की जिद्द करेगी, रोयेंगी और कहेंगी कि जब जानकीजी अपने पति के साथ जा सकती है तो मैं क्यों नहीं जा सकती?

लक्ष्मणजी स्वय धर्म है लेकिन आज धर्म ही द्वंन्द में फँस गया, उर्मिलाजी को साथ लेकर जाया नहीं जा सकता और बिना बतायें जाये तो जाये कैसे? रोती हुई पत्नी को छोड कर जा भी तो नहीं सकते, दोस्तों! नारी के आँसू को ठोकर मारना किसी पुरुष के बस की बात नहीं, पत्थर दिल ह्रदय, पत्थर ह्रदय पुरूष भी बडे से बडे पहाड को ठुकरा सकता है लेकिन रोती हुई पत्नी को ठुकरा कर चले जाना किसी पुरुष के बस की बात नहीं है।

लक्ष्मणजी चिंता में डूबे हैं अगर रोई तो उन्हें छोडा नहीं जा सकता और साथ लेकर जाया नहीं जा सकता करे तो करे क्या? इस चिन्ता में डूबे थे कि उर्मिलाजी का भवन आ गया, इधर उर्मिलाजी को घटना की पहले ही जानकारी हो चुकी है और इतने आनन्द में डूबी है कि मैरे प्रभु, मैरे पति, मैरे सुहाग का इतना बडा सौभाग्य कि उन्हें प्रभु की चरणों की सेवा का अवसर मिला है।

पति की सोच में डूबी श्रंगार किए बैठी है, वो वेष धारण किया जो विवाह के समय किया था, कंचन का थाल सजाया, आरती का दीप सजाकर प्रतीक्षा करती है, विश्वास है कि आयेंगे अवश्य, बिना मिले तो जा नहीं सकते? भय में डूबे लक्ष्मणजी आज कांप रहे है, सज्जनों! आप तो जानते ही है कि लक्ष्मणजी शेषनाग के अवतार हैं और नाग को काल भी कहते हैं।

आप कल्पना कीजिये, इस देश की माताओं के सामने काल हमेशा कांपता है, संकोच में डूबे लक्ष्मणजी ने धीरे से कुण्डी खटखटाई, देवी द्वार खोलो, जैसे ही उर्मिलाजी ने द्वार खोला तो लक्ष्मणजी ने आँखें बंद कर लीं, निगाह से निगाह मिलाने का साहस नहीं, उनको भय लगता है, आँसू आ गयें, उर्मिलाजी समझ गई कि मैरे कारण मेरे पतिदेव असमंजस में आ गये हैं।

उर्मिलाजी ने दोनों हाथों से कंधा पकड लिया और कहा आर्यपुत्र घबराओ नहीं, धीरज धरो, मैं सब जानती हूंँ कि आप भगवान् के साथ वनवास जा रहे हैं, मैं आपको बिल्कुल नहीं रोकूँगी बल्कि मुझे खुशी है कि आपको भ्राता और भाभी की सेवा करने का मौका मिल रहा है, आप निश्चिंत होकर जाइये, मैं माँ सुमित्राजी का पूरा ध्यान रखूंगी।

मित्रो! इस प्रस्तुति को विस्तार देकर आगे की प्रस्तुति से उर्मिलाजी के शौर्य के और दर्शन करने की कोशिश करेंगे।

शेष जारी • • • • • • • • •

जय भारतीय नारी शक्ति!
जय माँ अम्बे!

संजय गुप्ता

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