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नात्युच्चशिखरो मेरुर्नातिनीचं रसातलम् ।
व्यवसायद्वितीयानां नात्यपारो महोदधि: ।।
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भावार्थ – जो मनुष्य लक्ष्यसिद्ध, आलस्य विहीन एवम् परम् पुरुषार्थी होता है (अपने स्वयं के प्रयत्नों पर निर्भर होता है), उसके लिए पर्वत की चोटी उंची नही, पॄथ्वी का तल नीचा नही और महासागर अनुल्लंघ्य नही, अर्थात् उसके लिये कुछ भी असम्भव नही है।
🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀

Posted in सुभाषित - Subhasit

एक ट्रक के पीछे एक
बड़ी अच्छी बात लिखी देखी….

“ज़िन्दगी एक सफ़र है,आराम से चलते रहो
उतार-चढ़ाव तो आते रहेंगें, बस गियर बदलते रहो”
“सफर का मजा लेना हो तो साथ में सामान कम रखिए
और
जिंदगी का मजा लेना हैं तो दिल में अरमान कम रखिए !!

तज़ुर्बा है हमारा… . .. _मिट्टी की पकड़ मजबुत होती है,
संगमरमर पर तो हमने …..पाँव फिसलते देखे हैं…!

👌👌👌👌😇😇

जिंदगी को इतना सिरियस लेने की जरूरत नही यारों,

यहाँ से जिन्दा बचकर कोई नही जायेगा!

जिनके पास सिर्फ सिक्के थे वो मज़े से भीगते रहे बारिश में ….

जिनके जेब में नोट थे वो छत तलाशते रह गए…

👌👌👌👌👌👌👌

पैसा इन्सान को ऊपर ले जा सकता है;

लेकिन इन्सान पैसा ऊपर नही ले जा सकता……

👌👌👌👌👌👌👌👌

कमाई छोटी या बड़ी हो सकती है….

पर रोटी की साईज़ लगभग सब घर में एक जैसी ही होती है।

:👌 शानदार बात👌

इन्सान की चाहत है कि उड़ने को पर मिले,

और परिंदे सोचते हैं कि रहने को घर मिले…

‬👌👌👌👌👌😇😇

कर्मो’ से ही पहचान होती है इंसानो की…

महेंगे ‘कपडे’ तो,’पुतले’ भी पहनते है दुकानों में !!..

😎😎😇😇😇
मुझे नही पता कि मैं एक बेहतरीन ईसान हूँ या नही...
लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि
मैं जिस को भी ये भेज रहा हूँ वो बहुत
_बहुत बेहतरीन है✍👏
अच्छा लगा तौ शैयर अवश्य करै🙏

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

Full comedy😁😁😁😁

एक आदमी ने भगवान से पूछा- 😆

मैं सारा दिन काम करता हूं,
अपने परिवार के लिए इतनी मेहनत करता हूं मेरी पत्नी पूरा दिन घर में रह कर करती क्या है?😄😄

उसकी जिंदगी बहुत सरल है..।😜😜😜

भगवान बोले- 😁

क्यों न दो दिन के लिए तुम्हे पत्नी बना देते हैं और तुम्हारी बीवी को पति?🤗🤗🤗

आदमी मान गया..।😋😋

अगले दिन सुबह 5 बजे अलार्म बज गया..।😁

उसने उठ कर बच्चों का लंच बनाया,

फिर बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजा। 🤠

फिर पत्नी को उठा कर उनका नाश्ता बनाया..।😊

पत्नी के ऑफिस जाने के बाद घर साफ किया..।😌

अभी नाश्ता करने ही बैठा था कि कामवाली आ गयी..। 😳

वो गई तो बच्चों के स्कूल से आने का टाइम हो गया..।😪

उन्हें खाना खिलाया और होमवर्क करने बिठाया। 🤓

शाम के खाने की तैयारी कर के बच्चों की इवनिंग क्लास में ले गया।😪

शाम को पत्नी के आने पर खाना परोसा तो पत्नी ने उसमें 4 कमियां निकाल दी..।😡😡😡

अगले दिन सुबह उठकर सबसे पहले भगवान से प्रार्थना की कि भगवान मुझे वापस आदमी बना दो..।😭😭😭

मुझे समझ आ गया कि औरत कितना काम करती है..।😓
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कहानी में Twist..😁😁
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भगवान बोले 🤣🤣🤣🤣

वैसे तो तुझे 2 दिन के लिए औरत बनना था, लेकिन अब मैं चाह कर भी तुझे आदमी नहीं बना सकता😁😁😁😁

क्योंकि कल रात तू प्रेगनेंट हो गया है..🤣🤣🤣

मिलते हैं फिर 9 महीने बाद

😂😂😂😂😂😜😜😜😉😉

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

बाबर ने मुश्किल से कोई 4 वर्ष राज किया। हुमायूं को ठोक पीटकर भगा दिया। मुग़ल साम्राज्य की नींव अकबर ने डाली और जहाँगीर, शाहजहाँ से होते हुए औरंगजेब आते आते उखड़ गया।
कुल 100 वर्ष (अकबर 1556ई. से औरंगजेब 1658ई. तक) के समय के स्थिर शासन को मुग़ल काल नाम से इतिहास में एक पूरे पार्ट की तरह पढ़ाया जाता है….
मानो सृष्टि आरम्भ से आजतक के कालखण्ड में तीन भाग कर बीच के मध्यकाल तक इन्हीं का राज रहा….!
अब इस स्थिर (?) शासन की तीन चार पीढ़ी के लिए कई किताबें, पाठ्यक्रम, सामान्य ज्ञान, प्रतियोगिता परीक्षाओं में प्रश्न, विज्ञापनों में गीत, ….इतना हल्ला मचा रखा है, मानो पूरा मध्ययुग इन्हीं 100 वर्षों के इर्द गिर्द ही है।
जबकि उक्त समय में मेवाड़ इनके पास नहीं था। दक्षिण और पूर्व भी एक सपना ही था।
अब जरा विचार करें….. क्या भारत में अन्य तीन चार पीढ़ी और शताधिक वर्ष पर्यन्त राज्य करने वाले वंशों को इतना महत्त्व या स्थान मिला है ?
अकेला विजयनगर साम्राज्य ही 300 वर्ष तक टिका रहा। हीरे माणिक्य की हम्पी नगर में मण्डियां लगती थीं।महाभारत युद्ध के बाद 1006 वर्ष तक जरासन्ध वंश के 22 राजाओं ने । 5 प्रद्योत वंश के राजाओं ने 138 वर्ष , 10 शैशुनागों ने 360 वर्षों तक , 9 नन्दों ने 100 वर्षों तक , 12 मौर्यों ने 316 वर्ष तक , 10 शुंगों ने 300 वर्ष तक , 4 कण्वों ने 85 वर्षों तक , 33 आंध्रों ने 506 वर्ष तक , 7 गुप्तों ने 245 वर्ष तक राज्य किया । फिर विक्रमादित्य ने 100 वर्षों तक राज्य किया था । इतने महान सत्य व ईमान के जीवंत चरित्र के धनी सम्राट भारत के इतिहास में गुमनाम कर दिए गए।
इन सबसे पूर्व वेद एवं पुराणों का इतिहास तो छुआ ही नहीं गया है!
उनका वर्णन करते समय इतिहासकारों को मुँह का कैंसर हो जाता है। सामान्य ज्ञान की किताबों में पन्ने कम पड़ जाते हैं। पाठ्यक्रम के पृष्ठ सिकुड़ जाते हैं। कोचिंग वालों की नानी मर जाती है। प्रतियोगी परीक्षकों के हृदय पर हल चल जाते हैं।
वामपंथी इतिहासकारों ने नेहरूवाद का मल भक्षण कर, जो उल्टियाँ की उसे ज्ञान समझ चाटने वाले चाटुकारों…!तुम्हे धिक्कार है !!!
भारत की सर्वमंगलकारी, वसुधैव कुटुम्बकम् की असीम प्रेम व सहयोग की पतित-पावनी सनातन संस्कृति को भुलाकर,
सरकारी अनुदानों से मजहबी मानवबमों की बेलगाम जमात बनाकर मानवता के उद्धार के दिवास्वप्न देखे जा रहें हैं।

यह सब कैसे और किस उद्देश्य से किया गया है ये अभी तक हम ठीक से समझ नहीं पाए हैं और ना हम समझने का प्रयास कर रहे हैं!
जागो भारत और सदाचारी व चरित्रवान युवा तैयार करने वाली सर्वहितकारी गुरुकुलीय जीवनचर्या आधारित शिक्षा व्यवस्था लागू करवाएं।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बार एक सच्चे सतगुरु के शिष्यों में स्वयं को महाज्ञानी दिखाने की होड़ लगी हुई थी। एक दिन सच्चे सतगुरु ने सभी शिष्यों को अपने पास बुलाया। सतगुरु के पास अंगीठी में दहक रहे कोयले गर्मी की तपन दे रहे थे। उन्होंने अपने शिष्यों को कहा कि इसमें दहक रहा सबसे बड़ा कोयला निकाल कर मेरे पास रख दो ताकि मैं उसकी तपन को नजदीक से प्राप्त करूं।
गुरु की आज्ञा मानकर शिष्यों ने तुरंत एक बड़ा अंगारा निकाल कर सतगुरु के पास रख दिया। थोड़ी देर में जो अंगारा तेजस्वी दिख रहा था और दहक रहा था, वह धीरे-धीरे ठंडा होने लगा और उस पर राख जमने लगी। कुछ देर बाद वह पूरी तरह से मुरझा कर कोयला बन कर रह गया।

सतगुरु ने वह कोयला शिष्यों को दिखाते हुए कहा कि तुम सब लोग चाहे जितने तेजस्वी एवं ज्ञानी क्यों न हो, पर अपने जीवन में कोयले जैसी भूल ना कर बैठना। यह कोयला अगर अंगीठी में रहता तो देर तक गर्मी देता, परंतु अकेले यह ज्यादा देर तक न टिक सका। अब न तो इसका श्रेय रहा और न ही इसकी प्रतिभा का लाभ हम उठा सकते हैं। मर्यादाओं की वह अंगीठी ही वह अंगीठी है जिसमें प्रतिभाएं संयुक्त रूप से सार्थक होती हैं।

सनातन धर्म की अंगीठी में दहक रहे गर्मी को बरकार रखना होगा ,छोटे बड़े सभी एक साथ जलेंगे तो तपन बनी रहेगी .

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नवसंवत्सर विक्रम सवंत 2075 चैत्र नवरात्र….वर्ष प्रतिपदा…19 मार्च 2018 !!
राष्ट्रीय पंचांग की पहचान कालमान एवं तिथिगणना किसी भी देश की ऐतिहासिकता की आधारशिला होती है। किंतु जिस तरह से हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओँ को विदेशी भाषा अंग्रेजी का वर्चस्व धूमिल रहा है, कमोवेश यही हश्र हमारे राष्ट्रीय पंचांग, मसलन कैलेण्डर का है। किसी पंचांग की कालगणना का आधार कोई न कोई प्रचलित संवत होता है।

हमारे राष्ट्रीय पंचांग का आधार शक संवत है। शक संवत को राष्ट्रीय संवत मानना नहीं चाहिए था, क्योंकि शक परदेशी थे और हमारे देश में हमलावर के रूप में आए थे। हालांकि यह अलग बात है कि शक भारत में बसने के बाद भारतीय संस्कृति में ऐसे रच बस गए कि उनकी मूल पहचान लुप्त हो गई। बावजूद शक संवत को राष्ट्रीय संवत की मान्यता नहीं देनी चाहिए थी, क्योंकि इसके लागू होने बाद भी हम इस संवत के अनुसार न तो कोई राष्ट्रीय पर्व व जयंतिया मानते है और न ही लोक परंपरा के पर्व। तय है इस संवत का हमारे दैनंदिन जीवन में कोई महत्व नहीं रह गया है। इसके वनिस्वत हमारे संपूर्ण राष्ट्र के लोक व्यवहार में विक्रम संवत के आधार पर तैयार किए जाने वाले पंचांग प्रचलन में हैं। इस पंचांग की विलक्षणता है कि यह ईसा संवत से तैयार ग्रेगियन कैलेंडर से भी 57 साल पहले वर्चस्व में आ गया था, जबकि शक संवत की शुरुआत ईसाई संवत के 78 साल बाद हुई थी। मसलन हमने कालगणना में गुलाम मानसिकता का परिचय देते हुए पिछड़ेपन को स्वीकारा।

प्राचीन भारत और मघ्य अमेरिका दो ही ऐसे देश थे, जहां आधुनिक सैकेण्ड से सूक्ष्मतर और प्रकाश वर्ष जैसे उत्कृष्ट कालमान प्रचलन में थे। अमेरिका में मय सभ्यता का वर्चस्व था। मय संस्कृति में शुक्र ग्रह के आधार पर कालगणना की जाती थी। विष्वकर्मा मय, दानवों के गुरू शुक्राचार्य का पौत्र और शिल्पकार त्वश्टा का पुत्र था। मय के वंशजों ने अनेक देषों में अपनी सभ्यता को विस्तार दिया। इस सभ्यता की दो प्रमुख विषेशताएं थी, स्थापत्य कला और दूसरी सूक्ष्म ज्योतिष व खगोलीय गणना में निपुणता। रावण की लंका का निर्माण इन्हीं मय दानवों ने किया था। मयों का गुरू भारत था। प्राचीन समय में युग, मनवन्तर, कल्प जैसे महत्तम और कालांश लघुतम समय मापक विधियां प्रचलन में थीं। समय नापने के कालांश को निम्न नाम दिए गए है, निमेश यानी 1 तुट 2 तुट यानी लव, 2 लव यानी निमेश, 5निमेश यानी एक काश्ठा, 30काश्ठा यानी कला 40 कला यानी नाडि़का, 2 नाडि़या यानी मुहुर्त यानी, अहोरत्र, 15 अहोरत्र यानी। पक्ष, 7 अहोरत्र यानी। सप्ताह, 2 सप्ताह यानी। पक्ष, 2 पक्ष यानी। मास, 12 मास यानी। ईसा से 1000 से 500 साल पहले ही भारतीय ऋषियों ने अपनी आष्चर्यजनक ज्ञानशक्ति द्वारा आकाश मण्डल के उन समस्त तत्वों का ज्ञान हासिल कर लिया था, जो कालगणना के लिए जरूरी थे, इसलिए वेद, उपनिषद् आयुर्वेद, ज्योतिष और बा्रहण संहिताओं में मास, क्रृतु, अयन, वर्ष , युग, ग्रह, ग्रहण, ग्रहकक्षा, नक्षत्र, विशव और दिन-रात का मान तथा उसकी वृद्धि हानी संबंधी विवरण पर्यात मात्रा में उपलब्ध है। हरेक तीसरे वर्ष चन्द्र और सौर वर्ष का तालमेल बिठाने के लिए एक अधिकमास जोड़ा गया हैं। इसे मलमास या पुरुषोत्तम भी कहा जाता है। ऋग्वेद की ऋचा संख्या 1,164,48 में एक पूरे वर्ष का विवरण इस प्रकार उल्लेखित है- ऋग्वेद में वर्ष को 12 चंद्र मासों में द्वादश प्रधयष्चक्रमेंक त्रीणि नम्यानी क उ तष्चिकेत। तस्मिन्त्सांक त्रिषता न षंकोवोडर्पिता शश्टिर्न चलाचलास। पूर्णमासी और अमावस्याओं के नाम और उनके फल बताए गए हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में 5 प्रकार की ऋतुओं का वर्णन है। तैत्तिरीय बा्रह्मण में ऋतृओं को पक्षी के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया है इसी तरह प्रश्न व्याकरण में 12 महिनों की तरह 12 तस्य ते वसन्त षिर ग्रिश्मों दक्षिण पक्ष वर्ष षरत पक्ष। हेमान्तो मघ्यम। अर्थात वर्ष का सिर वसंत है। दाहिना पंख ग्रीष्म, बायां पंख शरद । पूंछ वर्षा और हेमन्त को मघ्य भाग कहा गया है।

मसलन तैत्तिरिय ब्राह्मण काल में वर्ष और ऋतुओं की पहचान और उनके समय का निर्धारण प्रचलन में आ गया था। ऋतुओं की स्थिति सूर्य की गति पर आधारित थी। एक वर्ष में सौर मास की शुरुआत ,चंद्रमास के प्रारंभ से ही होता था। प्रथम वर्ष के सौर मास का आरंभ शुक्ल पक्ष की द्वादशी की तिथी के और आगे आने वाले तीसरे वर्ष में सौर मास का आरंभ कृष्ण पक्ष की अष्टमी से होता था। तैत्तिरीय ब्राह्मण में सूर्य के छह माह उत्तरायाण एवं छह माह दक्षिणायन में रहने की स्थिति का भी उल्लेख है। दरअसल जम्बू द्वीप के बीच में सुमेरू पर्वत है। सूर्य और चन्द्रमा समेत सभी ज्योतिष मण्डल इस पर्वत की परिक्रमा करते हे। सूर्य जब जम्बूद्वीप के अंतिम आभ्यातंर मार्ग से बाहर की और निकलता हुआ लवण समुद्र्र की ओर जाता है, तब इस काल को दक्षिणायन और जब सूर्य लवण समुद्र्र के अंतिम मार्ग से भ्रमण करता हुआ जम्बूद्वीप की और कूच करता है, तो इस कालखण्ड को उत्तरायण कहते है। ऋग्वेद में युग का कालखण्ड 5 वर्ष माना गया है। इस पांच साला युग के पहले वर्ष को संवत्सर, दूसरे को परिवत्सर, तीसरे को इदावत्सर, चैथे को अनुवत्सर और पांचवें वर्ष को इद्रवत्सर कहा गया है। इन सब उल्लेखों से प्रमाणित होता है कि ऋग्वैदिक काल से ही चंद्रमास और सौर वर्ष के आधार पर की गई कालगणना प्रचलन में आने लगी थी, जिसे जन सामान्य ने स्वीकार किया। चन्द्रकला की वृद्धि और उसके क्षय के निष्कर्षों को समय नापने का आधार माना गया। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के आधार पर उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की विधिवत शुरुआत की। इस दैंनंदिन तिथी गणना को पंचांग कहा गया। किंतु जब स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अपना राष्ट्रीय संवत अपनाने की बात आई तो राष्ट्र भाषा की तरह सांमती मानसिकता के लोगों ने विक्रम संवत को राष्ट्रीय संवत की मान्यता देने में विवाद पैदा कर दिए। कहा गया कि भारतीय काल गणना उलझाऊ है। इसमें तिथियों और मासों का परिमाप घटता-बढ़ता है, इसलिए यह अवैज्ञानिक है। जबकि राष्ट्रीय न होते हुए भी सरकारी प्रचलन में जो ग्रेगेरियन कैलेंडर है, उसमें भी तिथियों का मान घटता-बढ़ता है। मास 30 और 31 दिन के होते है। इसके आलावा फरवरी माह कभी 28 तो कभी 29 दिन का होता है। तिथियों में संतुलन बिठाने के इस उपाय को लीपईयर यानी अधिवर्ष कहा जाता है। ऋग्वेद से लेकर विक्रम संवत तक की सभी भारतीय कालगणनाओं में इसे अधिकमास ही कहा गया है।

ग्रेगेरियन केलैंण्डर की रेखाकिंत कि जाने वाली महत्वपूर्ण विसंगति यह है कि दुनिया भर की कालगणनाओं में वर्ष का प्रारंभ वसंत के बीच या उसके आसपास होता है, जो फागुन और चैत्र मास की शुरुआत होती है। इसी समय नई फसल पक कर तैयार होती है, जो एक ऋतुचक्र की शुरुआत होने का संकेत है। इसलिए हिंदी मास या विक्रम संवत में चैत्र और वैशाख महीनों को मधुमास कहा गया है। इसी दौरान चैत्र शुक्ल प्रतिपदा यानी गुड़ी पड़वा से नया संवत्सर प्रारंभ होता है। जबकि ग्रेगेरियन में नए साल की शुरुआत पौश मास अर्थात जनवरी से होती है, जो किसी भी उल्लेखनीय परिर्वतन का प्रतीक नहीं है। इसलिए वह ऋग्वैदिक काल से ही जनसामान्य में प्रचलन में थी। बावजूद हमने शक संवत को राष्ट्रीय संवत के रूप में स्वीकारा, जो शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है। क्योंकि शक विदेशी होने के साथ आक्रांता थे। चंद्र्रगुप्त द्व्रितिय ने शकों को उज्जैन में परास्त कर विक्रम संवत की उपयोगिता ऋतुओं से जुड़ी थी, उनका उत्तरी एवं मघ्य भारत में समूल नाश कर दिया और विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। यह ऐतिहासिक घटना ईसा सन् से 57 साल पहले धटी और विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की शुरुआत की। जबकि इन्हीं शकों की एक लड़ाकू टुकड़ी को कुशाण शासक कनिष्क ने मगध और पाटलीपुत्र में ईसा सन् के 78 साल बाद परास्त किया और शक संवत की शुरुआत की। विक्रमादित्य को इतिहास के पन्नों में षकारी भी कहा गया है, अर्थात शकों का नाश करने वाला शत्रु। शत्रुता तभी होती है जब किसी राष्ट्र की संप्रभुता और संस्कृति को क्षति पहुंचाने का कोई विदेशी काम करता है। इस सब के बावजूद राष्ट्रीयता के बहाने हमें ईसा संवत को त्यागना पड़ा तो विक्रम संवत की बजाए शक संवत को स्वीकार लिया। मसलन पंचांग यानी कैलेंडर की दुनिया में 57 साल आगे रहने की बजाय हमने 78 साल पीछे रहना उचित माना। अपनी गरिमा को पीछे धकेलना हमारी मानसिक गुलामी की विचित्र विडंबना है।

………….✍🏻हिन्दू समूह 🔱🚩

विकास खुराना