Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

(((((((((( भक्त की खिचड़ी ))))))))))
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श्री कृष्ण की परम उपासक कर्मा बाई जी भगवान को बाल भाव से भजती थीं. बाल रूप ठाकुर जी से वह रोज ऐसे बातें करतीं जैसे बिहारी जी उनके पुत्र हों और उनके घर में ही वास करते हैं.
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एक दिन उनकी इच्छा हुई कि बिहारी जी को फल-मेवे की जगह अपने हाथ से कुछ बनाकर खिलाउं. उन्होंने प्रभु से अपनी इच्छा से बता दी.
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भगवान तो भक्तों के लिए सर्वथा प्रस्तुत हैं. गोपाल बोले- जो भी बनाया हो वही खिला दो. भूख लगी है.
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कर्मा बाई जी ने खिचड़ी बनाई थी. ठाकुर जी को खिचड़ी दी और उन्होंने बड़े चाव से खाया. कर्मा बाई जी पंखा झलने लगीं कि कहीं गरम खिचड़ी से ठाकुर जी के मुंह न जल जाएं.
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संसार को अपने मुख में समाने वाले भगवान को भक्त एक माता की तरह पंखा कर रही हैं. भगवान भक्त की भावना में विभोर हो गए.
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भक्त वत्सल भगवान ने कहा- मुझे तो खिचड़ी बहुत अच्छी लगी. मेरे लिए आप रोज खिचड़ी ही पकाया करो. मैं तो यही खाउंगा.
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कर्मा बाई जी रोज सुबह उठतीं और सबसे पहले खिचड़ी बनातीं. बिहारी जी भी सुबह-सबेरे दौड़े आते. आते ही कहते माता जल्दी से मेरी प्रिय खिचड़ी लाओ.
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प्रतिदिन का यही क्रम बन गया. भगवान सुबह-सुबह आते, भोग लगाते और फिर चले जाते. एक बार एक साधु कर्मा बाई जी के पास आया.
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उसने सुबह-सुबह सबसे पहले खिचड़ी बनाते देखा तो नाराज होकर कहा-सर्व प्रथम नहा धोकर पूजा-पाठ करनी चाहिए लेकिन आपको तो पेट की चिंता सताने लगती है.
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कर्मा बाई जी बोलीं- क्यां करूं, संसार जिस भगवान की पूजा-अर्चना कर रही होती है, वही सुबह-सुबह भूखे आ जाते हैं. उनके लिए ही तो खिचड़ी बनाती हूं.
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साधु ने सोचा कि शायद कर्मा बाई की बुद्धि फिर गई है. जैसे भगवान इसकी बनाई खिचड़ी के लिए भूखे रह जाते हैं.
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उसने कहा कि तुम भगवान को अशुद्ध कर रही हो. सुबह स्नान के बाद पहले रसोई की सफाई करो. फिर भगवान के लिए भोग बनाओ.
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अगले दिन कर्मा बाई जी ने ऐसा ही किया. जैसे ही सुबह हुई भगवान आये और बोले माँ में आ गया, खिचड़ी लाओ.
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कर्मा बाई जी ने कहा- अभी में स्नान कर रही हूँ, थोडा रुको ! थोड़ी देर बाद भगवान ने आवाज लगाई, जल्दी कर माँ, मेरे मंदिर के पट खुल जायेगे मुझे जाना है.
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वह फिर बोलीं – अभी में सफाई कर रही हूँ, भगवान ने सोचा आज माँ को क्या हो गया. ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ.
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भगवान ने झटपट जल्दी-जल्दी खिचड़ी खायी, आज खिचड़ी में भी भाव का वह स्वाद नहीं आया. जल्दी-जल्दी में भगवान बिना पानी पिए ही भागे. बाहर संत को देखा तो समझ गये जरुर इसी ने कुछ सिखाया है.
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ठाकुर जी के मंदिर के पुजारी ने जैसे ही पट खोले तो देखा भगवान के मुख से खिचड़ी लगी थी. वे बोले- प्रभु ! ये खिचड़ी कैसे आप के मुख में लग गयी.
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भगवान ने कहा- पुजारी जी आप उस संत के पास जाओ और उसे समझाओ, मेरी माँ को कैसी पट्टी पढाई.
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पुजारी ने संत से सारी बात कही. संत घबराए और तुरंत कर्मा बाई जी के पास जाकर कहा- ये नियम धरम तो हम संतो के लिये है आप तो जैसे बनाती हो वैसे ही बनाएँ. ठाकुर जी खिचड़ी खाते रहे.
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भगवान अपनी बनाई व्यवस्था को कभी बदलते नहीं. सो एक दिन कर्मा बाई जी के भी प्राण छूटे. उस दिन भगवान बहुत रोए. पुजारी ने पट खोला तो देखा भगवान रो रहे थे.
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पुजारी ने रोने का कारण पूछा तो भगवान बोले- आज मेरी माँ इस लोक को छोड़कर मेरे लोक को विदा हो गई. अब मुझे कौन खिचड़ी बनाकर खिलाएगा.
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पुजारी ने कहा- प्रभु आप की माता की कमी महसूस न होने दी जाएगी. आज से सबसे पहले रोज खिचड़ी का भोग लगेगा
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इस तरह आज भी जगन्नाथ भगवान को खिचड़ी का भोग लगता है.
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ये दंत कथाएं हैं. भक्तों की भगवान के प्रति आस्था और बदले में भगवान का भक्तों के प्रति कई गुणा ज्यादा स्नेह को बताने के लिए ये कथाएं अस्तित्व में आईं.
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इनमें आप भक्ति का रस चखने की कोशिश करें तो आनंद आएगा. ईश्वर की शक्ति के आगे तर्क शीलता भी नतमस्तक होती है. तभी तो चिकित्सा विज्ञान के लोग भी कहते हैं- दवा से ज्यादा दुआ काम आएगी.

(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))

देव शर्मा

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