Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अघासुर वध की कथा
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एक दिन नन्दनंदन श्यामसुन्दर वन में कलेवा करने के विचार से, बड़े तडके उठ गये, और सिंगी कीमधुर ध्वनि सेअपने साथी ग्वालबालो को मन की बात जनाते हुए जगाया औरबछडो को आगे करके, वे ब्रजमंडल से निकल पड़े.

श्रीकृष्ण के साथ ही उनके प्रेमी सहस्त्रो ग्वालबाल छीके, बेत, सिंगी औरबाँसुरी,लेकर, घरों से चल पड़े, फिर उन्होंने वृन्दावन के लाल-पीले-हरे फलोसे, नयी-नयी कोपलों से गुच्छों से, रंग-बिरंगे फूलोंसे, मोरपंखो से, और गेरु आदिरंगीन धातुओ सेअपने को सजा लिया.

कोई किसीका बेत या बाँसुरी चुरा लेता, एक दूसरे कीतरफ फेक देते, फिर वापसलौटा देते, कोई भौरों केसाथ गुनगुना रहा है, कोई कोयलो केस्वर-में-स्वर मिलकर कुहू-कुहू कर रहे है,

कोई मोरो को देखकर नाचता, कोई बंदरों की पूंछ पकड़कर खीच रहे है,भगवान श्रीकृष्ण ज्ञानी संतो के लिए स्वयं ब्रह्मानंद के मूर्तिमान अनुभवहै दास्यभाव से युक्त भक्त के लिए वे आराध्येदेव देव परम ऐश्वर्येशाली परमेश्वर है.

बहुत जन्मो काश्रम और कष्ट उठाकर जिन्होंने अपनी इन्द्रियों और अन्तःकरण को वश में कर लिया है उन योगियों के लिए भगवान केचरण कमलों कीरज अप्राप्त है.

वही भगवान स्वयं ब्रजवासी ग्वालबाल की आँखों केसामने रहकर सदाखेल खेलते है. कभी उनके कंधे पर चढ़ जातेहै, कभी किसी के गले से लग जाते है,

उनके सौभाग्य की महिमाइससे अधिक क्या कहीजाये.इसी समय अघासुर नाम का महान दैत्य आ गया. उससे श्रीकृष्ण और ग्वालबालो की सुखमयी क्रीडा देखी ना गयी, वह इतना भयानक था, कि देवता भीउसकी मृत्यु की बाट देखते रहते थे,

वह पूतनाऔर बकासुर का छोटा भाई, कंस का भेजा हुआ था. श्रीकृष्ण को देखकर वहसोचने लगा कि यह ही मेरे भाईबहिन को मारने वाला है इसे मार दूँगा.

यह सोचकरवह अजगर का रूप धारण करके मार्ग में लेट गया,उसकावह शरीर एक योजन लंबे बड़े पर्वत केसमान विशाल एवं मोटाथा,वह बहुत ही अदभुद था.

उसकी नियत सब बालको कीनिगलने की थी इसलिए उसने गुफा के समान अपना बहुत बड़ा मुहँ फाड़ रखाथा उसका नीचे का होठ पृथ्वी, और ऊपर का होठ बादलों से लग रहा था, उसके जबड़े कंदराओ के समान थे,

और दाढे पर्वत केशिखर-सी जान पड़ती थी,जीभ एक चौड़ीलाल सड़क-सी दीखती थी,साँस आँधी के समान थी.अघासुर का रूप देखकर बालको नेसमझा कि यह भी वृन्दावन की शोभा है.

वे कौतुकवश खेल-खेल में उत्प्रेक्षा करने लगे–वे कहने लगेकि ये तो अजगर का खुला हुआमुहँ है.

इस प्रकार कहते हुएवे ग्वालबाल श्रीकृष्ण का सुन्दर मुख देखते औरताली पीट-पीटकर एक गुफा समझकर,अधासुर के मुहँ मेंचले गये.

उन अनजानबच्चो कीआपस में की हुई भ्रमपूर्ण बाते सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने सोच कि-‘अरे इन्हें तो सच्चासर्प भी झूठा प्रतीत होता है ‘.भगवान जान गये कि यह राक्षस है भला उनसे क्या छिपा है?सब ग्वालबाल अघासुरके पेट में चले गये.

पर उसने उन्हें निगला नहीं क्योकि वह इस बात की बाट देख रहा था कि श्री कृष्ण मुहँ मेंआ जाये तब सबको एक साथ निगल जाऊँगा.

भगवान भूत-भविष्य-वर्त्तमान,सबको प्रत्यक्ष देखतेरहते है वे स्वयंउसके मुहँ मेंघुस गये.अघासुर बछडो और ग्वालो के सहित भगवान श्रीकृष्ण को अपनी दाढ़ो सेचबाकर चूर-चूरकर डालना चाहता था.

परन्तु उसी समय अविनाशी श्रीकृष्ण ने बड़ी फुर्ती से अपना शरीर बढ़ा लिया.इसके बादभगवान नेअपने शरीर को इतना बड़ा कर लिया कि उसका गलाही रुँध गया .

वह व्याकुल होकर बहुत ही छटपटाने लगा साँसरुककर सारे शरीर मेंभर गयी.और अंत में उसकेप्राण ब्रहारंध्र फोडकर निकल गये.

उसी समय भगवान नेबछडो और ग्वालबालो को जिला दिया और उन सबको साथ लेकरवे अघासुर के मुहँ से बाहर निकल गयेउस अजगर के स्थूलशरीर से एक अत्यंत अद्भुत और महान ज्योति निकली, और भगवानमें समांगयी.

सार-यह लीला भगवान नेपाँच वर्ष मेंही की थी अघासुर पाप का स्वरुप था भगवानके स्पर्श मात्र सेसके सारेपाप धुल गये और उसे उस ‘सारूप्यमुक्ति’प्राप्त हुई

“भगवान श्रीकृष्ण के किसी एक अंग की भावनिर्मित प्रतिमा यदि ध्यान केद्वारा एक बार भी हृदय में बैठाली जाये तो वह सालोक्य,सामीप्य,आदि गति दान करतीहै.

भगवानआतामानंद के नित्य साक्षत्कारस्वरुप है माया उनके पासफटक नहींपाती.वे ही स्वयंअघासुर के शरीर में प्रवेश कर गये.

जय जय श्री राधे
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देव शर्मा

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