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आप कौन से भक्त हैं ?जो भगवान की कृपा आशीर्वाद से निहाल हो जाते हैं या फिर जो भगवान के कोप के भजन बन जाते हैं ? एक रोचक कथा –


एक राजा के दो बगीचे थे। बगीचों के देखभाल के लिए उन्हें दो मालियों की जरुरत थी।
मंत्री ने दो मालियों को राजा के समक्ष बुलवाया और राजा से उन दोनों को काम पर रख लेने की सिफारिश की।

राजा ने एक माली को एक बगीचा और दूसरे माली को दूसरा बगीचा देखभाल के लिए सौंप दिया। और निश्चिन्त हो गए।

एक माली की राजा पर बड़ी श्रद्धा निष्ठा हो गयी कि राजा ने मुझे नौकरी पर रख लिया है राजा की इस कृपा का मुझे कृतज्ञ होना चाहिए।

उसने बगीचे में एक आम के सुंदर पेड़ के नीचे एक चबूतरा बनाया, उस पर राजा का बड़ा सा चित्र रख दिया।
नित्य उस चित्र पर फूल चढ़ाने लगा, धूप अगरबत्ती दिखाने लगा, वहाँ बड़ी देर तक बैठ कर राजा के नाम का जप- ध्यान करने लगा। कोई मिलने आ जाता तो राजा की खूब महिमा सुनाता बड़ाई करता।

इधर बगीचे में कहाँ कौन सा पौधा सूख रहा है ? कहाँ कीड़े लगे हैं , कहाँ खाद पानी निराई गुड़ाई छँटाई की जरूरत है ? किस मौसम में कौन से नए फूलों की क्यारियाँ तैयार करने की जरुरत है ? इस पर उसका ध्यान नहीं था। फलस्वरूप 6 महीने में बगीचा बर्बाद हो गया।

दूसरे बगीचे के माली ने बगीचे में पूरी मेहनत की राजा का चित्र तो नहीं लगाया पर उसने राजा द्वारा दी गयी जिम्मेदारी को समझा और बगीचे को सुंदर बनाने में पूरी तरह जुट गया।

बगीचे की भली भांति सफाई , निराई गुड़ाई की। नए मौसम के अनुरूप फूलों की क्यारियाँ तैयार कीं। दूर दूर से अच्छे, सुँदर, खुशबूदार फूलों के पौधे लाकर लगाए।
समय पर कटाई छंटाई, खाद पानी देने लगा। फलस्वरूप बगीचा कुछ ही दिनों में लहलहाने लगा।

लगभग 6 माह बाद राजा एक दिन समय निकाल कर अपने उद्यान की सैर को निकले। पहले बगीचे में गए तो देखा पूरा बगीचा उजाड़ पड़ा था। झाड़ झंखाड़ उग आए थे। कहीं पौधे सूख रहे थे, कहीं इक्का दुक्का फूल खिले थे।
दूर नजर पड़ी तो देखा एक वृक्ष के नीचे राजा का चित्र रखा हुआ था और माली उस चित्र के आगे धूप अगरबत्ती दिखाने में लगा हुआ था।

यह देखते ही राजा को क्रोध आ गया। उन्होंने सैनिकों को माली को धक्के देकर बगीचे से बाहर निकालने का आदेश दिया। क्योंकि उसने अपना कर्तव्य नहीं निभाया था, दिए गए बगीचे को ठीक से देखभाल करने, संवारने की जिम्मेदारी को निभाने की बजाय केवल राजा के चित्र की पूजा करने में लगा था।

इसी क्रोधावेश में राजा को ध्यान आया कि एक दूसरे माली को भी उसी दिन नियुक्त किया था, कहीं उसने भी बगीचे को बर्बाद तो नहीं कर दिया ?

राजा क्रोध में भरे हुए उस दूसरे बगीचे की ओर चल दिये। जब उस बगीचे में पहुँचे तो देखते हैं कि बगीचा साफ सुथरा था, चारों ओर गुलाब, चंपा, चमेली, गुलदाउदी आदि के पुष्प खिले हुए थे, कोयल कूक रही थी भौंरे गुँजार कर रहे थे। चारों ओर हवा में भीनी भीनी सुगंध फैली हुई थी।

राजा का क्रोध ठंडा हो गया, मन अत्यंत प्रसन्न हो गया। इधर उधर देखा तो माली बगीचे के एक हिस्से में निराई गुड़ाई में व्यस्त था।
राजा ने माली को बुलाया और अपने गले से मोतियों का हार उतार कर, माली को पहना दिया।


इस संसार मे मनुष्य का जन्म लेना उस माली की तरह है जिसे परमात्मा ने उसकी बनाई हुई सृष्टि को बनाने संवारने की जिम्मेदारी दी है।
पर यह कर्तव्य निभाने की बजाय अधिकांश भक्त, देवी देवताओं के चित्र सजा कर केवल धूप अगरबत्ती दिखाने में, कीर्तन करने में लगे हैं।


दुनियाँ में लोग गरीबी,अशिक्षा, बीमारी, भ्रष्टाचार, आतंक से तबाह हो रहे हैं, सनातन धर्म के मूल स्वरूप को भुला कर आम जन शिरडी के साईं, रामपाल, रामरहीम, आसाराम, निर्मल बाबा जैसों के चक्कर मे लुट और बर्बाद होने में लगे हैं।


हिंदुओं का युद्ध स्तर पर प्रतिवर्ष हजारों लाखों की संख्या में धर्मांतरण हो रहा है। पर भक्त गण धूप अगरबत्ती दिखाने में लगे हैं, कीर्तन करने, केवल जप ध्यान करने में लगे हैं। देश धर्म संस्कृति जाए भाड़ में हमे क्या ?


ऐसे तथाकथित भक्त ही ईश्वर के कोप के भाजन बनते हैं । इन्हीं के लिए कहा गया है —
जनम जनम मुनि जतन कराहीं अंत राम कहीं पावत नाहिं।

जबकि वे भक्त, ईश्वर निष्ठ व्यक्ति जो अपने जीवन को ईश्वरीय कार्य मे, देश,धर्म,संस्कृति के उत्थान में लगाते हैं वे धन्य हो जाते हैं। ईश्वर की कृपा, आशीर्वाद से उनका जन्म लेना सार्थक हो जाता है, वे इतिहास में अमर हो जाते हैं।

शबरी,गीध, गिलहरी, हनुमान जी ने ईश्वर के निमित्त स्वयं को न्यौछावर कर दिया था।

आज के युग मे, कुछ सदी पहले

बंदा वैरागी–
उज्जैन महाकालेश्वर में नर्मदा नदी के किनारे गुफा में तप साधना में लीन थे। गुरुगोविंद सिंह उन्हें ढूंढते हुए पहुंचे थे। यह समय माला जपने का नहीं बल्कि भाला उठाने का है क्योंकि देश,धर्म,संस्कृति का अस्तित्व खतरे में है। यह कह कर उन्हें तप साधना से उठाकर, सिख सेना का सेनापति बनाया था।

विवेकानंद —
हिमालय में जाकर समाधि लगाना चाहते थे पर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें देश धर्म संस्कृति के उत्थान के लिए कार्य करने की प्रेरणा दी।

आचार्य श्रीराम शर्मा—
किशोर उम्र में ही हिमालय में तप करने जाना चाहते थे पर उनके कई जन्मों के गुरु 6-700 वर्ष की आयुवाले स्वामी सर्वेश्वरानंद जी ने उन्हें गायत्री की तप साधना के साथ साथ, आर्ष ग्रंथों (वेद,पुराण,उपनिषदों आदि) के उद्धार, भाष्य करने और श्री सत्य सनातन धर्म, संस्कृति के उत्थान म् नियोजित कर दिया।

नरेंद्र मोदी–
युवावस्था में दो वर्ष हिमालय में सन्यासी बन भटकते रहे। पर उनके गुरु ने उन्हें देश धर्म संस्कृति के उत्थान के लिए कार्य करने का निर्देश दिया।

आप और हम को यह तय करना होता है कि हम अपने व्यक्तिगत,पारिवारिक जीवन के साथ साथ , श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के उत्थान में भी अपने तन,मन, धन से सहयोग कर व्यक्ति,परिवार,समाज, व राष्ट्र का उत्थान करेंगे ?


या फिर एकांगी पूजा, जप,ध्यान में लगे हुए देश ,धर्म,संस्कृति का विनाश होते हुए देखते रहेंगे ?
ईश्वर का कोप या कृपा ?
परिणाम वैसा ही तो मिलेगा ।
विशेष;–
कहानियाँ किसी सिद्धांत को समझाने के लिए लिखी या बनाई जाती हैं। इसमें पूजा के सिद्धांत को समझाने का प्रयास किया गया है, कहानी को दुबारा ध्यान से पढ़ें।


सिद्धांत को समझे बिना केवल चित्र या मूर्ति की पूजा करने वाले हिन्दू, पाकिस्तान, बांग्लादेश, कश्मीर, केरल, बंगाल आदि में बर्बाद हो गए, बर्बाद हो रहे हैं।


जो नहीं समझेंगे वे निकट भविष्य में बर्बाद हो जाएंगे इसमें कोई संदेह नहीं।

जय माँ आदिशक्ति गायत्री, जय सनातन धर्म।
ओंकारनाथशर्मा ‘ श्रद्धानंद
संस्थापक, संचालक,
श्री सत्य सनातन धर्म परिवार
सिद्धपीठ, गायत्री शक्तिपीठ शांतिधाम, छपरा, बिहार।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

यह कथा बहुत पुरानी है।

एक बार शीतला माता ने सोचा कि चलो आज देखु कि धरती पर मेरी पूजा कौन करता है, कौन मुझे मानता है। यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में आई और देखा कि इस गाँव में मेरा मंदिर भी नही है, ना मेरी पुजा है।

माता शीतला गाँव कि गलियो में घूम रही थी, तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) निचे फेका। वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में (छाले) फफोले पड गये। शीतला माता के पुरे शरीर में जलन होने लगी।

शीतला माता गाँव में इधर उधर भाग भाग के चिल्लाने लगी अरे में जल गई, मेरा शरीर तप रहा है, जल रहा हे। कोई मेरी मदद करो। लेकिन उस गाँव में किसी ने शीतला माता कि मदद नही करी। वही अपने घर के बहार एक कुम्हारन (महिला) बेठी थी। उस कुम्हारन ने देखा कि अरे यह बूढी माई तो बहुत जल गई है। इसके पुरे शरीर में तपन है। इसके पुरे शरीर में (छाले) फफोले पड़ गये है। यह तपन सहन नही कर पा रही है।

तब उस कुम्हारन ने कहा है माँ तू यहाँ आकार बैठ जा, मैं तेरे शरीर के ऊपर ठंडा पानी डालती हूँ। कुम्हारन ने उस बूढी माई पर खुब ठंडा पानी डाला और बोली है माँ मेरे घर में रात कि बनी हुई राबड़ी रखी है थोड़ा दही भी है। तू दही-राबड़ी खा लें। जब बूढी माई ने ठंडी (जुवार) के आटे कि राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली।

तब उस कुम्हारन ने कहा आ माँ बेठ जा तेरे सिर के बाल बिखरे हे ला में तेरी चोटी गुथ देती हु और कुम्हारन माई कि चोटी गूथने हेतु (कंगी) कागसी बालो में करती रही। अचानक कुम्हारन कि नजर उस बुडी माई के सिर के पिछे पड़ी तो कुम्हारन ने देखा कि एक आँख वालो के अंदर छुपी हैं। यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे घबराकर भागने लगी तभी उसबूढी माई ने कहा रुक जा बेटी तु डर मत। मैं कोई भुत प्रेत नही हूँ। मैं शीतला देवी हूँ। मैं तो इस घरती पर देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है। कौन मेरी पुजा करता है। इतना कह माता चारभुजा वाली हीरे जवाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्णमुकुट धारण किये अपने असली रुप में प्रगट हो गई।

माता के दर्शन कर कुम्हारन सोचने लगी कि अब में गरीब इस माता को कहा बिठाऊ। तब माता बोली है बेटी तु किस सोच मे पड गई। तब उस कुम्हारन ने हाथ जोड़कर आँखो में आसु बहते हुए कहा- है माँ मेरे घर में तो चारो तरफ दरिद्रता है बिखरी हुई हे में आपको कहा बिठाऊ। मेरे घर में ना तो चौकी है, ना बैठने का आसन। तब शीतला माता प्रसन्न होकर उस कुम्हारन के घर पर खड़े हुए गधे पर बैठ कर एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर कि दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फेक दिया और उस कुम्हारन से कहा है बेटी में तेरी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हु अब तुझे जो भी चाहिये मुझसे वरदान मांग ले।

कुम्हारन ने हाथ जोड़ कर कहा है माता मेरी इक्छा है अब आप इसी (डुंगरी) गाँव मे स्थापित होकर यही रहो और जिस प्रकार आपने आपने मेरे घर कि दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ़ कर दूर किया ऐसे ही आपको जो भी होली के बाद कि सप्तमी को भक्ति भाव से पुजा कर आपको ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन चढ़ाये उसके घर कि दरिद्रता को साफ़ करना और आपकी पुजा करने वाली नारि जाति (महिला) का अखंड सुहाग रखना। उसकी गोद हमेशा भरी रखना। साथ ही जो पुरुष शीतला सप्तमी को नाई के यहा बाल ना कटवाये धोबी को पकड़े धुलने ना दे और पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़कर, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी दरिद्रता ना आये।

तब माता बोली तथाअस्तु है बेटी जो तुने वरदान मांगे में सब तुझे देती हु । है बेटी तुझे आर्शिवाद देती हूँ कि मेरी पुजा का मुख्य अधिकार इस धरती पर सिर्फ कुम्हार जाति का ही होगा। तभी उसी दिन से डुंगरी गाँव में शीतला माता स्थापित हो गई और उस गाँव का नाम हो गया शील कि डुंगरी। शील कि डुंगरी भारत का एक मात्र मुख्य मंदिर है। शीतला सप्तमी वहाँ बहुत विशाल मेला भरता है। इस कथा को पड़ने से घर कि दरिद्रता का नाश होने के साथ सभी मनोकामना पुरी होती है।

विक्रम खुराना