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नेहरू और शिक्षा नीति–

जब संसद में नेहरू का स्तुति गान गाया जा रहा था तभी मेरा ध्यान नेहरु के उन पापों की ओर गया जिनकी कीमत हम आजतक चुका रहे हैं.
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भारतीय शिक्षा का विकृतीकरण नेहरू की एक मुख्य देन है. आइए इसपर विचार करें…
नेहरु के शिक्षा मंत्री –
11 नवम्बर 1888 को पैदा हुए मक्का में, वालिद का नाम था ” मोहम्मद खैरुद्दीन” और अम्मी मदीना (अरब) की थीं। नाना शेख मोहम्मद ज़ैर वत्री ,मदीना के बहुत बड़े विद्वान थे। मौलाना आज़ाद अफग़ान उलेमाओं के ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे जो बाबर के समय हेरात से भारत आए थे। ये सज्जन जब दो साल के थे तो इनके वालिद कलकत्ता आ गए। सब कुछ घर में पढ़ा और कभी स्कूल कॉलेज नहीं गए। बहुत ज़हीन मुसलमान थे। इतने ज़हीन कि इन्हे मृत्युपर्यन्त “भारत रत्न ” से भी नवाज़ा गया। इतने काबिल कि कभी स्कूल कॉलेज का मुंह नहीं देखा और बना दिए गए भारत के पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री। इस शख्स का नाम था “मौलाना अबुल कलम आज़ाद “।
इन्होने इस बात का ध्यान रखा कि विद्यालय हो या विश्वविद्यालय कहीं भी इस्लामिक अत्याचार को ना पढ़ाया जाए. इन्होने भारत के इतिहास को ही नहीं अन्य पुस्तकों को भी इस तरह लिखवाया कि उनमे भारत के गौरवशाली अतीत की कोई बात ना आए. आज भी इतिहास का विद्यार्थी भारत के अतीत को गलत ढंग से समझता है.
हमारे विश्वविद्यालयों में – गुरु तेग बहादुर, गुरु गोबिंद सिंह, बन्दा बैरागी, हरी सिंह नलवा, राजा सुहेल देव पासी, दुर्गा दास राठौर के बारे में कुछ नहीं बताया जाता..
आज की तारीख में इतिहास हैं। 1 ) हिन्दू सदैव असहिष्णु थे 2) मुस्लिम इतिहास की साम्प्रदायिकता को सहानुभूति की नज़र से देखा जाये।
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भारतीय संस्कृति की रीढ़ की हड्डी तोड़ने तथा लम्बे समय तक भारत पर राज करने के लिए 1835 में ब्रिटिश संसद में भारतीय शिक्षा प्रणाली को ध्वस्त करने के लिए मैकाले ने क्या रणनीति सुझायी थी तथा उसी के तहत Indian Education Act- 1858 लागु कर दिया गया।
अंग्रेज़ों ने ” Aryan Invasion Theory” द्वारा भारतीय इतिहास को इसलिए इतना तोडा मरोड़ा कि भारतियों कि नज़र में उनकी संस्कृति निकृष्ट नज़र आये और आने वाली पीढ़ियां यही समझें कि अँगरेज़ बहुत उत्कृष्ट प्रशासक थे।
आज जो पढाया जा रहा है उसका सार है –
1) हिन्दू आर्यों की संतान हैं और वे भारत के रहने वाले नहीं हैं। वे कहीं बाहर से आये हैं और यहाँ के आदिवासियों को मार मार कर तथा उनको जंगलों में भगाकर उनके नगरों और सुन्दर हरे-भरे मैदानों में स्वयं रहते हैं।

2) हिन्दुओं के देवी देवता राम, कृष्ण आदि की बातें झूठे किस्से कहानियां हैं। हिन्दू महामूर्ख और अनपढ़ हैं।
3) हिन्दुओं का कोई इतिहास नहीं है और यह इतिहास अशोक के काल से आरम्भ होता है।
4) हमारे पूर्वज जातिवादी थे. मानवता तो उनमे थी ही नहीं..
5) वेद, जो हिन्दुओं की सर्व मान्य पूज्य पुस्तकें हैं ,गड़रियों के गीतों से भरी पड़ी हैं।
6) हिन्दू सदा से दास रहे हैं –कभी शकों के, कभी हूणों के, कभी कुषाणों के और कभी पठानों तुर्कों और मुगलों के।

7) रामायण तथा महाभारत काल्पनिक किस्से कहानियां हैं।

15 अगस्त 1947, को आज़ादी मिली, क्या बदला ????? रंगमंच से सिर्फ अंग्रेज़ बदले बाकि सब तो वही चला। अंग्रेज़ गए तो सत्ता उन्ही की मानसिकता को पोषित करने वाली कांग्रेस और नेहरू के हाथ में आ गयी। नेहरू के कृत्यों पर तो किताबें लिखी जा चुकी हैं पर सार यही है की वो धर्मनिरपेक्ष कम और मुस्लिम हितैषी ज्यादा था। न मैकाले की शिक्षा नीति बदली और न ही शिक्षा प्रणाली। शिक्षा प्रणाली जस की तस चल रही है और इसका श्रेय स्वतंत्र भारत के प्रथम और दस वर्षों (1947-58) तक रहे शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलम आज़ाद को दे ही देना चाहिए बाकि जो कसर बची थी वो नेहरू की बिटिया इन्दिरा गाँधी ने तो आपातकाल में विद्यालयों में पढ़ाया जाने वाला इतिहास भी बदल कर पूरी कर दी ।
जिस आज़ादी के समय भारत की 18.73% जनता साक्षर थी उस भारत के प्रधानमंत्री ने अपना पहला भाषण “tryst With Destiny” अंग्रेजी में दिया था आज का युवा भी यही मानता है कि यदि अंग्रेजी न होती तो भारत इतनी तरक्की नहीं कर पाता। और हम यह सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि पता नहीं जर्मनी, जापान,चीन इजराइल ने अपनी मातृभाषाओं में इतनी तरक्की कैसे कर ली।

सुमेर चंद जैन

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मनसुखा बाबा

वृन्दावन में एक संत हुए मनसुखा बाबा………

वो सदा चलते फिरते ठाकुर जी की लीलाओं में खोये रहते थे ।ठाकुर की सखा भाव से सेवा करते थे।

सब संतो के प्रिय थे इसलिए जहां जाते वहा प्रसाद की व्यवस्था हो जाती। और बाकी समय नाम जप और लीला चिंतन करते रहते थे।

एक दिन उनके जांघ पे फोड़ा हो गया असहनीय पीड़ा हो रही थी। बहोत उपचार के बाद भी कोई आराम नहीं मिला।

तो एक व्यक्ति ने उस फोड़े का नमूना लेके आगरा के किसी अच्छे अस्पताल में भेज दिया।
वहां के डॉक्टर ने बताया की इस फोड़े में तो कैंसर बन गया है

तुरंत इलाज़ करना पड़ेगा नहीं तो बाबा का बचना मुश्किल है।
जैसे ही ये बात बाबा को पता चली की उनको आगरा लेके जा रहे हैं

तो बाबा लगेे रोने और बोले हमहूँ कहीं नहीं जानो हम ब्रज से बहार जाके नहीं मरना चाहते।

हमें यहीं छोड़ दो अपने यार के पास हम जियेंगे तो अपने यार के पास और मरेंगे तो अपने यार की गोद में। हमें नहीं करवानो इलाज़।

और बाबा नहीं गए इलाज़ करवाने। बाबा चले गए बरसाने। बहोत असहनीय पीड़ा हो रही थी। उस रात बाबा दर्द से कराह रहे थे।

इत्ते में क्या देखते हैं वृषभानु दुलारी श्री किशोरी जू अपनी अष्ट सखियों के साथ आ रही हैं।

और बाबा के समीप आके ललिता सखी से बोली अरे ललिते जे तो मनसुखा बाबा हैं ना।

तो ललिता जी बोली हाँ श्री जी ये मनसुखा बाबा हैं और डॉक्टर ने बताया की इनको कैंसर है देखो कितना दर्द से कराह रहे हैं।

परम दयालु करुनामई सरकार श्री लाडली जी से उनका दर्द सहा नहीं गया और बोली ललिता बाबा को कोई कैंसर नहीं हैं ।ये तो एक दम स्वस्थ हैं।

जब बाबा इस लीला से बहार आये तो उन्होंने देखा की उनका दर्द एक दम समाप्त हो गया।
और जांघ पर यहाँ तक की किसी फोड़े का निशान भी नहीं रहा।
देखो कैसी करुनामई सरकार हैं श्री लाडली जी हमारी…….❤❤❤❤
“कद्र” करनी है तो “जीते जी” करें

“मरने” के बाद तो “पराए” भी रो देते हैं

आज “जिस्म” मे “जान” है तो
देखते नही हैं “लोग”

जब “रूह” निकल जाएगी तो
“कफन” हटा हटा कर देखेंगे

किसी ने क्या खूब लिखा है

        "वक़्त" निकालकर

“बाते” कर लिया करो “अपनों से”

अगर “अपने ही” न रहेंगे
तो “वक़्त” का क्या करोगे

“गुरुर” किस बात का… “साहब”

आज “मिट्टी” के ऊपर
तो कल “मीट्टीकै नीचे.
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अतिसुन्दर शिक्षा
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रेल सफ़र में भीख़ माँगने के दौरान एक भिख़ारी को एक सूट बूट पहने सेठ जी उसे दिखे। उसने सोचा कि यह व्यक्ति बहुत अमीर लगता है, इससे भीख़ माँगने पर यह मुझे जरूर अच्छे पैसे देगा। वह उस सेठ से भीख़ माँगने लगा।

भिख़ारी को देखकर उस सेठ ने कहा, “तुम हमेशा मांगते ही हो, क्या कभी किसी को कुछ देते भी हो ?”

भिख़ारी बोला, “साहब मैं तो भिख़ारी हूँ, हमेशा लोगों से मांगता ही रहता हूँ, मेरी इतनी औकात कहाँ कि किसी को कुछ दे सकूँ ?”

सेठ:- जब किसी को कुछ दे नहीं सकते तो तुम्हें मांगने का भी कोई हक़ नहीं है। मैं एक व्यापारी हूँ और लेन-देन में ही विश्वास करता हूँ, अगर तुम्हारे पास मुझे कुछ देने को हो तभी मैं तुम्हे बदले में कुछ दे सकता हूँ।

तभी वह स्टेशन आ गया जहाँ पर उस सेठ को उतरना था, वह ट्रेन से उतरा और चला गया।

इधर भिख़ारी सेठ की कही गई बात के बारे में सोचने लगा। सेठ के द्वारा कही गयीं बात उस भिख़ारी के दिल में उतर गई। वह सोचने लगा कि शायद मुझे भीख में अधिक पैसा इसीलिए नहीं मिलता क्योकि मैं उसके बदले में किसी को कुछ दे नहीं पाता हूँ। लेकिन मैं तो भिखारी हूँ, किसी को कुछ देने लायक भी नहीं हूँ।लेकिन कब तक मैं लोगों को बिना कुछ दिए केवल मांगता ही रहूँगा।

बहुत सोचने के बाद भिख़ारी ने निर्णय किया कि जो भी व्यक्ति उसे भीख देगा तो उसके बदले मे वह भी उस व्यक्ति को कुछ जरूर देगा।
लेकिन अब उसके दिमाग में यह प्रश्न चल रहा था कि वह खुद भिख़ारी है तो भीख के बदले में वह दूसरों को क्या दे सकता है ?

इस बात को सोचते हुए दिनभर गुजरा लेकिन उसे अपने प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिला।

दुसरे दिन जब वह स्टेशन के पास बैठा हुआ था तभी उसकी नजर कुछ फूलों पर पड़ी जो स्टेशन के आस-पास के पौधों पर खिल रहे थे, उसने सोचा, क्यों न मैं लोगों को भिख़ के बदले कुछ फूल दे दिया करूँ। उसको अपना यह विचार अच्छा लगा और उसने वहां से कुछ फूल तोड़ लिए।

वह ट्रेन में भीख मांगने पहुंचा। जब भी कोई उसे भीख देता तो उसके बदले में वह भीख देने वाले को कुछ फूल दे देता। उन फूलों को लोग खुश होकर अपने पास रख लेते थे। अब भिख़ारी रोज फूल तोड़ता और भीख के बदले में उन फूलों को लोगों में बांट देता था।

कुछ ही दिनों में उसने महसूस किया कि अब उसे बहुत अधिक लोग भीख देने लगे हैं। वह स्टेशन के पास के सभी फूलों को तोड़ लाता था। जब तक उसके पास फूल रहते थे तब तक उसे बहुत से लोग भीख देते थे। लेकिन जब फूल बांटते बांटते ख़त्म हो जाते तो उसे भीख भी नहीं मिलती थी,अब रोज ऐसा ही चलता रहा था।

एक दिन जब वह भीख मांग रहा था तो उसने देखा कि वही सेठ ट्रेन में बैठे है जिसकी वजह से उसे भीख के बदले फूल देने की प्रेरणा मिली थी।

वह तुरंत उस व्यक्ति के पास पहुंच गया और भीख मांगते हुए बोला, आज मेरे पास आपको देने के लिए कुछ फूल हैं, आप मुझे भीख दीजिये बदले में मैं आपको कुछ फूल दूंगा।

शेठ ने उसे भीख के रूप में कुछ पैसे दे दिए और भिख़ारी ने कुछ फूल उसे दे दिए। उस सेठ को यह बात बहुत पसंद आयी।

सेठ:- वाह क्या बात है..? आज तुम भी मेरी तरह एक व्यापारी बन गए हो, इतना कहकर फूल लेकर वह सेठ स्टेशन पर उतर गया।

लेकिन उस सेठ द्वारा कही गई बात एक बार फिर से उस भिख़ारी के दिल में उतर गई। वह बार-बार उस सेठ के द्वारा कही गई बात के बारे में सोचने लगा और बहुत खुश होने लगा। उसकी आँखे अब चमकने लगीं, उसे लगने लगा कि अब उसके हाथ सफलता की वह 🔑चाबी लग गई है जिसके द्वारा वह अपने जीवन को बदल सकता है।

वह तुरंत ट्रेन से नीचे उतरा और उत्साहित होकर बहुत तेज आवाज में ऊपर आसमान की ओर देखकर बोला, “मैं भिखारी नहीं हूँ, मैं तो एक व्यापारी हूँ..

मैं भी उस सेठ जैसा बन सकता हूँ.. मैं भी अमीर बन सकता हूँ !

लोगों ने उसे देखा तो सोचा कि शायद यह भिख़ारी पागल हो गया है, अगले दिन से वह भिख़ारी उस स्टेशन पर फिर कभी नहीं दिखा।

एक वर्ष बाद इसी स्टेशन पर दो व्यक्ति सूट बूट पहने हुए यात्रा कर रहे थे। दोनों ने एक दूसरे को देखा तो उनमे से एक ने दूसरे से हाथ मिलाया और कहा, “क्या आपने मुझे पहचाना ?”

सेठ:- “नहीं तो ! शायद हम लोग पहली बार मिल रहे हैं।

भिखारी:- सेठ जी.. आप याद किजीए, हम पहली बार नहीं बल्कि तीसरी बार मिल रहे हैं।

सेठ:- मुझे याद नहीं आ रहा, वैसे हम पहले दो बार कब मिले थे ?

अब पहला व्यक्ति मुस्कुराया और बोला
:- हम पहले भी दो बार इसी ट्रेन में मिले थे, मैं वही भिख़ारी हूँ जिसको आपने पहली मुलाकात में बताया कि मुझे जीवन में क्या करना चाहिए और दूसरी मुलाकात में बताया कि मैं वास्तव में कौन हूँ।

सेठ:- ओह..! याद आया। तुम वही भिखारी हो जिसे मैंने एक बार भीख देने से मना कर दिया था और दूसरी बार मैंने तुमसे कुछ फूल खरीदे थे लेकिन आज तुम सूट बूट पहने कहाँ जा रहे हो और आजकल क्या कर रहे हो ?

:- सेठ जी… मैं वही भिख़ारी हूँ। लेकिन आज मैं फूलों का एक बहुत बड़ा व्यापारी हूँ और इसी व्यापार के काम से दूसरे शहर जा रहा हूँ।

आपने मुझे पहली मुलाकात में प्रकृति का नियम बताया था… जिसके अनुसार हमें तभी कुछ मिलता है, जब हम कुछ देते हैं। लेन देन का यह नियम वास्तव में काम करता है, मैंने यह बहुत अच्छी तरह महसूस किया है, लेकिन मैं खुद को हमेशा भिख़ारी ही समझता रहा, इससे ऊपर उठकर मैंने कभी सोचा ही नहीं था और जब आपसे मेरी दूसरी मुलाकात हुई तब आपने मुझे बताया कि मैं एक व्यापारी बन चुका हूँ। अब मैं समझ चुका था कि मैं वास्तव में एक भिखारी नहीं बल्कि व्यापारी बन चुका हूँ।

मैंने समझ लिया था कि लोग मुझे इतनी भीख क्यों दे रहे हैं क्योंकि वह मुझे भीख नहीं दे रहे थे बल्कि उन फूलों का मूल्य चुका रहे थे। सभी लोग मेरे फूल खरीद रहे थे क्योकि इससे सस्ते फूल उन्हें कहाँ मिलते।

मैं लोगों की नजरों में एक छोटा व्यापारी था लेकिन मैं अपनी नजरों में एक भिख़ारी ही था। आपके बताने पर मुझे समझ आ गया कि मैं एक छोटा व्यापारी हूँ। मैंने ट्रेन में फूल बांटने से जो पैसे इकट्ठे किये थे, उनसे बहुत से फूल खरीदे और फूलों का व्यापारी बन गया।

यहाँ के लोगों को फूल बहुत पसंद हैं और उनकी इसी पसंद ने मुझे आज फूलों का एक बहुत बड़ा व्यापारी बना दिया।

स्टेशन आने पर दोनो साथ उतरे और अपने-अपने व्यापार की बात करते हुए आगे बढ़ गए।

मित्रों.. इस कहानी से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। कहानी में सेठ जी ‘ लो’ और ‘दो’ के नियम को बहुत अच्छी तरह जानता था, दुनिया के सभी बड़े व्यापारी पूँजीपती इसी नियमो का पालन करके ही बड़े व्यापारी बने हैं।
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देव शर्मा

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विजया एकादशी फरवरी ११ विशेष
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भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का व्रत है विजय एकादशी। इसे फाल्गुन मास की कृष्ण एकादशी को मनाया जाता है। कहा जाता है कि एकादशी का व्रत धारण करने से न सिर्फ समस्त कार्यों में सफलता मिलती है, बल्कि पूर्व जन्म के पापों का भी नाश हो जाता है। वहीं इसका पुण्य उस व्यक्ति को भी मिलता है जिसकी मृत्यु हो चुकी है आप आप उसकी आत्मा की शांति या मोक्ष की कामना से यह व्रत धारण कर रहे हैं।

कथा के अनुसार वनवास के दौरान जब भगवान श्रीराम को रावण से युद्ध करने जाना था तब उन्होंने भी अपनी पूरी सेना के साथ इस महाव्रत को रखकर ही लंका पर विजय प्राप्त की थी।

व्रत विधि
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इस दिन भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित कर उनकी धूम, दीप, पुष्प, चंदन, फूल, तुलसी आदि से आराधना करें, जिससे कि समस्त दोषों का नाश हो और आपकी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकें। भगवान विष्णु को तुलसी अत्यधिक प्रिय है इसलिए इस दिन तुलसी को आवश्यक रूप से पूजन में शामिल करें। भगवान की व्रत कथा का श्रवण और रात्रि में हरिभजन करते हुए उनसे आपके दुखों का नाश करने की प्रार्थना करें। रात्रि जागकरण का पुण्य फल आपको जरूर ही प्राप्त होगा। व्रत धारण करने से एक दिन पहले ब्रम्हचर्य धर्म का पालन करते हुए व्रती को सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। व्रत धारण करने से व्यक्ति कठिन कार्यों एवं हालातों में विजय प्राप्त करता है।

एकादशी कथा
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युधिष्ठिर ने पूछा: हे वासुदेव! फाल्गुन (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार माघ) के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है और उसका व्रत करने की विधि क्या है? कृपा करके बताइये।

भगवान श्रीकृष्ण बोले: युधिष्ठिर एक बार नारदजी ने ब्रह्माजी से फाल्गुन के कृष्णपक्ष की ‘विजया एकादशी’ के व्रत से होनेवाले पुण्य के बारे में पूछा था तथा ब्रह्माजी ने इस व्रत के बारे में उन्हें जो कथा और विधि बतायी थी, उसे सुनो।

ब्रह्माजी ने कहा : नारद यह व्रत बहुत ही प्राचीन, पवित्र और पाप नाशक है । यह एकादशी राजाओं को विजय प्रदान करती है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजी जब लंका पर चढ़ाई करने के लिए समुद्र के किनारे पहुँचे, तब उन्हें समुद्र को पार करने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। उन्होंने लक्ष्मणजी से पूछा ‘सुमित्रानन्दन किस उपाय से इस समुद्र को पार किया जा सकता है ? यह अत्यन्त अगाध और भयंकर जल जन्तुओं से भरा हुआ है। मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे इसको सुगमता से पार किया जा सके।

लक्ष्मणजी बोले हे प्रभु आप ही आदिदेव और पुराण पुरुष पुरुषोत्तम हैं। आपसे क्या छिपा है? यहाँ से आधे योजन की दूरी पर कुमारी द्वीप में बकदाल्भ्य नामक मुनि रहते हैं। आप उन प्राचीन मुनीश्वर के पास जाकर उन्हींसे इसका उपाय पूछिये।

श्रीरामचन्द्रजी महामुनि बकदाल्भ्य के आश्रम पहुँचे और उन्होंने मुनि को प्रणाम किया। महर्षि ने प्रसन्न होकर श्रीरामजी के आगमन का कारण पूछा।

श्रीरामचन्द्रजी बोले ब्रह्मन् मैं लंका पर चढ़ाई करने के उद्धेश्य से अपनी सेनासहित यहाँ आया हूँ। मुने अब जिस प्रकार समुद्र पार किया जा सके, कृपा करके वह उपाय बताइये।

बकदाल्भय मुनि ने कहा : हे श्रीरामजी फाल्गुन के कृष्णपक्ष में जो ‘विजया’ नाम की एकादशी होती है, उसका व्रत करने से आपकी विजय होगी निश्चय ही आप अपनी वानर सेना के साथ समुद्र को पार कर लेंगे।

राजन् ! अब इस व्रत की फलदायक विधि सुनिये: दशमी के दिन सोने, चाँदी, ताँबे अथवा मिट्टी का एक कलश स्थापित कर उस कलश को जल से भरकर उसमें पल्लव डाल दें। उसके ऊपर भगवान नारायण के सुवर्णमय विग्रह की स्थापना करें। फिर एकादशी के दिन प्रात: काल स्नान करें। कलश को पुन: स्थापित करें। माला, चन्दन, सुपारी तथा नारियल आदि के द्वारा विशेष रुप से उसका पूजन करें। कलश के ऊपर सप्तधान्य और जौ रखें। गन्ध, धूप, दीप और भाँति भाँति के नैवेघ से पूजन करें। कलश के सामने बैठकर उत्तम कथा वार्ता आदि के द्वारा सारा दिन व्यतीत करें और रात में भी वहाँ जागरण करें । अखण्ड व्रत की सिद्धि के लिए घी का दीपक जलायें । फिर द्वादशी के दिन सूर्योदय होने पर उस कलश को किसी जलाशय के समीप (नदी, झरने या पोखर के तट पर) स्थापित करें और उसकी विधिवत् पूजा करके देव प्रतिमासहित उस कलश को वेदवेत्ता ब्राह्मण के लिए दान कर दें कलश के साथ ही और भी बड़े बड़े दान देने चाहिए। श्रीराम आप अपने सेनापतियों के साथ इसी विधि से प्रयत्नपूर्वक ‘विजया एकादशी’ का व्रत कीजिये इससे आपकी विजय होगी।

ब्रह्माजी कहते हैं नारद यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि के कथनानुसार उस समय ‘विजया एकादशी’ का व्रत किया। उस व्रत के करने से श्रीरामचन्द्रजी विजयी हुए। उन्होंने संग्राम में रावण को मारा, लंका पर विजय पायी और सीता को प्राप्त किया बेटा जो मनुष्य इस विधि से व्रत करते हैं, उन्हें इस लोक में विजय प्राप्त होती है और उनका परलोक भी अक्षय बना रहता है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : युधिष्ठिर ! इस कारण ‘विजया’ का व्रत करना चाहिए । इस प्रसंग को पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।

जगदीश जी की आरती
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ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश…

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश…

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश…

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश…

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश…

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश…

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे।
करुणा हाथ बढ़ाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश…

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश…
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Dev Sharma

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બજેટ પછી બીઝનેસ ક્લાસ સિવાય નાં લોકો ચુપ રહે તેના માટે નો એક પ્રયાસ છે. અંગ્રેજી માં છે. જેણેે પણ તેનો ગુજરાતી માં અનુવાદ કર્યો છે તેનો ખુબ ખુબ આભાર. તમે વાચો અને તમારો દ્રષ્ટિકોણ આપો.

“બજેટ અને તેના પછી ચર્ચાતી ટેક્સેશનની સાદી સમજ ::
ટેક્સ કઈ રીતે ચુકવાય છે, એની પાછળનું રેશનલ શું? જો એ ઘટાડવામાં આવે તો કોને વધુ ફાયદો? એ સમજવા નીચેની નાની ઉદાહરણ વાર્તા સમજવી રહી.
દસ મિત્રો રોજ રાત્રે સાથે જમવા જાય. અને સંયુક્ત બીલ (દસ જણાનું) ૧૦૦ રૂપીયા આવે. (દાખલો ગણવા સહેલું પડે એટલે)

દરેકની આર્થીક સ્થિતિ થોડી અલગ અલગ એટલે અરસપરસ નક્કી કરી નીચે મુજબ વ્યવસ્થા ગોઠવેલી.

પ્રથમ ચાર વ્યક્તિ સહુથી ગરીબ. એટલે એમને કશું જ ચુકવવાનું નહી. તદ્દન મફત.

પાંચમો વ્યક્તિ ૧ રૂપીયો ચુકવે.

છઠ્ઠો વ્યક્તિ ૩ રૂપીયા ચુકવે

સાતમો વ્યક્તિ ૭ રૂપીયા ચુક્વે

આઠમો વ્યક્તિ ૧૨ રૂપીયા ચુકવે

નવમો વ્યક્તિ ૧૮ રૂપીયા અને

દસમો જે સહુથી ધનીક છે તે ૫૯ રૂપીયા ચુકવે –

આમ પુરા સો થાય અને તમામ લોકો આ વ્યસ્થાથી સંતુષ્ટ હતા.
થોડા સમય પછી એ રેસ્ટોરન્ટના માલીકે ખુશખબર આપી કે આપ સર્વેનો વ્યવહાર અને નિયમિત ગ્રાહક તરીકેની વફાદારીને ધ્યાનમાં રાખતાં ૧૦૦ ના બદલે ૮૦ રૂપીયા બીલ થશે. અને આપ દસ લોકો એજ રીતે નિયમિત ભોજન માણી શક્શો.

બધા ખુશ થયા. અને એ જે ૨૦ બચ્યા એ કેમ વહેંચવા? એ ચર્ચા શરૂ કરી.

પછી નક્કી થયું કે જે ચુકવે છે તેને એક સમાન ફાયદો આપવો. અને ૨૦/૬ = ૩.૩૩ કરી શકાય.

બીજો ઓપ્શન એ છે કે જેમ આપ ચુકવો છો એ જ પ્રપોર્શનમાં આપને લાભ કરી આપું.

એ વર્કીંગ કંઈક આ પ્રમાણે થયું.

પ્રથમ ચાર સાથે પાંચમાને પણ મફત ભોજન મળશે

છઠ્ઠાને હવે ૩ રૂપીયાને બદલે ૨ રૂપીયા ચુકવવાના (એટલે ૩૩% બચત)

સાતમાને હવે ૭ રૂપીયાને બદલે ૫ રૂપીયા ચુકવવાના (એટલે ૨૮% બચત)

આઠમાને હવે ૧૨ રૂપીયાને બદલે ૯ રૂપીયા ચુકવવાના (એટલે ૨૫% બચત)

નવમાને હવે ૧૮ રૂપીયાને બદલે ૧૪ રૂપીયા ચુકવવાના (એટલે ૨૨% બચત)

અને દસમાને હવે ૫૯ રૂપીયાને બદલે ૪૯ રૂપીયા ચુકવવાના (એટલે ૧૬% બચત)

દરેક લોકો પહેલાં કરતાં સારી સ્થિતિમાં હતા.

અને

જમતાં જમતાં છઠ્ઠો વ્યક્તિ કહે કે મને તો આ બચતના વીસમાંથી એક જ રૂપીયાનો લાભ થયો. આ અન્યાય છે. અનર્થ છે.

તો તરત જ પાંચમો અને સાતમો પણ ટહુક્યા, કે બરાબર જ છે હડહડતો અન્યાય કહેવાય, વહેંચણી બરાબર નથી જ. આ દસમો વીના કારણે બચતના ૫૦% લઈ જાય છે.

નવમો કહે કે બરાબર જ છે, મને જ્યારે ચાર જ રૂપીયા બચતના મળે છે ત્યારે એને તો પુરા ૧૦ મળે છે. ગેરવ્યાજબી વહેંચણી છે.

ત્યાં તો (મફતનું જમતા) પહેલા ચાર બરાડી ઉઠ્યા, અમને તો કોઇ જ લાભ નહી? અમારૂં તો હંમેશા શોષણ જ થતું આવ્યું છે અને રહેતું હોય છે. બદમાશી તો આ ધનીક લોકોની જ કાયમની હોય છે.

અને એ નવ લોકો ઉશ્કેરાઈને એ દસમા વ્યક્તિને ઘેરી વળ્યા અને દે ધનાધન માર્યો. ખુબ ઘાયલ કરી ધમકી આપીને કાઢી મુક્યો.

બીજા દિવસની સાંજે ફરી એક વખત બધા જમવા ભેગા થયા, પણ એ દસમો વ્યક્તિ ત્યાં હાજર ન હતો.

હવે એ નવ લોકો એ એમના તમામ પ્રયત્નોથી ભંડોળ એકત્ર કરી તપાસ કરી તો ખબર પડી કે આજે તો કોઇ જ નહી જમી શકે. અને આખું તો છોડો, અડધી વ્યવસ્થા પણ શક્ય ન બની.
અને તે દિવસથી રોજ તમામ ભુખ્યા પાછા ફરતા રહ્યા..

સાર એ છે કે સહુથી વધુ ટેક્સ ભરે છે તેને રીડક્શન દરમ્યાન પણ લાભ એ જ પ્રપોર્શનમાં મળે છે. કારણ કે એ એની આવકના પ્રમાણમાં ટેક્સ પણ વધુ ભરતો હોય છે.

જેની આવક વધુ છે તે તો બીજે પણ ગમ્મે ત્યાં મનભાવતું જમી શક્શે. દેશમાં અને નહીતર દેશ બહાર કે જ્યાં સાનુકુળ વાતાવરણ છે, જ્યાં તક મળે ત્યાં.

કથાબીજ: David Kamerschen – Ph.D.
University of Georgia

જે આ વાંચીને સમજી શકે છે તેમને ખુલાસાની કે સમજાવવાની જરૂર નથી.

અને

જે નથી સમજી શક્તા એમના માટે સમજાવવું અશક્ય છે.