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विवाह – वेद सम्मत – वेद-वेदांग में वर-वधू से गृहस्थ सुख निमित्त कई प्रतिज्ञाओं का प्रतिपादन करते हैं।

इस मन्त्र वर-वधु प्रतिज्ञा कर रहे है कि :
समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ |
सं मातारिश्वा सं धाता समु देष्ट्री दधातु नौ || [ऋग्वेद 10.85.47]
यज्ञशाला में बैठे हुए विद्वान लोगों! हम प्रसन्नता पूर्वक गृहस्थाश्रम में साथ रहने के लिए एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं। हम दोनों के ह्रदय जाल के समान शांत और मिले रहेंगे; जैसे प्राणवायु सबको प्रिय है वैसे हम दोनों एक-दूसरे में सदा प्रसन्न रहेंगे; जैसे सबमें स्थित परमात्मा सारे जगत को धारण करता है वैसे ही हम दोनों एक-दूसरे को धारण करेंगे; जैसे उपदेशक श्रोताओं से प्रीति करता है वैसे हम दोनों की आत्मा एक-दूसरे के साथ दृढ़ प्रेम को धारण करे।
ओम् गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः |
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं तवादुर्गार्हपत्याय देवाः || [ऋग्वेद 10.85.56]
हे वरानने! मैं ऐश्वर्य और सुसंतानादि सौभाग्य की वृद्धि के लिए तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ। तू मुझ पति के साथ जरावस्था को सुखपूर्वक प्राप्त हों। तथा; हे वीर! मैं सौभाग्य की वृद्धि के लिए आपके हाथ को ग्रहण करती हूँ। आप मुझ पत्नी के साथ वृद्धावस्था पर्यंत प्रसन्न ए़वं अनुकूल रहिये। आपको मैं और मुझे आप आजसे पति-पत्नी भाव से प्राप्त हुए हैं। परमात्मा और सभामंडप में। बैठे हुए विद्वान लोग गृहस्थाश्रम-कर्म के अनुष्ठान के लिए मुझे तुमको देते हैं।
1. अघोरचक्षुरपतिघ्न्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाःसुवर्चाः |
वीरसूर्देवृकामा स्योना शं नो भव द्विपदेशं चतुष्पदे|| [ऋग्वेद 10/85/44]
परमात्मा की कृपा से हे वरानने! तू पति से विरोध न करने वाली और प्रिय दृष्टी हो। मंगलकारी, सब पशुओं को सुखदाता, पवित्र अंत:करण युक्त, सुन्दर शुभ गुण-कर्म-स्वाभाव और विद्या से सुप्रकाशित, उत्तम वीर पुत्रों को उत्पन्न करनेहारी, परमात्मा की उपासना करानेहारी, हमारे लोगों और गे आदि पशुओं को सुख देने वाली हो।
ये तीनों ऋग्वेद के मन्त्र हैं। अथर्ववेद पति-पत्नी को परस्पर प्रेम निर्वाह के लिए इस प्रकार प्रेरणा देता है:-
भगस्ते हस्तमग्रभीत् सविता हस्तमग्रभीत् |
पत्नी त्वमसि धर्माणाहं गृहपतिस्तव || [अथर्ववेद 14/1/51]
वर वधु से कहता है कि ऐश्वर्ययुक्त! मैं तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ और धर्मयुक्त मार्ग में प्रेरक मैं तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ। तू धर्म से मेरी पत्नी है और मैं धर्म से तेरा गृहपति हूँ।
ममेयमस्तु पोष्या मह्य त्वदाद् बृहस्पति: |
मया पत्या प्रजावति सं जीव शरदः शतम् || [अथर्ववेद 14/1/52]
बृहस्पति (परमात्मा) ने तुझको मुझे दिया है कि तू जगत भर में मेरी पोषण कारी पत्नी हो। तू मुझ पति के साथ सौ वर्ष तक सुखपूर्वक जीवन धारण कर।
त्वष्टा वासो व्यदधाच्छुभे कं बृहस्पते: प्रशिषा कविनाम् |
तेनेमन नहीं सविता भगश्च सूर्यामिव परि …..||
हे शुभानाने! परमात्मा और विद्वानों की शिक्षा से हम दम्पति होते हैं। तू मेरी प्रसन्नता के लिए सुन्दर वस्त्र और आभूषण तथा सुख को प्राप्त हो। हम दोनों की इच्छा को परमात्मा सिद्ध करे। जैसे इस नारी को ईश्वर संतान से सुशोभित करे, इसी प्रकार सूर्य की किरण के समान तुझको मैं भी सुशोभित करूँ।
अहं विष्यामि मयि रूपमस्या वेददित पश्यन्मनस: कुलायम् |
न स्तेयमद्मि मनसोदमुच्ये स्वयं श्रथ्नानो वरुणस्य पाशान् || [अथर्ववेद 14/1/58]
जैसे मान से कुल की वृद्धि को देखता हुआ मैं इस तेरे रूप को प्रीति से प्राप्त और इसमें प्रेम द्वारा व्याप्त होता हूँ, वैसे तू मेरी वधु मुझमें प्रेम से व्याप्त होकर अनुकूल व्यवहार को प्राप्त होवे। जैसे मैं उत्तम पदार्थों का वधु से चोरी से भोग नहीं करता हूँ वैसे ही यह वधु भी किया करे।
वेद मन्त्रों की ये भावनाएँ गुह्यासूत्रों में भी पाई गई है:-
यदैसि मनसा दूरं दिशोऽनुपवमानो वा |
हिरण्यपर्णो वैकर्ण: स त्वा मन्मनसां करोतु || [पाराokaaoकाo 1 4]
जैसे पवित्र वायु और तेजोमय जल आदि को किरणों से ग्रहण करनेवाला सूर्य दुरस्थ पदार्थो और …।
मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनु चितं ते अस्तु|
मम वाचमेकमना जुषरच प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम् || [पाराo kaaoकाo 1 -8/8]
हे वधु! तेरे अन्त:करण और आत्मा को मैं अपने व्रत के अनुकूल धारण करता हूँ। मेरे चित्त के अनुकूल सदा तेरा चित्त रहे, मेरी वाणी तू एकाग्रचित्त से सेवन करे। परमात्मा तुझे मेरे अनुकूल रखे।
अन्नपाशेन मणिना प्राणसुत्रेण प्रिश्निना |
बध्नामि सत्यग्रन्थिना मनश्च हृदयं च ते || [मैत्रिय ब्राo 1/3/8]
हे वर या वधु! जैसे अन्न के saathसाथ प्राण, प्राण के साथ अन्न, तथा अन्न और प्राण का अंतरिक्ष के साथ सम्बन्ध हैवैसे तेरे ह्रदय, मान और चित्त को सत्य की गाँठ से बांधती/बांधता हूँ।
यदेत हृदयं तव तदस्तु हृदयं मम |
यदिदं हृदयं मम तदस्तु हृदयं तव || [मैत्रिय ब्राo 1/3/9]
हे वर या वधु! तेरी आत्मा या अन्त:करण मेरी आत्मा या अन्त:करण के तुल्य प्रिय हो और मेरी आत्मा, प्राण और मन तेरी आत्मा के तुल्य प्रिय रहे।
वेद के इन मन्त्रों से पुष्टि होती है कि गृहस्थ सुख के लिए पति-पत्नी का प्रेम आवश्यक है।
विवाह – ऋग्वेद का आदेश
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रामायण के तेरह अनसुने सच!!!!!

भगवान राम और देवी सीता के जन्म एवं जीवनयात्रा का वर्णन जिस महाकाव्य में किया गया है उसे रामायण के नाम से जाना जाता हैl हालांकि ऐसा माना जाता है कि मूल रामायण की रचना “ऋषि वाल्मीकि” द्वारा किया गया था, लेकिन कई अन्य संतों और वेद पंडितों जैसे- तुलसीदास, संत एकनाथ आदि ने इसके अन्य संस्करणों की भी रचना की हैl हालांकि प्रत्येक संस्करण में अलग-अलग तरीके से कहानी का वर्णन किया गया है, लेकिन मूल रूपरेखा एक ही हैl ऐसा माना जाता है कि रामायण की घटना 4थी और 5वीं शताब्दी ई.पू. की हैl

हम में से अधिकांश लोगों को रामायण की कहानी पता है, लेकिन इस महाकाव्य से जुड़े कुछ ऐसे भी रहस्य हैं, जिनके बारे में लोगों को पता नहीं हैl आज हम आपके सामने रामायण से जुड़े ऐसे ही 13 रहस्यों को उजागर कर रहे हैं:

  1. रामायण के हर 1000 श्लोक के बाद आने वाले पहले अक्षर से गायत्री मंत्र बनता है

गायत्री मंत्र में 24 अक्षर होते हैं और वाल्मीकि रामायण में 24,000 श्लोक हैंl रामायण के हर 1000 श्लोक के बाद आने वाले पहले अक्षर से गायत्री मंत्र बनता हैl यह मंत्र इस पवित्र महाकाव्य का सार हैl गायत्री मंत्र को सर्वप्रथम ऋग्वेद में उल्लिखित किया गया हैl

  1. राम और उनके भाइयों के अलावा राजा दशरथ एक पुत्री के भी पिता थे????

श्रीराम के माता-पिता एवं भाइयों के बारे में तो प्रायः सभी जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को यह मालूम है कि राम की एक बहन भी थीं, जिनका नाम “शांता” थाl वे आयु में चारों भाईयों से काफी बड़ी थींl उनकी माता कौशल्या थींl ऐसी मान्यता है कि एक बार अंगदेश के राजा रोमपद और उनकी रानी वर्षिणी अयोध्या आएl उनको कोई संतान नहीं थीl बातचीत के दौरान राजा दशरथ को जब यह बात मालूम हुई तो उन्होंने कहा, मैं अपनी बेटी शांता आपको संतान के रूप में दूंगाl यह सुनकर रोमपद और वर्षिणी बहुत खुश हुएl उन्होंने बहुत स्नेह से उसका पालन-पोषण किया और माता-पिता के सभी कर्तव्य निभाएl

एक दिन राजा रोमपद अपनी पुत्री से बातें कर रहे थे, उसी समय द्वार पर एक ब्राह्मण आए और उन्होंने राजा से प्रार्थना की कि वर्षा के दिनों में वे खेतों की जुताई में राज दरबार की ओर से मदद प्रदान करेंl राजा को यह सुनाई नहीं दिया और वे पुत्री के साथ बातचीत करते रहेl द्वार पर आए नागरिक की याचना न सुनने से ब्राह्मण को दुख हुआ और वे राजा रोमपद का राज्य छोड़कर चले गएl वह ब्राह्मण इन्द्र के भक्त थेl अपने भक्त की ऐसी अनदेखी पर इन्द्र देव राजा रोमपद पर क्रुद्ध हुए और उन्होंने उनके राज्य में पर्याप्त वर्षा नहीं कीl इससे खेतों में खड़ी फसलें मुरझाने लगीl

इस संकट की घड़ी में राजा रोमपद ऋष्यशृंग ऋषि के पास गए और उनसे उपाय पूछाl ऋषि ने बताया कि वे इन्द्रदेव को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करेंl ऋषि ने यज्ञ किया और खेत-खलिहान पानी से भर गएl इसके बाद ऋष्यशृंग ऋषि का विवाह शांता से हो गया और वे सुखपूर्वक रहने लगेl बाद में ऋष्यशृंग ने ही दशरथ की पुत्र कामना के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया थाl जिस स्थान पर उन्होंने यह यज्ञ करवाया था, वह अयोध्या से लगभग 39 कि.मी. पूर्व में था और वहाँ आज भी उनका आश्रम है और उनकी तथा उनकी पत्नी की समाधियाँ हैंl

  1. राम विष्णु के अवतार हैं लेकिन उनके अन्य भाई किसके अवतार थे????

राम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है लेकिन आपको पता है कि उनके अन्य भाई किसके अवतार थे? लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार माना जाता है जो क्षीरसागर में भगवान विष्णु का आसन हैl जबकि भरत और शत्रुघ्न को क्रमशः भगवान विष्णु द्वारा हाथों में धारण किए गए सुदर्शन-चक्र और शंख-शैल का अवतार माना जाता हैl

  1. सीता स्वयंवर में प्रयुक्त भगवान शिव के धनुष का नाम,,,,

हम में से अधिकांश लोगों को पता है कि राम का सीता से विवाह एक स्वयंवर के माध्यम से हुआ थाl उस स्वंयवर के लिए भगवान शिव के धनुष का इस्तेमाल किया गया था, जिस पर सभी राजकुमारों को प्रत्यंचा चढ़ाना थाl लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि भगवान शिव के उस धनुष का नाम “पिनाक” थाl

  1. लक्ष्मण को “गुदाकेश” के नाम से भी जाना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि वनवास के 14 वर्षों के दौरान अपने भाई और भाभी की रक्षा करने के उद्देश्य से लक्ष्मण कभी सोते नहीं थेl इसके कारण उन्हें “गुदाकेश” के नाम से भी जाना जाता हैl वनवास की पहली रात को जब राम और सीता सो रहे थे तो निद्रा देवी लक्ष्मण के सामने प्रकट हुईंl उस समय लक्ष्मण ने निद्रा देवी से अनुरोध किया कि उन्हें ऐसा वरदान दें कि वनवास के 14 वर्षों के दौरान उन्हें नींद ना आए और वह अपने प्रिय भाई और भाभी की रक्षा कर सकेl निद्रा देवी इस बात पर प्रसन्न होकर बोली कि अगर कोई तुम्हारे बदले 14 वर्षों तक सोए तो तुम्हें यह वरदान प्राप्त हो सकता हैl इसके बाद लक्ष्मण की सलाह पर निद्रा देवी लक्ष्मण की पत्नी और सीता की बहन “उर्मिला” के पास पहुंचीl उर्मिला ने लक्ष्मण के बदले सोना स्वीकार कर लिया और पूरे 14 वर्षों तक सोती रहीl

  1. उस जंगल का नाम जहाँ राम, लक्ष्मण और सीता वनवास के दौरान रूके थे????

रामायण महाकाव्य की कहानी के बारे में हम सभी जानते हैं कि राम और सीता, लक्ष्मण के साथ 14 वर्षों के लिए वनवास गए थे और राक्षसों के राजा रावण को हराकर वापस अपने राज्य लौटे थेl हम में से अधिकांश लोगों को पता है कि राम, लक्ष्मण और सीता ने कई साल वन में बिताए थे, लेकिन कुछ ही लोगों को उस वन के नाम की जानकारी होगीl उस वन का नाम दंडकारण्य था जिसमें राम, सीता और लक्ष्मण ने अपना वनवास बिताया थाl यह वन लगभग 35,600 वर्ग मील में फैला हुआ था जिसमें वर्तमान छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के कुछ हिस्से शामिल थेl उस समय यह वन सबसे भयंकर राक्षसों का घर माना जाता थाl इसलिए इसका नाम दंडकारण्य था जहाँ “दंड” का अर्थ “सजा देना” और “अरण्य” का अर्थ “वन” है।

  1. लक्ष्मण रेखा प्रकरण का वर्णन वाल्मीकि रामायण में नहीं है?????

पूरे रामायण की कहानी में सबसे पेचीदा प्रकरण लक्ष्मण रेखा प्रकरण है, जिसमें लक्ष्मण वन में अपनी झोपड़ी के चारों ओर एक रेखा खींचते हैंl जब सीता के अनुरोध पर राम हिरण को पकड़ने और मारने की कोशिश करते हैं, तो वह हिरण राक्षस मारीच का रूप ले लेता हैl मरने के समय में मारीच राम की आवाज में लक्ष्मण और सीता के लिए रोता हैl यह सुनकर सीता लक्ष्मण से आग्रह करती है कि वह अपने भाई की मदद के लिए जाए क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि उनके भाई किसी मुसीबत में फंस गए हैंl

पहले तो लक्ष्मण सीता को अकेले जंगल में छोड़कर जाने को राजी नहीं हुए लेकिन बार-बार सीता द्वारा अनुरोध करने पर वह तैयार हो गएl इसके बाद लक्ष्मण ने झोपड़ी के चारों ओर एक रेखा खींची और सीता से अनुरोध किया कि वह रेखा के अन्दर ही रहे और यदि कोई बाहरी व्यक्ति इस रेखा को पार करने की कोशिश करेगा तो वह जल कर भस्म हो जाएगाl इस प्रकरण के संबंध में अज्ञात तथ्य यह है कि इस कहानी का वर्णन ना तो “वाल्मीकि रामायण” में है और ना ही “रामचरितमानस” में हैl लेकिन रामचरितमानस के लंका कांड में इस बात का उल्लेख रावण की पत्नी मंदोदरी द्वारा किया गया हैl

  1. रावण एक उत्कृष्ट वीणा वादक था?????

रावण सभी राक्षसों का राजा थाl बचपन में वह सभी लोगों से डरता था क्योंकि उसके दस सिर थेl भगवान शिव के प्रति उसकी दृढ़ आस्था थीl इस बात की पुख्ता जानकारी है कि रावण एक बहुत बड़ा विद्वान था और उसने वेदों का अध्ययन किया थाl लेकिन क्या आपको पता है कि रावण के ध्वज में प्रतीक के रूप में वीणा होने का कारण क्या था? चूंकि रावण एक उत्कृष्ट वीणा वादक था जिसके कारण उसके ध्वज में प्रतीक के रूप में वीणा अंकित थाl हालांकि रावण इस कला को ज्यादा तवज्जो नहीं देता था लेकिन उसे यह यंत्र बजाना पसन्द थाl

  1. इन्द्र के ईर्ष्यालु होने के कारण “कुम्भकर्ण” को सोने का वरदान प्राप्त हुआ था ????

रामायण में एक दिलचस्प कहानी हमेशा सोने वाले “कुम्भकर्ण” की हैl कुम्भकर्ण, रावण का छोटा भाई था, जिसका शरीर बहुत ही विकराल थाl इसके अलावा वह पेटू (बहुत अधिक खाने वाला) भी थाl रामायण में वर्णित है कि कुम्भकर्ण लगातार छह महीनों तक सोता रहता था और फिर सिर्फ एक दिन खाने के लिए उठता था और पुनः छह महीनों तक सोता रहता थाl

लेकिन क्या आपको पता है कि कुम्भकर्ण को सोने की आदत कैसे लगी थीl एक बार एक यज्ञ की समाप्ति पर प्रजापति ब्रह्मा कुन्भकर्ण के सामने प्रकट हुए और उन्होंने कुम्भकर्ण से वरदान मांगने को कहाl इन्द्र को इस बात से डर लगा कि कहीं कुम्भकर्ण वरदान में इन्द्रासन न मांग ले, अतः उन्होंने देवी सरस्वती से अनुरोध किया कि वह कुम्भकर्ण की जिह्वा पर बैठ जाएं जिससे वह “इन्द्रासन” के बदले “निद्रासन” मांग लेl इस प्रकार इन्द्र की ईर्ष्या की वजह से कुम्भकर्ण को सोने का वरदान प्राप्त हुआ थाl

  1. नासा के अनुसार “रामायण” की कहानी और “आदम का पुल” एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं !!!!!

रामायण की कहानी के अंतिम चरण में वर्णित है कि राम और लक्ष्मण ने वानर सेना की मदद से लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए एक पुल का निर्माण किया थाl ऐसा माना जाता है कि यह कहानी लगभग 1,750,000 साल पहले की हैl हाल ही में नासा ने पाक जलडमरूमध्य में श्रीलंका और भारत को जोड़ने वाले एक मानव निर्मित प्राचीन पुल की खोज की है और शोधकर्ताओं और पुरातत्वविदों के अनुसार इस पुल के निर्माण की अवधि रामायण महाकाव्य में वर्णित पुल के निर्माणकाल से मिलती हैl नासा के उपग्रहों द्वारा खोजे गए इस पुल को “आदम का पुल” कहा जाता है और इसकी लम्बाई लगभग 30 किलोमीटर हैl

  1. रावण को पता था कि वह राम के हाथों मारा जाएगा!!!!!

रामायण की पूरी कहानी पढ़ने के बाद हमें पता चलता है कि रावण एक क्रूर और सबसे विकराल राक्षस था, जिससे सभी लोग घृणा करते थेl जब रावण के भाइयों ने सीता के अपहरण की वजह से राम के हमले के बारे में सुना तो अपने भाई को आत्मसमर्पण करने की सलाह दी थीl यह सुनकर रावण ने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया और राम के हाथों मरकर मोक्ष पाने की इच्छा प्रकट कीl उसके कहा कि “अगर राम और लक्ष्मण दो सामान्य इंसान हैं, तो सीता मेरे पास ही रहेगी क्योंकि मैं आसानी से उन दोनों को परास्त कर दूंगा और यदि वे देवता हैं तो मैं उन दोनों के हाथों मरकर मोक्ष प्राप्त करूँगाl

  1. आखिर क्यों राम ने लक्ष्मण को मृत्युदंड दिया?????

रामायण में वर्णित है कि श्री राम ने न चाहते हुए भी जान से प्यारे अपने छोटे भाई लक्ष्मण को मृत्युदंड दिया थाl आखिर क्यों भगवान राम ने लक्ष्मण को मृत्युदंड दिया था? यह घटना उस वक़्त की है जब श्री राम लंका विजय के बाद अयोध्या लौट आये थे और अयोध्या के राजा बन गए थेl

एक दिन यम देवता कोई महत्तवपूर्ण चर्चा करने के लिए श्री राम के पास आते हैंl चर्चा प्रारम्भ करने से पूर्व उन्होंने भगवान राम से कहा की आप मुझे वचन दें कि जब तक मेरे और आपके बीच वार्तालाप होगी हमारे बीच कोई नहीं आएगा और जो आएगा, उसे आप मृत्युदंड देंगेंl इसके बाद राम, लक्ष्मण को यह कहते हुए द्वारपाल नियुक्त कर देते हैं कि जब तक उनकी और यम की बात हो रही है वो किसी को भी अंदर न आने दे, अन्यथा वह उसे मृत्युदंड दे देंगेl

लक्ष्मण भाई की आज्ञा मानकर द्वारपाल बनकर खड़े हो जाते हैंl लक्ष्मण को द्वारपाल बने कुछ ही समय बीतने के बाद वहां पर ऋषि दुर्वासा का आगमन होता हैl जब दुर्वासा ने लक्ष्मण से अपने आगमन के बारे में राम को जानकारी देने के लिये कहा तो लक्ष्मण ने विनम्रता के साथ मना कर दियाl इस पर दुर्वासा क्रोधित हो गये तथा उन्होने सम्पूर्ण अयोध्या को श्राप देने की बात कहीl लक्ष्मण ने शीघ्र ही यह निश्चय कर लिया कि उनको स्वयं का बलिदान देना होगा ताकि वो नगरवासियों को ऋषि के श्राप से बचा सकें और उन्होने भीतर जाकर ऋषि दुर्वासा के आगमन की सूचना दीl

अब श्री राम दुविधा में पड़ गए क्योंकि उन्हें अपने वचन के अनुसार लक्ष्मण को मृत्युदंड देना थाl इस दुविधा की स्थिति में श्री राम ने अपने गुरू वशिष्ठ का स्मरण किया और कोई रास्ता दिखाने को कहाl गुरूदेव ने कहा कि अपनी किसी प्रिय वस्तु का त्याग, उसकी मृत्यु के समान ही हैl

अतः तुम अपने वचन का पालन करने के लिए लक्ष्मण का त्याग कर दोl लेकिन जैसे ही लक्ष्मण ने यह सुना तो उन्होंने राम से कहा की आप भूल कर भी मेरा त्याग नहीं करना, आप से दूर रहने से तो यह अच्छा है की मैं आपके वचन का पालन करते हुए मृत्यु को गले लगा लूँl ऐसा कहकर लक्ष्मण ने जल समाधि ले लीl

  1. राम ने सरयू नदी में डूबकी लगाकर पृथ्वीलोक का परित्याग किया था । ऐसा माना जाता है कि जब सीता ने पृथ्वी के अन्दर समाहित होकर अपने शरीर का परित्याग कर दिया तो उसके बाद राम ने सरयू नदी में जल समाधि लेकर पृथ्वीलोक का परित्याग किया था|।

संजय गुप्ता

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भारत में रविवार की छुट्टी किस व्यक्ति ने दिलाई?
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रविवार की छुट्टी के पीछे उस महान व्यक्ति का क्या मकसद था? जानिए क्या है इसका इतिहास।

साथियों, जिस व्यक्ति की वजह से हमें ये छुट्टी हासिल हुयी है, उस महापुरुष का नाम है “नारायण मेघाजी लोखंडे”. नारायण मेघाजी लोखंडे ये जोतीराव फुलेजी के सत्यशोधक आन्दोलन के कार्यकर्ता थे। और कामगार नेता भी थे। अंग्रेजो के समय में हफ्ते के सातो दिन मजदूरो को काम करना पड़ता था। लेकिन नारायण मेघाजी लोखंडे जी का ये मानना था की, हफ्ते में सात दिन हम अपने परिवार के लिए काम करते है। लेकिन जिस समाज की बदौलत हमें नौकरिया मिली है, उस समाज की समस्या छुड़ाने के लिए हमें एक दिन छुट्टी मिलनी चाहिए। उसके लिए उन्होंने अंग्रेजो के सामने 1881 में प्रस्ताव रखा। लेकिन अंग्रेज ये प्रस्ताव मानने के लिए तयार नहीं थे। इसलिए आख़िरकार नारायण मेघाजी लोखंडे जी को इस sunday की छुट्टी के लिए 1881 में आन्दोलन करना पड़ा। ये आन्दोलन दिन-ब-दिन बढ़ते गया। लगभग 8 साल ये आन्दोलन चला। आखिरकार 1889 में अंग्रेजो को sunday की छुट्टी का ऐलान करना पड़ा। ये है इतिहास।
क्या हम इसके बारे में जानते है?
अनपढ़ लोग छोड़ो लेकिन क्या पढ़े लिखे लोग भी इस बात को जानते है?
जहा तक हमारी जानकारी है, पढ़े लिखे लोग भी इस बात को नहीं जानते। अगर जानकारी होती तो sunday के दिन enjoy नहीं करते….समाज का काम करते….और अगर समाज का काम ईमानदारी से करते तो समाज में भुखमरी, बेरोजगारी, बलात्कार, गरीबी, लाचारी ये समस्या नहीं होती।
साथियों, इस sunday की छुट्टीपर हमारा हक़ नहीं है, इसपर “समाज” का हक़ है। कोई बात नहीं, आज तक हमें ये मालूम नहीं था लेकिन अगर आज हमें मालूम हुआ है तो आज से ही sunday का ये दिन सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित करें.!!
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देव शर्मा

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक भक्त ने विष्णु को खोजते—खोजते एक दिन पा लिया। चरण पकड़ लिए। बड़ा आह्लादित था, आनंदित था। जो चाहिए था, मिल गया था। खूब—खूब धन्यवाद दिए विष्णु को और कहा कि बस एक बात और: मुझसे कुछ थोड़ा सा काम करा लें, कुछ सेवा करा लें। आपने इतना दिया, जीवन दिया, जीवन का परम उत्सव दिया और अब यह परम जीवन भी दिया। मुझसे कुछ थोड़ी सेवा करा लें! मुझे ऐसा न लगे कि मैं आपके लिए कुछ भी न कर पाया, आपने इतना किया! मुझे थोड़ा सा सौभाग्य दे दें! जानता हूं, आपको किसी की जरूरत नहीं, किसी बात की जरूरत नहीं। लेकिन मेरा मन रह जाएगा कि मैं भी प्रभु के लिए कुछ कर सका!
विष्णु ने कहा: कर सकोगे? करना बहुत कठिन होगा।
मगर भक्त जिद्द अड़ गया। तो कहा: ठीक है, मुझे प्यास लगी है।
क्षीरसागर में तैरते हैं विष्णु, वहां कैसी प्यास! पर इस भक्त के लिए कहा कि चल ठीक, मुझे प्यास लगी है। तू जाकर एक प्याली भर पानी ले आ।
भक्त भागा। तुम कहोगे क्षीरसागर था, वहीं से भर लेता। लेकिन जो पास है, वह तो किसी को दिखाई नहीं पड़ता। पास तो दिखाई ही नहीं पड़ता। पास के लिए तो हम बिलकुल अंधे हैं। हमें दूर की चीजें दिखाई पड़ती हैं। जितनी दूर हों, उतनी साफ दिखाई पड़ती हैं। चांदत्तारे दिखाई पड़ते हैं। निकट पड़ोस नहीं दिखाई पड़ता। उसे भी नहीं दिखाई पड़ा होगा। तुम जैसा ही आदमी रहा होगा। भागा। उसने कहा: अभी लाता हूं।
चला। उतरा संसार में। एक द्वार पर जाकर दस्तक दी। एक सुंदर युवती ने द्वार खोला। उस भक्त ने कहा कि देवी, मुझे एक प्याली भर शीतल जल मिल जाए।
उस युवती ने कहा: आप आए हैं, ब्राह्मण देवता! भीतर विराजें! मेरे घर को धन्य करें! ऐसे बाहर—बाहर से न चले जाएं। फिर मेरे पिता भी बाहर गए हैं। मैं घर में अकेली हूं। वे आएंगे तो बहुत नाराज होंगे कि ब्राह्मण देवता आए और तूने बाहर से भेज दिया! नहीं—नहीं, आप भीतर आएं!
एक क्षण को तो ब्राह्मण देवता डरे! युवती है, सुंदर है, अति सुंदर, ऐसी सुंदर स्त्री नहीं देखी। विष्णु भी एक क्षण को फीके मालूम पड़ने लगे। विष्णु के फीके हो जाने में देर कितनी लगती है! ऐसा दूर का सपना मालूम होने लगे। तो भक्त डरा, घबड़ाया। घबड़ाया इसीलिए कि विष्णु एक क्षण को भूलने ही लगे। आवाज दूर से दूर होने लगी।
उसने कहा कि नहीं—नहीं। माथे पर पसीना आ गया। लेकिन युवती तो मानी न। उसने हाथ ही पकड़ लिया ब्राह्मण देवता का—कि आप आएं भीतर, ऐसे न जाने दूंगी। उसके हाथ का पकड़ना—ब्राह्मण देवता के विष्णु बिलकुल विलीन हो गए। वह भीतर ले गई। उसने कहा: जल तो आप ले जाएंगे, लेकिन पहले स्वयं तो जलपान कर लें। तो नाश्ता करवाया, पानी पिलाया।
एकांत! उस युवती का सौंदर्य! उस युवती का भाग—भाग कर ब्राह्मण देवता की सेवा करना! विष्णु धीरे—धीरे स्मृति से उतर गए। कभी—कभी बीच—बीच में याद आ जाती कि बेचारे प्यासे होंगे, फिर सोचता कि ठीक है, भगवान को क्या प्यास! वह तो मेरे लिए ही उन्होंने कह दिया है, अन्यथा उनको क्या प्यास! वे तो परम तृप्ति में हैं! तो ऐसी कोई जल्दी तो है नहीं। और दो क्षण रुक लूं।
और युवती ने जब निमंत्रण दिया कि जब आप ही आ गए हैं, मेरे पिता भी थोड़ी देर में आते ही होंगे, उनसे भी मिल कर जाएं, तो वह सहज ही राजी हो गया। और युवती सेवा करती रही। और युवती का सौंदर्य और रूप मन को मोहता रहा। सांझ हो गई, पिता तो लौटे नहीं। युवती ने कहा: आप भोजन तो कर ही लें। अब सांझ को कहां भोजन करेंगे।
भोजन बना, भोजन किया। रात हो गई। युवती ने कहा: इस रात में अब कहां जाएंगे!
सोच तो ब्राह्मण देवता भी यही रहे थे कि रात अब कहां जाएंगे! सुबह—सुबह भोर होते, ब्रह्ममुहूर्त में निकल जाना। राजी हो गए। फिर तो वर्षों बीत गए। फिर वह वहां से निकले नहीं। फिर एक पर एक काम आते गए। ब्राह्मण देवता करें भी तो क्या करें! सुबह युवती कहने लगी कि पिता तो आए नहीं हैं, गाय का दूध लगाना है, मुझसे लगता नहीं, आप लगा दें। तो गाय का दूध लगाया। फिर बैल बीमार था। तो युवती ने कहा कि ब्राह्मण देवता, इसकी भी कुछ सेवा करें, मैं कहां औषधि लेने जाऊं! और फिर ये सब भी परमात्मा के ही हैं। बात भी जंची।
ब्राह्मण देवता रुके सो रुके। फिर उनके बेटे हुए, बेटियां हुईं, बड़ा फैलाव हो गया। कोई पचास—साठ साल बीत गए। बेटों के बेटे हो गए। तब गांव में बाढ़ आई। भयंकर बाढ़ आई! ब्राह्मण देवता बूढ़े हो गए हैं। लेकर अपने बच्चों को, नाती—पोतों को किसी तरह बाढ़ से निकलने की कोशिश कर रहे हैं। सारा गांव डूबा जा रहा है। भयंकर बाढ़ है! ऐसी कभी न देखी न सुनी। जैसे बाढ़ में से जा रहे हैं बचा कर, पत्नी बह गई। पत्नी को बचाने दौड़े तो जिस बच्चे का हाथ पकड़ा था, उसका हाथ छूट गया। उस किनारे पहुंचते—पहुंचते सारा परिवार विलीन हो गया बाढ़ में।
उस किनारे एक पत्थर की चट्टान पर ब्राह्मण देवता खड़े हैं और बाढ़ की एक बड़ी उत्तुंग लहर आती है। उत्तुंग लहर पर आते हैं विष्णु बैठे हुए और कहते हैं: मैं प्यासा ही हूं, तुम अभी तक पानी नहीं लाए? मैंने तुमसे पहले ही कहा था, तुम न कर सकोगे। क्योंकि तुम संसार छोड़ कर भागे थे। जो छोड़ कर भागता है, उसका आकर्षण शेष रहता है।
यह कथा बड़ी प्यारी है।…क्योंकि तुम संसार छोड़ कर भागे थे। संसार से जाग कर ऊपर नहीं उठे थे। संसार की तरफ आंख बंद करके भागे थे। तो छोटे से काम के लिए भी संसार में जाओगे तो उलझ जाओगे। लेने गए थे जल और सारा संसार बस गया। गए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास! फिर जब कोई कपास ओटता है तो ओटता ही चला जाता है। कपास का ओटना ऐसा है, कभी पूरा नहीं होता।
जय श्री हरि ।
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देव शर्मा

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कॉलबेल की आवाज़ सुनकर जैसे ही सुबह सुबह शांतनु ने दरवाजा खोला सामने एक पुराना से ब्रीफकेस लिए गांव के मास्टर जी और उनकी बीमार पत्नी खड़ी थीं। मास्टर जी ने चेहरे के हाव भाव से पता लगा लिया कि उन्हें सामने देख शांतनु को जरा भी खुशी का अहसास न हुआ है। जबरदस्ती चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की कोशिश करते हुए बोला “अरे सर आप दोनों बिना कुछ बताए अचानक से चले आये!अंदर आइये।”

मास्टर साहब ब्रीफकेस उठाये अंदर आते हुए बोले” हाँ बेटा, अचानक से ही आना पड़ा मास्टरनी साहब बीमार हैं पिछले कुछ दिनों से तेज फीवर उतर ही नहीं रहा, काफी कमजोर भी हो गई है। गाँव के डॉक्टर ने AIIMS दिल्ली में अविलंब दिखाने की सलाह दी। अगर तुम आज आफिस से छुट्टी लेकर जरा वहाँ नंबर लगाने में मदद कर सको तो…”

“नहीं नहीं, छुट्टी तो आफिस से मिलना असंभव सा है “बात काटते हुए शांतनु ने कहा। थोड़ी देर में प्रिया ने भी अनमने ढंग से से दो कप चाय और कुछ बिस्किट उन दोनों बुजुर्गों के सामने टेबल पर रख दिये। सान्या सोकर उठी तो मास्टर जी और उनकी पत्नी को देखकर खूब खुशी से चहकते हुए “दादू दादी”बोलकर उनसे लिपट गयी दरअसल छः महीने पहले जब शांतनु एक सप्ताह के लिए गाँव गया था तो सान्या ज्यादातर मास्टर जी के घर पर ही खेला करती थी। मास्टर जी निःसंतान थे और उनका छोटा सा घर शांतनु के गाँव वाले घर से बिल्कुल सटा था। बूढ़े मास्टर साहब खूब सान्या के साथ खेलते और मास्टरनी साहिबा बूढ़ी होने के बाबजूद दिन भर कुछ न कुछ बनाकर सान्या को खिलातीं रहतीं थीं। बच्चे के साथ वो दोनों भी बच्चे बन गए थे।

गाँव से दिल्ली वापस लौटते वक्त सान्या खूब रोई उसके अपने दादा दादी तो थे नहीं मास्टर जी और मास्टरनी जी में ही सान्या दादा दादी देखती थी। जाते वक्त शांतनु ने घर का पता देते हुए कहा कि “कभी भी दिल्ली आएं तो हमारे घर जरूर आएं बहुत अच्छा लगेगा।” दोनों बुजुर्गों की आँखों से सान्या को जाते देख आँसू गिर रहे थे और जी भर भर आशीर्वाद दे रहे थे।

कुल्ला करने जैसे ही मास्टर जी बेसिन के पास आये प्रिया की आवाज़ सुनाई दी “क्या जरूरत थी तुम्हें इनको अपना पता देने की दोपहर को मेरी सहेलियाँ आती हैं उन्हें क्या जबाब दूँगी और सान्या को अंदर ले आओ कहीं बीमार बुढ़िया मास्टरनी की गोद मे बीमार न पड़ जाए”

शांतनु ने कहा “मुझे क्या पता था कि सच में आ जाएँगे रुको किसी तरह इन्हें यहाँ से टरकाता हूँ”

दोनों बुजर्ग यात्रा से थके हारे और भूखे आये थे सोचा था बड़े इत्मीनान से शांतनु के घर चलकर सबके साथ आराम से नाश्ता करेंगे। इस कारण उन्होंने कुछ खाया पिया भी न था। आखिर बचपन में कितनी बार शांतनु ने भी तो हमारे घर खाना खाया है। उन्होंने जैसे अधिकार से उसे उसकी पसंद के घी के आलू पराठे खिलाते थे इतना बड़ा आदमी बन जाने के बाद भी शांतनु उन्हें वैसे ही पराठे खिलायेगा।

” सान्या!!” मम्मी की तेज आवाज सुनकर डरते हुए सान्या अंदर कमरे में चली गयी। थोड़ी देर बाद जैसे ही शांतनु हॉल में उनसे मिलने आया तो देखा चाय बिस्कुट वैसे ही पड़े हैं और वो दोनों जा चुके हैं।

पहली बार दिल्ली आए दोनों बुजुर्ग किसी तरह टैक्सी से AIIMS पहुँचे और भारी भीड़ के बीच थोड़ा सुस्ताने एक जगह जमीन पर बैठ गए। तभी उनके पास एक काला सा आदमी आया और उनके गाँव का नाम बताते हुए पूछा” आप मास्टर जी और मास्टरनी जी हैं ना। मुझे नहीं पहचाना मैं कल्लू। आपने मुझे पढ़ाया है।”

मास्टर जी को याद आया “ये बटेसर हरिजन का लड़का कल्लू है बटेसर नाली और मैला साफ करने का काम करता था। कल्लू को हरिजन होने के कारण स्कूल में आने पर गांववालो को ऐतराज था इसलिए मास्टर साहब शाम में एक घंटे कल्लू को चुपचाप उसके घर पढ़ा आया करते थे।”

” मैं इस अस्पताल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हूँ। साफ सफाई से लेकर पोस्टमार्टम रूम की सारी जिम्मेवारी मेरी है।”

फिर तुरंत उनका ब्रीफकेस सर पर उठाकर अपने एक रूम वाले छोटे से क्वार्टर में ले गया। रास्ते में अपने साथ काम करने वाले लोगों को खुशी खुशी बता रहा था मेरे रिश्तेदार आये हैं मैं इन्हें घर पहुँचाकर अभी आता हूँ घर पहुँचते ही पत्नी को सारी बात बताई पत्नी ने भी खुशी खुशी तुरंत दोनों के पैर छुए फिर सब मिलकर एक साथ गर्मा गर्म नाश्ता किए। फिर कल्लू की छोटी सी बेटी उन बुजुर्गों के साथ खेलने लगी।

कल्लू बोला “आपलोग आराम करें आज मैं जो कुछ भी हूँ आपकी बदौलत ही हूँ फिर कल्लू अस्पताल में नंबर लगा आया। “कल्लू की माँ नहीं थी बचपन से ही।

मास्टरनी साहब का नंबर आते ही कल्लू हाथ जोड़कर डॉक्टर से बोला “जरा अच्छे से इनका इलाज़ करना डॉक्टर साहब ये मेरी बूढ़ी माई है “सुनकर बूढ़ी माँ ने आशीर्वाद की झड़ियां लगाते हुए अपने काँपते हाथ कल्लू के सर पर रख दिए। वो बांझ औरत आज सचमुच माँ बन गयी थी उसे आज बेटा मिल गया था और उस बिन माँ के कल्लू को भी माँ मिल गयी थी….

रामचंद्र आर्य