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एक वैष्णव था। उसका जीवन अत्यंत सरल और सात्विक था। वह सभी के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करता था और दूसरों के दुख-दर्द में उनके काम आता था। उसे इस बात का गर्व था कि वह वैष्णव है। एक बार वह मथुरा जा रहा था। रास्ते में शाम हो गई। उसने वहीं एक गांव में ठहरने का निश्चय किया। वह किसी वैष्णव के घर ही रुकना चाहता था। उसने एक घर के दरवाजे पर जाकर कहा, “मैंने सुना है कि इस गांव में सब वैष्णव हैं। मैं भी वैष्णव हूं। मैं रातभर ठहरकर सवेरे चला जाऊंगा। क्या मुझे एक रात के लिए आपके यहां आश्रय मिल सकता है ?” अंदर से किसी आदमी ने कहा, “आप परदेसी हैं, मेरे यहां आपका हार्दिक स्वागत है। किंतु चूंकि आप वैष्णव के ही घर रुकने के अभिलाषी हैं, इसलिए आपको यह बता देना मेरा कर्तव्य है कि इस गांव में मुझे छोड़कर सभी वैष्णव हैं।” वैष्णव ने उस आदमी को प्रणाम किया और वहां से हट गया। वह दूसरे घर पहुंचा। वहां जाकर उसने स्वयं को वैष्णव बताते हुए वैष्णव के घर रुकने की इच्छा प्रकट की तो वहां भी वही जवाब मिला, जो पहले घर में मिला था। तीसरे, चौथे, पांचवें, और यहां तक कि अंतिम घर के गृहस्थों ने भी उसे बड़ी नम्रता के साथ वही जवाब दिया। वैष्णव बड़ी उलझन में पड़ गया कि आखिर यह माजरा क्या है ? उसने तो सुना था कि इस गांव में सभी वैष्णव हैं, लेकिन यहां तो दृश्य विपरीत ही है। एक भी घर ऐसा नहीं है जो स्वयं को वैष्णव कहे। अब वह कहां जाए ? तभी उसे सामने एक मंदिर दिखाई दिया। वह वहां गया और मंदिर के पुजारी से अपनी जिज्ञासा का समाधान चाहा। वे हंसकर बोले, “बेटा, इस जगत में जो भला मानुष है, वही सचमुच वैष्णव है। सच्चा वैष्णव कभी अपने मुंह से स्वयं को वैष्णव नहीं कहता। उसकी वाणी नहीं, आचरण बोलता है। जो स्वयं को छोटा मानता है, वही सही अर्थों में बड़ा होता है।” वैष्णव को अहसास हुआ कि गांव के विषय में जो सुना गया था, वह सच ही है। ये लोग ही सच्चे वैष्णवजन हैं।

K L Kakkad

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श्री गोबर गणेश निमाड़ मध्यप्रदेश
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मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में नर्मदा नदी के किनारे बसा माहेश्वर एक महत्वपूर्ण कस्बा है। इसी कस्बे के महावीर मार्ग पर एक अति प्राचीन मंदिर है, जिसका नाम है गोबर गणेश।

गोबर गणेश शब्द से हिन्दी में बुद्धूपने का संकेत मिलता है, इसलिए यह नाम इस कस्बे में आने वालों को अपनी तरफ आकर्षित करता है। दूसरी बात स्थानीय लोग बताते हैं कि इस मन्दिर का प्रताप सबसे बढ़कर है। गोबर गणेश मन्दिर से कोई खाली हाथ नहीं जाता।

माहेश्वर नगर पंचायत में लिपिक के पद पर कार्यरतमंगेश जोशी के अनुसार यह मन्दिर गुप्त कालीन है। औरंगजेब के समय में इसे मस्जिद बनाने का प्रयास किया गया था, जिसके प्रमाण इस मन्दिर का गुंबद है, जो मस्जिद की तरह है। बाद में श्रद्धालुओं ने यहां पुनः मूर्ति की स्थापना करके, वहां पूजा प्रारंभ की।

गोबर गणेश मंदिर में गणेश की जो प्रतिमा है, वह शुद्ध रूप से गोबर की बनी है। इस मूर्ति में 70 से 75 फीसदी हिस्सा गोबर है और इसका 20 से 25 फीसदी हिस्सा मिट्टी और दूसरी सामग्री है, इसीलिए इस मंदिर को गोबर गणेश मंदिर कहते हैं।

इस मंदिर की देखभाल का काम ‘श्री गोबर गणेश मंदिर जिर्णोद्धार समिति’ कर रही है। विद्वानों के अनुसार मिट्टी और गोबर की मूर्ति की पूजा पंचभूतात्मक होने तथा गोबर में लक्ष्मी का वास होने से ‘लक्ष्मी तथा ऐश्वर्य’ की प्राप्ति‍ हेतु की जाती है।

मंदिर के पुजारी अस्सी वर्षिय दत्तात्रेय जोशी के अनुसार गणेश जी का स्वरूप भूतत्व रूपी है। ‘महोमूलाधारे’ इस प्रमाण से मूलाधार भूतत्व है। अर्थात् मूलाधार में भूतत्व रूपी गणेश विराजमान हैं।

और गणपति के ग्लोंबीज का विचार करने से पहले यह अवगत होता है कि ‘तस्मादा एतस्मा दात्मनआकाशः सम्भूतः आकाशादायुः वायोरग्निआग्नेरापः अभ्दयः; पृथ्वी’ इस सृष्टि के अनुसार‘गकार’, ‘खबीज’ और ‘लकार’, भूबीज इनके जोड़ सेपंचभूतात्मक गणेश हैं।’

माहेश्वर में बने गोबर के गणेश प्रतिमा की पूजा की सार्थकता बताते हुए पंडित श्री जोशी कहते हैं-भाद्रपक्ष शुक्ल चतुर्थी के पूजन के लिए हमारे पूर्वजगोबर या मिट्टी से ही गणपति का बिम्ब बनाकर पूजा करते थे।

आज भी यह प्रथा आचार में प्रचलित है। शोणभद्र शीला या अन्य सोने चांदी बने बिम्ब को पूजा में नहीं रखते क्योंकि ‘गोबर में लक्ष्मी का वास होता है।

इसी प्रकार गोबर एवं मिट्टी से बनी गणेशप्रतिमाओं को पूजा में ग्रहण करते हैं।

चूंकि माना गया है कि गणपति में भूतत्व है।’ श्री गणेश वही हैं, जिनकी पूजा हिन्दू रीति में हर शुभकार्य से पहले अनिवार्य मानी गई है, इसलिए श्रीगणेश करना हमारी परंपरा में किसी कार्य को प्रारंभ करने के पर्यायवाची के तौर पर लिया जाता है।

माहेश्वर का गोबर गणेश मंदिर पहली नजर में देशभर में स्थित अपनी ही तरह के हजारों गणेश मंदिरों की ही तरह है, लेकिन इस मंदिर में गोबर से निर्मित गणेश और इस मंदिर का गुंबद जो आम हिन्दू मंदिरों की तरह नहीं है, अपनी तरफ आकर्षित जरूर करता है।

एक खास बात और, स्थानीय लोगों की इस मंदिर में आस्था किसी का भी ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर सकती है, इसलिए नर्मदा के किनारे निमाड़ क्षेत्र में कभी जाएं तो माहेश्वर का गोबर गणेश मंदिर देखना ना भूलें
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Dev Sharma

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#विसंगतआवेगोंकेदेशमें

#मेजरकुमुदडोगरा और श्रीदेवी

१५ फरबरी भारतीय वायु सेना का एक फाइटर जहाज़ दुर्घटनाग्रस्त हुआ , विंग कमांडर वत्स और उनके साथी जेम्स वीरगति को प्राप्त हुये . पांच दिन पहिले ही विंग कमांडर वत्स की पत्नी मेजर कुसुम डोगरा ने एक संतान को जन्म दिया था . पति के देश के लिए प्राण होम देने पर , अंतिम दर्शन और क्रिया के लिए मेजर कुमुद डोगरा सेना की परंपरा का निर्वाह करते हुये इस अवसर पहिने जाने वाली वर्दी पहन कर पूर्ण सैनिक गौरव और सम्मान के साथ आयीं , तनिक भी विचलित हुये बिना , कोई विलाप , दुर्बलता नहीं , पूर्ण दृढ़ता का मुख भाव , पांच दिन की नवजात संतान को हाथों में थामे, सधे क़दमों से मार्च करते हुये , वो संतान की जिसका मुंह पिता ने देखा ही नहीं था , वो संतान जो अपने रणबांकुरे पिता को देख भी ले पांच दिवस की आयु में , तो अबोध पहिचाने कैसे ? बाद में चित्रों और कहानियों से ही बताना होगा की तुम उस वीर सैनिक की बेटी हो .

खबर अख़बारों में छपी , टी वी पर भी आई , सोशल मीडिया पर भी , लोगों के छोटे छोटे अनमने से सन्देश आये , RIP, नमन , श्रद्धांजलि , नारी शक्ति को प्रणाम इत्यादि . किसी राजनेता , नेता , अभिनेता का बयान नहीं आया ना ही शासन में बैठे लोगों ने कोई उदगार व्यक्त किये .

कुमुद डोगरा साधारण सैनिक परिवार से हैं , देशभक्ति बचपन से मानस पर आना स्वाभाविक है , सेना की नियुक्ति ली , विंग कमांडर वत्स दक्ष पायलट माने जाते थे , अति अनुशासित और कर्त्तव्य निष्ठ , मेजर कुमुद डोगरा ने प्रेम और सम्मान के भाव के साथ उन्हें जीवन साथी चुना , एक संतान पांच दिन की , और इति .

श्रीदेवी बोनी कपूर की पत्नी मोना कपूर और उनके बच्चों के साथ उन्ही के घर में रहती थीं , मिथुन चक्रवर्ती की उपस्थिति में ‘राखी’ बाँध कर उन्होंने बोनी कपूर को भाई के रिश्ते में बांध लिया था , बाद में वो बोनी कपूर द्वारा गर्भवती हुयीं फिर दोनों ने एक मंदिर में जाकर विवाह किया , विवाह आपराधिक था , क्योंकि बोनी कपूर ने पहिली पत्नी से कानूनी अलगाव नहीं किया था , अपने लगभग वयस्क हो गए दो बच्चों और पत्नी को छोड़ कर बोनी कपूर श्रीदेवी के साथ रहने लगे , उन्हें दो संताने हुयीं . श्रीदेवी ने कई फिल्मों में ‘अभिनय’ किया , नृत्य किया , अपने सुन्दर शरीर का खूब प्रदर्शन किया, अपने अभिनय कौशल से खूब धन कमाया , सात बार इनकम टैक्स की चोरी में पकड़ी गयीं , तीन घंटे की फिल्मों की काल्पनिक कथा के अलावा देश के लिए उनका कोई सन्देश नहीं था , देहयष्टि के सौन्दर्यीकरण के लिए १७ ,१८ बार ऑपरेशन कराये , जिसके बाद कई हानिकारक दवाएं जिनमे Steroids भी हैं लेती थीं , ५४ वर्ष की आयु में दिल के दौरे से उनका देहांत हो गया .

टी वी चैनल , अख़बारों में शोक सन्देश पढ़ रहा हूँ , टाइम्स ऑफ़ इंडिया की हेड लाइन है ” देश से चांदनी चली गयी “, तमाम अन्य राजनेताओं ने , अभिनेताओं ने भारी भरकम शोक सन्देश भेजे , दिन भर टी वी पर उनके रोमांचक जीवन की झलकियाँ दिखाई गयीं , फेस बुक के मित्रों ने ऐसे शोक के लेख लिखे की क्या कहूँ ।

मैं स्तब्ध हूँ इन सब को देख सुन कर , हमारे भावावेग विसंगत और दिशा भ्रमित हैं , हम यथार्थ में नहीं उन्मांद में जीना पसंद करते हैं , श्री देवी की मौत का दुःख मुझे भी है , पर उससे ज्यादह दुःख मुझे हमारे विसंगत आवेगों पर है . मेजर कुमुद और विंग कमांडर वत्स की दास्तान में ग्लेमर , सस्पेंस , मासंलता , धन , प्रसिद्धि , अभिनय ,विचलन ,विसंगति ,मंच , रुपहला पर्दा नहीं है ,अर्धनग्न वस्त्रों में नृत्य नहीं है , #एकसपाटदेशप्रेमऔरकुर्बानीहै , #हमेंकैसेआकर्षितकरपाएगी ???
यह भी सच है।।।।

( #मेजरदीपकअग्रवाल की व्हाट्सएप ग्रुप पर आयी एक पोस्ट से साभार )

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आप कौन से भक्त हैं ?जो भगवान की कृपा आशीर्वाद से निहाल हो जाते हैं या फिर जो भगवान के कोप के भजन बन जाते हैं ? एक रोचक कथा –


एक राजा के दो बगीचे थे। बगीचों के देखभाल के लिए उन्हें दो मालियों की जरुरत थी।
मंत्री ने दो मालियों को राजा के समक्ष बुलवाया और राजा से उन दोनों को काम पर रख लेने की सिफारिश की।

राजा ने एक माली को एक बगीचा और दूसरे माली को दूसरा बगीचा देखभाल के लिए सौंप दिया। और निश्चिन्त हो गए।

एक माली की राजा पर बड़ी श्रद्धा निष्ठा हो गयी कि राजा ने मुझे नौकरी पर रख लिया है राजा की इस कृपा का मुझे कृतज्ञ होना चाहिए।

उसने बगीचे में एक आम के सुंदर पेड़ के नीचे एक चबूतरा बनाया, उस पर राजा का बड़ा सा चित्र रख दिया।
नित्य उस चित्र पर फूल चढ़ाने लगा, धूप अगरबत्ती दिखाने लगा, वहाँ बड़ी देर तक बैठ कर राजा के नाम का जप- ध्यान करने लगा। कोई मिलने आ जाता तो राजा की खूब महिमा सुनाता बड़ाई करता।

इधर बगीचे में कहाँ कौन सा पौधा सूख रहा है ? कहाँ कीड़े लगे हैं , कहाँ खाद पानी निराई गुड़ाई छँटाई की जरूरत है ? किस मौसम में कौन से नए फूलों की क्यारियाँ तैयार करने की जरुरत है ? इस पर उसका ध्यान नहीं था। फलस्वरूप 6 महीने में बगीचा बर्बाद हो गया।

दूसरे बगीचे के माली ने बगीचे में पूरी मेहनत की राजा का चित्र तो नहीं लगाया पर उसने राजा द्वारा दी गयी जिम्मेदारी को समझा और बगीचे को सुंदर बनाने में पूरी तरह जुट गया।

बगीचे की भली भांति सफाई , निराई गुड़ाई की। नए मौसम के अनुरूप फूलों की क्यारियाँ तैयार कीं। दूर दूर से अच्छे, सुँदर, खुशबूदार फूलों के पौधे लाकर लगाए।
समय पर कटाई छंटाई, खाद पानी देने लगा। फलस्वरूप बगीचा कुछ ही दिनों में लहलहाने लगा।

लगभग 6 माह बाद राजा एक दिन समय निकाल कर अपने उद्यान की सैर को निकले। पहले बगीचे में गए तो देखा पूरा बगीचा उजाड़ पड़ा था। झाड़ झंखाड़ उग आए थे। कहीं पौधे सूख रहे थे, कहीं इक्का दुक्का फूल खिले थे।
दूर नजर पड़ी तो देखा एक वृक्ष के नीचे राजा का चित्र रखा हुआ था और माली उस चित्र के आगे धूप अगरबत्ती दिखाने में लगा हुआ था।

यह देखते ही राजा को क्रोध आ गया। उन्होंने सैनिकों को माली को धक्के देकर बगीचे से बाहर निकालने का आदेश दिया। क्योंकि उसने अपना कर्तव्य नहीं निभाया था, दिए गए बगीचे को ठीक से देखभाल करने, संवारने की जिम्मेदारी को निभाने की बजाय केवल राजा के चित्र की पूजा करने में लगा था।

इसी क्रोधावेश में राजा को ध्यान आया कि एक दूसरे माली को भी उसी दिन नियुक्त किया था, कहीं उसने भी बगीचे को बर्बाद तो नहीं कर दिया ?

राजा क्रोध में भरे हुए उस दूसरे बगीचे की ओर चल दिये। जब उस बगीचे में पहुँचे तो देखते हैं कि बगीचा साफ सुथरा था, चारों ओर गुलाब, चंपा, चमेली, गुलदाउदी आदि के पुष्प खिले हुए थे, कोयल कूक रही थी भौंरे गुँजार कर रहे थे। चारों ओर हवा में भीनी भीनी सुगंध फैली हुई थी।

राजा का क्रोध ठंडा हो गया, मन अत्यंत प्रसन्न हो गया। इधर उधर देखा तो माली बगीचे के एक हिस्से में निराई गुड़ाई में व्यस्त था।
राजा ने माली को बुलाया और अपने गले से मोतियों का हार उतार कर, माली को पहना दिया।


इस संसार मे मनुष्य का जन्म लेना उस माली की तरह है जिसे परमात्मा ने उसकी बनाई हुई सृष्टि को बनाने संवारने की जिम्मेदारी दी है।
पर यह कर्तव्य निभाने की बजाय अधिकांश भक्त, देवी देवताओं के चित्र सजा कर केवल धूप अगरबत्ती दिखाने में, कीर्तन करने में लगे हैं।


दुनियाँ में लोग गरीबी,अशिक्षा, बीमारी, भ्रष्टाचार, आतंक से तबाह हो रहे हैं, सनातन धर्म के मूल स्वरूप को भुला कर आम जन शिरडी के साईं, रामपाल, रामरहीम, आसाराम, निर्मल बाबा जैसों के चक्कर मे लुट और बर्बाद होने में लगे हैं।


हिंदुओं का युद्ध स्तर पर प्रतिवर्ष हजारों लाखों की संख्या में धर्मांतरण हो रहा है। पर भक्त गण धूप अगरबत्ती दिखाने में लगे हैं, कीर्तन करने, केवल जप ध्यान करने में लगे हैं। देश धर्म संस्कृति जाए भाड़ में हमे क्या ?


ऐसे तथाकथित भक्त ही ईश्वर के कोप के भाजन बनते हैं । इन्हीं के लिए कहा गया है —
जनम जनम मुनि जतन कराहीं अंत राम कहीं पावत नाहिं।

जबकि वे भक्त, ईश्वर निष्ठ व्यक्ति जो अपने जीवन को ईश्वरीय कार्य मे, देश,धर्म,संस्कृति के उत्थान में लगाते हैं वे धन्य हो जाते हैं। ईश्वर की कृपा, आशीर्वाद से उनका जन्म लेना सार्थक हो जाता है, वे इतिहास में अमर हो जाते हैं।

शबरी,गीध, गिलहरी, हनुमान जी ने ईश्वर के निमित्त स्वयं को न्यौछावर कर दिया था।

आज के युग मे, कुछ सदी पहले

बंदा वैरागी–
उज्जैन महाकालेश्वर में नर्मदा नदी के किनारे गुफा में तप साधना में लीन थे। गुरुगोविंद सिंह उन्हें ढूंढते हुए पहुंचे थे। यह समय माला जपने का नहीं बल्कि भाला उठाने का है क्योंकि देश,धर्म,संस्कृति का अस्तित्व खतरे में है। यह कह कर उन्हें तप साधना से उठाकर, सिख सेना का सेनापति बनाया था।

विवेकानंद —
हिमालय में जाकर समाधि लगाना चाहते थे पर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें देश धर्म संस्कृति के उत्थान के लिए कार्य करने की प्रेरणा दी।

आचार्य श्रीराम शर्मा—
किशोर उम्र में ही हिमालय में तप करने जाना चाहते थे पर उनके कई जन्मों के गुरु 6-700 वर्ष की आयुवाले स्वामी सर्वेश्वरानंद जी ने उन्हें गायत्री की तप साधना के साथ साथ, आर्ष ग्रंथों (वेद,पुराण,उपनिषदों आदि) के उद्धार, भाष्य करने और श्री सत्य सनातन धर्म, संस्कृति के उत्थान म् नियोजित कर दिया।

नरेंद्र मोदी–
युवावस्था में दो वर्ष हिमालय में सन्यासी बन भटकते रहे। पर उनके गुरु ने उन्हें देश धर्म संस्कृति के उत्थान के लिए कार्य करने का निर्देश दिया।

आप और हम को यह तय करना होता है कि हम अपने व्यक्तिगत,पारिवारिक जीवन के साथ साथ , श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के उत्थान में भी अपने तन,मन, धन से सहयोग कर व्यक्ति,परिवार,समाज, व राष्ट्र का उत्थान करेंगे ?


या फिर एकांगी पूजा, जप,ध्यान में लगे हुए देश ,धर्म,संस्कृति का विनाश होते हुए देखते रहेंगे ?
ईश्वर का कोप या कृपा ?
परिणाम वैसा ही तो मिलेगा ।
विशेष;–
कहानियाँ किसी सिद्धांत को समझाने के लिए लिखी या बनाई जाती हैं। इसमें पूजा के सिद्धांत को समझाने का प्रयास किया गया है, कहानी को दुबारा ध्यान से पढ़ें।


सिद्धांत को समझे बिना केवल चित्र या मूर्ति की पूजा करने वाले हिन्दू, पाकिस्तान, बांग्लादेश, कश्मीर, केरल, बंगाल आदि में बर्बाद हो गए, बर्बाद हो रहे हैं।


जो नहीं समझेंगे वे निकट भविष्य में बर्बाद हो जाएंगे इसमें कोई संदेह नहीं।

जय माँ आदिशक्ति गायत्री, जय सनातन धर्म।
ओंकारनाथशर्मा ‘ श्रद्धानंद
संस्थापक, संचालक,
श्री सत्य सनातन धर्म परिवार
सिद्धपीठ, गायत्री शक्तिपीठ शांतिधाम, छपरा, बिहार।

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यह कथा बहुत पुरानी है।

एक बार शीतला माता ने सोचा कि चलो आज देखु कि धरती पर मेरी पूजा कौन करता है, कौन मुझे मानता है। यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में आई और देखा कि इस गाँव में मेरा मंदिर भी नही है, ना मेरी पुजा है।

माता शीतला गाँव कि गलियो में घूम रही थी, तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) निचे फेका। वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में (छाले) फफोले पड गये। शीतला माता के पुरे शरीर में जलन होने लगी।

शीतला माता गाँव में इधर उधर भाग भाग के चिल्लाने लगी अरे में जल गई, मेरा शरीर तप रहा है, जल रहा हे। कोई मेरी मदद करो। लेकिन उस गाँव में किसी ने शीतला माता कि मदद नही करी। वही अपने घर के बहार एक कुम्हारन (महिला) बेठी थी। उस कुम्हारन ने देखा कि अरे यह बूढी माई तो बहुत जल गई है। इसके पुरे शरीर में तपन है। इसके पुरे शरीर में (छाले) फफोले पड़ गये है। यह तपन सहन नही कर पा रही है।

तब उस कुम्हारन ने कहा है माँ तू यहाँ आकार बैठ जा, मैं तेरे शरीर के ऊपर ठंडा पानी डालती हूँ। कुम्हारन ने उस बूढी माई पर खुब ठंडा पानी डाला और बोली है माँ मेरे घर में रात कि बनी हुई राबड़ी रखी है थोड़ा दही भी है। तू दही-राबड़ी खा लें। जब बूढी माई ने ठंडी (जुवार) के आटे कि राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली।

तब उस कुम्हारन ने कहा आ माँ बेठ जा तेरे सिर के बाल बिखरे हे ला में तेरी चोटी गुथ देती हु और कुम्हारन माई कि चोटी गूथने हेतु (कंगी) कागसी बालो में करती रही। अचानक कुम्हारन कि नजर उस बुडी माई के सिर के पिछे पड़ी तो कुम्हारन ने देखा कि एक आँख वालो के अंदर छुपी हैं। यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे घबराकर भागने लगी तभी उसबूढी माई ने कहा रुक जा बेटी तु डर मत। मैं कोई भुत प्रेत नही हूँ। मैं शीतला देवी हूँ। मैं तो इस घरती पर देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है। कौन मेरी पुजा करता है। इतना कह माता चारभुजा वाली हीरे जवाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्णमुकुट धारण किये अपने असली रुप में प्रगट हो गई।

माता के दर्शन कर कुम्हारन सोचने लगी कि अब में गरीब इस माता को कहा बिठाऊ। तब माता बोली है बेटी तु किस सोच मे पड गई। तब उस कुम्हारन ने हाथ जोड़कर आँखो में आसु बहते हुए कहा- है माँ मेरे घर में तो चारो तरफ दरिद्रता है बिखरी हुई हे में आपको कहा बिठाऊ। मेरे घर में ना तो चौकी है, ना बैठने का आसन। तब शीतला माता प्रसन्न होकर उस कुम्हारन के घर पर खड़े हुए गधे पर बैठ कर एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर कि दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फेक दिया और उस कुम्हारन से कहा है बेटी में तेरी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हु अब तुझे जो भी चाहिये मुझसे वरदान मांग ले।

कुम्हारन ने हाथ जोड़ कर कहा है माता मेरी इक्छा है अब आप इसी (डुंगरी) गाँव मे स्थापित होकर यही रहो और जिस प्रकार आपने आपने मेरे घर कि दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ़ कर दूर किया ऐसे ही आपको जो भी होली के बाद कि सप्तमी को भक्ति भाव से पुजा कर आपको ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन चढ़ाये उसके घर कि दरिद्रता को साफ़ करना और आपकी पुजा करने वाली नारि जाति (महिला) का अखंड सुहाग रखना। उसकी गोद हमेशा भरी रखना। साथ ही जो पुरुष शीतला सप्तमी को नाई के यहा बाल ना कटवाये धोबी को पकड़े धुलने ना दे और पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़कर, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी दरिद्रता ना आये।

तब माता बोली तथाअस्तु है बेटी जो तुने वरदान मांगे में सब तुझे देती हु । है बेटी तुझे आर्शिवाद देती हूँ कि मेरी पुजा का मुख्य अधिकार इस धरती पर सिर्फ कुम्हार जाति का ही होगा। तभी उसी दिन से डुंगरी गाँव में शीतला माता स्थापित हो गई और उस गाँव का नाम हो गया शील कि डुंगरी। शील कि डुंगरी भारत का एक मात्र मुख्य मंदिर है। शीतला सप्तमी वहाँ बहुत विशाल मेला भरता है। इस कथा को पड़ने से घर कि दरिद्रता का नाश होने के साथ सभी मनोकामना पुरी होती है।

विक्रम खुराना

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जापान में परीक्षा से पहले प्रिंसिपल ने बच्चों के पैरेंट्स को एक लेटर भेजा जिसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है :-

डियर पैरेंट्स
मैं जानता हूं आप इसको लेकर बहुत बेचैन हैं कि आपका बेटा इम्तिहान में अच्छा प्रदर्शन करें

लेकिन ध्यान रखें कि यह बच्चे जो इम्तिहान दे रहे हैं इनमें भविष्य के अच्छे कलाकार भी हैं जिन्हें गणित समझने की बिल्कुल जरूरत नहीं,

इनमें बड़ी बड़ी कंपनियों के प्रतिनिधि भी बैठे हैं, जिन्हें इंग्लिश लिटरेचर और इतिहास समझने की जरूरत नहीं है,

इन बच्चों में भविष्य के बड़े-बड़े संगीतकार भी हैं जिनकी नजर में केमिस्ट्री के कम अंकों का कोई महत्व नहीं,

इन सबका इनके भविष्य पर कोई असर नहीं पड़ने वाला इन बच्चों में भविष्य के एथलीट्स भी हैं जिनकी नजर में उनके मार्क्स से ज्यादा उन की फिटनेस जरूरी है|

लिहाजा अगर आपका बच्चा ज्यादा नंबर लाता है तो बहुत अच्छी बात है लेकिन अगर वह ज्यादा नंबर नहीं ला सका तो तो आप बच्चे से उसका आत्मविश्वास और उसका स्वाभिमान ना छीन ले

अगर वह अच्छे नंबर ना ला सके तो आप उन्हें हौसला दीजिएगा की कोई बात नहीं यह एक छोटा सा इम्तिहान हैl

वह तो जिंदगी में इससे भी कुछ बड़ा करने के लिए बनाए गए हैं l

अगर वह कम मार्क्स लाते हैं तो आप उन्हें बता दें कि आप फिर भी इनसे प्यार करते हैं और आप उन्हें उन के कम अंको की वजह से जज नहीं करेंगे l

ईश्वर के लिए ऐसा ही कीजिएगा और जब आप ऐसा करेंगे फिर देखिएगा कि आपका बच्चा दुनिया भी जीत लेगा l

एक इम्तिहान और कम नंबर आपके बच्चे से इसके सपने और इसका टैलेंट नहीं छीन सकते

और हां प्लीज ऐसा मत सोचिएगा कि इस दुनिया में सिर्फ डॉक्टर और इंजीनियर ही खुश रहते हैं
(यह सब तो क्लब 99 की रेस में लगे घोडे है)

“अपने बच्चों को एक. अच्छा इंसान बनने की शिक्षा दीजिये.

केवल अंक ही बच्चों की योग्यता का मापदंड नही

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एक था भिखारी ! रेल सफ़र में भीख़ माँगने के दौरान एक सूट बूट पहने सेठ जी उसे दिखे। उसने सोचा कि यह व्यक्ति बहुत अमीर लगता है, इससे भीख़ माँगने पर यह मुझे जरूर अच्छे पैसे देगा। वह उस सेठ से भीख़ माँगने लगा।

भिख़ारी को देखकर उस सेठ ने कहा, “तुम हमेशा मांगते ही हो, क्या कभी किसी को कुछ देते भी हो ?”

भिख़ारी बोला, “साहब मैं तो भिख़ारी हूँ, हमेशा लोगों से मांगता ही रहता हूँ, मेरी इतनी औकात कहाँ कि किसी को कुछ दे सकूँ ?”

सेठ:- जब किसी को कुछ दे नहीं सकते तो तुम्हें मांगने का भी कोई हक़ नहीं है। मैं एक व्यापारी हूँ और लेन-देन में ही विश्वास करता हूँ, अगर तुम्हारे पास मुझे कुछ देने को हो तभी मैं तुम्हे बदले में कुछ दे सकता हूँ।

तभी वह स्टेशन आ गया जहाँ पर उस सेठ को उतरना था, वह ट्रेन से उतरा और चला गया।

इधर भिख़ारी सेठ की कही गई बात के बारे में सोचने लगा। सेठ के द्वारा कही गयीं बात उस भिख़ारी के दिल में उतर गई। वह सोचने लगा कि शायद मुझे भीख में अधिक पैसा इसीलिए नहीं मिलता क्योकि मैं उसके बदले में किसी को कुछ दे नहीं पाता हूँ। लेकिन मैं तो भिखारी हूँ, किसी को कुछ देने लायक भी नहीं हूँ।लेकिन कब तक मैं लोगों को बिना कुछ दिए केवल मांगता ही रहूँगा।

बहुत सोचने के बाद भिख़ारी ने निर्णय किया कि जो भी व्यक्ति उसे भीख देगा तो उसके बदले मे वह भी उस व्यक्ति को कुछ जरूर देगा।
लेकिन अब उसके दिमाग में यह प्रश्न चल रहा था कि वह खुद भिख़ारी है तो भीख के बदले में वह दूसरों को क्या दे सकता है ?

इस बात को सोचते हुए दिनभर गुजरा लेकिन उसे अपने प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिला।

दुसरे दिन जब वह स्टेशन के पास बैठा हुआ था तभी उसकी नजर कुछ फूलों पर पड़ी जो स्टेशन के आस-पास के पौधों पर खिल रहे थे, उसने सोचा, क्यों न मैं लोगों को भीख़ के बदले कुछ फूल दे दिया करूँ। उसको अपना यह विचार अच्छा लगा और उसने वहां से कुछ फूल तोड़ लिए।

वह ट्रेन में भीख मांगने पहुंचा। जब भी कोई उसे भीख देता तो उसके बदले में वह भीख देने वाले को कुछ फूल दे देता। उन फूलों को लोग खुश होकर अपने पास रख लेते थे। अब भिख़ारी रोज फूल तोड़ता और भीख के बदले में उन फूलों को लोगों में बांट देता था।

कुछ ही दिनों में उसने महसूस किया कि अब उसे बहुत अधिक लोग भीख देने लगे हैं। वह स्टेशन के पास के सभी फूलों को तोड़ लाता था। जब तक उसके पास फूल रहते थे तब तक उसे बहुत से लोग भीख देते थे। लेकिन जब फूल बांटते बांटते ख़त्म हो जाते तो उसे भीख भी नहीं मिलती थी,अब रोज ऐसा ही चलता रहा ।

एक दिन जब वह भीख मांग रहा था तो उसने देखा कि वही सेठ ट्रेन में बैठे है जिसकी वजह से उसे भीख के बदले फूल देने की प्रेरणा मिली थी।

वह तुरंत उस व्यक्ति के पास पहुंच गया और भीख मांगते हुए बोला, आज मेरे पास आपको देने के लिए कुछ फूल हैं, आप मुझे भीख दीजिये बदले में मैं आपको कुछ फूल दूंगा।

शेठ ने उसे भीख के रूप में कुछ पैसे दे दिए और भिख़ारी ने कुछ फूल उसे दे दिए। उस सेठ को यह बात बहुत पसंद आयी।

सेठ:- वाह क्या बात है..? आज तुम भी मेरी तरह एक व्यापारी बन गए हो, इतना कहकर फूल लेकर वह सेठ स्टेशन पर उतर गया।

लेकिन उस सेठ द्वारा कही गई बात एक बार फिर से उस भिख़ारी के दिल में उतर गई। वह बार-बार उस सेठ के द्वारा कही गई बात के बारे में सोचने लगा और बहुत खुश होने लगा। उसकी आँखे अब चमकने लगीं, उसे लगने लगा कि अब उसके हाथ सफलता की वह 🔑चाबी लग गई है जिसके द्वारा वह अपने जीवन को बदल सकता है।

वह तुरंत ट्रेन से नीचे उतरा और उत्साहित होकर बहुत तेज आवाज में ऊपर आसमान की ओर देखकर बोला, “मैं भिखारी नहीं हूँ, मैं तो एक व्यापारी हूँ..

मैं भी उस सेठ जैसा बन सकता हूँ.. मैं भी अमीर बन सकता हूँ !

लोगों ने उसे देखा तो सोचा कि शायद यह भिख़ारी पागल हो गया है, अगले दिन से वह भिख़ारी उस स्टेशन पर फिर कभी नहीं दिखा।

एक वर्ष बाद इसी स्टेशन पर दो व्यक्ति सूट बूट पहने हुए यात्रा कर रहे थे। दोनों ने एक दूसरे को देखा तो उनमे से एक ने दूसरे को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा, “क्या आपने मुझे पहचाना ?”

सेठ:- “नहीं तो ! शायद हम लोग पहली बार मिल रहे हैं।

भिखारी:- सेठ जी.. आप याद कीजिए, हम पहली बार नहीं बल्कि तीसरी बार मिल रहे हैं।

सेठ:- मुझे याद नहीं आ रहा, वैसे हम पहले दो बार कब मिले थे ?

अब पहला व्यक्ति मुस्कुराया और बोला:

हम पहले भी दो बार इसी ट्रेन में मिले थे, मैं वही भिख़ारी हूँ जिसको आपने पहली मुलाकात में बताया कि मुझे जीवन में क्या करना चाहिए और दूसरी मुलाकात में बताया कि मैं वास्तव में कौन हूँ।

नतीजा यह निकला कि आज मैं फूलों का एक बहुत बड़ा व्यापारी हूँ और इसी व्यापार के काम से दूसरे शहर जा रहा हूँ।

आपने मुझे पहली मुलाकात में प्रकृति का नियम बताया था… जिसके अनुसार हमें तभी कुछ मिलता है, जब हम कुछ देते हैं। लेन देन का यह नियम वास्तव में काम करता है, मैंने यह बहुत अच्छी तरह महसूस किया है, लेकिन मैं खुद को हमेशा भिख़ारी ही समझता रहा, इससे ऊपर उठकर मैंने कभी सोचा ही नहीं था और जब आपसे मेरी दूसरी मुलाकात हुई तब आपने मुझे बताया कि मैं एक व्यापारी बन चुका हूँ। अब मैं समझ चुका था कि मैं वास्तव में एक भिखारी नहीं बल्कि व्यापारी बन चुका हूँ।

भारतीय मनीषियों ने संभवतः इसीलिए स्वयं को जानने पर सबसे अधिक जोर दिया और फिर कहा –

सोऽहं
शिवोहम !!

समझ की ही तो बात है…
भिखारी ने स्वयं को जब तक भिखारी समझा, वह भिखारी रहा | उसने स्वयं को व्यापारी मान लिया, व्यापारी बन गया |
जिस दिन हम समझ लेंगे कि मैं कौन हूँ…

फिर जानने समझने को रह ही क्या जाएगा

🙏🙏

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

એક દિવસ માતા પુત્રી ફોન પર વાત કરી રહ્યા હતા. માં કહે “દીકરી તું આવે છે ત્યારે ઘર ની રોનક વધી જાય છે, તારા પપ્પા પણ બહુ જ આનંદમાં હોય છે, દીકરી કહે: “હા મા, બસ થોડો સમય..પછી તો ભાઈનો અભ્યાસ પૂરો થઈ જશે, પછી એના લગ્ન કરી એક દીકરી લાવજો જે ત્યાંજ રહેશે એટલે ઘર ફરી રોનક વાળું જ રહેશે.” માતા હરખાતા બોલી, હા, બેટા, પછી તો તને કુંવરી ની જેમ રાખીશ, અત્યારે તું આવે ત્યારે હું જરા વ્યસ્ત રહુ છુ, દીકરી સાસરે હતી એટલે માતા ને અટકાવતા બોલી, “માં, ભાભી આપણા ઘરમા આવશે પછી તને મારી ખોટ નહીં સાલે, મા કહે, તે જે હોય તે પણ મને એટલી ખબર પડે કે દીકરી એ દીકરી હોય, જેટલું એને માવતર નું પેટમાં બળે એટલું દીકરા ને પણ ના બળે.. મા ને અટકાવતા દીકરી બોલી, બસ આજ વાંધો છે આપણા સમાજનો, દીકરી નો મોહ જ નથી મુકતા, તમે પુત્રવધૂ ને પુત્રવધૂ તરીકે રાખો તો એ પુત્રથી પણ વઘુ ધ્યાન રાખે, પણ એ પારકી છે એ ગણીને એના વાંક કાઢ્યા કરો તો એ પણ સાસુ છે એમ જ મનમાં ગાંઠ વાળશે.. પણ બેટા..માં ને આગળ બોલતા અટકાવી પુત્રી બોલી, જુઓ માં, અમને તમારી ફિકર હોય જ એમાં શંકા ને સ્થાન નથી, અમે ક્યારેક આવીને તમારું થોડું ધ્યાન રાખીએ તો એમાં કોઈ મોટી વાત નથી, પણ એ ત્યાં રહી આખો દિવસ કામ કરે અને તમે અમારા ગુણ ગાઓ એતો વ્યાજબી ના કહેવાય ને? દિકરી જમાઈ એની જગ્યાએ ભલે મીઠા ખરા પણ ક્યારેક જ શોભે, જ્યારે વહુ તો લુણ હોય છે જેના વિના જેમ પકવાન ફિક્કા લાગે તેમ વહુ વિના ઘર સુનું લાગે, એજ સાચી રોનક છે, આજ થી જ મન માં ગાંઠ વાળી લો તો સ્વર્ગ મેળવવા માટે દેહ નહીં છોડવો પડે, ચાલ માં હવે મારે થોડું કામ છે, તમારું ધ્યાન રાખજો.. કહી દીકરીએ ફોન રાખી દીધો.!!

માતા મનમાં જ ગર્વ કરતી રહી કે મારી દીકરી કેટલી મોટી થઈ ગઈ અને પરણ્યા પછી કેવી મૂલ્યવાન વાતો સમજાવે છે, મિત્રો.. નસીબદાર હોય છે એ ઘર જ્યાં માતાને દીકરી આવી સમજણ આપે છે, પરણ્યા પછી દિકરી ને આ બધું માત્ર એના જીવન નો અનુભવ શીખવે છે..
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एक था भिखारी ! रेल सफ़र में भीख़ माँगने के दौरान एक सूट बूट पहने सेठ जी उसे दिखे। उसने सोचा कि यह व्यक्ति बहुत अमीर लगता है, इससे भीख़ माँगने पर यह मुझे जरूर अच्छे पैसे देगा। वह उस सेठ से भीख़ माँगने लगा।

भिख़ारी को देखकर उस सेठ ने कहा, “तुम हमेशा मांगते ही हो, क्या कभी किसी को कुछ देते भी हो ?”

भिख़ारी बोला, “साहब मैं तो भिख़ारी हूँ, हमेशा लोगों से मांगता ही रहता हूँ, मेरी इतनी औकात कहाँ कि किसी को कुछ दे सकूँ ?”

सेठ:- जब किसी को कुछ दे नहीं सकते तो तुम्हें मांगने का भी कोई हक़ नहीं है। मैं एक व्यापारी हूँ और लेन-देन में ही विश्वास करता हूँ, अगर तुम्हारे पास मुझे कुछ देने को हो तभी मैं तुम्हे बदले में कुछ दे सकता हूँ।

तभी वह स्टेशन आ गया जहाँ पर उस सेठ को उतरना था, वह ट्रेन से उतरा और चला गया।

इधर भिख़ारी सेठ की कही गई बात के बारे में सोचने लगा। सेठ के द्वारा कही गयीं बात उस भिख़ारी के दिल में उतर गई। वह सोचने लगा कि शायद मुझे भीख में अधिक पैसा इसीलिए नहीं मिलता क्योकि मैं उसके बदले में किसी को कुछ दे नहीं पाता हूँ। लेकिन मैं तो भिखारी हूँ, किसी को कुछ देने लायक भी नहीं हूँ।लेकिन कब तक मैं लोगों को बिना कुछ दिए केवल मांगता ही रहूँगा।

बहुत सोचने के बाद भिख़ारी ने निर्णय किया कि जो भी व्यक्ति उसे भीख देगा तो उसके बदले मे वह भी उस व्यक्ति को कुछ जरूर देगा।
लेकिन अब उसके दिमाग में यह प्रश्न चल रहा था कि वह खुद भिख़ारी है तो भीख के बदले में वह दूसरों को क्या दे सकता है ?

इस बात को सोचते हुए दिनभर गुजरा लेकिन उसे अपने प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिला।

दुसरे दिन जब वह स्टेशन के पास बैठा हुआ था तभी उसकी नजर कुछ फूलों पर पड़ी जो स्टेशन के आस-पास के पौधों पर खिल रहे थे, उसने सोचा, क्यों न मैं लोगों को भीख़ के बदले कुछ फूल दे दिया करूँ। उसको अपना यह विचार अच्छा लगा और उसने वहां से कुछ फूल तोड़ लिए।

वह ट्रेन में भीख मांगने पहुंचा। जब भी कोई उसे भीख देता तो उसके बदले में वह भीख देने वाले को कुछ फूल दे देता। उन फूलों को लोग खुश होकर अपने पास रख लेते थे। अब भिख़ारी रोज फूल तोड़ता और भीख के बदले में उन फूलों को लोगों में बांट देता था।

कुछ ही दिनों में उसने महसूस किया कि अब उसे बहुत अधिक लोग भीख देने लगे हैं। वह स्टेशन के पास के सभी फूलों को तोड़ लाता था। जब तक उसके पास फूल रहते थे तब तक उसे बहुत से लोग भीख देते थे। लेकिन जब फूल बांटते बांटते ख़त्म हो जाते तो उसे भीख भी नहीं मिलती थी,अब रोज ऐसा ही चलता रहा ।

एक दिन जब वह भीख मांग रहा था तो उसने देखा कि वही सेठ ट्रेन में बैठे है जिसकी वजह से उसे भीख के बदले फूल देने की प्रेरणा मिली थी।

वह तुरंत उस व्यक्ति के पास पहुंच गया और भीख मांगते हुए बोला, आज मेरे पास आपको देने के लिए कुछ फूल हैं, आप मुझे भीख दीजिये बदले में मैं आपको कुछ फूल दूंगा।

शेठ ने उसे भीख के रूप में कुछ पैसे दे दिए और भिख़ारी ने कुछ फूल उसे दे दिए। उस सेठ को यह बात बहुत पसंद आयी।

सेठ:- वाह क्या बात है..? आज तुम भी मेरी तरह एक व्यापारी बन गए हो, इतना कहकर फूल लेकर वह सेठ स्टेशन पर उतर गया।

लेकिन उस सेठ द्वारा कही गई बात एक बार फिर से उस भिख़ारी के दिल में उतर गई। वह बार-बार उस सेठ के द्वारा कही गई बात के बारे में सोचने लगा और बहुत खुश होने लगा। उसकी आँखे अब चमकने लगीं, उसे लगने लगा कि अब उसके हाथ सफलता की वह 🔑चाबी लग गई है जिसके द्वारा वह अपने जीवन को बदल सकता है।

वह तुरंत ट्रेन से नीचे उतरा और उत्साहित होकर बहुत तेज आवाज में ऊपर आसमान की ओर देखकर बोला, “मैं भिखारी नहीं हूँ, मैं तो एक व्यापारी हूँ..

मैं भी उस सेठ जैसा बन सकता हूँ.. मैं भी अमीर बन सकता हूँ !

लोगों ने उसे देखा तो सोचा कि शायद यह भिख़ारी पागल हो गया है, अगले दिन से वह भिख़ारी उस स्टेशन पर फिर कभी नहीं दिखा।

एक वर्ष बाद इसी स्टेशन पर दो व्यक्ति सूट बूट पहने हुए यात्रा कर रहे थे। दोनों ने एक दूसरे को देखा तो उनमे से एक ने दूसरे को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा, “क्या आपने मुझे पहचाना ?”

सेठ:- “नहीं तो ! शायद हम लोग पहली बार मिल रहे हैं।

भिखारी:- सेठ जी.. आप याद कीजिए, हम पहली बार नहीं बल्कि तीसरी बार मिल रहे हैं।

सेठ:- मुझे याद नहीं आ रहा, वैसे हम पहले दो बार कब मिले थे ?

अब पहला व्यक्ति मुस्कुराया और बोला:

हम पहले भी दो बार इसी ट्रेन में मिले थे, मैं वही भिख़ारी हूँ जिसको आपने पहली मुलाकात में बताया कि मुझे जीवन में क्या करना चाहिए और दूसरी मुलाकात में बताया कि मैं वास्तव में कौन हूँ।

नतीजा यह निकला कि आज मैं फूलों का एक बहुत बड़ा व्यापारी हूँ और इसी व्यापार के काम से दूसरे शहर जा रहा हूँ।

आपने मुझे पहली मुलाकात में प्रकृति का नियम बताया था… जिसके अनुसार हमें तभी कुछ मिलता है, जब हम कुछ देते हैं। लेन देन का यह नियम वास्तव में काम करता है, मैंने यह बहुत अच्छी तरह महसूस किया है, लेकिन मैं खुद को हमेशा भिख़ारी ही समझता रहा, इससे ऊपर उठकर मैंने कभी सोचा ही नहीं था और जब आपसे मेरी दूसरी मुलाकात हुई तब आपने मुझे बताया कि मैं एक व्यापारी बन चुका हूँ। अब मैं समझ चुका था कि मैं वास्तव में एक भिखारी नहीं बल्कि व्यापारी बन चुका हूँ।

भारतीय मनीषियों ने संभवतः इसीलिए स्वयं को जानने पर सबसे अधिक जोर दिया और फिर कहा –

सोऽहं
शिवोहम !!

समझ की ही तो बात है…
भिखारी ने स्वयं को जब तक भिखारी समझा, वह भिखारी रहा | उसने स्वयं को व्यापारी मान लिया, व्यापारी बन गया |
जिस दिन हम समझ लेंगे कि मैं कौन हूँ…

फिर जानने समझने को रह ही क्या जाएगा

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[24/02, 3:41 a.m.] ‪+91 98886 74107‬: मल्लिकार्जुन

यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्री शैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है।
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[24/02, 3:43 a.m.] ‪+91 98886 74107‬: सोमनाथ

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। शिवपुराण के अनुसार जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने क्षय रोग होने का श्राप दिया था, तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर इस श्राप से मुक्ति पाई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चंद्रदेव ने की थी।
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[24/02, 3:45 a.m.] ‪+91 98886 74107‬: नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी 17 मील की है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शनों के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
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[24/02, 3:45 a.m.] ‪+91 98886 74107‬: धृष्णेश्वर मन्दिर

घृष्णेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के संभाजीनगर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे धृष्णेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं। यहीं पर श्री एकनाथजी गुरु व श्री जनार्दन महाराज की समाधि भी है।
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[24/02, 3:45 a.m.] ‪+91 98886 74107‬: केदारनाथ

केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भी भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में स्थित है। बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है।
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[24/02, 3:45 a.m.] ‪+91 98886 74107‬: महाकालेश्वर

यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है।
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[24/02, 3:45 a.m.] ‪+91 98886 74107‬: भीमाशंकर

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रृद्धा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।
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[24/02, 3:46 a.m.] ‪+91 98886 74107‬: काशी विश्वनाथ

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है, कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा। इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे।
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[24/02, 3:46 a.m.] ‪+91 98886 74107‬: ओंकारेश्वर

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के साथ ही किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है।
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[24/02, 3:46 a.m.] ‪+91 98886 74107‬: त्र्यंबकेश्वर

यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मा गिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरू होती है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा।
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[24/02, 3:46 a.m.] ‪+91 98886 74107‬: वैद्यनाथ

श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथ धाम कहा जाता है। यह स्थान झारखण्ड प्रान्त, पूर्व में बिहार प्रान्त के संथाल परगना के दुमका नामक जनपद में पड़ता है।
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[24/02, 3:46 a.m.] ‪+91 98886 74107‬: रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग

यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथ पुरं नामक स्थान में स्थित है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है, कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है।
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