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भगवान का नाम


भगवान का नाम

 

एक पंडित जी थे। उन्होंने एक नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया हुआ था।

पंडित जी बहुत विद्वान थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे।.

नदी के दूसरे किनारे पर लक्ष्मी नाम की एक ग्वालिन अपने बूढ़े पिताश्री के साथ रहती थी।.

लक्ष्मी सारा दिन अपनी गायों को देखभाल करती थी।

सुबह जल्दी उठकर अपनी गायों को नहला कर दूध दोहती,.

फिर अपने पिताजी के लिए खाना बनाती,

तत्पश्चात् तैयार होकर दूध बेचने के लिए निकल जाया करती थी।.

पंडित जी के आश्रम में भी दूध लक्ष्मी के यहाँ से ही आता था।.

एक बार पंडित जी को किसी काम से शहर जाना था।

उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि उन्हें शहर जाना है, इसलिए अगले दिन दूध उन्हें जल्दी चाहिए।.

लक्ष्मी अगले दिन जल्दी आने का वादा करके चली गयी।.

अगले दिन लक्ष्मी ने सुबह जल्दी उठकर अपना सारा काम समाप्त किया और जल्दी से दूध उठाकर आश्रम की तरफ निकल पड़ी।.

नदी किनारे उसने आकर देखा कि कोई मल्लाह अभी तक आया नहीं था।

लक्ष्मी बगैर नाव के नदी कैसे पार करती ?.

फिर क्या था,

लक्ष्मी को आश्रम तक पहुँचने में देर हो गयी।.

आश्रम में पंडित जी जाने को तैयार खड़े थे।

उन्हें सिर्फ लक्ष्मी का इन्तजार था।.

लक्ष्मी को देखते ही उन्होंने लक्ष्मी को डाँटा और देरी से आने का कारण पूछा।.

लक्ष्मी ने भी बड़ी मासूमियत से पंडित जी से कह दिया कि नदी पर कोई मल्लाह नहीं था,

वह नदी कैसे पार करती ?

इसलिए देर हो गयी।.

पंडित जी गुस्से में तो थे ही, उन्हें लगा कि लक्ष्मी बहाने बना रही है।

उन्होंने भी गुस्से में लक्ष्मी से कहा,.

क्यों बहाने बनाती है।

लोग तो जीवन सागर को भगवान का नाम लेकर पार कर जाते हैं,

तुम एक छोटी सी नदी पार नहीं कर सकती ?.

पंडित जी की बातों का लक्ष्मी पर बहुत गहरा असर हुआ।

दूसरे दिन भी जब लक्ष्मी दूध लेकर आश्रम जाने निकली तो नदी के किनारे मल्लाह नहीं था।.

लक्ष्मी ने मल्लाह का इंतजार नहीं किया।

उसने भगवान को याद किया और पानी की सतह पर चलकर आसानी से नदी पार कर ली।.

इतनी जल्दी लक्ष्मी को आश्रम में देख कर पंडित जी हैरान रह गये,

उन्हें पता था कि कोई मल्लाह इतनी जल्दी नहीं आता है।.

उन्होंने लक्ष्मी से पूछा कि तुमने आज नदी कैसे पार की ?.

लक्ष्मी ने बड़ी सरलता से कहा—

‘‘पंडित जी आपके बताये हुए तरीके से।

मैंने भगवान् का नाम लिया और पानी पर चलकर नदी पार कर ली।’’.

पंडित जी को लक्ष्मी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ।

उसने लक्ष्मी से फिर पानी पर चलने के लिए कहा।.

लक्ष्मी नदी के किनारे गयी और उसने भगवान का नाम जपते-जपते बड़ी आसानी से नदी पार कर ली।.

पंडित जी हैरान रह गये।

उन्होंने भी लक्ष्मी की तरह नदी पार करनी चाही।.

पर नदी में उतरते वक्त उनका ध्यान अपनी धोती को गीली होने से बचाने में लगा था।.

वह पानी पर नहीं चल पाये और धड़ाम से पानी में गिर गये।.

पंडित जी को गिरते देख लक्ष्मी ने हँसते हुए कहा,

‘‘आपने तो भगवान का नाम लिया ही नहीं,

आपका सारा ध्यान अपनी नयी धोती को बचाने में लगा हुआ था।’’.

पंडित जी को अपनी गलती का अहसास हो गया।

उन्हें अपने ज्ञान पर बड़ा अभिमान था।.

पर अब उन्होंने जान लिया था कि भगवान को पाने के लिए किसी भी ज्ञान की जरूरत नहीं होती।

उसे तो पाने के लिए सिर्फ सच्चे मन से याद करने की जरूरत है।.

कहानी में हमें यह बताया गया है कि अगर सच्चे मन से भगवान को याद किया जाये,
तो भगवान तुरन्त अपने भक्तों की मदद करते है।
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🌹जय श्री राम🌹 🌹जय हनुमान🌹
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Sandhya Sharma

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नरसिंह अवतार और भक्त प्रहलाद की कथा


नरसिंह अवतार और भक्त प्रहलाद की कथा!!!!!

सतयुग में ऋषि कश्यप के दो पुत्र थे हिरण्याक्ष और हिरणाकश्यप। हिरण्याक्ष भगवान ब्रह्म से मिले वरदान की वजह से बहुत अहंकारी हो गया था। अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए वो भूदेवी को साथ लेकर पाताल में भगवान विष्णु की खोज में चला गया। भगवान विष्णु ने वराह अवतार में उसके साथ युद्ध किया और उसका विनाश कर दिया। लेकिन संसार के लिए खतरा अभी टला नही था क्योंकि उसका भाई हिरणाकश्यप अपने भाई के मौत की बदला लेने को आतुर था। उसने देवताओ से बदला लेने के लिए अपनी असुरो की सेना से देवताओ पर आक्रमण कर दिया। हिरणाकश्यप देवताओ से लड़ता लेकिन हर बार भगवान विष्णु उनकी मदद कर देते।

हिरणाकश्यप ने सोचा “अगर मुझे विष्णु को हराना है तो मुझे अपनी रक्षा के लिए एक वरदान की आवश्यकता है। क्योंकि मै जब भी देवताओ और मनुष्यों पर आक्रमण करता हु , विष्णु मेरी सारी योजना तबाह कर देता है ……उससे लड़ने के लिए मुझे शक्तिशाली बनना पड़ेगा ।

अपने दिमाग में ऐसे विचार लेकर वो वन की तरफ निकल पड़ता है और भगवान ब्रह्मा की तपस्या में लीन हो जाता हो। वो काफी लम्बे समय तक तपस्या में इसलिए रहना चाहता था ताकि वो भगवान ब्रह्मा से अमर होने का वरदान मांग सके। इस दौरान वो अपने ओर अपने साम्राज्य के बारे में भूलकर कठोर तपस्या में लग जाता है।

इस दौरान इंद्रदेव को ये ज्ञात होता है कि हिरणाकश्यप असुरो का नेतृत्व नही कर रहा है। इंद्रदेव सोचते है कि ” यदि इस समय असुरो को समाप्त कर दिया जाए तो फिर कभी वो आक्रमण नही कर पाएंगे। हिरणाकश्यप के बिना असुरो की शक्ति आधी है अगर इस समय इनको खत्म कर दिया जाए तो हिरणाकश्यप के लौटने पर उसका आदेश मानने वाला कोई शेष नही रहेगा।

ये सोचते हुए इंद्र अपने दुसरे देवो के साथ असुरो के साम्राज्य पर आक्रमण कर देते है।इंद्रदेव के अपेक्षा के अनुसार हिरणाकश्यप के बिना असुर मुकाबले में कमजोर पड़ गये और युद्ध में हार गये। इंद्रदेव ने असुरो के कई समूहों को समाप्त कर दिया।

हिरणाकश्यप की राजधानी को तबाह कर इन्द्रदेव ने हिरणाकश्यप के महल में प्रवेश किया। जहा पर उनको हिरणाकश्यप की पत्नी कयाधू नजर आयी। इंददेव ने हिरणाकश्यप की पत्नी को बंदी बना लिया ताकि भविष्य में हिरणाकश्यप के लौटने पर उसके बंधक बनाने के उपयोग कर पाए। इंद्रदेव जैसे ही कयाधू को इंद्र लोक लेकर जाने लगे महर्षि नारद प्रकट हुए और उसी समय इंद्र को कहा “इंद्रदेव रुक जाओ आप ये क्या कर रहे हो ” ।

महर्षि नारद इंद्रदेव के कयाधू को अपने रथ में ले जाते देख क्रोधित हो गये। इंददेव में नतमस्तक होकर महर्षि नारद से कहा “महर्षि हिरणाकश्यप के नेतृत्व के बिना असुरो पर आक्रमण किया है और मेरा मानना है कि असुरो के आतंक को समाप्त करने का यही समय है।

वहा के विनाश को देखकर महर्षि नारद ने क्रोधित स्वर में कहा “हा ये सत्य है मै देख सकता हूं, लेकिन ये औरत इसमें कहा से आयी , क्या इसने तुमसे युद्ध किया , मुझे ऐसा नही लग रहा है कि इसने तुम्हारे विरुद्ध कोई शस्र उठाया है फिर तुम उसको क्यों चोट पंहुचा रहे हो ? “

इंद्रदेव ने महर्षि नारद की तरफ देखते हुए जवाब दिया कि वो उसके शत्रु हिरणाकश्यप की पत्नी है जिसे वो बंदी बना करले जा रहा है ताकि हिरणाकश्यप कभी आक्रमण करे तो वो उसका उपयोग कर सके। महर्षि नारद ने गुस्से में इन्द्रदेव को कहा कि केवल युद्ध जीतने के लिए दुसरे की पत्नी का अपहरण करोगे और इस निरपराध स्त्री को ले जाना महापाप होगा।

इंद्रदेव को महर्षि नारद की बाते सुनने के बाद कयाधू को रिहा करने के अलावा कोई विकल्प नही था। इंद्रदेव ने कयाधू को छोड़ दिया और महर्षि नारद को उसका जीवन बचाने के लिए धन्यवाद दिया। महर्षि नारद ने पूछा कि असुरो के विनाश के बाद वो अब कहा रहेगी। कयाधू उस समय गर्भवती थी और अपनी संतान की रक्षा के लिए उसने महर्षि नारद को उसकी देखभाल करने की प्रार्थना की। महर्षि नारद उसको अपने घर लेकर चले गये और उसकी देखभाल की। इस दौरान वो कयाधू को विष्णु भगवान की कथाये भी सुनाया करते थे जिसको सुनकर कयाधू को भगवान विष्णु से लगाव हो गया था। उसके गर्भ मर पल रहे शिशु को भी विष्णु भगवान की कहानियों ने मोहित कर दिया था।

समय गुजरता गया एक दिन स्वर्ग की वायु इतनी गर्म हो गयी थी कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था। कारण खोजने पर देवो को पता चला कि हिरणाकश्यप की तपस्या बहुत शक्तिशाली हो गयी थी जिसने स्वर्ग को भी गर्म कर दिय था। इस असहनीय गर्मी को देखते हुए देव भगवान ब्रह्मा के पास गये और मदद के लिए कहा। भगवान ब्रह्मा को हिरणाकश्यप से मिलने के लिए धरती पर प्रकट होना पड़ा। भगवान ब्रह्मा हिरणाकश्यप की कठोर तपस्या से बहुत प्रस्सन हुए और उसे वरदान मांगने को कहा।

हिरणाकश्यप ने नतमस्तक होकर कहा “भगवान मुझे अमर बना दो ”

भगवान ब्रह्मा ने अपना सिर हिलाते हुए कहा “पुत्र , जिनका जन्म हुआ है उनकी मृत्यु निश्चित है मै सृष्टि के नियमो को नही बदल सकता हु कुछ ओर मांग लो ”

हिरणाकश्यप अब सोच में पड़ गया क्योंकि जिस वरदान के लिए उसने तपस्या की वो प्रभु ने देने से मना कर दिया |हिरणाकश्यप अब विचार करने लगा कि अगर वो असंभव शर्तो पर म्रत्यु का वरदान मांगे तो उसकी साधना सफल हो सकती है। हिरणाकश्यप ने कुछ देर ओर सोचते हुए भगवान ब्रह्मा से वरदान मांगा।

“प्रभु मेरी इच्छा है कि मै ना तो मुझे मनुष्य मार सके और ना ही जानवर , ना मुझे कोई दिन में मार सके और ना ही रात्रि में , ना मुझे कोई स्वर्ग में मार सके और ना ही पृथ्वी पर , ना मुझे कोई घर में मार सके और ना ही घर के बाहर , ना कोई मुझे अस्त्र से मार सके और ना कोई शस्त्र से ” ।

हिरणाकश्यप का ये वरदान सुनकर एक बार तो ब्रह्मा चकित रह गये कि हिरणाकश्यप का ये वरदान बहुत विनाश कर सकता है लेकिन उनके पास वरदान देने के अलावा ओर कोई विकल्प नही था। भगवान ब्रह्मा ने तथास्तु कहते हुए मांगे हुए वरदान के पूरा होने की बात कही और वरदान देते ही भगवान ब्रह्मा अदृश्य हो गये।

हिरणाकश्यप खुशी से अपने साम्राज्य लौट गया और इंद्रदेव द्वारा किये विनाश को देखकर बहुत दुःख हुआ। उसने इंद्रदेव से बदला लेने की ठान ली और अपने वरदान के बल पर इंद्रलोक पर आक्रमण कर दिया। इंद्रदेव के पास कोई विकल्प ना होते हुए वो सभी देवो के साथ देवलोक चले गये। हिरणाकश्यप अब इंद्रलोक का राजा बन गया।

हिरणाकश्यप अपनी पत्नी कयाधू को खोजकर घर लेकर आ गया। कयाधू के विरोध करने के बावजूद हिरणाकश्यप मनुष्यों पर यातना ढाने लगा और उसके खिलाफ आवाज उठाने वाला अब कोई नही था। अब कयाधू ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम प्रहलाद रखा गया।जैसे जैसे प्रहलाद बड़ा होता गया वैसे वैसे हिरणाकश्यप ओर अधिक शक्तिशाली होता गया।

हालांकि प्रहलाद अपने पिता से बिलकुल अलग था और किसी भी जीव को नुकसान नही पहुचता था। वो भगवान विष्णु का अगाध भक्त था और जनता उसके अच्छे व्यवाहर की वजह से उससे प्यार करती थी।

एक दिन गुरु शुक्राचार्य प्रहलाद की शिकायत लेकर हिरणाकश्यप के पास पहुचे और कहा “महाराज , आपका पुत्र हम जो पढ़ाते है वो नही पढ़ता है और सारा समय विष्णु के नाम ने लगा रहता है ” हिरणाकश्यप ने उसी समय गुस्से में प्रहलाद को बुलाया और पूछा कि वो दिन भर विष्णु का नाम क्यों लेता रहता है। प्रहलाद ने जवाब दिया “पिताश्री , भगवान विष्णु ही सारे जगत के पालनहार है इसलिए मै उनकी पूजा करता हु मै दुसरो की तरफ आपके आदेशो को मानकर आपकी पूजा नही कर सकता हुआ “|

हिरणाकश्यप ने अब शाही पुरोहितो से उसका ध्यान रखने को कहा और विष्णु का जाप बंद कराने को कहा लेकिन कोई फर्क नही पड़ा। इसके विपरीत गुरुकुल में प्रहलाद दुसरे शिष्यों को भी उसकी तरह भगवान विष्णु की आराधना करने के लिए प्रेरित करने लगा।

हिरणाकश्यप ने परेशान होकर फिर प्रहलाद को बुलाया और पूछा “पुत्र तुम्हे सबसे प्रिय क्या है ?”

प्रहलाद ने जवाब दिया “मुझे भगवान विष्णु का नाम लेना सबसे प्रिय लगता है ”

अब हिरणाकश्यप ने पूछा “इस सृष्टि में सबसे शक्तिमान कौन है ?”

प्रहलाद ने फिर उत्तर दिया “तीन लोको के स्वामी और जगत के पालनहार भगवान विष्णु सबसे सर्वशक्तिमान है “
अब हिरणाकश्यप को अपने गुस्से पर काबू नही रहा और उसने अपने पहरेदारो से प्रहलाद को विष देने को कहा। प्रहलाद ने विष का प्याला पूरा पी लिया लेकिन उसकी मृत्यु नही हुयी। सभी व्यक्ति इस चमत्कार को देखकर अचम्भित रह गये। अब हिरणाकश्यप ने आदेश दिया कि प्रहलाद को बड़ी चट्टान से बांधकर समुद्र में फेंक दो लेकिन फिर चमत्कार हुआ और रस्सिया अपने आप खुल गयी। भगवान विष्णु का नाम लेकर वो समुद्र जल से बाहर आ गया। इसके बाद एक दिन जब प्रहलाद भगवान विष्णु के ध्यान में मग्न था तब उस पर उन्मत्त हाथियों के झुण्ड को छोड़ दिया लेकिन वो हाथी उसके पास शांति से बैठ गये।

अब हिरणाकश्यप ने अपनी बहन होलिका और बुलाया और कहा “बहन तुम्हे भगवान से वरदान मिला है कि तुम्हे अग्नि से कोई नुकसान नही होगा , मै तुम्हारे इस वरदान क परखना चाहता हूं , मेरा पुत्र प्रहलाद दिन भर विष्णु का नाम जपता रहता है और मुझसे सामना करता है …मै उसकी सुरत नही देखना चाहता हु …..मै उसे मारना चाहता हु क्योंकि वो मेरा पुत्र नही है …..मै चाहता हु कि तुम प्रहलाद को गोद में बिठाकर अग्नि पर बैठ जाओ ”।

होलिका ने अपने भाई की बात स्वीकार कर ली।
अब होलिका ने ध्यान करते हुए प्रहलाद को अपनी गोद में बिठाया और हिरणाकश्यप को आग लगाने को कहा। हिरणाकश्यप प्रहलाद के भक्ति की शक्ति को नही जानता था। फिर भी आग से प्रतिरक्षित होलिका जलने लग गयी और उसके पापो ने उसका नाश कर दिया। जब आग बुझी तो प्रहलाद उस जली हुयी जगह के मध्य अभी भी ध्यान में बैठा हुआ था जबकि होलिका कही भी नजर नही आयी।

अब हिरणाकश्यप भी घबरा गया और प्रहलाद को ध्यान से खीचते हुए ले गया और चिल्लाते हुए बोला “तुम कहते हो तुम्हारा विष्णु हर जगह पर है , बताओ अभी विष्णु कहा पर है ? वो पेड़ के पीछे है या मेरे महल में है या इस स्तंभ में है बताओ ?

प्रहलाद ने अपने पिता की आँखों में आँखे मिलाकर कहा “हां पिताश्री , भगवान विष्णु हर जगह पर है ”

क्रोधित हिरणाकश्यप ने अपने गदा से स्तम्भ पर प्रहार किया और गुस्से से कहा “तो बताओ वो कहा है “

हिरणाकश्यप दंग रह गया और देखा कि वो स्तम्भ चकनाचूर हो गया और उस स्तम्भ से एक क्रूर पशु निकला जिसका मुंह शेर का और शरीर मनुष्य जैसा था | हिरणाकश्यप उस आधे पशु और आधे मानव को देखकर पीछे हट गया। तभी उस आधे पशु और आधे मानव ने जोर से कहा “मै नारायण का अवतार नरसिंह हु और मै तुम्हारा विनाश करने आया हूं “ ।हिरणाकश्यप उसे देखकर जैसे ही बच कर भागने लगा तभी नरसिंह ने पंजो से उसे जकड़ दिया। हिरणाकश्यप ने अपने आप को छुडाने के बहुत कोशिश की लेकिन नाकाम रहा।

नरसिंह अब हिरणाकश्यप को घसीटते हुए दरवाजे की चौखट तक ले गया जो ना घर में था और ना घर के बाहर और उसे अपनी गोद में बिठा दिया जो ना आकाश में था और ना ही धरती पर और सांझ के समय ना ही दिन और ना ही रात हिरणाकश्यप को अपने पंजो नाहे अस्त्र ना ही शस्त्र से उसका वध कर दिया।हिरणाकश्यप का वध करने के बाद दहाड़ते हुए नरसिंह सिंहासन पर बैठ गया।

सारे असुर ऐसे क्रूर पशु को देखकर भाग गये और देवताओ की भी नरसिंह के पास जाने की हिम्मत नही हुयी। अब बिना डरे हुए प्रहलाद आगे बढ़ा और नरसिंहा से प्यार से कहा “प्रभु , मै जानता हु कि आप मेरी रक्षा के लिए आये हो ” ।

नरसिंह ने मुस्कुराकर जवाब दिया “हां पुत्र मै तुम्हारे लिए ही आया हु , तुम चिंता मत करो तुम्हे इस कथा का ज्ञान नही है कि तुम्हारे पिता मेरे द्वारपाल विजय है उन्हें एक श्राप के कारण पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा और तीन ओर जन्मो के पश्चात उसे फिर वैकुण्ठ में स्थान मिल जाएगा इसलिए तुम्हे चिंता करने की कोई आवश्यकता नही है ”।

प्रहलाद ने अपना सिर हिलाते हुए कहा “प्रभु अब मुझे कुछ नही चाहिए “नरसिंह ने अपना सिर हिलाया और कहा “नही पुत्र तुम जनता पर राज करने के लिए बने हो और तुम अपने जनता की सेवा करने के पश्चात वैकुण्ठ आना “।

प्रहलाद अब असुरो का उदार शासक बन गया जिसने अपने शासनकाल के दौरान प्रसिद्धि पायी और असुरो के पुराने क्रूर तरीके समाप्त कर दिए।

Sanjay Gupta

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पांडुरंग शास्त्रीं आठवलेंचा एक विचार
यत्र योगेश्वरो कृष्णो…
स्वाध्याय परिवार… मॅगसेसे, टेम्पल्टन, महात्मा गांधी, लोकमान्य टिळक, पद्मविभूषण पुरस्कार. असंख्य कार्यकर्त्यांचं पाठबळ.
पांडुरंग शास्त्री आठवले ह्यांच्याबद्दल लिहावं तितकं कमीच आहे !!
त्यांच्या नंतर आजही असंख्य राबते हात देशभर काम करत आहेत.
त्यांचे विचार हा संपूर्ण भारतवर्षाला जोडणारा एक धागा आहे.
पांडुरंग शास्त्री ह्यांच्या विचारात काय बळ आहे? त्यांचे विचार कोणती किमया करू शकतात ?
विनय नावाच्या एका तरुणाचा हा किस्सा आहे. तो मला पहिल्यांदा भेटला तेव्हा गप्पा मारता मारता म्हणाला,
” दादा, मी बोटीवर पोर्टर म्हणून काम करतो. बोट जगभर फिरते. त्यामुळे अनेक महिन्यांनी घरी येतो.
पगार चांगला आहे. फक्त एक प्रॉब्लेम आहे. मी पर्मनंट नाही. त्यामुळे बोटीवर जावं की नाही हा प्रश्न पडतो. जॉब सोडला तरी मुंबईत दुसरा जॉब मिळणार नाही. त्यामुळे काय करावं हा प्रश्न पडला आहे. ”
विनयच्या घरी आई -वडील आणि एक बहीण होती. वडिलांची कंपनी बंद पडल्याने अनेक वर्षे गरिबीत काढावी लागली होती. पण आता विनय चांगली कमाई करत होता. बहिणीचं लग्न लावून देणार होता. पण नोकरीचा भरवसा नव्हता. बोटीवर बोलावलं नाही तर घरीच बसावं लागणार होतं.
त्याने मला हताश होऊन विचारलं
” तुम्हीच सांगा, मी काय करू?”
ह्या प्रश्नाचं उत्तर माझ्याकडेही नव्हतं. फक्त एक उदाहरण मला आठवलं.
” विनय, तू जेवायला बसतोस तेव्हा चार पोळ्या खातोस.
पहिली पोळी खाल्ली तरी भूक भागत नाही. दुसरी खाल्ली तरी पोट भरत नाही.
तिसरी पोळी खाल्यावर थोडी भूक कमी होते आणि चौथ्या पोळीने पोट भरतं.
पण तू आईला असं म्हणू शकतोस का की मला चौथी पोळी आधीच दे.
माझं लगेच पोट भरेल आणि आधीच्या तीन पोळ्या खाण्याचे कष्ट करावे लागणार नाहीत ”
विनय सहजपणे म्हणाला,
” असं कसं होईल. आधीच्या तीन पोळ्या खाव्याचं लागणार!”
मी तोच धागा पकडून पुढे म्हणालो,
” यशही असंच असतं. कष्ट करत, टक्के टोणपे खात, एक एक पायरी चढून जावं लागतं आणि मग यश मिळतं. एकदम यशाकडे जाण्याचा मार्ग नाही. ”
विनय त्यावर काही बोलला नाही. तो बोटीवर गेला आणि पुढे दोन वर्षे काहीच संपर्क झाला नाही.
विनय नोकरी करत असेल का ? की कंपनीने त्याला काढून टाकलं असेल ?
निराश विनयचं पुढे काय झालं ह्याची उत्सुकता मला लागली होती.
आणि एक दिवस विनय अचानक माझा पत्ता शोधत आला. कंपनीने त्याला पर्मनंट केलं होतं आणि विनयने तोवर भाड्याचं घर सोडून नवीन ब्लॉक घेतला होता. आता भविष्याची त्याला चिंता नव्हती.
विनय आनंदाने म्हणाला,
” दादा, तुम्ही पोळीचं उदाहरण दिलं. ते मी लक्षात ठेवलं. मन लावून काम केलं आणि माझे कष्ट पाहून कंपनीने मला पर्मनंटचं लेटर दिलं. ”
विनयला शेवटी भेटलो तेव्हा तो उदास होता आणि आता चेहऱ्यावर आनंद मावत नव्हता… हा आनंद मिळाला होता कष्टाने !
विनय म्हणाला,
” आता तुम्हाला पार्टी द्यायची आहे. बोला कुठे पार्टी देऊ !”
मी विनयला लगेच सांगून टाकलं
“मी जे उदाहरण तुला दिलं होतं ते माझं नव्हतं. पांडुरंग शास्त्री आठवले ह्यांनी दिलेलं ते उदाहरण आहे!
पार्टी द्यायचीच तर वेगळी पार्टी दे. हे उदाहरण तू इतरांना सांग. अडीअडचणीत असणाऱ्यांना सांग.
त्यांनाही ते उपयोगी पडेल.”
त्यावर विनयने ठामपणे होकार दिला.
आता विनयने बहिणीचं लग्न लावलं. स्वतः लग्न केलं आणि तो स्थिर झाला आहे. बोट जाईल तिथे, जगभर फिरतो.
आठवलेंच्या एका विचाराची ही किमया आहे. एका विनयला त्यांनी सकारात्मक -positive विचार दिला.
तुम्ही हे वाचाल तेव्हा एकचं अपेक्षा आहे. ह्या उदाहरणाचा प्रसार करा. त्यात अशी शक्ती आहे की संघर्ष -struggle करणाऱ्याला बळ मिळेल. कष्टाचं मोल कळेल.
आठवलेंचं हे उदाहरण, त्यांचे अनेक विचार हे धन जितकं लुटता येईल तितकं लुटायचं आहे.
कारण जितकं लुटलं जाईल तितकं धन वाढत जाणार आहे.
यत्र योगेश्वरो कृष्णो, यत्र पार्थो धनुर्धर:।
तत्र श्रीर्विजयो, भूतिर्धुवा नीतिर्मतर्मम्।
जिथे श्रीकृष्ण आहे तिथे विजय निश्चित आहे. जिथे आठवलेंचे विचार आहेत तिथे यश निश्चित आहे.
लेखक : निरेन आपटे.

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एक इलाके में एक भले आदमी का निधन हो गया


एक इलाके में एक भले आदमी का निधन हो गया , लोग अर्थी ले जाने को तैयार हुये और जब उठाकर श्मशान ले जाने लगे तो एक आदमी आगे आया और अर्थी का एक पांव पकड़ लिया और बोला के मरने वाले ने मेरे 15 लाख देने है, पहले मुझे पैसे दो फिर उसको जाने दूंगा।

अब तमाम लोग खड़े तमाशा देख रहे हैं, बेटों ने कहा के मरने वाले ने हमें तो कोई ऐसी बात नही कही कि वह कर्जदार है, इसलिए हम नही दे सकतें मृतक के भाइयों ने कहा के जब बेटे जिम्मेदार नही तो हम क्यों दें। अब सारे खड़े है और उसने अर्थी पकड़ी हुई है, जब काफ़ी देर गुज़र गई तो बात घर की औरतों तक भी पहुंच गई।

मरने वाले कि इकलौती बेटी ने जब बात सुनी तो फौरन अपना सारा ज़ेवर उतारा और अपनी सारी नक़द रकम जमा करके उस आदमी के लिए भिजवा दी और कहा कि भगवान के लिए ये रकम और ज़ेवर बेच के उसकी रकम रखो और मेरे पिताजी की अंतिम यात्रा को ना रोको। मै मरने से पहले सारा कर्ज़ अदा कर दूंगी। और बाकी रकम का जल्दी बंदोबस्त कर दूंगी।

अब वह अर्थी पकड़ने वाला शख्स खड़ा हुआ और सारे लोगो से मुखातिब हो कर बोला: असल बात ये है मैने मरने वाले से 15 लाख लेना नही वरन उसका देना है और उसके किसी वारिस को मै जानता नही था तो मैने ये खेल किया। अब मुझे पता चल चुका है के उसकी वारिस एक बेटी है और उसका कोई बेटा या भाई नही है।
🙏🙏🙏
😄😄😄

र के नीखरा

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भगवा ध्वज चातुर्वर्ण्य सनातन धर्म का प्रतीक है।
—– जिसमें ——-
श्वेत -ब्राह्मण
रक्त -क्षत्रिय
पीत -वैश्य
कृष्ण – शूद्र का प्रतीक है!
इनमें से प्रथम तीन के मेल से बनता है- अग्निवर्ण भगवा एवं इसे आसन प्रदान करता है- शूद्रवर्णी बाँस। इस प्रकार स्तम्भ सहित भगवा ध्वज चातुर्वर्ण्य सनातन धर्म का प्रतीक है! यथा-
ब्राह्मणां तु सितो वर्णः क्षत्रियाणां तु लोहितः।
वैश्याणां तु पितोवर्णः शूद्राणामसितस्तथा।।
अस्तु
जो इन्हें पृथक् करता है वह सनातन धर्म के प्रति द्रोह करता है। वोट एवं अंग्रेजी राजनीति की कुत्सा ने इनमें वैमनस्य फैलाकर इसका सामरस्य भंग किया है।
अासुरी नीति को समझकर आदर्श समाज-राज-व्यवस्था- रामराज्य के पोषक वर्णाश्रम धर्म को हृदयंगम करिये और पृथ्वी पर उसे साकार करने की दिशा में मनुस्मृत्यादि विधि-निषेधों के अनुपालन में तत्पर रहकर धर्मयुद्ध करते रहिये।
कालप्रसूत यावत्प्रतीयमान अपायिन (आने जाने वाले) धर्म को त्यागकर स्वभावनियत महाकालरक्षित शाश्वत परम्परानुसारी सनातन धर्म का ही निरंतर अनुसरण कर्तव्य है! यथा-
#आगमापायिनोनित्यस्तांस्तितिक्षस्वभारत।
स्वधर्म छोड़कर संविधान पालन के नाम पर परधर्मो भयावह का अनुसरण मत करें। याद रखें – स्वधर्म छोड़कर यह धरा क्षणभर भी नहीं टिक सकती ।
#धर्मो
रक्षतिसर्वदा
जौं न होत जग जनम भरत को।
सकल धरम धुर धरनि धरत को।।
भगवान को भरत सर्वप्रिय क्यों थे? क्योंकि
रावण के पापाचार से रसातल जा रही धरित्री के धुरी को भरत ने अपने धर्म से ही धारण कर रखा था! हनुमान जी भगवान को भरतसम प्रिय क्यों थे? (तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई) क्योंकि वे धर्म की ध्वजा को सदा धारण करते हैं (हाँथ वज्र अरू ध्वजा विराजे) क्यों भगवान को शिव अतिशय प्रिय हैं – कोउ नहिं शिव समान प्रिय मोरे।
क्योंकि ईश्वर शिव का नाम हीं वृषध्वज (धर्मध्वज) है! और तो और स्वयं भगवान को भी भगवान क्यों कहा जाता है क्योंकि वह – भगवा नयतीति भगवान्। सनातन वर्णाश्रम धर्म की ध्वजा का उन्नयन कर उसे सदा फहराते रहते हैं।
#धर्म
संस्थापनार्थायसंभवामियुगे_युगे।
स्वभाव नियतं धर्म क्या है?
स्वधर्म क्या है?
वर्णधर्म क्या है?
कालधर्म और आपद्धर्म भी क्या है?
निश्चय ही स्वधर्म, वर्णनियतधर्म को छोड़-छोड़कर कभी कोई तो कभी कोई धर्म अपना लेना वर्णधर्म नहीं हो सकता। स्थायी धर्म तो नियत ही हो सकता। जो अनिश्चित एवं सुविधानुसार बदला जा सके यदि वह धर्म हो तो व्यभिचार क्या है? वर्णसंकरत्व क्या है? और धर्मत्याग क्या है?
अस्तु दयानंदी बहकावे में न आकर अपने कर्तव्य का निश्चय करके स्वधर्म पालन में तत्पर हो जाना ही -इहलोक में सुखप्राप्ति एवं परम धाम में स्थिर होने का एकमात्र मार्ग है।
गर्व से भगवत्प्रदत्त वर्ण को उसके वर्णधर्म के साथ स्वीकार कर भगवद्व्यवस्था को स्वीकार करें यही भक्ति है।
स्वधर्म पालन भक्ति है भगवान कहते हैं यही ।
स्ववर्णआश्रम छोड़कर भक्ति करे नादान ही।।
मोर दास कहाइ नर आसा।
करइ तौ कहहु कहा विस्वासा।।
बहुत कहउ का कथा बढ़ाई।
एहि आचरन बस्य मैं भाई।।
अर्थात भगवान के भक्त कहाना चाहते हैं तो उनके आदेश यानी वेद में वर्णावलम्बियों को बताये गये उनके विधि-निषेधों का पालन कीजिए बहुत क्या कहें भगवान स्वधर्म पालन से ही वशीभूत हो जाते हैं! जो उनकी आज्ञाओं का पालन न करते हुए भी अपने को उनका भक्त और वेद शास्त्रों का बड़ा जानकार बनता है, उनसे बड़ा ढ़ोंगी और कोई नहीं है! अंततः –
राष्ट्र पुनः सांस्कृतिक संक्रमणकाल से गुजर रहा है अस्तु धर्मनिष्ठों को पुनः अपने दायित्व को समझकर सचेत रहने की आवश्यकता है ।
ॐ नमो नारायणाय।
श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नमः।।
सनातन धर्मो विजयते।
हर हर हर महादेव।।

Rajesvaranandji

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एक बहुत बड़ा अमीर आदमी था।
उसने अपने गांव के सब गरीब लोगों के लिए, भिखमंगों के लिए माहवारी दान बांध दिया था।
किसी भिखमंगे को दस रुपये मिलते महीने में, किसी को बीस रुपये मिलते। वे हर एक तारीख को आकर अपने पैसे ले जाते थे। वर्षों से ऐसा चल रहा था। एक भिखमंगा था जो बहुत ही गरीब था और जिसका बड़ा परिवार था। उसे पचास रुपये महीने मिलते थे। वह हर महिने एक तारीख को आकर अपने रुपये लेकर जाता था।

एक बार महिने की एक तारीख आई। वह रुपये लेने आया, बूढ़ा भिखारी। लेकिन धनी के मैनेजर ने कहा कि भई, थोड़ा बदलाव हुआ है। पचास रुपये की जगह सिर्फ पच्चीस रुपये अब से तुम्हें मिलेंगे। वह भिखारी बहुत नाराज हो गया। उसने कहा, क्या मतलब? सदा से मुझे पचास मिलते रहे हैं। और बिना पचास लिए मैं यहां से न हटूंगा। क्या कारण है पच्चीस देने का?

मैनेजर ने कहा कि जिनकी तरफ से तुम्हें रुपये दान में मिलते हैं उनकी लड़की का विवाह है और उस विवाह में बहुत खर्च होगा। और यह कोई साधारण विवाह नहीं है। उनकी एक ही लड़की है, करोड़ों का खर्च है। इसलिए अभी रुपयों की थोड़ी असुविधा है। पच्चीस ही मिलेंगे। उस भिखारी ने जोर से टेबल पीटी और उसने कहा, इसका क्या मतलब? तुमने मुझे क्या समझा है? मैं कोई बिरला हूं? मेरे पैसे काट कर और अपनी लड़की की शादी? अगर अपनी लड़की की शादी में लुटाना है तो अपने पैसे लुटाओ।

कई सालों से उसे पचास रुपये मिल रहे हैं; वह आदी हो गया है, अधिकारी हो गया है; वह उनको अपने मान रहा है। उसमें से पच्चीस काटने पर उसको विरोध है।

तुम्हें जो मिला है जीवन में, उसे तुम अपना मान रहे हो। उसमें से कभी कटौती होगी तो तुम विरोध तो करोगे, लेकिन जो तुम्हें नित्य मिल रहा है उसके लिए तुमने धन्यवाद कभी नहीं दिया है। इस भिखारी ने कभी धन्यवाद नहीं दिया उस अमीर को आकर कि तू पचास रुपये महीने हमें देता है, इसके लिए धन्यवाद। लेकिन जब कटा तो शिकायत और विरोध।

जीवन के लिए तुम्हारे मन में कोई धन्यवाद नहीं है, मृत्यु के लिए बड़ी शिकायत। सुख के लिए कोई धन्यवाद नहीं है, दुख के लिए बड़ी शिकायत। तुम सुख के लिए कभी धन्यवाद देने मंदिर गए हो? दुख की शिकायत लेकर ही गए हो जब भी गए हो। जब भी तुमने परमात्मा को पुकारा है तो कोई दुख, कोई पीड़ा, कोई शिकायत। तुमने कभी उसे धन्यवाद देने के लिए भी पुकारा है?

रामचंद्र आर्य

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चाहत


चाहत
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देशी घी के लड्डुओं की खुशबू घरआंगन में पसरी हुई थी. तनु एकटक लड्डुओं को देखे जा रही थी. उन्हें उठा कर बाहर फेंक देने का मन हो रहा था.
‘‘मां, लड्डू,’’ मालू, शालू दोनों बहनें मचल उठीं.
‘‘अपने घर भी जब हमारा नन्हा सा भाई आएगा तो लड्डू बंटेंगे, है न मां?’’
बच्चियां पुलक रही थीं. ‘भाई’ शब्द तनु को कहीं गहरे तक बेध गया. कमोबेश सबकुछ तो है उस के पास. छोटा सा घर, प्यार करने वाला सुदर्शन पति, सुंदरप्यारी 2 बेटियां. परंतु नहीं है तो बस एक बेटा. बेटे की चाहत तनु के दिल में गहरे पैठी हुई थी. समय के साथ उस की जड़ें गहरी और मजबूत होती जा रही थीं. काश, एक पुत्र उसे भी होता. बेटे की मां का गौरव उसे भी प्राप्त होता.
प्रत्येक दंपती को संतान की चाहत रहती है पर बेटे की चाहत कुछ ज्यादा ही होती है. तनु भी इस का अपवाद नहीं थी.
‘‘नहीं खाना लड्डू. फेंको,’’ बेटियों के हाथ से लड्डू छीनती अपने ही संकुचित विचारों के दायरे में कैद तनु जोर से चीखी.
बच्चियां सहम गईं. आंखों में आंसू आ गए. बच्चियां अपना अपराध सम झ नहीं पाईं. चुपचाप सिसकती रहीं. रो तो तनु भी रही थी. मालू, शालू तो डांट के कारण रो रही थीं. तनु के रोने का क्या कारण हो सकता है? पड़ोसिन के घर बेटे के जन्म पर ईर्ष्याजनित पीड़ा. स्वयं को पुत्र न होने का दुख और इस संबंध में कुछ कर न पाने की विवशता.
शाम को अतुल दफ्तर से आए तो अति प्रसन्न थे. उन के हाथ में मिठाई का डब्बा था.
‘‘तनु, मैं मामा बन गया और तुम मामी. रैना के बेटा हुआ है. लो, मुंह मीठा करो और पड़ोस में मिठाइयां बांटो,’’ अतुल खुशी से चिल्लाया.
‘‘क्या, बेटा हुआ है?’’ तनु चौंक उठी.
‘‘क्यों, तुम्हें विश्वास नहीं होता? लो, तार पढ़ो,’’ कहते हुए हाथ का पुर्जा पत्नी की ओर बढ़ा दिया.
तनु अनमनी हो उठी.
‘‘हां, सभी के यहां बेटा हो रहा है. दुखिया तो हम ही हैं. बेटे का मुंह देखने के लिए तरस रहे हैं,’’ तनु की ठंडी आवाज सुन अतुल आश्चर्यचकित रह गया.
‘‘ऐसा, क्यों कहती हो? हमारी
मालू, शालू ही हमारे लिए बेटे से कम नहीं हैं. बेटेबेटी में अंतर तुम कब से करने लगीं?’’
‘‘हां, तुम्हें क्या? सुनना तो मु झे पड़ता है,’’ तनु अपना दुखड़ा रोने लगी.
तनु के इस बेमौके फसाद पर अतुल का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. दफ्तर की थकान अतुल पर हावी होने लगी. खुशी के अवसर पर तनु को यह क्या हो गया? कैसी कुंठा पाले है वह अपने मन में? जो वस्तु अपने हाथ में न हो, उस के लिए सिर धुनने से क्या लाभ? देवीदेवता, झाड़फूंक और इस तरह के ढोंग, आडंबरों पर अतुल को जरा भी आस्था नहीं. उस का मन कड़वा हो उठा.
बेटे की चाहत में तनु अपनी सुधबुध खो बैठी. बातबात पर पति से ठनने लगी. सदा हंसनेमुसकराने वाला अतुल अब कुछ झुं झलाया सा रहने लगा.
तनु, जो सुघड़ गृहिणी, ममतामयी जननी और भावुक पत्नी थी, बड़ी उदास रहने लगी. बेवजह बच्चियों को पीट देना, पति से झगड़ पड़ना, छोटीछोटी बातों पर चिढ़ जाना, राई को पर्वत बना कर रोनाधोना उस की दिनचर्या में शामिल हो गया.
घरगृहस्थी की लहलहाती बगिया तहसनहस होने लगी. हंसताखेलता परिवार एक तनाव में जीने लगा. तनु नीमहकीमों और पाखंडी ओ झाओं के घरों के चक्कर लगाने लगी. तनु का ध्यान घरगृहस्थी से बिलकुल उचट गया. सोचती, ‘बिना बेटे की मां की जिंदगी भी कोई माने रखती है?’
जब भी कोई पूछता, ‘आप की
2 बेटियां ही हैं?’ तो वह उबल पड़ती. पूछने वाले को उलटासीधा सुना देती. अतुल भौचक्का था. इस विकट परिस्थिति में तनु को सामान्य बनाने के लिए वह क्या करे, उस की कुछ सम झ में नहीं आता था. तनु के अवचेतन मन में जो बेटे की चाहत थी, वह अब पल्लवितपुष्पित हो कर बाहर की ओर फैलने लगी थी. किसी के घर पुत्र के जन्म की खबर पा कर तनु उत्तेजित हो उठती. सारे घर में कुहराम मचा देती. इस के विपरीत किसी के घर पुत्री के जन्म की खबर पर एक व्यंग्यात्मक मुसकान उस के होंठों पर छा जाती. शायद उस खबर से उसे संतुष्टि मिलती थी.
अतुल उसे किसी मनोचिकित्सक से मिलाना चाहता था परंतु वह तैयार न होती. उलटे, पति से झगड़ा करने लगती. बेटे की चाहत ने एक मनोरोग का रूप ले लिया.
पुत्रप्राप्ति की ललक ने तनु को तरहतरह के अंधविश्वासों के चक्कर में डाल दिया. पाखंडियों के कहने पर वह आएदिन उपवास भी करने लगी. उस का स्वास्थ्य चौपट होने लगा. जो पैसा और श्रम घरगृहस्थी में लगना चाहिए था वह झाड़फूंक करने वालों की भेंट चढ़ने लगा. पुत्ररत्न की प्राप्ति का नुसखा जहां से भी प्राप्त होने की उम्मीद होती, तनु वहां दौड़ पड़ती. लोग उस की इस दीवानगी पर हंसते, पड़ोसिनें पीठ पीछे उस का मजाक उड़ातीं.
तनु को किसी की परवा नहीं थी. उस के जीवन का एकमात्र लक्ष्य था एक बेटे की प्राप्ति. फूल की तरह 2 बेटियों की पूरी जिम्मेदारी तनु पर थी. उसे भुला कर वह बेटा पाने की उम्मीद में तरहतरह के पाखंडों में उल झ गई.
फलस्वरूप बेटियों का स्वास्थ्य गिरने लगा. पढ़ाई में वे पिछड़ने लगीं. पूरा परिवार हीनभावना का शिकार हो उठा. अतुल हैरान हो सोचता, ‘यह कैसी मनोग्रंथि पाल रखी है तनु ने? एक बेटे की चाहत में बेटियों की फौज खड़ी करना कहां की सम झदारी है? इस महंगाई के जमाने में जहां जनसंख्या विस्फोटक स्थिति में पहुंच चुकी है, ज्यादा संतान पैदा करना नैतिकता के विरुद्ध है, दूसरों के मुंह की रोटी छीनने समान है, दूसरों का हक मारना है. छोटा परिवार, सुखी परिवार.’
‘‘हम मालू, शालू की ही उचित परवरिश करें. वे ही बुढ़ापे में हमारी देखभाल करेंगी.’’
‘‘बेटियों के शादीब्याह नहीं करोगे? सिर्फ उन की कमाई खाने का इरादा है?’’ तनु का तीखा उत्तर पा अतुल सम झाने का प्रयत्न करता, ‘‘कमाई तो हम किसी की नहीं खाएंगे. इस बदलते युग में जहां प्रत्येक क्षण जीवनमूल्य परिवर्तित हो रहे हों, किसी का भी आसरा करना अदूरदर्शिता है. रही बेटियों की शादी के बाद की बात, तो समय आने पर उस का भी हल हो जाएगा. वृद्ध होने पर पास की पूंजी काम आएगी और फिर हमतुम एकसाथ रहेंगे ही,’’ और फिर ठहाका लगा कर अतुल वातावरण को सहज करने की कोशिश करता.
क्षणभर के लिए स्मित मुसकान तनु के नाजुक होंठों पर भी छिटकती परंतु अगले ही पल गायब भी हो जाती.
दिन, सप्ताह, महीने बीतने लगे. शहर के दूसरे छोर पर एक पाखंडी महात्मा पधारे थे. जोरशोर से उन का प्रचार हो रहा था. व्यक्तियों की अधूरी मनोकामनाओं को पूरी करने वाले कल्पतरु कहे जा रहे थे वे. उन की शरण में जो भी जाता, मनवांछित फल पा जाता था. भला, ऐसे चमत्कारी महात्मा की खबर तनु के कानों तक कैसे न पहुंचती. तनु की मानसिकता वाले अंधभक्तों के बल पर ही तो पाखंडियों की दुनिया रोशन होती है.
मालू, शालू को स्कूल और अतुल को दफ्तर भेज तनु रिकशे से महात्मा के पास जा रही थी कि रास्ते में अचानक उस की भेंट अपनी स्कूल की एक सहपाठिन से हो गई.
‘‘सरला, तू यहां?’’
‘‘अरे तनु…’’ कह कर दोनों गले मिलीं, ‘‘हां, मेरे पति का तबादला इसी शहर में हुआ है. हम दोनों एक ही दफ्तर में कार्यरत हैं.’’
दोनों पुरानी सहेलियां साथ बिताए कटुमधु प्रसंगों को याद कर पुलकित होने लगीं.
‘‘कहीं जा रही हो क्या?’’ सरला ने पूछा, ‘‘आज मेरी छुट्टी है. यहीं पास ही रहती हूं, चलो न मेरे घर.’’
तनु इनकार न कर सकी. सरला तनु को अपने घर ले गई. तनु भूल गई कि उसे किसी महात्मा के पास जाना है.
घर खूब साफसुथरा, सजासंवरा था. तनु को अपना बिखरा घर याद आया. अंदर कुरसी पर बैठी सरला की मां मटर की फलियां छील रही थीं, ‘‘अरे चाचीजी? आप भी यहीं हैं? नमस्ते,’’ तनु हाथ जोड़े वृद्धा की झुर्रियों का युवावस्था के रूप में सामंजस्य बैठाने लगी.
खानापीना और बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा था.
‘‘मां तुम्हारे साथ ही रहती हैं?’’ एकांत पा कर तनु फुसफुसाई, ‘‘तुम्हारे तो 5 भाई थे न?’’
‘‘हां, थे क्या, हैं. 5 भाइयों की मैं अकेली बहन हूं. लेकिन तुम्हें जान कर आश्चर्य होगा कि मां की देखभाल सही ढंग से करने के लिए कोई बेटाबहू तैयार नहीं हुए. मां की बढ़ती उम्र और लाचारी से द्रवित हो मैं उन्हें अपने पास ले आई. उन की जिंदगी के जो 2-4 वर्ष बाकी हैं, कम से कम आराम से तो कटें?’’
‘‘तुम्हारे पति इस का विरोध नहीं करते? मां बेटी के यहां रह लेती हैं?’’ रूढि़वादी मानसिकता वाली तनु की आंखें आश्चर्य से फैल गईं.
‘‘मैं स्वयं कमाती हूं. इसलिए पति क्यों विरोध करेंगे? और मु झे पढ़ालिखा कर इस योग्य मेरी मां ही ने तो बनाया है. तुम्हें शायद पता नहीं कि पिता की मृत्यु के बाद भाइयों ने मेरी पढ़ाई का कितना विरोध किया था. परंतु दूरदर्शी व दृढ़निश्चयी मेरी मां ने कभी भी बेटी होने का अनुचित दंड मु झे नहीं दिया. जहां तक मां का बेटी के घर रहने का सवाल है तो वृद्ध, शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति को क्या चाहिए? उचित देखभाल, सेवा और प्यारभरे दो मीठे बोल. वह चाहे बेटाबहू दें या फिर बेटीदामाद. बदलती दुनिया में जहां बेटाबहू मांबाप को अवांछित बो झ सम झने लगते हैं, बेटी का मृदु स्पर्श, प्यारभरा आश्वासन उन्हें नया जीवन देता है.
‘‘अब देखो न, मेरी 3 बेटियां हैं, तीनों को मैं ने पढ़ाई के अतिरिक्त हर तरह की शिक्षा देने का निश्चय किया है. जब वे स्वयं सक्षम होंगी तभी तो जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सहजता से मुकाबला कर सकेंगी. वे किसी की आश्रित न रहेंगी तभी तो किसी का सहारा बन सकती हैं. अब वे दिन लद गए जब बेटियों को बेटों से अयोग्य सम झा जाता था. आंखें खोल कर देखो, दुनिया में कौन सा कार्यक्षेत्र है जो लड़कियों की पहुंच से बाहर है?’’
‘‘पर एक बेटा तो होना ही चािहए,’’ तनु की दलील में पहले वाली तुर्शी नहीं थी.
‘‘होना क्यों नहीं चाहिए पर ऐसा तो नहीं कि पुत्र की चाह में बेटियों की संख्या बढ़ाई जाए और उन्हें तुच्छ सम झा जाए. क्या अपनी किसी संतान को मात्र इसलिए प्रताडि़त व निरुत्साहित किया जाए क्योंकि वह बेटी है. जिस बेटी के अभिभावक बाल्यावस्था में ही उस का मनोबल तोड़ देते हैं वही बेटी वयस्क होने पर अंधविश्वासी, कुंठित, डरपोक और बातबात पर पलायन करने वाली साबित होती है. खैर छोड़ो, तुम सुनाओ, तुम्हारी गृहस्थी कैसी चल रही है? कितने बच्चे हैं तुम्हारे?’’ सरला ने तनु से पूछा.
यही प्रश्न तनु की दुखती रग थी. परंतु इस प्रश्न से आज वह आहत नहीं हुई. बेटे और बेटी का बड़ा ही सहज और स्पष्ट चित्रण सरला ने किया था. तनु की आंखों पर छाई धुंध धीरेधीरे छंटने लगी.
उस के पति भी तो 4 भाई हैं. मगर वृद्ध सासससुर की सेवा करने के लिए कोई दंपती हृदय से तैयार नहीं. पुत्र और पुत्रवधुओं की उदासीनता का ही परिणाम है कि वे आज अपनी बेटी के यहां पड़े हुए हैं. कैसा बेटा? कैसी बेटी? संतान को जैसी शिक्षा देंगे उस की मनोवृत्ति वैसी ही होगी.
अपनी बेटियों की कितनी उपेक्षा कर रही है तनु और अजन्मे बेटे के लिए चिंतित है. किंतु उस बेटे की मां बनने वाली बेटी की ऐसी अवहेलना? उस का सोया कर्तव्य जाग उठा. मृगमरीचिका के पीछे भागने वालों को आखिरकार निराश ही होना पड़ता है. पति व बेटियों के प्रति अपनी उदासीनता याद कर वह सिहर उठी. अब बेटे की चाहत समूल नष्ट हो चुकी थी.
‘‘अरे, 3 बज गए? मेरी भी 2 प्यारी प्यारी बेटियां हैं. स्कूल से आती ही होंगी.’’
इतने दिनों से रुका वात्सल्य बेटियों पर लुटाने के लिए तनु व्यग्र हो उठी. अतुल का मनपसंद नाश्ता भी बनाना है, इसलिए बगैर विदा की औपचारिकता पूरी किए वह घर के लिए दौड़ पड़ी.
तनु की भावनाओं से अनजान सरला अपनी सहेली के उतावलेपन को ठगी सी देखती रही.

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एक बार किसी देश का राजा अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने के लिए गाँवो में घूम रहा था l
घूमते-घूमते उसके कुर्ते का बटन टूट गया,उसने अपने मंत्री को कहा कि, पता करो की इस गाँव में कौन सा दर्जी हैं,जो मेरे बटन को सिल सके,

मंत्री ने पता किया ,, उस गाँव में सिर्फ एक ही दर्जी था,, जो कपडे सिलने का काम करता था,,,

उसको राजा के सामने ले जाया गया,, राजा ने कहा,कय़ा तुम मेरे कुर्ते का बटन सी सकते हो,,,

दर्जी ने कहा,यह कोई मुश्किल काम थोड़े ही है,,, उसने मंत्री से बटन ले लिया,,, धागे से उसने राजा के कुर्त ेका बटन फोरन सी दिया,,,

क्योंकि बटन भी राजा के पास था,, सिर्फ उसको अपना धागे का प्रयोग करना था,,,…

राजा ने दर्जी से पूछा कि,, कितने पैसे दू ,,,

उसने कहा, महाराज रहने दो,,, छोटा सा काम था,, उसने मन में सोचा कि, बटन भी राजा के पास था,, उसने तो सिर्फ धागा ही लगाया हैं,,,

राजा ने फिर से दर्जी को कहा, कि…नहीं नहीं बोलो कितनीे माया दू,,,

दर्जी ने सोचा कि,, 2 रूपये मांग लेता हूँ,,,

फिर मन में सोचाकि; कहीं राजा यह ने सोचलें,
कि बटन टाँगने के मुझ से 2 रुपये ले रहा हैं..तो गाँव वालों से कितना लेता होगा.. क्योंकि उस जमाने में २ रुपये की कीमत बहुत होती थी,,,

दर्जी ने राजा से कहा, कि,, महाराज जो भी आपको उचित लगे ,, वह दे दो,,

अब था तो राजा ही,,उसने अपने हिसाब से देना था,, कहीं देने में उसकी पोजीशन ख़राब न हो जाये,,,

उसने अपने मंत्री से कहा कि,, इस दर्जी को २ गाँव दे दों, यह हमारा हुकम है ,,,

कहाँ वो दर्जी सिर्फ २ रुपये की मांग कर रहा था,,
और कहाँ राजा ने उसको २ गाँव दे दिए ,,

जब हम प्रभु पर सब कुछ छोड़ देते हैं, तो वह अपने हिसाब से देता हैं,,
सिर्फ हम मांगने में कमी कर जाते है,,,
देने वाला तो पता नही क्या देना चाहता हैं,,,
इसलिए संत-महात्मा कहते है,,, प्रभु के चरणों पर अपने आपको-अर्पण कर दों,,
फिर देखो उनकी लीला ।

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इमानदारी का फल


(((( इमानदारी का फल ))))
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बहुत समय पहले की बात है, प्रतापगढ़ के राजा को कोई संतान नहीं थी.
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राजा ने फैसला किया कि वह अपने राज्य के किसी बच्चे को ही अपना उत्तराधिकारी चुनेगा.
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इसी इरादे से एक दिन सभी बच्चों को बुलाया गया. राजा ने घोषणा की कि वह वह वहां मौजूद बच्चों में से ही किसी को अपना उत्तराधिकारी चुनेगा.
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उसके बाद उसने सभी बच्चों के बीच एक छोटी सी थैली बंटवा दी…. और बोला,
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“प्यारे बच्चों, आप सभी को जो थैली दी गयी है उसमे अलग-अलग पौधों के बीज हैं. हर बच्चे को सिर्फ एक ही बीज दिया गया है…
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आपको इसे अपने घर ले जाकर एक गमले में लगाना है. 6 महीने बाद हम फिर यहाँ इकठ्ठा होंगे और उस समय मैं फैसला करूँगा कि मेरे बाद प्रतापगढ़ का अगला शाषक कौन होगा ?
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उन्ही लड़कों में ध्रुव नाम का भी एक लड़का था. बाकी बच्चों की तरह वह भी बीज लेकर ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर वापस पहुँच गया.
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माँ की मदद से उसने एक गमला चुना और उसमे और अच्छे से उसकी देखभाल करता.
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दिन बीतने लगे, पर हफ्ते-दो हफ्ते बाद भी ध्रुव के गमले में पौधे का कोई नामोनिशान नहीं था.
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वहीँ अब आस-पास के कुछ बच्चों के गमलों में उपज दिखने लगी थी.
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ध्रुव ने सोचा कि हो सकता है उसका बीज कुछ अलग हो… और कुछ दिनों बाद उसमे से कुछ निकले.
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और ऐसा सोच कर वह पूरी लगन से गमले की देखभाल करता रहा. पर तीन महीने बीत जाने पर भी उसका गमला खाली था.
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वहीं दूसरी ओर बाकी बच्चों के गमलों में अच्छे-खासे पौधे उग गए थे. कुछ में तो फल-फूल भी दिखाई देने लगे थे.
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ध्रुव का खाली गमला देख सभी उसका मजाक बनाते… और उस पर हँसते… यहाँ तक की कुछ बड़े बुजुर्ग भी उसे बेकार में मेहनत करने से मना करते.
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पर बावजूद इसेक ध्रुव ने हार नहीं मानी, और लगातार गमले की देखभाल करता रहा.
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देखते-देखते 6 महीने भी बीत गए और राजा के सामने अपना गमला ले जाने का दिन आ गया.
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ध्रुव चिंतित था क्योंकि अभी भी उसे गमले में कुछ नहीं निकला था. वह मन ही मन सोचने लगा-
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अगर मैं ऐसे ही राजा के सामने चला गया तो सब लोग मुझ पर कितना हँसेंगे… और कहीं राजा भी मुझसे नाराज हो गया और सजा देदी तो…
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किसी को यकीन नहीं होगा कि मैं बीज में रोज पानी डालता था…सब मुझे कितना आलसी समझेंगे!
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माँ ध्रुव की परेशानी समझ रही थी, उसने ध्रुव की आँखों में आँखें डाल कर कहा-
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“नतीजा जो कुछ भी हो, तुम्हे राजा को उसका दिया हुआ बीज लौटाना ही चाहिए !”
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तय दिन सभी बच्चे राजमहल के मैदान में इकठ्ठा हो गए. वहां एक से बढ़कर एक पौधों का अम्बार लगा था…
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रंग-बिरंगे फूलों की खुशबु से पूरा महल सुगन्धित हो गया था.
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ध्रुव का खाली गमला देख बाकी बच्चे उसका मजाक उड़ा रहे थे कि तभी राजा के आने की घोषणा हुई.
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सभी बच्चे शांति से अपनी जगह खड़े हो गए… सब के अन्दर बस एक ही प्रश्न चल रहा था…कि कौन बनेगा राजा ?
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राजा बच्चों के बीच से हो कर आगे बढ़ने लगे… वह जहाँ से भी गुजरते बच्चे तन कर खड़े हो जाते और अपने आप को योग्य उत्तराधिकारी साबित करने की कोशिश करते.
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तमाम खूबसूरत पौधों को देखने के बाद राजा की नज़र ध्रुव पर पड़ी.
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“क्या हुआ ? तुम्हारा गमला खाली क्यों है ?”, राजा ने पूछा.
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“जी मैं रोज इसमें पानी डालता था… धूप दिखाता था… 6 महीने तक मैंने इसकी पूरी देख-भाल की पर फिर भी इसमें से पौधा नहीं निकला..”, ध्रुव कुछ हिचकिचाहट के साथ बोला.
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राजा बाकी गमलों को देखने के लिए आगे बढ़ गया और जब सभी गमले देखने के बाद उसने बच्चों को संबोधित किया-
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“आप लोगों ने खुद को साबित करने के लिए कड़ी कड़ी मेहनत की… ज्यादातर लोग किसी भी कीमत पर राजा बनना चाहते हैं,
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लेकिन एक लड़का है जो यहाँ खाली हाथ ही चला आया…. ध्रुव, तुम यहाँ मेरे पास आओ…”
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सबके सामने इस तरह बुलाया जाना ध्रुव को कुछ अजीब लगा.
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा.
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जैसे ही राजा ने उसका गमला उठाकर बाकी बच्चों को दिखाया…सभी हंसने लगे.
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“शांत हो जाइए!”, राजा ने ऊँची आवाज़ में कहा, “
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6 महीने पहले मैंने आपको बीज दिए थे और अपने-अपने पौधों के साथ आने को कहा था.
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मैंने आपको जो बीज दिए थे वो बंजर थे… आप चाहे उसकी जितनी भी देख-भाल करते उसमे से कुछ नहीं निकलता…
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लेकिन अफ़सोस है कि आप सबके बीच में बस एक ध्रुव ही है जो खाली हाथ यहाँ उपस्थित हुआ है.
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आप सबको उससे सीखना चाहिए… पहले तो उसने ईमानदारी दिखाई कि और लोगों की तरह बीज में से कुछ ना निकले पर दूसरा बीज नहीं लगाया…
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और उसके बाद खाली गमले के साथ यहाँ आने का साहस दिखाया… ये जानते हुए भी कि लोग उस पर कितना हँसेंगे… उसे कितना अपमानित होना पड़ेगा!
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मैं घोषणा करता हूँ कि ध्रुव ही प्रतापगढ़ का अगला राजा होगा. यही उसकी इमानदारी का फल है

Sanjay Gupta

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सुखी रहने का तरीका….
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एक बार की बात है संत तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था उनके समक्ष आया और बोला- गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रहते हैं, ना आप किसी पे क्रोध करते हैं और ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं ? कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए ?

संत बोले – मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य जानता हूँ ! “मेरा रहस्य! वह क्या है गुरु जी?” – शिष्य ने आश्चर्य से पूछा। “तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो” – संत तुकाराम बड़े दुखी होते हुए बोले। कोई और कहता तो शिष्य ये बात मजाक में टाल सकता था, पर स्वयं संत तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था ? शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद ले वहां से चला गया।

उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी किसी पर क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान और पूजा में लगाता। वह उनके पास भी जाता जिससे उसने कभी गलत व्यवहार किया था और उनसे माफ़ी मांगता। देखते-देखते संत की भविष्यवाणी को एक हफ्ते पूरे होने को आये।

शिष्य ने सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु के दर्शन कर आशीर्वाद ले लेते हैं। वह उनके समक्ष पहुंचा और बोला – “गुरुजी, मेरा समय पूरा होने वाला है, कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये!”
“मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है पुत्र । अच्छा, ये बताओ कि पिछले सात दिन कैसे बीते ? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें अपशब्द कहे?”- संत तुकाराम ने प्रश्न किया।

“नहीं – नहीं, बिलकुल नहीं। मेरे पास जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे, मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था ? मैं तो सबसे प्रेम से मिला, और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी मांगी” – शिष्य तत्परता से बोला।
संत तुकाराम मुस्कुराए और बोले, “बस यही तो मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।” मैं जानता हूँ कि मैं कभी भी मर सकता हूँ, इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, और यही मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है। शिष्य समझ गया कि संत तुकाराम ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था ।

वास्तव में हमारे पास भी सात दिन ही बचें हैं : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि, आठवां दिन तो बना ही नहीं है । “तो आइये आज से हम भी परिवर्तन आरम्भ करें।”@Cp

Vijay Khattar