Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अंग्रेज कवि हुआ टेनिसन। और उसने अपने संस्मरण


अंग्रेज कवि हुआ टेनिसन। और उसने अपने संस्मरण
में एक बड़ी अनूठी बात लिखी है। उसने लिखा
है कि मैं छोटा बच्चा था और मुझे घर में जल्दी
सोने भेज दिया जाता। घर के लोग तो देर तक
जागते, लेकिन बच्चे को जल्दी भेज देते। मुझे नींद
न आती और कोई उपाय न था और अंधेरे में मुझे डर
भी लगता। अंधेरा कर देते कमरे में और दरवाजा
बंद कर देते और कहते, कि सो जाओ। और सोना
पड़ता। और नींद न आती और अंधेरे में भूत-प्रेत
दिखाई पड़ते और डर भी लगता।
तो मैं आंख बंद करके, कि क्या करूं–पिता
नास्तिक थे इसलिए कोई प्रार्थना कभी
सिखाई नहीं थी। परमात्मा का कोई नाम
नहीं सिखाया, तो क्या करूं? तो मैं अपना ही
नाम दोहराता : “टेनिसन-टेनिसन-टेनिसन”।
उससे थोड़ी हिम्मत बढ़ती, थोड़ी गर्मी आती
और “टेनिसन, टेनिसन, टेनिसन दोहराते-दोहराते
मैं सो जाता।
धीरे-धीरे यह अभ्यास हो गया। और जब भी
चिंता पकड़ती, कोई तनाव होता तो टेनिसन
कहता है, बस तीन बार भीतर आंख बंद करके मुझे
इतना ही कहना पड़ताः “टेनिसन, टेनिसन,
टेनिसन; और सब शांत हो जाता। मंत्र हो गया
अपना ही नाम।
और टेनिसन ने लिखा है, कि मैं इससे बड़े गहरे
ध्यान में उतरने लगा। यह तो मुझे बहुत बाद में
पता चला कि इसे लोग ध्यान कहते हैं।
अपना ही नाम का स्मरण भी तुम्हें परमात्मा
तक पहुंचा सकता है। यह सवाल नहीं है, क्योंकि
सभी नाम उसके हैं। तुम्हारा नाम भी उसी का
है। टेनिसन भी उसी का नाम है। अल्लाह उसी
का नाम है, राम उसी का नाम है। कोई दशरथ के
बेटे ने ठेका लिया है? तुम भी किसी दशरथ के बेटे
हो। तुम्हारा नाम भी उसी का नाम है।
तुम अपना ही नाम भी अगर दोहराओ, तो भी
परिणाम वही होगा। क्योंकि असली सवाल
बोधपूर्वक भीतर स्मरण को जगाने का है। अगर
“टेनिसन, टेनिसन, टेनिसन” या “राम, राम, राम”
कुछ भी तुम दोहराते हो, उसके दोहराने के क्षण
में ही भीतर एक शांत अवस्था बनने लगती है।
और उसको दोहराते-दोहराते तुम्हें यह दिखाई
पड़ने लगता है कि दोहराने वाला अलग है और
जो दोहराया जा रहा है, वह अलग है। तुम धीरे-
धीरे साक्षी-भाव को उत्पन्न होने लगते हो।
स्मरण साक्षी-भाव की सीढ़ियां हैं। जितना
स्मरण गहरा होता है, उतने तुम साक्षी-भाव से
भर जाते हो। इसे तुम करके देखो। अगर न हो
परमात्मा पर भरोसा, कोई चिंता नहीं, तुम
अपना ही स्मरण करो।

➡कहे कबीर दीवाना, प्रवचन-१६,

ओशो

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