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जानिए, कितने मुख वाला रुद्राक्ष है आपके लिए लाभकारी!!!!!

रुद्राक्ष भगवान शिव को बहुत ही प्रिय है। इसे परम पावन समझना चाहिए। रुद्राक्ष के दर्शन से, स्‍पर्श से तथा उसपर जप करने से वह समस्‍त पापों का हरण करने वाला माना गया है। भगवान शिव ने समस्‍त लोकों का उपकार करने के लिए देवी पार्वती के सामने रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन किया था। आइए जानते हैं क्‍या है रुद्राक्ष की महिमा, क्‍यों, कैसे, किन्‍हें धारण करना चाहिए रुद्राक्ष। साथ ही यह भी जानेंगे कि धारक के लिए कितना लाभकारी है रुद्राक्ष।

शिव महापुराण में भगवान शिव ने माता पार्वती को रुद्राक्ष की पूरी महिमा सुनाई है। भगवान शंकर के अनुसार, ”पूर्वकाल की बात है, मैं मन को संयम में रखकर हजारों दिव्‍य वर्षों तक घोर तपस्‍या में लगा रहा। एक दिन सहसा मेरा मन क्षुब्‍ध हो उठा। मैं सम्‍पूर्ण लोकों का उपकार करने वाला स्‍वतंत्र परमेश्‍वर हूं। अत: उस समय मैंने लीलावश ही अपने दोनों नेत्र खोले, खोलते ही मेरे नेत्र पुटों से कुछ जल की बूंदें गिरीं। आंसुओं की उन बूंदों से वहां रुद्राक्ष नामक वृक्ष पैदा हो गया।

शिव महापुराण के अनुसार, भक्‍तों पर अनुग्रह करने के लिए वे अश्रुबिन्‍दु स्‍थावर भाव को प्राप्‍त हो गये। वे रुद्राक्ष भगवान शिव ने विष्‍णुभक्‍त को तथा चारों वर्णों के लोगों को बांट दिया। भूतलपर अपने प्रिय रुद्राक्षों को उन्‍होंने गौड़ देश में उत्‍पन्‍न किया। मथुरा, अयोध्‍या, लंका, मलयाचल, सह्यगिरि, काशी तथा अन्‍य देशों में उनके अंकुर उगाये गये।

भगवान शिव कहते हैं, ”मेरी आज्ञा से वे (रुद्राक्ष) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्‍य और शूद्र जाति के भेद से इस भूतलपर प्रकट हुए। रुद्राक्षों की ही जाति के शुभाक्ष भी हैं। उन ब्राह्मणादि जातिवाले रुद्राक्षों के वर्ण श्‍वेत, रक्‍त, पीत तथा कृष्‍ण हैं। मनुष्‍यों को चाहिये कि वे क्रमश: वर्ण के अनुसार अपनी जाति का ही रुद्राक्ष धारण करें।

ब्रह्मचारी, वानप्रस्‍थ, गृहस्‍थ और संन्‍यासी – सबको नियमपूर्वक रुद्राक्ष धारण करना उचित है। इसे धारण करने का सौभाग्‍य बड़े पुण्‍य से प्राप्‍त होता है। रुद्राक्ष शिव का मंगलमय लिंग विग्रह है। सूक्षम रुद्राक्ष को ही सदा प्रशस्‍त माना गया है। सभी आश्रमों, समस्‍त वर्णों, स्‍त्रियों और शूद्रों को भी भगवान शिव की आज्ञा के अनुसार सदैव रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। श्‍वेत रुद्राक्ष केवल ब्राह्मणों को ही धारण करना चाहिए। गहरे लाल रंग का रुद्राक्ष क्षत्रियों के लिए हितकर बताया गया है। वैश्‍यों के लिए प्रतिदिन बारंबार पीले रुद्राक्ष को धारण करना आवश्‍यक है और शूद्रों को काले रंग का रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। यह वेदोक्‍त मार्ग है।

शिव महापुराण के अनुसार, जो रुद्राक्ष बेर के फल के बराबर होता है, वह उतना छोटा होने पर भी लोक में उत्‍तम फल देनेवाला तथा सुख सौभाग्‍य की वृद्धि करने वाला होता है। जो रुद्राक्ष आंवले के फल के बराबर होता है, वह समस्‍त दु:खों का विनाश करने वाला होता है तथा जो बहुत छोटा होता है, वह सम्‍पूर्ण मनोरथों और फलों की सिद्धि करने वाला है। रुद्राक्ष जैसे-जैसे छोटा होता है, वैसे ही वैसे अधिक फल देने वाला होता है। एक-एक बड़े रुद्राक्ष से एक-एक छोटे रुद्राक्ष को विद्वानों ने दसगुना अधिक फल देने वाला बताया है।

कैसे रुद्राक्षों को करें धारण।

समान आकार-प्रकार वाले चिकने, मजबूत, स्‍थूल, कण्‍टकयुक्‍त और सुंदर रुद्राक्ष अभिलाषित पदार्थों के दाता तथा सदैव भोग और मोक्ष देने वाले हैं। वहीं जिसे कीड़ों ने दूषित कर दिया हो, जो टूटा-फूटा हो, जिसमें उभरे हुए दाने न हों, जो व्रणयुक्‍त हों तथा जो पूरा-पूरा गोल न हो, इन पांच प्रकार के रुद्राक्षों को त्‍याग देना चाहिए।

जिस रुद्राक्ष में अपने आप ही धागा पिरोने के योग्‍य छिद्र हो गया हो, वह रुद्राक्ष उत्‍तम माना गया है। जिसमें मनुष्‍य के प्रयत्‍न से छेद किया गया हो वह मध्‍यम श्रेणी का होता है। रुद्राक्ष-धारण बड़े-बड़े पातकों का नाश करने वाल हे।

शिव महापुराण के अनुसार इस जगत् में ग्‍यारह सौ रुद्राक्ष धारण करके मनुष्‍य जिस फल को पाता है उसका वर्णन सैकड़ों वर्षों में भी नहीं किया जा सकता। भक्‍तिमान् पुरुष साढ़े पांच सौ रुद्राक्ष के दानों का सुंदर मुकुट बना लें और उसे सिर पर धारण करें। तीन सौ साठ दानों को लंबे सूत्र में पिरोकर एक हार बना लें। वैसे-वैसे तीन हार बनाकर भक्‍ति परायण पुरुष उनका यज्ञोपवित तैयार करें और उसे यथास्‍थान धारण किये रहे।

किसी अंग में कितने रुद्राक्ष धारण करने चाहिए ।

सिरपर ईशान मंत्र से, कान में तत्‍पुरुष मंत्र से तथा गले और हृदय में अघोर मंत्र से रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। विद्वान पुरुष दोनों हाथों में अघोर-बीजमंत्र से रुद्राक्ष धारण करें। उदर पर वामदेव मंत्र से पंद्रह रुद्राक्षों द्वारा गुंथी हुई माला धारण करे।

अंगो सहित प्रणव का पांच बार जप करके रुद्राक्ष की तीन, पांच या सात मालाएं धारण करें अथवा मूलमंत्र ”नम: शिवाय” से ही समस्‍त रुद्राक्षों को धारण करें। रुद्राक्षधारी पुरुष अपने खान-पान में मदिरा, मांस, लहसुन, प्‍याज, सहिजन, लिसोड़ा आदि को त्‍याग दें।

जिसके ललाट में त्रिपुण्‍ड लगा हो और सभी अंग रुद्राक्ष से विभूषित हो तथा जो मृत्‍युंजय मंत्र का जप कर रहा हो, उसका दर्शन करने से साक्षात् रुद्र के दर्शन का फल प्राप्‍त होता है।

रुद्राक्ष अनेक प्रकार के बताये गये हैं। ये भेद भोग और मोक्षरूपी फल देने वाले हैं।

एक मुखी : एक मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् शिव का स्‍वरूप है। वह भोग और मोक्षरूपी फल प्रदान करता है। जहां रुद्राक्ष की पूजा होती है, वहां से लक्ष्‍मी दूर नहीं जातीं। उस स्‍थान के सारे उपद्रव नष्‍ट हो जाते हैं तथा वहां रहने वाले लोगों की सम्‍पूर्ण कामनाएं पूर्ण होती हैं।

दो मुखी : दो मुखवाला रुद्राक्ष देवदेवेश्‍वर कहा गया है। वह सम्‍पूर्ण कामनाओं और फलों को देने वाला है।

तीन मुखी : तीन मुखवाला रुद्राक्ष सदा साक्षात् साधना का फल देने वाला है, उसके प्रभाव से सारी विद्याएं प्रतिष्‍ठित होती हैं।

चार मुखी : चार मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् ब्रह्मा का रूप है। वह दर्शन और स्‍पर्श से शीघ्र ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थों को देने वाला है।

पंच मुखी : पांच मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात कालाग्‍निरुद्ररूप है। वह सब कुछ करने में समर्थ है। सबको मुक्‍ति देनेवाला तथा सम्‍पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करने वाला है। पंचमुख रुद्राक्ष समस्‍त पापों को दूर कर देता है।

षड् मुखी : छह मुखवाला रुद्राक्ष भगवान कार्तिकेय का स्‍वरूप है। यदि दाहिनी बांह में उसे धारण किया जाए तो धारण करने वाला मनुष्‍य ब्रह्महत्‍या आदि पापों से मुक्‍त हो जाता है।

सप्‍त मुखी : सात मुखवाला रुद्राक्ष अनंगस्‍वरूप और अनंग नाम से ही प्रसिद्ध है। उसको धारण करने से दरिद्र भी ऐश्‍वर्यशाली हो जाता है।

अष्‍ट मुखी : आठ मुखवाला रुद्राक्ष अष्‍टमूर्ति भैरवरूप है, उसको धारण करने से मनुष्‍य पूर्णायु होता है और मृत्‍यु के पश्‍चात शूलधारी शंकर हो जाता है।

नौ मुखी : नौ मुख वाले रुद्राक्ष को भैरव तथा कपिल-मुनि का प्रतीक माना गया है। साथ ही नौ रूप धारण करने वाली महेश्‍वरी दुर्गा उसकी अधिष्‍ठात्री देवी मानी गयी हैं। शिव कहते हैं, ”जो मनुष्‍य भक्‍तिपरायण हो अपने बायें हाथ में नौ मुख रुद्राक्ष को धारण करता है, वह निश्‍चय ही मेरे समान सर्वेश्‍वर हो जाता है – इसमें संशय नहीं है।”

दश मुखी : दस मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् भगवान विष्‍णु का रूप है। उसको धरण करने से मनुष्‍य की सम्‍पूर्ण कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।

ग्‍यारह मुखी : ग्‍यारह मुख वाला जो रुद्राक्ष है, वह रुद्ररूप है। उसको धारण करने से मनुष्‍य सर्वत्र विजयी होता है।
बारह मुखी : बारह मुखवाले रुद्राक्ष को केश प्रदेश में धरण करें। उसके धरण करने से मानो मस्‍तकपर बारहों आदित्‍य विराजमान हो जाते हैं।

तेरह मुखी : तेरह मुखवाला रुद्राक्ष विश्‍वेदेवों का स्‍वरूप है। उसको धारण करके मनुष्‍य सम्‍पूर्ण अभीष्‍टों को प्राप्‍त तथा सौभाग्‍य और मंगल लाभ करता है।

चौदह मुखी : चौदह मुखवाला जो रुद्राक्ष है, वह परम शिवरूप है। उसे भक्‍ति पूर्वक मस्‍तक पर धरण करें। इससे समस्‍त पापों का नाश हो जाता है।

शिव महापुराण के अनुसार साधक को चाहिये कि वह निद्रा और आलस्‍य का त्‍याग करके श्रद्धा-भक्‍ति से सम्‍पन्‍न हो, सम्‍पूर्ण मनोरथों की सिद्धि के लिये ऊपर लिखे मंत्रों द्वारा रुद्राक्षों को धारण करे। रुद्राक्ष की माला धरण करने वाले पुरुषों को देखकर भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी तथा जो अन्‍य द्रोहकारी राक्षस आदि हैं, वे सब के सब दूर भाग जाते हैं। रुद्राक्ष मालाधारी पुरुष को देखकर मैं शिव, भगवान् विष्‍णु, देवी दुर्गा, गणेश, सूर्य तथा अन्‍य देवता भी प्रसन्‍न हो जाते हैं।

पापों का नाश करने के लिए रुद्राक्ष धारण आवश्‍यक बताया गया है। वह निश्‍चय ही सम्‍पूर्ण अभीष्‍ट मनोरथों का साधक है। अत: अवश्‍य ही उसे धारण करना चाहिए। भगवान शिव कहते हैं, ”हे परमेश्‍वरी, लोक में मंगलमय रुद्राक्ष जैसा फलदायी दूसरी कोई माला नहीं है।

संजय गुप्ता

Posted in आयुर्वेद - Ayurveda

हृदय की बीमारी*

आयुर्वेदिक इलाज !!

हमारे देश भारत मे 3000 साल पहले एक बहुत बड़े ऋषि हुये थे

उनका नाम था महाऋषि वागवट जी !!

उन्होने एक पुस्तक लिखी थी

जिसका नाम है अष्टांग हृदयम!!

(Astang hrudayam)

और इस पुस्तक मे उन्होने ने
बीमारियो को ठीक करने के लिए 7000 सूत्र लिखे थे !

यह उनमे से ही एक सूत्र है !!

वागवट जी लिखते है कि कभी भी हृदय को घात हो रहा है !

मतलब दिल की नलियों मे blockage होना शुरू हो रहा है !

तो इसका मतलब है कि रकत (blood) मे acidity(अम्लता ) बढ़ी हुई है !

अम्लता आप समझते है !

जिसको अँग्रेजी मे कहते है acidity !!

अम्लता दो तरह की होती है !

एक होती है पेट कि अम्लता !

और एक होती है रक्त (blood) की अम्लता !!

आपके पेट मे अम्लता जब बढ़ती है !

तो आप कहेंगे पेट मे जलन सी हो रही है !!

खट्टी खट्टी डकार आ रही है !

मुंह से पानी निकाल रहा है !

और अगर ये अम्लता (acidity)और बढ़ जाये !

तो hyperacidity होगी !

और यही पेट की अम्लता बढ़ते-बढ़ते जब रक्त मे आती है तो रक्त अम्लता (blood acidity) होती !!

और जब blood मे acidity बढ़ती है तो ये अम्लीय रक्त (blood) दिल की नलियो मे से निकल नहीं पाता !

और नलिया मे blockage कर देता है !

तभी heart attack होता है !! इसके बिना heart attack नहीं होता !!

और ये आयुर्वेद का सबसे बढ़ा सच है जिसको कोई डाक्टर आपको बताता नहीं !

क्योंकि इसका इलाज सबसे सरल है !!

इलाज क्या है ??

वागबट जी लिखते है कि जब रक्त (blood) मे अम्लता (acidity) बढ़ गई है !

तो आप ऐसी चीजों का उपयोग करो जो क्षारीय है !

आप जानते है दो तरह की चीजे होती है !

अम्लीय और क्षारीय !!

acidic and alkaline

अब अम्ल और क्षार को मिला दो तो क्या होता है ! ?????

acid and alkaline को मिला दो तो क्या होता है )?????

neutral

होता है सब जानते है !!

तो वागबट जी लिखते है !

कि रक्त की अम्लता बढ़ी हुई है तो क्षारीय(alkaline) चीजे खाओ !

तो रक्त की अम्लता (acidity) neutral हो जाएगी !!!

और रक्त मे अम्लता neutral हो गई !

तो heart attack की जिंदगी मे कभी संभावना ही नहीं !!

ये है सारी कहानी !!

अब आप पूछोगे जी ऐसे कौन सी चीजे है जो क्षारीय है और हम खाये ?????

आपके रसोई घर मे ऐसी बहुत सी चीजे है जो क्षारीय है !

जिनहे आप खाये तो कभी heart attack न आए !

और अगर आ गया है !

तो दुबारा न आए !!

सबसे ज्यादा आपके घर मे क्षारीय चीज है वह है लौकी !!

जिसे दुधी भी कहते है !!

English मे इसे कहते है bottle gourd !!!

जिसे आप सब्जी के रूप मे खाते है !

इससे ज्यादा कोई क्षारीय चीज ही नहीं है !

तो आप रोज लौकी का रस निकाल-निकाल कर पियो !!

या कच्ची लौकी खायो !!
वागवतट जी कहते है रक्त की अम्लता कम करने की सबसे ज्यादा ताकत लौकी मे ही है !

तो आप लौकी के रस का सेवन करे !!

कितना सेवन करे ?????????

रोज 200 से 300 मिलीग्राम पियो !!

कब पिये ??

सुबह खाली पेट (toilet जाने के बाद ) पी सकते है !!

या नाश्ते के आधे घंटे के बाद पी सकते है !!

इस लौकी के रस को आप और ज्यादा क्षारीय बना सकते है !

इसमे 7 से 10 पत्ते के तुलसी के डाल लो

तुलसी बहुत क्षारीय है !!

इसके साथ आप पुदीने से 7 से 10 पत्ते मिला सकते है !

पुदीना बहुत क्षारीय है !

इसके साथ आप काला नमक या सेंधा नमक जरूर डाले !

ये भी बहुत क्षारीय है !!

लेकिन याद रखे नमक काला या सेंधा ही डाले !

वो दूसरा आयोडीन युक्त नमक कभी न डाले !!

ये आओडीन युक्त नमक अम्लीय है !!!!

तो मित्रों आप इस लौकी के जूस का सेवन जरूर करे !!

2 से 3 महीने आपकी सारी heart की blockage ठीक कर देगा !!

21 वे दिन ही आपको बहुत ज्यादा असर दिखना शुरू हो जाएगा !!!

कोई आपरेशन की आपको जरूरत नहीं पड़ेगी !!

घर मे ही हमारे भारत के आयुर्वेद से इसका इलाज हो जाएगा !!

और आपका अनमोल शरीर और लाखो रुपए आपरेशन के बच जाएँगे !!

और पैसे बच जाये ! तो किसी गौशाला मे दान कर दे !

डाक्टर को देने से अच्छा है !किसी गौशाला दान दे !!

हमारी गौ माता बचेगी तो भारत बचेगा !!

अमर शहीद राजीव दीक्षित जी की प्रेरणा से ……💐💐
हल्दी का पानी

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पानी में हल्दी मिलाकर पीने से होते है यह 7 फायदें…..
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  1. गुनगुना हल्दी वाला पानी पीने से दिमाग तेज होता है. सुबह के समय हल्दी का गुनगुना पानी पीने से दिमाग तेज और उर्जावान बनता है.
  2. रोज यदि आप हल्दी का पानी पीते हैं तो इससे खून में होने वाली गंदगी साफ होती है और खून जमता भी नहीं है. यह खून साफ करता है और दिल को बीमारियों से भी बचाता है.
    🙏👏🌹

  3. लीवर की समस्या से परेशान लोगों के लिए हल्दी का पानी किसी औषधि से कम नही है. हल्दी के पानी में टाॅक्सिस लीवर के सेल्स को फिर से ठीक करता है. हल्दी और पानी के मिले हुए गुण लीवर को संक्रमण से भी बचाते हैं.
    🙏👏🌹
  4. हार्ट की समस्या से परेशान लोगों को हल्दी वाला पानी पीना चाहिए. हल्दी खून को गाढ़ा होने से बचाती है. जिससे हार्ट अटैक की संभावना कम हो जाती है.
    🙏👏🌹
  5. जब हल्दी के पानी में शहद और नींबू मिलाया जाता है तब यह शरीर के अंदर जमे हुए विषैले पदार्थों को निकाल देता है जिसे पीने से शरीर पर बढ़ती हुई उम्र का असर नहीं पड़ता है. हल्दी में फ्री रेडिकल्स होते हैं जो सेहत और सौंदर्य को बढ़ाते हैं.
    🙏👏🌹
  6. शरीर में किसी भी तरह की सजून हो और वह किसी दवाई से ना ठीक हो रही हो तो आप हल्दी वाला पानी का सेवन करें. हल्दी में करक्यूमिन तत्व होता है जो सूजन और जोड़ों में होने वाले असाहय दर्द को ठीक कर देता है. सूजन की अचूक दवा है हल्दी का पानी.
    🙏👏🌹
  7. कैंसर खत्म करती है हल्दी. हल्दी कैंसर से लड़ती है और उसे बढ़ने से भी रोक देती है. हल्दी एंटी.कैंसर युक्त होती है. यदि आप सप्ताह में तीन दिन हल्दी वाला पानी पीएगें तो आपको भविष्य में कैंसर से हमेशा बचे रहेगें.👏🙏

🙏Plz forward me in your all groups

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हमारे वेदों के अनुसार स्वस्थ रहने के १५ नियम

१- खाना खाने के १.३० घंटे बाद पानी पीना है

२- पानी घूँट घूँट करके पीना है जिस से अपनी मुँह की लार पानी के साथ मिलकर पेट में जा सके , पेट में acid बनता है और मुँह में छार ,दोनो पेट में बराबर मिल जाए तो कोई रोग पास नहीं आएगा

३- पानी कभी भी ठंडा ( फ़्रीज़ का )नहीं पीना है।

४- सुबह उठते ही बिना क़ुल्ला किए २ ग्लास पानी पीना है ,रात भर जो अपने मुँह में लार है वो अमूल्य है उसको पेट में ही जाना ही चाहिए ।

५- खाना ,जितने आपके मुँह में दाँत है उतनी बार ही चबाना है ।

६ -खाना ज़मीन में पलोथी मुद्रा या उखड़ूँ बैठकर ही भोजन करे ।

७ -खाने के मेन्यू में एक दूसरे के विरोधी भोजन एक साथ ना करे जैसे दूध के साथ दही , प्याज़ के साथ दूध , दही के साथ उड़द दल

८ -समुद्री नमक की जगह सेंध्या नमक या काला नमक खाना चाहिए

९-रीफ़ाइन तेल , डालडा ज़हर है इसकी जगह अपने इलाक़े के अनुसार सरसों , तिल , मूँगफली , नारियल का तेल उपयोग में लाए । सोयाबीन के कोई भी प्रोडक्ट खाने में ना ले इसके प्रोडक्ट को केवल सुअर पचा सकते है , आदमी में इसके पचाने के एंज़िम नहीं बनते है ।

१०- दोपहर के भोजन के बाद कम से कम ३० मिनट आराम करना चाहिए और शाम के भोजन बाद ५०० क़दम पैदल चलना चाहिए

११- घर में चीनी (शुगर )का उपयोग नहीं होना चाहिए क्योंकि चीनी को सफ़ेद करने में १७ तरह के ज़हर ( केमिकल )मिलाने पड़ते है इसकी जगह गुड़ का उपयोग करना चाहिए और आजकल गुड बनाने में कॉस्टिक सोडा ( ज़हर ) मिलाकर गुड को सफ़ेद किया जाता है इसलिए सफ़ेद गुड ना खाए । प्राकृतिक गुड ही खाये । और प्राकृतिक गुड चोकलेट कलर का होता है। ।

१२ – सोते समय आपका सिर पूर्व या दक्षिण की तरफ़ होना चाहिए ।

१३- घर में कोई भी अलूमिनियम के बर्तन , कुकर नहीं होना चाहिए । हमारे बर्तन मिट्टी , पीतल लोहा , काँसा के होने चाहिए

१४ -दोपहर का भोजन ११ बजे तक अवम शाम का भोजन सूर्यास्त तक हो जाना चाहिए

१५ सुबह भोर के समय तक आपको देशी गाय के दूध से बनी छाछ (सेंध्या नमक और ज़ीरा बिना भुना हुआ मिलाकर ) पीना चाहिए । यदि आपने ये नियम अपने जीवन में लागू कर लिए तो आपको डॉक्टर के पास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी और देश के ८ लाख करोड़ की बचत होगी । यदि आप बीमार है तो ये नियमों का पालन करने से आपके शरीर के सभी रोग ( BP , शुगर ) अगले ३ माह से लेकर १२ माह में ख़त्म हो जाएँगे ।

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मनुष्य की नीयत


(((( मनुष्य की नीयत ))))
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किसी गाँव में एक साधु रहता था जो दिन भर लोगो को उपदेश दिया करता था।
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उसी गाँव में एक नर्तकी थी, जो लोगो के सामने नाचकर उनका मन बहलाया करती थी।
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एक दिन गाँव में बाढ़ आ गयी और दोनो एक साथ ही मर गये।
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मरने के बाद जब ये दोनो यमलोक पहूँचे तो इनके कर्मों और उनके पीछे छिपी भावनाओं के आधार पर इन्हे स्वर्ग या नरक दिये जाने की बात कही गई।
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साधु खुद को स्वर्ग मिलने को लेकर पुरा आश्वस्त था।
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वही नर्तकी अपने मन में ऐसा कुछ भी विचार नही कर रही थी। नर्तकी को सिर्फ फैसले का इंतजार था।
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तभी घोषणा हूई कि साधु को नरक और नर्तकी को स्वर्ग दिया जाता है।
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इस फैसले को सुनकर साधु गुस्से से यमराज पर चिल्लाया और क्रोधित होकर पूछा ,
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यह कैसा न्याय है महाराज ? मैं जीवन भर लोगो को उपदेश देता रहा और मुझे नरक नसीब हुआ!
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जबकि यह स्त्री जीवन भर लोगो को रिझाने के लिये नाचती रही और इसे स्वर्ग दिया जा रहा है। ऐसा क्यो ?
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यमराज ने शांत भाव से उत्तर दिया ,” यह नर्तकी अपना पेट भरने के लिये नाचती थी..
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लेकिन इसके मन में यही भावना थी कि मैं अपनी कला को ईश्वर के चरणोँ में समर्पित कर रही हूँ।
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जबकि तुम उपदेश देते हुये भी यह सोचते थे कि कि काश तुम्हे भी नर्तकी का नाच देखने को मिल जाता !
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हे साधु ! लगता है तुम इस ईश्वर के इस महत्त्वपूर्ण सन्देश को भूल गए कि इंसान के कर्म से अधिक कर्म करने के पीछे की भावनाएं मायने रखती है।
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अतः तुम्हे नरक और नर्तकी को स्वर्ग दिया जाता है। “
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मित्रों, हम कोई भी काम करें, उसे करने के पीछे की नियत साफ़ होनी चाहिए, अन्यथा दिखने में भले लगने वाले काम भी हमे पुण्य की जगह पाप का ही भागी बना देंगे।

सकंजय गुप्ता

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हनुमान जी का जुगाड़


(((((( हनुमान जी का जुगाड़ ))))))
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एक गरीब ब्रह्मण था। उसको अपनी कन्या का विवाह करना था। उसने विचार किया कि कथा करने से कुछ पैसा आ जायेगा तो काम चल जायेगा।
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ऐसा विचार करके उसने भगवान राम के एक मंदिर में बैठ कर कथा आरंभ की। उसका भाव था कि कोई श्रोता आये, चाहे न आये पर भगवान तो मेरी कथा सुनेंगे।
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पंडित जी ने कथा आरंभ की थोड़े ही देर में श्रोता आने लगे और नाम मात्र चढ़ावा चढ़ा। पंडित जी ने उसी में संतोष किया और रोजाना मंदिर में जाकर कथा करने लगे।
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एक बहुत कंजूस सेठ मंदिर में आया। भगवान को प्रणाम करके जब वह मंदिर कि परिकर्मा कर रहा था, तब भीतर से कुछ आवाज आ रही थी। ऐसा लगा कि दो व्यक्ति आपस में बातें कर रहे हैं।
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सेठ ने कान लगा कर सुना। भगवान राम हनुमान जी से कह रहे थे कि,”इस गरीब ब्रह्मण के लिए सौ रूपए का इंतजाम कर देना, जिससे कन्यादान का कार्य ठीक से हो जाए।
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हनुमान जी ने कहा, ठीक है महाराज ! इसके लिए सौ रूपए का इंतजाम हो जाएगा।
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सेठ ने यह सुना तो वह कथा समाप्ति के बाद पंडित जी से मिला और उनसे पूछा, पंडित जी ! कथा में रूपए पैदा हो रहें हैं कि नहीं ?
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पंडित जी बोले, श्रोता बहुत कम आते हैं तो रूपए कैसे पैदा हों ?
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सेठ ने कहा, मेरी एक शर्त है रोजाना कथा में जितना पैसा आए वह आप मेरे को दे देना और मैं आप को पचास रूपए दे दिया करूंगा।
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पंडित जी ने सोचा कि उनके पास कौन सा इतने पैसे आते हैं। अगर मैं सेठ की बात मान लूं तो रोजाना पचास रूपए तो मिलेंगे, पंडित जी ने सेठ कि बात मान ली।
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इधर सेठ ने सोच रखा था कि भगवान कि आज्ञा का पालन करने हेतु हनुमान जी सौ रूपए पंडित जी को जरूर देंगे।
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मुझे सीधे-सीधे पचास रूपए का फायदा हो रहा है। जो लोभी आदमी होते हैं वे पैसे के बारे में ही सोचते हैं। सेठ ने भगवान जी कि बातें सुनकर भी भक्ति कि और ध्यान नहीं दिया बल्कि पैसे कि और आकर्षित हो गए।
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अब सेठ जी कथा के उपरांत पंडित जी के पास गए और उनसे पूछा कि, कितने रुपए आएं है ?
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सेठ के मन में विचार था कि हनुमान जी सौ रूपए तो भेंट में जरूर दिलवाऐंगे, मगर पंडित जी ने कहा कि पांच-सात रूपए ही हुए हैं।
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अब सेठ को शर्त के मुताबिक पचास रूपए पंडित जी को देने पड़े। सेठ को हनुमान जी पर बहुत ही गुस्सा आ रहा था कि उन्होंने पंडित जी को सौ रूपए नहीं दिए।
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वह मंदिर में गया और हनुमान जी कि मूर्ती पर घूंसा मारा। घूंसा मारते ही सेठ का हाथ मूर्ती पर चिपक गया
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अब सेठ जोर लगाये अपना हाथ छुड़ाने के लिए पर नाकाम रहा। हाथ हनुमान जी कि पकड़ में ही रहा। हनुमान जी किसी को पकड़ लें तो वह कैसे छूट सकता है ?
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सेठ को फिर आवाज सुनाई दी। उसने ध्यान से सुना, भगवान हनुमान जी से पूछ रहे थे कि तुमने ब्रह्मण को सौ रूपए दिलाएं कि नहीं ?
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हनुमान जी ने कहा, महाराज पचास रूपए तो दिला दिए हैं, बाकी पचास रुपयों के लिए सेठ को पकड़ रखा है। वह पचास रूपए दे देगा तो छोड़ देंगे।
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सेठ ने सुना तो विचार किया कि मंदिर में लोग आकर मेरे को देखेंगे तो बड़ी बेईज्ज़ती होगी।
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वह चिल्लाकर बोला, हनुमान जी महाराज ! मेरे को छोड़ दो, मैं पचास रूपय दे दूंगा।
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हनुमान जी ने सेठ को छोड़ दिया। सेठ ने जाकर पंडित जी को पचास रूपए दे दिए।
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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~देव शर्मा

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आदतें नस्लों का पता देती हैं। ( एक अरबी कहानी )
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एक बादशाह के दरबार मे एक अजनबी नौकरी की तलब के लिए हाज़िर हुआ ।

क़ाबलियत पूछी गई,
कहा,
“सियासी हूँ ।” ( अरबी में सियासी अक्ल ओ तदब्बुर से मसला हल करने वाले मामला फ़हम को कहते हैं ।)

बादशाह के पास सियासतदानों की भरमार थी, उसे खास “घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज” बना लिया।
चंद दिनों बाद बादशाह ने उस से अपने सब से महंगे और अज़ीज़ घोड़े के मुताल्लिक़ पूछा,
उसने कहा, “नस्ली नही हैं ।”

बादशाह को ताज्जुब हुआ, उसने जंगल से साईस को बुला कर दरियाफ्त किया..
उसने बताया, घोड़ा नस्ली हैं, लेकिन इसकी पैदायश पर इसकी मां मर गई थी, ये एक गाय का दूध पी कर उसके साथ पला है।

बादशाह ने अपने मसूल को बुलाया और पूछा तुम को कैसे पता चला के घोड़ा नस्ली नहीं हैं ?”

“”उसने कहा “जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुह में लेकर सर उठा लेता हैं ।”””

बादशाह उसकी फरासत से बहुत मुतास्सिर हुआ, उसने मसूल के घर अनाज ,घी, भुने दुंबे, और परिंदों का आला गोश्त बतौर इनाम भिजवाया।

और उसे मलिका के महल में तैनात कर दिया।
चंद दिनो बाद , बादशाह ने उस से बेगम के बारे में राय मांगी, उसने कहा, “तौर तरीके तो मलिका जैसे हैं लेकिन शहज़ादी नहीं हैं ।”

बादशाह के पैरों तले जमीन निकल गई, हवास दुरुस्त हुए तो अपनी सास को बुलाया, मामला उसको बताया, सास ने कहा “हक़ीक़त ये हैं, कि आपके वालिद ने मेरे खाविंद से हमारी बेटी की पैदायश पर ही रिश्ता मांग लिया था, लेकिन हमारी बेटी 6 माह में ही मर गई थी, लिहाज़ा हम ने आपकी बादशाहत से करीबी ताल्लुक़ात क़ायम करने के लिए किसी और कि बच्ची को अपनी बेटी बना लिया।”

बादशाह ने अपने मुसाहिब से पूछा “तुम को कैसे इल्म हुआ ?”

“”उसने कहा, “उसका खादिमों के साथ सुलूक जाहिलों से भी बदतर हैं । एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक मुलाहजा एक अदब होता हैं, जो शहजादी में बिल्कुल नहीं।

बादशाह फिर उसकी फरासत से खुश हुआ और बहुत से अनाज , भेड़ बकरियां बतौर इनाम दीं साथ ही उसे अपने दरबार मे मुतय्यन कर दिया।

कुछ वक्त गुज़रा, मुसाहिब को बुलाया,अपने बारे में दरियाफ्त किया ।

मुसाहिब ने कहा “जान की अमान ।”

बादशाह ने वादा किया ।

उसने कहा, “न तो आप बादशाह ज़ादे हो न आपका चलन बादशाहों वाला है।”

बादशाह को ताव आया, मगर जान की अमान दे चुका था, सीधा अपनी वालिदा के महल पहुंचा ।

वालिदा ने कहा,
“ये सच है, तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी औलाद नहीं थी तो तुम्हे लेकर हम ने पाला ।”

बादशाह ने मुसाहिब को बुलाया और पूछा , बता, “तुझे कैसे इल्म हुआ ????”

उसने कहा “बादशाह जब किसी को “इनाम ओ इकराम” दिया करते हैं, तो हीरे मोती जवाहरात की शक्ल में देते हैं….लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें इनायत करते हैं…ये असलूब बादशाह ज़ादे का नही, किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है।”

किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, इल्म, बाहुबल हैं ये सब बाहरी मुल्लम्मा हैं ।
इंसान की असलियत, उस के खून की किस्म उसके व्यवहार, उसकी नियत से होती हैं ।

एक इंसान बहुत आर्थिक, शारीरिक, सामाजिक और राजनैतिक रूप से बहुत शक्तिशाली होने के उपरांत भी अगर वह छोटी छोटी चीजों के लिए नियत खराब कर लेता हैं, इंसाफ और सच की कदर नहीं करता, अपने पर उपकार और विश्वास करने वालों के साथ दगाबाजी कर देता हैं, या अपने तुच्छ फायदे और स्वार्थ पूर्ति के लिए दूसरे इंसान को बड़ा नुकसान पहुंचाने की लिए तैयार हो जाता हैं, तो समझ लीजिए, खून में बहुत बड़ी खराबी हैं । बाकी सब तो पीतल पर चढ़ा हुआ सोने का मुलम्मा हैं ।
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देव शर्मा

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भगवान का नाम


भगवान का नाम

 

एक पंडित जी थे। उन्होंने एक नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया हुआ था।

पंडित जी बहुत विद्वान थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे।.

नदी के दूसरे किनारे पर लक्ष्मी नाम की एक ग्वालिन अपने बूढ़े पिताश्री के साथ रहती थी।.

लक्ष्मी सारा दिन अपनी गायों को देखभाल करती थी।

सुबह जल्दी उठकर अपनी गायों को नहला कर दूध दोहती,.

फिर अपने पिताजी के लिए खाना बनाती,

तत्पश्चात् तैयार होकर दूध बेचने के लिए निकल जाया करती थी।.

पंडित जी के आश्रम में भी दूध लक्ष्मी के यहाँ से ही आता था।.

एक बार पंडित जी को किसी काम से शहर जाना था।

उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि उन्हें शहर जाना है, इसलिए अगले दिन दूध उन्हें जल्दी चाहिए।.

लक्ष्मी अगले दिन जल्दी आने का वादा करके चली गयी।.

अगले दिन लक्ष्मी ने सुबह जल्दी उठकर अपना सारा काम समाप्त किया और जल्दी से दूध उठाकर आश्रम की तरफ निकल पड़ी।.

नदी किनारे उसने आकर देखा कि कोई मल्लाह अभी तक आया नहीं था।

लक्ष्मी बगैर नाव के नदी कैसे पार करती ?.

फिर क्या था,

लक्ष्मी को आश्रम तक पहुँचने में देर हो गयी।.

आश्रम में पंडित जी जाने को तैयार खड़े थे।

उन्हें सिर्फ लक्ष्मी का इन्तजार था।.

लक्ष्मी को देखते ही उन्होंने लक्ष्मी को डाँटा और देरी से आने का कारण पूछा।.

लक्ष्मी ने भी बड़ी मासूमियत से पंडित जी से कह दिया कि नदी पर कोई मल्लाह नहीं था,

वह नदी कैसे पार करती ?

इसलिए देर हो गयी।.

पंडित जी गुस्से में तो थे ही, उन्हें लगा कि लक्ष्मी बहाने बना रही है।

उन्होंने भी गुस्से में लक्ष्मी से कहा,.

क्यों बहाने बनाती है।

लोग तो जीवन सागर को भगवान का नाम लेकर पार कर जाते हैं,

तुम एक छोटी सी नदी पार नहीं कर सकती ?.

पंडित जी की बातों का लक्ष्मी पर बहुत गहरा असर हुआ।

दूसरे दिन भी जब लक्ष्मी दूध लेकर आश्रम जाने निकली तो नदी के किनारे मल्लाह नहीं था।.

लक्ष्मी ने मल्लाह का इंतजार नहीं किया।

उसने भगवान को याद किया और पानी की सतह पर चलकर आसानी से नदी पार कर ली।.

इतनी जल्दी लक्ष्मी को आश्रम में देख कर पंडित जी हैरान रह गये,

उन्हें पता था कि कोई मल्लाह इतनी जल्दी नहीं आता है।.

उन्होंने लक्ष्मी से पूछा कि तुमने आज नदी कैसे पार की ?.

लक्ष्मी ने बड़ी सरलता से कहा—

‘‘पंडित जी आपके बताये हुए तरीके से।

मैंने भगवान् का नाम लिया और पानी पर चलकर नदी पार कर ली।’’.

पंडित जी को लक्ष्मी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ।

उसने लक्ष्मी से फिर पानी पर चलने के लिए कहा।.

लक्ष्मी नदी के किनारे गयी और उसने भगवान का नाम जपते-जपते बड़ी आसानी से नदी पार कर ली।.

पंडित जी हैरान रह गये।

उन्होंने भी लक्ष्मी की तरह नदी पार करनी चाही।.

पर नदी में उतरते वक्त उनका ध्यान अपनी धोती को गीली होने से बचाने में लगा था।.

वह पानी पर नहीं चल पाये और धड़ाम से पानी में गिर गये।.

पंडित जी को गिरते देख लक्ष्मी ने हँसते हुए कहा,

‘‘आपने तो भगवान का नाम लिया ही नहीं,

आपका सारा ध्यान अपनी नयी धोती को बचाने में लगा हुआ था।’’.

पंडित जी को अपनी गलती का अहसास हो गया।

उन्हें अपने ज्ञान पर बड़ा अभिमान था।.

पर अब उन्होंने जान लिया था कि भगवान को पाने के लिए किसी भी ज्ञान की जरूरत नहीं होती।

उसे तो पाने के लिए सिर्फ सच्चे मन से याद करने की जरूरत है।.

कहानी में हमें यह बताया गया है कि अगर सच्चे मन से भगवान को याद किया जाये,
तो भगवान तुरन्त अपने भक्तों की मदद करते है।
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🌹जय श्री राम🌹 🌹जय हनुमान🌹
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Sandhya Sharma

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नरसिंह अवतार और भक्त प्रहलाद की कथा


नरसिंह अवतार और भक्त प्रहलाद की कथा!!!!!

सतयुग में ऋषि कश्यप के दो पुत्र थे हिरण्याक्ष और हिरणाकश्यप। हिरण्याक्ष भगवान ब्रह्म से मिले वरदान की वजह से बहुत अहंकारी हो गया था। अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए वो भूदेवी को साथ लेकर पाताल में भगवान विष्णु की खोज में चला गया। भगवान विष्णु ने वराह अवतार में उसके साथ युद्ध किया और उसका विनाश कर दिया। लेकिन संसार के लिए खतरा अभी टला नही था क्योंकि उसका भाई हिरणाकश्यप अपने भाई के मौत की बदला लेने को आतुर था। उसने देवताओ से बदला लेने के लिए अपनी असुरो की सेना से देवताओ पर आक्रमण कर दिया। हिरणाकश्यप देवताओ से लड़ता लेकिन हर बार भगवान विष्णु उनकी मदद कर देते।

हिरणाकश्यप ने सोचा “अगर मुझे विष्णु को हराना है तो मुझे अपनी रक्षा के लिए एक वरदान की आवश्यकता है। क्योंकि मै जब भी देवताओ और मनुष्यों पर आक्रमण करता हु , विष्णु मेरी सारी योजना तबाह कर देता है ……उससे लड़ने के लिए मुझे शक्तिशाली बनना पड़ेगा ।

अपने दिमाग में ऐसे विचार लेकर वो वन की तरफ निकल पड़ता है और भगवान ब्रह्मा की तपस्या में लीन हो जाता हो। वो काफी लम्बे समय तक तपस्या में इसलिए रहना चाहता था ताकि वो भगवान ब्रह्मा से अमर होने का वरदान मांग सके। इस दौरान वो अपने ओर अपने साम्राज्य के बारे में भूलकर कठोर तपस्या में लग जाता है।

इस दौरान इंद्रदेव को ये ज्ञात होता है कि हिरणाकश्यप असुरो का नेतृत्व नही कर रहा है। इंद्रदेव सोचते है कि ” यदि इस समय असुरो को समाप्त कर दिया जाए तो फिर कभी वो आक्रमण नही कर पाएंगे। हिरणाकश्यप के बिना असुरो की शक्ति आधी है अगर इस समय इनको खत्म कर दिया जाए तो हिरणाकश्यप के लौटने पर उसका आदेश मानने वाला कोई शेष नही रहेगा।

ये सोचते हुए इंद्र अपने दुसरे देवो के साथ असुरो के साम्राज्य पर आक्रमण कर देते है।इंद्रदेव के अपेक्षा के अनुसार हिरणाकश्यप के बिना असुर मुकाबले में कमजोर पड़ गये और युद्ध में हार गये। इंद्रदेव ने असुरो के कई समूहों को समाप्त कर दिया।

हिरणाकश्यप की राजधानी को तबाह कर इन्द्रदेव ने हिरणाकश्यप के महल में प्रवेश किया। जहा पर उनको हिरणाकश्यप की पत्नी कयाधू नजर आयी। इंददेव ने हिरणाकश्यप की पत्नी को बंदी बना लिया ताकि भविष्य में हिरणाकश्यप के लौटने पर उसके बंधक बनाने के उपयोग कर पाए। इंद्रदेव जैसे ही कयाधू को इंद्र लोक लेकर जाने लगे महर्षि नारद प्रकट हुए और उसी समय इंद्र को कहा “इंद्रदेव रुक जाओ आप ये क्या कर रहे हो ” ।

महर्षि नारद इंद्रदेव के कयाधू को अपने रथ में ले जाते देख क्रोधित हो गये। इंददेव में नतमस्तक होकर महर्षि नारद से कहा “महर्षि हिरणाकश्यप के नेतृत्व के बिना असुरो पर आक्रमण किया है और मेरा मानना है कि असुरो के आतंक को समाप्त करने का यही समय है।

वहा के विनाश को देखकर महर्षि नारद ने क्रोधित स्वर में कहा “हा ये सत्य है मै देख सकता हूं, लेकिन ये औरत इसमें कहा से आयी , क्या इसने तुमसे युद्ध किया , मुझे ऐसा नही लग रहा है कि इसने तुम्हारे विरुद्ध कोई शस्र उठाया है फिर तुम उसको क्यों चोट पंहुचा रहे हो ? “

इंद्रदेव ने महर्षि नारद की तरफ देखते हुए जवाब दिया कि वो उसके शत्रु हिरणाकश्यप की पत्नी है जिसे वो बंदी बना करले जा रहा है ताकि हिरणाकश्यप कभी आक्रमण करे तो वो उसका उपयोग कर सके। महर्षि नारद ने गुस्से में इन्द्रदेव को कहा कि केवल युद्ध जीतने के लिए दुसरे की पत्नी का अपहरण करोगे और इस निरपराध स्त्री को ले जाना महापाप होगा।

इंद्रदेव को महर्षि नारद की बाते सुनने के बाद कयाधू को रिहा करने के अलावा कोई विकल्प नही था। इंद्रदेव ने कयाधू को छोड़ दिया और महर्षि नारद को उसका जीवन बचाने के लिए धन्यवाद दिया। महर्षि नारद ने पूछा कि असुरो के विनाश के बाद वो अब कहा रहेगी। कयाधू उस समय गर्भवती थी और अपनी संतान की रक्षा के लिए उसने महर्षि नारद को उसकी देखभाल करने की प्रार्थना की। महर्षि नारद उसको अपने घर लेकर चले गये और उसकी देखभाल की। इस दौरान वो कयाधू को विष्णु भगवान की कथाये भी सुनाया करते थे जिसको सुनकर कयाधू को भगवान विष्णु से लगाव हो गया था। उसके गर्भ मर पल रहे शिशु को भी विष्णु भगवान की कहानियों ने मोहित कर दिया था।

समय गुजरता गया एक दिन स्वर्ग की वायु इतनी गर्म हो गयी थी कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था। कारण खोजने पर देवो को पता चला कि हिरणाकश्यप की तपस्या बहुत शक्तिशाली हो गयी थी जिसने स्वर्ग को भी गर्म कर दिय था। इस असहनीय गर्मी को देखते हुए देव भगवान ब्रह्मा के पास गये और मदद के लिए कहा। भगवान ब्रह्मा को हिरणाकश्यप से मिलने के लिए धरती पर प्रकट होना पड़ा। भगवान ब्रह्मा हिरणाकश्यप की कठोर तपस्या से बहुत प्रस्सन हुए और उसे वरदान मांगने को कहा।

हिरणाकश्यप ने नतमस्तक होकर कहा “भगवान मुझे अमर बना दो ”

भगवान ब्रह्मा ने अपना सिर हिलाते हुए कहा “पुत्र , जिनका जन्म हुआ है उनकी मृत्यु निश्चित है मै सृष्टि के नियमो को नही बदल सकता हु कुछ ओर मांग लो ”

हिरणाकश्यप अब सोच में पड़ गया क्योंकि जिस वरदान के लिए उसने तपस्या की वो प्रभु ने देने से मना कर दिया |हिरणाकश्यप अब विचार करने लगा कि अगर वो असंभव शर्तो पर म्रत्यु का वरदान मांगे तो उसकी साधना सफल हो सकती है। हिरणाकश्यप ने कुछ देर ओर सोचते हुए भगवान ब्रह्मा से वरदान मांगा।

“प्रभु मेरी इच्छा है कि मै ना तो मुझे मनुष्य मार सके और ना ही जानवर , ना मुझे कोई दिन में मार सके और ना ही रात्रि में , ना मुझे कोई स्वर्ग में मार सके और ना ही पृथ्वी पर , ना मुझे कोई घर में मार सके और ना ही घर के बाहर , ना कोई मुझे अस्त्र से मार सके और ना कोई शस्त्र से ” ।

हिरणाकश्यप का ये वरदान सुनकर एक बार तो ब्रह्मा चकित रह गये कि हिरणाकश्यप का ये वरदान बहुत विनाश कर सकता है लेकिन उनके पास वरदान देने के अलावा ओर कोई विकल्प नही था। भगवान ब्रह्मा ने तथास्तु कहते हुए मांगे हुए वरदान के पूरा होने की बात कही और वरदान देते ही भगवान ब्रह्मा अदृश्य हो गये।

हिरणाकश्यप खुशी से अपने साम्राज्य लौट गया और इंद्रदेव द्वारा किये विनाश को देखकर बहुत दुःख हुआ। उसने इंद्रदेव से बदला लेने की ठान ली और अपने वरदान के बल पर इंद्रलोक पर आक्रमण कर दिया। इंद्रदेव के पास कोई विकल्प ना होते हुए वो सभी देवो के साथ देवलोक चले गये। हिरणाकश्यप अब इंद्रलोक का राजा बन गया।

हिरणाकश्यप अपनी पत्नी कयाधू को खोजकर घर लेकर आ गया। कयाधू के विरोध करने के बावजूद हिरणाकश्यप मनुष्यों पर यातना ढाने लगा और उसके खिलाफ आवाज उठाने वाला अब कोई नही था। अब कयाधू ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम प्रहलाद रखा गया।जैसे जैसे प्रहलाद बड़ा होता गया वैसे वैसे हिरणाकश्यप ओर अधिक शक्तिशाली होता गया।

हालांकि प्रहलाद अपने पिता से बिलकुल अलग था और किसी भी जीव को नुकसान नही पहुचता था। वो भगवान विष्णु का अगाध भक्त था और जनता उसके अच्छे व्यवाहर की वजह से उससे प्यार करती थी।

एक दिन गुरु शुक्राचार्य प्रहलाद की शिकायत लेकर हिरणाकश्यप के पास पहुचे और कहा “महाराज , आपका पुत्र हम जो पढ़ाते है वो नही पढ़ता है और सारा समय विष्णु के नाम ने लगा रहता है ” हिरणाकश्यप ने उसी समय गुस्से में प्रहलाद को बुलाया और पूछा कि वो दिन भर विष्णु का नाम क्यों लेता रहता है। प्रहलाद ने जवाब दिया “पिताश्री , भगवान विष्णु ही सारे जगत के पालनहार है इसलिए मै उनकी पूजा करता हु मै दुसरो की तरफ आपके आदेशो को मानकर आपकी पूजा नही कर सकता हुआ “|

हिरणाकश्यप ने अब शाही पुरोहितो से उसका ध्यान रखने को कहा और विष्णु का जाप बंद कराने को कहा लेकिन कोई फर्क नही पड़ा। इसके विपरीत गुरुकुल में प्रहलाद दुसरे शिष्यों को भी उसकी तरह भगवान विष्णु की आराधना करने के लिए प्रेरित करने लगा।

हिरणाकश्यप ने परेशान होकर फिर प्रहलाद को बुलाया और पूछा “पुत्र तुम्हे सबसे प्रिय क्या है ?”

प्रहलाद ने जवाब दिया “मुझे भगवान विष्णु का नाम लेना सबसे प्रिय लगता है ”

अब हिरणाकश्यप ने पूछा “इस सृष्टि में सबसे शक्तिमान कौन है ?”

प्रहलाद ने फिर उत्तर दिया “तीन लोको के स्वामी और जगत के पालनहार भगवान विष्णु सबसे सर्वशक्तिमान है “
अब हिरणाकश्यप को अपने गुस्से पर काबू नही रहा और उसने अपने पहरेदारो से प्रहलाद को विष देने को कहा। प्रहलाद ने विष का प्याला पूरा पी लिया लेकिन उसकी मृत्यु नही हुयी। सभी व्यक्ति इस चमत्कार को देखकर अचम्भित रह गये। अब हिरणाकश्यप ने आदेश दिया कि प्रहलाद को बड़ी चट्टान से बांधकर समुद्र में फेंक दो लेकिन फिर चमत्कार हुआ और रस्सिया अपने आप खुल गयी। भगवान विष्णु का नाम लेकर वो समुद्र जल से बाहर आ गया। इसके बाद एक दिन जब प्रहलाद भगवान विष्णु के ध्यान में मग्न था तब उस पर उन्मत्त हाथियों के झुण्ड को छोड़ दिया लेकिन वो हाथी उसके पास शांति से बैठ गये।

अब हिरणाकश्यप ने अपनी बहन होलिका और बुलाया और कहा “बहन तुम्हे भगवान से वरदान मिला है कि तुम्हे अग्नि से कोई नुकसान नही होगा , मै तुम्हारे इस वरदान क परखना चाहता हूं , मेरा पुत्र प्रहलाद दिन भर विष्णु का नाम जपता रहता है और मुझसे सामना करता है …मै उसकी सुरत नही देखना चाहता हु …..मै उसे मारना चाहता हु क्योंकि वो मेरा पुत्र नही है …..मै चाहता हु कि तुम प्रहलाद को गोद में बिठाकर अग्नि पर बैठ जाओ ”।

होलिका ने अपने भाई की बात स्वीकार कर ली।
अब होलिका ने ध्यान करते हुए प्रहलाद को अपनी गोद में बिठाया और हिरणाकश्यप को आग लगाने को कहा। हिरणाकश्यप प्रहलाद के भक्ति की शक्ति को नही जानता था। फिर भी आग से प्रतिरक्षित होलिका जलने लग गयी और उसके पापो ने उसका नाश कर दिया। जब आग बुझी तो प्रहलाद उस जली हुयी जगह के मध्य अभी भी ध्यान में बैठा हुआ था जबकि होलिका कही भी नजर नही आयी।

अब हिरणाकश्यप भी घबरा गया और प्रहलाद को ध्यान से खीचते हुए ले गया और चिल्लाते हुए बोला “तुम कहते हो तुम्हारा विष्णु हर जगह पर है , बताओ अभी विष्णु कहा पर है ? वो पेड़ के पीछे है या मेरे महल में है या इस स्तंभ में है बताओ ?

प्रहलाद ने अपने पिता की आँखों में आँखे मिलाकर कहा “हां पिताश्री , भगवान विष्णु हर जगह पर है ”

क्रोधित हिरणाकश्यप ने अपने गदा से स्तम्भ पर प्रहार किया और गुस्से से कहा “तो बताओ वो कहा है “

हिरणाकश्यप दंग रह गया और देखा कि वो स्तम्भ चकनाचूर हो गया और उस स्तम्भ से एक क्रूर पशु निकला जिसका मुंह शेर का और शरीर मनुष्य जैसा था | हिरणाकश्यप उस आधे पशु और आधे मानव को देखकर पीछे हट गया। तभी उस आधे पशु और आधे मानव ने जोर से कहा “मै नारायण का अवतार नरसिंह हु और मै तुम्हारा विनाश करने आया हूं “ ।हिरणाकश्यप उसे देखकर जैसे ही बच कर भागने लगा तभी नरसिंह ने पंजो से उसे जकड़ दिया। हिरणाकश्यप ने अपने आप को छुडाने के बहुत कोशिश की लेकिन नाकाम रहा।

नरसिंह अब हिरणाकश्यप को घसीटते हुए दरवाजे की चौखट तक ले गया जो ना घर में था और ना घर के बाहर और उसे अपनी गोद में बिठा दिया जो ना आकाश में था और ना ही धरती पर और सांझ के समय ना ही दिन और ना ही रात हिरणाकश्यप को अपने पंजो नाहे अस्त्र ना ही शस्त्र से उसका वध कर दिया।हिरणाकश्यप का वध करने के बाद दहाड़ते हुए नरसिंह सिंहासन पर बैठ गया।

सारे असुर ऐसे क्रूर पशु को देखकर भाग गये और देवताओ की भी नरसिंह के पास जाने की हिम्मत नही हुयी। अब बिना डरे हुए प्रहलाद आगे बढ़ा और नरसिंहा से प्यार से कहा “प्रभु , मै जानता हु कि आप मेरी रक्षा के लिए आये हो ” ।

नरसिंह ने मुस्कुराकर जवाब दिया “हां पुत्र मै तुम्हारे लिए ही आया हु , तुम चिंता मत करो तुम्हे इस कथा का ज्ञान नही है कि तुम्हारे पिता मेरे द्वारपाल विजय है उन्हें एक श्राप के कारण पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा और तीन ओर जन्मो के पश्चात उसे फिर वैकुण्ठ में स्थान मिल जाएगा इसलिए तुम्हे चिंता करने की कोई आवश्यकता नही है ”।

प्रहलाद ने अपना सिर हिलाते हुए कहा “प्रभु अब मुझे कुछ नही चाहिए “नरसिंह ने अपना सिर हिलाया और कहा “नही पुत्र तुम जनता पर राज करने के लिए बने हो और तुम अपने जनता की सेवा करने के पश्चात वैकुण्ठ आना “।

प्रहलाद अब असुरो का उदार शासक बन गया जिसने अपने शासनकाल के दौरान प्रसिद्धि पायी और असुरो के पुराने क्रूर तरीके समाप्त कर दिए।

Sanjay Gupta

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पांडुरंग शास्त्रीं आठवलेंचा एक विचार
यत्र योगेश्वरो कृष्णो…
स्वाध्याय परिवार… मॅगसेसे, टेम्पल्टन, महात्मा गांधी, लोकमान्य टिळक, पद्मविभूषण पुरस्कार. असंख्य कार्यकर्त्यांचं पाठबळ.
पांडुरंग शास्त्री आठवले ह्यांच्याबद्दल लिहावं तितकं कमीच आहे !!
त्यांच्या नंतर आजही असंख्य राबते हात देशभर काम करत आहेत.
त्यांचे विचार हा संपूर्ण भारतवर्षाला जोडणारा एक धागा आहे.
पांडुरंग शास्त्री ह्यांच्या विचारात काय बळ आहे? त्यांचे विचार कोणती किमया करू शकतात ?
विनय नावाच्या एका तरुणाचा हा किस्सा आहे. तो मला पहिल्यांदा भेटला तेव्हा गप्पा मारता मारता म्हणाला,
” दादा, मी बोटीवर पोर्टर म्हणून काम करतो. बोट जगभर फिरते. त्यामुळे अनेक महिन्यांनी घरी येतो.
पगार चांगला आहे. फक्त एक प्रॉब्लेम आहे. मी पर्मनंट नाही. त्यामुळे बोटीवर जावं की नाही हा प्रश्न पडतो. जॉब सोडला तरी मुंबईत दुसरा जॉब मिळणार नाही. त्यामुळे काय करावं हा प्रश्न पडला आहे. ”
विनयच्या घरी आई -वडील आणि एक बहीण होती. वडिलांची कंपनी बंद पडल्याने अनेक वर्षे गरिबीत काढावी लागली होती. पण आता विनय चांगली कमाई करत होता. बहिणीचं लग्न लावून देणार होता. पण नोकरीचा भरवसा नव्हता. बोटीवर बोलावलं नाही तर घरीच बसावं लागणार होतं.
त्याने मला हताश होऊन विचारलं
” तुम्हीच सांगा, मी काय करू?”
ह्या प्रश्नाचं उत्तर माझ्याकडेही नव्हतं. फक्त एक उदाहरण मला आठवलं.
” विनय, तू जेवायला बसतोस तेव्हा चार पोळ्या खातोस.
पहिली पोळी खाल्ली तरी भूक भागत नाही. दुसरी खाल्ली तरी पोट भरत नाही.
तिसरी पोळी खाल्यावर थोडी भूक कमी होते आणि चौथ्या पोळीने पोट भरतं.
पण तू आईला असं म्हणू शकतोस का की मला चौथी पोळी आधीच दे.
माझं लगेच पोट भरेल आणि आधीच्या तीन पोळ्या खाण्याचे कष्ट करावे लागणार नाहीत ”
विनय सहजपणे म्हणाला,
” असं कसं होईल. आधीच्या तीन पोळ्या खाव्याचं लागणार!”
मी तोच धागा पकडून पुढे म्हणालो,
” यशही असंच असतं. कष्ट करत, टक्के टोणपे खात, एक एक पायरी चढून जावं लागतं आणि मग यश मिळतं. एकदम यशाकडे जाण्याचा मार्ग नाही. ”
विनय त्यावर काही बोलला नाही. तो बोटीवर गेला आणि पुढे दोन वर्षे काहीच संपर्क झाला नाही.
विनय नोकरी करत असेल का ? की कंपनीने त्याला काढून टाकलं असेल ?
निराश विनयचं पुढे काय झालं ह्याची उत्सुकता मला लागली होती.
आणि एक दिवस विनय अचानक माझा पत्ता शोधत आला. कंपनीने त्याला पर्मनंट केलं होतं आणि विनयने तोवर भाड्याचं घर सोडून नवीन ब्लॉक घेतला होता. आता भविष्याची त्याला चिंता नव्हती.
विनय आनंदाने म्हणाला,
” दादा, तुम्ही पोळीचं उदाहरण दिलं. ते मी लक्षात ठेवलं. मन लावून काम केलं आणि माझे कष्ट पाहून कंपनीने मला पर्मनंटचं लेटर दिलं. ”
विनयला शेवटी भेटलो तेव्हा तो उदास होता आणि आता चेहऱ्यावर आनंद मावत नव्हता… हा आनंद मिळाला होता कष्टाने !
विनय म्हणाला,
” आता तुम्हाला पार्टी द्यायची आहे. बोला कुठे पार्टी देऊ !”
मी विनयला लगेच सांगून टाकलं
“मी जे उदाहरण तुला दिलं होतं ते माझं नव्हतं. पांडुरंग शास्त्री आठवले ह्यांनी दिलेलं ते उदाहरण आहे!
पार्टी द्यायचीच तर वेगळी पार्टी दे. हे उदाहरण तू इतरांना सांग. अडीअडचणीत असणाऱ्यांना सांग.
त्यांनाही ते उपयोगी पडेल.”
त्यावर विनयने ठामपणे होकार दिला.
आता विनयने बहिणीचं लग्न लावलं. स्वतः लग्न केलं आणि तो स्थिर झाला आहे. बोट जाईल तिथे, जगभर फिरतो.
आठवलेंच्या एका विचाराची ही किमया आहे. एका विनयला त्यांनी सकारात्मक -positive विचार दिला.
तुम्ही हे वाचाल तेव्हा एकचं अपेक्षा आहे. ह्या उदाहरणाचा प्रसार करा. त्यात अशी शक्ती आहे की संघर्ष -struggle करणाऱ्याला बळ मिळेल. कष्टाचं मोल कळेल.
आठवलेंचं हे उदाहरण, त्यांचे अनेक विचार हे धन जितकं लुटता येईल तितकं लुटायचं आहे.
कारण जितकं लुटलं जाईल तितकं धन वाढत जाणार आहे.
यत्र योगेश्वरो कृष्णो, यत्र पार्थो धनुर्धर:।
तत्र श्रीर्विजयो, भूतिर्धुवा नीतिर्मतर्मम्।
जिथे श्रीकृष्ण आहे तिथे विजय निश्चित आहे. जिथे आठवलेंचे विचार आहेत तिथे यश निश्चित आहे.
लेखक : निरेन आपटे.

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एक इलाके में एक भले आदमी का निधन हो गया


एक इलाके में एक भले आदमी का निधन हो गया , लोग अर्थी ले जाने को तैयार हुये और जब उठाकर श्मशान ले जाने लगे तो एक आदमी आगे आया और अर्थी का एक पांव पकड़ लिया और बोला के मरने वाले ने मेरे 15 लाख देने है, पहले मुझे पैसे दो फिर उसको जाने दूंगा।

अब तमाम लोग खड़े तमाशा देख रहे हैं, बेटों ने कहा के मरने वाले ने हमें तो कोई ऐसी बात नही कही कि वह कर्जदार है, इसलिए हम नही दे सकतें मृतक के भाइयों ने कहा के जब बेटे जिम्मेदार नही तो हम क्यों दें। अब सारे खड़े है और उसने अर्थी पकड़ी हुई है, जब काफ़ी देर गुज़र गई तो बात घर की औरतों तक भी पहुंच गई।

मरने वाले कि इकलौती बेटी ने जब बात सुनी तो फौरन अपना सारा ज़ेवर उतारा और अपनी सारी नक़द रकम जमा करके उस आदमी के लिए भिजवा दी और कहा कि भगवान के लिए ये रकम और ज़ेवर बेच के उसकी रकम रखो और मेरे पिताजी की अंतिम यात्रा को ना रोको। मै मरने से पहले सारा कर्ज़ अदा कर दूंगी। और बाकी रकम का जल्दी बंदोबस्त कर दूंगी।

अब वह अर्थी पकड़ने वाला शख्स खड़ा हुआ और सारे लोगो से मुखातिब हो कर बोला: असल बात ये है मैने मरने वाले से 15 लाख लेना नही वरन उसका देना है और उसके किसी वारिस को मै जानता नही था तो मैने ये खेल किया। अब मुझे पता चल चुका है के उसकी वारिस एक बेटी है और उसका कोई बेटा या भाई नही है।
🙏🙏🙏
😄😄😄

र के नीखरा

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भगवा ध्वज चातुर्वर्ण्य सनातन धर्म का प्रतीक है।
—– जिसमें ——-
श्वेत -ब्राह्मण
रक्त -क्षत्रिय
पीत -वैश्य
कृष्ण – शूद्र का प्रतीक है!
इनमें से प्रथम तीन के मेल से बनता है- अग्निवर्ण भगवा एवं इसे आसन प्रदान करता है- शूद्रवर्णी बाँस। इस प्रकार स्तम्भ सहित भगवा ध्वज चातुर्वर्ण्य सनातन धर्म का प्रतीक है! यथा-
ब्राह्मणां तु सितो वर्णः क्षत्रियाणां तु लोहितः।
वैश्याणां तु पितोवर्णः शूद्राणामसितस्तथा।।
अस्तु
जो इन्हें पृथक् करता है वह सनातन धर्म के प्रति द्रोह करता है। वोट एवं अंग्रेजी राजनीति की कुत्सा ने इनमें वैमनस्य फैलाकर इसका सामरस्य भंग किया है।
अासुरी नीति को समझकर आदर्श समाज-राज-व्यवस्था- रामराज्य के पोषक वर्णाश्रम धर्म को हृदयंगम करिये और पृथ्वी पर उसे साकार करने की दिशा में मनुस्मृत्यादि विधि-निषेधों के अनुपालन में तत्पर रहकर धर्मयुद्ध करते रहिये।
कालप्रसूत यावत्प्रतीयमान अपायिन (आने जाने वाले) धर्म को त्यागकर स्वभावनियत महाकालरक्षित शाश्वत परम्परानुसारी सनातन धर्म का ही निरंतर अनुसरण कर्तव्य है! यथा-
#आगमापायिनोनित्यस्तांस्तितिक्षस्वभारत।
स्वधर्म छोड़कर संविधान पालन के नाम पर परधर्मो भयावह का अनुसरण मत करें। याद रखें – स्वधर्म छोड़कर यह धरा क्षणभर भी नहीं टिक सकती ।
#धर्मो
रक्षतिसर्वदा
जौं न होत जग जनम भरत को।
सकल धरम धुर धरनि धरत को।।
भगवान को भरत सर्वप्रिय क्यों थे? क्योंकि
रावण के पापाचार से रसातल जा रही धरित्री के धुरी को भरत ने अपने धर्म से ही धारण कर रखा था! हनुमान जी भगवान को भरतसम प्रिय क्यों थे? (तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई) क्योंकि वे धर्म की ध्वजा को सदा धारण करते हैं (हाँथ वज्र अरू ध्वजा विराजे) क्यों भगवान को शिव अतिशय प्रिय हैं – कोउ नहिं शिव समान प्रिय मोरे।
क्योंकि ईश्वर शिव का नाम हीं वृषध्वज (धर्मध्वज) है! और तो और स्वयं भगवान को भी भगवान क्यों कहा जाता है क्योंकि वह – भगवा नयतीति भगवान्। सनातन वर्णाश्रम धर्म की ध्वजा का उन्नयन कर उसे सदा फहराते रहते हैं।
#धर्म
संस्थापनार्थायसंभवामियुगे_युगे।
स्वभाव नियतं धर्म क्या है?
स्वधर्म क्या है?
वर्णधर्म क्या है?
कालधर्म और आपद्धर्म भी क्या है?
निश्चय ही स्वधर्म, वर्णनियतधर्म को छोड़-छोड़कर कभी कोई तो कभी कोई धर्म अपना लेना वर्णधर्म नहीं हो सकता। स्थायी धर्म तो नियत ही हो सकता। जो अनिश्चित एवं सुविधानुसार बदला जा सके यदि वह धर्म हो तो व्यभिचार क्या है? वर्णसंकरत्व क्या है? और धर्मत्याग क्या है?
अस्तु दयानंदी बहकावे में न आकर अपने कर्तव्य का निश्चय करके स्वधर्म पालन में तत्पर हो जाना ही -इहलोक में सुखप्राप्ति एवं परम धाम में स्थिर होने का एकमात्र मार्ग है।
गर्व से भगवत्प्रदत्त वर्ण को उसके वर्णधर्म के साथ स्वीकार कर भगवद्व्यवस्था को स्वीकार करें यही भक्ति है।
स्वधर्म पालन भक्ति है भगवान कहते हैं यही ।
स्ववर्णआश्रम छोड़कर भक्ति करे नादान ही।।
मोर दास कहाइ नर आसा।
करइ तौ कहहु कहा विस्वासा।।
बहुत कहउ का कथा बढ़ाई।
एहि आचरन बस्य मैं भाई।।
अर्थात भगवान के भक्त कहाना चाहते हैं तो उनके आदेश यानी वेद में वर्णावलम्बियों को बताये गये उनके विधि-निषेधों का पालन कीजिए बहुत क्या कहें भगवान स्वधर्म पालन से ही वशीभूत हो जाते हैं! जो उनकी आज्ञाओं का पालन न करते हुए भी अपने को उनका भक्त और वेद शास्त्रों का बड़ा जानकार बनता है, उनसे बड़ा ढ़ोंगी और कोई नहीं है! अंततः –
राष्ट्र पुनः सांस्कृतिक संक्रमणकाल से गुजर रहा है अस्तु धर्मनिष्ठों को पुनः अपने दायित्व को समझकर सचेत रहने की आवश्यकता है ।
ॐ नमो नारायणाय।
श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नमः।।
सनातन धर्मो विजयते।
हर हर हर महादेव।।

Rajesvaranandji