Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

चाहत


चाहत
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देशी घी के लड्डुओं की खुशबू घरआंगन में पसरी हुई थी. तनु एकटक लड्डुओं को देखे जा रही थी. उन्हें उठा कर बाहर फेंक देने का मन हो रहा था.
‘‘मां, लड्डू,’’ मालू, शालू दोनों बहनें मचल उठीं.
‘‘अपने घर भी जब हमारा नन्हा सा भाई आएगा तो लड्डू बंटेंगे, है न मां?’’
बच्चियां पुलक रही थीं. ‘भाई’ शब्द तनु को कहीं गहरे तक बेध गया. कमोबेश सबकुछ तो है उस के पास. छोटा सा घर, प्यार करने वाला सुदर्शन पति, सुंदरप्यारी 2 बेटियां. परंतु नहीं है तो बस एक बेटा. बेटे की चाहत तनु के दिल में गहरे पैठी हुई थी. समय के साथ उस की जड़ें गहरी और मजबूत होती जा रही थीं. काश, एक पुत्र उसे भी होता. बेटे की मां का गौरव उसे भी प्राप्त होता.
प्रत्येक दंपती को संतान की चाहत रहती है पर बेटे की चाहत कुछ ज्यादा ही होती है. तनु भी इस का अपवाद नहीं थी.
‘‘नहीं खाना लड्डू. फेंको,’’ बेटियों के हाथ से लड्डू छीनती अपने ही संकुचित विचारों के दायरे में कैद तनु जोर से चीखी.
बच्चियां सहम गईं. आंखों में आंसू आ गए. बच्चियां अपना अपराध सम झ नहीं पाईं. चुपचाप सिसकती रहीं. रो तो तनु भी रही थी. मालू, शालू तो डांट के कारण रो रही थीं. तनु के रोने का क्या कारण हो सकता है? पड़ोसिन के घर बेटे के जन्म पर ईर्ष्याजनित पीड़ा. स्वयं को पुत्र न होने का दुख और इस संबंध में कुछ कर न पाने की विवशता.
शाम को अतुल दफ्तर से आए तो अति प्रसन्न थे. उन के हाथ में मिठाई का डब्बा था.
‘‘तनु, मैं मामा बन गया और तुम मामी. रैना के बेटा हुआ है. लो, मुंह मीठा करो और पड़ोस में मिठाइयां बांटो,’’ अतुल खुशी से चिल्लाया.
‘‘क्या, बेटा हुआ है?’’ तनु चौंक उठी.
‘‘क्यों, तुम्हें विश्वास नहीं होता? लो, तार पढ़ो,’’ कहते हुए हाथ का पुर्जा पत्नी की ओर बढ़ा दिया.
तनु अनमनी हो उठी.
‘‘हां, सभी के यहां बेटा हो रहा है. दुखिया तो हम ही हैं. बेटे का मुंह देखने के लिए तरस रहे हैं,’’ तनु की ठंडी आवाज सुन अतुल आश्चर्यचकित रह गया.
‘‘ऐसा, क्यों कहती हो? हमारी
मालू, शालू ही हमारे लिए बेटे से कम नहीं हैं. बेटेबेटी में अंतर तुम कब से करने लगीं?’’
‘‘हां, तुम्हें क्या? सुनना तो मु झे पड़ता है,’’ तनु अपना दुखड़ा रोने लगी.
तनु के इस बेमौके फसाद पर अतुल का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. दफ्तर की थकान अतुल पर हावी होने लगी. खुशी के अवसर पर तनु को यह क्या हो गया? कैसी कुंठा पाले है वह अपने मन में? जो वस्तु अपने हाथ में न हो, उस के लिए सिर धुनने से क्या लाभ? देवीदेवता, झाड़फूंक और इस तरह के ढोंग, आडंबरों पर अतुल को जरा भी आस्था नहीं. उस का मन कड़वा हो उठा.
बेटे की चाहत में तनु अपनी सुधबुध खो बैठी. बातबात पर पति से ठनने लगी. सदा हंसनेमुसकराने वाला अतुल अब कुछ झुं झलाया सा रहने लगा.
तनु, जो सुघड़ गृहिणी, ममतामयी जननी और भावुक पत्नी थी, बड़ी उदास रहने लगी. बेवजह बच्चियों को पीट देना, पति से झगड़ पड़ना, छोटीछोटी बातों पर चिढ़ जाना, राई को पर्वत बना कर रोनाधोना उस की दिनचर्या में शामिल हो गया.
घरगृहस्थी की लहलहाती बगिया तहसनहस होने लगी. हंसताखेलता परिवार एक तनाव में जीने लगा. तनु नीमहकीमों और पाखंडी ओ झाओं के घरों के चक्कर लगाने लगी. तनु का ध्यान घरगृहस्थी से बिलकुल उचट गया. सोचती, ‘बिना बेटे की मां की जिंदगी भी कोई माने रखती है?’
जब भी कोई पूछता, ‘आप की
2 बेटियां ही हैं?’ तो वह उबल पड़ती. पूछने वाले को उलटासीधा सुना देती. अतुल भौचक्का था. इस विकट परिस्थिति में तनु को सामान्य बनाने के लिए वह क्या करे, उस की कुछ सम झ में नहीं आता था. तनु के अवचेतन मन में जो बेटे की चाहत थी, वह अब पल्लवितपुष्पित हो कर बाहर की ओर फैलने लगी थी. किसी के घर पुत्र के जन्म की खबर पा कर तनु उत्तेजित हो उठती. सारे घर में कुहराम मचा देती. इस के विपरीत किसी के घर पुत्री के जन्म की खबर पर एक व्यंग्यात्मक मुसकान उस के होंठों पर छा जाती. शायद उस खबर से उसे संतुष्टि मिलती थी.
अतुल उसे किसी मनोचिकित्सक से मिलाना चाहता था परंतु वह तैयार न होती. उलटे, पति से झगड़ा करने लगती. बेटे की चाहत ने एक मनोरोग का रूप ले लिया.
पुत्रप्राप्ति की ललक ने तनु को तरहतरह के अंधविश्वासों के चक्कर में डाल दिया. पाखंडियों के कहने पर वह आएदिन उपवास भी करने लगी. उस का स्वास्थ्य चौपट होने लगा. जो पैसा और श्रम घरगृहस्थी में लगना चाहिए था वह झाड़फूंक करने वालों की भेंट चढ़ने लगा. पुत्ररत्न की प्राप्ति का नुसखा जहां से भी प्राप्त होने की उम्मीद होती, तनु वहां दौड़ पड़ती. लोग उस की इस दीवानगी पर हंसते, पड़ोसिनें पीठ पीछे उस का मजाक उड़ातीं.
तनु को किसी की परवा नहीं थी. उस के जीवन का एकमात्र लक्ष्य था एक बेटे की प्राप्ति. फूल की तरह 2 बेटियों की पूरी जिम्मेदारी तनु पर थी. उसे भुला कर वह बेटा पाने की उम्मीद में तरहतरह के पाखंडों में उल झ गई.
फलस्वरूप बेटियों का स्वास्थ्य गिरने लगा. पढ़ाई में वे पिछड़ने लगीं. पूरा परिवार हीनभावना का शिकार हो उठा. अतुल हैरान हो सोचता, ‘यह कैसी मनोग्रंथि पाल रखी है तनु ने? एक बेटे की चाहत में बेटियों की फौज खड़ी करना कहां की सम झदारी है? इस महंगाई के जमाने में जहां जनसंख्या विस्फोटक स्थिति में पहुंच चुकी है, ज्यादा संतान पैदा करना नैतिकता के विरुद्ध है, दूसरों के मुंह की रोटी छीनने समान है, दूसरों का हक मारना है. छोटा परिवार, सुखी परिवार.’
‘‘हम मालू, शालू की ही उचित परवरिश करें. वे ही बुढ़ापे में हमारी देखभाल करेंगी.’’
‘‘बेटियों के शादीब्याह नहीं करोगे? सिर्फ उन की कमाई खाने का इरादा है?’’ तनु का तीखा उत्तर पा अतुल सम झाने का प्रयत्न करता, ‘‘कमाई तो हम किसी की नहीं खाएंगे. इस बदलते युग में जहां प्रत्येक क्षण जीवनमूल्य परिवर्तित हो रहे हों, किसी का भी आसरा करना अदूरदर्शिता है. रही बेटियों की शादी के बाद की बात, तो समय आने पर उस का भी हल हो जाएगा. वृद्ध होने पर पास की पूंजी काम आएगी और फिर हमतुम एकसाथ रहेंगे ही,’’ और फिर ठहाका लगा कर अतुल वातावरण को सहज करने की कोशिश करता.
क्षणभर के लिए स्मित मुसकान तनु के नाजुक होंठों पर भी छिटकती परंतु अगले ही पल गायब भी हो जाती.
दिन, सप्ताह, महीने बीतने लगे. शहर के दूसरे छोर पर एक पाखंडी महात्मा पधारे थे. जोरशोर से उन का प्रचार हो रहा था. व्यक्तियों की अधूरी मनोकामनाओं को पूरी करने वाले कल्पतरु कहे जा रहे थे वे. उन की शरण में जो भी जाता, मनवांछित फल पा जाता था. भला, ऐसे चमत्कारी महात्मा की खबर तनु के कानों तक कैसे न पहुंचती. तनु की मानसिकता वाले अंधभक्तों के बल पर ही तो पाखंडियों की दुनिया रोशन होती है.
मालू, शालू को स्कूल और अतुल को दफ्तर भेज तनु रिकशे से महात्मा के पास जा रही थी कि रास्ते में अचानक उस की भेंट अपनी स्कूल की एक सहपाठिन से हो गई.
‘‘सरला, तू यहां?’’
‘‘अरे तनु…’’ कह कर दोनों गले मिलीं, ‘‘हां, मेरे पति का तबादला इसी शहर में हुआ है. हम दोनों एक ही दफ्तर में कार्यरत हैं.’’
दोनों पुरानी सहेलियां साथ बिताए कटुमधु प्रसंगों को याद कर पुलकित होने लगीं.
‘‘कहीं जा रही हो क्या?’’ सरला ने पूछा, ‘‘आज मेरी छुट्टी है. यहीं पास ही रहती हूं, चलो न मेरे घर.’’
तनु इनकार न कर सकी. सरला तनु को अपने घर ले गई. तनु भूल गई कि उसे किसी महात्मा के पास जाना है.
घर खूब साफसुथरा, सजासंवरा था. तनु को अपना बिखरा घर याद आया. अंदर कुरसी पर बैठी सरला की मां मटर की फलियां छील रही थीं, ‘‘अरे चाचीजी? आप भी यहीं हैं? नमस्ते,’’ तनु हाथ जोड़े वृद्धा की झुर्रियों का युवावस्था के रूप में सामंजस्य बैठाने लगी.
खानापीना और बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा था.
‘‘मां तुम्हारे साथ ही रहती हैं?’’ एकांत पा कर तनु फुसफुसाई, ‘‘तुम्हारे तो 5 भाई थे न?’’
‘‘हां, थे क्या, हैं. 5 भाइयों की मैं अकेली बहन हूं. लेकिन तुम्हें जान कर आश्चर्य होगा कि मां की देखभाल सही ढंग से करने के लिए कोई बेटाबहू तैयार नहीं हुए. मां की बढ़ती उम्र और लाचारी से द्रवित हो मैं उन्हें अपने पास ले आई. उन की जिंदगी के जो 2-4 वर्ष बाकी हैं, कम से कम आराम से तो कटें?’’
‘‘तुम्हारे पति इस का विरोध नहीं करते? मां बेटी के यहां रह लेती हैं?’’ रूढि़वादी मानसिकता वाली तनु की आंखें आश्चर्य से फैल गईं.
‘‘मैं स्वयं कमाती हूं. इसलिए पति क्यों विरोध करेंगे? और मु झे पढ़ालिखा कर इस योग्य मेरी मां ही ने तो बनाया है. तुम्हें शायद पता नहीं कि पिता की मृत्यु के बाद भाइयों ने मेरी पढ़ाई का कितना विरोध किया था. परंतु दूरदर्शी व दृढ़निश्चयी मेरी मां ने कभी भी बेटी होने का अनुचित दंड मु झे नहीं दिया. जहां तक मां का बेटी के घर रहने का सवाल है तो वृद्ध, शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति को क्या चाहिए? उचित देखभाल, सेवा और प्यारभरे दो मीठे बोल. वह चाहे बेटाबहू दें या फिर बेटीदामाद. बदलती दुनिया में जहां बेटाबहू मांबाप को अवांछित बो झ सम झने लगते हैं, बेटी का मृदु स्पर्श, प्यारभरा आश्वासन उन्हें नया जीवन देता है.
‘‘अब देखो न, मेरी 3 बेटियां हैं, तीनों को मैं ने पढ़ाई के अतिरिक्त हर तरह की शिक्षा देने का निश्चय किया है. जब वे स्वयं सक्षम होंगी तभी तो जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सहजता से मुकाबला कर सकेंगी. वे किसी की आश्रित न रहेंगी तभी तो किसी का सहारा बन सकती हैं. अब वे दिन लद गए जब बेटियों को बेटों से अयोग्य सम झा जाता था. आंखें खोल कर देखो, दुनिया में कौन सा कार्यक्षेत्र है जो लड़कियों की पहुंच से बाहर है?’’
‘‘पर एक बेटा तो होना ही चािहए,’’ तनु की दलील में पहले वाली तुर्शी नहीं थी.
‘‘होना क्यों नहीं चाहिए पर ऐसा तो नहीं कि पुत्र की चाह में बेटियों की संख्या बढ़ाई जाए और उन्हें तुच्छ सम झा जाए. क्या अपनी किसी संतान को मात्र इसलिए प्रताडि़त व निरुत्साहित किया जाए क्योंकि वह बेटी है. जिस बेटी के अभिभावक बाल्यावस्था में ही उस का मनोबल तोड़ देते हैं वही बेटी वयस्क होने पर अंधविश्वासी, कुंठित, डरपोक और बातबात पर पलायन करने वाली साबित होती है. खैर छोड़ो, तुम सुनाओ, तुम्हारी गृहस्थी कैसी चल रही है? कितने बच्चे हैं तुम्हारे?’’ सरला ने तनु से पूछा.
यही प्रश्न तनु की दुखती रग थी. परंतु इस प्रश्न से आज वह आहत नहीं हुई. बेटे और बेटी का बड़ा ही सहज और स्पष्ट चित्रण सरला ने किया था. तनु की आंखों पर छाई धुंध धीरेधीरे छंटने लगी.
उस के पति भी तो 4 भाई हैं. मगर वृद्ध सासससुर की सेवा करने के लिए कोई दंपती हृदय से तैयार नहीं. पुत्र और पुत्रवधुओं की उदासीनता का ही परिणाम है कि वे आज अपनी बेटी के यहां पड़े हुए हैं. कैसा बेटा? कैसी बेटी? संतान को जैसी शिक्षा देंगे उस की मनोवृत्ति वैसी ही होगी.
अपनी बेटियों की कितनी उपेक्षा कर रही है तनु और अजन्मे बेटे के लिए चिंतित है. किंतु उस बेटे की मां बनने वाली बेटी की ऐसी अवहेलना? उस का सोया कर्तव्य जाग उठा. मृगमरीचिका के पीछे भागने वालों को आखिरकार निराश ही होना पड़ता है. पति व बेटियों के प्रति अपनी उदासीनता याद कर वह सिहर उठी. अब बेटे की चाहत समूल नष्ट हो चुकी थी.
‘‘अरे, 3 बज गए? मेरी भी 2 प्यारी प्यारी बेटियां हैं. स्कूल से आती ही होंगी.’’
इतने दिनों से रुका वात्सल्य बेटियों पर लुटाने के लिए तनु व्यग्र हो उठी. अतुल का मनपसंद नाश्ता भी बनाना है, इसलिए बगैर विदा की औपचारिकता पूरी किए वह घर के लिए दौड़ पड़ी.
तनु की भावनाओं से अनजान सरला अपनी सहेली के उतावलेपन को ठगी सी देखती रही.

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एक बार किसी देश का राजा अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने के लिए गाँवो में घूम रहा था l
घूमते-घूमते उसके कुर्ते का बटन टूट गया,उसने अपने मंत्री को कहा कि, पता करो की इस गाँव में कौन सा दर्जी हैं,जो मेरे बटन को सिल सके,

मंत्री ने पता किया ,, उस गाँव में सिर्फ एक ही दर्जी था,, जो कपडे सिलने का काम करता था,,,

उसको राजा के सामने ले जाया गया,, राजा ने कहा,कय़ा तुम मेरे कुर्ते का बटन सी सकते हो,,,

दर्जी ने कहा,यह कोई मुश्किल काम थोड़े ही है,,, उसने मंत्री से बटन ले लिया,,, धागे से उसने राजा के कुर्त ेका बटन फोरन सी दिया,,,

क्योंकि बटन भी राजा के पास था,, सिर्फ उसको अपना धागे का प्रयोग करना था,,,…

राजा ने दर्जी से पूछा कि,, कितने पैसे दू ,,,

उसने कहा, महाराज रहने दो,,, छोटा सा काम था,, उसने मन में सोचा कि, बटन भी राजा के पास था,, उसने तो सिर्फ धागा ही लगाया हैं,,,

राजा ने फिर से दर्जी को कहा, कि…नहीं नहीं बोलो कितनीे माया दू,,,

दर्जी ने सोचा कि,, 2 रूपये मांग लेता हूँ,,,

फिर मन में सोचाकि; कहीं राजा यह ने सोचलें,
कि बटन टाँगने के मुझ से 2 रुपये ले रहा हैं..तो गाँव वालों से कितना लेता होगा.. क्योंकि उस जमाने में २ रुपये की कीमत बहुत होती थी,,,

दर्जी ने राजा से कहा, कि,, महाराज जो भी आपको उचित लगे ,, वह दे दो,,

अब था तो राजा ही,,उसने अपने हिसाब से देना था,, कहीं देने में उसकी पोजीशन ख़राब न हो जाये,,,

उसने अपने मंत्री से कहा कि,, इस दर्जी को २ गाँव दे दों, यह हमारा हुकम है ,,,

कहाँ वो दर्जी सिर्फ २ रुपये की मांग कर रहा था,,
और कहाँ राजा ने उसको २ गाँव दे दिए ,,

जब हम प्रभु पर सब कुछ छोड़ देते हैं, तो वह अपने हिसाब से देता हैं,,
सिर्फ हम मांगने में कमी कर जाते है,,,
देने वाला तो पता नही क्या देना चाहता हैं,,,
इसलिए संत-महात्मा कहते है,,, प्रभु के चरणों पर अपने आपको-अर्पण कर दों,,
फिर देखो उनकी लीला ।

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इमानदारी का फल


(((( इमानदारी का फल ))))
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बहुत समय पहले की बात है, प्रतापगढ़ के राजा को कोई संतान नहीं थी.
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राजा ने फैसला किया कि वह अपने राज्य के किसी बच्चे को ही अपना उत्तराधिकारी चुनेगा.
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इसी इरादे से एक दिन सभी बच्चों को बुलाया गया. राजा ने घोषणा की कि वह वह वहां मौजूद बच्चों में से ही किसी को अपना उत्तराधिकारी चुनेगा.
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उसके बाद उसने सभी बच्चों के बीच एक छोटी सी थैली बंटवा दी…. और बोला,
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“प्यारे बच्चों, आप सभी को जो थैली दी गयी है उसमे अलग-अलग पौधों के बीज हैं. हर बच्चे को सिर्फ एक ही बीज दिया गया है…
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आपको इसे अपने घर ले जाकर एक गमले में लगाना है. 6 महीने बाद हम फिर यहाँ इकठ्ठा होंगे और उस समय मैं फैसला करूँगा कि मेरे बाद प्रतापगढ़ का अगला शाषक कौन होगा ?
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उन्ही लड़कों में ध्रुव नाम का भी एक लड़का था. बाकी बच्चों की तरह वह भी बीज लेकर ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर वापस पहुँच गया.
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माँ की मदद से उसने एक गमला चुना और उसमे और अच्छे से उसकी देखभाल करता.
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दिन बीतने लगे, पर हफ्ते-दो हफ्ते बाद भी ध्रुव के गमले में पौधे का कोई नामोनिशान नहीं था.
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वहीँ अब आस-पास के कुछ बच्चों के गमलों में उपज दिखने लगी थी.
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ध्रुव ने सोचा कि हो सकता है उसका बीज कुछ अलग हो… और कुछ दिनों बाद उसमे से कुछ निकले.
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और ऐसा सोच कर वह पूरी लगन से गमले की देखभाल करता रहा. पर तीन महीने बीत जाने पर भी उसका गमला खाली था.
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वहीं दूसरी ओर बाकी बच्चों के गमलों में अच्छे-खासे पौधे उग गए थे. कुछ में तो फल-फूल भी दिखाई देने लगे थे.
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ध्रुव का खाली गमला देख सभी उसका मजाक बनाते… और उस पर हँसते… यहाँ तक की कुछ बड़े बुजुर्ग भी उसे बेकार में मेहनत करने से मना करते.
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पर बावजूद इसेक ध्रुव ने हार नहीं मानी, और लगातार गमले की देखभाल करता रहा.
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देखते-देखते 6 महीने भी बीत गए और राजा के सामने अपना गमला ले जाने का दिन आ गया.
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ध्रुव चिंतित था क्योंकि अभी भी उसे गमले में कुछ नहीं निकला था. वह मन ही मन सोचने लगा-
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अगर मैं ऐसे ही राजा के सामने चला गया तो सब लोग मुझ पर कितना हँसेंगे… और कहीं राजा भी मुझसे नाराज हो गया और सजा देदी तो…
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किसी को यकीन नहीं होगा कि मैं बीज में रोज पानी डालता था…सब मुझे कितना आलसी समझेंगे!
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माँ ध्रुव की परेशानी समझ रही थी, उसने ध्रुव की आँखों में आँखें डाल कर कहा-
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“नतीजा जो कुछ भी हो, तुम्हे राजा को उसका दिया हुआ बीज लौटाना ही चाहिए !”
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तय दिन सभी बच्चे राजमहल के मैदान में इकठ्ठा हो गए. वहां एक से बढ़कर एक पौधों का अम्बार लगा था…
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रंग-बिरंगे फूलों की खुशबु से पूरा महल सुगन्धित हो गया था.
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ध्रुव का खाली गमला देख बाकी बच्चे उसका मजाक उड़ा रहे थे कि तभी राजा के आने की घोषणा हुई.
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सभी बच्चे शांति से अपनी जगह खड़े हो गए… सब के अन्दर बस एक ही प्रश्न चल रहा था…कि कौन बनेगा राजा ?
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राजा बच्चों के बीच से हो कर आगे बढ़ने लगे… वह जहाँ से भी गुजरते बच्चे तन कर खड़े हो जाते और अपने आप को योग्य उत्तराधिकारी साबित करने की कोशिश करते.
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तमाम खूबसूरत पौधों को देखने के बाद राजा की नज़र ध्रुव पर पड़ी.
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“क्या हुआ ? तुम्हारा गमला खाली क्यों है ?”, राजा ने पूछा.
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“जी मैं रोज इसमें पानी डालता था… धूप दिखाता था… 6 महीने तक मैंने इसकी पूरी देख-भाल की पर फिर भी इसमें से पौधा नहीं निकला..”, ध्रुव कुछ हिचकिचाहट के साथ बोला.
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राजा बाकी गमलों को देखने के लिए आगे बढ़ गया और जब सभी गमले देखने के बाद उसने बच्चों को संबोधित किया-
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“आप लोगों ने खुद को साबित करने के लिए कड़ी कड़ी मेहनत की… ज्यादातर लोग किसी भी कीमत पर राजा बनना चाहते हैं,
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लेकिन एक लड़का है जो यहाँ खाली हाथ ही चला आया…. ध्रुव, तुम यहाँ मेरे पास आओ…”
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सबके सामने इस तरह बुलाया जाना ध्रुव को कुछ अजीब लगा.
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा.
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जैसे ही राजा ने उसका गमला उठाकर बाकी बच्चों को दिखाया…सभी हंसने लगे.
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“शांत हो जाइए!”, राजा ने ऊँची आवाज़ में कहा, “
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6 महीने पहले मैंने आपको बीज दिए थे और अपने-अपने पौधों के साथ आने को कहा था.
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मैंने आपको जो बीज दिए थे वो बंजर थे… आप चाहे उसकी जितनी भी देख-भाल करते उसमे से कुछ नहीं निकलता…
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लेकिन अफ़सोस है कि आप सबके बीच में बस एक ध्रुव ही है जो खाली हाथ यहाँ उपस्थित हुआ है.
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आप सबको उससे सीखना चाहिए… पहले तो उसने ईमानदारी दिखाई कि और लोगों की तरह बीज में से कुछ ना निकले पर दूसरा बीज नहीं लगाया…
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और उसके बाद खाली गमले के साथ यहाँ आने का साहस दिखाया… ये जानते हुए भी कि लोग उस पर कितना हँसेंगे… उसे कितना अपमानित होना पड़ेगा!
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मैं घोषणा करता हूँ कि ध्रुव ही प्रतापगढ़ का अगला राजा होगा. यही उसकी इमानदारी का फल है

Sanjay Gupta

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सुखी रहने का तरीका….
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एक बार की बात है संत तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था उनके समक्ष आया और बोला- गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रहते हैं, ना आप किसी पे क्रोध करते हैं और ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं ? कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए ?

संत बोले – मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य जानता हूँ ! “मेरा रहस्य! वह क्या है गुरु जी?” – शिष्य ने आश्चर्य से पूछा। “तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो” – संत तुकाराम बड़े दुखी होते हुए बोले। कोई और कहता तो शिष्य ये बात मजाक में टाल सकता था, पर स्वयं संत तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था ? शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद ले वहां से चला गया।

उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी किसी पर क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान और पूजा में लगाता। वह उनके पास भी जाता जिससे उसने कभी गलत व्यवहार किया था और उनसे माफ़ी मांगता। देखते-देखते संत की भविष्यवाणी को एक हफ्ते पूरे होने को आये।

शिष्य ने सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु के दर्शन कर आशीर्वाद ले लेते हैं। वह उनके समक्ष पहुंचा और बोला – “गुरुजी, मेरा समय पूरा होने वाला है, कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये!”
“मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है पुत्र । अच्छा, ये बताओ कि पिछले सात दिन कैसे बीते ? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें अपशब्द कहे?”- संत तुकाराम ने प्रश्न किया।

“नहीं – नहीं, बिलकुल नहीं। मेरे पास जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे, मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था ? मैं तो सबसे प्रेम से मिला, और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी मांगी” – शिष्य तत्परता से बोला।
संत तुकाराम मुस्कुराए और बोले, “बस यही तो मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।” मैं जानता हूँ कि मैं कभी भी मर सकता हूँ, इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, और यही मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है। शिष्य समझ गया कि संत तुकाराम ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था ।

वास्तव में हमारे पास भी सात दिन ही बचें हैं : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि, आठवां दिन तो बना ही नहीं है । “तो आइये आज से हम भी परिवर्तन आरम्भ करें।”@Cp

Vijay Khattar

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पहली – पूरा चाँद


कलम : खलील जिब्रान

पहली – पूरा चाँद

पूर्णिमा का चाँद अपनी पूरी दमक के साथ निकला, नगर के सब कुत्तों ने चाँद पर भौंकना प्रारम्भ कर दिया। एक कुत्ता चुप रहा, उसने कहा- ‘शान्ति को उसकी नींद से न जगाओ और चाँद को अपने शोर से भूमि पर न बुलाओ।’

दूसरे कुत्तों ने भौंकना बंद कर दिया। डरावनी खामोशी छा गई परन्तु फिर वही उपदेशक कुत्ता सारी रात शान्ति का उपदेश देता हुआ भौंकता रहा।

दूसरी – पागल

पागलखाने के बाग में मैंने एक युवक को देखा, जिसका सुन्दर मुख पीला हो रहा था, जिस पर हैरानी की स्याही चढ़ी हुई थी। मैं उसके पास जाकर बेंच पर बैठा और पूछा- तुम यहाँ कैसे?
उसने चौंक कर मेरी तरफ देखा और कहा- ‘यहाँ आपका यह प्रश्न यद्यपि व्यर्थ है, फिर भी उत्तर अवश्य दूँगा।’
वह कहने लगा- ‘मेरे पिता की यह इच्छा थी कि मैं ठीक उनकी प्रतिमूर्ति बनूँ और यही इच्छा मेरे चाचा की थी। मेरी माँ की भी यह इच्छा थी कि मैं अपने स्वर्गीय नाना के चरण चिन्हों पर चलूँ। मेरी बहन अपने निर्भीक नाविक पति को मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ आदर्श समझती थी। मेरा भाई सोचता था कि मुझे और कुछ नहीं वरन उनके समान एक नामी पहलवान बनना चाहिए।

‘और यही हाल मेरे गुरुओं का था, न्याय, सँगीत और तर्क के अध्यापकों का, सबकी यह इच्छा थी और बड़े परिश्रम से इस प्रयत्न में थे कि वे मुझमें अपने गुण इस प्रकार प्रतिबिम्बित देखें, जिस प्रकार दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देखते हैं।
‘और मैं यहाँ इसलिए चला आया कि यहाँ वहाँ से अधिक शान्ति है और यहाँ मैं कम से कम ‘मैं’ तो बन सकता हूँ।’

फिर वह एकाएक मेरी तरफ मुड़ते हुए बोला- ‘परन्तु आप यहाँ कैसे पहुँचे? उच्च शिक्षा के कारण या अच्छी संगति के कारण?’ मैं भौचक्का रह गया। मैंने कहा- ‘मैं तो केवल भेंट करने वाला मुलाकाती हूँ।’
वह बोला, ‘अच्छा अब समझा, आप उनमें से हैं, जो इस दीवार के उधर वाले पागलखाने में रहते हैं!’

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पंजाब के जालंधर में उत्तर की तरफ रेलवे स्टेशन से सिर्फ 1 किमी की दुरी पर माँ भगवती का यह शक्तिपीठ स्थापित है | यह मंदिर माँ त्रिपुरमालिनी देवी मंदिर और देवी तालाब मंदिर नाम से जाना जाता है | यह मंदिर भी माँ सती के 51 शक्तिपीठो में से के है |

कहा जाता है की माँ सती का इस जगह बाया वक्ष ( स्तन ) गिरा था और इस शक्तिपीठ की मान्यता हो गयी थी | यहाँ की शक्ति ‘त्रिपुरमालिनी’ तथा भैरव ‘भीषण’ हैं। हजारो भक्त माँ की कृपा पाने दर्शन हेतु दुर दुर से यहा आते है | इस मंदिर में शिवा की भीसन मानकर पूजा की जाती है | मंदिर का शिखर सोने से बनाया गया है | समय समय पर मंदिर परिसर में माँ के जगरात्रे और नवरात्रो में बड़ी धूम धाम से मेला भरता है | मंदिर बहूत सारी मन मोहक झांकिया भी त्यौहारो पर लगाता है जिसे देखने भक्तो की अपार भीड दुर दराज से आती है |

माँ त्रिपुरमालिनी देवी मंदिर परिसर :

कहा जाता है की यह मंदिर 200 साल पुराना है | इसे ‘स्तनपीठ’ भी कहा जाता है जिसमे देवी का वाम स्तन कपडे से ढका रह्ता है और धातु से बना मुख के दर्शन भक्तो को कराये जाते है | यह मंदिर तालाब के मध्य स्तिथ है जहा जाने के लिए 12 फ़ीट चोड़ी जगह है | मुख्य भगवती के मंदिर में तीन मूरत है | माँ भगवती के साथ माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती विराजमान है | भक्त इस मंदिर में इन देवियो की मूरत के परिकर्मा देते है | पूरा मंदिर परिसर लग भग 400 मीटर में फैला हुआ है | मंदिर परिसर में भक्तो के आराम करने की सुविधा भी है |

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🚩 जानिए इतिहास क्यों मनाते है 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस

January 25, 2018
http://azaadbharat.org

🚩 गणतन्त्र दिवस भारत का राष्ट्रीय पर्व है जो प्रति वर्ष 26 जनवरी को मनाया जाता है। इसी दिन सन 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया था।

🚩 #26जनवरी और 15 अगस्त दो ऐसे राष्ट्रीय दिवस हैं जिन्हें हर भारतीय खुशी और उत्साह के साथ मनाता है।

🚩हमारी #मातृभूमि भारत लंबे समय तक ब्रिटिश शासन की गुलाम रही जिसके दौरान भारतीय लोग ब्रिटिश शासन द्वारा बनाये गये कानूनों को मानने के लिये मजबूर थे, भारतीय #स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा लंबे संघर्ष के बाद अंतत: 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली।

🚩सन 1929 के दिसंबर में #लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ उसमें प्रस्ताव पारित कर इस बात की घोषणा की गई कि यदि अंग्रेज सरकार 26 जनवरी 1930 तक भारत को स्वायत्तयोपनिवेश(डोमीनियन) का पद नहीं प्रदान करेगी, जिसके तहत भारत ब्रिटिश साम्राज्य में ही स्वशासित एकाई बन जाता, तो भारत अपने को पूर्णतः स्वतंत्र घोषित कर देगा।

🚩26 जनवरी 1930 तक जब #अंग्रेज #सरकार ने कुछ नहीं किया तब कांग्रेस ने उस दिन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के निश्चय की घोषणा की और अपना सक्रिय #आंदोलन आरंभ किया। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा। तदनंतर स्वतंत्रता प्राप्ति के वास्तविक दिन 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार किया गया।

🚩26 जनवरी का महत्व बनाए रखने के लिए विधान निर्मात्री सभा (कांस्टीट्यूएंट असेंबली) द्वारा लगभग ढाई साल बाद भारत ने अपना #संविधान लागू किया और खुद को लोकतांत्रिक गणराज्य के रुप में घोषित किया। लगभग 2 साल 11 महीने और 18 दिनों के बाद 26 जनवरी 1950 को हमारी संसद द्वारा भारतीय संविधान को पास किया गया। खुद को संप्रभु, #लोकतांत्रिक, #गणराज्य घोषित करने के साथ ही भारत के लोगों द्वारा 26 जनवरी “गणतंत्र दिवस” के रुप में मनाया जाने लगा।

🚩देश को गौरवशाली गणतंत्र #राष्ट्र बनाने में जिन देशभक्तों ने अपना बलिदान दिया उन्हें 26 जनवरी दिन याद किया जाता और उन्हें श्रद्धाजंलि दी जाती है।

🚩गणतंत्र दिवस से जुड़े कुछ तथ्य:

🚩1- पूर्ण #स्वराज दिवस (26 जनवरी 1930) को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान 26 जनवरी को लागू किया गया था।

🚩2- 26 जनवरी 1950 को 10:18 मिनट पर भारत का संविधान लागू किया गया था।

🚩3- गणतंत्र दिवस की पहली #परेड 1955 को दिल्ली के राजपथ पर हुई थी।

🚩4- भारतीय संविधान की दो प्रत्तियां जो हिन्दी और अंग्रेजी में हाथ से लिखी गई।

🚩5- भारतीय संविधान की #हाथ से लिखी मूल प्रतियां संसद भवन के पुस्तकालय में सुरक्षित रखी हुई हैं।

🚩6- भारत के पहले #राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने गवर्नमैंट हाऊस में 26 जनवरी 1950 को शपथ ली थी।

🚩7- गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं ।

🚩8- 26 जनवरी को हर साल 21 #तोपों की सलामी दी जाती है।

🚩9- 29 जनवरी को विजय चौक पर बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी का आयोजन किया जाता है जिसमें भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना के बैंड हिस्सा लेते हैं। यह दिन #गणतंत्र दिवस के समारोह के समापन के रूप में मनाया जाता है।
राष्ट्रध्वज एवं राष्ट्रगीत का सम्मान करें !

🚩 राष्ट्रप्रतीकों का सम्मान करें, राष्ट्राभिमान बढाएं !

  1. राष्ट्रध्वज को ऊंचे स्थान पर फहराएं ।
  2. प्लास्टिक के राष्ट्रध्वजों का उपयोग न करें ।
  3. ध्यान रखें कि राष्ट्रध्वज नीचे अथवा कूडे में न गिरे ।
  4. राष्ट्रध्वज का उपयोग शोभावस्तु के रूप में अथवा पताका एवं खिलौने के रूप में न करें ।
  5. जिन वस्त्रों पर राष्ट्रध्वज छपा हुआ है, ऐसे वस्त्र न पहनें अथवा अपने मुख पर भी ध्वज चित्रित न करवाएं ।
  6. राष्ट्रगीत के समय बातें न करें, सावधान मुद्रा में खडे रहें ।
Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक आदमी ने एक बहुत ही खूबसूरत लड़की से शादी की


एक बार जरूर पढ़े. ..

एक आदमी ने एक बहुत ही खूबसूरत लड़की से शादी की.

शादी के बाद दोनो की ज़िन्दगी बहुत प्यार से गुजर रही थी. वह उसे बहुत चाहता था और उसकी खूबसूरती की हमेशा तारीफ़ किया करता था. लेकिन कुछ महीनों के बाद लड़की चर्मरोग (skin Disease) से ग्रसित हो गई और धीरे-धीरे उसकी खूबसूरती जाने लगी. खुद को इस तरह देख उसके मन में डर समाने लगा कि यदि वह बदसूरत हो गई, तो उसका पति उससे नफ़रत करने लगेगा और वह उसकी नफ़रत बर्दाशत नहीं कर पाएगी.

इस बीच एक दिन पति को किसी काम से शहर से बाहर जाना पड़ा. काम ख़त्म कर जब वह घर वापस लौट रहा था, उसका accident हो गया. Accident में उसने अपनी दोनो आँखें खो दी. लेकिन इसके बावजूद भी उन दोनो की जिंदगी सामान्य तरीके से आगे बढ़ती रही.

समय गुजरता रहा और अपने चर्मरोग के कारण लड़की ने अपनी खूबसूरती पूरी तरह गंवा दी. वह बदसूरत हो गई. लेकिन अंधे पति को इस बारे में कुछ भी पता नहीं था. इसलिए इसका उनके खुशहाल विवाहित जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. वह उसे उसी तरह प्यार करता रहा.

एक दिन उस लड़की की मौत हो गई. पति अब अकेला हो गया था. वह बहुत दु:खी था. वह उस शहर को छोड़कर जाना चाहता था. उसने अंतिम संस्कार की सारी क्रियाविधि पूर्ण की और शहर छोड़कर जाने लगा. तभी एक आदमी ने पीछे से उसे पुकारा और पास आकर कहा, “अब तुम बिना सहारे के अकेले कैसे चल पाओगे? इतने साल तो तुम्हारी पत्नि तुम्हारी मदद किया करती थी.”

पति ने जवाब दिया, “दोस्त! मैं अंधा नहीं हूँ. मैं बस अंधा होने का नाटक कर रहा था. क्योंकि यदि मेरी पत्नि को पता चल जाता कि मैं उसकी बदसूरती देख सकता हूँ, तो यह उसे उसके रोग से ज्यादा दर्द देता.
इसलिए मैंने इतने साल अंधे होने का दिखावा किया. वह बहुत अच्छी पत्नि थी.
मैं बस उसे खुश रखना चाहता था.”
..

सीख–खुश रहने के लिए हमें भी एक दूसरे की कमियो के प्रति आखे वंद कर लेनी चाहिए..
और उन कमियो को नजरन्दाज कर देना चाहिए ||||

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बाबर और राणा सांगा में भयानक युद्ध चल रहा था । बाबर ने युद्ध में पहली बार तोपों का इस्तेमाल किया था ।

उन दिनों युद्ध केवल दिन में लड़ा जाता था । शाम के समय दोनों तरफ के सैनिक अपने अपने शिविरों
में आराम करते थे । फिर सुबह युद्ध होता था ।

लड़ते लड़ते शाम हो चली थी , दोनों तरफ के सैनिक अपने शिविरों में भोजन तैयार कर रहे थे ।

बाबर अपने शिविर के बाहर खड़ा दुश्मन सेना के कैम्प को देख रहा था । तभी उसे राणा सांगा की सेना के शिविरों से कई जगह से धुँआ उठता दिखाई दिया । बाबर को लगा कि दुश्मन के शिविर में आग लग गई है । उसने तुरंत अपने सेनापति मीर बाकी को बुलाया और पूछा,

“देखो दुश्मन के शिविर में आग लग गई है क्या ? शिविर में पचासों जगहों से धुँआ निकल रहा हैं ।”

सेनापति ने अपने गुप्तचरों को आदेश दिया –

“जाओ पता लगाओ कि दुश्मन के सैन्य शिविर से इतनी बड़ी संख्या में इतनी जगहों से धुँओ का गुब्बार क्यों निकल रहा है ?”

गुप्तचर कुछ देर बाद लौटे । उन्होंने बताया,

“हुजूर दुश्मन सैनिक सब हिन्दू हैं ।वो एक साथ एक जगह बैठकर खाना नहीं खाते ।सेना में कई जात के सैनिक है जो एक दूसरे का छुआ नहीं खाते । इसलिए सब अपना- अपना भोजन अलग अलग बनाते हैं, अलग- अलग खाते हैं ।एक दूसरे का छुआ पानी तक नहीं पीते।”

यह  सुनकर बाबर खूब जोर से हँसा काफी देर हँसने के बाद उसने अपने सेनापति से कहा,

“मीर बाकी फ़तेह हमारी ही होगी । ये क्या हमसे लड़ेंगे? जो सेना एक साथ मिल बैठकर खाना तक नहीं खा सकती, वो एक साथ मिलकर दुश्मन के खिलाफ कैसे लड़ेगी ?”

बाबर सही था । तीन दिनों में राणा सांगा की सेना मार दी गई और बाबर ने मुग़ल शासन की नींव रखी । लेकिन हिन्दू आज भी उतने ही बेवकूफ़ हैं, जितने पहले थे ।

विषय आज भी चिन्तनीय है !

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अथर्व वेद के श्लोक में

मातृभूमि का स्पष्ट उल्लेख है।

रत्नाकराधौतपदां

हिमालयकिरीटिनीम्‌।

ब्रह्मराजर्षिरत्नाढ्याम्

वंदेभारतमातरम्‌॥

रत्नों का भंडार सागर

जिसके चरण पखारता हो,

पर्वतराज हिमालय जिसका

मुकुट हो,ब्रह्मर्षि और राजर्षि

जिसके प्रतिष्ठित पुत्र हों,

उस भारत माता को नमन–

भारत अत्यंत पौराणिक

नाम है !

सनातन धर्मी हिन्दुओं का

निवास स्थान भारत है।

हिन्दू स्थान या हिंदुस्तान

परवर्ती काल का नाम

करण है।

भायं रत: भारत: !

अर्थात वह पावन भूमि जहां

के लोग ज्ञान(भायं)प्राप्त करने

एवं ज्ञान बांटने में सदा रत(रत:)

रहते है,वह पावन भूमि भारत है।

जहाँ ज्ञान की देवी को माता

भारती,माता सरस्वती के रूप

में पूजा जाता है।

”तेरा वैभव अमर रहे माँ,

हम दिन चार रहे ना रहें”

==========

भारतवर्ष का नाम “भारतवर्ष”

कैसे पड़ा ?

हमारे लिए यह जानना बहुत

ही आवश्यक है भारतवर्ष

का नाम भारतवर्ष कैसे पड़ा ?

एक सामान्य जनधारणा है

कि महाभारत एक कुरूवंश

में राजा दुष्यंत और उनकी

पत्नी शकुंतला के प्रतापी

पुत्र भरत के नाम पर इस

देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।

हमने शकुंतला और दुष्यंत

पुत्र भरत के साथ अपने

देश के नाम की उत्पत्ति

को जोड़कर अपने इतिहास

को पश्चिमी इतिहासकारों की

दृष्टि से पांच हजार साल के

अंतराल में समेटने का प्रयास

किया है।

लेकिन वही पुराण इससे

अलग कुछ दूसरी साक्षी

प्रस्तुत करता है।

इस ओर हमारा ध्यान

नही गया,जबकि पुराणों

में इतिहास ढूंढ़कर अपने

इतिहासके साथ और अपने

आगत के साथ न्याय करना

हमारे लिए बहुत ही

आवश्यक था।

तनिक विचार करें इस

विषय पर:-

आज के वैज्ञानिक इस बात

को मानते हैं कि प्राचीन काल

में सात भूभागों में अर्थात

महाद्वीपों में भूमण्डल को

बांटा गया था।

लेकिन सात महाद्वीप

किसने बनाए क्यों बनाए

और कब बनाए गये।

इस ओर अनुसंधान नही

किया गया।

अथवा कहिए कि जान पूछ

कर अनुसंधान की दिशा मोड़

दी गयी।

लेकिन वायु पुराण इस ओर

बड़ी रोचक कहानी हमारे

सामने प्रस्तुत करता है।

वायु पुराण की कहानी के

अनुसार त्रेता युग के प्रारंभ

में अर्थात अब से लगभग

22 लाख वर्ष पूर्व स्वयम्भुव

मनु के पौत्र और प्रियव्रत

के पुत्र ने इस भरत खंड

को बसाया था।

सप्तद्वीपपरिक्रान्तं

जम्बूदीपं निबोधत।

अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं

कन्यापुत्रं महाबलम।।

प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं

जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।

तस्य पुत्रा बभूवुर्हि

प्रजापतिसमौजस:।

ज्येष्ठो नाभिरिति

ख्यातस्तस्य किम्पुरूषो

अनुज:।।

नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि

हिमाह्व तन्निबोधत।

प्रियव्रत का अपना कोई पुत्र

नही था इसलिए उन्होंने अपनी

पुत्री का पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद

लिया था।

जिसका लड़का नाभि था,

नाभि की एक पत्नी मेरू

देवी से जो पुत्र पैदा हुआ

उसका नाम ऋषभ था।

इस ऋषभ का पुत्र भरत था।

इसी भरत के नाम पर भारतवर्ष

इस देश का नाम पड़ा।

उस समय के राजा प्रियव्रत

ने अपनी कन्या के दस पुत्रों

में से सात पुत्रों को संपूर्ण

पृथ्वी के सातों महाद्वीपों

का अलग-अलग राजा

नियुक्त किया था।

राजा का अर्थ इस समय

धर्म,और न्यायशील राज्य

के संस्थापक से लिया जाता था।

राजा प्रियव्रत ने जम्बू द्वीप

का शासक अग्नीन्ध्र को

बनाया था।

बाद में भरत ने जो अपना

राज्य अपने पुत्र को दिया

वह भारतवर्ष कहलाया।

भारतवर्ष का अर्थ है भरत

का क्षेत्र।

भरत के पुत्र का नाम

सुमति था।

इस विषय में वायु पुराण

के निम्न श्लोक पठनीय हैं—

सप्तद्वीपपरिक्रान्तं

जम्बूदीपं निबोधत।

अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं

कन्यापुत्रं महाबलम।।

प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं

जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।

तस्य पुत्रा बभूवुर्हि

प्रजापतिसमौजस:।

ज्येष्ठो नाभिरिति

ख्यातस्तस्य किम्पुरूषो

अनुज:।।

नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि

हिमाह्व तन्निबोधत।

(वायु 31-37,38)

इन्हीं श्लोकों के साथ कुछ

अन्य श्लोक भी पठनीय हैं

जो वहीं प्रसंगवश उल्लिखित हैं।

हम अपने घरों में अब भी कोई

याज्ञिक कार्य कराते हैं तो उसमें

पंडित जी संकल्प कराते हैं।

उस संकल्प मंत्र को हम बहुत

हल्के में लेते हैं,या पंडित जी

की एक धार्मिक अनुष्ठान की

एक क्रिया मानकर छोड़ देते हैं।

लेकिन उस संकल्प मंत्र में

हमें वायु पुराण की इस साक्षी

के समर्थन में बहुत कुछ मिल

जाता है।

जैसे उसमें उल्लेख आता है-

जम्बू द्वीपे भारतखंडे

आर्याव्रत देशांतर्गते….।

ये शब्द ध्यान देने योग्य हैं।

इनमें जम्बूद्वीप आज के

यूरेशिया(यूरोप एवं एशिया)

के लिए प्रयुक्त किया गया है।

पृथ्वी का शेष भाग पाताल

लोक(अमेरिका,अफ्रीका,

आस्ट्रेलिया)कहा जाता था।

इस जम्बू द्वीप में भारत

खण्ड अर्थात भरत का

क्षेत्र अर्थात ‘भारतवर्ष’

स्थित है,जो कि आर्यावर्त्त

(आर्य अर्थात श्रेष्ठ जनो द्वारा

आवर्त्त क्षेत्र) कहलाता है।

इस संकल्प के द्वारा हम

अपने गौरवमयी अतीत

के गौरवमयी इतिहास का

व्याख्यान कर डालते हैं।

अब प्रश्न आता है शकुंतला

और दुष्यंत के पुत्र भरत

से इस देश का नाम क्यों

जोड़ा जाता है ?

इस विषय में हमें ध्यान देना

चाहिए कि महाभारत नाम

का ग्रंथ मूलरूप में जय नाम

का ग्रंथ था,जो कि बहुत छोटा

था लेकिन बाद में बढ़ाते बढ़ाते

उसे इतना विस्तार दिया गया

कि राजा विक्रमादित्य को यह

कहना पड़ा कि यदि इसी प्रकार

यह ग्रंथ बढ़ता गया तो एक दिन

एक ऊंट का बोझ हो जाएगा।

बौद्ध शासकों के शासनकाल

बुद्ध को पूज्य एवं सनातनियों

में ग्राह्य बनाने के लिए हमारे

वेद,पुराणों अनेक घाल मेल

किये गए।

तदनुरूप इस ग्रंथ में भी

अनेक घाल मेल किये हुए।

अत: शकुंतला,दुष्यंत के पुत्र

भरत से इस देश के नाम की

उत्पत्ति का प्रकरणजोडऩा

उसी घालमेल का परिणाम

हो सकता है।

जब हमारे पास साक्षी लाखों

साल पुरानी है और आज का

विज्ञान भी यह मान रहा है कि

धरती पर मनुष्य का आगमन

करोड़ों साल पूर्व हो चुका था,

तो हम पांच हजार वर्ष पुरानी

किसी कहानी पर क्यों विश्वास

करें ?

दूसरी बात हमारे संकल्प मंत्र

में पंडित जी हमें सृष्टि सम्वत

के विषय में भी बताते हैं कि

अब १९७२९४९११८ वां वर्ष

चल रहा है।

बात तो हम एक

१९७२९४९११७ वर्ष पुरानी

करें और अपना इतिहास पश्चिम

के लेखकों की कलम से केवल

पांच हजार साल पुराना पढ़ें

या मानें तो यह आत्मप्रवंचना

के अतिरिक्त और क्या है ?

【(इस ब्रह्माण्ड की कुल आयु

= २.४ महायुग + ४२६ महायुग

  • २७ महायुग + ३८८८००० वर्ष,

= ४५५.४ महायुग + ३८८८००० वर्ष,

= ४५५.४ × ४३२००००

  • ३८८८००० वर्ष

{चूँकि 1 महायुग

=४३२०००० }

=१९७२९४४००० वर्ष

(द्वापर युग की समाप्ति तक)

इस कलि के ५११७ वर्ष बीत

चुके है यदि उन्हें भी जोड़े

तो ब्रह्माण्ड की कुल आयु

=१९७२९४४००० वर्ष + ५११७

= १९७२९४९११७ वर्ष !)】

★#सन्दर्भ_सूर्यपुराण★

जब इतिहास के लिए हमारे

पास एक से एक बढ़कर साक्षी

हो और प्रमाण भीउपलब्ध हो,

साथ ही तर्क भी हों तो फिर उन

साक्षियों,प्रमाणों और तर्कों के

आधार पर अपना अतीत अपने

आप खंगालना हमारी जिम्मेदारी

बनती है।

हमारे देश के बारे में वायु पुराण

में ही उल्लिखित है कि हिमालय

पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात

क्षेत्र भारतवर्ष है।

इस विषय में देखिए वायु

पुराण क्या कहता है—-

हिमालयं दक्षिणं वर्षं

भरतायन्यवेदयत्।

तस्मात्तद्भारतं वर्ष

तस्य नाम्ना बिदुर्बुधा:।।

★हमने शकुंतला और दुष्यंत

पुत्र भरत के साथ अपने देश

के नाम की उत्पत्ति को जोड़

कर अपने इतिहास को पश्चिमी

इतिहासकारों की दृष्टि से पांच

हजार साल के अंतराल में

समेटने का प्रयास किया है।★

यदि किसी पश्चिमी इतिहास

कार को हम अपने बोलने में

या लिखने में उद्घ्रत कर दें तो

यह हमारे लिये शान की बात

समझी जाती है,और यदि हम

अपने विषय में अपने ही किसी

लेखक कवि या प्राचीन ग्रंथ

का संदर्भ दें तो रूढि़वादिता

का प्रमाण माना जाता है।

यह सोच सिरे से ही गलत है।

अब आप समझें राजस्थान

के इतिहास के लिए सबसे

प्रमाणित ग्रंथ कर्नल टाड

का इतिहास माना जाता है। ?

हमने यह नही सोचा कि

एक विदेशी व्यक्ति इतने

पुराने समय में भारत में

आकर साल,डेढ़ साल रहे

और यहां का इतिहास तैयार

कर दे,यह कैसे संभव है ?

विशेषत: तब जबकि उसके

आने के समय यहां यातायात

के अधिक साधन नही थे और

वह राजस्थानी भाषा से भी

परिचित नही था।

तब ऐसी परिस्थिति में उसने

केवल इतना काम किया कि

जो विभिन्न रजवाड़ों के संबंध

में इतिहास संबंधी पुस्तकें

उपलब्ध थीं उन सबको

संहिताबद्घ कर दिया।

इसके बाद राजकीय संरक्षण

में करनल टाड की पुस्तक

को प्रमाणिक माना जाने लगा।

जिससे यह धारणा रूढ हो गयीं

कि राजस्थान के इतिहास पर

कर्नल टाड का एकाधिकार है।

ऐसी ही धारणाएं हमें अन्य

क्षेत्रों में भी परेशान करती हैं।

अपने देश के इतिहास के बारे

में व्याप्त भ्रांतियों का निवारण

करना हमारा ध्येय होना चाहिए।

अपने देश के नाम के विषय

में भी हमें गंभी चिंतन करना

चाहिए,इतिहास मरे गिरे लोगों

का लेखाजोखा नही है,

जैसा कि इसके विषय में माना

जाता है,बल्कि इतिहास अतीत

के गौरवमयी पृष्ठों और हमारे

न्यायशील और धर्मशील

राजाओं के कृत्यों का

वर्णन करता है।

‘वृहद देवता’ ग्रंथ में कहा गया

है कि ऋषियों द्वारा कही गयी

पुराने काल की बात इतिहास है।

ऋषियों द्वारा हमारे लिये जो

मार्गदर्शन किया गया है उसे

तो हम रूढिवाद मानें और

दूसरे लोगों ने जो हमारे लिये

कुछ कहा है उसे सत्य मानें,

यह ठीक नही।

इसलिए भारतवर्ष के नाम

के विषय में व्याप्त भ्रांति का

निवारण किया जाना अत्यंत

आवश्यक है।

इस विषय में जब हमारे पास

पर्याप्त प्रमाण हैं तो भ्रांति के

निवारण में काफी सहायता

मिल जाती है।

इस सहायता के आधार पर

हम अपने अतीत का गौरव

मयी गुणगान करें,तो सचमुच

कितना आनंद आएगा ?

भारत को ‘माता’ क्यों

कहते हैं,’पिता’ क्यों नहीं !!

देश की आज़ादी से पहले और

बाद के वर्षों में भी हम अक्सर

‘भारत माता की जय’ का नारा

सुनते और लगाते आए हैं।

लेकिन क्या कभी आपने

सोचा है कि भारत को ‘‘माता’’

क्यों कहते हैं,”पिता’’ क्यों नहीं

और ‘भारत-माता’ शब्द कहां

से आया ?

कहां से आया ‘भारतमाता’ शब्द ?

हम भारतवासी ज्ञानवान,

ज्ञानशील पुत्र को उत्पन्न

करने वाली भारतमाता

के पुत्र हैं अतः माँ भारती

हमारी माता हैं।

‘आदि काल से ही भारत

को मातृभूमि कहा गया है।

इसके साक्ष्य वेदों में भी

मिलते हैं।

अथर्व वेद के श्लोक में

मातृभूमि का स्पष्ट उल्लेख है।

रत्नाकराधौतपदां

हिमालयकिरीटिनीम्‌

ब्रह्मराजर्षिरत्नाढ्याम्

वंदेभारतमातरम्‌ ॥

रत्नों का भंडार सागर जिसके

चरण पखारता हो,पर्वतराज

हिमालय जिसका मुकुट हो,

ब्रह्मर्षि और राजर्षि जिसके

प्रतिष्ठित पुत्र हों,

उस भारत माता को नमन !

हालांकि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय

द्वारा लिखित वंदेमातरम ने

मातृभूमि की अवधारण को

और बल दिया।’

वहीं वर्तमान समय का पहला

लिखित साक्ष्य 19 वीं सदी के

प्रसिद्ध बांगला लेखक और

साहित्यकार भूदेव मुखोपाध्याय

के लिखे व्यंग्य –

”उनाबिम्सा पुराणा’

(‘Unabimsa Purana’)

या ‘उन्नीसवें पुराण’(‘The

Nineteenth Purana’)

में मिलता है।

लेख का प्रकाशन सन

1866 में किया गया था।

इस लेख में ‘‘भारत-माता’’ के

लिए ‘आदि-भारती’ शब्द का

उपयोग किया गया था।

भारत को ‘माता’ क्यों कहा

जाने लगा ?

भारत को ‘माता’ कहकर

संबोधित करने का श्रेय

बंगला लेखक किरण चंद्र

बनर्जी को भी जाता है।

1873 में इनके नाटक ‘भारत-

माता’ में भारत के लिए ‘माता’

शब्द का प्रयोग किया गया था।

आज़ादी से पहले बंगाल में

दुर्गा पूजा लोगों को एकजुट

करने और स्वराज(आजादी)

पर चर्चा करने का एक माध्यम

बनी हुई थी।

इस दौरान बंगाल के लेखकों,

साहित्यकारों और कवियों के

लेखों और रचनाओं में मां दुर्गा

का गहरा प्रभाव रहा और इनके

द्वारा लिखे गए लेखों,नाटकों

और कविताओं में भी भारत

को दुर्गा की तर्ज पर ‘मां’ और

‘‘मातृभूमि’’ कहकर संबोधित

किया जाने लगा।

#साभारसंकलित

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,

जयति पुण्य भूमि भारत,,,

सदा सर्वदा सुमंगल,,,

वंदेभारतमातरम,,,

जय भवानी,,,

जय श्री राम