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ડેલીયોમાં ડાયરો થાતો નથી, એટલે હું ગામડે જાતો નથી

રાહડાં ગીતો ને છંદો ગુમ થયાં, રસ ભરી વાતો નથી ને રાતો નથી
ગામડા ને શહેર ભરખી ગયું, ગોંદરે જણ એકેય દેખાતો નથી

આમ્રવન બદલાઈ ગયું છે ફલેટમાં, કોકિલા નો સાદ સંભળાતો નથી
રાયડાના ફૂલ પીળાં કયાં ગયાં? ખાખરા નો રંગ પણ રાતો નથી

ખેતરો છે શુષ્ક જળ તળમાં ગયું, મોલ મબલખ કયાંય લહેરાતો નથી
ભીંત સામે ભીંત છે બસ ભીંત છે, વાયરો ખડકીમાં થઈ વાતો નથી

ઓઢી હું છત ની રજાઈ પોઢતો, જેમાં તારા ચાંદની ભાતો નથી
નૈણ નીચાં ઢાળી કાઢી ઘૂમટો, પાણી એ ચહેરો હવે પાતો નથી

શબ્દ નું સંતૂર ના સંતાડ તું, સાજ વિણ નરપત ગઝલ ગાતો નથી

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😎 💠💠💠 ★घर की असली वारिस★💠💠💠
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⏺️⏺️⏺️⏺️⏺️⏺️ असली वारिस ⏺️⏺️⏺️⏺️⏺️

◆एक इलाके में एक बाबा जी का इन्तिक़ाल हो गया, जनाज़ा तैयार हुआ और जब उठाकर कब्रस्तान ले जाने लगे तो एक आदमी आगे आया और चारपाई का एक पाऊं पकड़ लिया और बोला के मरने वाले ने मेरे 15 लाख देने है, पहले मुझे पैसे दो फिर उसको दफन करने दूंगा।

◆अब तमाम लोग खड़े तमाशा देख रहे है, बेटों ने कहा के मरने वाले ने हमें तो कोई ऐसी बात नही की के वह मकरूज है, इसलिए हम नही दे सकतें मुतवफ्फा के भाइयों ने कहा के जब बेटे जिम्मेदार नही तो हम क्यों दें। अब सारे खड़े है और उसने चारपाई पकड़ी हुई है, जब काफ़ी देर गुज़र गई तो बात घर की औरतों तक भी पहुंच गई।

◆मरने वाले कि एकलौती बेटी ने जब बात सुनी तो फौरन अपना सारा ज़ेवर उतारा और अपनी सारी नक़द रकम जमा करके उस आदमी के लिए भिजवा दी और कहा के अल्लाह के लिए ये रकम और ज़ेवर बेच के उसकी रकम रखो और मेरे अब्बु जान का जनाज़ा ना रोको। में मरने से पहले सारा कर्ज़ अदा कर दूंगी। और बाकी रकम का जल्दी बंदोबस्त कर दूंगी।

◆अब वह चारपाई पकड़ने वाला शख्स खड़ा हुआ और सारे मजमे से मुखातिब हो कर बोला: असल बात ये है मेने मरने वाले से 15 लाख लेना नही बल्के उसका देना है और उसके किसी वारिस को में जानता नही था तो मैने ये खेल किया। अब मुझे पता चल चुका है के उसकी वारिस एक बेटी है और उसका कोई बेटा या भाई नही है।

साभार – लियाकत अली मुंशी

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લઘુ કથા… ( ખાલી પેટ ) 😰

આશરે ૧૦ વર્ષ નો એક છોકરો રાધાના ઘરનો દરવાજો ખખડાવી રહ્યો હતો…
રાધા એ બહાર આવીને પૂછ્યું, “શુ છે.. ???”

બાળક : આન્ટી… શુ હું તમારા ઘરનું આ ગાર્ડન સાફ કરી દઉં…??

રાધા : ના…. અમારે નથી કરાવવું…

બાળક 🙏🏼 હાથ જોડીને દયનીય લય થી બોલ્યો.. ” પ્લીઝ આન્ટી કરાવી લો ને… હું બરાબર સાફ-સફાઈ કરીશ..

રાધાને દયા આવી ગઈ, એણે પુછયુ,” અચ્છા ઠીક છે, પણ પૈસા કેટલા લઈશ..??”

બાળક : પૈસા નથી જોઈતા આન્ટી, મને ફક્ત જમવાનું આપી દેજો..!!

રાધા : ઓહ..!!! પણ કામ બરાબર કરજે…

છોકરો તરત જ સાફ-સફાઈ કરવા લાગ્યો… રાધાને વિચાર આવ્યો, કે છોકરો ભૂખ્યો લાગે છે… પહેલા એને જમવાનું આપી દઉં..

રાધા જમવાનું લાવી…
અને બાળક ને બોલાવીને કહ્યું પહેલા જમવા માટે આગ્રહ કર્યો… પણ બાળકે ના કહી દીધું.

બાળક : પહેલા કામ કરી લઉં પછી જ તમે મને જમવાનું આપજો…

” ઠીક છે…” કહી, રાધા પોતાના કામ માં લાગી ગઈ..

એક કલાકમાં છોકરાએ કામ પતાવી દીધું અને કહ્યું , “આન્ટી જી જોઈ લો , સફાઈ બરાબર કરી છે કે નહી..??”

રાધા : “અરે વાહ..! તે તો બહુ સરસ રીતે સાફ સફાઈ કરી છે અને માટીના કુંડા પણ એકદમ વ્યવસ્થિત રીતે ગોઠવી દીધા છે.. તું હવે હાથ-પગ ધોઈ લે હું તારા માટે જમવાનું લઈ આવું…”

છોકરો હાથ-પગ ધોઈને આવ્યો ત્યાં સુધી માં રાધા જમવાનું લઈ આવી.. અને છોકરાનું વર્તન જોઈને એને આશ્ચર્ય થયું… છોકરો એના કપડાંના થેલામાંથી થેલી કાઢીને જમવાનું વ્યવસ્થિત રીતે ભરી રહ્યો હતો..

એ જોઈ રાધાએ કહ્યું,”તે ખાધા-પીધા વગર જ કામ કર્યું છે , તો અહીં બેસી ને જમી તો લે… વધારે જોઈતું હશે તો હું બીજું આપી દઈશ.”

બાળક : નહિ આન્ટી, મારી મા ઘરે બીમાર છે. સરકારી દવાખાનામાં દવા તો મળી ગઈ પણ ડૉકટર સાહેબે કહ્યું છે કે ખાલી પેટ દવા ના લેવી..

આ સાંભળી રાધા રડી પડી..😭😭

અને પોતાના હાથે જ બાળકની માતા ની જેમ પોતાના હાથે જ બાળકને ખવડાવ્યું, એની બીમાર મા માટે પણ રોટલી બનાવી અને બાળકની સાથે જઈને એની માતાને જમવાનું આપવા ગઈ…. અને કહ્યું,” બહેન, તમે ગરીબ નહી પણ બહુ શ્રીમંત છો.. જે મિલકત(બાળકને આપેલા સંસ્કાર) તમે તમારા બાળકને આપ્યા છે , એ અમે ક્યારે પણ નહીં આપી શકીયે..

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सूर्यवंशी राजा नृग की कथा


सूर्यवंशी राजा नृग की कथा?

  • इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला॥
    जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्र द्रोह पावक सो जरई॥

भावार्थ:-इंद्र के वज्र, मेरे विशाल त्रिशूल, काल के दंड और श्री हरि के विकराल चक्र के मारे भी जो नहीं मरता, वह भी विप्रद्रोह रूपी अग्नि से भस्म हो जाता है॥

‘श्रीमद्भागवत महापुराण’ के अनुसार- श्रीशुकदेवजी कहते हैं- “प्रिय परीक्षित! एक दिन साम्ब, प्रद्युम्न, चारुभानु और गदा आदि यदुवंशी राजकुमार घूमने के लिये उपवन में गये। वहाँ बहुत देर तक खेल खेलते हुए उन्हें प्यास लग आयी।

अब वे इधर-उधर जल की खोज करने लगे। वे एक कुएँ के पास गये; उसमें जल तो था नहीं, एक बड़ा विचित्र जीव दीख पड़ा। वह जीव पर्वत के समान आकार का एक गिरगिट था।

उसे देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही। उनका हृदय करुणा से भर आया और वे उसे बाहर निकालने का प्रयत्न करने लगे। परन्तु जब वे राजकुमार उस गिरे हुए गिरगिट को चमड़े और सूत की रस्सियों से बाँधकर बाहर न निकाल सके, तब कुतूहलवश उन्होंने यह आश्चर्यमय वृत्तान्त भगवान श्रीकृष्ण के पास जाकर निवेदन किया।

जगत के जीवनदाता कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण उस कुएँ पर आये। उसे देखकर उन्होंने बायें हाथ से खेल-खेल में-अनायास ही उसको बाहर निकाल लिया। भगवान श्रीकृष्ण के करकमलों का स्पर्श होते ही उसका गिरगिट-रूप जाता रहा और वह एक स्वर्गीय देवता के रूप में परिणत हो गया।

अब उसके शरीर का रंग तपाये हुए सोने के समान चमक रहा था और उसके शरीर पर अद्भुत वस्त्र, आभूषण और पुष्पों के हार शोभा पा रहे थे। यद्यपि भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि इस दिव्य पुरुष को गिरगिट-योनि क्यों मिली थी, फिर भी वह कारण सर्वसाधारण को मालूम हो जाय, इसलिये उन्होंने उस दिव्य पुरुष से पूछा- “महाभाग! तुम्हारा यह रूप तो बहुत ही सुन्दर है। तुम हो कौन?

मैं तो ऐसा समझता हूँ कि तुम अवश्य ही कोई श्रेष्ठ देवता हो। कल्याणमूर्ते! किस कर्म के फल से तुम्हें इस योनि में आना पड़ा था? वास्तव में तुम इसके योग्य नहीं हो। हम लोग तुम्हारा वृत्तान्त जानना चाहते हैं। यदि तुम हम लोगों को वह बतलाना उचित समझो तो अपना परिचय अवश्य दो।”

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- “परीक्षित! जब अनन्तमूर्ति भगवान श्रीकृष्ण ने राजा नृग से इस प्रकार पूछा, तब उन्होंने अपना सूर्य के समान जाज्वल्यमान मुकुट झुकाकर भगवान को प्रणाम किया और वे इस प्रकार कहने लगे।

राजा नृग ने कहा- “प्रभो! मैं महाराज इक्ष्वाकु का पुत्र राजा नृग हूँ। जब कभी किसी ने आपके सामने दानियों की गिनती की होगी, तब उसमें मेरा नाम भी अवश्य ही आपके कानों में पड़ा होगा। प्रभो! आप समस्त प्राणियों की एक-एक वृत्ति के साक्षी हैं।

भूत और भविष्य का व्यवधान भी आपके अखण्ड ज्ञान में किसी प्रकार की बाधा नहीं डाल सकता। अतः आपसे छिपा ही क्या है? फिर भी मैं आपकी आज्ञा का पालन करने के लिये कहता हूँ। भगवन! पृथ्वी में जितने धूलिकण हैं, आकाश में जितने तारे हैं और वर्षा में जितनी जल की धाराएँ गिरती हैं, मैंने उतनी ही गौएँ दान की थीं।

वे सभी गौएँ दुधार, नौजवान, सीधी, सुन्दर, सुलक्षणा और कपिला थीं। उन्हें मैंने न्याय के धन से प्राप्त किया था। सबके साथ बछड़े थे। उनके सींगों में सोना मढ़ दिया गया था और खुरों में चाँदी। उन्हें वस्त्र, हार और गहनों से सजा दिया जाता था।

ऐसी गौएँ मैने दी थीं। भगवन! मैं युवावस्था से सम्पन्न श्रेष्ठ ब्राह्मणकुमारों को-जो सद्गुणी, शीलसम्पन्न, कष्ट में पड़े हुए कुटुम्ब वाले, दम्भरहित तपस्वी, वेदपाठी, शिष्यों को विद्यादान करने वाले तथा सच्चरित्र होते-वस्त्राभूषण से अलंकृत करता और उन गौओं का दान करता।

इस प्रकार मैंने बहुत-सी गौएँ, पृथ्वी, सोना, घर, घोड़े, हाथी, दासियों के सहित कन्याएँ, तिलों के पर्वत, चाँदी, शय्या, वस्त्र, रत्न, गृह-सामग्री और रथ आदि दान किये। अनेकों यज्ञ किये और बहुत-से कुएँ, बावली आदि बनवाये।

एक दिन किसी अप्रतिग्रही तपस्वी ब्राह्मण की एक गाय बिछुड़कर मेरी गौओं में आ मिली। मुझे इस बात का बिलकुल पता न चला। इसलिये मैंने अनजान में उसे किसी दूसरे ब्राह्मण को दान कर दिया। जब उस गाय को वे ब्राह्मण ले चले, तब उस गाय के असली स्वामी ने कहा- “यह गौ मेरी है।” दान ले जाने वाले ब्राह्मण ने कहा- “यह तो मेरी है, क्योंकि राजा नृग ने मुझे इसका दान किया है।

” वे दोनों ब्राह्मण आपस में झगड़ते हुए अपनी-अपनी बात कायम करने के लिये मेरे पास आये। एक ने कहा- “यह गाय अभी-अभी आपने मुझे दी है” और दूसरे ने कहा कि “यदि ऐसी बात है तो तुमने मेरी गाय चुरा ली है।” भगवन! उन दोनों ब्राह्मणों की बात सुनकर मेरा चित्त भ्रमित हो गया।

मैंने धर्मसंकट में पड़कर उन दोनों से बड़ी अनुनय-विनय की और कहा कि- “मैं बदले में एक लाख उत्तम गौएँ दूँगा। आप लोग मुझे यह गाय दे दीजिये। मैं आप लोगों का सेवक हूँ। मुझसे अनजाने में यह अपराध बन गया है। मुझ पर आप लोग कृपा कीजिये और मुझे इस घोर कष्ट से तथा घोर नरक में गिरने से बचा लीजिये।”

“राजन! मैं इसके बदले मैं कुछ नहीं लूँगा।” यह कहकर गाय का स्वामी चला गया। “तुम इसके बदले में एक लाख ही नहीं, दस हज़ार गाएँ और दो तो भी मैं लेने का नहीं।” इस प्रकार कहकर दूसरा ब्राह्मण भी चला गया। देवाधिदेव जगदीश्वर! इसके बाद आयु समाप्त होने पर यमराज के दूत आये और मुझे यमपुरी ले गये।

वहाँ यमराज ने मुझसे पूछा- “राजन! तुम पहले अपने पाप का फल भोगना चाहते हो या पुण्य का? तुम्हारे दान और धर्म के फलस्वरूप तुम्हें ऐसा तेजस्वी लोक प्राप्त होने वाला है, जिसकी कोई सीमा ही नहीं है।” भगवन! तब मैंने यमराज से कहा- “देव! पहले मैं अपने पाप का फल भोगना चाहता हूँ।” और उसी क्षण यमराज ने कहा- “तुम गिर जाओ।

” उनके ऐसा कहते ही मैं वहाँ से गिरा और गिरते ही समय मैंने देखा कि मैं गिरगिट हो गया हूँ। प्रभो! मैं ब्राह्मणों का सेवक, उदार, दानी और आपका भक्त था। मुझे इस बात की उत्कट अभिलाषा थी कि किसी प्रकार आपके दर्शन हो जायँ। इस प्रकार आपकी कृपा से मेरे पूर्वजन्मों की स्मृति नष्ट न हुई। भगवन! आप परमात्मा हैं।

बड़े-बड़े शुद्ध-हृदय योगीश्वर उपनिषदों की दृष्टि से अपने हृदय में आपका ध्यान करते हैं। इन्द्रियातीत परमात्मन! साक्षात आप मेरे नेत्रों के सामने कैसे आ गये। क्योंकि मैं तो अनेक प्रकार के व्यसनों, दुःखद कर्मों में फँसकर अंधा हो रहा था। आपका दर्शन तो तब होता है, जब संसार के चक्कर से छुटकारा मिलने का समय आता है।

देवताओं के भी आराध्यदेव! पुरुषोत्तम गोविन्द! आप ही व्यक्त और अव्यक्त जगत तथा जीवों के स्वामी हैं। अविनाशी अच्युत! आपकी कीर्ति पवित्र है। अन्तर्यामी नारायण! आप ही समस्त वृत्तियों और इन्द्रियों के स्वामी हैं। प्रभो! श्रीकृष्ण! मैं अब देवताओं के लोक में जा रहा हूँ। आप मुझे आज्ञा दीजिये। आप ऐसी कृपा कीजिये कि मैं चाहे कहीं कहीं भी क्यों न रहूँ, मेरा चित्त सदा आपके चरणकमलों में ही लगा रहे।

आप समस्त कार्यों और कारणों के रूप में विद्यमान हैं। आपकी शक्ति अनन्त हैं और आप स्वयं ब्रह्म हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ। सच्चिंदानन्दस्वरूप सर्वान्तर्यामी वासुदेव श्रीकृष्ण! आप समस्त योगों के स्वामी योगेश्वर हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ।”

राजा नृग ने इस प्रकार कहकर भगवान की परिक्रमा की और अपने मुकुट से उनके चरणों का स्पर्श करके प्रणाम किया। फिर उनसे आज्ञा लेकर सबके देखते-देखते ही वे श्रेष्ठ विमान पर सवार हो गये।

राजा नृग के चले जाने पर ब्राह्मणों के परम प्रेमी, धर्म के आधार देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्ण ने क्षत्रियों को शिक्षा देने के लिये वहाँ उपस्थित अपने कुटुम्ब के लोगों से कहा- “जो लोग अग्नि के समान तेजस्वी हैं, वे भी ब्राह्मणों का थोड़े-से-थोड़ा धन हड़पकर नहीं पचा सकते।

फिर जो अभिमानवश झूठ-मूठ अपने को लोगों का स्वामी समझते हैं, वे राजा तो क्या पचा सकते हैं? मैं हलाहल विष को विष नहीं मानता, क्योंकि उसकी चिकित्सा होती है। वस्तुतः ब्राह्मणों का धन ही परम विष है, उसको पचा लेने के लिये पृथ्वी में कोई औषध, कोई उपाय नहीं है।

हलाहल विष केवल खाने वाले का ही प्राण लेता है और आग भी जल के द्वारा बुझायी जा सकती है; परन्तु ब्राह्मण के धन रूप अरणि से जो आग पैदा होती है, वह सारे कुल को समूल जला डालती है। ब्राह्मण का धन यदि उसकी पूरी-पूरी सम्मति लिये बिना भोगा जाय, तब तो वह भोगने वाले, उसके लड़के और पौत्र-इन तीन पीढ़ियों को ही चौपट करता है।

परन्तु यदि बलपूर्वक हठ करके उसका उपभोग किया जाय, तब तो पूर्वपुरुषों की दस पीढ़ियाँ और आगे की भी दस पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं।

जो मूर्ख राजा अपनी राजलक्ष्मी के घमंड से अंधे होकर ब्राह्मणों का धन हड़पना चाहते हैं, समझना चाहिये कि वे जान-बूझकर नरक में जाने का रास्ता साफ कर रहे हैं। वे देखते नहीं कि उन्हें अधःपतन के कैसे गहरे गड्ढ़े में गिरना पड़ेगा।

जिन उदारहृदय और बहु-कुटुम्बी ब्राह्मणों की वृत्ति छीन ली जाती है, उनके रोने पर उनके आँसू की बूँदों से धरती के जितने धूलकण भीगते हैं, उतने वर्षों तक ब्राह्मण के स्वत्व को छीनने वाले उस उच्छ्रंखल राजा और उसके वंशजों को कुम्भी पाक नरक में दुःख भोगना पड़ता है। जो मनुष्य अपनी या दूसरों की दी हुई ब्राह्मणों की वृत्ति, उनकी जीविका के साधन छीन लेते हैं, वे साठ हज़ार वर्ष तक विष्ठा के कीड़े होते हैं।

इसलिये मैं तो यही चाहता हूँ कि ब्राह्मणों का धन कभी भूल से भी मेरे कोष में न आये, क्योंकि जो लोग ब्राह्मणों के धन की इच्छा भी करते हैं, उसे छीनने की बात तो अलग रही, वे इस जन्म में अल्पायु, शत्रुओं से पराजित और राज्यभ्रष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के बाद भी दूसरों को कष्ट देने वाले साँप ही होते हैं।

इसलिये मेरे आत्मीयो! यदि ब्राह्मण अपराध करे, तो भी उससे द्वेष मत करो। वह मार ही क्यों न बैठे या बहुत-सी गालियाँ या शाप ही क्यों न दे, उसे तुम लोग सदा नमस्कार ही करो। जिस प्रकार मैं बड़ी सावधानी से तीनों समय ब्राह्मणों को प्रणाम करता हूँ, वैसे ही तुम लोग भी किया करो। जो मेरी इस आज्ञा का उल्लंघन करेगा, उसे मैं क्षमा नहीं करूँगा, दण्ड दूँगा।

यदि ब्राह्मण के धन का अपहरण हो जाय तो वह अपहृत धन उस अपहरण करने वाले को-अनजान में उसके द्वारा यह अपराध हुआ हो तो भी-अधःपतन के गड्ढ़े में डाल देता है। जैसे ब्राह्मण की गाय ने अनजान में उसे लेने वाले राजा नृग को नरक में डाल दिया था।”

परीक्षित! समस्त लोकों को पवित्र करने वाले भगवान श्रीकृष्ण द्वारकावासियों को इस प्रकार उपदेश देकर अपने महल में चले गये।

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अतिउपयोगी घरेलू नुस्‍खे
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1. तेज सिरर्दर्द से छुटकारा पाने के लिए सेब को छिल कर बारीक काटें। उसमें थोड़ा सा नमक मिलाकर सुबह खाली पेट खाएं।

  1. (Periods) में दर्द से छुटकारा पाना के लिए ठंडे पानी में दो-तीन नींबू निचोड़ कर पिये।
  2. शरीर पर कहीं जल गया हो, तेज धूप से त्वचा झुलस गई हो, त्वचा पर झुर्रियां हों या कोई त्वचा रोग हो तो कच्चे आलू का रस निकालकर लगाने से फायदा होता हैं।

  3. मक्खन में थोड़ा सा केसर मिलाकर रोजाना लगाने से काले होंठ भी गुलाबी होने लगते हैं।

  4. मुंह की बदबू से परेशान हों तो दालचीनी का टुकड़ा मुंह में रखें।
    मुंह की बदबू तुरंत दूर हो जाती हैं।

  5. बहती नाक से परेशान हों तो युकेलिप्टस(सफेदा) का तेल रूमाल में डालकर सूंघे। आराम मिलेगा।

  6. कुछ दिनों तक नहाने से पहले रोजाना सिर में प्याज का पेस्ट लगाएं।
    बाल सफेद से काले होने लगेंगे।

  7. चाय पत्ती के उबले पानी से बाल धोएं, इससे बाल कम गिरेंगे।

  8. बैंगन के भरते में शहद मिलाकर खाने से अनिद्रा रोग का नाश होता है।
    ऐसा शाम को भोजन में भरता बनाते समय करें।

  9. संतरे के रस में थोड़ा सा शहद मिलाकर दिन में तीन बार एक-एक कप पीने से गर्भवती की दस्त की शिकायत दूर हो जाती हैं।

  10. गले में खराश होने पर सुबह-सुबह सौंफ चबाने से बंद गला खुल जाता हैं।

  11. सवेरे भूखे पेट तीन चार अखरोट की गिरियां निकालकर कुछ दिन खाने मात्र से ही घुटनों का दर्द समाप्त हो जाता हैं।

  12. ताजा हरा धनिया मसलकर सूंघने से छींके आना बंद हो जाती हैं।

  13. प्याज का रस लगाने से मस्सो के छोटे–छोटे टुकड़े होकर जड़ से गिर जाते हैं।

  14. प्याज के रस में नींबू का रस मिलाकर पीने से उल्टियां आना तत्काल बंद हो जाती हैं।

  15. गैस की तकलीफ से तुरंत राहत पाने के लिए लहसुन की 2 कली छीलकर 2 चम्मच शुद्ध घी के साथ चबाकर खाएं फौरन आराम होगा।

  16. मसालेदार खाना खाएं मसालेदार खाना आपकी बंद नाक को तुरंत ही खोल देगा।

  17. आलू का छिलका आपकी त्वचा पर ब्लीच की तरह काम करता है। इसे लगाने से आपकी काली पड़ी त्वचा का रंग सुधरता है।
    इसलिए आज के बाद आलू के छिलके को फेके नहीं बल्कि उनका इस्तेमाल करें।

  18. यदि आपको अकसर मुंह में छाले होने की शिकायत रहती है तो रोज़ाना खाना खाने के बाद गुड को चूसना ना भूलें। ऐसा करने छाले आपसे बहुत दूर रहेंगे।

  19. पतली छाछ में चुटकी भर सोडा डालकर पीने से पेशाब की जलन दूर होती ह

  20. प्याज और गुड रोज खाने से बालक की ऊंचाई बढती हैं।

  21. रोज गाजर का रस पीने से दमें की बीमारी जड़ से दूर होती हैं।

  22. खजूर गर्म पानी के साथ लेने से कफ दूर होता हैं।

  23. एक चम्‍मच समुद्री नमक लें और अपनी खोपड़ी पर लगा लें। इसे अच्‍छी तरह से मसाज करें और ऐसा करते समय उंगलियों को गीला कर लें। बाद में शैम्‍पू लगाकर सिर धो लें। महीने में एक बार ऐसा करने से रूसी नहीं होगी।

  24. अगर आपके नाखून बहुत कड़े हैं तो उन्‍हे काटने से पहले हल्‍के गुनगुने पानी में नमक डालकर, हाथों को भिगोकर रखें। और 10 मिनट बाद उन नाखूनों को काट दें। इससे सारे नाखून आसानी से कट जाएंगे।

  25. शरीर में कहीं गुम चोट लग जाए या नकसीर आए तो बर्फ की सिकाई बहुत फायदेमंद होती हैं।

  26. अगर कोई कीड़ा-मकोड़ा काट ले, तो तुरंत कच्चे आलू का एक पतला टुकड़ा काटकर उस पर नमक लगाकर कीड़े के काटे हुए स्थान पर 5-7 मिनट तक रगड़ें।जलन और दर्द गायब हो जाएगा।

  27. बवासीर से छुटकारा पाने के लिए सुबह खाली पेट 2 आलू-बुखारे खाए

  28. दांत के दर्द से छुटकारा पाने के लिए अदरक का छोटा सा टुकड़ा चबाएं। दर्द तुरंत दूर हो जाएगा।

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🔶 अष्टावक्र ऋषि 🔶

ऋषि अष्टावक्र का शरीर कई जगह से टेढ़ा-मेढ़ा था, इसलिए वह सुन्दर नहीं दिखते थे । एक दिन जब ऋषि अष्टावक्र राजा जनक की सभा में पहुँचे तो उन्हें देखते ही सभा के सभी सदस्य हँस पड़े । ऋषि अष्टावक्र सभा के सदस्यों को हँसता देखकर वापिस लौटने लगे ।

यह देखकर राजा जनक ने ऋषि अष्टावक्र से पूछा – ‘‘भगवन ! आप वापिस क्यों जा रहे हैं ?’’

ऋषि अष्टावक्र ने उत्तर दिया – ‘‘राजन ! मैं मूर्खों की सभा में नहीं बैठता ।’’

ऋषि अष्टावक्र की बात सुनकर सभा के सदस्य नाराज हो गए और उनमें से एक सदस्य ने क्रोध में बोल ही दिया – ‘‘हम मूर्ख क्यों हुए ? आपका शरीर ही ऐसा है तो हम क्या करें ?’’

तभी ऋषि अष्टावक्र ने उत्तर दिया – ‘‘तुम लोगों को यह नहीं मालूम कि तुम क्या कर रहे हो ! अरे, तुम मुझ पर नहीं, सर्वशक्तिमान ईश्वर पर हँस रहे हो । मनुष्य का शरीर तो हांडी की तरह है, जिसे ईश्वर रुपी कुम्हार ने बनाया है । हांडी की हँसी उड़ाना क्या कुम्हार की हँसी उड़ाना नहीं हुआ ?’’ अष्टावक्र का यह तर्क सुनकर सभी सभा सदस्य लज्जित हो गए और उन्होंने ऋषि अष्टावक्र से क्षमा मांगी ।

हम में से ज्यादातर लोग आमतौर पर किसी ना किसी व्यक्ति को देखकर हँसते हैं, उनका मजाक उड़ाते हैं कि वह कैसे भद्दा दिखता है या कैसे भद्दे कपड़े पहने हुए है । लेकिन जब हम ऐसा करते हैं तो हम परमात्मा का ही मजाक उड़ाते हैं ना कि उस व्यक्ति का ।

इन्सान के व्यक्तित्व का निर्माण उसका रंग, शरीर या कपड़ों से नहीं हुआ करता, बल्कि व्यक्तित्व का निर्माण मनुष्य के विचारों एवं उसके आचरण से हुआ करता है ।
श्री राधे।।
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Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

कोणार्क का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर
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कोणार्क उड़ीसा प्रदेश के पुरी जिले में पुरी के जगन्नाथ मन्दिर से 21 मील उत्तर-पूर्व समुद्रतट पर चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित है। यहाँ का सूर्य मन्दिर बहुत प्रसिद्ध है। इस मंदिर की कल्पना सूर्य के रथ के रूप में की गई है। रथ में बारह जोड़े विशाल पहिए लगे हैं और इसे सात शक्तिशाली घोड़े तेजी से खींच रहे हैं। जितनी सुंदर कल्पना है, रचना भी उतनी ही भव्य है। मंदिर अपनी विशालता, निर्माणसौष्ठव तथा वास्तु और मूर्तिकला के समन्वय के लिये अद्वितीय है और उड़ीसा की वास्तु और मूर्तिकलाओं की चरम सीमा प्रदर्शित करता है। एक शब्द में यह भारतीय स्थापत्य की महत्तम विभूतियों में है।

कोणार्क का सूर्य मंदिर..
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यह विशाल मंदिर मूलत: चौकोर (865न्540 फुट) प्राकार से घिरा था जिसमें तीन ओर ऊँचे प्रवेशद्वार थे। मंदिर का मुख पूर्व में उदीयमान सूर्य की ओर है और इसके तीन प्रधान अंग – देउल (गर्भगृह), जगमोहन (मंडप) और नाटमंडप – एक ही अक्ष पर हैं। सबसे पहले दर्शक नाटमंडप में प्रवेश करता है। यह नाना अलंकरणों और मूर्तियों से विभूषित ऊँची जगती पर अधिष्ठित है जिसकी चारों दिशाओं में सोपान बने हैं। पूर्व दिशा में सोपानमार्ग के दोनों ओर गजशार्दूलों की भयावह और शक्तिशाली मूर्तियाँ बनी हैं। नाटमंडप का शिखर नष्ट हो गया है, पर वह नि:संदेह जगमोहन शिखर के आकार का रहा होगा। उड़ीसा के अन्य विकसित मंदिरों में नाटमंडप और भोगमंदिर भी एक ही अक्ष में बनते थे जिससे इमारत लंबी हो जाती थी। कोणार्क में नाटमंडप समानाक्ष होकर भी पृथक् है और भोगमंदिर अक्ष के दक्षिणपूर्व में है; इससे वास्तुविन्यास में अधिक संतुलन आ गया है।

नाटमंडप से उतरकर दर्शक जगमोहन की ओर बढ़ता है। दोनों के बीच प्रांमण में ऊँचा एकाश्म अरूणस्तंभ था जो अब जगन्नाथपुरी के मंदिर के सामने लगा है।

जगमोहन और देउल एक ही जगती पर खड़े हैं और परस्पर संबद्ध हैं। जगती के नीचे गजथर बना है जिसमें विभिन्न मुद्राओं में हाथियों के सजीव दृश्य अंकित हैं। गजथर के ऊपर जगती अनेक घाटों और नाना भाँति की मूर्तियों से अलंकृत है। इसके देवी देवता, किन्नर, गंधर्व, नाग, विद्याधरव्यालों और अप्सराओं के सिवा विभिन्न भावभंगियों में नर नारी तथा कामासक्त नायक नायिकाएँ भी प्रचुरता से अंकित हैं। संसारचक्र की कल्पना पुष्ट करने के लिये जगती की रचना रथ के सदृश की गई है और इसमें चौबीस बृहदाकार (9 फुट 8 इंच व्यास के) चक्के लगे हैं जिनका अंगप्रत्यंग सूक्ष्म अलंकरणों से लदा हुआ है। जगती के अग्र भाग में सोपान-पंक्ति है जिसके एक ओर तीन और दूसरी ओर चार दौड़ते घोड़े बने हैं। ये सप्ताश्व सूर्यदेव की गति और वेग के प्रतीक हैं जिनसे जगत् आलोकित और प्राणन्वित है।

देउल का शिखर नष्ट हो गया है और जंघा भी भग्नावस्था में है, पर जगमोहन सुरक्षित है और बाहर से 100 फुट लंबा चौड़ा और इतना ही ऊँचा है। भग्नावशेष से अनुमान है कि देउल का शिखर 200 फुट से भी अधिक ऊँचा और उत्तर भारत का सबसे उत्तुंग शिखर रहा होगा। देउल और जगमोहन दोनों ही पंचरथ और पंचांग है पर प्रत्येक रथ के अनेक उपांग है और तलच्छंद की रेखाएँ शिखर तक चलती है। गर्भगृह (25 फुट वर्ग) के तीनों भद्रों में गहरे देवकोष्ठ बने हैं जिनमें सूर्यदेव की अलौकिक आभामय पुरूषाकृति मूर्तियाँ विराजमान हैं।

जगमोहन का अलंकृत अवशाखा द्वार ही भीतर का प्रवेशद्वार है। जगमोहन भीतर से सादा पर बाहर से अलंकरणों से सुसज्जित है। इसका शिखर स्तूपकोणाकार (पीढ़ा देउल) है और तीन तलों में विभक्त है। निचले दोनों तलों में छह छह पीढ़ हैं जिनमें चतुरंग सेना, शोभायात्रा, रत्यगान, पूजापाठ, आखेट इत्यादि के विचित्र दृश्य उत्कीर्ण हैं। उपरले में पाँच सादे पीढ़े हैं। तलों के अंतराल आदमकद स्त्रीमूर्तियों से सुशोभित हैं। ये ललित भंगिमों में खड़ी बाँसुरी, शहनाई, ढोल, मृढंग, झाँझ और मजीरा बजा रही हैं। उपरले तल के ऊपर विशाल घंटा और चोटी पर आमलक रखा है। स्त्रीमूर्तियों के कारण इस शिखर में अद्भुत सौंदर्य के साथ प्राण का भी संचार हुआ है जो इस जगमोहन की विशेषता है। वास्तुतत्वज्ञों की राय में इससे सुघड़ और उपयुक्त शिखर कल्पनातीत है। (कृ. दे.)

इस मंदिर का निर्माण गंग वंश के प्रतापी नरेश नरर्सिह देव (प्रथम) (1238-64 ई.) ने अपने एक विजय के स्मारक स्वरूप कराया था। इसके निर्माण में 1200 स्थपति 12 वर्ष तक निरंतर लगे रहे। अबुल फजल ने अपने आइने-अकबरी में लिखा है कि इस मंदिर में उड़ीसा राज्य के बारह वर्ष की समुची आय लगी थी। उनका यह भी कहना है कि यह मंदिर नवीं शती ई. में बना था, उस समय उसे केसरी वंश के किसी नरेश ने निर्माण कराया था। बाद में नरसिंह देव ने उसको नवीन रूप दिया। इस मंदिर के आस पास बहुत दूर तक किसी पर्वत के चिन्ह नहीं हैं, ऐसी अवस्था में इस विशालकाय मंदिर के निर्माण के लिये पत्थर कहाँ से और कैसे लाए गए यह एक अनुत्तरित जिज्ञासा है।

इस मंदिर के निर्माण के संबंध में एक दंतकथा प्रचलित है कि संपूर्ण प्रकार के निर्माण हो जाने पर शिखर के निर्माण की एक समस्या उठ खड़ी हुई। कोई भी स्थपति उसे पूरा कर न सका तब मुख्य स्थपति के धर्मपाद नामक 12 वर्षीय पुत्र ने यह साहसपूर्ण कार्य कर दिखाया। उसके बाद उसने यह सोचकर कि उसके इस कार्य से सारे स्थपतियों की अपकीर्ति होगी और राजा उनसे नाराज हो जाएगा, उसने उस शिखर से कूदकर आत्महत्या कर ली। एक अन्य स्थानीय अनुश्रुति है कि मंदिर के शिखर में कुंभर पाथर नामक चुंबकीय शक्ति से युक्त पत्थरलगा था। उसके प्रभाव से इसके निकट से समुद्र में जानेवाले जहाज और नौकाएँ खिंची चली आती थीं और टकराकर नष्ट हो जाती थीं।

कहा जाता है कि काला पहाड़ नामक प्रसिद्ध आक्रमणकारी मुसलमान ने इस मंदिर को ध्वस्त किया किंतु कुछ अन्य लोग इसके ध्वंस का कारण भूकंप मानते हैं।

इस स्थान के एक पवित्र तीर्थ होने का उल्लेख कपिलसंहिता, ब्रह्मपुराण, भविष्यपुराण, सांबपुराण, वराहपुराण आदि में मिलता है। उनमें इस प्रकार एक कथा दी हुई है। कृष्ण के जांबवती से जन्मे पुत्र सांब अत्यन्त सुंदर थे। कृष्ण की स्त्रियाँ जहाँ स्नान किया करती थीं, वहाँ से नारद जी निकले। उन्होंने देखा कि वहाँ स्त्रियाँ सांब के साथ प्रेमचेष्टा कर रही है। यह देखकर नारद श्रीकृष्ण को वहाँ लिवा लाए। कृष्ण ने जब यह देखा तब उन्होंन उसे कोढ़ी हो जाने का शाप दे दिया। जब सांब ने अपने को इस संबंध में निर्दोष बताया तब कृष्ण ने उन्हें मैत्रये बन (अर्थात् जहाँ कोणार्क है) जाकर सूर्य की आराधना करने को कहा। सांब की आराधना से प्रसन्न होकर सूर्य ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिया। दूसरे दिन जब वे चंद्रभागा नदी में स्नान करने गए तो उन्हें नदी में कमल पत्र पर सूर्य की एक मूर्ति दिखाई पड़ी। उस मूर्ति को लाकर सांब ने यथाविधि स्थापना की और उसकी पूजा के लिये अठारह शाकद्वीपी ब्राह्मणों को बुलाकर वहाँ बसाया। पुराणों में इस सूर्य मूर्ति का उल्लेख कोणार्क अथवा कोणादित्य के नाम से किया गया है।

कहते है कि रथ सप्तमी को सांब ने चंद्रभागा नदी में स्नानकर उक्त मूर्ति प्राप्त की थी। आज भी उस तिथि को वहाँ लोग स्नान और सूर्य की पूजा करने आते हैं।
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बोध कथा – चट्टे बट्टे

एक देहात के बाजार में चार सब्जी वाले बैठते थे। दो महिलाएं और दो पुरुष। बाजार की सड़क उत्तर से दक्षिण की तरफ जाती थी। अब होता यह था कि उत्तर से आने वाले ग्राहक को सबसे पहले महिला का ठेला मिलता। मान लिया वह आलू 20 रुपये किलो दे रही है तो उसके बाद वाला पुरुष वही आलू 21 रुपये किलो बताता और अगली महिला के ठेले पर आलू 22 रुपये किलो बिक रहे होते। और एकदम दक्षिणी सिरे पर बैठा ठेले वाला वही आलू 23 रुपये किलो बताता।
अब कोई व्यक्ति दक्षिण की तरफ से आ रहा होता तो उसके सामने पड़ने वाला वही सब्जी वाला आलू 20 रुपये किलो बताता और इस तरह उल्टी दिशा में दाम बढ़ते जाते।
दोनों तरफ से आने वाले ग्राहक हमेशा परेशान रहते कि वापस जाकर 20 रुपये किलो खरीदें या यहीं पर 21 या 22 या 23 रुपये किलो खरीदें। मजे की बात चारों में से कोई भी एक पैसा कम न करता। ग्राहक को किसी न किसी से तो सौदा करना ही पड़ता। कभी सही दाम पर और कहीं ज्यादा दाम पर।
एक बार एक भले आदमी ने बुजुर्ग से दिखने वाले सब्जी वाले से पूछ ही लिया- क्या चक्कर है। उत्तर से दक्षिण की तरफ बढ़ते हुए दाम बढ़ते हैं और दक्षिण की तरफ से आने वाले ग्राहक को उत्तर की ओर आते हुए ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं। दुकानदार ने समझाया – बाबूजी यह बाजार है और बाजार में हमेशा कंपीटीशन होता है। सच तो यह है कि हम सब एक ही परिवार के सदस्य हैं। मियां , बीवी , बेटा और बहू। आप किसी से भी खरीदें पैसे हमारे ही घर में आने हैं। मामला ये है कि अगर हम चारों आपको आलू 20 रुपये किलो बतायें तो आप उसके लिए 18 या 19 रुपये देने को तैयार होंगे लेकिन जब हम 20 से 23 के बीच में आलू बेच रहे हैं तो आपको लगता है कि जहां सस्ते मिल रहे हैं वहीं से ले लो।
यही हमारी राजनीति में हो रहा है। सामान वही है। लूटने के तरीके भी वही हैं और लूटने वाले भी वही हैं। सब एक ही कुनबे के। हमें पता नहीं चलता कि हम किस से नाता जोड़ कर कम लुट रहे हैं और किससे नाता बनाकर ज्यादा लुट रहे हैं। यह राजनीति का बाजार है।

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पुष्यमित्र शुंग

बात आज से 2100 साल पहले की है। एक किसान ब्राह्मण के घर एक पुत्र ने जन्म लिया। नाम रखा गया पुष्यमित्र। पूरा नाम पुष्यमित्र शुंग। और वो बना एक महान हिन्दू सम्राट जिसने भारत को बुद्ध देश बनने से बचाया। अगर ऐसा कोई राजा कम्बोडिया, मलेशिया या इंडोनेशिया में जन्म लेता तो आज भी यह देश हिन्दू होते।
जब सिकन्दर ब्राह्मण राजा पोरस से मार खाकर अपना विश्व विजय का सपना तोड़ कर उत्तर भारत से शर्मिंदा होकर मगध की और गया था उसके साथ आये बहुत से यवन वहां बस गए। अशोक सम्राट के बुद्ध धर्म अपना लेने के बाद उनके वंशजों ने भारत में बुद्ध धर्म लागू करवा दिया। ब्राह्मणों के द्वारा इस बात का सबसे अधिक विरोध होने पर उनका सबसे अधिक कत्लेआम हुआ। हज़ारों मन्दिर गिरा दिए गए। इसी दौरान पुष्यमित्र के माता पिता को धर्म परिवर्तन से मना करने के कारण उनके पुत्र की आँखों के सामने काट दिया गया। बालक चिल्लाता रहा मेरे माता पिता को छोड़ दो। पर किसी ने नही सुनी। माँ बाप को मरा देखकर पुष्यमित्र की आँखों में रक्त उतर आया। उसे गाँव वालों की संवेदना से नफरत हो गयी। उसने कसम खाई की वो इसका बदला बौद्धों से जरूर लेगा और जंगल की तरफ भाग गया।

एक दिन मौर्य नरेश बृहद्रथ जंगल में घूमने को निकला। अचानक वहां उसके सामने शेर आ गया। शेर सम्राट की तरफ झपटा। शेर सम्राट तक पहुंचने ही वाला था की अचानक एक लम्बा चौड़ा बलशाली भीमसेन जैसा बलवान युवा शेर के सामने आ गया। उसने अपनी मजबूत भुजाओं में उस मौत को जकड़ लिया। शेर को बीच में से फाड़ दिया और सम्राट को कहा की अब आप सुरक्षित हैं। अशोक के बाद मगध साम्राज्य कायर हो चुका था। यवन लगातार मगध पर आक्रमण कर रहे थे। सम्राट ने ऐसा बहादुर जीवन में ना देखा था। सम्राट ने पूछा ” कौन हो तुम”। जवाब आया ” ब्राह्मण हूँ महाराज”। सम्राट ने कहा “सेनापति बनोगे”? पुष्यमित्र ने आकाश की तरफ देखा, माथे पर रक्त तिलक करते हुए बोला “मातृभूमि को जीवन समर्पित है”। उसी वक्त सम्राट ने उसे मगध का उपसेनापति घोषित कर दिया।
जल्दी ही अपने शौर्य और बहादुरी के बल पर वो सेनापति बन गया। शांति का पाठ अधिक पढ़ने के कारण मगध साम्राज्य कायर ही चूका था। पुष्यमित्र के अंदर की ज्वाला अभी भी जल रही थी। वो रक्त से स्नान करने और तलवार से बात करने में यकीन रखता था। पुष्यमित्र एक निष्ठावान हिन्दू था और भारत को फिर से हिन्दू देश बनाना उसका स्वपन था।
आखिर वो दिन भी आ गया। यवनों की लाखों की फ़ौज ने मगध पर आक्रमण कर दिया। पुष्यमित्र समझ गया की अब मगध विदेशी गुलाम बनने जा रहा है। बौद्ध राजा युद्ध के पक्ष में नही था। पर पुष्यमित्र ने बिना सम्राट की आज्ञा लिए सेना को जंग के लिए तैयारी करने का आदेश दिया। उसने कहा की इससे पहले दुश्मन के पाँव हमारी मातृभूमि पर पड़ें हम उसका शीश उड़ा देंगे। यह नीति तत्कालीन मौर्य साम्राज्य के धार्मिक विचारों के खिलाफ थी। सम्राट पुष्यमित्र के पास गया। गुस्से से बोला ” यह किसके आदेश से सेना को तैयार कर रहे हो”। पुष्यमित्र का पारा चढ़ गया। उसका हाथ उसके तलवार की मुठ पर था। तलवार निकालते ही बिजली की गति से सम्राट बृहद्रथ का सर धड़ से अलग कर दिया और बोला ” ब्राह्मण किसी की आज्ञा नही लेता”।

हज़ारों की सेना सब देख रही थी। पुष्यमित्र ने लाल आँखों से सम्राट के रक्त से तिलक किया और सेना की तरफ देखा और बोला “ना बृहद्रथ महत्वपूर्ण था, ना पुष्यमित्र, महत्वपूर्ण है तो मगध, महत्वपूर्ण है तो मातृभूमि, क्या तुम रक्त बहाने को तैयार हो??”। उसकी शेर सी गरजती आवाज़ से सेना जोश में आ गयी। सेनानायक आगे बढ़ कर बोला “हाँ सम्राट पुष्यमित्र । हम तैयार हैं”। पुष्यमित्र ने कहा” आज मैं सेनापति ही हूँ।चलो काट दो यवनों को।”।

जो यवन मगध पर अपनी पताका फहराने का सपना पाले थे वो युद्ध में गाजर मूली की तरह काट दिए गए। एक सेना जो कल तक दबी रहती थी आज युद्ध में जय महाकाल के नारों से दुश्मन को थर्रा रही है। मगध तो दूर यवनों ने अपना राज्य भी खो दिया। पुष्यमित्र ने हर यवन को कह दिया की अब तुम्हे भारत भूमि से वफादारी करनी होगी नही तो काट दिए जाओगे।

इसके बाद पुष्यमित्र का राज्यभिषेक हुआ। उसने सम्राट बनने के बाद घोषणा की अब कोई मगध में बुद्ध धर्म को नही मानेगा। हिन्दू ही राज धर्म होगा। उसने साथ ही कहा “जिसके माथे पर तिलक ना दिखा वो सर धड़ से अलग कर दिया जायेगा”। उसके बाद पुष्यमित्र ने वो किया जिससे आज भारत कम्बोडिया नही है। उसने लाखों बौद्धों को मरवा दिया। बुद्ध मन्दिर जो हिन्दू मन्दिर गिरा कर बनाये गए थे उन्हें ध्वस्त कर दिया। बुद्ध मठों को तबाह कर दिया। चाणक्य काल की वापसी की घोषणा हुई और तक्षिला विश्विद्यालय का सनातन शौर्य फिर से बहाल हुआ।
शुंग वंशवली ने कई सदियों तक भारत पर हुकूमत की।
पुष्यमित्र ने उनका साम्राज्य पंजाब तक फैला लिया।

इनके पुत्र सम्राट अग्निमित्र शुंग ने अपना साम्राज्य तिब्बत तक फैला लिया और तिब्बत भारत का अंग बन गया। वो बौद्धों को भगाता चीन तक ले गया। वहां चीन के सम्राट ने अपनी बेटी की शादी अग्निमित्र से करके सन्धि की। उनके वंशज आज भी चीन में “शुंग” surname ही लिखते हैं।
पंजाब- अफ़ग़ानिस्तान-सिंध की शाही ब्राह्मण वंशवली के बाद शुंग साम्राज्य शायद सबसे बेहतरीन ब्राह्मण साम्राज्य था। शायद पेशवा से भी महान।