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સમસ્યાઓ સામે લડવાનો સાચો રસ્તો


સમસ્યાઓ સામે લડવાનો સાચો રસ્તો….

વેદવ્યાસજીએ મહાભારતમાં બહુ સરસ પ્રસંગનું વર્ણન કરેલ છે.

એકવાર કૃષ્ણ, બલરામ અને સાત્યકિ (સાત્યકિ દ્વારકાનો મોટો યોદ્ધો હતો.)
જંગલમાં ફરવા માટે ગયા.
સાંજ પડવા આવી અને રસ્તો ભૂલી ગયા.
કૃષ્ણએ કહ્યું,
“આપણે જંગલમાં જ રાતવાસો કરીએ અને સવારે સૂર્યોદય થાય ત્યારે રસ્તો શોધીશું.
રાત્રે આપણી સલામતી માટે આપણે એવું નક્કી કરીએ કે રાતના ત્રણ સરખા ભાગ કરીને ત્રણે વ્યક્તિનો જાગવાનો વારો કાઢીએ.
એક જાગે અને બાકીના બે સૂતેલાની રક્ષા કરે.”

પ્રથમ સાત્યકિનો જાગવાનો વારો હતો.
એ સમયે બ્રહ્મરાક્ષસ આવ્યો. સાત્યકિએ એની સાથે લડાઈ શરૂ કરી.
સાત્યકિ બ્રહ્મરાક્ષસને બરોબરની ફાઈટ આપતો હતો.
આ લડાઈમાં જ્યારે સાત્યકિને વાગે એટલે એ દર્દની ચીસ પાડે.
એનું પરિણામ એ આવે કે સાત્યકિની ચીસથી બ્રહ્મરાક્ષસનું કદ મોટું થાય
અને કદ મોટું થવાથી આવનારા મુક્કાની તાકાત વધી જાય.

સાત્યકિનો જાગવાનો સમય પૂરો થયો એટલે એમણે તુરંત જ બલરામને જગાડ્યા.
હવે બલરામે આ રાક્ષસ સામેની લડાઈ ચાલુ કરી
પરંતુ સાત્યકિએ કર્યું એવું જ બલરામે કર્યું.
બલરામને પણ વાગે એટલે દર્દની
ચીસ પાડે અને પેલા બ્રહ્મરાક્ષસનું કદ મોટું થાય.
એમનો સમય પૂરો થયો એટલે એમણે કૃષ્ણને જગાડ્યા.

કૃષ્ણએ બ્રહ્મરાક્ષસ સાથેની આ લડાઈમાં
નવી વ્યૂહરચના અપનાવી. પોતને જ્યારે તક મળે ત્યારે પેલા રાક્ષસને બરાબરનો મારી લે
અને
રાક્ષસ મારે તો સામે જોઈને ખડખડાટ હસે.
એનું પરિણામ એ આવ્યું
કે પેલા બ્રહ્મરાક્ષસનું કદ નાનું થવા લાગ્યું
અને થોડા સમયની લડાઈમાં એનું કદ નાની પૂતળી જેવું થઈ ગયું.
પછી કૃષ્ણએ બહુ જ આસાનીથી પેલા પૂતળી જેવા બ્રહ્મરાક્ષસની ગરદન મરડીને મારી નાખ્યો.

મહાભારતના આ પ્રસંગ દ્વારા વ્યાસજી જીવનનો બહુ જ મોટો સંદેશો આપી જાય છે.

આપણા બધાના જીવનમાં પ્રશ્નો, પડકારો અને સમસ્યાઓરૂપી બ્રહ્મરાક્ષસ આવે છે.
આ પ્રશ્નો, પડાકારો અને સમસ્યાઓ સામે આપણે જેટલા રડ્યા રાખીએ એટલું જ એનું કદ વધતું જાય
અને એક સમય એવો આવે કે એ આપણને મારી નાખે- ખલાસ કરી દે
પરંતુ જો આ પ્રશ્નો, પડકારો અને સમસ્યાઓ સામે હસતા રહીએ તો એક સમય એવો આવે કે એનું કદ નાની પૂતળી જેવું થઈ જાય અને આપણે એને મારી શકીએ

અને છેલ્લે…

જીંદગી ક્યાં સહેલી છે,
એને સહેલી બનાવવી પડે છે.
કંઈક આપણા અંદાજ થી,
તો કંઈક નજરઅદાંજ થી

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हम दुकान वाले है….

ना घूमने जाते हैं, ना फिरने जाते है।
हम दुकान वाले है , दुकान के सिवाए कही ना जाते हैं।

ना गाने सुना करते हैं, ना गज़ले सुना करते हैं।
हम दुकान वाले हैं, लोगों की परेशानी सुना करते हैं।

ग्राहक लोगों के दुःख-दर्द कुछ ऐसे पहचान लेते है।
हम दुकान वाले हैं, चेहरा देखकर सब हाल जान लेते हैं।

ना गीता, ना बाइबिल, ना ही क़ुरान पढ़ते है।
हम दुकान वाले है, Scheme Circular और Tax Notice पढ़ते है।

ना डिस्को में जाते हैं हम, ना डेट पे जाते हैं,
हम दुकान वाले है, अक़सर घर देर से जाते है।

खुद ही कहानी लिखते है और खुद ही डायरेक्टर होते हैं।
हम दुकान वाले हैं, हमारे अपने परदे,
अपने थिएटर होते है।

हसरतें हूबहू है, ख़ुदा नहीं, हम भी बनना इंसान भला चाहते है।
हम दुकान वाले है, चाहे कुछ भी हो अपने ग्राहक का भला चाहते हैं।

ना खाकी पे एतबार है , ना सरकार पे इतना भरोसा करते है।
हम दुकान वाले है, लोग हम पे बेहिसाब भरोसा करते है।

हिन्दू भी खड़ा रहता है, मुस्लिम भी खड़ा रहता है।
ये बनिये दुकान वालो का दिल है, जहां
इंसानियत भीतर रहती है, मज़हब बाहर खड़ा रहता हैं।

सभी व्यापारी भाइयो को समर्पित

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विदुर जी की प्रेरक कथा!!!!!

अध्यात्मवाद में निश्चितरुपेण लौकिक और पारलौकिक सभी प्रकार की उलझनों के समाधान की पूर्ण शक्ति विद्यमान है। चोरी को, भ्रष्टाचार को, अनाचार, अत्याचार और व्यभिचार को अध्यात्मवाद ही दूर कर सकता है, कोई राजनैतिक दल या शक्तिशाली राज्य-प्रणाली भी दूर नहीं कर सकती। उपनिषद-काल में जब अध्यात्मवाद का प्रचार था, तब लोगों के चरित्र बहुत ऊँचे थे। आपको एक कथा सुनाता हूँ―

विदुर जी महाराज आज से लगभग ५ हजार वर्ष पूर्व धृतराष्ट्र के पास पहुँचे तो धृतराष्ट्र ने कहा, “विदुर जी ! सारा संसार घूमकर आये हैं आप, कहिये कहाँ-कहाँ पर क्या देखा आपने?”

विदुर जी बोले, “राजन् ! कितने आश्चर्य की बात देखी है मैंने। सारा संसार लोभ श्रृंखलाओं में फँस गया है। काम, क्रोध, लोभ, भय के कारण उसे कुछ भी दिखाई नहीं देता, पागल हो गया है। आत्मा को वह जानता ही नहीं।” तब एक कथा उन्होंने सुनाई।

एक वन था बहुत भयानक। उसमें भूला-भटका हुआ एक व्यक्ति जा पहुँचा। मार्ग उसे मिला नहीं। परन्तु उसने देखा कि वन में शेर, चीते, रीछ, हाथी और कितने ही पशु दहाड़ रहे हैं। भय से उसके हाथ-पाँव काँपने लगे। बिना देखे वह भागने लगा।

भागता-भागता एक स्थान पर पहुँच गया। वहाँ देखा कि पाँच विषधर साँप फन फैलाये फुङ्कार रहे हैं। उनके पास ही एक वृद्ध स्त्री खड़ी है। महाभयंकर साँप जब इसकी और लपका तो वह फिर भागा और अन्त में हाँफता हुआ एक गढ़ में जा गिरा जो घास और पौधों से ढका पड़ा था।

सौभाग्य से एक बड़े वृक्ष की शाखा उसके हाथ में आ गई। उसको पकड़कर वह लटकने लगा। तभी उसने नीचे देखा कि एक कुआँ है और उसमें एक बहुत बड़ा साँप एक अजगर मुख खोले बैठा है। उसे देखकर वह काँप उठा। शाखा को दृढ़ता से पकड़ लिया कि गिरकर अजगर के मुख में न जा पड़े। परन्तु ऊपर देखा तो उससे भी भयंकर दृश्य था।

छः मुख वाला एक हाथी वृक्ष को झंझोड़ रहा था और जिस शाखा को उसने पकड़ रखा था, उसे सफेद और काले रंग के चूहे काट रहे थे। भय से उसका रंग पीला पड़ गया, परन्तु तभी शहद की एक बूँद उसके होंठों पर आ गिरी। उसने ऊपर देखा। वृक्ष के ऊपर वाले भाग में मधु-मक्खियों का एक छत्ता लगा था, उसी से शनैः–शनैः शहद की बूँदें गिरती थीं। इन बूँदों का स्वाद वह लेने लगा।

इस बात को भूल गया कि नीचे अजगर है। इस बात को भूल गया कि वृक्ष को एक छः मुख वाला हाथी झंझोड़ रहा है। इस बात को भी भूल गया कि जिस शाखा से वह लटका है उसे सफेद और काले चूहे काट रहे हैं और इस बात को भी कि चारों ओर भयानक वन है जिसमें भयंकर पशु चिंघाड़ रहे हैं।

धृतराष्ट्र ने कथा को सुना तो कहा, “विदुर जी ! यह कौन से वन की बात आप कहते हैं? कौन है वह अभागा व्यक्ति जो इस भयानक वन में पहुँचकर संकट में फँस गया?”

*विदुर जी ने कहा―”राजन् ! यह संसार ही वह वन है। मनुष्य ही वह अभागा व्यक्ति है। संसार में पहुँचते ही वह देखता है कि इस वन में रोग, कष्ट और चिन्तारुपी पशु गरज रहे हैं। यहाँ काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के पाँच विषधर साँप फन फैलाये फुङ्कार रहे हैं। यहीं वह बूढ़ी स्त्री रहती है जिसे वृद्धावस्था कहते हैं और जो रुप तथा यौवन को समाप्त कर देती है। इनसे डरकर वह भागा। वह शाखा,जिसे जीने की इच्छा कहते हैं, हाथ में आ गई।

इस शाखा से लटके-लटके उसने देखा कि नीचे मृत्यु का महासर्प मुँह खोले बैठा है। वह सर्प, जिससे आज तक कोई भी नहीं बचा, ना राम, न रावण, न कोई राजा न महाराजा, न कोई धनवान् न कोई निर्धन, कोई भी कालरुपी सर्प से आज तक बचा नहीं; और छः मुख वाला हाथी जो इस वृक्ष को झंझोड़ रहा था वह वर्ष है―छः ऋतु वाला। छः ऋतुएँ ही उसके मुख हैं।

लगातार वह इस वृक्ष को झंझोड़ता रहता है; और इसके साथ ही काले और श्वेत रंग के चूहे इस शाखा को त्रीवता से काट रहे हैं; ये रात और दिन आयु को प्रतिदिन छोटा कर रहे हैं,यही दो चूहे हैं।

इस प्रेरक कथा से लोगों को शिक्षा लेनी चाहिए। आश्चर्य है कि मनुष्य जानता है कि उल्टे कर्मों से मेरी अगले जन्म में दुर्गति होगी,अगला जन्म अच्छा नहीं मिलेगा, परन्तु फिर भी मनुष्य दुष्क्रमों में ही लगा रहता है। तब सँभलता है जब सँभलने से कुछ हाथ नहीं लगता।_

संजय गुप्ता

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🌞🌞🌞 रोचक कथा 🌞🌞🌞
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एक बार महावीर हनुमान श्री राम के किसी कार्य में व्यस्त थे। उस जगह से शनिदेव जी गुजर रहे थे। रास्ते में उन्हें हनुमानजी दिखाई पड़े। अपने स्वभाव की वजह से शनिदेव जी को शरारत सूझी और वे उस रामकार्य में विघ्न डालने हनुमान जी के पास पंहुच गए। हनुमानजी ने शनि देव को चेतावनी दी और उन्हें ऐसा करने से रोका पर शनिदेव नहीं माने। हनुमानजी ने तब शनिदेव जी को अपनी पूंछ से जकड लिया और फिर से राम कार्य करने लगे। कार्य के दौरान वे इधरउधर चहलकदमी भी कर रहे थे। अत: शनिदेवजी को बहुत सारी चोटें आई। शनिदेव ने बहुत प्रयास किया पर हनुमान जी की कैद से खुद को छुड़ा नहीं पाए। उन्होंने विनती की पर हनुमानजी अपने कार्य में खोये हुए थे
जब राम जी का कार्य ख़त्म हुआ तब उन्हें शनिदेवजी का ख्याल आया और तब उन्होंने शनिदेव को आजाद किया। शनिदेव जी को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने हनुमानजी से माफ़ी मांगी कि वे कभी भी राम और हनुमान जी के कार्यों में कोई विघ्न नहीं डालेंगे और श्री राम और हनुमान जी के भक्तों को उनका विशेष आशीष प्राप्त होगा।

शनिदेव जी ने भगवान श्री हनुमान से सरसों का तेल मांगा जिसे वह अपने घावों पर लगा सके और जल्द ही चोटों से उभर सकें। हनुमानजी ने उन्हें वो तेल उपलब्ध करवाया और इस तरह शनिदेव के जख्म ठीक हुए।

तब शनिदेव जी ने कहा की इस स्मृति में जो भी भक्त शनिवार के दिन मुझपर सरसों का तेल चढ़ाएगा उसे मेरा विशेष आशीष प्राप्त होगा।

एक कथा के अनुसारअहंकारी लंकापति रावण ने शनिदेव जो को कैद कर लिया और उन्हें लंका में एक जेल में डाल दिया। जब तक हनुमानजी लंका नहीं पंहुचे तब तक शनिदेव उसी जेल में कैद रहे।

जब हनुमान सीता मैया की खोज में लंका में आए तब मां जानकी को खोजते-खोजते उन्हें भगवान शनि देव जेल में कैद मिले। हनुमानजी ने तब शनि भगवान को आजाद करवाया। आजादी के बाद उन्होंने हनुमानजी को धन्यवाद दिया और उनके भक्तों पर विशेष कृपा बनाए रखने का वचन दिया।

संजय गुप्ता

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बुद्धिमान कौन


((((( बुद्धिमान कौन ))))
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एक गाँव में एक व्यापारी रहता था, उसकी ख्याति दूर दूर तक फैली थी।
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एक बार वहाँ के राजा ने उसे चर्चा पर बुलाया। काफी देर चर्चा के बाद राजा ने कहा –
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“महाशय, आप बहुत बड़े सेठ है, इतना बड़ा कारोबार है पर आपका लड़का इतना मूर्ख क्यों है ? उसे भी कुछ सिखायें।
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उसे तो सोने चांदी में मूल्यवान क्या है यह भी नहीं पता॥” यह कहकर राजा जोर से हंस पड़ा..
व्यापारी को बुरा लगा, वह घर गया व लड़के से पूछा “सोना व चांदी में अधिक मूल्यवान क्या है ?”
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“सोना”, बिना एक पल भी गंवाए उसके लड़के ने कहा।
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“तुम्हारा उत्तर तो ठीक है, फिर राजा ने ऐसा क्यूं कहा-? सभी के बीच मेरी खिल्ली भी उड़ाई।”
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लड़के के समझ मे आ गया, वह बोला “राजा गाँव के पास एक खुला दरबार लगाते हैं,
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जिसमें सभी प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल होते हैं। यह दरबार मेरे स्कूल जाने के मार्ग मे ही पड़ता है।
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मुझे देखते ही बुलवा लेते हैं, अपने एक हाथ में सोने का व दूसरे में चांदी का सिक्का रखकर, जो अधिक मूल्यवान है वह ले लेने को कहते हैं…
और मैं चांदी का सिक्का ले लेता हूं। सभी ठहाका लगाकर हंसते हैं व मज़ा लेते हैं। ऐसा तक़रीबन हर दूसरे दिन होता है।”
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“फिर तुम सोने का सिक्का क्यों नहीं उठाते, चार लोगों के बीच अपनी फजिहत कराते हो व साथ मे मेरी भी❓”
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लड़का हंसा व हाथ पकड़कर पिता को अंदर ले गया और कपाट से एक पेटी निकालकर दिखाई जो चांदी के सिक्कों से भरी हुई थी।
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यह देख व्यापारी हतप्रभ रह गया।
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लड़का बोला “जिस दिन मैंने सोने का सिक्का उठा लिया उस दिन से यह खेल बंद हो जाएगा।
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वो मुझे मूर्ख समझकर मज़ा लेते हैं तो लेने दें, यदि मैं बुद्धिमानी दिखाउंगा तो कुछ नहीं मिलेगा।”

बनिये का बेटा हुं अक़्ल से काम लेता हूँ
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मूर्ख होना अलग बात है व समझा जाना अलग.. स्वर्णिम मॊके का फायदा उठाने से बेहतर है, हर मॊके को स्वर्ण में तब्दील करना।
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जैसे समुद्र सबके लिए समान होता है, कुछ लोग पानी के अंदर टहलकर आ जाते हैं, कुछ मछलियाँ ढूंढ पकड़ लाते हैं .. व कुछ मोती चुन कर आते हैं।
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देव शर्मा

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बर्तनों की आवाज़ देर रात तक आ रही थी,
रसोई का नल चल रहा है,
माँ रसोई में है….

तीनों बहुऐं अपने-अपने कमरे में सोने जा चुकी,
माँ रसोई में है…

माँ का काम बकाया रह गया था,पर काम तो सबका था;
पर माँ तो अब भी सबका काम अपना ही मानती है..

दूध गर्म करके,
ठण्ड़ा करके,
जावण देना है,
ताकि सुबह बेटों को ताजा दही मिल सके;

सिंक में रखे बर्तन माँ को कचोटते हैं,
चाहे तारीख बदल जाये,सिंक साफ होना चाहिये….

बर्तनों की आवाज़ से
बहू-बेटों की नींद खराब हो रही है;
बड़ी बहू ने बड़े बेटे से कहा;
“तुम्हारी माँ को नींद नहीं आती क्या? ना खुद सोती है और ना ही हमें सोने देती है”

मंझली ने मंझले बेटे से कहा; “अब देखना सुबह चार बजे फिर खटर-पटर चालू हो जायेगी, तुम्हारी माँ को चैन नहीं है क्या?”

छोटी ने छोटे बेटे से कहा; “प्लीज़ जाकर ये ढ़ोंग बन्द करवाओ कि रात को सिंक खाली रहना चाहिये”

माँ अब तक बर्तन माँज चुकी थी

झुकी कमर,
कठोर हथेलियां,
लटकी सी त्वचा,
जोड़ों में तकलीफ,
आँख में पका मोतियाबिन्द,
माथे पर टपकता पसीना,
पैरों में उम्र की लड़खडाहट
मगर,
दूध का गर्म पतीला
वो आज भी अपने पल्लू से उठा लेती है,
और…
उसकी अंगुलियां जलती नहीं है,
क्योंकि वो माँ है ।

दूध ठण्ड़ा हो चुका,
जावण भी लग चुका,
घड़ी की सुईयां थक गई,
मगर…
माँ ने फ्रिज में से भिण्ड़ी निकाल ली और काटने लगी;
उसको नींद नहीं आती है, क्योंकि वो माँ है!

कभी-कभी सोचता हूं कि माँ जैसे विषय पर लिखना,बोलना,बताना,जताना क़ानूनन बन्द होना चाहिये;
क्योंकि यह विषय निर्विवाद है,
क्योंकि यह रिश्ता स्वयं कसौटी है!

रात के बारह बजे सुबह की भिण्ड़ी कट गई,
अचानक याद आया कि गोली तो ली ही नहीं;
बिस्तर पर तकिये के नीचे रखी थैली निकाली,
मूनलाईट की रोशनी में
गोली के रंग के हिसाब से मुंह में रखी और गटक कर पानी पी लिया…

बगल में एक नींद ले चुके बाबूजी ने कहा;”आ गई”
“हाँ,आज तो कोई काम ही नहीं था”
-माँ ने जवाब दिया,

और

लेट गई,कल की चिन्ता में
पता नहीं नींद आती होगी या नहीं पर सुबह वो थकान रहित होती हैं,
क्योंकि वो माँ है!

सुबह का अलार्म बाद में बजता है,
माँ की नींद पहले खुलती है;
याद नहीं कि कभी भरी सर्दियों में भी,
माँ गर्म पानी से नहायी हो
उन्हे सर्दी नहीं लगती,
क्योंकि वो माँ है!

अखबार पढ़ती नहीं,मगर उठा कर लाती है;
चाय पीती नहीं,मगर बना कर लाती है;
जल्दी खाना खाती नहीं,मगर बना देती है,
क्योंकि वो माँ है!

माँ पर बात जीवनभर खत्म ना होगी,

🙂 माँ

देव शर्मा

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जानिए वो छः काम जो केवल कर सकते थे महाबलशाली पवनपुत्र हनुमान जी!

शिवपुराण के अनुसार त्रेतायुग में भगवान श्रीराम की सहायता करने और दुष्टों का नाश करने के लिए भगवान शिव ने वानर जाति में हनुमान के रूप में अवतार लिया था! हनुमान जी को भगवान शिव का श्रेष्ठ रुद्रा अवतार कहा जाता है!

जब भी श्रीराम-लक्ष्मण पर कोई संकट आया, हनुमानजी ने उसे अपनी बुद्धि व पराक्रम से दूर कर दिया! वाल्मीकि रामायण में स्वयं भगवान श्रीराम ने अगस्त्य मुनि से कहा है कि हनुमान के पराक्रम से ही उन्होंने रावण पर विजय प्राप्त की है!

आज हम आपको हनुमानजी द्वारा किए गए कुछ ऐसे ही कामों के बारे में बता रहे हैं! जिन्हें करना किसी और के वश में नहीं था!

  1. समुद्र लांघना! माता सीता की खोज करते समय जब हनुमान, अंगद, जामवंत आदि वीर समुद्र तट पर पहुंचे तो 100 योजन विशाल समुद्र को देखकर उनका उत्साह कम हो गया!
    तब अंगद ने वहां उपस्थित सभी पराक्रमी वानरों से उनके छलांग लगाने की क्षमता के बारे में पूछा!

तब किसी वानर ने कहा कि वह 30 योजन तक छलांग लगा सकता है, तो किसी ने कहा कि वह 50 योजन तक छलांग लगा सकता है! ऋक्षराज जामवंत ने कहा कि वे 90 योजन तक छलांग लगा सकते हैं!

सभी की बात सुनकर अंगद ने कहा कि- मैं 100 योजन तक छलांग लगाकर समुद्र पार तो कर लूंगा लेकिन लौट पाऊंगा कि नहीं, इसमें संशय है! तब जामवंत ने हनुमानजी को उनके बल व पराक्रम का स्मरण करवाया और हनुमानजी ने 100 योजन विशाल समुद्र को एक छलांग में ही पार कर लिया!

  1. माता सीता की खोज! समुद्र लांघने के बाद हनुमान जब लंका पहुंचे तो लंका के द्वार पर ही लंकिनी नामक राक्षसी से उन्हें रोक लिया!

हनुमानजी ने उसे परास्त कर लंका में प्रवेश किया! हनुमानजी ने माता सीता को बहुत खोजा, लेकिन वह कहीं भी दिखाई नहीं दी! फिर भी हनुमानजी के उत्साह में कोई कमी नहीं आई। मां सीता के न मिलने पर हनुमानजी ने सोचा कहीं रावण ने उनका वध तो नहीं कर दिया!

यह सोचकर हनुमानजी को बहुत दु:ख हुआ, लेकिन उनके मन में पुन: उत्साह का संचार हुआ और वे लंका के अन्य स्थानों पर माता सीता की खोज करने लगे! अशोक वाटिका में जब हनुमानजी ने माता सीता को देखा तो वे अति प्रसन्न हुए! इस प्रकार हनुमानजी ने यह कठिन काम भी बहुत ही सहजता से कर दिया!

  1. अक्षयकुमार का वध व लंका दहन! माता सीता की खोज करने के बाद हनुमानजी ने उन्हें भगवान श्रीराम का संदेश सुनाया!

इसके बाद हनुमानजी ने अशोक वाटिका को तहस-नहस कर दिया। ऐसा हनुमानजी ने इसलिए किया क्योंकि वे शत्रु की शक्ति का अंदाजा लगा सकें! जब रावण के सैनिक हनुमानजी को पकडऩे आए तो उन्होंने उनका भी वध कर दिया!

इस बात की जानकारी जब रावण को लगी तो उसने सबसे पहले जंबुमाली नामक राक्षस को हनुमानजी को पकडऩे के लिए भेजा! हनुमानजी ने उसका भी वध कर दिया तब रावण ने अपने पराक्रमी पुत्र अक्षयकुमार को भेजा! हनुमानजी ने उसका वध भी कर दिया!

इसके बाद हनुमानजी ने अपना पराक्रम दिखाते हुए लंका में आग लगा दी! पराक्रमी राक्षसों से भरी लंका नगरी में जाकर माता सीता को खोज करना व अनेक राक्षसों का वध करके लंका को जलाने का साहस हनुमानजी ने बड़ी ही सहजता से कर दिया!

  1. विभीषण को अपने पक्ष में करना! श्रीरामचरित मानस के अनुसार जब हनुमानजी लंका में माता सीता की खोज कर रहे थे! तभी उन्होंने किसी के मुख से भगवान श्रीराम का नाम सुना!

तब हनुमानजी ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और विभीषण के पास जाकर उनका परिचय पूछा! अपना परिचय देने के बाद विभीषण ने हनुमानजी से उनका परिचय पूछा ! तब हनुमानजी ने उन्हें सारी बात सच-सच बता दी!

रामभक्त हनुमान को देखकर विभीषण बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने पूछा कि क्या राक्षस जाति का होने के बाद भी श्रीराम मुझे अपनी शरण में लेंगे? तब हनुमानजी ने कहा कि भगवान श्रीराम अपने सभी सेवकों से बहुत प्रेम करते हैं!

जब विभीषण रावण को छोड़कर श्रीराम की शरण में आए तो सुग्रीव, जामवंत आदि ने कहा कि ये रावण का भाई है इसलिए इस पर भरोसा नहीं करना चाहिए! उस स्थिति में हनुमानजी ने ही विभीषण का समर्थन किया था! अंत में, विभीषण के परामर्श से ही भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया!

  1. श्री राम-लक्ष्मण के लिए संजीवनी पहाड़ लेकर आना!!!! वाल्मीकि रामायण के अनुसार युद्ध के दौरान रावण के पराक्रमी पुत्र इंद्रजीत ने ब्रह्मास्त्र चलाकर कई करोड़ वानरों का वध कर दिया! ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से ही भगवान श्रीराम व लक्ष्मण बेहोश हो गए!

तब ऋक्षराज जामवंत ने हनुमानजी से कहा कि तुम शीघ्र ही हिमालय पर्वत जाओ, वहां तुम्हें ऋषभ तथा कैलाश शिखर का दर्शन होगा! इन दोनों के बीच में एक औषधियों का पर्वत दिखाई देगा तुम उसे ले आओ! उन औषधियों की सुगंध से ही राम-लक्ष्मण व अन्य सभी घायल वानर पुन: स्वस्थ हो जाएंगे!

जामवंत जी के कहने पर हनुमानजी तुरंत उस पर्वत को लेने उड़ चले! रास्ते में कई तरह की मुसीबतें आईं, लेकिन अपनी बुद्धि और पराक्रम के बल पर हनुमान उस औषधियों का वह पर्वत समय रहते उठा ले आए! उस पर्वत की औषधियों की सुगंध से ही राम-लक्ष्मण व करोड़ों घायल वानर पुन: स्वस्थ हो गए!

  1. अनेक राक्षसों का वध! युद्ध में हनुमानजी ने अनेक पराक्रमी राक्षसों का वध किया! इनमें धूम्राक्ष, अकंपन, देवांतक, त्रिशिरा, निकुंभ आदि प्रमुख थे! हनुमानजी और रावण में भी भयंकर युद्ध हुआ था!वाल्मीकि रामायण के अनुसार हनुमानजी का थप्पड़ खाकर रावण उसी तरह कांप उठा था! जैसे भूकंप आने पर पर्वत हिलने लगते हैं। हनुमानजी के इस पराक्रम को देखकर वहां उपस्थित सभी वानरों में हर्ष छा गया था!

हनुमान जी को साधारण समझने वालों के लिए!
सिर्फ इतना ही कहूंगा कि
शंकर सुवन केशरी नन्दन! तेज प्रताप महाजग वंदन!!
इसका अर्थ मात्र समझ लें! और हनुमान जी के अद्भुत बल का प्रमाण और उनकी दिव्यता जानने के लिये पूरी हनुमान चालीसा को पढ़कर उसका अर्थ जाने!

जय बजरंगबली!
जय श्री राम

संजय गुप्ता

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बड़े भाग मानुष तन पावा | सुर दुर्लभ सद् ग्रन्थन्हि गावा ||
साधन् धाम मोक्ष कर द्वारा | पाई न जेहिं परलोक सँवारा ||
||रा०च०मा०/उ०का०/४२||

अर्थात मनुष्य कि शरीर बड़े हि भाग्य से प्राप्त होती क्योंकि मानव शरीर पाना देवताओं के लिए भी दुर्लभ होता है अर्थात मानव शरीर के लिए देवता गण भी तरसते रहते हैं – लालायित रहते हैं | ऐसा इसलिए कि मानव शरीर एक ऐसा शरीर है जो जीव को मोक्ष के दरवाजे तक पहुँचाने के लिए समस्त मोक्ष साधनों का धाम या घर है | इस मानव शरीर को पाकर भी जो मनुष्य अपना परलोक सँवार नहीं लेता यानी अपने जीव का उद्धार तथा मुक्ति-अमरता न पा लेता वही वहाँ परलोक में और यहाँ लोक में अपार दु:ख कष्ट पाता है |

इस प्रकार श्री रामचंद्र जी महाराज का समस्त उपदेश ही मानव को बिषय-कामनाओं से हटाकर बिमुक्त एवं मोक्षोन्मुख कराना है तथा पारलौकिक विचार-ध्यान-ज्ञान का ही उपदेश है | ये सारी बातें उनकी भगवत्ता को स्पष्ट परिलक्षित करते हैं |

आज भी अगर उनकी उपदेश को हम आत्मसात करते हैं और उनकी बताई हुई राह में चलते हैं तो अवश्य ही अपने जीवन का उद्धार-कल्याण कराने में सफल हो सकते हैं | और ये राम नवमी के पर्व हमें हर साल यहीं स्मरण कराती है कि हम उनकी बताई हुई राह में चले | अगर हम चलते हैं तब ही ये राम नवमी पर्व का मानना सार्थक हो सकेगा |

श्री नंगली साहिब

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नफे का सौदा


💠💠💠💠 नफे का सौदा — 💠💠💠💠

एक बार एक तपस्वी सिद्ध संत काशी में एक किसान एक घर भिक्षा मांगने गए !

उन्होंने भिक्षापात्र को आगे बढ़ाया ही था कि किसान ने उन्हें एक बार ऊपर से नीचे तक देखा । शरीर पूर्णांग था । कहीं कोई अपंगता उसे दिखाई नहीं दी !

किसान कर्म पूजक था । गहरी आँखों से देखता हुआ बोला – ” मैं तो किसान हूँ । दिनरात परिश्रम करके अपना पेट भरता हूँ । साथ ही अपने पुरे परिवार को संभालता हूँ । अनाथ और अपंग लोगों को भिक्षा भी देता हूँ । लेकिन तुम क्यों बीना परिश्रम किये भोजन प्राप्त करना चाहते हो ?”

संत ने बहुत ही शांत स्वर में उत्तर दिया – ” मैं भी तो किसान हूँ । मैं भी खेती करता हूँ !”

किसान ने आश्चर्य से उनकी तरफ देखा और कहा – ” तो फिर आप भिक्षा क्यों मांग रहे है ?”

संत ने किसान की शंका का समाधान करते हुए कहा – ” हाँ वत्स ! मैं भी खेती करता हूँ, किन्तु मैं आत्मा की खेती करता हूँ ।

मैं ज्ञान के हल से श्रृद्धा के बीज बोता हूँ । तपस्या के जल से सींचता हूँ !

विनय मेरे हल की हरिस,। विचारशीलता फाल, और मन नरेली है !

सतत अभ्यास का यान मुझे गंतव्य की ओर ले जा रहा है जहाँ न दुःख है न संताप । मेरी इस खेती से अमरता की फसल लहराती है !

तब यदि तुम मुझे अपनी खेती का कुछ भाग दो और मैं तुम्हे अपनी खेती का कुछ भाग दू तो क्या यह सौदा लाभ का न रहेगा !”

किसान को बात समझ में आ गई । वह ख़ुशी से संत के चरणों में नतमस्तक हो गया !!

दान की महिमा अंनत है भिक्षुक सद्पात्र होना चाहिए !

!! जय श्रीराम !!

संजय गुप्त

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एक ऐसा गांव जहाँ सिर्फ एक बार जाने से मिट जाती है गरीबी, भगवान शिव ने दिया है यह वरदान


एक ऐसा गांव जहाँ सिर्फ एक बार जाने से मिट जाती है गरीबी, भगवान शिव ने दिया है यह वरदान
27 Jan. 2018

यदि आप गरीब हैं तो उत्तराखंड के इस गांव में जा कर देखिये। यहां पर भगवान शिव की ऐसी महिमा है कि जो भी यहाँ आता है उनकी गरीबी दूर हो जाती है। इतना ही नहीं इस गांव को श्रापमुक्त जगह का दर्जा प्राप्त है। यह माना जाता है कि यहां आने से व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है

ये स्थान है उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित देश का सबसे अंतिम गांव माणा। यहीं पर माणा पास है जिससे होकर भारत और तिब्बत के मध्य वर्षों से व्यापार होता रहा था। पवित्र बद्रीनाथ धाम से 3 किमी आगे जाकर भारत और तिब्बत की सीमा पर स्थित इस गांव का नाम भगवान शिव के भक्त मणिभद्र देव के नाम पर रखा गया था। उत्तराखंड संस्कृत अकादमी, हरिद्वार के उपाध्यक्ष पंडित नंद किशोर पुरोहित कहते हैं कि इस गांव में आने पर व्यक्ति स्वप्नद्रष्टा हो जाता है। जिसके पश्चात् वह होने वाली घटनाओं के बारे में जान सकता है। डॉ. नंद किशोर के मुताबिक माणिक शाह नाम का एक व्यापारी था जो शिव का बहुत बड़ा भक्त था। एक बार व्यापारिक यात्रा के दौरान लुटेरों ने उसका सिर काटकर कत्ल कर दिया।

किन्तु इसके बाद भी उसकी गर्दन शिव का जाप करती रही। उसकी श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसके गर्दन पर वराह का सिर लगा दिया। इसके बाद माणा गांव में मणिभद्र की पूजा भी की जाने लगी। तब शिव ने माणिक शाह को वरदान दिया कि माणा आने पर व्यक्ति की दरिद्रता दूर हो जाएगी। डॉं नंदकिशोर के मुताबिक मणिभद्र भगवान से बृहस्पतिवार के दिन पैसे के लिए प्रार्थना की जाए तो अगले बृहस्पतिवार तक मिल जाते है। इसी गांव में श्रीगणेश जी ने व्यास ‌ऋषि के कहने पर महाभारत की रची थी। इतना ही नहीं महाभारत युद्ध के समाप्त होने पर पांडव द्रोपदी के साथ इसी गांव से होकर ही स्वर्ग को जाने वाली स्वर्गारोहिणी सीढ़ी तक गए थे।

संजय गुप्ता