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#जीवनमेसंयमरखनाआवश्यक_है.

एक समय की बात है, एक व्यक्ति अपनी जिंदगी में हो रही परेशानी से बहुत उदास था। वह समस्याओं और मुसीबतों से इस कदर टूट गया था, कि उसके मन में हर पल एक नकारात्मक विचार आने लगी थी। जीवन की बहुत सारी परेशानी होने की वजह से वह ज्यादा हताश हो गया था, एक बार उसे किसी ने की आप किसी अच्छे से संत महात्मा के पास जाओ वही आपके समस्या का उपाय बतायेंगे अथवा कोई मार्गदर्शन करेंगे | वह एक संत के पास पहुँचा और उनसे अपनी समस्या बताई। संत ने उसकी बात को ध्यानपूर्वक सुना और उसे अगले दिन आने को कहा।

अगले दिन जब वह व्यक्ति संत के पास पहुँचा तो संत ने उसे पानी से भरा एक गिलास देते हुए कहा इसमें एक मुट्ठी नमक डालो और इस पानी को पी जाओ| वह व्यक्ति संत की बात को मानते हुए पानी में नमक डालकर पीने लगा। लेकिन एक घूँट पानी से ज्यादा नहीं पी पाया। तभी संत ने पूछा क्या हुआ? पानी का स्वाद कैसा लगा? तब उस व्यक्ति ने जवाब दिया एकदम कड़वा। संत मुस्कुराये और बोले ठीक है अब फिर से एक मुट्ठी नमक और लो और मेरे पीछे पीछे आओ।

वह व्यक्ति मुट्ठी मे नमक लेकर संत के पीछे पीछे चलने लगा। वहा से कुछ दूरी पर ही एक झील था, संत उस व्यक्ति को उसी एक झील के पास लेकर गये । और बोले अपने मुट्ठी पर जो नमक रखे हो उसे इस झील के पानी मे डाल दो। व्यक्ति ने नमक झील में डाल दिया। उसके बाद संत बोले अब इस झील का पानी पियो। व्यक्ति ने झील से पानी पिया। जब व्यक्ति ने पानी पी लिया तब संत ने उससे पुनः यही पूछा अब बताओ पानी का स्वाद कैसा है? क्या यह तुम्हे अभी भी कड़वा लग रहा है? व्यक्ति ने जवाब दिया नहीं नहीं ये तो बहुत मीठा है।

तब संत ने उस व्यक्ति को समझाते हुए कहा। यह जीवन के दुःख भी बिल्कुल नमक की तरह हैं। ना तो यह कम है और ना ही ज्यादा। सभी के जीवन में दुखों की मात्रा वही रहती है लेकिन ये हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों, मुश्किलों, मुसीबतों का सामना किस तरह से करते हैं। यदि हमने खुद को छोटा करके दुखों को बहुत बड़ा बना दिया तो ये दुःख हमारी जिंदगी को कड़वाहट से भर देंगे। और यदि हमने दुखों की तुलना में खुद को बहुत बड़ा बना लिया तो कोई भी दुःख हमारी जिंदगी की मिठास को नहीं छीन सकता । इसलिए हमे उस झील की पानी की तरह बनना है जिसमे दुख के कड़वाहट मिलने पर भी हमे दुख का पता न चले.

Dev krishna

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एक बार एक विदेशी भारत आया। उसने ताजमहल को देखकर किसी से पूछा कि ये ताज महल किसने बनाया? एक आदमी बोला, ‘पता नहीं।’विदेशी ने समझा की ‘पता नहीं’ ने बनाया है। फिर विदेशी ने जयपुर का महल देखा और किसी से पूछा की ये किसने बनाया? किसी ने कहा, ‘पता नहीं?’ विदेशी बोला ये भी पता नहीं ने बनाया बहुत अच्छा बनाया है। फिर वो दिल्ली गया और उधर कुतब मीनार देखा और किसी से पूछा ये किसने बनाई? फिर किसी ने कहा, ‘पता नहीं।’ विदेशी ने सोचा ये भी ‘पता नहीं’ ने बनाया। क्या मस्त इंजीनियर है यार ‘पता नहीं’। मैं ‘पता नहीं’ से जरूर मिलकर जाऊंगा। कुछ आगे चलकर उसको एक जनाजा मिला तो विदेशी ने किसी से पूछा, ‘ये कौन मर गया?’ उस आदमी ने कहा, ‘पता नहीं!’ विदेशी उदास होकर बोला : ‘मेरी तो किस्मत ही खराब है, मिलने से पहले ही पता नहीं मर गया!’

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श्रीमद्भगवद्गीता संबंधित प्रश्नोत्तरी ?????

प्रश्न ‒ यह जीव परमात्माका अंश है ( – गीता । १५ | ७ । ), तो क्या यह जीव परमात्मा से पैदा हुआ है ? क्या यह जीव परमात्मा का एक टुकड़ा है ?

उत्तर ‒ऐसी बात नहीं है । यह जीव अनादि है, सनातन है और परमात्मा पूर्ण है; अतः जीव परमात्मा का टुकड़ा कैसे हो सकता है ? वास्तव में यह जीव परमात्मस्वरूप ही है; परंतु जब यह प्रकृति के अंश को अर्थात् शरीर-इन्द्रियाँ-मन बुद्धि को ” मैं और मेरा ‘’ मान लेता है, तब यह अंश हो जाता है । प्रकृतिके अंश को छोड़ने पर यह पूर्ण हो जाता है ।

प्रश्न ‒ ईश्वर अपनी माया से सम्पूर्ण प्राणियोंको घुमाता है ( – गीता । १८ । ६१ । ), तो क्या ईश्वर ही प्राणियों से पाप-पुण्य कराता है ?

उत्तर ‒ जैसे कोई मनुष्य रेल में बैठ जाता है, तो उसको परवश होकर रेल के अनुसार ही जाना पड़ता है; ऐसे ही जो प्राणी शरीररूपी यन्त्र पर आरूढ़ हो गये हैं अर्थात् जिन्होंने शरीररूपी यन्त्र के साथ मैं-मेरापन का सम्बन्ध जोड़ लिया है, उन्हीं प्राणियों को ईश्वर उनके स्वभाव और कर्मों के अनुसार घुमाता है, कर्मों का फल भुगताता है, उनसे पाप-पुण्य नहीं कराता ।

प्रश्र ‒ अनुगीता में भगवान्‌ ने कहा है कि उस समय मैंने योगमें स्थित होकर गीता कही थी, पर अब मैं वैसी बातें नहीं कह सकता ( – महाभारत, आश्वमेधिक॰ । १६ । १२ । १३ । ), तो क्या भगवान्‌ भी कभी योग में स्थित रहते हैं और कभी योग में स्थित नहीं रहते ? क्या भगवान्‌ का ज्ञान भी आगन्तुक है ?

उत्तर ‒ जैसे बछड़ा गाय का दूध पीने लगता है, तो गाय के शरीर में रहने वाला दूध स्तनों में आ जाता है, ऐसे ही श्रोता उत्कण्ठित होकर जिज्ञासापूर्वक कोई बात पूछता है, तो वक्ता के भीतर विशेष भाव स्फुरित होने लगते हैं । गीता में अर्जुन ने उत्कण्ठा और व्याकुलता-पूर्वक अपने कल्याण की बातें पूछी थीं, जिससे भगवान्‌ के भीतर विशेषता से भाव पैदा हुए थे । परंतु अनुगीता में अर्जुन की उतनी उत्कण्ठा, व्याकुलता नहीं थी । अतः गीता में जैसा रसीला वर्णन आया है, वैसा वर्णन अनुगीता में नहीं आया ।

प्रश्न ‒ भगवान्‌ ने गीता में तीन जगह ( – गीता । ३ । ३ । ; । १४ । ६ । और । १५ । २० में ) अर्जुन के लिये ” अनघ ” सम्बोधन का प्रयोग किया है, जिससे सिद्ध होता है कि भगवान्‌ अर्जुन को पापरहित मानते हैं, तो फिर ‘‘ मैं तेरे को सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा ” ( – गीता । १८ । ६६ । ) – यह कहना कैसे ?

उत्तर ‒ जो भगवान्‌ के सम्मुख हो जाता है, उसके पाप समाप्त हो जाते हैं । अर्जुन ( – गीता । २ । ७ । में ) भगवान्‌ के सम्मुख हुए थे; अतः वे पापरहित थे और भगवान्‌ की दृष्टि में भी अर्जुन पापरहित थे । परन्तु अर्जुन यह मानते थे कि युद्ध में कुटुम्बियों को मारने से मेरे को पाप लगेगा ( – गीता । १ । ३६ । ; । ३९, ४५ । ) । अर्जुन की इस मान्यता को लेकर ही भगवान्‌ कहते हैं कि ” मैं तेरेको सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा । ”

प्रश्न – भगवान् किसी के पाप-पुण्य को ग्रहण नहीं करते ( – गीता । ५ । १५ । ) तू जो कुछ करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे अर्थात् भगवान् सब कुछ ग्रहण करते हैं ( – गीता । ९ । २७ । ) ‒ यह दोनों बातें कैसे ?

उत्तर – विषय दो हैं, एक नहीं । पाँचवें अध्याय के पंद्रहवें श्लोक में सामान्य प्राणियों की बात है और नवें अध्याय के सत्ताईसवें श्लोक में भक्तों की बात है । सामान्य प्राणी तो स्वयं ही कर्ता और भोक्ता बनते हैं अर्थात् अपने किये हुएका फल स्वयं ही भोगते हैं, इसलिये भगवान् उनके पाप-पुण्य को ग्रहण नहीं करते । परंतु जो सर्वथा भगवान्‌ की शरण हो जाते हैं, वे भक्त भगवान्‌ को ही सबका भोक्ता और मालिक मानते हैं । अतः वे भक्त भावपूर्वक भगवान्‌ को जो कुछ देते हैं, अर्पण करते हैं, उसको भगवान् ग्रहण करते हैं । उन भक्तों के भाव के कारण ही भगवान्‌ को भूख लग जाती है, प्यास लग जाती है ( – गीता । ९ । २६ । ) । कारण कि भगवान् भाव के ही भोक्ता हैं ।

प्रश्न – देखना, सुनना, स्पर्श करना आदि क्रियाएँ करता हुआ भी ऐसा मानता है कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ ( – गीता । ५ । ८-९ । ) ‒ यह कैसे ?

उत्तर – सांख्ययोगी को यही अनुभव होता है कि वास्तव में इन्द्रियाँ ही इन्द्रियों के विषयों में बरत रही हैं अर्थात् सभी क्रियाएँ इन्द्रियों में ही हो रही हैं । करनामात्र प्रकृति में ही है; क्योंकि मात्र क्रियाएँ और पदार्थ प्रकृति के ही हैं । स्वरूप में न क्रिया है, न पदार्थ । अतः ‘’ मैं स्वयं प्रकृति से अतीत चिन्मय तत्त्व हूँ; मेरे स्वरूप के साथ इनका कोई सम्बन्ध था नहीं, है नहीं, होगा नहीं और होना सम्भव ही नहीं, इसलिये मैं कुछ भी नहीं करता हूँ ” ‒इस प्रकार अपने स्वरूप की दृष्टि से कहना वास्तविक ही है ।

प्रश्न ‒ कोई एक मेरे को तत्त्व से जानता है ( – गीता । ७ । ३ । ) ; मेरे को कोई नहीं जानता ( – गीता । ७ । २६ । ) ‒ यह दो बातें कैसे ?

उत्तर ‒ सातवें अध्याय के तीसरे श्लोक में साधकों की बात है । जो संसार से उपराम होकर भगवान्‌ में लग जाते हैं, वे भगवान्‌ की कृपा से भगवान्‌ को जान जाते हैं । सातवें अध्याय के छब्बीसवें श्लोक में सामान्य प्राणियों की बात है । जो प्राणी जन्म-मृत्यु के प्रवाह में पड़े हुए हैं, उनको भगवान् तो जानते हैं, पर वे प्राणी मूढ़ता के कारण भगवान्‌ को नहीं जानते । तात्पर्य है कि उपर्युक्त दोनों श्लोकों में साधक-असाधक का भेद है अर्थात् तीसरे श्लोक में जानने के कर्ता साधक हैं और छब्बीसवें श्लोक में जानने के कर्ता असाधक हैं ।

प्रश्न – वह परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियों और उनके विषयों को प्रकाशित करने वाला है तथा वह सम्पूर्ण इन्द्रियों से रहित है ( – गीता । १३ । १४ । ) ‒ यह कैसे ?

उत्तर – जैसे एक-एक इन्द्रिय से एक-एक विषय का ज्ञान होता है, पर मन को पाँचों इन्द्रियों का, उनके विषयों का और उन विषयों में एक-एक विषय में क्या कमी है, क्या घटिया है, क्या बढ़िया है; आदि का ज्ञान होता है अर्थात् मन पाँचों इन्द्रियों को तथा उनके विषयों को प्रकाशित करता है । मन को ऐसा ज्ञान होते हुए भी मन में पाँचों इन्द्रियाँ नहीं हैं । ऐसे ही वह परमात्मा सबको, संसारमात्र को प्रकाशित करता है, पर वह इन्द्रियों से रहित है अर्थात् उस परमात्मा में इन्द्रियाँ नहीं है ।

प्रश्न- प्रकृति में स्थित पुरुष ही भोक्ता बनता है ( – गीता । १३ । २१ । ); शरीर में स्थित होता हुआ भी पुरुष भोक्ता नहीं बनता ( – गीता । १३ । ३१ । ); यह दोनों बातें कैसे ?

उत्तर- तेरहवें अध्याय के इक्कीसवें श्लोक में तो जो प्रकृति में स्थित है अर्थात् जिसने प्रकृति ( अर्थात्‌ शरीर ) के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लिया है, वही प्रकृतिजन्य गुणों का भोक्ता बनता है; और इकतीसवें श्लोक में जो शरीर से सम्बन्ध-विच्छेद करके अपने स्वरूप में स्थित हो गया है, वह शरीर में रहता हुआ भी भोक्ता नहीं बनता । तात्पर्य है कि इक्कीसवें श्लोक में तो प्रकृति ( शरीर ) के साथ सम्बन्ध जोड़े हुए पुरुष का वर्णन है और इकतीसवें श्लोक में शरीर के साथ सम्बन्ध तोड़े हुए पुरुष का वर्णन है ।

प्रश्न ‒ परमात्मा ‘ज्ञेय’ अर्थात् जानने योग्य है ( – गीता । १३ । १२ । ) ; परमात्मा ‘अविज्ञेय’ अर्थात् जानने का विषय नहीं है ( – गीता । १३ । १५ । ) ‒ यह दोनों बातें कैसे ?

उत्तर ‒ जानना दो तरह का होता है:- करण-निरपेक्ष और करण-सापेक्ष । जो इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि करणों के द्वारा नहीं जाना जा सकता, वह करण-निरपेक्ष होता है और जो करणों के द्वारा जाना जा सकता है, वह करण-सापेक्ष होता है । परमात्मतत्त्व का ज्ञान करण-निरपेक्ष होता है अर्थात् वह स्वयं के द्वारा ही जाना जाता है, इसलिये वह ‘ज्ञेय’ है और वह करणों के द्वारा जानने में नहीं आता, इसलिये वह ‘अविज्ञेय’ है ।

प्रश्न‒ शरीरी (जीवात्मा) अविनाशी है, इसका विनाश कोई कर ही नहीं सकता ( – गीता । २ । १७ । ) यह न मारता है और न मारा जाता है ( – गीता । २ । १९ । ) तो फिर मनुष्य को प्राणियों की हत्या का पाप लगना ही नहीं चाहिये ?

उत्तर‒ पाप तो पिण्ड-प्राण का वियोग करने का लगता है; क्योंकि प्रत्येक प्राणी पिण्ड-प्राण में रहना चाहता है, जीना चाहता है । यद्यपि महात्मा लोग जीना नहीं चाहते, फिर भी उन्हें मारने का बड़ा भारी पाप लगता है; क्योंकि उनका जीना संसारमात्र चाहता है । उनके जीने से प्राणिमात्र का परम हित होता है, प्राणिमात्र को सदा रहने वाली शान्ति मिलती है । जो वस्तुएँ प्राणियों के लिये जितनी आवश्यक होती हैं, उनका नाश करने का उतना ही अधिक पाप लगता है ।

प्रश्न‒ ज्ञानवान् पुरुष अपनी प्रकृति ( स्वभाव ) के अनुसार चेष्टा करता है ( – गीता । ३ । ३३ । ), पर वह बँधता नहीं । अन्य प्राणी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करते हैं, पर वे बँध जाते हैं । ऐसा क्यों ?

उत्तर‒ ज्ञानी महापुरुष की प्रकृति तो राग-द्वेष रहित, शुद्ध होती है; अतः वह प्रकृति को अपने वश में करके ही चेष्टा करता है, इसलिये वह कर्मो से बँधता नहीं । परंतु अन्य प्राणियों की प्रकृति में राग-द्वेष रहते हैं और वे प्रकृति के वश में होकर राग-द्वेषपूर्वक कार्य करते हैं, इसलिये वे कर्मो से बँध जाते हैं । अतः मनुष्य को अपनी प्रकृति, अपना स्वभाव शुद्ध‒निर्मल बनाना चाहिये और अपने अशुद्ध स्वभाव के वश में होकर कोई कार्य नहीं करना चाहिये ।

प्रश्न‒ ज्ञानिजन ब्राह्मण, चाण्डाल, गाय, हाथी, कुत्ते आदिमें समदर्शी होते हैं ( – गीता । ५ । १८ । ), तो फिर वर्ण, आश्रम आदि का अड़ंगा क्यों ?

उत्तर‒ज्ञानी महापुरुष का व्यवहार तो ब्राह्मण, चाण्डाल गाय, हाथी आदि के शरीरों को लेकर यथायोग्य ही होता है । शरीर नित्य-निरन्तर बदलते है; अतः ऐसे परिवर्तनशील शरीर में उनकी विषमता रहती है और रहनी ही चाहिये ।

कारण कि सभी प्राणियों के साथ खान-पान आदि व्यवहार की एकता, समानता तो कोई कर ही नहीं सकता अर्थात् सबके साथ व्यवहार में विषमता तो रहेगी ही ।

ऐसी विषमता में भी तत्त्वदर्शी पुरुष एक परमात्मा को ही समानरूप से देखते हैं । इसीलिये भगवान्‌ ने तत्त्वज्ञ पुरुषों के लिये ‘‘ समदर्शिनः ’’ कहा है, न कि ‘’ समवर्तिनः ‘’ । समवर्ती (समान व्यवहार करनेवाला) तो यमराज का, मौतका नाम है, जो कि सबको समानरूप से मारती है ।

प्रश्न‒ मनुष्यलोकमें कर्मजन्य सिद्धि शीघ्र मिल जाती है’ (- गीता । ४ । १२ । ), पर यह बात देखने में नहीं आती । ऐसा क्यों ?

उत्तर‒ कर्मजन्य सिद्धि, कर्मों का फल- दो प्रकार का होता है‒ एक तात्कालिक और दूसरा कालान्तरिक । तात्कालिक फल शीघ्र देखने में आता है और कालान्तरिक फल समय पाकर देखने में आता है, शीघ्र देखने में नहीं आता । भोजन किया और भूख मिट गयी; जल पिया और प्यास मिट गयी; ए• सी• चलाया और गर्मी मिट गयी; गरम कपड़ा ओढ़ा और जाड़ा दूर हो गया‒ यह तात्कालिक फल है ।

इसी तरह किसी को प्रसन्न करने के लिये उसकी स्तुति-प्रार्थना करने से, उसकी सेवा करने से वह प्रसन्न हो जाता है; ग्रहों की सांगोपांग विधिपूर्वक पूजा करने से ग्रह शान्त हो जाते है; महामृत्युञ्जय मन्त्र का जप करने से रोग दूर हो जाते है; गया में विधिपूर्वक श्राद्ध करने से जीव प्रेतयोनि से छूट जाता है और उसकी सद्‌गति हो जाती है‒यह सब कर्मो का तात्कालिक फल है ।

इस तात्कालिक फल को दृष्टि में रखकर ही लोग देवताओं की उपासना करते है । अतः ‘मनुष्यलोक में कर्मजन्य सिद्धि शीघ्र मिल जाती है’‒ऐसा कहा गया है ।

।। राम राम ।।

संजय गुप्ता

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भगवान का नाम


(((( भगवान का नाम ))))
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एक पंडित जी थे। उन्होंने एक नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया हुआ था।
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पंडित जी बहुत विद्वान थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे।
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नदी के दूसरे किनारे पर लक्ष्मी नाम की एक ग्वालिन अपने बूढ़े पिताश्री के साथ रहती थी।
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लक्ष्मी सारा दिन अपनी गायों को देखभाल करती थी। सुबह जल्दी उठकर अपनी गायों को नहला कर दूध दोहती,
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फिर अपने पिताजी के लिए खाना बनाती, तत्पश्चात् तैयार होकर दूध बेचने के लिए निकल जाया करती थी।
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पंडित जी के आश्रम में भी दूध लक्ष्मी के यहाँ से ही आता था।
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एक बार पंडित जी को किसी काम से शहर जाना था। उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि उन्हें शहर जाना है, इसलिए अगले दिन दूध उन्हें जल्दी चाहिए।
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लक्ष्मी अगले दिन जल्दी आने का वादा करके चली गयी।
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अगले दिन लक्ष्मी ने सुबह जल्दी उठकर अपना सारा काम समाप्त किया और जल्दी से दूध उठाकर आश्रम की तरफ निकल पड़ी।
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नदी किनारे उसने आकर देखा कि कोई मल्लाह अभी तक आया नहीं था। लक्ष्मी बगैर नाव के नदी कैसे पार करती ?
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फिर क्या था, लक्ष्मी को आश्रम तक पहुँचने में देर हो गयी।
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आश्रम में पंडित जी जाने को तैयार खड़े थे। उन्हें सिर्फ लक्ष्मी का इन्तजार था।
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लक्ष्मी को देखते ही उन्होंने लक्ष्मी को डाँटा और देरी से आने का कारण पूछा।
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लक्ष्मी ने भी बड़ी मासूमियत से पंडित जी से कह दिया कि नदी पर कोई मल्लाह नहीं था, वह नदी कैसे पार करती ? इसलिए देर हो गयी।
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पंडित जी गुस्से में तो थे ही, उन्हें लगा कि लक्ष्मी बहाने बना रही है। उन्होंने भी गुस्से में लक्ष्मी से कहा,
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क्यों बहाने बनाती है। लोग तो जीवन सागर को भगवान का नाम लेकर पार कर जाते हैं, तुम एक छोटी सी नदी पार नहीं कर सकती ?
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पंडित जी की बातों का लक्ष्मी पर बहुत गहरा असर हुआ। दूसरे दिन भी जब लक्ष्मी दूध लेकर आश्रम जाने निकली तो नदी के किनारे मल्लाह नहीं था।
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लक्ष्मी ने मल्लाह का इंतजार नहीं किया। उसने भगवान को याद किया और पानी की सतह पर चलकर आसानी से नदी पार कर ली।
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इतनी जल्दी लक्ष्मी को आश्रम में देख कर पंडित जी हैरान रह गये, उन्हें पता था कि कोई मल्लाह इतनी जल्दी नहीं आता है।
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उन्होंने लक्ष्मी से पूछा कि तुमने आज नदी कैसे पार की ?
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लक्ष्मी ने बड़ी सरलता से कहा—‘‘पंडित जी आपके बताये हुए तरीके से। मैंने भगवान् का नाम लिया और पानी पर चलकर नदी पार कर ली।’’
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पंडित जी को लक्ष्मी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने लक्ष्मी से फिर पानी पर चलने के लिए कहा।
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लक्ष्मी नदी के किनारे गयी और उसने भगवान का नाम जपते-जपते बड़ी आसानी से नदी पार कर ली।
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पंडित जी हैरान रह गये। उन्होंने भी लक्ष्मी की तरह नदी पार करनी चाही।
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पर नदी में उतरते वक्त उनका ध्यान अपनी धोती को गीली होने से बचाने में लगा था।
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वह पानी पर नहीं चल पाये और धड़ाम से पानी में गिर गये।
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पंडित जी को गिरते देख लक्ष्मी ने हँसते हुए कहा, ‘‘आपने तो भगवान का नाम लिया ही नहीं, आपका सारा ध्यान अपनी नयी धोती को बचाने में लगा हुआ था।’’
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पंडित जी को अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्हें अपने ज्ञान पर बड़ा अभिमान था।
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पर अब उन्होंने जान लिया था कि भगवान को पाने के लिए किसी भी ज्ञान की जरूरत नहीं होती। उसे तो पाने के लिए सिर्फ सच्चे मन से याद करने की जरूरत है।
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कहानी में हमें यह बताया गया है कि अगर सच्चे मन से भगवान को याद किया जाये, तो भगवान तुरन्त अपने भक्तों की मदद करते है।
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं..

संजय गुप्ता

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अन्न/भोजन का मन पर क्या असर होता है ।
इस उद्धाहरण से हम समझ सकते है –
” तीन महीने का प्रयोग करके देखे कि सात्विक अन्न खाने से अपने आप को एक बदलाव महसूस होने लगेगा क्योंकि जैसा अन्न वैसा मन। ”
सात्विक अन्न सिर्फ शाकाहारी भोजन नही बल्कि परमात्मा की याद में बनाया गया भोजन है .

गुस्से से अगर खाना बनाया गया है उसे सात्विक अन्न नही कहेंगे, इसलिए खाना बनाने वालों को कभी भी नाराज, परेशान स्थिति में खाना नही बनाना चाहिए।

और कभी भी माँ बहनों को (या जो खाना बनाते है उनको) डांटना नहीं, उनसे कभी लड़ना नहीं क्योंकि वो kitchen में जाके और आपके ही खाने में गुस्से वाली Vibrations मिला के…..आपको ही एक घंटे में खिलाने वाले है….
ये ध्यान में रखने वाली अत्यन्त ही महत्वपूर्ण बात है।

किसी को डांट दो, गुस्सा कर दो और बोलो जाके खाना बनाओ…..अब….?
खाना तो हाथ बना रहा है मन क्या कर रहा है अन्दर मन तो लगतार खिन्न है -……तो वो सारे Vibration खाने के अंदर जा रहे है..

भोजन तीन प्रकार का होता है-
1. जो हम Hotel में खाते है
2. जो घर में माँ बनाती है और
3. जो हम मंदिर और गुरूद्वारे में खाते है
तीनो के Vibration अलग अलग होते हैं ।

(1) जो Hotel में खाना बनाते है उनके Vibration कैसे होते है आप खाओ और हम कमायें जो ज्यादा बाहर खाता है उसकी वृति धन कमाने के अलावा कुछ और सोच नहीं सकती है क्यूंकि वो खाना ही वही खा रहा है…

(2) घर में जो माँ खाना बनाती है
वो बड़े प्यार से खाना बनाती है…
घर में आजकल जो धन ज्यादा आ गया है इसलिए घर में Cook (नौकर) रख लिए है खाना बनाने के लिए और वो जो खाना बना रहे है वो भी.. इसी सोच से कि आप खाओ हम कमाए….

एक बच्चा अपनी माँ को बोले कि..एक रोटी और खानी है तो माँ का चेहरा ही खिल जाता है।कितनी प्यार से वो एक और रोटी बनाएगी। कि मेरे बच्चे ने रोटी तो और मांगी वो उस रोटी में बहुत ज्यादा प्यार भर देती है…
अगर आप अपने Cook (नौकर) को बोलो एक रोटी और खानी है…. तो..? वो सोचेगा …रोज 2 रोटी खाते है, आज एक और चाहिए आज ज्यादा भूख लगी है अब मेरे लिए एक कम पडेगी या ..आटा भी ख़त्म हो गया अब और आटा गुंथना पड़ेगा एक रोटी के लिए..मुसीबत…!!!

ऐसी रोटी नही खानी है..ऐसी रोटी खाने से..ना खाना ही भला….

(3) जो मंदिर और गुरूद्वारे में
खाना बनता है प्रसाद बनता है वो किस भावना से बनता है…
वो परमात्मा को याद करके खाना बनाया जाता है क्यों न हम अपने घर में परमात्मा की याद में प्रसाद बनाना शुरू कर दें.

करना क्या है-
घर, रसोई साफ़, मन शांत, रसोई में अच्छे गीत (भजन-कीर्तन) चलाये और परमात्मा को याद करते हुए खाना बनाये ।

घर में जो Problem है उसके लिए जो solution है उसके बारे में परमात्मा को याद करते हुए खाना बनाये.
परमात्मा को कहे मेरे बच्चे के कल exam है, इस खाने में बहुत ताकत भर दो.! शांति भर दो.! ताकि मेरे बच्चे का मन एकदम शांत हो, ताकि उसकी सारी टेंशन ख़तम हो जाये.
हे परमात्मा, मेरे पति को Business में बहुत टेंशन है और वो बहुत गुस्सा करते हैं, इस खाने में ऐसी शक्ति भरो, कि उनका मन शांत हो जाये…
जैसा अन्न वैसा मन.. जादू है खाने में। असर है पकाने में।
🍲🌯🌮🍞🍝🍲🍜🌯🍣🌭☕

संजय गुप्ता

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ठाकुर जी और उनके भक्त की एक निराली कथा


ठाकुर जी और उनके भक्त की एक निराली कथा …….
एक लडकी थी जो कृष्ण जी की अनन्य भक्त थी, बचपन से ही कृष्ण भगवान का भजन करती थी, भक्ति करती थी, भक्ति करते-करते बड़ी हो गई, भगवान की कृपासे उसका विवाह भी श्रीधाम वृंदावन में किसी अच्छे घर में हो गया. विवाह होकर पहली बार वृंदावन गई, पर नई दुल्हन होने से कही जा न सकी, और मायके चलि गई. और वो दिन भी आया जब उसका पति उसे लेने उसके मायके आया, अपने पति के साथ फिर वृंदावन पहुँच गई, पहुँचते पहुँचते उसे शाम हो गई, पति वृंदावन में यमुना किनारे रूककर कहने लगा –
देखो! शाम का समय है में यमुना जी मे स्नान करके अभी आता हूँ, तुम इस पेड़ के नीचे बैठ जाओ और सामान की देखरेख करना मै थोड़े ही समय में आ जाऊँगा यही सामने ही हूँ, कुछ लगे तो मुझे आवाज देदेना, इतना कहकर पति चला गया और वह लडकी बैठ गई.
अब एक हाथ लंबा घूँघट निकाल रखा है, क्योकि गाँव है,ससुराल है और वही बैठ गई, मन ही मन विचार करने लगी – कि देखो! ठाकुर जी की कितनी कृपाहै उन्हें मैंने बचपन से भजा और उनकी कृपा से मेरा विवाह भी श्री धाम वृंदावन में हो गया.
मैं इतने वर्षों से ठाकुर जी को मानती हूँ परन्तु अब तक उनसेकोई रिश्ता नहीं जोड़ा? फिर सोचती है ठाकुर जी की उम्र क्या होगी ? लगभग १६ वर्ष के होंगे, मेरे पति २० वर्ष केहै उनसे थोड़े से छोटे है, इसलिए मेरे पति के छोटे भाई की तरह हुए, और मेरे देवर की तरह, तो आज से ठाकुर जी मेरे देवर हुए, अब तो ठाकुर जी से नया सम्बन्ध जोड़कर बड़ी प्रसन्न हुई और मन ही मन ठाकुर जी से कहने लगी – “देखो ठाकुर जी ! आज से मै तुम्हारी भाभी और तुम मेरे देवर हो गए, अब वो समय आएगा जब तुम मुझे भाभी-भाभी कहकर पुकारोगे”
इतना सोच ही रही थी तभी एक १०- १५ वर्ष का बालक आया और उस लडकी से बोला – भाभी-भाभी !
लडकी अचानक अपने भाव से बाहर आई और सोचने लगी वृंदावन में तो मै नई हूँ ये भाभी कहकर कौन बुला रहा है, नई थी इसलिए घूँघट उठकर नहीं देखा कि गाँव के किसी बड़े-बूढ़े ने देख लिया तो बड़ी बदनामी होगी. अब वह बालक बार-बार कहता पर वह उत्तर न देती बालक पास आया और बोला – भाभी! नेक अपना चेहरा तो देखाय दे, अब वह सोचने लगी अरे ये बालक तो बड़ी जिद कर रहा है इसलिए कस केघूँघट पकड़कर बैठ गई कि कही घूँघट उठकर देखन ले, लेकिन उस बालक ने जबरजस्ती घूँघट उठकर चेहरा देखा और भाग गया. थोड़ी देर में उसका पति आ गया, उसनेसारी बात अपने पतिसे कही.
पति नेकहा – तुमने मुझे आवाज क्यों नहीं दी ? लड़की बोली – वह तो इतनेमें भाग ही गया था.
पति बोला – चिंता मत करो, वृंदावन बहुत बड़ा थोड़े ही है , कभी किसी गली में खेलता मिल गया तो हड्डी पसली एक कर दूँगा फिर कभी ऐसा नहीं कर सकेगा. तुम्हे जहाँ भी दिखे, मुझे जरुर बताना.
फिर दोनों घर गए, कुछ दिन बाद उसकी सास नेअपने बेटे से कहा- बेटा! देख तेरा विवाह हो गया, बहू मायके से भी आ गई, पर तुम दोनों अभी तक बाँके बिहारी जी केदर्शन के लिए नहीं गए कल जाकर बहू को दर्शन कराकर लाना. अब अगले दिन दोनों पति पत्नी ठाकुर जी के दर्शन के लिए मंदिर जाते है मंदिर में बहुत भीड़ थी,
लड़का कहने लगा – देखो! तुम स्त्रियों के साथ आगे जाकर दर्शन करो, में भी आता हूँ अब वह आगे गई पर घूंघट नहीं उठाती उसे डर लगता कोई बड़ा बुढा देखेगा तो कहेगा नई बहू घूँघट के बिना घूम रही है.
बहूत देर हो गई पीछे से पति ने आकर कहा –
अरी बाबली ! बिहारी जी सामनेहै, घूँघट काहे नाय खोले, घूँघट नाय खोलेगी तो दर्शन कैसे करेगी,
अब उसने अपना घूँघट उठाया और जो बाँके बिहारी जी की ओर देखातो बाँके बिहारी जी कि जगह वही बालक मुस्कुराता हुआ दिखा तो एकदम से चिल्लाने लगी – सुनिये जल्दी आओ!
जल्दी आओ !
पति पीछेसे भागा- भागा आया बोला क्या हुआ?
लड़की बोली – उस दिन जो मुझे भाभी-भाभी कहकर भागा था वह बालक मिल गया.
पति ने कहा – कहाँ है ,अभी उसे देखता हूँ ?
तो ठाकुर जी की ओर इशारा करके बोली- ये रहा, आपके सामनेही तो है,
उसके पति ने जो देखा तो अवाक रह गया और वही मंदिर में ही अपनी पत्नी के चरणों में गिर पड़ा बोला तुम धन्य हो वास्तव में तुम्हारे ह्रदय में सच्चा भाव ठाकुर जी के प्रति है,
मै इतने वर्षों से वृंदावन मै हूँ मुझे आज तक उनकेदर्शन नहीं हुए और तेरा भाव इतना उच्च है कि बिहारी जी के तुझे दर्शन हुए…………………………….
भक्त और भगवान की जय ………

संजय गुप्ता

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(((( भिखारी और अमीर ))))
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एक बार एक संत जंगल में ध्यानमग् न बैठे थे, वह आस पास की गतिविधियों से बिल्कुल बेख़बर होकर भगवान की तपस्या कर रहे थे |
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तभी वहाँ से एक अमीर आदमी गुज़रा और वो संत को देखकर बहुत प्रभावित हुआ |
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जब संत ने आँखे खोली तो वह उनके आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और अपने थेले से 1000 सोने के सिक्के निकाल कर बोला कि महाराज मेरी तरफ से ये सिक्के स्वीकार करें
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मुझे उम्मीद है कि आप इनका उपयोग अच्छे कामों में ही करेंगे|
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संत उसे देखकर मुस्कुराए और बोले कि क्या तुम अमीर आदमी हो ?
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वह बोला हाँ |
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संत ने कहा कि क्या तुम्हारे पास और धन है, वह बोला हाँ घर पे मेरे पास और बहुत सारा धन है मैं बहुत अमीर हूँ |
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संत बोले की क्या तुम और ज़्यादा अमीर बनाना चाहते हो वह बोला हाँ मैं रोज भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे और धन दें मैं और अमीर हो जायूँ|
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यह सुनकर संत ने उसे सिक्के वापस देते हुए कहा कि यह अपना धन वापस लो मैं भिखारी से कभी कुछ नहीं लेता|
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वह आदमी अपना अपमान सुनकर गुस्सा हो गया कि आप ये क्या बोल रहे हैं |
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संत बोले की मैं तो भगवान का भक्त हूँ मेरे पास सब कुछ है मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं लेकिन तुम तो रोज भगवान से धन माँगते हो तो अमीर तो मैं हू तुम तो भिखारी हो |
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अमीर की दौलत उसका चरित्र होता है नाकी धन|
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धन दौलत यह सब ऐसी चीज़ें हैं जिससे इंसान का कभी पेट नहीं भरता|
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आप किसी अमीर इंसान से जाकर पूछिए कि क्या आप संतुष्ट हैं तो वह कहेगा नहीं क्यूंकि उसे और धन चाहिए|
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अमीर वह होता है जो एक अच्छे चरित्र का मालिक है, धन से अमीर तो दुनिया में एक से एक भरे पड़े हैं, तो ऐसा अमीर बनने से क्या होगा|
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अपनी सोच को ऊँचा रखिये, विचारों को शुद्ध रखिये तब ही आप दुनिया के सबसे अमीर इंसान बन सकेंगे| धन्यवाद!!

((((( जय जय श्री राधे )))))
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आदतें नस्लों का पता देती हैं

बादशाह के यहॉं एक अजनबी नौकरी के लिए हाज़िर हुआ ।
क़ाबिलियत पूछी गई, कहा, “सियासी हूँ ” (अरबी में सियासी अक्ल ओ तदब्बुर से मसला हल करने वाले को कहते हैं )।

उसे खास “घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज” बना लिया।

चंद दिनों बाद बादशाह ने अपने सबसे महंगे और अज़ीज़ घोड़े के बारे में पूछा। उसने कहा, “नस्ली नहीं हैं ।”

बादशाह ने साईस को बुला कर पूँछा।उसने बताया, “घोड़ा नस्ली हैं, लेकिन पैदायश पर इसकी मां मर गई थी तो गाय का दूध पी कर पला है।”

बादशाह, “तुमको कैसे पता चला कि घोड़ा नस्ली नहीं हैं ?”

उसने कहा, “जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुँह में लेकर सर उठा लेता हैं ।”

बादशाह उसकी होशियारी से बहुत ख़ुश हुआ, और उसके घर अनाज, घी, भुने दुंबे, और परिंदों का आला गोश्त बतौर इनाम भिजवाया।

फिर, उसे मलिका के महल में तैनात कर दिया।

चंद दिनो बाद, बादशाह ने उस से बेगम के बारे में राय मांगी। उसने कहा, “तौर तरीके तो मलिका जैसे हैं लेकिन शहज़ादी नहीं हैं ।”

बादशाह के पैरों तले जमीन निकल गई। अपनी सास को बुलाया, मामला उसको बताया, सास ने कहा, “हक़ीक़त ये हैं, कि आपके वालिद ने मेरे खाविंद से हमारी बेटी की पैदायश पर ही रिश्ता मांग लिया था, लेकिन हमारी बेटी ६ माह में ही मर गई थी, लिहाज़ा हम ने आपकी बादशाहत से करीबी ताल्लुक़ात क़ायम करने के लिए किसी और कि बच्ची को अपनी बेटी बना लिया।”

बादशाह ने अपने मुसाहिब से पूछा, “तुम को कैसे इल्म हुआ ?”

उसने कहा, “उसका खादिमों के साथ सुलूक जाहिलों से भी बदतर हैं । एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक मुलाहजा एक अदब होता हैं, जो शहजादी में बिल्कुल नहीं ।”

बादशाह फिर उसकी फरासत से खुश हुआ और बहुत से अनाज , भेड़ बकरियां बतौर इनाम दीं साथ ही उसे अपने दरबार में तैनात कर दिया। कुछ वक्त गुज़रा,मुसाहिब को बुलाया, अपने बारे में दरियाफ्त किया ।

मुसाहिब ने कहा “जान की अमान ।” बादशाह नें वादा किया ।

उसने कहा, “न तो आप बादशाह ज़ादे हो न आपका चलन बादशाहों वाला है।”

बादशाह को ताव आया, मगर जान की अमान दे चुका था, सीधा अपनी वालिदा के महल पहुंचा ।

वालिदा ने कहा, “ये सच है, तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी औलाद नहीं थी तो तुम्हें पाला ।”

बादशाह ने मुसाहिब से पूँछा, “तुझे कैसे इल्म हुआ ?”

उसने कहा, “बादशाह जब किसी को “इनाम ओ इकराम” दिया करते हैं, तो हीरे मोती जवाहरात की शक्ल में देते हैं। लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें इनायत करते हैं। ये असलूब बादशाह ज़ादे का नही, किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है।”

किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, इल्म, बाहुबल हैं ये सब बाहरी मुल्लम्मा हैं ।

इंसान की असलियत, उस के खून की किस्म उसके व्यवहार, उसकी नीयत से होती हैं ।

इंसान आर्थिक, शारीरिक, सामाजिक और राजनैतिक रूप से बहुत शक्तिशाली होने के उपरांत भी अगर छोटी छोटी चीजों के लिए नियत खराब कर लेता हैं, इंसाफ और सच की कद्र नहीं करता, अपने पर उपकार और विश्वास करने वालों के साथ दगाबाजी कर देता हैं, अपने तुच्छ फायदे और स्वार्थ पूर्ति के लिए दूसरे इंसान को बड़ा नुकसान पहुंचाने की लिए तैयार हो जाता हैं, तो समझ लीजिए पीतल पर चढ़ा हुआ सोने का मुलम्मा है।

Vikash Khurana

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कब तक महिमा गायेंगे

कब तक कथा गुलामी की सुन, हम यूँ नैन झुकायेंगे l
सात समन्दर पार गये वो, कब तक महिमा गायेंगे ll

आजादी का जश्न ठीक पर, चारण गान नहीं गाना l
अंग्रेजी कुत्तों के सम्मुख, बनकर स्यार नहीं जाना ll
वीर भरत की औलादें हम, वीर धर्म अपनायेंगे l
कब तक कथा गुलामी की सुन, हम यूँ नैन झुकायेंगे ll

चाटुकार राजाओं ने निज, लालच में घुटने टेंके l
फूट डालकर अंग्रेजों ने, जाल बिछा, दाने फेंके ll
नेताओं को शर्म नहीं क्या, देश बेचकर खायेंगे l
कब तक कथा गुलामी की सुन, हम यूँ नैन झुकायेंगे ll

सवा अरब की मानव क्षमता, सारे जग पर भारी है l
जब हमीद ने ठान लिया तो, सारी सेना हारी है ll
स्वाभिमान का पावन उत्सव, मिलजुल आज मनायेंगे l
कब तक कथा गुलामी की सुन, हम यूँ नैन झुकायेंगे ll

कान खोलकर सुन ले दुनिया, राह छोड़ दो शेरों को l
भारत उनका जो भारत के, मार भगाओ गैरों को ll
धरती से अम्बर तक मिलकर, राष्ट्र ध्वजा फहरायेंगे l
कब तक कथा गुलामी की सुन, हम यूँ नैन झुकायेंगे ll

हिन्दी भारत माँ की भाषा, हिन्दी की जय – जय बोलो l
सवा अरब की आबादी मिल, जग हो हिन्दीमय, बोलो ll
धरती के कोने – कोने में, हिन्दी – राग सुनायेंगे l
कब तक कथा गुलामी की सुन, हम यूँ नैन झुकायेंगे ll

अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय 9862744237

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हाथ की 5 उंगलियाँ और उससे जुड़े शारीरिक अंग

हमारे हाथ की पांचों उंगलियाँ शरीर के अलग अलग अंगों से जुडी होती है | इसका मतलब आप को दर्द नाशक दवाइयां खाने की बजाए इस आसान और प्रभावशाली तरीके का इस्तेमाल करना करना चाहिए | आज इस लेख के माध्यम से हम आपको बतायेगे के शरीर के किसी हिस्से का दर्द सिर्फ हाथ की उंगली को रगड़ने से कैसे दूर होता है |

हमारे हाथ की अलग- अलग उंगलियाँ अलग- अलग बिमारिओ और भावनाओं से जुडी होती है | शायद आप को पता न हो, हमारे हाथ की उंगलिया चिंता, डर और चिड़चिड़ापन दूर करने की क्षमता रखती है | उंगलियों पर धीरे से दबाव डालने से शरीर के कई अंगो पर प्रभाव पड़ेगा।

1. अंगूठा 👍🏼
– The Thumb
हाथ का अंगूठा हमारे फेफड़ो से जुड़ा होता है | अगर आप की दिल की धड़कन तेज है तो हलके हाथो से अंगूठे पर मसाज करे और हल्का सा खिचे | इससे आप को आराम मिलेगा |

2. तर्जनी 👆🏽
– The Index Finger
ये उंगली आंतों gastro intestinal tract से जुडी होती है | अगर आप के पेट में दर्द है तो इस उंगली को हल्का सा रगड़े , दर्द गायब हो जायेगा।

3. बीच की उंगली 🖕🏼
– The Middle Finger
ये उंगली परिसंचरण तंत्र तथा circulation system से जुडी होती है | अगर आप को चक्कर या आपका जी घबरा रहा है तो इस उंगली पर मालिश करने से तुरंत रहत मिलेगी |

4. तीसरी उंगली 🖖🏽
The Ring Finger
ये उंगली आपकी मनोदशा से जुडी होती है | अगर किसी कारण आपकी मनोदशा अच्छी नहीं है या शांति चाहते हो तो इस उंगली को हल्का सा मसाज करे और खिचे, आपको जल्द ही इस के अच्छे नतीजे प्राप्त हो जयेगे, आप का मूड खिल उठेगा।

5. छोटी उंगली 🤙🏽
The Little Finger
छोटी उंगली का किडनी और सिर के साथ सम्बन्ध होता है | अगर आप को सिर में दर्द है तो इस उंगली को हल्का सा दबाये और मसाज करे, आप का सिर दर्द गायब हो जायेगा | इसे मसाज करने से किडनी भी तंदरुस्त रहती है |

पोस्ट उपयोगी लगे तो कम से कम अपने मित्रो और परिचितों तक भेजे और स्वस्थ भारत के निर्माण में अपना पूर्ण योगदान दे।

🌸 धन्यवाद 🌸