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हर दिन पावन
23 जनवरी/जन्म-तिथि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

स्वतन्त्रता आन्दोलन के दिनों में जिनकी एक पुकार पर हजारों महिलाओं ने अपने कीमती गहने अर्पित कर दिये, जिनके आह्नान पर हजारों युवक और युवतियाँ आजाद हिन्द फौज में भर्ती हो गये, उन नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म उड़ीसा की राजधानी कटक के एक मध्यमवर्गीय परिवार में 23 जनवरी, 1897 को हुआ था।

सुभाष के अंग्रेजभक्त पिता रायबहादुर जानकीनाथ चाहते थे कि वह अंग्रेजी आचार-विचार और शिक्षा को अपनाएँ। विदेश में जाकर पढ़ें तथा आई.सी.एस. बनकर अपने कुल का नाम रोशन करें; पर सुभाष की माता श्रीमती प्रभावती हिन्दुत्व और देश से प्रेम करने वाली महिला थीं। वे उन्हें 1857 के संग्राम तथा विवेकानन्द जैसे महापुरुषों की कहानियाँ सुनाती थीं। इससे सुभाष के मन में भी देश के लिए कुछ करने की भावना प्रबल हो उठी।

सुभाष ने कटक और कोलकाता से विभिन्न परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। फिर पिताजी के आग्रह पर वे आई.सी.एस की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड चले गये। अपनी योग्यता और परिश्रम से उन्होंने लिखित परीक्षा में पूरे विश्वविद्यालय में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया; पर उनके मन में ब्रिटिश शासन की सेवा करने की इच्छा नहीं थी। वे अध्यापक या पत्रकार बनना चाहते थे। बंगाल के स्वतन्त्रता सेनानी देशबन्धु चितरंजन दास से उनका पत्र-व्यवहार होता रहता था। उनके आग्रह पर वे भारत आकर कांग्रेस में शामिल हो गये।

कांग्रेस में उन दिनों गांधी जी और नेहरू की तूती बोल रही थी। उनके निर्देश पर सुभाष बाबू ने अनेक आन्दोलनों में भाग लिया और 12 बार जेल-यात्रा की। 1938 में गुजरात के हरिपुरा में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में वे कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये गये; पर फिर उनके गांधी जी से कुछ मतभेद हो गये। गांधी जी चाहते थे कि प्रेम और अहिंसा से आजादी का आन्दोलन चलाया जाये; पर सुभाष बाबू उग्र साधनों को अपनाना चाहते थे। कांग्रेस के अधिकांश लोग सुभाष बाबू का समर्थन करते थे। युवक वर्ग तो उनका दीवाना ही था।

सुभाष बाबू ने अगले साल मध्य प्रदेश के त्रिपुरी में हुए अधिवेशन में फिर से अध्यक्ष बनना चाहा; पर गांधी जी ने पट्टाभि सीतारमैया को खड़ा कर दिया। सुभाष बाबू भारी बहुमत से चुनाव जीत गये। इससे गांधी जी के दिल को बहुत चोट लगी। आगे चलकर सुभाष बाबू ने जो भी कार्यक्रम हाथ में लेना चाहा, गांधी जी और नेहरू के गुट ने उसमें सहयोग नहीं दिया। इससे खिन्न होकर सुभाष बाबू ने अध्यक्ष पद के साथ ही कांग्रेस भी छोड़ दी।

अब उन्होंने ‘फारवर्ड ब्लाक’ की स्थापना की। कुछ ही समय में कांग्रेस की चमक इसके आगे फीकी पड़ गयी। इस पर अंग्रेज शासन ने सुभाष बाबू को पहले जेल में और फिर घर में नजरबन्द कर दिया; पर सुभाष बाबू वहाँ से निकल भागे। उन दिनों द्वितीय विश्व युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। सुभाष बाबू ने अंग्रेजों के विरोधी देशों के सहयोग से भारत की स्वतन्त्रता का प्रयास किया। उन्होंने आजाद हिन्द फौज के सेनापति पद से जय हिन्द, चलो दिल्ली तथा तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा का नारा दिया; पर दुर्भाग्य से उनका यह प्रयास सफल नहीं हो पाया।

सुभाष बाबू का अन्त कैसे, कब और कहाँ हुआ, यह रहस्य ही है। कहा जाता है कि 18 अगस्त, 1945 को जापान में हुई एक विमान दुर्घटना में उनका देहान्त हो गया। यद्यपि अधिकांश तथ्य इसे झूठ सिद्ध करते हैं; पर उनकी मृत्यु के रहस्य से पूरा पर्दा उठना अभी बाकी है।
प्रस्तुतकर्ता ✍ योगेश पारेख
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♦ जानिए की आपकी राशि से अनुसार कौनसा बिज़नेस करना बेहतर है-

♦ मेष- (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, आ) :

राशि चक्र की सबसे प्रथम राशि मेष है। जिसके स्वामी मंगल है। धातु संज्ञक यह राशि चर (चलित) स्वभाव की होती है। इस राशि के जातक निर्णय लेने मे जल्दबाजी करते है तथा जिस कार्य को हाथ मे लिया है उसको पूरा किए बिना पीछे नहीं हटते। इनका स्वभाव कभी-कभी विरक्ति का भी रहता है। लालच करना इस राशि के लोगो के स्वभाव मे नहीं होता। दूसरों की मदद करना अच्छा लगता है। इनमे कल्पना शक्ति की प्रबलता रहती है।

क्या करे व्यापर/बिजनेस : मेष राशि के लोगो को गणित, फिजिक्स, अकाउंट आदि विषयो मे अधिक सफलता मिलती है। उन्हे सेना, आर्किटेक्ट, अस्त्र-शस्त्र, वास्तुशास्त्र मे कॅरियर या इनसे जुड़े सेक्टर मे बिज़नेस करना चाहिए। इनमे सफलता की अधिक संभावना रहती है। मंगल के साथ सूर्य की यूति हो तो सरकारी क्षेत्र मे सफलता मिलती है। अधिक सफलता के लिए लाल वस्त्र पहनना चाहिए। मसूर दाल का दान करना चाहिए।

♦ वृष- (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो) :

इस राशि का चिह्न बैल है। बैल स्वभाव से ही अधिक पारिश्रमी और बहुत अधिक वीर्यवान होता है। इस राशि के जातक सरकार का मुख्य सचेतक बनने की योग्यता रखते हैं। मंगल का प्रभाव से जातक के अंदर मानसिक गर्मी प्रदान करता है। कल-कारखानो, स्वास्थ्य कार्यों और जनता के झगड़े सुलझाने का कार्य इस राशि के जातक कर सकते है । ये अधिक सौन्दर्य प्रेमी और कला प्रिय होते है।

क्या करे व्यापर/बिजनेस : वृषभ राशि के लोग कला प्रेमी होते है, ये लोग एक्टर, सिंगर, ऑटो सेलर, इलेक्ट्रिक इक्पिमेट सेलर, नाट्य कला, म्यूजिक के विशारद एवं कॉमर्स, ऑर्ट, पेंटिंग जिओलॉजी के विषय मे सफलता प्राप्त करने वाले होते है। इस राशि के लोगो को इन्हीं क्षेत्रो से जुड़े बिज़नेस या ट्रैन्ड मे कदम बढ़ाने चाहिए। सफलता की संभावना अधिक रहती है। इस राशि का स्वामी शुक्र होता है, जो वस्त्र एवं किराना बिज़नेस मे भी सफलता दिलाता है। अत्यधिक सफलता के लिए इस राशि के लोगो को सफेद वस्त्र पहनना चाहिए।

♦ मिथुन- (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, ह) :

यह राशि चक्र की तीसरी राशि है। राशि का प्रतीक युवा दम्पति है, यह द्वि-स्वभाव वाली राशि है। इस राशि के जातक वाहनो की अच्छी जानकारी रखते है। नए-नए वाहनो और सुख के साधनो के प्रति अत्यधिक आकर्षण होता है। इनका घरेलू साज-सज्जा के प्रति अधिक झुकाव होता है। इस राशि के लोगो मे ब्रह्माण्ड के बारे मे पता करने की योग्यता जन्मजात होती है। वह वायुयान और सेटेलाइट के बारे मे ज्ञान बढ़ाता है। राहु-शनि का साथ मिलने से जातक के अन्दर शिक्षा और शक्ति उत्पादित होती है। जातक का कार्य शिक्षा स्थानों मे या बिजली, पेट्रोल या वाहन वाले कामों की ओर होता है।

क्या करे व्यापर/बिजनेस : इस राशि के लोग अध्यापक, प्रध्यापक, कवि, गीतकार, संगीतकार, प्रवचनकर्ता, ज्योतिषी, गणित, केमिस्ट्री, जिओलॉजी, अकाउंट, होटल मैनेजमेट, मैनेजमेट, फाइनेंस, बैंकिंग के विषय चुन सकते है। इस राशि के लोग इस क्षे़त्र मे बिज़नेस शुरू कर सकते है। अधिक सफलता के लिए मिथुन राशि के लोगों को हरे वस्त्र पहनना, मूंग की दाल का सेवन एवं दान करना चाहिए। सूर्य का पूजन सर्वश्रेष्ठ है।

♦ कर्क- (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो) :

राशि चक्र की चौथी राशि कर्क है। इस राशि का चिह्न केकड़ा है। यह चर राशि है। शनि-बुध दोनो मिलकर जातक को होशियार बना देते है। शनि-शुक्र जातक को धन और जायदाद देते है। शुक्र उसे सजाने संवारने की कला देता है और शनि अधिक आकर्षण देता है। इस राशि के जातक श्रेष्ठ बुद्धि वाले, जल मार्ग से यात्रा पसंद करने वाले, कामुक, कृतज्ञ, ज्योतिषी, सुगंधित पदार्थों के सेवी और भोगी होते है।

क्या करे व्यापर/बिजनेस : इन लोगो के लिए जलीय वस्तु, शक्कर, चावल, चांदी, टीचिंग, वस्त्र, स्त्रियों के वस्त्र, सौंदर्य सामग्री, रंग, उपकरण मरम्मत करना, कॉमर्स, आर्ट, जियोलॉजी, मैनेजमेट, कम्प्यूटर के विषयों को चयन करना उचित होता है। इनमे नौकरी या इससे जुडे़ बिजनेस इस राशि वालो के लिए उपयुक्त है। अत्यधिक सफलता के लिए सफेद वस्त्र पहनें, शिव एवं नारायण को चावल का भोग लगाएं एवं चावल का सेवन करे।

♦सिंह- (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे) :

सिंह राशि पूर्व दिशा की द्योतक है। इसका चिह्न शेर है। राशि का स्वामी सूर्य है और इस राशि का तत्व अग्नि है। केतु-मंगल जातक मे दिमागी रूप से आवेश पैदा करता है। केतु-शुक्र, जो जातक मे सजावट और सुन्दरता के प्रति आकर्षण को बढ़ाता है। केतु-बुध, कल्पना करने और हवाई किले बनाने के लिए सोच पैदा करता है। चंद्र-केतु जातक मे कल्पना शक्ति का विकास करता है। शुक्र-सूर्य जातक को स्वाभाविक प्रवृत्तियों की तरफ बढ़ाता है। छाती बड़ी होने के कारण इनमे हिम्मत बहुत अधिक होती है। और मौका आने पर यह लोग जान पर खेलने से भी नहीं चूकते। जातक जीवन के पहले दौर मे सुखी, दूसरे मे दुखी और अंतिम अवस्था मे पूर्ण सुखी होता है।

क्या करे व्यापर/बिजनेस : इस राशि के लोग प्रतिभाशाली होते है और इनके करीब-करीब सभी बिज़नेस मे सफल होने की संभावना रहती है। इस राशि के लोग एडवाइजर, ज्योतिष, इंजीनियर, चिकित्सक, वैज्ञानिक, सेना मे ज्यादा सफल होते है। ये अच्छे मैनेजर होते है। इनके लिए बिज़नेस विषय अनुकूल है। कॉमर्स, अकाउंट, कानून मे अधिक सफलता की संभावना रहती है। अत्यधिक सफलता के लिए आदित्य ह्दय स्त्रोत का पाठ करे एवं लाल वस्त्र पहनें।

♦ कन्या- (ढो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो) :

राशि चक्र की छठी कन्या राशि दक्षिण दिशा की द्योतक है। इस राशि का चिह्न हाथ मे फूल लिए कन्या है। राशि का स्वामी बुध है। कन्या राशि के लोग बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी होते है। भी होते है और वह दिमाग की अपेक्षा दिल से ज्यादा काम लेते है। इस राशि के लोग संकोची, शर्मीले और झिझकने वाले होते है। ये अपनी योग्यता के बल पर ही उच्च पद पर पहुंचते है। विपरीत परिस्थितियां भी इन्हे डिगा नही सकतीं और ये अपनी सूझबूझ, धैर्य, चातुर्य के कारण आगे बढ़ते रहते है।

क्या करे व्यापर/बिजनेस : इस राशि के लोग एजुकेशन, टीचिंग, लेखन, एक्टिंग, म्यूजिक के क्षेत्र मे सफलता प्राप्त करते है। इनके लिए जिओलॉजी, फिजिक्स, केमिस्ट्री, गणित, के विषय अनुकूल है। अत्यधिक सफलता के लिए हरे वस्त्र पहनें। गणेशजी का पूजन करना लाभदायक होता है।

♦ तुला- (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते) :

तुला राशि का चिह्न तराजू है और यह राशि पश्चिम दिशा की द्योतक है, यह वायुतत्व की राशि है। इस राशि वालो को कफ की समस्या होती है। इस राशि के पुरुष सुंदर, आकर्षक व्यक्तित्व वाले होते है। आंखो मे चमक व चेहरे पर प्रसन्नता झलकती है। इनका स्वभाव सम होता है। किसी भी परिस्थिति मे विचलित नहीं होते, दूसरो को प्रोत्साहन देना, सहारा देना इनका स्वभाव होता है। ये व्यक्ति कलाकार, सौंदर्योपासक व स्नेहिल होते है। ये लोग व्यावहारिक भी होते है व इनके मित्र इन्हे करते है।

क्या करे व्यापर/बिजनेस: इस राशि के लोगो को एक्टिंग, म्यूजिक, सेना, मैनेजमेट, ज्यूडिशियरी, बैंक, इन्श्योरेंस, फाइनेंस, मशीनरी, कम्प्यूटर के क्षेत्र मे रोजगार या बिज़नेस आजमाना चाहिए। कॉमर्स, इकोनॉमिक्स, वनस्पतिशास्त्र, गणित के विषयों का चयन करना शुभ होता है। अत्यधिक सफलता के लिए नीले वस्त्र पहनें एवं हनुमान चालीसा का पाठ करे।

♦ वृश्चिक- (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू) :

वृश्चिक राशि का चिह्न बिच्छू है और यह राशि उत्तर दिशा की द्योतक है। वृश्चिक राशि जलतत्व की राशि है। वृश्चिक राशि वालों मे दूसरों को आकर्षित करने की अच्छी क्षमता होती है। इस राशि के लोग बहादुर, भावुक होने के साथ-साथ कामुक होते है। शरीरिक गठन भी अच्छा होता है। ऐसे व्यक्तियो की शारीरिक संरचना अच्छी तरह से विकसित होती है। इनमे शारीरिक व मानसिक शक्ति प्रचूर मात्रा मे होती है। इन्हे बेवकूफ बनाना आसान नहीं होता है, इसलिए कोई इन्हें धोखा नहीं दे सकता। ये हमेशा साफ-सुथरी और सही सलाह देने मे विश्वास रखते है। कभी-कभी साफगोई विरोध का कारण भी बन सकती है। ये जातक दूसरो के विचारो का विरोध ज्यादा करते है, अपने विचारो के पक्ष मे कम बोलते है और आसानी से सबके साथ घुलते-मिलते नहीं है।

क्या करे व्यापर/बिजनेस : इन लोगो के लिए सेना, शस्त्र संबंधी कार्य, पुलिस, ज्यूडिशियरी, क्रिमिनल लायर, सोशल सर्विस, राजनीति के क्षेत्र सफलता दिलाने वाले होते है। फिजिक्स, गणित, कानून, अकाउंट, राजनीतिशास्त्र, होटल मैनेजमेट, ह्म्यूमन रिसोर्स के विषय इनके लिए लाभदायक होते है। इनसे जुड़े बिजनेस भी इनके लिए उपयुक्त होते है। बेहतर सफलता के लिए लाल वस्त्र पहनें या साथ मे रखें एवं हनुमानजी को पूजन अर्चना करे।

♦ धनु- (ये, यो, भा, भी, भू, धा, फा, ढा, भे) :

धनु द्वि-स्वभाव वाली राशि है। इस राशि का चिह्न धनुषधारी है। यह राशि दक्षिण दिशा की द्योतक है। धनु राशि वाले काफी खुले विचारो के होते है। जीवन के अर्थ को अच्छी तरह समझते है। दूसरो के बारे मे जानने की कोशिश हमेशा करते रहते है। धनु राशि वालो को रोमांच काफी पसंद होता है। ये निडर व आत्म विश्वासी होते है। ये अत्यधिक महत्वाकांक्षी और स्पष्टवादी होते है। स्पष्टवादिता के कारण दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचा देते है।

क्या करे व्यापर/बिजनेस : इस राशि के लोगों को नाट्य, ललित कला, गोल्ड सिल्वर बिज़नेस, किराना, सोशल सर्विस, अध्यात्म गुरू, मैनेजर, होटल, स्कूल संचालन के क्षेत्र मे सफलता मिलती है। साइंस, गणित, कॉमर्स, अकाउंट एवं सभी विषय अनुकूल होते है। बेहतर सफलता के लिए पीले वस्त्र पहनें एवं अपने गुरू के सम्मान के साथ गुरू मंत्र का जाप करे।

♦ मकर- (भो, जा, जी, खी, खू, खे, खो, गा, गी) :

मकर राशि का चिह्न मगरमच्छ है। मकर राशि के व्यक्ति अति महत्वाकांक्षी होते है। यह सम्मान और सफलता प्राप्त करने के लिए लगातार कार्य कर सकते है। इनका शाही स्वभाव व गंभीर व्यक्तित्व होता है। आपको अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बहुत कठिन परिश्रम करना पड़ता है। ईश्वर व भाग्य मे विश्वास करते है। दृढ़ पसंद-नापसंद के चलते इनका वैवाहिक जीवन लचीला नहीं होता और जीवनसाथी को आपसे परेशानी महसूस हो सकती है। प्रत्येक कार्य को बहुत योजनाबद्ध ढंग से करते है। आपकी खामोशी आपके साथी को प्रिय होती है। अगर आपका जीवनसाथी आपके व्यवहार को अच्छी तरह समझ लेता है तो आपका जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होता है। आप जीवन साथी या मित्रो के सहयोग से उन्नति प्राप्त कर सकते है।

क्या करे व्यापर/बिजनेस : ये लोग मशीनरी, रिपेयरिंग, कम्प्यूटर, सिविल इंजीनियर, आर्किटेक्ट, वास्तु विज्ञानी, गुप्त विद्याओं के जानकार, वैज्ञानिक, अच्छे रिसर्चर होते है। इनके लिए गणित, फिजिक्स, केमिस्ट्री, संस्कृत, भाषा, अकाउंट, मैनेजमेट संबंधी विषय हितकर होते है। अत्यधिक सफलता के लिए काले वस्त्र पहनें एवं हनुमानजी को पूजन करे।

♦ कुंभ- (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा) :

राशि चक्र की यह ग्यारहवीं राशि है। कुंभ राशि का चिह्न घड़ा लिए खड़ा हुआ व्यक्ति है। इस राशि का स्वामी भी शनि है। शनि मंद ग्रह है तथा इसका रंग नीला है। इसलिए इस राशि के लोग गंभीरता को पसंद करने वाले होते है एवं गंभीरता से ही कार्य करते है। कुंभ राशि वाले लोग बुद्धिमान होने के साथ-साथ व्यवहारकुशल होते है। जीवन मे स्वतंत्रता के पक्षधर होते है। प्रकृति से भी असीम प्रेम करते है। शीघ्र ही किसी से भी मित्रता स्थपित कर सकते है। आप सामाजिक क्रियाकलापो मे रुचि रखने वाले होते है। इसमे भी साहित्य, कला, संगीत व दान आपको बेहद पसंद होता है। इस राशि के लोगों मे साहित्य प्रेम भी उच्च कोटि का होता है। आप केवल बुद्धिमान व्यक्तियों के साथ बातचीत पसंद करते है। कभी भी आप अपने मित्रों से असमानता का व्यवहार नहीं करते है। अपने व्यवहार मे बहुत ईमानदार रहते है।

क्या करे व्यापर/बिजनेस : इस राशि के कार्य क्षेत्र बहुत कुछ मकर राशि से मिलते-जुलते है। क्योंकि दोनों ही राशि का स्वामी शनि है। इसके अलावा सेना, टेक्निकल, मेडिसिन के क्षेत्र भी सफलता दिलाने वाले होते है। वनस्पतिशास्त्र, गणित, फार्मा, इलेक्ट्रिक के विषय हितकर होते है। बेहतरीन सफलता के लिए काले वस्त्र पहनें एवं दुर्गा एवं हनुमानजी का पूजन करे।

♦ मीन- (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची) :

मीन राशि का चिह्न मछली होता है। मीन राशि वाले मित्रपूर्ण व्यवहार के कारण अपने कार्यालय व आस पड़ोस मे अच्छी तरह से जाने जाते है। आप कभी अति मैत्रीपूर्ण व्यवहार नहीं करते है। बल्कि आपका व्यवहार बहुत नियंत्रित रहता है। ये आसानी से किसी के विचारों को पढ़ सकते है। अपने धन को बहुत देखभाल कर खर्च करते है। आपके अभिन्न मित्र मुश्किल से एक या दो ही होते है। जिनसे ये अपने दिल की सभी बाते कह सकते है। ये विश्वासघात के अलावा कुछ भी बर्दाश्त कर सकते है।

क्या करे व्यापर/बिजनेस : इन लोगो को अध्यात्म, मेटल विक्रेता, व्हीकल, इलेक्ट्रिक इक्विपमेट के सेलर, गुप्तचर विभाग, फायर सर्विस, ज्यूडिशियरी मे सफलता मिलती है। गणित, साइंस एवं कॉमर्स के सभी विषय तकनीकी विषय भी लाभकारी होते है। अत्यधिक सफलता के लिए पीले वस्त्र पहनें एवं शिव का पूजन करे।

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👌🏼👌🏼ખાસ વાંચવા જેવું 👌🏼👌🏼અેક વાર લક્ષ્મીદેવી અને પનોતીદેવી બંને ઝઘડ્યા …

લક્ષ્મીદેવી કહે હું ‌‍રૂપાળી અને પનોતીદેવી કહે હું. HB

બંને જણ શંકર ભગવાન પાસે ગયા અને એમને પૂછ્યું અમારા બન્ને માં રૂપાળું કોણ ?

શંકર ભગવાને કહ્યું અા બાબતમાં મને ખબર ના પડે….

તમે નગરના બજારમાં વાણીયા ની દુકાને જાવ જવાબ મળી જાશે……

બન્ને જણ વાણીયા ની દુકાને ગયા અને એને પૂછ્યું કે અમારા બન્નેમાં રૂપાળુકોણ ? વાણીયો વિચાર કરીને કહ્યું સામે લીમડે જઈને પાછા અાવો પછી હું કહું…

બન્ને જણ લીમડે જઈને પાછા આવ્યા એ પછી વાણીયા કહ્યું કે પનોતીદેવી તમે જાતા હો ત્યારે બહુ રૂપાળા લાગો છો અને લક્ષ્મીદેવી તમે આવતા હો ત્યારે બહુ રૂપાળા લાગો છો.

આમ વાણીયાએ પ્રશ્નનું નિરાકરણ કર્યું ….

વાણીયા ઉપર બન્ને દેવી પ્રસન્ન થઈ ગયા
અને
.
ત્યારથી વાણીયા નૅ પનોતી ક્યારેય નડતી નથી અને લક્ષ્મી ક્યારેય
ખૂટતી નથી….
🌈😂😂🌹😂🌹😂😂🌈

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कन्या कुमारी की कथा ।
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नारदजी ने यह क्या किया
कुंवारी रह गई वह कन्या-

यह कहानी है उस कन्या की जिसने भगवान शिव को पति रुप में पाने के लिए घोर तपस्या की। भगवान शिव ने विवाह करने का वरदान भी दिया और एक दिन बारात लेकर शिवजी विवाह करने निकल भी पड़े।

लेकिन नारदजी ने शुचीन्द्रम नामक स्थान पर भगवान शिव को ऐसा उलझाया कि विवाह का मुहूर्त निकल गया। मान्यता है कि इस कन्या को कलयुग के अंत तक शिव जी से विवाह के लिए अब इंतजार करना है।

ऐसी मान्यता है कि कुंवारी नामक यह कन्या आदिशक्ति के अंश से उत्पन्न हुई थी। इनका जन्म वाणासुर नामक असुर का वध करने के लिए हुआ था। इस असुर ने कुंवारी कन्या के हाथों मृत्यु पाने का वरदान प्राप्त किया था।

देवी का विवाह हो जाने पर वाणासुर का वध नहीं हो पाता इसलिए देवताओं के कहने पर नारद जी ने शिव जी और कुंवारी नामक कन्या के विवाह में बाधक बनने का काम किया।

जहां देवी का विवाह होना था वह वर्तमान में कन्याकुमारी तीर्थ कहलाता है। देवी के कुंवारी रह जाने के कारण ही इस स्थान का यह नाम कन्याकुमारी पड़ा। यहां आज भी अक्षत, तिल, रोली आदि रेत के रुप
में मिलते हैं।

कहते हैं यह उसी अक्षत, तिल और रोली के अंश जो भगवान शिव और कुंवारी नामक कन्या के विवाह के लिए थे। विवाह नहीं होने पर विवाह सामग्री को समुद्र में फेंक दिया गया था।

संजय गुप्ता

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एक आदमी ❄बर्फ बनाने वाली कम्पनी में काम करता था___

एक दिन कारखाना बन्द होने से पहले अकेला फ्रिज करने वाले कमरे का चक्कर लगाने गया तो गलती से दरवाजा बंद हो गया
और वह अंदर बर्फ वाले हिस्से में फंस गया..

छुट्टी का वक़्त था और सब काम करने वाले लोग घर जा रहे थे
किसी ने भी अधिक ध्यान नहीं दिया की कोई अंदर फंस गया है।

वह समझ गया की दो-तीन घंटे बाद उसका शरीर बर्फ बन जाएगा अब जब मौत सामने नजर आने लगी तो
भगवान को सच्चे मन से याद करने लगा।

अपने कर्मों की क्षमा मांगने लगा और भगवान से कहा कि प्रह्लाद को तुमने अग्नि से बचाया, अहिल्या को पत्थर से नारि बनाया, शबरी के जुठे बेर खाकर उसे स्वर्ग में स्थान दिया।
प्रभु अगर मैंने जिंदगी में कोई एक काम भी मानवता व धर्म का किया है तो तूम मुझे यहाँ से बाहर निकालो।
मेरे बीवी बच्चे मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। उनका पेट पालने वाला इस दुनिया में सिर्फ मैं ही हूँ।

मैं पुरे जीवन आपके इस उपकार को याद रखूंगा और इतना कहते कहते उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे।

एक घंटे ही गुजरे थे कि अचानक फ़्रीजर रूम में खट खट की आवाज हुई।

दरवाजा खुला चौकीदार भागता हुआ आया।

उस आदमी को उठाकर बाहर निकाला और 🔥 गर्म हीटर के पास ले गया।

उसकी हालत कुछ देर बाद ठीक हुई तो उसने चौकीदार से पूछा, आप अंदर कैसे आए ?

चौकीदार बोला कि साहब मैं 20 साल से यहां काम कर रहा हूं। इस कारखाने में काम करते हुए हर रोज सैकड़ों मजदूर और ऑफिसर कारखाने में आते जाते हैं।

मैं देखता हूं लेकिन आप उन कुछ लोगों में से हो, जो जब भी कारखाने में आते हो तो मुझसे हंस कर
राम राम करते हो
और हालचाल पूछते हो और निकलते हुए आपका
राम राम काका
कहना मेरी सारे दिन की थकावट दूर कर देता है।

जबकि अक्सर लोग मेरे पास से यूं गुजर जाते हैं कि जैसे मैं हूं ही नहीं।

आज हर दिनों की तरह मैंने आपका आते हुए अभिवादन तो सुना लेकिन
राम राम काका
सुनने के लिए इंतज़ार
करता रहा।

जब ज्यादा देर हो गई तो मैं आपको तलाश करने चल पड़ा कि कहीं आप किसी मुश्किल में ना फंसे हो।

वह आदमी हैरान हो गया कि किसी को हंसकर
राम राम कहने जैसे छोटे काम की वजह से आज उसकी जान बच गई।

राम कहने से तर जाओगे
मीठे बोल बोलो,
संवर जाओगे,

सब की अपनी जिंदगी है
यहाँ कोई किसी का नही खाता है।

जो दोगे औरों को,
वही वापस लौट कर आता है।
🙏🌹🌹🙏

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ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार वर्जित है ये काम!!!!!

अच्छे और सुखी जीवन के लिए शास्त्रों के अनुसार कई ऐसे नियम बनाए गए हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य है। यहां हम आपको ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताए गए कुछ ऐसे नियम बता रहे है जिसका पालन स्त्री और पुरुषों दोनों को करना चाहिए।

ब्रह्मवैवर्तपुराण में बताए गए नियम –
1. इन तिथियों पर ध्यान रखें ये बातें हिन्दी पंचांग के अनुसार किसी भी माह की अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी और अष्टमी तिथि पर स्त्री संग, तेल मालिश और का सेवन नहीं करना चाहिए।

  1. इन चीजों को जमीन पर न रखें,,,दीपक, शिवलिंग, शालग्राम (शालिग्राम), मणि, देवी-देवताओं की मूर्तियां, यज्ञोपवीत, सोना और शंख को कभी भी सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए। इन्हें नीचे रखने से पहले कोई कपड़ा बिछाएं या किसी ऊंचे स्थान पर रखें।
  2. दिन के समय न करें समागम ,,,,दिन के समय और सुबह-शाम पूजन के समय स्त्री और पुरुष को समागम (sex) नहीं करना चाहिए। जो लोग यह काम करते हैं, उन्हें महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त नहीं होती है। कई प्रकार के रोगों का सामना करना पड़ता है। इसकी वजह से स्त्री और पुरुष, दोनों को आंख और कान से जुड़े रोग हो सकते हैं। साथ ही, इसे पुण्यों का विनाश करने वाला कर्म भी माना गया है।

  3. पुरुषों को ध्यान रखनी चाहिए ये बात,,,पुरुषों को कभी भी पराई स्त्रियों को बुरी नजर से नहीं देखना चाहिए। कभी भी मल-मूत्र को भी नहीं देखना चाहिए। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार ये काम विनाश की ओर ले जाते हैं। इनसे दरिद्रता बढ़ती है।

  4. स्त्रियां को ध्यान रखनी चाहिए ये बातें,,,जो स्त्रियां अपने पति को डांटती हैं, सताती हैं, पति की आज्ञा का पालन नहीं करती हैं, सम्मान नहीं करती हैं, उनके पुण्य कर्मों का क्षय होता है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार जो स्त्रियां वाणी द्वारा दुख पहुंचाती हैं वे अगले जन्म में कौए का जन्म पाती हैं। पति के साथ हिंसा करने वाली स्त्री का अगला जन्म सूअर के रूप में होता है।

  5. ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए,,,,किसी बुरे चरित्र वाले इंसान के साथ एक स्थान पर सोना, खाना-पीना, घूमना-फिरना वर्जित किया गया है। क्योंकि किसी व्यक्ति के साथ बात करने से, शरीर को छूने से, एक स्थान पर सोने से, साथ भोजन करने से, एक-दूसरे के गुणों और दोष आपस में संचारित अवश्य होते हैं। जिस प्रकार पानी पर तेल की बूंद गिरते ही वह फैल जाती है, ठीक उसी प्रकार बुरे चरित्र वाले व्यक्ति के संपर्क में आते ही बुराइयां हमारे अंदर प्रवेश कर जाती हैं।

  6. सूर्य और चंद्र को अस्त होते समय नहीं देखना चाहिए
    सूर्य और चंद्र को अस्त होते समय नहीं देखना चाहिए। यह अपशकुन माना गया है। ऐसा करने पर आंखों से संबंधित रोग होने की संभावनाएं रहती हैं। सूर्य को उदय होते समय देखना बेहद फायदेमंद होता है। इसी वजह से सुबह जल्दी उठने की प्राचीन परंपरा है।

  7. इनका अनादर नहीं करना चाहिए,,,हमें किसी भी परिस्थिति में पिता, माता, पुत्र, पुत्री, पतिव्रता पत्नी, श्रेष्ठ पति, गुरु, अनाथ स्त्री, बहन, भाई, देवी-देवता और ज्ञानी लोगों का अनादर नहीं करना चाहिए। इनका अनादर करने पर यदि व्यक्ति धनकुबेर भी हो तो उसका खजाना खाली हो जाता है। इन लोगों का अपमान करने वाले व्यक्ति को महालक्ष्मी हमेशा के लिए त्याग देती हैं।

  8. तय तिथि पर पूरा करना चाहिए दान का संकल्प,,,यदि हमने किसी को दान देने का संकल्प किया है तो इस संकल्प को तय तिथि पर किसी भी परिस्थिति में पूरा करना चाहिए। दान देने में यदि एक दिन का विलंब होता है तो दुगुना (दोगुणा) दान देना चाहिए। यदि एक माह का विलंब होता है तो दान सौगुना हो जाता है। दो माह बितने पर दान की राशि सहस्त्रगुनी यानी हजार गुना हो जाती है। अत: दान के लिए जब भी संकल्प करें तो तय तिथि पर दान कर देना चाहिए। अकारण दान देने में विलंब नहीं करना चाहिए।

  9. सुबह उठते ही ध्यान रखें ये बातें,,,,स्त्री हो या पुरुष, सुबह उठते ही इष्टदेव का ध्यान करते हुए दोनों हथेलियों को देखना चाहिए। इसके बाद अधिक समय तक बिना नहाए नहीं रहना चाहिए। रात में पहने हुए कपड़ों को शीघ्र त्याग देना चाहिए।

  10. रविवार को ध्यान रखें ये बातें,,,,रविवार के दिन कांस्य के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए। इस दिन मसूर की दाल, अदरक, लाल रंग की खाने की चीजें भी नहीं खाना चाहिए।

  11. घर में प्रवेश करते समय ध्यान रखें ये बातें,,,,हम जब भी कहीं बाहर से लौटकर घर आते हैं तो सीधे घर में प्रवेश नहीं करना चाहिए। मुख्य द्वार के बाहर ही दोनों पैरों को साफ पानी से धो लेना चाहिए। इसके बाद ही घर में प्रवेश करें। ऐसा करने पर घर की पवित्रता और स्वच्छता बनी रहती है।

ब्रह्मवैवर्तपुराण : यह पुराण वैष्णव पुराण है। इस पुराण के केंद्र में भगवान श्रीहरि और श्रीकृष्ण हैं। यह चार खंडों में विभाजित है। पहला खंड ब्रह्म खंड है, दूसरा प्रकृति खंड है, तीसरा गणपति खंड है और चौथा श्रीकृष्ण जन्म खंड है। इस पुराण में श्रेष्ठ जीवन के लिए कई सूत्र बताए गए हैं।

संजय गुप्ता

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हिन्दू धर्म के यह प्रसिद्ध बारह संवाद, जानकर चौंक जाएंगे!!!!!

पाश्चात्यता या आधुनिकता के नाम पर विचारों का खुलापन भ्रामक विचारों के फैलने के लिए, देश विरोधी विचारों और गतिविधियों के लिए भी अच्छा माहौल तैयार करता है। लोगों को ईश्वर से काट दो, बेरोजगारी को बढ़ाओ, गरीबी का सम्मान करो, युवाओं को हर तरह की वर्जनाओं को तोड़ना सिखाओं, मीडिया के माध्यम से देश में असंतोष की आग को भड़काओं, धर्मों में फूट डालों और फिर तभी आप किसी देश को तोड़ सकते हैं।

आजकल देखने में यही आ रहा है कि हमारे देश का युवा भटक गया है। वह उन विचारों के हाथों की कठपुतलियां बन गया है जो उसे ही नहीं भारत को भी बर्बादी के रास्ते पर ले जाती है।

अधिकतर हिन्दुओं को अपने धर्म का ज्ञान नहीं होता। यही कारण है कि वे युवा अवस्था में विपरित विचारधारा के प्रभाव में आकर अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं। इसके अलावा वे जिंदगी भर द्वंद्व, दुविधा या असंतोष की भावना में ही रहते हैं। वे कभी यह निर्णय नहीं ले पाते हैं कि क्या सही और क्या गलत। ऐसे लोग खुद के परिवार को ही संकट में नहीं डालते बल्कि ये लोग देश, धर्म और समाज के लिए भी घातक सिद्ध होते हैं, क्योंकि वे जो भी सोचते हैं वह उनकी सोच नहीं होती है वह या तो बाजार से प्रभावित या वामपंथ से प्रभावित सोच होती है। खैर..

भारत में ऐसे बहुत से ज्ञानी और ध्यानी हुए जिनकी गाथा और जिनके विचार जानकर आप हैरान रह जाएंगे। वामपंथ या एकेश्‍वरवाद की विचारधारा भी भारत के दर्शन की देन है। भारत में ही ऐसे कई महान राजनीतिज्ञ, नीतिज्ञ, दार्शनिक, आध्यात्मिक, आस्तिक, नास्तिक, वैज्ञानिक और चमत्कारिक संत हुए है तो हमें किसी विदेशी को जानने की कोई जरूरत नहीं।

आओ जानते हैं कि हिन्दू धर्म में दो लोगों के बीच होने वाले ऐसे कौन से विश्‍व प्रसिद्ध संवाद है जिन्हें पढ़कर या सुनकर लाखों लोगों का जीवन बदल गया है और जिन्हें पढ़कर दुनियभार के राजनीतिज्ञ, नीतिज्ञ, वैज्ञानिक, आध्यामिक और दार्शनिकों ने अपना एक अलग ही धर्म, दर्शन, नीति और विज्ञान का सिद्धांत गढ़ा। यह तय है कि इन्हें पढ़कर आपकी जिंदगी में शांति, दृढ़ता, निर्भिकता और बुद्धि का विकास होगा। हम यहां आपके लिए ऐसी जानकारी लाएं हैं जिन्हें जानकार आप निश्‍चित ही हैरान रह जाएंगे।

पहला संवाद… अष्टावक्र और जनक संवाद :अष्टावक्र दुनिया के प्रथम ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सत्य को जैसा जाना वैसा कह दिया। न वे कवि थे और न ही दार्शनिक। चाहे वे ब्राह्मणों के शास्त्र हों या श्रमणों के, उन्हें दुनिया के किसी भी शास्त्र में कोई रुचि नहीं थी। उनका मानना था कि सत्य शास्त्रों में नहीं लिखा है। शास्त्रों में तो सिद्धांत और नियम हैं, सत्य नहीं, ज्ञान नहीं। ज्ञान तो तुम्हारे भीतर है।

अष्टावक्र ने जो कहा वह ‘अष्टावक्र गीता’ नाम से प्रसिद्ध है। राजा जनक ने अष्टावक्र को अपना गुरु माना था। राजा जनक और अष्टावक्र के बीच जो संवाद हुआ उसे ‘अष्टावक्र गीता’ के नाम से जाना जाता है।

दूसरा संवाद… श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद:हिन्दू धर्म के एकमात्र धर्मग्रंथ है वेद। वेदों के चार भाग हैं- ऋग, यजु, साम और अथर्व। वेदों के सार को उपनिषद कहते हैं और उपनिषदों का सार या निचोड़ गीता में हैं। उपनिषदों की संख्या 1000 से अधिक है उसमें भी 108 प्रमुख हैं। गीता के ज्ञान को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कुरुक्षेत्र में खड़े होकर दिया था। यह श्रीकृष्‍ण-अर्जुन संवाद नाम से विख्‍यात है।

किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह वेद या उपनिषद पढ़ें उनके लिए गीता ही सबसे उत्तम धर्मग्रंथ है। महाभारत के 18 अध्याय में से एक भीष्म पर्व का हिस्सा है गीता। गीता को अच्‍छे से समझने से ही आपकी समझ में बदलाव आ जाएगा। धर्म, कर्म, योग, सृष्टि, युद्ध, जीवन, संसार आदि की जानकारी हो जाएगी। सही और गलत की पहचान होने लगेगी। तब आपके दिमाग में स्पष्टता होगी द्वंद्व नहीं। जिसने गीता नहीं पढ़ी वह हिन्दू धर्म के बारे में हमेशा गफलत में ही रहेगा।

श्रीकृष्ण के गुरु घोर अंगिरस थे। घोर अंगिरस ने देवकी पुत्र कृष्ण को जो उपदेश दिया था वही उपदेश कृष्ण गीता में अर्जुन को देते हैं। छांदोग्य उपनिषद में उल्लेख मिलता है कि देवकी पुत्र कृष्‍ण घोर अंगिरस के शिष्य हैं और वे गुरु से ऐसा ज्ञान अर्जित करते हैं जिससे फिर कुछ भी ज्ञातव्य नहीं रह जाता है।

तीसरा संवाद..

यक्ष-युद्धिष्ठिर संवाद :यक्ष और युद्धिष्ठिर के बीच हुए संवाद को यक्ष प्रश्न कहा जाता है। यक्ष और युधिष्ठिर के बीच जो संवाद हुआ है उसे जानने के बाद आप जरूर हैरान रह जाएंगे। यह अध्यात्म, दर्शन और धर्म से जुड़े प्रश्न ही नहीं है, यह आपकी जिंदगी से जुड़े प्रश्न भी है। आप भी अपने जीवन में कुछ प्रश्नों के उत्तर ढूंढ ही रहे होंगे।

‘यक्ष’ ने किए थे युधिष्ठिर से ये प्रश्न,,,,भारतीय इतिहास ग्रंथ महाभारत में ‘यक्ष-युधिष्ठिर संवाद’ नाम से एक बहु चर्चित प्रकरण है। संवाद का विस्तृत वर्णन वनपर्व के अध्याय 312 एवं 313 में दिया गया है। यक्ष ने युद्धिष्ठिर से लगभग 124 सवाल किए थे। यक्ष ने सवालों की झड़ी लगाकर युधिष्ठिर की परीक्षा ली।

अनेकों प्रकार के प्रश्न उनके सामने रखे और उत्तरों से संतुष्ट हुए। अंत में यक्ष ने चार प्रश्न युधिष्ठिर के समक्ष रखे जिनका उत्तर देने के बाद ही उन्होंने मृत पांडवों (अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव) को जिंदा कर दिया था। यह सवाल जीवन, संसार, सृष्टि, ईश्‍वर, प्रकृति, नीति, ज्ञान, धर्म, स्त्री, बुराई आदि अनेकों विषयों के संबंधित थे।

चौथा संवाद… लक्ष्मण और रावण संवाद :प्रभु श्रीराम के तीर से जब रावण मरणासन्न अवस्था में हो गया, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से उसके पास जाकर शिक्षा लेने को कहा। श्रीराम की यह बात सुनकर लक्ष्मण चकित रह गए।

भगवान श्रीराम ने लक्ष्‍मण से कहा कि इस संसार में नीति, राजनीति और शक्ति का महान पंडित रावण अब विदा हो रहा है, तुम उसके पास जाओ और उससे जीवन की कुछ ऐसी शिक्षा ले लो जो और कोई नहीं दे सकता।

श्रीराम की बात मानकर लक्ष्मण मरणासन्न अवस्था में पड़े रावण के नजदीक सिर के पास जाकर खड़े हो गए, लेकिन रावण ने कुछ नहीं कहा। लक्ष्मण ने लौटकर प्रभु श्रीराम से कहा कि वे तो कुछ बोलते ही नहीं। तब श्रीराम ने कहा यदि किसी से ज्ञान प्राप्त करना है तो उसके चरणों के पास हाथ जोड़कर खड़े होना चाहिए, न कि सिर के पास। श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, जाओ और रावण के चरणों के पास बैठो। यह बात सुनकर लक्ष्मण इस बार रावण के चरणों में जाकर बैठ गए। रावण ने लक्ष्मण को जो सीख दी उसे सभी जानते हैं।

पांचवां संवाद… अंगद और रावण के बीच संवाद :गोस्वामी तुलसीदास कृत महाकाव्य श्रीरामचरितमानस के लंकाकांड में बालि पुत्र अंगद रावण की सभा में रावण को सीख देते हुए बताते हैं कि कौन-से ऐसे 14 दुर्गुण है जिसके होने से मनुष्य मृतक के समान माना जाता है।

अंगद-रावण के बीच जो संवाद हुआ था वह बहुत ही रोचक था उसे पढ़ने और उसकी व्याख्या जानेने से व्यक्ति को अपने जीवन की स्थिति के बारे में बहुत कुछ ज्ञान हो जाता है।

छठा संवाद… यमराज-नचिकेता संवाद :वाजश्रवसपुत्र नचिकेता और मृत्यु के देवता यमराज के बीच जो संवाद होता है वह विश्‍व का प्रथम दार्शनिक संवाद माना जा सकता है। वाजश्रवस अपने पुत्र को क्रोधवा यमराज को दान कर देते हैं। नचिकेता तब यमलोक पहुंच जाते हैं।

यमलोक में उसे वक्त यमदूत नचिकेता से कहते हैं कि यमराज इस वक्त नहीं है। तब नचिकेता तीन दिन तक यमराज की प्रतिक्षा करते हैं। यमपुरी के द्वार पर बैठा नचिकेता बीती बातें सोच रहा था। उसे इस बात का संतोष था कि वह पिता की आज्ञा का पालन कर रहा था। लगातार तीन दिन तक वह यमपुरी के बाहर बैठा यमराज की प्रतीक्षा करता रहा। तीसरे दिन जब यमराज आए तो वे नचिकेता को देखकर चौंके।

जब उन्हें उसके बारे में मालूम हुआ तो वे भी आश्चर्यचकित रह गए। अंत में उन्होंने नचिकेता को अपने कक्ष में बुला भेजा। यमराज के कक्ष में पहुंचते ही नचिकेता ने उन्हें प्रणाम किया। उस समय उसके चेहरे पर अपूर्व तेज था। उसे देखकर यमराज बोले- ‘वत्स, मैं तुम्हारी पितृभक्ति और दृढ़ निश्चय से बहुत प्रसन्न हुआ। तुम मुझसे कोई भी तीन वरदान मांग सकते हो।’

सातवां संवाद… शिव-पार्वती संवाद :रामायण या रामचरित के बालकांड में शिव-पार्वती संवाद का वर्णन मिलता है। ‘गायत्री-मंजरी’ में भी ‘शिव-पार्वती संवाद’ आता है। हम इस संवाद की बात नहीं कर रहे हैं। भारत के कश्मीर राज्य में अमरनाथ नामक गुफा है जहां जून माह में बाबा अमरनाथ के दर्शन करने के लिए हजारों हिन्दू जाते हैं। दरअसल, यह गुफा शिव और पार्वती संवाद की साक्षी है। यहां भगवान शिव ने माता पार्वती को ‘रहस्यमयी ज्ञान’ की शिक्षा दी थी। इस ज्ञान को विज्ञान भैरव तंत्र में संग्रहित किया गया है।

शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया, उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

अमरनाथ के अमृत वचन :शिव द्वारा मां पार्वती को जो ज्ञान दिया गया, वह बहुत ही गूढ़-गंभीर तथा रहस्य से भरा ज्ञान था। उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव के ‘‍विज्ञान भैरव तंत्र’ और ‘शिव संहिता’ में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। भगवान शिव के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं। इसी की एक शाखा हठयोग की है। भगवान शिव कहते हैं- ‘वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:’ अर्थात वाम मार्ग अत्यंत गहन है और योगियों के लिए भी अगम्य है। मेरुतंत्र

आठवां संवाद… याज्ञवल्क्यजी-गार्गी संवाद :वृहदारण्यक उपनिषद् में दोनों के बीच हुए संवाद का उल्लेख मिलता है। राजा जनक अपने राज्य में शास्त्रार्थ का आयोजन करते रहते थे। जो भी शास्त्रार्थ में जीत जाता था वह सोने से लदी गाएं ले जाता था। एक बार के आयोजन में याज्ञवल्क्यजी को भी निमंत्रण मिला था। तब याज्ञवल्क्यजी ने शास्त्रार्थ से पहले ही अपने एक शिष्य से कहा बेटा! इन गौओं को अपने यहां हांक ले चलो।

ऐसे में सभी ऋषि क्रुद्ध होकर उनसे शास्त्रार्थ करने लगे। याज्ञवल्क्यजी ने सबके प्रश्नों का यथाविधि उत्तर दिया और सभी को संतुष्ट कर दिया। उस सभा में ब्रह्मवादिनी गार्गी भी बुलायी गयी थी। सबके पश्चात् याज्ञवल्क्यजी से शास्त्रार्थ करने वे उठी। दोनों के बीच जो शास्त्रार्थ हुआ। गार्गी ने याज्ञवल्क्यजी से कई प्रश्न किए। अंत में याज्ञवल्क्य ने कहा- गार्गी! अब इससे आगे मत पूछो।

इसके बाद महर्षि याज्ञवक्ल्यजी ने यथार्थ सुख वेदान्ततत्त्‍‌व समझाया, जिसे सुनकर गार्गी परम सन्तुष्ट हुई और सब ऋषियों से बोली-भगवन्! याज्ञवल्क्य यथार्थ में सच्चे ब्रह्मज्ञानी हैं। गौएं ले जाने का जो उन्होंने साहस किया वह उचित ही था।

नौवां संवाद… काक भुशुण्डी-गरुड़जी संवाद :काक भुशुण्‍डी ने पक्षीराज गरुड़जी को राम की कथा पहले ही सुना दी थी। इसका वर्णन हमें रामायण और रामचरित मानस में मिलता है। शिवजी माता पार्वती से कहते हैं कि इससे पहले यह सुंदर कथा काक भुशुण्डी ने गरुड़जी से कही थी।

रामचरित मानस में काकभुशुण्डी ने अपने जन्म की पूर्वकथा और कलि महिमा का वर्णन किया है। इसका उल्लेख रामचरित मानस में मिलता है।

नारदजी की आज्ञा से जब भगवान राम को नागपाश से छुड़ाकर गरुड़जी पुन: अपने धाम लौट रहे होते हैं तब उनके मन में शंका उत्पन्न होती है कि यह कैसे भगवान जो एक तुच्छ राक्षस द्वारा फेंके गए नागपाश से ही बंध गए? इस शंका समाधान के लिए वे नारद से पूछते हैं। नारदजी उन्हें ब्रह्मा के पास भेज देते हैं। ब्रह्माजी उन्हें शिवजी के पास भेज देते हैं। तब शिवजी ने कहा भगवान की माया बताना मुश्‍किल है। एक पक्षी ही एक पक्षी को समझा सकता है अत: तुम काक भिशुण्डी के पास जाओ। काक भुशुण्डी और गरुड़जी के बीच जो संवाद होता है वह अतुलनीय है।

दसवां संवाद… युधिष्ठिर-भीष्म संवाद :अंतिम वक्त में पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को समझाया धर्म का मर्म। क्या कहा भीष्म ने युधिष्ठिर से जब वे तीरों की शैया पर लेटे हुए थे?

भीष्म यद्यपि शरशय्या पर पड़े हुए थे फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण के कहने से युद्ध के बाद युधिष्ठिर का शोक दूर करने के लिए राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म आदि का मूल्यवान उपदेश बड़े विस्तार के साथ दिया। इस उपदेश को सुनने से युधिष्ठिर के मन से ग्लानि और पश्‍चाताप दूर हो जाता है। यह उपदेश महाभारत के भीष्मस्वर्गारोहण पर्व में मिलता है।

ग्यारहवां संवाद… धृतराष्ट्र-विदुर संवाद :महाभारत’ की कथा के महत्वपूर्ण पात्र विदुर को कौरव-वंश की गाथा में विशेष स्थान प्राप्त है। विदुर हस्तिनापुर राज्‍य के शीर्ष स्‍तंभों में से एक अत्‍यंत नीतिपूर्ण, न्यायोचित सलाह देने वाले माने गए है।

हिन्दू ग्रंथों में दिए जीवन-जगत के व्यवहार में राजा और प्रजा के दायित्वों की विधिवत नीति की व्याख्या करने वाले महापुरुषों में महात्मा विदुर सुविख्यात हैं। उनकी विदुर-नीति वास्तव में महाभारत युद्ध से पूर्व युद्ध के परिणाम के प्रति शंकित हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के साथ उनका संवाद है।

वास्तव में महर्षि वेदव्यास रचित ‘महाभारत’ का उद्योग पर्व ‘विदुर नीति’ के रूप में वर्णित है। महाभारत में एक और जहां महत्वपूर्ण कृष्ण अर्जुन संवाद, यक्ष युधिष्‍ठिर संवाद, धृतराष्ट्र संजय संवाद, भीष्म युद्धिष्ठिर संवाद है तो दूसरी और धृतराष्ट और विदूर का महत्वपूर्ण संवाद भी वर्णित है। प्रत्येक हिन्दू को महाभारत पढ़ना चाहिए। इस घर में भी रखना चाहिए। जो यह कहता है कि महाभारत घर में रखने से महाभारत होती है वह मूर्ख, अज्ञानी या धूर्त व्यक्ति हिन्दुओं को अपने धर्म से दूर रखना चाहता होगा।

बारहवां संवाद… आदि शंकराचार्य-मंडन मिश्र संवाद :आदि शंकराचार्य देशभर के साधु-संतों और विद्वानों से शास्त्रार्थ करते करते अंत में प्रसिद्ध विद्वान मंडन मिश्र के गांव पहुंचे थे। यहां उन्होंने 42 दिनों तक लगातार हुए शास्त्रार्थ किया जिसकी निर्णायक थीं मंडन मिश्र की पत्नी भारती।

आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच जो संवाद हुआ उस संवाद की बहुत चर्चा होती है। हालांकि आदि शंकराचार्य ने मंडन को पराजित कर तो दिया, पर उनकी पत्नी के एक सवाल का जवाब नहीं दे पाए और अपनी हार मान ली।

हालांकि उपरोक्त के अलावा भी और भी हैं लेकिन यहां कुछ प्रमुख ही प्रस्तुत किए गए हैं।

संजय गुप्ता

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बसंत पंचमी में मां सरस्वती को अर्पित करें उनकी ये 5 प्र‌िय चीजें, होगी ज्ञान और धन की वर्षा

हिंदु पंचाग के अनुसार हर वर्ष माघ महीने में शुक्ल की पंचमी को विद्या व बुद्धि की देवी मां सरस्वती की उपासना होती है। इस पर्व को आम भाषा में वसंत पंचमी बोला जाता है। यह दिन वर्ष के कुछ खास दिनों मे से एक माना जाता है, इसलिए कुछ लोग इसे “अबूझ मुहूर्त” भी कहते हैं। मान्यता है कि जिन लोगों की कुंडली में विद्या व बुद्धि का योग नहीं होता है वह लोग वसंत पंचमी को मां सरस्वती को पूजा करके उस योग को अच्छा कर सकते हैं। इसी वर्ष पूरे हिंदुस्तान में वसंत पंचमी 22 जनवरी को मनाई जाएगी।

पूजा करते वक्त इन बातों का रखें ध्यान
मां सरस्वती की पूजा से होते हैं ये लाभ
मान्यता है कि जिन लोगों में एकाग्रता की कमी हो उन्हें मां सरस्वती की पूजा जरूर करनी चाहिए। ऐसे लोगों को प्रतिदिन एक बार सरस्वती वंदना का पाठ जरूर करना चाहिए। सरस्वती वंदना का पाठ करने से एकाग्रता की कमी की समस्या दूर हो जाती है। पूजा के दौरान मां सरस्वती पेन अर्पित करके उसे पूरा वर्ष यूज करना चाहिए। ऐसा बोला जाता है कि इस पेन में माता सरस्वती का वास होता है जो सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती है। लेखन के एरिया में करियर बनाने वाले लोगों के लिए बोला जाता है कि उन्हें लिखने से पहले “ऐं” जरूर लिखना चाहिए।
क्या है वसंत का महत्व
हिंदू मान्यता के अनुसार वसंत का उत्सव प्रकृति का उत्सव है। यौवन हमारे ज़िंदगी का बसंत है तो बसंत इस सृष्टि का यौवन है।ईश्वर श्री कृष्ण ने भी गीता में ‘ऋतूनां कुसुमाकरः’ कहकर ऋतुराज बसंत को अपनी विभूति माना है। शास्त्रों एवं पुराणों कथाओं के अनुसार बसंत पंचमी वसरस्वती पूजा को लेकर एक बहुत ही रोचक कथा है।
कथा है प्रख्यात
जब ईश्वर विष्णु की आदेश से प्रजापति ब्रह्माजी सृष्टि की रचना करके जब उस दुनिया में देखते हैं तो उन्हें चारों ओर सुनसान निर्जन ही दिखाई देता था। उदासी से सारा वातावरण मूक सा हो गया था। जैसे किसी की वाणी ना हो। यह देखकर ब्रह्माजी ने उदासी तथा मलिनता को दूर करने के लिए अपने कमंडल से जल लेकर छिड़का। उन जलकणों के पड़ते ही पेड़ों से एक शक्ति उत्पन्न हुई जो दोनों हाथों से वीणा बजा रही थी व दो हाथों में पुस्तक व माला धारण की हुई जीवों को वाणी दान की, इसलिये उस देवी को सरस्वती बोला गया। यह देवी विद्या, बुद्धि को देने वाली है। इसलिये बसंत पंचमी के दिन हर घर में सरस्वती की पूजा भी की जाती है। दूसरे शब्दों में बसंत पंचमी का दूसरा नाम सरस्वती पूजा भी है। मां सरस्वती को विद्या व बुद्धि की देवी माना गया है।
वसंत पंचमी को मां सरस्वती के प्रगट होने का दिन माना जाता है. ज्ञान और बुद्ध‌ि की देवी सरस्वती से अगर आप भी ज्ञान और अच्छी याददाश्त पाना चाहते हैं तो देवी सरस्वती की पूजा करते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाह‌िए और पूजा में देवी सरस्वती की प्र‌िय 5 वस्तु भेंट करनी चाह‌िए.

-देवी सरस्वती को पीले और सफेद रंग के फूल पसंद है जो बसंत के मौसम में आसानी से उपलब्‍ध हो जाते हैं. आपको इन फूलों से देवी की पूजा करनी चाह‌िए. देवी की प्रसन्नता के ल‌िए आप गेंदे और सरसो के पुष्प अर्प‌ित कर सकते हैं.
-मां सरस्वती को बूंदी का प्रसाद बहुत प्र‌िय होता है. बूंदी पीले रंग की होती है और यह गुरू से संबंध‌ित वस्तु भी है जो ज्ञान के कारक ग्रह हैं. देवी सरस्वती को बूंदी अर्प‌ित करने से गुरु अनुकूल होते हैं और ज्ञान प्राप्त‌ि में आने वाली बाधा दूर होती है.
-बंसत पंचमी के द‌िन पीले रंग का व‌िशेष महत्व है इसल‌िए सफेद की बजाय पीले रंग के वस्त्र अर्प‌ित करें तो यह बहुत शुभ होता है.
-पूजन में कलम और कॉपी जरुर शामिल करें, इससे बुध की स्‍थ‌ित‌ि अनुकूल होती है ज‌िससे बुद्ध‌ि बढ़ती है और स्मरण शक्त‌ि भी अच्छी होती है.
-केसर और पीला चंदन का त‌िलक करें और खुद भी लगाएं. ज्यो‌त‌िषशास्‍त्र में इसे गुरु से संबंध‌ित वस्तु कहा गया है ज‌िससे ज्ञान और धन दोनों के मामले में अनुकूलता की प्राप्त‌ि होती है.

आभा गौतम

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मित्रो आज बसंतपंचमी है, आपको आपके परिवार को इस पावन दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं!!!!!

वसंत पंचमी या श्रीपंचमी एक हिन्दू त्योहार है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। यह पूजा पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। इस दिन स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करती हैं।

प्राचीन भारत और नेपाल में पूरे साल को जिन छह मौसमों में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था। जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों में सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं।

वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती, यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है।

सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा।

इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया।

पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-

प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।

अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूँ भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है।

पतंगबाज़ी का वसंत से कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन पतंग उड़ाने का रिवाज़ हज़ारों साल पहले चीन में शुरू हुआ और फिर कोरिया और जापान के रास्ते होता हुआ भारत पहुँचा।

वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है।

यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं।

कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।

इसके साथ ही यह पर्व हमें अतीत की अनेक प्रेरक घटनाओं की भी याद दिलाता है। सर्वप्रथम तो यह हमें त्रेता युग से जोड़ती है। रावण द्वारा सीता के हरण के बाद श्रीराम उसकी खोज में दक्षिण की ओर बढ़े। इसमें जिन स्थानों पर वे गये, उनमें दंडकारण्य भी था। यहीं शबरी नामक भीलनी रहती थी। जब राम उसकी कुटिया में पधारे, तो वह सुध-बुध खो बैठी और चख-चखकर मीठे बेर राम जी को खिलाने लगी। प्रेम में पगे झूठे बेरों वाली इस घटना को रामकथा के सभी गायकों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया।

दंडकारण्य का वह क्षेत्र इन दिनों गुजरात और मध्य प्रदेश में फैला है। गुजरात के डांग जिले में वह स्थान है जहां शबरी मां का आश्रम था। वसंत पंचमी के दिन ही रामचंद्र जी वहां आये थे। उस क्षेत्र के वनवासी आज भी एक शिला को पूजते हैं, जिसके बारे में उनकी श्रध्दा है कि श्रीराम आकर यहीं बैठे थे। वहां शबरी माता का मंदिर भी है।

वसंत पंचमी का दिन हमें पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, पर जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं।

इसके बाद की घटना तो जगप्रसिद्ध ही है। गौरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। पृथ्वीराज के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर गौरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया। तभी चंदबरदाई ने पृथ्वीराज को संदेश दिया।

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान ॥

पृथ्वीराज चौहान ने इस बार भूल नहीं की। उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंदबरदाई के संकेत से अनुमान लगाकर जो बाण मारा, वह गौरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया। (1192 ई) यह घटना भी वसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी।

वसंत पंचमी का लाहौर निवासी वीर हकीकत से भी गहरा संबंध है। एक दिन जब मुल्ला जी किसी काम से विद्यालय छोड़कर चले गये, तो सब बच्चे खेलने लगे, पर वह पढ़ता रहा। जब अन्य बच्चों ने उसे छेड़ा, तो दुर्गा मां की सौगंध दी। मुस्लिम बालकों ने दुर्गा मां की हंसी उड़ाई। हकीकत ने कहा कि यदि में तुम्हारी बीबी फातिमा के बारे में कुछ कहूं, तो तुम्हें कैसा लगेगा?

बस फिर क्या था, मुल्ला जी के आते ही उन शरारती छात्रों ने शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। फिर तो बात बढ़ते हुए काजी तक जा पहुंची। मुस्लिम शासन में वही निर्णय हुआ, जिसकी अपेक्षा थी। आदेश हो गया कि या तो हकीकत मुसलमान बन जाये, अन्यथा उसे मृत्युदंड दिया जायेगा। हकीकत ने यह स्वीकार नहीं किया। परिणामत: उसे तलवार के घाट उतारने का फरमान जारी हो गया।

कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी। हकीकत ने तलवार उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो? इस पर जल्लाद ने दिल मजबूत कर तलवार चला दी, पर उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा। वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया। यह घटना वसंत पंचमी (23.2.1734) को ही हुई थी। पाकिस्तान यद्यपि मुस्लिम देश है, पर हकीकत के आकाशगामी शीश की याद में वहां वसंत पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती है। हकीकत लाहौर का निवासी था। अत: पतंगबाजी का सर्वाधिक जोर लाहौर में रहता है।

वसंत पंचमी हमें गुरू रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है। उनका जन्म 1816 ई. में वसंत पंचमी पर लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था। कुछ समय वे रणजीत सिंह की सेना में रहे, फिर घर आकर खेतीबाड़ी में लग गये, पर आध्यात्मिक प्रवष्त्ति होने के कारण इनके प्रवचन सुनने लोग आने लगे। धीरे-धीरे इनके शिश्यों का एक अलग पंथ ही बन गया, जो कूका पंथ कहलाया।

गुरू रामसिंह गोरक्षा, स्वदेशी, नारी उध्दार, अंतरजातीय विवाह, सामूहिक विवाह आदि पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने भी सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिश्कार कर अपनी स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी। प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर भैणी गांव में मेला लगता था। 1872 में मेले में आते समय उनके एक शिष्य को मुसलमानों ने घेर लिया। उन्होंने उसे पीटा और गोवध कर उसके मुंह में गोमांस ठूंस दिया। यह सुनकर गुरू रामसिंह के शिष्य भड़क गये। उन्होंने उस गांव पर हमला बोल दिया, पर दूसरी ओर से अंग्रेज सेना आ गयी। अत: युद्ध का पासा पलट गया।

इस संघर्ष में अनेक कूका वीर शहीद हुए और 68 पकड़ लिये गये। इनमें से 50 को सत्रह जनवरी 1872 को मलेरकोटला में तोप के सामने खड़ाकर उड़ा दिया गया। शेष 18 को अगले दिन फांसी दी गयी। दो दिन बाद गुरू रामसिंह को भी पकड़कर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। 14 साल तक वहां कठोर अत्याचार सहकर 1885 ई. में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।

वसंत पंचमी हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्मदिवस (28.02.1899) भी है। निराला जी के मन में निर्धनों के प्रति अपार प्रेम और पीड़ा थी। वे अपने पैसे और वस्त्र खुले मन से निर्धनों को दे डालते थे। इस कारण लोग उन्हें ‘महाप्राण’ कहते थे।

Sanjay gupta

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ऐं ह्रीं श्रीं अंतरिक्ष सरस्वती परम रक्षिणी
मम सर्व विघ्न बाधा निवारय निवारय स्वाहा।