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मित्रो आज रविवार है, आज हम आपको भगवान सूर्य के सात घोड़ों से जुड़े विज्ञान के बारे में बतायेगें

हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं तथा उनसे जुड़ी कहानियों का इतिहास काफी बड़ा है या यूं कहें कि कभी ना खत्म होने वाला यह इतिहास आज विश्व में अपनी एक अलग ही पहचान बनाए हुए है। विभिन्न देवी-देवताओं का चित्रण, उनकी वेश-भूषा और यहां तक कि वे किस सवारी पर सवार होते थे यह तथ्य भी काफी रोचक हैं।

हिन्दू धर्म में विघ्नहर्ता गणेश जी की सवारी काफी प्यारी मानी जाती है। गणेश जी एक मूषक यानि कि चूहे पर सवार होते हैं जिसे देख हर कोई अचंभित होता है कि कैसे महज एक चूहा उनका वजन संभालता है। गणेश जी के बाद यदि किसी देवी या देवता की सवारी सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है तो वे हैं सूर्य भगवान।

सूर्य भगवान सात घोड़ों द्वारा चलाए जा रहे रथ पर सवार होते हैं। सूर्य भगवान जिन्हें आदित्य, भानु और रवि भी कहा जाता है, वे सात विशाल एवं मजबूत घोड़ों पर सवार होते हैं। इन घोड़ों की लगाम अरुण देव के हाथ होती है और स्वयं सूर्य देवता पीछे रथ पर विराजमान होते हैं।

लेकिन सूर्य देव द्वारा सात ही घोड़ों की सवारी क्यों की जाती है? क्या इस सात संख्या का कोई अहम कारण है? या फिर यह ब्रह्मांड, मनुष्य या सृष्टि से जुड़ी कोई खास बात बताती है। इस प्रश्न का उत्तर पौराणिक तथ्यों के साथ कुछ वैज्ञानिक पहलू से भी बंधा हुआ है।

सूर्य भगवान से जुड़ी एक और खास बात यह है कि उनके 11 भाई हैं, जिन्हें एकत्रित रूप में आदित्य भी कहा जाता है। यही कारण है कि सूर्य देव को आदित्य के नाम से भी जाना जाता है। सूर्य भगवान के अलावा 11 भाई ( अंश, आर्यमान, भाग, दक्ष, धात्री, मित्र, पुशण, सवित्र, सूर्या, वरुण, वमन, ) सभी कश्यप तथा अदिति की संतान हैं।

पौराणिक इतिहास के अनुसार कश्यप तथा अदिति की 8 या 9 संतानें बताई जाती हैं लेकिन बाद में यह संख्या 12 बताई गई। इन 12 संतानों की एक बात खास है और वो यह कि सूर्य देव तथा उनके भाई मिलकर वर्ष के 12 माह के समान हैं। यानी कि यह सभी भाई वर्ष के 12 महीनों को दर्शाते हैं।

सूर्य देव की दो पत्नियां – संज्ञा एवं छाया हैं जिनसे उन्हें संतान प्राप्त हुई थी। इन संतानों में भगवान शनि और यमराज को मनुष्य जाति का न्यायाधिकारी माना जाता है। जहां मानव जीवन का सुख तथा दुख भगवान शनि पर निर्भर करता है वहीं दूसरी ओर शनि के छोटे भाई यमराज द्वारा आत्मा की मुक्ति की जाती है। इसके अलावा यमुना, तप्ति, अश्विनी तथा वैवस्वत मनु भी भगवान सूर्य की संतानें हैं। आगे चलकर मनु ही मानव जाति का पहला पूर्वज बने।

सूर्य भगवान सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होते हैं। इन सात घोड़ों के संदर्भ में पुराणों तथा वास्तव में कई कहानियां प्रचलित हैं। उनसे प्रेरित होकर सूर्य मंदिरों में सूर्य देव की विभिन्न मूर्तियां भी विराजमान हैं लेकिन यह सभी उनके रथ के साथ ही बनाई जाती हैं।

विशाल रथ और साथ में उसे चलाने वाले सात घोड़े तथा सारथी अरुण देव, यह किसी भी सूर्य मंदिर में विराजमान सूर्य देव की मूर्ति का वर्णन है। भारत में प्रसिद्ध कोणार्क का सूर्य मंदिर भगवान सूर्य तथा उनके रथ को काफी अच्छे से दर्शाता है।

लेकिन इस सब से हटकर एक सवाल काफी अहम है कि आखिरकार सूर्य भगवान द्वारा सात ही घोड़ों की सवारी क्यों की जाती हैं। यह संख्या सात से कम या ज्यादा क्यों नहीं है। यदि हम अन्य देवों की सवारी देखें तो श्री कृष्ण द्वारा चालए गए अर्जुन के रथ के भी चार ही घोड़े थे, फिर सूर्य भगवान के सात घोड़े क्यों? क्या है इन सात घोड़ों का इतिहास और ऐसा क्या है इस सात संख्या में खास जो सूर्य देव द्वारा इसका ही चुनाव किया गया।

सूर्य भगवान के रथ को संभालने वाले इन सात घोड़ों के नाम हैं – गायत्री, भ्राति, उस्निक, जगति, त्रिस्तप, अनुस्तप और पंक्ति। कहा जाता है कि यह सात घोड़े एक सप्ताह के सात दिनों को दर्शाते हैं। यह तो महज एक मान्यता है जो वर्षों से सूर्य देव के सात घोड़ों के संदर्भ में प्रचलित है लेकिन क्या इसके अलावा भी कोई कारण है जो सूर्य देव के इन सात घोड़ों की तस्वीर और भी साफ करता है।

पौराणिक दिशा से विपरीत जाकर यदि साधारण तौर पर देखा जाए तो यह सात घोड़े एक रोशनी को भी दर्शाते हैं। एक ऐसी रोशनी जो स्वयं सूर्य देवता यानी कि सूरज से ही उत्पन्न होती है। यह तो सभी जानते हैं कि सूर्य के प्रकाश में सात विभिन्न रंग की रोशनी पाई जाती है जो इंद्रधनुष का निर्माण करती है।

यह रोशनी एक धुर से निकलकर फैलती हुई पूरे आकाश में सात रंगों का भव्य इंद्रधनुष बनाती है जिसे देखने का आनंद दुनिया में सबसे बड़ा है।

सूर्य भगवान के सात घोड़ों को भी इंद्रधनुष के इन्हीं सात रंगों से जोड़ा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यदि हम इन घोड़ों को ध्यान से देखें तो प्रत्येक घोड़े का रंग भिन्न है तथा वह एक-दूसरे से मेल नहीं खाता है। केवल यही कारण नहीं बल्कि एक और कारण है जो यह बताता है कि सूर्य भगवान के रथ को चलाने वाले सात घोड़े स्वयं सूरज की रोशनी का ही प्रतीक हैं।

यदि आप किसी मंदिर या पौराणिक गाथा को दर्शाती किसी तस्वीर को देखेंगे तो आपको एक अंतर दिखाई देगा। कई बार सूर्य भगवान के रथ के साथ बनाई गई तस्वीर या मूर्ति में सात अलग-अलग घोड़े बनाए जाते हैं, ठीक वैसा ही जैसा पौराणिक कहानियों में बताया जाता है लेकिन कई बार मूर्तियां इससे थोड़ी अलग भी बनाई जाती हैं।

कई बार सूर्य भगवान की मूर्ति में रथ के साथ केवल एक घोड़े पर सात सिर बनाकर मूर्ति बनाई जाती है। इसका मतलब है कि केवल एक शरीर से ही सात अलग-अलग घोड़ों की उत्पत्ति होती है। ठीक उसी प्रकार से जैसे सूरज की रोशनी से सात अलग रंगों की रोशनी निकलती है। इन दो कारणों से हम सूर्य भगवान के रथ पर सात ही घोड़े होने का कारण स्पष्ट कर सकते हैं।

पौराणिक तथ्यों के अनुसार सूर्य भगवान जिस रथ पर सवार हैं उसे अरुण देव द्वारा चलाया जाता है। एक ओर अरुण देव द्वारा रथ की कमान तो संभाली ही जाती है लेकिन रथ चलाते हुए भी वे सूर्य देव की ओर मुख कर के ही बैठते हैं।

रथ के नीचे केवल एक ही पहिया लगा है जिसमें 12 तिल्लियां लगी हुई हैं। यह काफी आश्चर्यजनक है कि एक बड़े रथ को चलाने के लिए केवल एक ही पहिया मौजूद है, लेकिन इसे हम भगवान सूर्य का चमत्कार ही कह सकते हैं। कहा जाता है कि रथ में केवल एक ही पहिया होने का भी एक कारण है।

यह अकेला पहिया एक वर्ष को दर्शाता है और उसकी 12 तिल्लियां एक वर्ष के 12 महीनों का वर्णन करती हैं। एक पौराणिक उल्लेख के अनुसार सूर्य भगवान के रथ के समस्त 60 हजार वल्खिल्या जाति के लोग जिनका आकार केवल मनुष्य के हाथ के अंगूठे जितना ही है, वे सूर्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा करते हैं। इसके साथ ही गांधर्व और पान्नग उनके सामने गाते हैं औरअप्सराएं उन्हें खुश करने के लिए नृत्य प्रस्तुत करती हैं।

कहा जाता है कि इन्हीं प्रतिक्रियाओं पर संसार में ऋतुओं का विभाजन किया जाता है। इस प्रकार से केवल पौराणिक रूप से ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों से भी जुड़ा है भगवान सूर्य का यह विशाल रथ।

संजय गुप्ता

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एक बार अकबर के हाथ की ऊँगली बुरी तरह घायल हो गई ।
अकबर को व्याकुल देख उन्हें ढांढस बंधाने हेतु बीरबल बोले, ‘भगवान जो करता है, अच्छा ही करता है ।’
इसे सुनकर अकबर को बड़ा गुस्सा आया । उन्होंने फ़ौरन बीरबल को चार दिन के लिए कारागार में डलवा दिया।
दूसरे दिन अकबर शिकार खेलने गए । अकेले होने के कारण उनका शिकार में मन नहीं लगा और रास्ता भटककर वे जंगलियों की बस्ती में जा पहुंचे ।
जंगलियों ने उन्हें पकड़ लिया और बलि चढ़ाने की तैयारी करने लगे ।
ऐसे में बादशाह को बीरबल की कमी बहुत खली ।
वे समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करूँ । तभी जंगलियों के पुजारी की नज़र अकबर की घायल ऊँगली पर पड़ी तो वह बोला, ‘इसे छोड़ दो, इसकी बलि नहीं दी जा सकती, ये खंडित है ।’
अकबर को छोड़ दिया गया ।
जान बचाकर वे अपने राजमहल आए और सोचने लगे की बीरबल ने सही कहा था ।
अगर आज यह कटी ऊँगली न होती तो मैं तो बलि चढ़ गया होता । उन्होंने महल में आते ही बीरबल को रिहा करवाया और बोले, ‘तुमने ठीक कहा था बीरबल, ईश्वर जो करता है अच्छा ही करता है ।’
बादशाह ने बीरबल को पूरी घटना बताई और उससे एक प्रश्न किया,
‘अगर मेरी ऊँगली घायल न हुई होती तो आज मैं मारा जाता, परन्तु मैंने तुम्हें कारागार में डाला, इसमें तुम्हारा क्या भला हुआ ?’
बीरबल ने कहा, ‘जहाँपनाह ! यदि आप मुझे कारागार में न डलवाते तो मैं भी आपके साथ शिकार पर जाता ।
जाहिर है हम दोनों ही जंगलियों द्वारा पकड़े जाते । तब, आपको तो वह खंडित कहकर छोड़ देते, मगर मैं सही सलामत था, इसलिए मेरी बलि चढ़ा देते ।
ईश्वर ने मुझे कारागार में डलवाकर अच्छा ही तो किया ।’
मित्रों ईश्वर जो करता है हमारे लिए अच्छा ही होता है लेकिन हम जाने अनजाने में चीज़ों को गलत सोच लेते हैं ।
अगर आपके साथ कुछ बुरा हुआ है तो भी इसमें कहीं ना कहीं आपका भला ही है ।
इसलिए सदैव सकारात्मक सोचना चाहिए |

संजय गुप्ता

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भक्त और भगवान का युद्ध,मित्रो आज हम आपको,अर्जुन-कृष्ण युद्ध की एक रोचक कथा बतायेगें।

एक बार महर्षि गालव जब प्रात: सूर्यार्घ्य प्रदान कर रहे थे, उनकी अंजलि में आकाश मार्ग में जाते हुए चित्रसेन गंधर्व की थूकी हुई पीक गिर गई| मुनि को इससे बड़ा क्रोध आया| वे उए शाप देना ही चाहते थे कि उन्हें अपने तपोनाश का ध्यान आ गया और वे रुक गए|

उन्होंने जाकर भगवान श्रीकृष्ण से फरियाद की,श्याम सुंदर तो ब्रह्मण्यदेव ठहरे ही, झट प्रतिज्ञा कर ली – चौबीस घण्टे के भीतर चित्रसेन का वध कर देने की। ऋषि को पूर्ण संतुष्ट करने के लिए उन्होंने माता देवकी तथा महर्षि के चरणों की शपथ ले ली।

गालव जी अभी लौटे ही थे कि देवर्षि नारद वीणा झंकारते पहुंच गए।भगवान ने उनका स्वागत-आतिथ्य किया।शांत होने पर नारद जी ने कहा, प्रभो !

आप तो परमानंद कंद कहे जाते हैं, आपके दर्शन से लोग विषादमुक्त हो जाते हैं, पर पता नहीं क्यों आज आपके मुख कमल पर विषाद की रेखा दिख रही है। इस पर श्याम सुंदर ने गालव जी के सारे प्रसंग को सुनाकर अपनी प्रतिज्ञा सुनाई। अब नारद जी को कैसा चैन?

आनंद आ गया| झटपट चले और पहुंचे चित्रसेन के पास, चित्रसेन भी उनके चरणों में गिर अपनी कुण्डली आदि लाकर ग्रह दशा पूछने लगे| नारद जी ने कहा, अरे तुम अब यह सब क्या पूछ रहे हो? तुम्हारा अंतकाल निकट आ पहुंचा है। अपना कल्याण चाहते हो तो बस, कुछ दान-पुण्य कर लो।चौबीस घण्टों में श्रीकृष्ण ने तुम्हें मार डालने की प्रतिज्ञा कर ली है।

अब तो बेचारा गंधर्व घबराया, वह इधर-उधर दौड़ने लगा,वह ब्रह्मधाम, शिवपुरी, इंद्र-यम-वरुण सभी के लोकों में दौड़ता फिरा, पर किसी ने उसे अपने यहां ठहरने तक नहीं दिया।

श्रीकृष्ण से शत्रुता कौन उधार ले।अब बेचारा गंधर्वराज अपनी रोती-पीटती स्त्रियों के साथ नारद जी की ही शरण में आया।नारद जी दयालु तो ठहरे ही, बोले, अच्छा यमुना तट पर चलो।

वहां जाकर एक स्थान को दिखाकर कहा, आज, आधी रात को यहां एक स्त्री आएगी। उस समय तुम ऊंचे स्वर में विलाप करते रहना। वह स्त्री तुम्हें बचा लेगी। पर ध्यान रखना, जब तक वह तुम्हारे कष्ट दूर कर देने की प्रतिज्ञा न कर ले, तब तक तुम अपने कष्ट का कारण भूलकर भी मत बताना।

नारद जी भी विचित्र ठहरे,एक ओर तो चित्रसेन को यह समझाया, दूसरी ओर पहुंच गए अर्जुन के महल में सुभद्रा के पास| उससे बोले, सुभद्रे ! आज का पर्व बड़ा ही महत्वपूर्ण है।आज आधी रात को यमुना स्नान करने तथा दीन की रक्षा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्त होगी।

आधी रात को सुभद्रा अपनी एक-दो सहेलियों के साथ यमुना-स्नान को पहुंची| वहां उन्हें रोने की आवाज सुनाई पड़ी| नारद जी ने दीनोद्धार का माहात्म्य बतला ही रखा था।सुभद्रा ने सोचा, चलो, अक्षय पुण्य लूट ही लूं।

वे तुरंत उधर गईं तो चित्रसेन रोता मिला।उन्होंने लाख पूछा, पर वह बिना प्रतिज्ञा के बतलाए ही नहीं। अंत में इनके प्रतिज्ञाबद्ध होने पर उसने स्थिति स्पष्ट की,अब तो यह सुनकर सुभद्रा बड़े धर्म-संकट और असमंजस में पड़ गईं।

एक ओर श्रीकृष्ण की प्रतिज्ञा – वह भी ब्राह्मण के ही के लिए, दूसरी ओर अपनी प्रतिज्ञा| अंत में शरणागत त्राण का निश्चय करके वे उसे अपने साथ ले गईं| घर जाकर उन्होंने सारी परिस्थिति अर्जुन के सामने रखी (अर्जुन का चित्रसेन मित्र भी था) अर्जुन ने सुभद्रा को सांत्वना दी और कहा कि तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी होगी।

नारद जी ने इधर जब यह सब ठीक कर लिया, तब द्वारका पहुंचे और श्रीकृष्ण से कह दिया कि, ‘महाराज ! अर्जुन ने चित्रसेन को आश्रय दे रखा है, इसलिए आप सोच-विचारकर ही युद्ध के लिए चलें|’ भगवान ने कहा, ‘नारद जी ! एक बार आप मेरी ओर से अर्जुन को समझाकर लौटाने की चेष्टा करके तो देखिए|’ अब देवर्षि पुन: दौड़े हुए द्वारका से इंद्रप्रस्थ पहुंचे।

अर्जुन ने सब सुनकर साफ कह दिया – ‘यद्यपि मैं सब प्रकार से श्रीकृष्ण की ही शरण हूं और मेरे पास केवल उन्हीं का बल है, तथापि अब तो उनके दिए हुए उपदेश – क्षात्र – धर्म से कभी विमुख न होने की बात पर ही दृढ़ हूं| मैं उनके बल पर ही अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा करूंगा| प्रतिज्ञा छोड़ने में तो वे ही समर्थ हैं| दौड़कर देवर्षि अब द्वारका आए और ज्यों का त्यों अर्जुन का वृत्तांत कह सुनाया, अब क्या हो?

युद्ध की तैयारी हुई| सभी यादव और पाण्डव रणक्षेत्र में पूरी सेना के साथ उपस्थित हुए| तुमुल युद्ध छिड़ गया| बड़ी घमासान लड़ाई हुई| पर कोई जीत नहीं सका| अंत में श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र छोड़ा| अर्जुन ने पाशुपतास्त्र छोड़ दिया| प्रलय के लक्षण देखकर अर्जुन ने भगवान शंकर को स्मरण किया| उन्होंने दोनों शस्त्रों को मनाया।

फिर वे भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और कहने लगे, प्रभो ! राम सदा सेवक रुचि राखी| वेद, पुरान, लोक सब राखी| भक्तों की बात के आगे अपनी प्रतिज्ञा को भूल जाना तो आपका सहज स्वभाव है| इसकी तो असंख्य आवृत्तियां हुई होंगी| अब तो इस लीला को यहीं समाप्त कीजिए|

बाण समाप्त हो गए| प्रभु युद्ध से विरत हो गए| अर्जुन को गले लगाकर उन्होंने युद्धश्रम से मुक्त किया, चित्रसेन को अभय किया| सब लोग धन्य-धन्य कह उठे| पर गालव को यह बात अच्छी नहीं लगी| उन्होंने कहा, यह तो अच्छा मजाक रहा| स्वच्छ हृदय के ऋषि बोल उठे, लो मैं अपनी शक्ति प्रकट करता हूं| मैं कृष्ण, अर्जुन, सुभद्रा समेत चित्रसेन को जला डालता हूं।

पर बेचारे साधु ने ज्यों ही जल हाथ में लिया, सुभद्रा बोल उठी, मैं यदि कृष्ण की भक्त होऊं और अर्जुन के प्रति मेरा प्रतिव्रत्य पूर्ण हो तो यह जल ऋषि के हाथ से पृथ्वी पर न गिरे| ऐसा ही हुआ| गालव बड़े लज्जित हुए| उन्होंने प्रभु को नमस्कार किया और वे अपने स्थान पर लौट गए| तदनंतर सभो अपने-अपने स्थान को पधारे।

संजय गुप्ता

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(((( चूके मत चौहान ))))
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पृथ्वीराज के राजकवि चंद्र बरदाई पृथ्वीराज से मिलने के लिए काबुल पहुंचे।
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वहां पर कैद खाने में पृथ्वीराज की दयनीय हालत देखकर चंद्रवरदाई के हृदय को गहरा आघात लगा और उन्होंने गौरी से बदला लेने की योजना बनाई।
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चंद्रवरदाई ने गौरी को बताया कि हमारे राजा एक प्रतापी सम्राट हैं और इन्हें शब्दभेदी बाण (आवाज की दिशा में लक्ष्य को भेदनाद्ध चलाने में पारंगत हैं,
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यदि आप चाहें तो इनके शब्दभेदी बाण से लोहे के सात तवे बेधने का प्रदर्शन आप स्वयं भी देख सकते हैं।
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इस पर गौरी तैयार हो गया और उसके राज्य में सभी प्रमुख ओहदेदारों को इस कार्यक्रम को देखने हेतु आमंत्रित किया।
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पृथ्वीराज और चंद्रवरदाई ने पहले ही इस पूरे कार्यक्रम की गुप्त मंत्रणा कर ली थी कि उन्हें क्या करना है।
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निश्चित तिथि को दरबार लगा और गौरी एक ऊंचे स्थान पर अपने मंत्रियों के साथ बैठ गया।
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चंद्रवरदाई के निर्देशानुसार लोहे के सात बड़े-बड़े तवे निश्चित दिशा और दूरी पर लगवाए गए।
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चूँकि पृथ्वीराज की आँखे निकाल दी गई थी और वे अंधे थे, अतः उनको कैद एवं बेड़ियों से आजाद कर बैठने के निश्चित स्थान पर लाया गया और उनके हाथों में धनुष बाण थमाया गया।
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इसके बाद चंद्रवरदाई ने पृथ्वीराज के वीर गाथाओं का गुणगान करते हुए बिरूदावली गाई तथा गौरी के बैठने के स्थान को इस प्रकार चिन्हित कर पृथ्वीराज को अवगत करवाया:-
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‘‘चार बांस, चैबीस गज, अंगुल अष्ठ प्रमाण।
ता ऊपर सुल्तान है, चूके मत चौहान।।’’
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अर्थात् चार बांस, चैबीस गज और आठ अंगुल जितनी दूरी के ऊपर सुल्तान बैठा है, इसलिए चौहान चूकना नहीं, अपने लक्ष्य को हासिल करो।
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इस संदेश से पृथ्वीराज को गौरी की वास्तविक स्थिति का आंकलन हो गया।
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तब चंद्रवरदाई ने गौरी से कहा कि पृथ्वीराज आपके बंदी हैं, इसलिए आप इन्हें आदेश दें, तब ही यह आपकी आज्ञा प्राप्त कर अपने शब्द भेदी बाण का प्रदर्शन करेंगे।
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इस पर ज्यों ही गौरी ने पृथ्वीराज को प्रदर्शन की आज्ञा का आदेश दिया, पृथ्वीराज को गौरी की दिशा मालूम हो गई और उन्होंने तुरन्त बिना एक पल की भी देरी किये अपने एक ही बाण से गौरी को मार गिराया।
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गौरी उपर्युक्त कथित ऊंचाई से नीचे गिरा और उसके प्राण पंखेरू उड़ गए।
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चारों और भगदड़ और हा-हाकार मच गया, इस बीच पृथ्वीराज और चंद्रवरदाई ने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार एक-दूसरे को कटार मार कर अपने प्राण त्याग दिये।
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आज भी पृथ्वीराज चौहान और चंद्रवरदाई की समाधी काबुल में विद्यमान हैं। इस प्रकार भारत के एक महान हिन्दू प्रतापी सम्राट का 1192 में अन्त हो गया।
संजय गुप्ता

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शिक्षाप्रद कहानी : घर बना मंदिर…

एक समय की बात है, मगध के व्यापारी को व्यापार में बहुत लाभ हुआ, अपार धन-संपत्ति पाकर उसका मन अहंकार से भर गया। उसके बाद से वह अपने अधीनस्थों से अहंकारपूर्ण व्यवहार करने लगा।

व्यापारी का अहंकार इतना प्रबल था कि उसको देखते हुए उसके परिवार वाले भी अहंकार के वशीभूत हो गए। किंतु जब सभी के अहंकार आपस में टकराने लगे तो घर का वातावरण नरक की तरह हो गया।

वह व्यापारी दुःखी होकर एक दिन भगवान बुद्ध के पास पहुंचा और याचना करके बोला – भगवन्! मुझे इस नरक से मुक्ति दिलाइए। मैं भी भिक्षु बनना चाहता हूं।

भगवान बुद्ध ने गंभीर स्वर में कहा- अभी तुम्हारे भिक्षु बनने का समय नहीं आया है। बुद्ध ने कहा- भिक्षु को पलायनवादी नहीं होना चाहिए। जैसे व्यवहार की अपेक्षा तुम दूसरों से करते हो, स्वयं भी दूसरों के प्रति वैसा ही व्यवहार करो। ऐसा करने से तुम्हारा घर भी मंदिर बन जाएगा।

घर जाकर उस व्यापारी ने भगवान बुद्ध की सीख को अपनाया और घर का वातावरण स्वतः बदल गया। अब सब अपने-अपने अहंकार को भूलकर एक-दूसरे के साथ प्रेम से रहने लगे। शीघ्र ही घर के दूषित वातावरण में नया उल्लास छा गया।

सीख : दूसरों के साथ आप ऐसा व्यवहार न करो, जो तुम्हें अपने लिए पसंद नहीं। अहंकार से हमेशा दूर रहने में ही इंसान की भलाई है।

संजय गुप्ता

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” गीता ज्ञान…….

एक बाथ स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के साथ एक शिष्य गंगा किनारे टहल रहे थे।

उस शिष्य ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी से भगवत गीता के दर्शन और योग मार्ग पर चर्चा छेड़ी, स्वभाविक ही चर्चा गीता के ज्ञान पर केंद्रित थी।

चर्चा यह भी थी कि भगवान की वाणी और अर्जुन जैसे शिष्य की उपस्थिति में इस उपदेश का क्या महत्व है ?

परमहंस जी उस शिष्य के गहन विचारों पर हां… हूं… करते जा रहे थे।

अचानक उन्होंने घाट की पेड़ियों पर बैठे एक साधु की ओर इशारा किया,

वह साधु अपने सामने गीता उपदेश देते भगवान श्रीकृष्ण का एक चित्र सजाए हुए था,

और चित्र के सामने श्रीमद्भागवत गीता जी की एक प्रति रखी थी।

साधु उस गीता जी को लेकर श्रीकृष्ण के चित्र को एकटक देखता जा रहा था,

और उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी।
परमहंस जी ने पूछा, बाबा यह क्या कर रहे हो, आंखों में आंसू क्यों भर आए ?

उस साधु ने कहा, गीता का श्रवण कर रहा हूं।

सुनते ही परमहंस जी के साथ आए शिष्य ने कहा, पर यहां तो पढ़ने वाला कोई नहीं है बाबा, आप किसको सुन रहे हैं ?

साधु चुप रहा और आनंद-अश्रु बहाता हुआ उस चित्र की ओर ही देखता रहा।

परमहंस जी ने उस शिष्य की ओर इशारा किया, जैसे कह रहे हों कि उसी बात को दोबारा कहें।

उस शिष्य ने साधु से फिर पूछा, इस बार साधु ने कहा, बोलो मत, देखो।

यह सामने अर्जुन युद्ध के मैदान में सब हथियार फेंककर खड़े हैं, भगवान उन्हें गीता का उपदेश दे रहे हैं, तुम्हें दिख नहीं रहा क्या ?

वह शिष्य चकित रह गया, परमहंस जी की ओर देखने लगा।
तब उन्होंने कहा, गीता का वास्तविक पाठ और श्रवण तो यहां हो रहा है,

तुम कितनी ही पोथियां पढ़ लो, उससे क्या।
मुख्य बात गीता में इतना डूब जाना है कि उस समय के सारे दृश्य साकार हो उठें।

हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे !
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे !!

संजय गुप्ता

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दान-पुण्य की महिमा महान है, शिक्षाप्रद कहानी !!!!!

धन-ऐवर्श्य से भरपूर सुख-सुविधाओं से सुसज्जित एक धनवान परिवार में चार भाई थे। घर का मुखिया उनका पिता अपने चारों पुत्रों के व्यवहार से अत्यधिक प्रसन्न था। सब लोग परस्पर प्रेमपूर्ण व्यवहार करते थे।

पिता की सद्आज्ञाओं का पालन और मां की भावनाओं का हृदय से सम्मान करना उनकी खास आदतों में शुमार था।

इस व्यापारी परिवार में बडे तीन भाई विवाहित थे, तीनों की धर्म पत्नियां भी अत्यंत सेवाभावी थीं, सब लोग एक साथ बैठकर भोजन करते थे, घर में किसी भी तरह से एकता का अभाव नहीं था।समय के अनुसार व्यापारी सेठ के चौथे पुत्र की शादी भी धूमधाम से सम्पन्न हुई। नई-नवेली दुल्हन एक खुशहाल परिवार में बहुत बन ठन कर आई, सबने उसका खूब स्वागत किया।

बहू को आए अभी पांच ही दिन हुए थे कि उसने देखा-इस बडे घर के द्वार पर भिखारी आता है मन में आस लेकर, लेकिन जब कोई उसकी आवाज नहीं सुनता तो चला जाता है निराश होकर। छठे दिन बहू नीचे वाले कमरे में बैठी हुई थी। सुबह का समय था, सेठ जी नियमित रूप से दो घंटे तक पूजा किया करते थे, प्रतिदिन की तरह वे अपने पूजा-पाठ के कार्यक्रम में संलग्न थे।

तभी उनके द्वार पर एक भिखारी आया। उसने अलख जगाई, भगवान के नाम पर कुछ दे दो मेरे दाता। आज इस नई-नवेली दुल्हन से रहा नहीं गया, उसने प्यार से, मगर ऊंची आवाज से कहा-बाबा चले जाओ यहां से, यहां तो सब बासी खाना खाते हैं, ताजा भोजन यहां नहीं बनता, देने के लिए यहां कुछ भी नहीं है। थोड़े-थोड़े समय के अंतराल पर दो-तीन याचक और आए, उन्होंने भी अलख जगाई, बहू ने उन्हें भी यही जबाव दिया। सेठ जी पूजा घर में सब कुछ सुन रहे थे। उन्हें बडा दु:ख हुआ कि बहू को क्या यहां ताजा भोजन नहीं मिलता अगर ऐसा है तो बड़ा अनर्थ हुआ है।

थोड़ी देर बाद सेठ जी से कोई मिलने आया, उसने आवाज दी कि सेठ जी घर में हैं क्या? और अन्य तो कोई बोला नहीं, छोटी बहू ने झट से कहा- सेठ जी दुकान गए हैं। फिर कोई मिलने वाला आया तो बहू ने कहा- सेठ जी बैंक गए हैं, फिर कोई व्यक्ति किसी काम से आया तो बहू ने कहा- सेठ जी कारखाने गए हैं। सेठ जी यह सब सुनकर बहुत आश्चर्यचकित हुए कि बहू ने ऐसा व्यवहार क्यों किया? मैं तो यहीं पर हूं और यह सबको झूठ बोल रही है।

प्रतिदिन की तरह सायं को सभी घर के सदस्य खाने की टेबल पर इकट्ठे हुए। चारों पुत्र, चारों पुत्र वधुएं, सेठ-सेठानी। भोजन रुचिकर बनाने की परम्परा सेठजी के घर में लम्बे समय से चली आ रही थी, नौकर-चाकर भोजन बनाते थे और प्रेमपूर्वक सब मिल-जुलकर ही खाते थे। किन्तु भोजन की शुरूआत सेठ जी से ही होती थी। सारे व्यंजन मेज पर सजाए गए, गर्म-गर्म पूड़ियां आती रहीं, लेकिन आज सेठजी ने भोजन प्रारंभ नहीं किया।

सब लोग अपने-अपने हिसाब से सोच रहे हैं, डर रहे हैं कि आज पता नहीं क्या बात है, पिता जी भोजन क्यों नहीं ग्रहण कर रहे हैं? काफी देर बाद सेठ जी ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए छोटी बहू से पूछा, बेटी तुम्हें घर में कोई परेशानी है, कोई तकलीफ है, या यहां तुम्हारे मान-सम्मान में कोई कमी है? छोटी बहू भी सबकी तरह सहमी हुई थी, उसने अपनी नजर नीची रखते हुए कहा पिताजी? मैं यहां खुश हूं। सभी लोग मेरा बहुत ख्याल रखते हैं। मुझे प्यार करते हैं, सभी मेरे लिए देवतुल्य हैं, यह तो मेरा सौभाग्य है कि मैं आपके घर की बहू बन पाई।

सेठजी ने कहा- तुम हमारी बेटी के समान हो, अगर तुम्हें कोई तकलीफ हो तो नि:संकोच होकर कहो, बहू ने अपने ससुर के चरण छूकर कहा कि मुझे यहां कोई परेशानी नहीं है, कृपया भोजन ग्रहण कीजिए, सास माता ने बहू के सुर में सुर मिलाते हुए कहा- आप भोजन करो- यह सब ठण्डा हुआ जा रहा है।

सेठ जी बहू के जवाब से संतुष्ट नहीं थे, उनके कानों में तो प्रात:काल वाली आवाजें गूंज रही थीं, कि सेठ जी बैंक गए हैं, कारखाने गए हैं, दुकान पर गए हैं, हमारे यहां खाना बासी होता है आदि। सेठ जी ने पुन: प्यार से कहा- बेटी। जब तुम्हें यहां कोई तकलीफ नहीं है तो तुमने सुबह भिखारी को यह क्यों कहा कि यहां तो सब बासी खाना खाते हैं, ताजा तो बनता ही नहीं और यह क्यों कहा कि सेठ जी बैंक गए हैं, दुकान गए हैं, कारखाने गए हैं।

छोटी बहु सुप्रिया विनम्रता से बोली पिताजी। मैं क्षमा चाहती हूं, किन्तु मैं पिछले पांच दिनों से सुनती-देखती आ रही हूं कि हमारे द्वार से भिखारी रोज खाली हाथ लौटकर जाते हैं, दान-पुण्य करते हुए कोई नजर नहीं आ रहा है, हम किसी जरूरतमंद को भोजन कराए बिना ही भोजन करते हैं।

पिताजी यह तो हमारे पूर्व जन्मों का पुण्य है कि हम खुशहाल हैं, किन्तु नए पुण्य तो हम अर्जित कर ही नहीं रहे, हम पूर्व में किए बासी पुण्य कर्मों के सुख भोग रहे हैं, नए करेंगे तो उनका फल ताजा होगा। सेठ जी को ये जागृति के वचन बहुत सुहाए, उन्होंने तुरन्त कहा- बेटी तुम ठीक कहती हो, कल से क्या। आज से ही हम दान-पुण्य करके भोजन ग्रहण करेंगे।

सेठ जी ने कहा- पर बेटी तुम यह तो बताओ कि तुमने ऐसा क्यों कहा कि सेठ जी बैंक गए हैं, दुकान पर गए हैं, कारखाने में गए हैं। बहू ने कहा- पिताजी। आप पूजाघर में थे, लेकिन सच बताना जब मैंने यह कहा कि आप बैंक गए हैं तब आपका मन पूजा में था या बैंक में, जब मैंने दुकान पर गए हैं कहा तो आपका मन उस समय कहां था? जब मैंने कारखाने की बात कही तब क्या आप अपने मजदूरों के वेतन की बात नहीं सोच रहे थे?

छोटी बहू के द्वारा ऐसा सुनकर सेठजी की आंखों में प्रेम के आंसू आ गए, और बहू का भी गला रुंध सा गया। सेठ जी ने बहू से कहा- बेटी तुम्हारी सारी बातें सही हैं, तुम केवल बहू बनकर हमारे घर नहीं आई बल्कि सौभाग्य लक्ष्मी बनकर हमारे घर में पधारी हो। तुमने हमारी आंखें खोलीं, हमें जगाया हम तेरे बहुत शुक्रगुजार हैं। प्रतिदिन दान-पुण्य जरूर करेंगे, भगवान की भक्ति मन से करेंगे।

किंतु बेटी। तुम यह तो बताओ कि तुमने ये अच्छी-अच्छी बातें कहां से सीखी हैं? बहू ने हाथ जोड़कर विनम्र भाव से कहा- पिताजी ये बातें हमें हमारे गुरू जी सिखाते हैं। उन्होंने हमें बताया था कि मानव का यह अनमोल चोला हमें हमारे पूर्व जन्मों के शुभ कर्मों के अनुरूप मिला है। लेकिन इस महान उपलब्धि को पाकर हमें कुछ पुण्य कर्म अवश्य करने चाहिए।

गुरु जी ने हमें बताया कि जब भी भोजन करो तो पहले अपने आस-पास देख लीजिए कि कोई भूखा तो नहीं हैं, द्वार पर आए भिखारी को कभी खाली हाथ नहीं लौटाना चाहिए, प्रभु भक्ति, प्रार्थना, उपासना के समय केवल प्रभु के प्रति भाव समर्पित होना चाहिए।

क्योंकि पिताजी ऐसा न करने से घर की खुशियां रूठ जाती हैं, प्रेम नफरत में बदल जाता है। शांति और चैन बिखर जाता है। ये आदर्श परम्पराएं हमारे घर में सब निभाते हैं, मैं सोचती हूं कि अब तो यही मेरा घर है और ही मेरे माता-पिता हैं, यहां पर भी ये कुछ पुण्य कर्म करने की आदत डालनी चाहिए।

सेठ जी की आज्ञानुसार घर के सभी सदस्य उसी दिन से पुण्यकर्मों में संलग्न हो गए, प्रभु भक्ति श्रध्दा-निष्ठा एवं प्रेमपूर्ण मन से करने लगे।

संजय गुप्ता

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⏩पत्नी त्याग – महापाप

उत्तानपाद के पुत्र और तपस्वी ध्रुव के छोटे भाई का नाम उत्तम था। यद्यपि वह धर्मात्मा राजा था फिर भी उसने एक बार अपनी पत्नी से अप्रसन्न होकर उसे घर से निकाल दिया और अकेला ही घर में रहने लगा।

एक दिन एक ब्राह्मण राजा उत्तम के पास आया और कहा- मेरी पत्नी को कोई चुरा ले गया है। यद्यपि वह स्वभाव की बड़ी क्रूर वाणी से कठोर, कुरूप और अनेक कुलक्षणों से भरी हुई थी, पर मुझे अपनी पत्नी की रक्षा, सेवा और सहायता करनी ही उचित है। राजा ने ब्राह्मण को दूसरी पत्नी दिला देने की बात कही पर उसने कहा- पत्नी के प्रति पति को वैसा ही सहृदय और धर्म परायण होना चाहिए जैसा कि पतिव्रता स्त्रियाँ होती है।

राजा ब्राह्मण की पत्नी को ढूँढ़ने के लिए चल दिया। चलते चलते वह एक वन में पहुँचा जहाँ एक तपस्वी महात्मा तप कर रहे थे। राजा का अपना अतिथि ज्ञान ऋषि ने अपने शिष्य को अर्घ्य, मधुपर्क आदि स्वागत का समान लाने को कहा। पर शिष्य ने उनके कान में एक गुप्त बात कही तो ऋषि चुप हो गये और उनने बिना स्वागत उपचार किये साधारण रीति से ही राजा से वार्ता की।

राजा का इस पर आश्चर्य हुआ। उनने स्वागत का कार्य स्थगित कर देने का कारण बड़े दुःख, विनय और संकोच के साथ पूछा। ऋषि ने उत्तर दिया राजन् आप ने पत्नी का त्याग कर वही पाप किया है। जो स्त्रियाँ किसी कारण से अपने पति का त्याग कर करती हैं। चाहे स्त्री दुष्ट स्वभाव की ही क्यों न हो पर उसका पालन और संरक्षण करना ही धर्म तथा कर्तव्य है। आप इस कर्तव्य से विमुख होने के कारण निन्दा और तिरस्कार के पात्र हैं। आपके पत्नी त्याग का पाप मालूम होने पर आपका स्वागत स्थगित करना पड़ा।

राजा को अपने कृत्य पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उसने ब्राह्मण की स्त्री के साथ ही अपनी स्त्री को भी ढूँढ़ा और उनको सत्कार पूर्वक राजा तथा ब्राह्मण ने अपने अपने घर में रखा।
देवताओं की साक्षी में पाणिग्रहण की हुई पत्नी में अनेक दोष होने पर भी उसका परित्याग नहीं करना चाहिए। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने सद् व्यवहार से दुर्गुणी पति को सुधारती है वैसे ही हर पुरुष को पत्नीव्रती होना चाहिए और प्रेम तथा सद् व्यवहार से उसे सुधारता चाहिए। त्याग करना तो कर्तव्यघात है |

संजय गुप्ता

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जिस पर कृपा श्याम की होए …………..

किशोर का जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ था। उसके पिता नगर के प्रसिद्ध सेठ थे। परिवार में कोई कमी नहीं थी। किशोर के दो बड़े भाई थे जो पिता के व्यवसाय में उनका हाथ बटाते थे।

किन्तु किशोर के लिए सब कुछ ठीक नहीं था। किशोर जन्म से ही नैत्र हीन था इस कारण उसका सारा जीवन घर में ही व्यतीत हुआ था। उसको घर में ही सभी सुख-साधन उपलब्ध रहते थे, नेत्रहीनता के अतिरिक्त किशोर के लिए एक और कष्टकारी स्थिति थी वह यह कि उसकी माँ का निधनछोटी उम्र में ही हो गया था। यद्धपि किशोर के पिता और उसके भाई उससे अत्यधिक प्रेम करते थे और उसकी सुख-सुविधा का पूर्ण ध्यान रखते थे।

किन्तु व्यापार की व्यस्तता के चलते वह घर में अधिक समय नहीं दे पाते थे किशोर का जीवन सेवकों के सहारे ही चल रहा था जिस कारण किशोर के मन में विरक्ति उत्त्पन्न होने लगी। वह ठाकुर जी के ध्यान में लीन रहने लगा। धीरे-धीरे ठाकुर जी के प्रति उसकी भक्ति बढ़ती चली गई।

अब उसका सारा समय ठाकुर जी के ध्यान और भजन-कीर्तन में व्यतीत होने लगा। उसके पिता और उसके भाइयों को इससे कोई आपत्ति नही थी, उन्होंने उसको कभी इस कार्य से नहीं रोका। किन्तु समय की गति को कौन रोक सकता है।

समय आने पर दोनों बड़े भाइयों का विवाह हो गया, आरम्भ में तो सब ठीक रहा किन्तु धीरे-धीरे किशोर की भाभीयों को किशोर अखरने लगा। किशोर भी अब युवा हो चला था। उसकी दोनों भाभी किशोर की सेवा करना बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी। पहले तो वह इस बात को मन में छुपाये रहीं किन्तु धीरे-धीरे इस बात ने किशोर के प्रति ईर्ष्या का भाव ले लिया।अपनी भाभी की इन भावनाओं से अनभिज्ञ किशोर उनमे अपनी माँ का रूप देखता था और सोंचता था की उसकी माँ की कमी अब पूर्ण हो गई है।

धीरे-धीरे ईर्ष्या विकराल रूपों धारण करती जा रही थी। समय की बात कुछ दिनों बाद किशोर के पिता का भी देहांत हो गया, अब किशोर पूर्ण रूप से अपने भाई और भाभी पर ही निर्भर हो गया था।उसके भाइयों का प्रेम अब भी उसके प्रति वैसा ही बना रहा।

किन्तु कहते हैं न कि त्रियाचरित्र के आगे किसी की नहीं चलती। अवसर देख किशोर की भाभीयों ने अपने पतियों को किशोर के विरूद्ध भड़काना आरम्भ कर दिया। जैसे-जैसे समय बीतता गया उनका षड्यंत्र बढ़ता गया, अंततः वह दिन भी आ गया जब जी किशोर के भाई भी पूर्ण रूप से किशोर की विरुद्ध हो गए, अब उनको भी किशोर अखरने लगा था।

इस सब बातो से अनभिज्ञ सहज, सरल हृदय किशोर अब भी ठाकुर जी की भक्ति में ही लीन रहता था, वह अपने भाइयों और भाभीयों के प्रति मन में किसी प्रकार की शंका नहीं रखता था। किन्तु ऐसा कब तक चलता आखिर एक दिन भाइयों की पत्नियों ने अपने पतियों को समझाया की इस नेत्रहीन के मोह में क्यों फंसे हो, इससे मुक्ति प्राप्त करो अन्यथा एक दिन तुमको अपनी सम्पति इसके साथ बाँटनी पड़ेगी, इस संपत्ति पर इसका अधिकार ही क्या है, इसने जीवन भर करा ही क्या है, यह जो भी कुछ है सब तुम्हारे परिश्रम का ही परिणाम है फिर आखिर इसको क्यों दी जाये।

भाइयों के मन में कपट घर कर गया एक दिन सब मिल कर किशोर से कहा की अब हम तुम्हारा बोझ और अधिक नहीं उठा सकते इसलिए हम तुम्हारा रहने खाने का प्रबंध कही और कर रहे हैं, अब तुम वही रहा करो। तुमको समय पर खाना कपडे और अन्य आवश्यक सामग्री मिलती रहेगी, तुमको किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं होने देंगे।

अपने भाइयों के मुख से अनायास ही इस प्रकार की बात सुन कर किशोर अवाक् रह गया। वह नहीं समझ सका कि वह क्या बोले, उसकी आँखों से झर-झर अश्रु बह निकले, किन्तु वह कुछ भी बोल पाने की स्तिथि में नहीं रहा।

अन्तः स्वयं को संयत करते हुए वह बोला। भाई आप ने मेरे लिए जो निर्णय लिया है वह निश्चित रूप से मेरे अच्छे के लिए ही होगा, किन्तु बस इतना तो बता दो कि मेरा अपराध क्या है, बस यही न कि में नेत्रहीन हूँ, किन्तु इसमें मेरा क्या दोष। यह तो प्रभु की इच्छा है, और भाई अब तक आपने मुझको इतना प्रेम किया फिर अनायास यह क्या हुआ।

भाइयों के पास कोई उत्तर नहीं था। वह उसको छोड़ कर चले गए। अब किशोर पूर्ण रूप से अनाथ हो चुका था। किन्तु ऐसा नहीं था जिसका कोई नहीं होता उसके भगवान होते है और फिर किशोर तो ठाकुर जी का दीवाना था फिर वह भला कैसे अनाथ हो सकता था। दुःखी मन किशोर ठाकुर जी के ध्यान में खो गया उसके मन से स्वर निकल उठे।

है गिरधर गोपाल, करुणा सिंधु कृपाल।
भक्तवत्सल, सबके सम्बल, मोहे लीजो सम्भाल।।
हरी में नैन हीन तुम नैना।
निर्बल के बल, दीन के बंधु।
कृपा मोह पे कर देना।।

अगले ही दिन किशोर के रहने का प्रबन्ध एक अन्य स्थान पर कर दिया गया, वह स्थान एकदम वीरान था, ना किसी का आना ना जाना, कुछ पशु-पक्षी वहा विचरते रहते थे, थोड़ी ही दूर से जंगल आरम्भ हो जाता था।

किशोर के खाने-पीने और देख-रेख के लिए एक सेवक की नियुक्ति कर दी गई। प्रतिदिन सुबह नाश्ते का प्रबंध और दोपहर तथा रात्रि के भोजन के प्रबन्ध किशोर के भाई और भाभी कर देते थे। उसके वस्त्र भी घर से धुल कर आ जाते थे। किशोर ने कुछ भी विरोध नहीं किया, वह उसमे ही संतुष्ट रहने लगा, उसका नियम था वह जब भी कुछ भोजन करता पहले अपने गोविन्द का स्मरण करता, उनको भोजन अर्पित करता और उस भोजन के लिए धन्यवाद देकर तब भोजन ग्रहण करता।

कुछ दिन यह क्रम चलता रहा इस बीच किशोर की दोनों भाभीयों को पुत्र रत्न की प्राप्त हुई। उसके बाद उनको किशोर का यह प्रति दिन का खाने और वस्त्र का प्रबंध भी अखरने लगा। तब दोनों ने मिल का एक भयानक षड्यंत्र रचा, उन्होंने किशोर को समाप्त करने की योजना बनाई।

अगले दिन रात्री के भोजन में विष मिलकर सेवक के हाथ भेज दिया इस बात से अनभिज्ञ सेवक भोजन लेकर पहुंचा और किशोर को भोजन सौंप दिया। किशोर ने भोजन प्राप्त किया और प्रतिदिन की भाँति भोजन गोविन्द को अर्पित किया, अब जिसके साथ गोविन्द सदा रहते हो उसके सामने कोई षड्यंत्र भला क्या करता। गोविन्द के भोजन स्वीकार करते ही भोजन प्रशाद के रूप में परिवर्तित हो गया, किशोर ने सुख पूर्वक भोजन किया भगवान का धन्याद किया और लग गया हरी भजन में।

उधर दोनों भाभी प्रसन्न थी कि चलो आज पीछा छूटा। अगले दिन अनजान बन कर उन्होंने फिर से प्रातः का नाश्ता तैयार किया और सेवक के हाथ भेज दिया, इस आशा में की थोड़ी ही देर में सेवक उनके मन को प्रसन्न करने वाली सूचना लेकर आएगा।नाश्ता देकर जब सेवक वापस लौटा तो किशोर को कुशल जान उनको बड़ा आश्चर्य हुआ। वह दोनों पाप बुद्धि यह नहीं जान पाई की जिसका रक्षक दयानिधान हो उसका भला कोई क्या बिगाड़ सकता है, उन्होंने सोचा हो सकता है कि किसी कारण वश किशोर ने रात्री में भोजन ही ना किया हो, ऐसा विचार कर उन कुटिल स्त्रिओं ने अपने मन की शंका का समाधान स्वयं के करने की ठानी।

उस दिन उन्होंने दोपहर के भोजन में किशोर के लिए खीर बनाई और उसमे पहले से भी अधिक तीक्षण विष मिला दिया, वह स्वयं ही खीर लेकर किशोर के पास गई और किशोर से बड़े ही प्रेम का व्यवहार किया और पूंछा की आज तुम्हारा चेहरा कुछ उदास लग रहा है, क्या रात्री में भोजन नही किया। अपनी भाभियों को वहा देख निर्मल मन किशोर बहुत प्रसन्न था, वह बोला नहीं भाभी मेने तो भोजन करा था, बहुत स्वादिष्ट लगा, यह तो आपका प्रेम है जो आपको ऐसा प्रतीत हो रहा है।यह सुनकर दोनों पापी स्त्रियां, शंका में पड़ गई कि इसने भोजन किया तो फिर यह जीवित कैसे है, उनकी पाप बुद्धि ने अब भी उनका साथ नही दिया और वह सत्य को नहीं पहचान पाईं।

उन्होंने मन में विचार किया की किशोर हमसे झूंठ बोल रहा है, तब उन्होंने प्रेम पूर्वक किशोर को खीर देकर कहा, आज हम तुम्हारे लिए अपने हाथ से खीर बना कर लाई है, और अपने सामने ही खिला कर जाएँगी। उनके कपट पूर्ण प्रेम के नाटक को किशोर नहीं जान पाया उसकी आँखों में आंसू आ गए।

उसने प्रेम से वह खीर ली और खाने बैठ गया, किन्तु खाने से पूर्व वह अपने गोविन्द को नहीं भूला, उसने प्रेम पूर्वक गोविन्द को स्मरण किया उनको खीर अर्पित करी और प्रेम पूर्वक खाने लगा। फिर कैसा विष और कैसा षड्यंत्र वह सुख पूर्वक सारी खीर खा गया। उधर उसकी भाभियों ने उसको खीर खाते देखा तो सोचा की हो गया इसका तो अंत, अब यहाँ रुकना उचित नहीं, ऐसा विचार कर वह तुरंत ही वहां से निकल गई।

खीर खाने के बाद किशोर ने भाभी को धन्यवाद कहा, किन्तु वह वहां होती तब ना, किशोर को बहुत आश्चर्य हुआ कि अनायास ही वह दोनों कहाँ चली गई। जब कोई उत्तर नहीं मिला तो उसने भगवान को पुनः स्मरण किया और हरी भजन में तल्लीन हो गया।

उधर दोनों भाभी प्रसन्न मन अपने घर पहुंची तो देखा घर में कोहराम मचा था, देखा तो पता चला कि उन दोनों के पुत्रों ने कोई विषेला पदार्थ खा लिए जिससे उनकी मृत्यु हो गई। यह देख दोनों को काटो तो खून नहीं की स्तिथि में पहुँच गई। अब उनको अपने पाप का अहसास हो गया था। वह जान गई की भगवान ने उनको उनके कर्मो का दण्ड दिया है, वह दोनों दहाड़े मार-मार कर रोने लगी और खुद को कोसने लगीं।

उधर एक सेवक दौड़ा-दौड़ा किशोर के पास पहुंचा और सारी घटना सुनाई, सुनकर किशोर एकदम से विचलित हो गया और रो पड़ा, वह सेवक से बोला भाई मुझको वहा ले चलो, सेवक किशोर को लेकर घर पहुंचा वह जाकर किशोर ने देखा कि सभी लोग जोर-जोर से विलाप कर रहे हैं, उसके भाई और भाभी का तो रो रो कर बुरा हाल था। किशोर को वहां जीवित खड़ा देख दोनों भाभी सन्न रह गई अब उनको इस बात का विश्वाश हो गया था की जिस किशोर को उन्होंने ठुकरा दिया और जिसकी हत्या करने की कुचेष्टा करी भगवान स्वयं उसके साथ है इसलिए उसका बाल भी बांका नहीं हुआ बल्कि भगवान ने उनको ही उनकी करनी का फल दिया है। वह दोनों कुटिल स्त्रियां किशोर से भयभीत हो उठी और उसके पैरो में गिर कर अपने सारे अपराध स्वीकार कर लिए और उनको क्षमा करने की दुहाई देने लगी किशोर और उसके भाई उन दोनों के इस षड्यंत्र को सुन अवाक् थे किन्तु किशोर तो वहां उन बच्चों की खातिर आया था।

किशोर ने सेवक से कहा मुझको बच्चों तक पहुंचा दो, सेवक ने ऐसा ही करा, बच्चों के पास जाकर किशोर ने श्री गोविन्द को स्मरण किया और प्रार्थना करी कि है गोविन्द आज मेरी लाज आपके हाथ में हैं, इन दोनों मासूमो को जीवन दान दो या फिर मेरा भी जीवन ले लो। ऐसी प्रार्थना कर किशोर ने दोनों बच्चों के सर पर हाथ रखा। ठाकुर जी की लीला, अपने भक्त की पुकार को कैसे अनसुना करते पल भर में भी दोनों बच्चे जीवित हो उठे।

यह देख किशोर के भाई और भाभी को बहुत लज्जा आई उन्होंने किशोर से अपने कर्मो के लिए क्षमा मांगी और कहा कि अब उसको कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है, अब वह यही रहेगा, पहले की ही तरहा।किन्तु किशोर का सर्वत्र तो अब उसके गोविन्द थे, उसको इन सब बातो से भला क्या लेना, वह सेवक के साथ वापस लौट गया। किशोर के भाई और भाभी बहुत लज्जित हुए जा रहे थे, सारा समाज उनको बुरा भला कह रहा था।

सबने यही कहा कि अंत में वही भाई काम आया जिसको उन्होंने निर्दयिता से ठुकरा दिया था। उन सभी को सारी रात नींद नहीं आई । अगले दिन सभी ने मिल कर किशोर को वापस लाने का निर्णय किया। सब लोग मिलकर किशोर के पास पहुंचे किन्तु किशोर तो पहले ही सब कुछ भांप चुका था, वह लोग जब किशोर के निवास पर पहुंचे तो किशोर वहां नहीं था। वह वहां से जा चुका था। भाई भाभी को बहुत पछतावा हुआ, उन्होंने किशोर को आस-पास बहुत खोजा किन्तु वह नहीं मिला, निराश मन सब लोग वापस लौट गए। उधर जंगल में कही दूर स्वर लहरियां गूँज रही थीं …………….

है गिरधर गोपाल, करुणा सिंधु कृपाल।
भक्तवत्सल, सबके सम्बल, मोहे लीजो सम्भाल।।

हरे कृष्णा
जय जय श्रीराधे

Sanjay Gipta

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👉 बिना उसकी कृपा के हम कुछ भी नही

🔴 कोई भी छोटा-बड़ा काम करो तो तुम ये कभी मत समझना की ये मैं कर रहा हुं या उसे अपने नाम से कभी मत रखना!

🔵 एक धार्मिक स्थान पर एक सेठ जी भंडारा करते थे एक बार एक संत श्री वहाँ प्रसाद ग्रहण करने आये तो उन्होने देखा की सेठजी के मन मे अहंकार का उदय हो रहा है तो उन्होने कहा सेठजी बिना उसकी कृपा के हम कुछ भी नही कर सकते है और तो बहुत दुर की बात जौगर उसकी कृपा न हो तो खिलाना तो बहुत दुर की बात सामने परोसी हुई थाली अरे थाली क्या हाथ मे लिया ग्रास भी हाथ मे रह जाता है

🔴 सेठजी आप यही सोचना की दाने दाने पर लिखा होता है खाने वाले का नाम अरे ये तो उसकी महानता है जो कर तो वो रहा है और नाम हमें दे रहा है! सेठजी जो काम रामजी को करना है वो तो वो करेंगे आप तो ये समझना की उन्होने इस धर्म-कर्म के लिये मुझे चुना है यही मेरा परम सौभाग्य है!

🔵 सन्त श्री तो कहकर चले गये पर सेठजी को ये हज़म नही हुआ की दाने दाने पर भी भला खाने वाले का नाम लिखा होता है क्या? सेठजी को भूख लग रही थी वो भण्डार कक्ष मे गये एक थाली मे भोजन लिया और मन मे सोचने लगे की इस भोजन पर मेरा नाम लिखा है देखता हुं की मुझे कौन रोकता है सेठजी ने जैसै ही पहला ग्रास हाथ मे लिया तो दुसरे हाथ मे जो फोन था उसपे घंटी बजी फोन उठाया तो उन्हे सूचना मिली की बेटे का एक्सीडेंट हो गया और वो हॉस्पिटल मे भर्ती है सेठजी तत्काल रवाना हुये।

🔴 हॉस्पिटल मे सेठजी की पत्नी ने कहा की बेटा अब ठीक है बेटे को कुशल मंगल देखकर वही बैठे पत्नी के हाथ में चावल का एक दाना था तो सेठजी भूख से व्याकुल थे उन्होंने दाना लिया और चावल खाने लगे खाने के बाद सेठजी ने पूछा अरे तुमने खाया या नही तो पत्नी ने कहा की लेकर तो मैं अपने लिये ही लाई थी पर शायद इस प्रसाद पर रामजी ने आपका नाम लिखा था!

🔵 अब सेठजी को सन्त श्री की वो सारी बाते याद आई और फिर जीवन मे कभी उन्होने अपने नाम से कुछ भी न चलाया सब रामजी के नाम से चलाया!

🔴 मित्रों, जिन्दगी मे ये सदा याद रखना की यदि कोई अच्छा कार्य, विशेष कार्य अथवा कोई शुभ-कर्म सम्पन्न हो जाये तो ये कभी न सोचना की मैं कर रहा हुं बस यही सोचना की मेरे राम मुझसे करवा रहे है और जिसने भी ये समझने की भुल की कि मैं कर रहा हुं, मैं हुं वो रामजी से दुर हो गया यदि रामजी का सामीप्य चाहते हो तो हमेशा यही समझना कि मैं नही कर रहा हुं मैं नही हुं जो कुछ भी है वो सियाराम है और वही मुझसे करवा रहे है वो मुझे निमित्त बना रहे है और मैं सिर्फ एक निमित्त हुं इससे ज्यादा और कुछ भी नही !

“निज चरणन की भक्ति हॆ नाथ मुझे दे दो
वाणी मे भी शक्ति हॆ नाथ मुझे दे दो
तेरी सेवा मिलती रहे इतनी सी कृपा कर दो ”

Sanjay Gupta