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बहुत पुराने समय में पिताजी द्वारा एक ऐसा ही प्रसंग मुझे सुनाया गया था।
जो अंतर्मन को झकझोर कर रख देता है

🌹प्रयाग दास🌹
प्राचीन काल की बात है प्रयाग दास नाम का एक छोटा सा छह सात वर्ष का बालक था जो अपने माता पिता की इकलौती संतान थी।
प्रयाग दास अपने मित्रों के साथ खेल रहा था तभी एक मित्र ने कहा कि जो रक्षाबंधन पर अपनी बहन से राखी बंधवा कर आएगा हम उसी को अपनी टोली में शामिल करेंगे और वही हमारे साथ खेलेगा ।
बालक प्रयाग दास यह सुनकर विह्ल हो उठा ।
अपनी मां से जाकर प्रयाग दास यह पूछता है कि मां मेरी बहन कहां है मुझे उससे राखी बंधवानी है। नहीं तो मेरे मित्र लोग मुझे अपने साथ नहीं खिलाएंगे।
माँ अपनी गृहस्थी के कार्य में लगी थी। बालक के बार-बार परेशान करने पर मां उससे झुंझलाकर कर बोलती है। की तेरी बहन जानकी है और बहनोई राम है और यह दोनों अवध में रहते हैं। अब यहां से जाओ हमें अपना काम करने दो ।
इतना सुनकर बालक प्रयाग दास प्रसन्न हो उठता है और कहता है अब तो हम अपनी बहन जानकी से मिलने जरूर जाएंगे और राखी बंधवा कर आएंगे।
और बालक प्रयाग दास यह संकल्प लेता है कि जब तक बहन को नहीं देख लेता तब तक पानी भी नहीं पियूंगा और मस्ती में आकर अवध की ओर प्रस्थान करता है और रास्ते भर प्रसन्न होते हुए जाता है।
कई दिन चलते चलते हो जाते हैं किंतु अवध नगर नहीं दिखाई देता है परंतु प्रयाग दास हताश नहीं होता वह चलता जाता है और एक समय वह अयोध्या जी पहुंच जाता है और नगर के कोने कोने में जाकर जानकी बहन को ढूंढता है किंतु वह नहीं मिलती तब भूख और प्यास से बेहाल मूर्छा खाकर वह गिर पड़ता है। तब एक संत की दृष्टि उस पर पड़ती है जोकि राम जानकी मंदिर से प्रसादी लेकर आ रहे थे संत उस बालक से कहते हैं कि बेटा लगता है तुमने बहुत दिनों से कुछ नहीं खाया लो यह जल पी लो यह प्रसादी खा लो तो बालक ने अन्न जल ग्रहण करने से इनकार कर दिया और कहा कि जब तक मेरी बहन जानकी नहीं मिल जाती जब तक मैं पानी भी नहीं पियूंगा। तब संत यह बताते हैं कि यह राम जानकी की ही प्रसादी है बालक उनसे पता पूछता है तो संत उन्हें राम जानकी मंदिर का पता बता देते हैं बालक प्रयाग दास ज्यौही मंदिर पहुंचता है। कि मंदिर के कपाट बंद हो चुके होते हैं।
प्रयाग दास चिल्ला चिल्ला कर बहन जानकी को बुलाता है तो मंदिर के पण्डे आकर बोलते हैं क्यों शोर मचा रहा है।
तब प्रयाग दास बोलता है कि मेरी बहन जानकी अंदर है उन्हें बुला दो तो पंडे बोलते हैं कि वह सो रही है प्रयाग दास बोलता है मैं जाकर जगा देता हूं प्रयाग दास की बार-बार हठ करने पर पंडित अंदर जाने का बहाना बनाते हैं। और आकर बोलते हैं कि वह 3 दिन के लिए बाहर गई है।
प्रयाग दास उदास हो जाता है और वहां से चल देता है मन में यह सोचता है कि यदि खाली हाथ लौटूंगा तो मेरे मित्र लोग मेरा मजाक उड़ाएंगे इससे तो अच्छा है यही अवध में सरयू तट पर अपने प्राण त्याग दूं ऐसा कहकर वह एक पीपल के पेड़ पर फंदा बनाकर लटकने की तैयारी करने लगता है ।
वहां मंदिर में यही सपना जानकी जी देखती हैं और प्रभु श्रीराम से बोलती है कि हे नाथ मुझे आज्ञा दीजिए मेरा छोटा भईया मुझसे राखी बंधवाने आया है तो मैं उसे राखी बांधने जाती हूं इतना कहकर जानकी जी राखी की थाली सजाकर आरती और मिष्ठान्न मेवा लेकर चल पड़ती है प्रयाग दास फांसी पर लटकने वाला ही था कि जानकीदेवी बोलती हैं कि भइया रुको मैं ही तुम्हारी बहन जानती हूं और तुम्हें राखी बांधने आई हूं और फिर प्रयाग दास उनसे मिलता है जानकी मैया अपने मायके मां बाबा के बारे में पूछती है और फिर कहती है कि भइया अब जाकर मेरी याद आई इतने दिनों से कहां थे तुम्हारी याद में तुम्हारी बहन जानकी विहल होती रहती थी और इस प्रकार सभी समाचार लेने के पश्चात प्रयाग दास को तिलक करके जानकीजी राखी बांधती है आरती उतारती है और मिठाई खिलाती है और कहती है कि भइया अब हमें भूल ना जाना और कुछ बड़े हो जाओ तो फिर आना और हमें अपने साथ लिवा ले जाना।
बालक प्रयागदस हाथ में राखी बंधवा कर वापस घर लौटता है और अपनी मां को सारी बात बताता है। और अति प्रसन्न होता है।।

यह प्रसंग इतना भवुक है कि सहज और सरल हृदय पर गहरे भाव छोड़ जाता है।
और भगवान हमसे क्या चाहते हैं पूजा पाठ भोग प्रसादी सब व्यर्थ है जब मन में भाव् ही ना हो।
बड़े-बड़े ऋषि मुनि भी महान तपस्या करके जिन्हें नहीं प्राप्त कर पाते वे भगवान भाव और प्रेम मैं बंधकर अपने आप ही साधारण जीव पर भी अपनी कृपादृष्टि बरसा देते हैं।

ऐसा ही प्रेम श्री जी के चरणों में हमेशा बना रहे।

राधे राधे बोलना पडेगा

ज्योति अग्रवाल

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