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ये पोस्ट बड़ी उम्मीद के साथ आप तक भेजी जा रही है। उम्मीद है आप इसे पूरा पढ़ेंगे और कुछ जिम्मेदार लोगों को जरूर भेजेंगे।

1990 के आसपास की बात है।
जो भी प्रतिभावान बच्चे अच्छे Engineering, Medical, Law, Accounts या अन्य किसी भी Field से अपनी पढ़ाई पूरी करते, विदेशी कम्पनियाँ तुरन्त Toppers को भर्ती करके विदेश ले जाती। ये दौर बहुत ज्यादा Competition का दौर था।

प्रतिभा पलायन (Brain Drain) एक राष्ट्रीय समस्या और ज्वलंत मुद्दा बन चुका था। TV, अख़बारों, रेडियो, सभाओं, संगोष्ठी और Debates में छाया हुआ मुद्दा।

राष्ट्र में रहकर युवा भले ही राष्ट्र की सेवा ना कर पा रहे थे, किन्तु भारत की विश्वगुरु की पहचान फिर से ज़िन्दा हो रही थी। संसार स्तब्ध था और धीरे-धीरे विश्व के सभी सम्मानित संस्थानों पर भारतीय युवा Doctors, Engineers, Professors, Scientists, CEO आदि-आदि के रूप में कब्जा जमाते जा रहे थे।

आपके जितने भी जानकार विदेशों में Set हैं, उनमें से ज़्यादातर की Graduation 1990 से 2005 के बीच पूरी हुई होगी। आप खुद देख लीजिये।

फिर से विश्व ने भारत के साथ छल किया। UNO के माध्यम से पैसे फेंककर भारत में No Detention Policy लागू करवाई और Universalisation of Elementary Education के नाम पर भारतीय शिक्षा की बुनियादी जड़ों को काट दिया।

युवाओं को भटकाने के लिए अमेरिकी और यूरोपी कम्पनियों ने Facebook, Whatsapp, twitter और ना जाने कितने जंजाल युवाओं के गले में डाल दिया।

Social Media या Shopping के अलावा आप अपने Computer पर किसी भी Developed Country की कोई भी Useful जानकारी, knowledge, Information वाली website आप नहीं खोल सकते।
आप check कर लीजिये।
वो लोग आपसे Medical, Engineering, Architecture में हो रही advancement share नहीं करना चाहते। बस आपको Social Media पर फँसाकर, आपका ध्यान भटकाकर आपको पढ़ाई में पीछे छोड़ना चाहते थे, और उन्होंने बड़े ही शातिराना ढंग से आपको पीछे छोड़ दिया।

कहाँ गया प्रतिभा-पलायन का मुद्दा ? जब प्रतिभा ही नहीं बची तो प्रतिभा-पलायन कैसा ?

युवा सतर्क हो जायें, Internet को छोड़कर किताबों की तरफ लौटें।

उज्ज्वल भविष्य आपका इंतजार कर रहा है। व्रत का मतलब समझें। संकल्प का मतलब समझें। खाना छोड़ना व्रत नहीं है, Internet या Mobile छोड़ना भी व्रत हो सकता है। दिन में दस घण्टे किताब पढ़ना भी संकल्प हो सकता है।

ये सन्देश किसी अज्ञात लेखक ने लिखा है। मुझे पढ़कर काफी अच्छा लगा और इसलिए मैं आप तक भेज रहा हूँ। आप भी पढ़िये और अच्छा लगे तो आगे भेजिये।

बुराई स्वतः फैलती है और अच्छाई प्रयास के द्वारा।

जैहिंद (जयहिन्द)

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बहुत पुराने समय में पिताजी द्वारा एक ऐसा ही प्रसंग मुझे सुनाया गया था।
जो अंतर्मन को झकझोर कर रख देता है

🌹प्रयाग दास🌹
प्राचीन काल की बात है प्रयाग दास नाम का एक छोटा सा छह सात वर्ष का बालक था जो अपने माता पिता की इकलौती संतान थी।
प्रयाग दास अपने मित्रों के साथ खेल रहा था तभी एक मित्र ने कहा कि जो रक्षाबंधन पर अपनी बहन से राखी बंधवा कर आएगा हम उसी को अपनी टोली में शामिल करेंगे और वही हमारे साथ खेलेगा ।
बालक प्रयाग दास यह सुनकर विह्ल हो उठा ।
अपनी मां से जाकर प्रयाग दास यह पूछता है कि मां मेरी बहन कहां है मुझे उससे राखी बंधवानी है। नहीं तो मेरे मित्र लोग मुझे अपने साथ नहीं खिलाएंगे।
माँ अपनी गृहस्थी के कार्य में लगी थी। बालक के बार-बार परेशान करने पर मां उससे झुंझलाकर कर बोलती है। की तेरी बहन जानकी है और बहनोई राम है और यह दोनों अवध में रहते हैं। अब यहां से जाओ हमें अपना काम करने दो ।
इतना सुनकर बालक प्रयाग दास प्रसन्न हो उठता है और कहता है अब तो हम अपनी बहन जानकी से मिलने जरूर जाएंगे और राखी बंधवा कर आएंगे।
और बालक प्रयाग दास यह संकल्प लेता है कि जब तक बहन को नहीं देख लेता तब तक पानी भी नहीं पियूंगा और मस्ती में आकर अवध की ओर प्रस्थान करता है और रास्ते भर प्रसन्न होते हुए जाता है।
कई दिन चलते चलते हो जाते हैं किंतु अवध नगर नहीं दिखाई देता है परंतु प्रयाग दास हताश नहीं होता वह चलता जाता है और एक समय वह अयोध्या जी पहुंच जाता है और नगर के कोने कोने में जाकर जानकी बहन को ढूंढता है किंतु वह नहीं मिलती तब भूख और प्यास से बेहाल मूर्छा खाकर वह गिर पड़ता है। तब एक संत की दृष्टि उस पर पड़ती है जोकि राम जानकी मंदिर से प्रसादी लेकर आ रहे थे संत उस बालक से कहते हैं कि बेटा लगता है तुमने बहुत दिनों से कुछ नहीं खाया लो यह जल पी लो यह प्रसादी खा लो तो बालक ने अन्न जल ग्रहण करने से इनकार कर दिया और कहा कि जब तक मेरी बहन जानकी नहीं मिल जाती जब तक मैं पानी भी नहीं पियूंगा। तब संत यह बताते हैं कि यह राम जानकी की ही प्रसादी है बालक उनसे पता पूछता है तो संत उन्हें राम जानकी मंदिर का पता बता देते हैं बालक प्रयाग दास ज्यौही मंदिर पहुंचता है। कि मंदिर के कपाट बंद हो चुके होते हैं।
प्रयाग दास चिल्ला चिल्ला कर बहन जानकी को बुलाता है तो मंदिर के पण्डे आकर बोलते हैं क्यों शोर मचा रहा है।
तब प्रयाग दास बोलता है कि मेरी बहन जानकी अंदर है उन्हें बुला दो तो पंडे बोलते हैं कि वह सो रही है प्रयाग दास बोलता है मैं जाकर जगा देता हूं प्रयाग दास की बार-बार हठ करने पर पंडित अंदर जाने का बहाना बनाते हैं। और आकर बोलते हैं कि वह 3 दिन के लिए बाहर गई है।
प्रयाग दास उदास हो जाता है और वहां से चल देता है मन में यह सोचता है कि यदि खाली हाथ लौटूंगा तो मेरे मित्र लोग मेरा मजाक उड़ाएंगे इससे तो अच्छा है यही अवध में सरयू तट पर अपने प्राण त्याग दूं ऐसा कहकर वह एक पीपल के पेड़ पर फंदा बनाकर लटकने की तैयारी करने लगता है ।
वहां मंदिर में यही सपना जानकी जी देखती हैं और प्रभु श्रीराम से बोलती है कि हे नाथ मुझे आज्ञा दीजिए मेरा छोटा भईया मुझसे राखी बंधवाने आया है तो मैं उसे राखी बांधने जाती हूं इतना कहकर जानकी जी राखी की थाली सजाकर आरती और मिष्ठान्न मेवा लेकर चल पड़ती है प्रयाग दास फांसी पर लटकने वाला ही था कि जानकीदेवी बोलती हैं कि भइया रुको मैं ही तुम्हारी बहन जानती हूं और तुम्हें राखी बांधने आई हूं और फिर प्रयाग दास उनसे मिलता है जानकी मैया अपने मायके मां बाबा के बारे में पूछती है और फिर कहती है कि भइया अब जाकर मेरी याद आई इतने दिनों से कहां थे तुम्हारी याद में तुम्हारी बहन जानकी विहल होती रहती थी और इस प्रकार सभी समाचार लेने के पश्चात प्रयाग दास को तिलक करके जानकीजी राखी बांधती है आरती उतारती है और मिठाई खिलाती है और कहती है कि भइया अब हमें भूल ना जाना और कुछ बड़े हो जाओ तो फिर आना और हमें अपने साथ लिवा ले जाना।
बालक प्रयागदस हाथ में राखी बंधवा कर वापस घर लौटता है और अपनी मां को सारी बात बताता है। और अति प्रसन्न होता है।।

यह प्रसंग इतना भवुक है कि सहज और सरल हृदय पर गहरे भाव छोड़ जाता है।
और भगवान हमसे क्या चाहते हैं पूजा पाठ भोग प्रसादी सब व्यर्थ है जब मन में भाव् ही ना हो।
बड़े-बड़े ऋषि मुनि भी महान तपस्या करके जिन्हें नहीं प्राप्त कर पाते वे भगवान भाव और प्रेम मैं बंधकर अपने आप ही साधारण जीव पर भी अपनी कृपादृष्टि बरसा देते हैं।

ऐसा ही प्रेम श्री जी के चरणों में हमेशा बना रहे।

राधे राधे बोलना पडेगा

ज्योति अग्रवाल

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जबर्दस्त सिख
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What is Karam? How it works?

☺: अनजाने कर्म का फल

VERY INTERESTING

एक राजा ब्राह्मणों को लंगर में महल के आँगन में भोजन करा रहा था ।
राजा का रसोईया खुले आँगन में भोजन पका रहा था ।
उसी समय एक चील अपने पंजे में एक जिंदा साँप को लेकर राजा के महल के उपर से गुजरी ।
तब पँजों में दबे साँप ने अपनी आत्म-रक्षा में चील से बचने के लिए अपने फन से ज़हर निकाला ।
तब रसोईया जो लंगर ब्राह्मणो के लिए पका रहा था, उस लंगर में साँप के मुख से निकली जहर की कुछ बूँदें खाने में गिर गई ।
किसी को कुछ पता नहीं चला ।
फल-स्वरूप वह ब्राह्मण जो भोजन करने आये थे उन सब की जहरीला खाना खाते ही मौत हो गयी ।
अब जब राजा को सारे ब्राह्मणों की मृत्यु का पता चला तो ब्रह्म-हत्या होने से उसे बहुत दुख हुआ ।

ऐसे में अब ऊपर बैठे यमराज के लिए भी यह फैसला लेना मुश्किल हो गया कि इस पाप-कर्म का फल किसके खाते में जायेगा …. ???
(1) राजा …. जिसको पता ही नहीं था कि खाना जहरीला हो गया है ….
या
(2 ) रसोईया …. जिसको पता ही नहीं था कि खाना बनाते समय वह जहरीला हो गया है ….
या
(3) वह चील …. जो जहरीला साँप लिए राजा के उपर से गुजरी ….
या
(4) वह साँप …. जिसने अपनी आत्म-रक्षा में ज़हर निकाला ….

बहुत दिनों तक यह मामला यमराज की फाईल में अटका (Pending) रहा ….

फिर कुछ समय बाद कुछ ब्राह्मण राजा से मिलने उस राज्य मे आए और उन्होंने किसी महिला से महल का रास्ता पूछा ।
उस महिला ने महल का रास्ता तो बता दिया पर रास्ता बताने के साथ-साथ ब्राह्मणों से ये भी कह दिया कि “देखो भाई ….जरा ध्यान रखना …. वह राजा आप जैसे ब्राह्मणों को खाने में जहर देकर मार देता है ।”

बस जैसे ही उस महिला ने ये शब्द कहे, उसी समय यमराज ने फैसला (decision) ले लिया कि उन मृत ब्राह्मणों की मृत्यु के पाप का फल इस महिला के खाते में जाएगा और इसे उस पाप का फल भुगतना होगा ।

यमराज के दूतों ने पूछा – प्रभु ऐसा क्यों ??
जब कि उन मृत ब्राह्मणों की हत्या में उस महिला की कोई भूमिका (role) भी नहीं थी ।
तब यमराज ने कहा – कि भाई देखो, जब कोई व्यक्ति पाप करता हैं तब उसे बड़ा आनन्द मिलता हैं । पर उन मृत ब्राह्मणों की हत्या से ना तो राजा को आनंद मिला …. ना ही उस रसोइया को आनंद मिला …. ना ही उस साँप को आनंद मिला …. और ना ही उस चील को आनंद मिला ।
पर उस पाप-कर्म की घटना का बुराई करने के भाव से बखान कर उस महिला को जरूर आनन्द मिला । इसलिये राजा के उस अनजाने पाप-कर्म का फल अब इस महिला के खाते में जायेगा ।

बस इसी घटना के तहत आज तक जब भी कोई व्यक्ति जब किसी दूसरे के पाप-कर्म का बखान बुरे भाव से (बुराई) करता हैं तब उस व्यक्ति के पापों का हिस्सा उस बुराई करने वाले के खाते में भी डाल दिया जाता हैं ।

अक्सर हम जीवन में सोचते हैं कि हमने जीवन में ऐसा कोई पाप नहीं किया, फिर भी हमारे जीवन में इतना कष्ट क्यों आया …. ??

*ये कष्ट और कहीं से नहीं, बल्कि लोगों की बुराई करने के कारण उनके पाप-कर्मो से आया होता हैं जो बुराई करते ही हमारे खाते में ट्रांसफर हो जाता हैं ।

सुबोध महेरा

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खिचड़ी का आविष्कार
कई वर्षों पहले एक बार,
दिन का नाम था रविवार।
पति-पत्नी की एक जोड़ी थी,
नोंकझोंक जिनमें थोड़ी थी।

अधिक था उनमें प्यार,
मीठी बातों का अम्बार।
सुबह पतिदेव ने ली अंगड़ाई,
पत्नी ने बढ़िया चाय पिलाई।

फिर नहाने को पानी किया गर्म,
निभाया अच्छी पत्नी का धर्म।
पति जब नहाकर निकल आए,
पत्नी ने बढ़िया पकौड़े खिलाए।

फिर पतिदेव ने समाचार-पत्र पकड़ा,
दोनों हाथों में उसे कसकर जकड़ा।
अगले तीन घंटे तक न खिसके,
रहे वो समाचार-पत्र से चिपके।

पत्नी निपटाती रही घर के काम,
मिला न एक पल भी आराम।
एक पल को जो कुर्सी पर टिकी,
पति ने तुरंत फरमाइश पटकी।

बोले अब नींद आ रही है ढेर सारी,
प्रियतमा बना दो पूड़ी और तरकारी।
पत्नी बोली मैं हूँ आपकी आज्ञाकारी,
लेकिन फ्रिज में नहीं है तरकारी।

पति बोले दोपहर तक कोहरा छाया है,
सूरज को भी बादलों ने छिपाया है।
ऐसे में तरकारी लेने तो न जाऊँगा,
छोड़ो पूड़ी, दाल-चावल ही खाऊँगा।

पत्नी बोली थोड़ी देर देखिए टीवी,
अभी खाना बनाकर लाती बीवी।
पति तुरंत ही गए कमरे के अंदर,
पत्नी ने रसोई में खोले कनस्तर।

दाल-चावल उसमें रखे थे पर्याप्त,
पर सिलेंडर होने वाला था समाप्त।
बन सकते थे चावल या फिर दाल,
क्या बनाएँ क्या न का था सवाल।

कोहरा, बादल और था थरथर जाड़ा,
सूरज निकले गुजर चुका था पखवाड़ा।
कैसे कहती पत्नी कि सिलेंडर लाना है,
वरना दाल-चावल को भूल जाना है।

इतनी ठंड में पति को कैसे भेजूँ बाजार,
काँप-काँप उनका हो जाएगा बँटाधार।
इस असमंजस से पाने के लिए मुक्ति,
धर्मपत्नी ने लगायी एक सुंदर युक्ति।

कच्ची दाल में कच्चे चावल मिलाए,
धोकर उसने तुरंत कुकर में चढ़ाए।
कुछ देर में एक लम्बी सी आई सीटी,
पति के पेट में चूहे करने लगे पीटी।

पत्नी ने मेज पर खिचड़ी लगायी,
साथ में अचार और दही भी लायी।
नया व्यंजन देखकर दिमाग ठनका,
और पति के मुख से स्वर खनका।

बोले न तो है चावल न ही है दाल,
दोनों को मिलाजुला ये क्या है बवाल।
पत्नी बोली सिलेंडर हो गया खाली,
इसलिए मैंने चावल-दाल मिला डाली।

एक बार ही कुकर था चढ़ सकता,
दाल-चावल में से कोई एक पकता।
इतनी ठंड में आप जो बाहर जाते,
अगले दो घण्टे तक कँपकँपाते।

इसलिए मैंने इन दोनों को मिलाया,
आपके लिए ये नया व्यंजन बनाया।
खाने से पहले धारणा मत बनाइए,
तनिक एक चम्मच तो चबाइए।

पेट में चूहे घमासान मचा रहे थे,
चावल देख पति ललचा रहे थे।
नुक्ताचीनी और नखरे छोड़कर,
खाया एक कौर चम्मच पकड़कर।

नये व्यंजन का नया स्वाद आया,
पत्नी का नवाचार बहुत भाया।
बोले अद्भुत संगम तुमने बनाया,
और मुझे ठण्ड से भी है बचाया।

तृप्त हूँ मैं ये नया व्यंजन खाकर,
और धन्य हूँ तुम-सी पत्नी पाकर।
पर एक बात तो बताओ प्रियतमा,
क्या नाम है इसका, क्या दूँ उपमा।

पत्नी बोली पहली बार इसे बनाया,
नाम इसका अभी कहाँ है रख पाया।
खिंच रही थी गैस दुविधा थी बड़ी,
इसलिए इसको बुलाएँगे खिचड़ी।

मित्रों इनके सामने जब समस्या हुई खड़ी,
न तो पति चिल्लाया न ही पत्नी लड़ी।
आपके समक्ष भी आए जब ऐसी घड़ी,
प्रेम से पकाइएगा कोई नयी खिचड़ी।

तो इस पूरी घटना का जो निकला सार,
उसे हम कह सकते हैं कुछ इस प्रकार।
कि पति-पत्नी में जब हो असीम प्यार,
तो हो जाता है खिचड़ी का आविष्कार।

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मित्रो आज शनिवार है, आज हम आपको बतायेगें कि
कैसे करें पीपल वृक्ष का पूजन और किन बातों का रखे ध्यान,,,,,,

पीपल को हिन्दू धर्म में सबसे पूजनीय वृक्ष माना गया है। पीपल का शुद्ध तत्सम नाम अश्वत्थ है। इसे विश्व वृक्ष, चैत्य वृक्ष और वासुदेव भी कहा जाता है। हिंदू दर्शन की मान्यता है इसके पत्ते-पत्ते में देवता का वास रहता है। विशेषकर विष्णु का। ऋगवेद में अश्वत्थ की लकड़ी के पात्रों का उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद और छंदोग्य उपनिषद में इस वृक्ष के नीचे देवताओं का स्वर्ग बताया गया है।

इस पेड़ की पूजा के कई धार्मिक और वैज्ञानिक कारण हैं। साथ ही, कुछ नियम भी। माना जाता है जो इन नियमों को मानकर पीपल की पूजा करता है वो निहाल हो जाता है, जबकि जो ध्यान नहीं रखता वो कंगाल हो जाता है। आइए जानते हैं पीपल की पूजा से जुड़े ऐसे ही कुछ धार्मिक वैज्ञानिक कारण और नियमों को….

धार्मिक कारण,,,श्रीमद्भगवदगीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि ‘अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम, मूलतो ब्रहमरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे, अग्रत: शिवरूपाय अश्वत्थाय नमो नम:’ यानी मैं वृक्षों में पीपल हूं। पीपल के मूल में ब्रह्मा जी, मध्य में विष्णु जी व अग्र भाग में भगवान शिव जी साक्षात रूप से विराजित हैं।

स्कंदपुराण के अनुसार पीपल के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में भगवान श्री हरि और फलों में सभी देवताओं का वास है। भारतीय जन जीवन में वनस्पतियों और वृक्षों में भी देवत्व की अवधारणा की गई है और यही कारण है कि धार्मिक दृष्टि से पीपल को देवता मान कर पूजन किया जाता है।

वैज्ञानिक कारण,,,अधिकतर पेड़ दिन में आक्सीजन छोड़ते हैं और कार्बनडाइआक्साईड ग्रहण करते हैं। जबकि रात को सभी वृक्ष कार्बन-डाइआक्साईड छोड़ते हैं व आक्सीजन लेते हैं, इसी कारण यह धारणा है कि रात को कभी भी पेड़ों के निकट नहीं सोना चाहिए। वैज्ञानिकों के अनुसार पीपल का पेड़ ही एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो कभी कार्बन डाईआक्साइड नहीं छोड़ता वह 24 घंटे आक्सीजन ही छोड़ता है इसलिए इसके पास जाने से कई रोग दूर होते हैं और शरीर स्वस्थ रहता है।

क्या है पूजन का फल,,पीपल के पेड़ में जल चढ़ाने व पूजन और परिक्रमा करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। वहीं शत्रुओं का नाश भी होता है। यह सुख संपत्ति, धन-धान्य, ऐश्वर्य, संतान सुख व सौभाग्य प्रदान करने वाला है। इसकी पूजा करने से ग्रह पीड़ा, पितरदोष, काल सर्प योग, विष योग व अन्य ग्रहों से पैदा होने वाले दोषों का निवारण हो जाता है। अमावस्या और शनिवार को पीपल के पेड़ के नीचे हनुमान जी की पूजा-अर्चना करते हुए हनुमान चालीसा का पाठ करने से पेरशानियां दूर होती हैं।

रोज सुबह नियम से पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर जप, तप और प्रभु नाम का सिमरण करने से जीव को शारीरिक व मानसिक लाभ प्राप्त होता है। पीपल के पेड़ के नीचे वैसे तो रोजाना सरसों के तेल का दीपक जलाना अच्छा काम है। यदि किसी कारणवश ऐसा संभव न हो तो शनिवार की रात को पीपल के नीचें दीपक जरूर जलाएं, क्योंकि इससे घर में सुख समृद्धि और खुशहाली आती है, कारोबार में सफलता मिलती है, रुके हुए काम बनने लगते हैं।

क्या न करें,,शास्त्रानुसार शनिवार को पीपल पर लक्ष्मी जी का वास माना जाता है।उस दिन जल चढ़ाना जहां श्रेष्ठ है वहीं रविवार को पीपल पर जल चढ़ाना निषेध है। शास्त्रों के अनुसार रविवार को पीपल पर जल चढ़ाने से घर में दरिद्रता आती है। पीपल के वृक्ष को कभी काटना नहीं चाहिए। ऐसा करने से पितरों को कष्ट मिलते हैं आैर वंशवृद्धि में रुकावट आती है। किसी विशेष काम से विधिवत नियमानुसार पूजन करने व यज्ञादि पवित्र कामों के लक्ष्य से पीपल की लकड़ी काटने पर दोष नहीं लगता

पीपल के अचूक उपाय,,,शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के बुरे प्रभावों को दूर करने के लिए, अपने ग्रहों के शुभ प्रभावों को प्राप्त करने के लिए, मनवाँछित सफलता के लिए हर जातक को प्रति शनिवार को पीपल के वृक्ष पर सुबह गुड़, दूध मिश्रित जल चढ़ाकर, धूप अगरबत्ती जलाकर उसकी सात परिक्रमा करनी चाहिए, एवं संध्या के समय पीपल के वृक्ष के नीचे कड़वे तेल का दीपक भी अवश्य ही जलाना चाहिए। इस नियम का पालन करने से पीपल की अदृश्य शक्तियां उस जातक की सदैव मदद करती है।

व्यापार में वृद्धि हेतु प्रत्येक शनिवार को एक पीपल का पत्ता लेकर उस पर चन्दन से स्वस्तिक बना कर उसे अपने व्यापारिक स्थल की अपनी गद्दी / बैठने के स्थान के नीचे रखे । इसे हर शनिवार को बदल कर अलग रखते रहे।
ऐसा 7 शनिवार तक लगातार करें फिर 8वें शनिवार को इन सभी पत्तों को किसी सुनसान जगह पर डाल दें और मन ही मन अपनी आर्थिक समृद्धि के लिए प्रार्थना करते रहे, शीघ्र पीपल की कृपा से आपके व्यापार में बरकत होनी शुरू हो जाएगी।

पीपल की सेवा से असाध्य से असाध्य रोगो में भी चमत्कारी लाभ होता देखा गया है । यदि कोई व्यक्ति किसी भी रोग से ग्रसित है वह नित्य पीपल की सेवा करके अपने बाएं हाथ से उसकी जड़ छूकर उनसे अपने रोगो को दूर करने की प्रार्थना करें तो जातक के रोग शीघ्र ही दूर होते है। उस पर दवाइयों का जल्दी / तेज असर होता है ।

यदि किसी बीमार व्यक्ति का रोग ठीक ना हो रहा हो तो उसके तकिये के नीचे पीपल की जड़ रखने से बीमारी जल्दी ठीक होती है ।

निसंतान दंपती संतान प्राप्ति हेतु पीपल के एक पत्ते को प्रतिदिन सुबह लगभग एक घंटे पानी में रखे, बाद में उस पत्ते को पानी से निकालकर किसी पेड़ के नीचे रख दें और पति पत्नी उस जल का सेवन करें तो शीघ्र संतान प्राप्त होती है।ऐसा लगभग 2 – 3 माह तक लगातार करना चाहिए।

पीपल का पेड़ रोपने और उसकी सेवा करने से पितृ दोष में कमी होती है । शास्त्रों के अनुसार पीपल के पेड़ की सेवा मात्र से ही न केवल पितृ दोष वरन जीवन के सभी परेशानियाँ स्वत: कम होती जाती है ।

शास्त्रानुसार प्रत्येक पूर्णिमा पर प्रातः 10 बजे पीपल वृक्ष पर मां लक्ष्मी का फेरा लगता है। इसलिए जो व्यक्ति आर्थिक रूप से मजबूत होना चाहते है वो इस समय पीपल के वृक्ष पर फल, फूल, मिष्ठान चढ़ाते हुए धूप अगरबती जलाकर मां लक्ष्मी की उपासना करें, और माता लक्ष्मी के किसी भी मंत्र की एक माला भी जपे।इससे जातक को अपने किये गए कार्यों के सर्वश्रेष्ठ फल मिलते है और वह धीरे धीरे आर्थिक रूप से सक्षम हो जाता है।

’ब्रह्म पुराण’ के 118 वें अध्याय में भगवान शनिदेव कहते हैं कि – ‘ शनिवार को जो मनुष्य प्रातःकाल नियमित रूप से पीपल के वृक्ष का स्पर्श करेंगे, उसे मीठा जल देंगे उनके सब कार्य सिद्ध होंगे तथा उनको मुझसे कोई पीड़ा भी नहीं होगी। उन्हें अन्य ग्रहजन्य पीड़ा भी नहीं होगी।’

शास्त्रों के अनुसार शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष का दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए ‘ॐ नमः शिवाय।’ का 108 बार जप करने से सभी दुःख, कठिनाईयाँ एवं ग्रहदोषों का दुष्प्रभाव दूर हो जाता है।

शनिवार के दिन पीपल के नीचे हनुमान चालीसा पड़ने और गायत्री मन्त्र की एक माला का जाप करने से किसी भी तरह का भय नहीं रहता है, समस्त बिग़डे कार्य भी बनने लगते है

प्राचीनकाल से लोग पीपल के पेड़ की पूजा करते है क्योंकि पीपल का पेड़ कई सारे गुणों से भरपूर है। पीपल का वृक्ष चौबीसों घंटे ऑक्सीजन प्रदान कर वातावरण को शुद्ध करता है। इसलिए गांवों में प्रत्येक घर तथा मन्दिर के आस पास आपको पीपल या नीम का वृक्ष अवश्य मिल जाता है। पीपल की छाया बेहद शीतल होती है और इसके पत्ते कोमल, चिकने और हरे रंग के होते हैं।

पीपल का पत्ता और पीपल का फल दोनों ही औषधीय गुणों से भरपूर है इसलिए आयुर्वेद में पीपल को औषधि के रूप उपयोग किया जाता है। पीपल फेफड़ों के रोग जैसे तपेदिक, अस्थमा, खांसी तथा कुष्ठ, आदि रोगों से निजात दिलाता है। इसके अलावा यह रतौंधि, मलेरिया ज्वर, कान दर्द, खांसी, बांझपन, सर्दी व जुखाम आदि रोगों से भी बचाता है। तो आज हम लोग गुणकारी पीपल के पेड़ की जानकारी और उसके फ़ायदों के बारे में जानेंगे

पीपल के औषधीय लाभ,,,,

  1. वीर्य बढ़ाएं और नपुंसकता को दूर भगाएं
    पीपल पर लगने वाला फल जिसे पिपरी कहते हैं; को छाया में सुखाकर पीस कर चलनी से छान लें। अब इस चूर्ण का एक चौथाई चम्मच 250 ग्राम दूध में मिलाकर नियमित रूप से पीने से वीर्य बढ़ता है तथा नपुंसकता दूर होती है।
  2. आँखों के लिए लाभकारी,,,पीपल का दूध आंखों के अनेक रोगों को दूर करता है। पीपल के पत्ते या टहनी तोड़ने से जो दूध निकलता है उसे थोड़ी मात्रा में प्रतिदिन सलाई से लगाएं और आंखों में दर्द, जलन और सूजन में राहत पाएं।

3, कान का दर्द दूर करें,,पीपल की ताज़ी पत्तियों को निचोड़कर उसका रस कान में डालने से कान दर्द दूर होता है।

  1. पैरों की बिवाई को ठीक करें,पीपल के पत्ते से निकलने वाले दूध को लगाने से पैरों की बिवाई ठीक हो जाती है।
  • खाँसी को छू मंतर करें,,जब आप खांस खांस कर परेशान हो जाएं तब खांसी के रोग से छुटकारा पाने के लिए पीपल के पत्तों को छाया में सुखाकर कूट कर इसमें मिसरी मिला दें तथा कीकर का गोंद मिलाकर चने के आकार के बराबर गोली बना लें। दिनभर में 2 गोलियां कुछ दिनों तक चूसनें से खांसी छू मंतर हो जाएगी।

  • 6, सर्दी जुखाम से बचाएं,,सर्दी जुखाम होने पर पीपल की 2 कोमल पत्तियों को चूसने से सर्दी जुकाम में आराम मिलता है।

    1. दाद खाज खुजली भगाएं,,,पीपल के 4-5 कोमल, नरम पत्ते ख़ूब चबा-चबाकर खाने से तथा इसकी छाल का काढ़ा बनाकर आधा कप मात्रा में पीने से दाद, खाज, खुजली आदि चर्म रोगों में आराम मिलता है।
  • दमा रोग को ठीक करें,,,पीपल की छाल के अन्दर का भाग निकालकर सुखा लें और कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें, यह चूर्ण दमा रोगी को सेवन कराएं इससे दमा रोग में आराम मिलेगा।

  • पीपल का दातून करने से लाभ,,,पीपल के दातुन से दांतों के रोग जैसे दांतों में कीड़ा लगना, मसूड़ों में सूजन, ख़ून निकलना, दांतों का पीलापन आदि रोग दूर हो जाते है। पीपल की दातून करने से मुंह की दुर्गंध दूर होती है और आंखों की रोशनी भी बढ़ती है।

  • 10 . पीलिया रोग को दूर करें,,,अगर पीलिया का रोगी पीपल की नर्म टहनी के छोटे-छोटे टुकड़े काटकर माला बना लें और इस माला को एक सप्ताह तक धारण करे तो पीलिया रोग चला जाता है।

    पीपल के औषधीय गुणों से परिचित होने के बाद यक़ीनन आप भी इस पेड़ को लगायेंगे और इसके चमत्कारिक लाभ से फ़ायदा उठायेंगे।

    पीपल के पेड़ को हिंदू धर्म में पूजा जाता है। यह पेड़ कोई साधारण पेड़ नहीं है। इस पेड़ में देवी देवता बसते हैं। साथ ही साथ यह इंसान की कई सारी बुरी दशाओं को भी खत्म करता है। पीपल का पेड़ वैज्ञानिक दृष्टि से रात और दिन दोनों समय में आॅक्सीजन देता है। आइये जानते हैं पीपल के चमतकारी फायदे।

    पीपल के पेड़ के चमतकारी फायदे,,,,

    साढ़ेसाती या ढईया,,,पीपल के पेड़ पर नियमित रूप से पानी चढ़ाने से शनि की साढ़ेसाती खत्म होती है। शनि का प्रभाव यदि आपको परेशान करता है तो आप रोज पीपल के पेड़ पर सूत का धागा बांधे। एैसा नियमित करें।

    कालसर्प दोष,,,यदि आपकी कुंड़ली में कालसर्प दोष है और आप उससे परेशान रहते हों तो नियमित रूप से पीपल के पेड़ की परिक्रमा करें। एैसा करने से कालसर्प दोष खत्म हो जाता है।

    दुख निवार्ण के लिए,,,वैदिक ग्रंथों में बताया गया है कि यदि इंसान के जीवन में दुख अधिक आ रहें हों तो वह इंसान पीपल का पेड़ जरूर लगाएं।

    पीपल का पेड़ लगाने से जीवन में कभी पैसों की कमी नहीं रहती है। शास्त्रों के अनुसार यदि इंसान पीपल के पेड़ की देखभाल करता है वह इंसान कभी जीवन में धन की कमी से परेशान नहीं होता है।

    बाधाओं से बचने के लिए,,,एैसा माना जाता है कि जो इंसान पीपल के पेड़ के नीचे शिवलिंग स्थापित करता है और उसकी पूजा करता है वह इंसान समस्त बाधाओं और कष्टों से मुक्त हो जाता है।

    शरीर के कष्टों में,,,जिस इंसान को शरीरिक कष्ट होते हों वे नियमित रूप से पीपल के पेड़ के नीचे दीया जलाएं।

    हनुमान चालीसा का पाठ पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ने से शनि की दषा खत्म हो जाती है और आपको चमतकारी फायदे मिलते है।

    धन प्राप्त करने के लिए,,,शनिवार के दिन में आप पीपल के पेड़ का एक पत्ता लें और उसे धो कर हल्दी से उसपर ह्रीं लिखें। और धूप दिया दिखाकर इस पत्ते को अपने पर्स या बटुए मेरख दें। एैसा करने से पर्स में कभी धन की कमी नहीं रहेगी।

    ये छोटे छोटे उपाय आपके लिए बहुत काम के हो सकते हैं यदि आप इन पर विश्वास बनाते हैं।

    संजय गुप्ता

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    💥संसार में जिसने जन्म लिया है उसे अपने पूर्वजन्मों के कर्मों के हिसाब से कष्ट भोगने ही होंगे आत्महत्या कर लेने से उन कष्टों से निजात नहीं मिलती……. बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख जरूर पढे।
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    किसी ने पूछा भगवान दु:ख दूर करते हैं
    साधु ने कहा ना रे भगवान किसी का दुःख दूर नहीं करते !यदि दुख ही दूर करना होता तो देते ही क्यों
    फिर दुःख दूर कौन करता है
    साधु बोले भगवान का नाम दु:ख दूर करता है उनके स्मरण में मन का रमण होने लगे तो दुःख का मरण है।
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    उत्तर भारत में प्रसिद्ध संत हुये हैं बाबा फकीर चंद गोसाईं ,
    उनके पास काफी दर्शनार्थी आते रहते थे और अपने मनोभावों के अनुसार अपनी जिज्ञासा का समाधान लेते रहते थे.
    बाबा फकीर चंद गोसाईं उनका सुंदर और व्यावहारिक निदान देते थे.
    उनके आश्रम के पास एक अध्यापक रहते थे. वह अक्सर उनके आश्रम आते-जाते रहते, प्रवचनों का लाभ लिया करते थे.
    एक बार अध्यापक महोदय अपने परिवार में होने वाली रोज-रोज की कलह से बुरी तरह त्रस्त हो गये.
    जहां शांति नहीं होती वहां लक्ष्मी भी नहीं ठहरतीं. इस कलह का परिणाम ऐसा रहा कि घर के आय के स्रोतों को नाश होने लगा.
    बात बिगड़ती-बिगड़ती ऐसी स्थिति तक पहुंच गई जब अध्यापक महोदय को भी सुधरो वरना नौकरी से विदाई का नोटिस दे दिया गया.
    कलह से चिंतित थे ही अब तो परिवार की दाल-रोटी पर भी संकट खड़ा होने वाला था. जिसे कोई राह नहीं दिखती उसे जीवन निरर्थक लगता ही है.
    आखिर थक-हारकर उन्होंने सोचा कि रोज-रोज की समस्याओं की मुक्ति का एक ही रास्ता है जीवन से छुटटी.
    अध्यापक महोदय ने आत्महत्या की सोची किन्तु आत्महत्या का निर्णय लेना इतना आसान तो था नहीं. सांसारिक प्राणी को तो अपने प्रियजनों और संतानों की चिंता अंत समय तक रहती ही है.
    वह जीना भी चाहते थे परंतु जीवन जीने लायक भी नहीं दिखता था. ऐसे उहापोह में पड़ा वह व्यक्ति बाबा फकीर चंद गोसाईं जी के आश्रम में पहुंचा और उन्हें प्रणाम करके सारी बात बताई.
    घुमा-फिराकर उन्होंने गोसाईं जी से आत्महत्या के विषय में उनकी राय जाननी चाही. गोसाईं जी उस समय आश्रमवासियों के भोजन के लिए बड़ी सावधानी से पत्तलें बना रहे थे. वह चुपचाप उसकी बातें सुनते रहे, कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
    उस व्यक्ति ने सोचा कि शायद निर्णय लेने में गोसाईं जी को विलम्ब हो रहा है.
    थोड़ी देर में उसे खीझ भी होने लगी कि वह इतनी बड़ी समस्या से जूझ रहा है और गोसाईं जी पत्तल बनाने में जुटे हैं.
    गोसाईं जी के परिश्रम और तल्लीनता को देख उसे आश्चर्य भी हुआ.
    उसने आखिर पूछ ही लिया- गोसाईं जी! आप इन पत्तलों को इतने परिश्रम से बना रहे हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद भोजन के उपरांत ये कूडे में फेंक दिये जायेंगे.
    गोसाईं जी मुस्कुराते हुए बोले- आप ठीक कहते हैं, लेकिन किसी वस्तु का पूरा उपयोग हो जाने के बाद उसको फेंकना बुरा नहीं, बुरा तब कहा जायेगा जब उसका उपयोग किए बिना अच्छी अवस्था में ही कोई उसे फेंक दे. आप तो समझदार हैं मेरे कहने का आशय तो भली-भांति समझ गए होंगे.
    इन शब्दों से अध्यापक महोदय की समस्या का समाधान हो गया. उस परिस्थिति में भी उनमें जीने का उत्साह आ गया और उन्होंने आत्महत्या का विचार त्याग दिया.
    संसार एक समुद्र है. उसमें असुविधा रूपी तरंगे आती ही रहेंगी. मनुष्य विपरीत परिस्थितियों में कई बार विचलित हो जाता है और इस समय कोरे उपदेश उसके मन पर अनुकूल प्रभाव भी नहीं छोडते.
    इसलिए ज्ञानी पुरूष ज्यादा शब्दों का प्रयोग किये बिना ही व्यक्ति की अशुभ वृत्तियों को समाप्त कर देते हैं.
    संसार में जिसने जन्म लिया है उसे अपने पूर्वजन्मों के कर्मों के हिसाब से कष्ट भोगने ही होंगे. आत्महत्या कर लेने से उन कष्टों से निजात नहीं मिलती. वे कष्ट आप अगले जन्मों में भोगेंगे.
    इसे आप अपने ऊपर चढ़े उस कर्ज की तरह लें. जितनी जल्दी कर्ज चुकता होगा, उस पर ब्याज कम लगेगा. यदि इस जन्म में काटने वाले कष्टों को अगले जन्मों के लिए रखेंगे तो ब्याज के साथ ज्यादा कष्ट भोगने होंगे.
    फिर कितने जन्मों तक आत्महत्या करके भागेंगे आप? क्या अच्छा नहीं कि इसी जन्म में हिसाब चुकता कर लिया जाए!
    आजकल एक प्रवृति, लोगों में महत्वाकांक्षा बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है. संतोष नहीं है. महत्वाकांक्षा का कोई अंत तो है नहीं, स्वाभाविक है कि सारी इच्छाएं पूरी होंगी नहीं. बस यहीं से शुरू होती है हताशा.
    जो लोग स्वभाव से जिद्दी रहे हैं, सबकुछ अपनी मर्जी से कराने वाले रहेे हैं, जरा सा भी समय के उलटफेर को सहन नहीं कर सकते उनमें जीवन छोडने की प्रवृति बहुत ज्यादा आ जाती है. इसलिए आजकल लोग आत्महत्या को विकल्प के रूप में समझने की भूल करते हैं.
    इसलिए जिद्दीपन छोड़कर ऐसा ख्याल मन में लाने से पहले अपने और अपने परिवार के बारे में अवश्य सोचें।

    Sanjay Gupta

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    असम में एक ईसाई धर्मप्रचारक भेजे गए थे, नाम था फादर क्रूज़ इन्हें असम के एक प्रभावशाली परिवार के लड़के को घर आकर अंग्रेजी पढ़ाने का अवसर मिला, पादरी साहब धीरे-धीरे घर का निरीक्षण करने लगे। उन्हें पता चल गया कि, बच्चे की दादी इस घर में सबसे प्रभाव वाली हैं, इसलिए उनको यदि ईसा की शिक्षाओं के जाल में फंसाया जाए तो, उनके माध्यम से पूरा परिवार और फिर पूरा गा़व ईसाई बनाया जा सकता है!

    पादरी साहब दादी मां को बताने लगे कि कैसे ईसा कोढ़ी का कोढ़ ठीक कर देते थे, कैसे वो नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति देते थे, आदि-आदि !

    दादी ने कहा, बेटा, हमारे “राम-कृष्ण” के चमत्कारों के आगे तो कुछ भी नहीं ये सब ! तुमने सुना है कि हमारे राम ने एक पत्थर का स्पर्श किया तो वो जीवित स्त्री में बदल गई। राम जी के नाम के प्रभाव से पत्थर भी तैर जाता था पानी में,आज भी तैर रहे है।

    पादरी साहब खामोश हो जाते पर प्रयास जारी रखते । एक दिन पादरी साहब चर्च से केक लेकर आ गए और दादी को खाने को दिया, पादरी साहब को विश्वास था कि दादी न खायेंगी पर उसकी आशा के विपरीत दादी ने केक लिया और खा गई !

    पादरी साहब आंखों में गर्वोक्त उन्माद भरे अट्टहास कर उठे, दादी तुमने चर्च का प्रसाद खा लिया ! अब तुम ईसाई हो ,

    दादी ने पादरी साहब के कान खींचते हुए कहा, वाह रे गधे ! मुझे एक दिन केक खिलाया तो मैं ईसाई हो गई और मैं जो प्रतिदिन तुमको अपने घर का खिलाती ह़ू , तो तू हिन्दू क्यों नहीं हुआ ? तू तो प्रतिदिन सनातन धर्म की इस आदि भूमि का वायु ,जल लेता है फिर तो तेरा रोम-रोम हिन्दू बन जाना चाहिए!

    अपने स्वधर्म और राष्ट्र को पथभ्रष्ट होने और गलत दिशा में जाने से बचाने वाली ये दादी मां थी असम की सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी “कमला देवी हजारिका”

    रामचंद्र आर्य