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मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक

मरने के बाद व्यक्ति की तीन तरह की गतियां होती हैं- 1. उर्ध्व गति, 2. स्थिर गति और 3.
अधो गति। व्यक्ति जब देह छोड़ता है तब सर्वप्रथम वह सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाता है। सूक्ष्म शरीर की गति के अनुसार ही वह भिन्न-भिन्न लोक में विचरण करता है और अंत में अपनी गति अनुसार ही पुन: गर्भ धारण करता है।
आत्मा के तीन स्वरूप माने गए हैं- जीवात्मा, प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा। जो भौतिक शरीर में
वास करता है उसे जीवात्मा कहते हैं। जब इस जीवात्मा का वासनामय शरीर में निवास होता है, तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं। तीसरा स्वरूप है सूक्ष्म स्वरूप। मरने के बाद जब आत्मा सूक्ष्मतम शरीर में प्रवेश करता है, तब उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं।
कमजोर सूक्ष्म शरीर से ऊपर की यात्रा मुश्किल हो जाती है तब ऐसा व्यक्ति नीचे के लोक में स्वत: ही गिर जाता है या वह मृत्युलोक में ही पड़ा रहता है और दूसरे जन्म का इंतजार करता है।
उसका यह इंतजार 100 वर्ष से 1000 वर्ष तक की अवधि का भी हो सकता है।
पहले बताए गए आत्मा के तीन स्वरूप से अलग- 1. पहली विज्ञान आत्मा, 2. दूसरी महान आत्मा और 3. तीसरी भूत आत्मा।
1. विज्ञान आत्मा वह है, जो गर्भाधान से पहले स्त्री-पुरुष में संभोग की इच्छा उत्पन्न
करती है, वह आत्मा रोदसी नामक मंडल से आता है, उक्त मंडल पृथ्वी से सत्ताईस हजार मील दूर है।
2. महान आत्मा वह है, जो चन्द्रलोक से अट्ठाईस अंशात्मक रेतस बनाकर आता है, उसी 28 अंश रेतस से पुरुष पुत्र पैदा करता है। 28 अंश रेतस लेकर आया महान आत्मा मरने के बाद चन्द्रलोक पहुंच जाता है, जहां उससे वहीं 28 अंश रेतस मांगा जाता है। चंद्रलोक में वह
आत्मा अपने स्वजातीय लोक में रहता है।
3. भूतात्मा वह है, जो माता-पिता द्वारा खाने वाले अन्न के रस से बने वायु द्वारा गर्भ पिण्ड
में प्रवेश करता है। उससे खाए गए अन्न और पानी की मात्रा के अनुसार अहम भाव शामिल होता है, इसी को प्रज्ञानात्मा तथा भूतात्मा कहते हैं। यह भूतात्मा पृथ्वी के
अलावा किसी अन्य लोक में नहीं जा सकता है। वे लोग जो जिंदगीभर क्रोध, कलह, नशा, भोग-संभोग, मांसभक्षण आदि धर्म-विरुद्ध निंदित कर्म में लगे रहे हैं मृत्यु के बाद उन्हें अधो गति प्राप्त होती। जिन्होंने थोड़ा-बहुत धर्म
भी साधा है या जो मध्यम मार्ग में रहे हैं उन्हें स्थिर गति प्राप्त होती है। और जिन्होंने
वेदसम्मत आचरण करते हुए जीवनपर्यंत यम-नियमों का पालन किया है उन्हें उर्ध्व गति प्राप्त होती है।
अधो गति वाला आत्मा कीट-पतंगे, कीड़े-मकौड़े, रेंगने वाले जंतु, जलचर प्राणी और पेड़-पौधे
आदि योनि में पहुंच जाता है। स्थिर गति वाला आत्मा पशु, पक्षी और मनुष्य की योनि में पहुंच
जाता है लेकिन जो उर्ध्व गति वाला आत्मा है उनमें से कुछ पितरों के लोक और कुछ देवलोक
पहुंच जाता है।
जो आत्मा अपने आध्यात्मिक बल के द्वारा देवलोक चला जाता है वह देवलोक में रहकर
सुखों को भोगता है। यदि वहां भी वह देवतुल्य बनकर रहता है तो देवता हो जाता है। लेकिन
यदि उनमें राग-द्वेष उत्पन्न होता है तो वह फिर से मृत्युलोक में मनुष्य योनि में जन्म ले
लेता है।
लेकिन उर्ध्व गति प्राप्त कुछ आत्माएं अपने आध्यात्मिक बल की शक्ति से पितर और
देवलोक से ऊपर ब्रह्मलोक में जाकर सदा के लिए जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
यही मोक्ष है।

-संदर्भ गरुड़-पुराण।

विपिन खुराना

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जब सरदार पटेल यरवदा जेल में थे उसी समय अप्रैल 1941 से अमदाबाद में एक भीषण हिन्दू मुस्लिम दंगा हुआ जिसमें हिन्दुओं ने जानमाल की बहुत क्षति उठायी।
सरदार को जब जेल में इस दंगे की सूचना मिली तो उन्हें बहुत व्यथा हुई। उनके मन में प्रश्नों का तूफान उठ खड़ा हुआ। ‘मुस्लिम उपद्रवकारियों में इतना साहस कहां से आया ?
ब्रिटिश अधिकारियों ने उनका उत्पात क्यों नहीं रोका ?
हिन्दुओं ने इतनी कायरता का परिचय क्यों दिया ?
इस दंगे में जितने हिन्दू मारे गए यदि उसके आधे भी साहस के साथ प्रतिरोध करने के लिए खड़े हो जाते तो क्या मरने वालों की संख्या कम नहीं हो जाती ?”
किंतु सरदार इन प्रश्नों का उत्तर देने से पहले ही पुन: भारत छोड़ो आंदोलन के अन्तर्गत कारावास में पहुंच गये।
1945 में जब वे बाहर निकले तो घटनाचक्र बहुत आगे बढ़ चुका था।
हिन्दू समाज असंगठित, निशस्त्र एवं कायर अहिंसा में जकड़ा हुआ पड़ा था और उधर 1939 से 1945 तक कांग्रेस नेतृत्व के ब्रिटिश सरकार से संघर्ष का लाभ उठाकर मुस्लिम लीग के नेतृत्व में मुस्लिम समाज पूर्ण तथा संगठित एवं सशस्त्र हो चुका था।
मुस्लिम समाज हिंसक शक्ति के सहारे मातृभूमि का विभाजन करने के लिए कटिबद्ध था।
सरदार ने गृह मंत्रालय संभाला।
मुस्लिम लीग ने ह्यसीधी कार्रवाईह्ण के रूप में हिंसक सामर्थ्य का प्रदर्शन किया।
पंजाब से लेकर पूर्वी बंगाल तक साम्प्रदायिक हिंसा भड़क उठी।
लाखों निर्दोष हिन्दू फिर से मुसलमानों के हाथों मारे गये।
सरदार ने गृहमंत्री होकर भी अपने को असहाय पाया।
उन्होंने देखा कि किस प्रकार समस्त ब्रिटिश अधिकारी एवं उनके द्वारा नियंत्रित प्रशासकीय तंत्र मुस्लिम हिंसा की पीठ थपथपा रहा था।
गांधी जी नोआखली में पड़े थे।
वहां सरदार के विरुद्ध उनके कान भरे जाने लगे।
गृहमंत्री के नाते सरदार ने दृढ़ता से काम लेना चाहा।
किंतु नेहरू और मौलाना आजाद सरदार के विरुद्ध हो गये।
नेहरू जी स्वयं नोआखाली गये।
उन्होंने गांधी जी के कान खूब भरे।
गांधी ने सरदार को पत्र के माध्यम से कहा….
“आपके बारे में बहुत असंतोष सुना। आपके भाषण लोगों को नाखुश करने वाले और उकसाने वाले होते हैं। आपने हिंसा अहिंसा का भेद नहीं रखा। तलवार का जवाब तलवार से देने का न्याय आप लोगों को सिखाते हैं। जब मौका मिलता है मुस्लिम लीग का अपमान करने से नहीं चूकते। यह सब सच हो तो बहुत हानिकारक है।”
खैर इसके बाद सरदार के समक्ष विभाजन की बात थी।
नेहरू और गांधी का दवाब लगातार था,
विभाजन को सरदार पटेल ने क्यों स्वीकार किया ?
इसका उत्तर उनके एज करीबी ने दिया जिससे सरदार ने एक सुबह टहलते हुए बात की
उन्होंने कहा …
“यदि विभाजन को स्वीकार नहीं किया जाता तो नगरों और गांवों में भी लम्बा साम्प्रदायिक संघर्ष चलेगा। यहां तक कि सेना और पुलिस भी साम्प्रदायिक आधार पर बंट जाएगी। यदि यह संघर्ष टाला न जा सका तो हिन्दू अधिक असंगठित एवं कम कट्टर होने के कारण एक सुदृढ़ संगठन के अभाव में पराजित हो जाएंगे।”
.
दोस्तों सरदार जैसा व्यक्तित्व भी हिंदुओं के अहिंसक होने की वजह से झुकने की मजबुुर हो गए
अगर हिंदुओं ने दंगे के समय मुसलमानों को पलट के जवाब दिया होता
तो शायद विभाजन से सरदार पलट सकते थे
और जिन्ना जैसो को अकेले ही सबक सिखा सकते थे
आज भी दुर्भाग्य है कि हिन्दू समाज अहिंसा का दामन तब भी पकडे रहते हैं
जब सामने वाला सिर्फ हिंसा चाहता है।

विपिन खुराना

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नाम की महिमा

एक अनपढ़(गँवार) आदमी एक महात्मा जी के पास जाकर बोला
‘‘महाराज ! हमकोतो कोई सीधी-सादी बात बता दो,
हम भगवान का नाम लेंगे ।’’

महात्माजी ने कहा- तुम ‘अघमोचन-अघमोचन’(“अघ” माने पाप, “मोचन” माने छुड़ाने वाला) नाम लिया करो ।’

’अब वह बेचारा गाँव का गँवार आदमी

“अघमोचन-अघमोचन”करता हुआ चला तो गाँव जाते-जाते “अ” भूल गया।

वह ‘घमोचन-घमोचन” बोलने लगा।

एक दिन वह हल जोत रहा था और “घमोचन-घमोचन” कर रहा था,
इतने में वैकुंठ लोक में भगवान भोजन करने बैठे।
उनको हँसी आ गयी।

लक्ष्मीजी ने पूछा-
‘‘आप क्यों हँसते हो ?’

’भगवान बोले- आज हमारा भक्त एक ऐसा नाम ले रहा है कि वैसा नाम तो किसीशास्त्र में है ही नहीं !‘‘

लक्ष्मी जी बोली- तब तो हम उसको देखेंगे और सुनेंगेे कि कौन-सा नाम ले रहा है ।’

’लक्ष्मी-नारायण दोनों खेत में पहुँचे।

पास में गड्ढा था।
भगवान स्वयं तो वहाँ छिप गये और लक्ष्मीजी भक्त के पास जाकर पूछने लगीं-‘
“अरे, तू यह क्या घमोचन-घमोचन बोल रहा है ?’’

उन्होंने एक बार, दो बार, तीन बार पूछा परंतु वह कुछ उत्तर ही न दे ।

उसने सोचा कि इसको बताने में हमारा नाम-जप छूट जायेगा।

अतः वह चुप रहा, बोला ही नहीं।

जब बार-बार लक्ष्मी जी पूछती रहीं तो अंत में उसको आया गुस्सा, गाँव का आदमी तो था ही,

बोला : ‘‘जा-जा ! तेरे खसम (पति) का नाम ले रहा हूँ ।’’

अब तो लक्ष्मी जी डरीं, कि यह तो हमको पहचान गया।

फिर बोलीं- ‘‘अरे, तूमेरे खसम को जानता है क्या?

कहाँ है मेरा खसम?’
’एक बार, दो बार, तीन बार पूछने पर वह फिर झुँझलाकर बोला

‘‘वहाँ गड्ढे में है, जा !’’लक्ष्मी जी समझ गयीं कि इसने हमको पहचान लिया।

नारायण भी वहाँ आ गये और बोले ‘

‘लक्ष्मी ! देख ली मेरे नाम की महिमा!

यह अघमोचन और घमोचन का भेद भले न समझता हो लेकिन हम तो समझते हैं
कि यह हमारा ही नाम ले रहा है।

यह हमारा ही नाम समझकर घमोचन नाम से हमको ही पुकार रहा है ।

भगवान ने भक्त को दर्शन देकर कृतार्थ किया ।

भक्त शुद्ध-अशुद्ध, टूटे-फूटे शब्दों से अथवा गुस्से में भी, कैसे भी भगवान का नाम लेता है।
तो भगवान का हृदय उससे मिलने को लालायित होउठता है।

देव कृष्णा

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भोजन के पालनीय नियम…

जो सिर पर पगड़ी या टोपी रख के, दक्षिण की ओर मुख करके अथवा जूते पहन कर भोजन करता है, उसका वह सारा भोजन आसुरी समझना चाहिए।

(महाभारत, अनुशासन पर्वः 90.19)

जो सदा सेवकों और अतिथियों के भोजन कर लेने के पश्चात् ही भोजन करता है, उसे केवल अमृत भोजन करने वाला (अमृताशी) समझना चाहिए।

(महाभारत, अनुशासन पर्वः 93.13)

भोजन के बीच-बीच में गुनगुना पानी पीना पुष्टिदायक है और भोजन के एक घंटे के बाद पानी पीना अमृततुल्य माना जाता है। प्रायः भोजन के बीच एक ग्लास (250 मि.ली.) पानी पीना पर्याप्त है।

जब बायाँ नथुना चल रहा हो तो तभी पेय पदार्थ पीने चाहिए। दायाँ स्वर चालू हो उस समय यदि पेय पदार्थ पीना पड़े तो दायाँ नथुना बंद करके बायें नथुने से श्वास लेते हुए ही पीना चाहिए।

साँस का दायाँ स्वर चलता हो तब भोजन और बायें स्वर के चलते समय पेय पदार्थ लेना स्वास्थ्य के लिए हितकर है।

मल-मूत्र त्यागने व रास्ता चलने के बाद तथा स्वाध्याय व भोजन के पहले पैर धो लेने चाहिए। भीगे पैर भोजन तो करे परंतु शयन न करे। भीगे पैर भोजन
करने वाला मनुष्य लम्बे समय तक जीवन धारण करता है।

(महाभारत, अनुशासन पर्व)

परोसे हुए अन्न की निंदा नहीं करनी चाहिए। मौन होकर एकाग्र चित्त से भोजन करना चाहिए। भोजनकाल में यह अन्न पचेगा या नहीं, इस प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिए। भोजन के बाद मन-ही-मन अग्नि क ध्यान करना चाहिये| भोजन के अंत में दही नहीं, मट्ठा पीना चाहिए तथा एक हाथ से दाहिने पैरे के अंगूठे पर जल डालें फिर जल से आँख, नाक, कान व नाभि का स्पर्श करें।

(महाभारत, अनुशासन पर्व)

पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से क्रमशः दीर्घायु और सत्य की प्राप्ति होती है। भूमि पर बैठकर ही भोजन करे, चलते-फिरते कभी न करे। किसी के साथ एक पात्र में तथा अपवित्र मनुष्य के निकट बैठकर भोजन करना निषिद्ध है।

(महाभारत, अनुशासन पर्व)

जिसको रजस्वला स्त्री ने छू दिया हो तथा जिसमें से सार निकाल लिया गया हो, ऐसा अन्न कदापि न खाये।

सत्पुरुषों के सामने बैठकर भोजन न करे।

सावधानी के साथ केवल सुबह और शाम को ही भोजन करे, बीच में कुछ भी खाना उचित नहीं है। शाम के समय अल्पाहार करे, दिन में भी उचित मात्रा में सेवन करे। भोजन के समय मौन रहना और आसन पर बैठना उचित है। निषिद्ध पदार्थ न खाये।

(महाभारत, अनुशासन पर्व)

भोजन पीना चाहिए और पानी खाना चाहिए। अर्थात् भोजन को इतना चबाओ कि वह पानी जैसा तरल बन जाय। पानी अथवा दूसरा पेय पदार्थ इतना आराम से पीना चाहिए मानो खा रहे हों।

खड़े होकर पानी पीना हानिकारक है, बैठकर और चुस्की लेते हुए पानी पियें।
अंजली से पानी नहीं पीना चाहिए।

स्नान किये बिना, मंत्रजप किये बिना, देवताओं को अर्पण किये बिना, गुरु, माता-पिता, अतिथि तथा अपने आश्रितों को भोजन कराये बिना, अपने से प्रेम न करने वाले व्यक्ति द्वारा बनाया या परोसा गया, उत्तर (या पूर्व) की ओर मुख किये बिना, जूठे मुख से, अपवित्र पात्रों में, अनुचित स्थान पर, असमय, हाथ-पैर-मुँह धोये बिना, बिना इच्छा के या उदास मन से, परोसे गये अन्न की निंदा करते हुए भोजन नहीं करना चाहिए।

जो मनुष्य अमावस्या को दूसरे का अन्न खाता है, उसका महीने भर का किया हुआ पुण्य दूसरे को (अन्नदाता को) मिल जाता है। अयनारम्भ (दक्षिणायन या उत्तरायण) के दिन दूसरे का अन्न खाय तो छः महीनों का और विषुवकाल (जब सूर्य मेष अथवा तुला राशि पर आये) में दूसरे का अन्न खाने से तीन महीनों का पुण्य चला जाता है। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाये तो बारह वर्षों से एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है। संक्रान्ति के दिन दूसरे का अन्न खाने से महीने भर से अधिक समय का पुण्य चला जाता है।

(स्कन्द पुराण, प्रभाव खं. 207.11.13)

जो निर्बुद्धि गृहस्थ अतिथि सत्कार के लोभ से दूसरे के घर जाकर उसका अन्न खाता है, वह मरने के बाद उस अन्नदाता के यहाँ पशु बनता है।

(मनु स्मृतिः 3.104)

भोजन करके हाथ-मुँह धोये बिना सूर्य, चंद्र, नक्षत्र इन त्रिविध तेजों की ओर कभी दृष्टि नहीं डालनी चाहिए।

(महाभारत, अनुशासन पर्व)

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महाराणा प्रताप
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महापराक्रमी वीर राजा, मेवाड़ के हिन्दू राजपूत शासक

महाराणा प्रताप सिंह ( ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत १५९७ तदानुसार ९ मई १५४०–१९ जनवरी १५९७) उदयपुर, मेवाड में शिशोदिया राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलो को कई बार युद्ध में भी हराया। उनका जन्म राजस्थान के कुम्भलगढ में महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जीवत कँवर के घर हुआ था। १५७६ के हल्दीघाटी युद्ध में २०,००० राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के ८०,००० की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने आपना अशव दे कर महाराणा को बचाया। प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें १७,००० लोग मारे गएँ। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा की हालत दिन-प्रतिदिन चिंतीत हुई। २५,००० राजपूतों को १२ साल तक चले उतना अनुदान देकर भामा शाह भी अमर हुआ।

महाराणा प्रताप सिंह : मेवाड़ के महाराणा
शासन : १५७२ – १५९७
राज तिलक : १ मार्च १५७२
पूरा नाम : महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया
पूर्वाधिकारी : उदयसिंह द्वितीय
उत्तराधिकारी : महाराणा अमर सिंह
जीवन संगी : 11 पत्नियाँ
संतान : अमर सिंह, भगवान दास (17 पुत्र)
राज घराना सिसोदिया
पिता : उदयसिंह द्वितीय
माता : महाराणी जयवंताबाई
धर्म : सनातन धर्म

जीवन

सफलता और अवसान
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ई.पू. 1579 से 1585 तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशो में विद्रोह होने लगे थे ओर महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उल्जा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने ई.पू. 1585 में मेवाड़ मुक्ति प्रयत्नों को ओर भी तेज कर लिया। महाराणा की सेना ने मुगल चौकियां पर आक्रमण शरु कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया , उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था , पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पे लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत ई.पू. 1585 में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए , परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई।

महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सीधरने के बाद अगरा ले आया।

‘एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।

महाराणा प्रताप सिंह के मृत्यु पर अकबर की प्रतिक्रिया
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अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था, पर उनकी यह लड़ाई कोई व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम नहीं था, हालांकि अपने सिद्धांतो और मूल्यो की लड़ाई थी। एक वह था जो अपने क्रूर साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था , जब की एक तरफ यह था जो अपनी भारत माँ की स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहा था। महाराणा प्रताप के मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था ओर अकबर जनता था कि महाराणा जैसा वीर कोई नहीं हे इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आंसू आ गए।

महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के वक्त अकबार लाहौर में था और वहीं उसे खबर मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है। अकबर की उस वक्त की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है :-

अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी

गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी

नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली

न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली

गहलोत राण जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी

निसाा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी

अर्थात्

हे गुहिलोत राणा प्रतापसिंघ तेरी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निश्वास के साथ आंसू टपकाए। क्योंकि तूने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया। तूने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि तू अपना आडा यानि यश या राज्य तो गंवा गया लेकिन फिर भी तू अपने राज्य के धुरे को बांए कंधे से ही चलाता रहा। तेरी रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही तू खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गया। तू कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहा और तेरा रौब दुनिया पर गालिब रहा। इसलिए मैं कहता हूं कि तू सब तरह से जीत गया और बादशाह हार गया।

अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना पूरा जीवन का बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और उनके स्वामिभक्त अश्व चेतक को मेरा शत-शत, कोटि-कोटि प्रणाम ……….
……………. विजेता मलिक

https://vijetamalikbjp.blogspot.in/2018/01/blog-post_19.html?m=1

Via MyNt

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॥ #ब्रिहदिश्वरर_मंदिर_का_इतिहास ॥

थ्न्जवर पेरीयाकोविल (ब्रिहदिश्वरर मंदिर) तमिलनाडू के थ्न्ज्वर में स्थित भगवान शिव का एक हिंदु मंदिर है। इसे राज-राजेश्वर, राज-राजेश्वरम एवं ब्रिहदिश्वरर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है एवं चोला वंश की वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है। 1010 इसवी में राजा राजा चोला प्रथम के द्वारा बनवाया गया यह मंदिर 1000 साल पुराना है। यह मंदिर UNESCO “वर्ल्ड हेरिटेज साईट” के “द ग्रेट लिविंग चोला टेम्पल” के 3 मंदिरों में से एक है। बाकी के 2 मंदिर गंगईकोंडा चोलपुरम और ऐरावटेश्वर मंदिर हैं।

16वि शताब्दी में मंदिर के चारो और दीवारों का निर्माण किया गया। 198 फीट का विमानं खम्बा दुनिया के सब से ऊंचे खम्बों में से एक है। गुम्बद का वजन ही 80 टन है। एक ही शीला से बनी नंदी की प्रतिमा 16 फीट लंबी और 13 फीट ऊंची है; यह प्रतिमा द्वार पर स्थित है। ग्रेनाइट से बने मंदिर के पत्थर 60 मिल की दुरी से लाये गये हैं। तमिलनाडू के सबसे आकर्षक पर्यटन स्थलों में से एक यह मंदिर है।

एक स्वप्न से हुए अनुभव के आधार पर राजा अरुलमोशीवर्म, जिन्हें राजराजा चोला प्रथम के नाम से भी जाना जाता है, ने यह मंदिर अपने साम्राज्य को इश्वर का आशीर्वाद दिलाने के लिए बनवाया था। इसका भूमि पूजन 1002 इसवी में किया गया। यह मंदिर महान चोला वास्तुशिल्प का शानदार उदाहरण है। ज्यामिति के नियम को आधार बना कर यह मंदिर बनाया गया है। इस काल के मंदिर चोला वंश के संपत्ति, ताकत और कलात्मक विशेषता के उदहारण हैं।

राजा के इश्वर से ख़ास संबंध और उसकी ताक़त को दर्शाने के लिए मंदिर में तरह तरह के पूजन कराये जाते थे। जैसे की राजकीय अभिषेक और उसी तरह से राजा का भी पूजन। वे शिव भक्त थे। चोला साम्राज्य की सोच और तमिल सभ्यता के साथ ही द्रविड़ वास्तुशिल्प का द्योतक है यह मंदिर। यह मंदिर चोला वास्तुशिल्प, मूर्तिकारी, चित्रकारी और कांसे की कारीगरी का उदाहरण है।

ब्रिहदिश्वरर मंदिर का उल्लेख मूवर उला औरकलिंगथूपारणी में भी किया गया है। ऐसा माना जाता है की यह मंदिर सामाजी, वित्तीय एवं राजनैतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। मंदिर में संगीत, नृत्य और कला को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न आयोजन किये जाते थे। विशेषज्ञों के राय में यह मंदिर द्रविड़ियन वस्तुशिप के चरमोत्कर्ष की कहानी बयान करते हैं। मंदिर को एक धरोहर के रूप में भारतीय पुरातात्विक विभाग के द्वारा अन्रक्षित किया गया है। तमिलनाडू के सबसे ज्यादा पर्यटक यहां आते हैं। ग्रेट लिविंग चोला टेम्पल की लिस्ट में इस मंदिर को 2004 में जोड़ा गाया था। सभी 3 मंदिर चोला वंश के द्वारा 10वी से 12वी शताब्दी में बनाए गए थे ओर इन सभी मंदिरों में बहुत सी समानताएं हैं।

ग्रेट लिविंग छोले टेम्पल कहलाने के पीछे का कारण यह है की आज भी इन मंदिरों में विभिन्न आयोजन एवं पूजा पाठ नियमित तौर पर होती है। राजराजा चोला प्रथम के जीवन पर ख्यात तमिल उपन्यासकार कल्कि ने पोंनियीं सेल्वन नामक उपन्यास लिखा है। बालाकुमारण ने भी उदइयारमें राजराजा चोला प्रथम और मंदिर के निर्माण के बारे में बताया है।

ब्रिहदिश्वरर मंदिर रथ यात्रा : Brihadeeswarar temple Rath Yatra

पहली बार मंदिर के रथ को विपरीत दिशा में स्थित रामार मंदिर से 20 अप्रैल 2015 को निकाला गया। हज़ारों लोगों ने इस रथ यात्रा में हिस्सा लिया। नौ दिनों के बाद 29 अप्रैल 2015 को रथ के ऊपर देवताओं की मूर्तियाँ रख कर इसे फिर घुमाया गाया। यह रथ यात्रा सौ सालों के बाद निकाली गयी है।

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👩 यह मेरी माँ हैं !!
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एक छोटे से शहर के प्राथमिक स्कूल में कक्षा 5 की शिक्षिका थीं।
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उनकी एक आदत थी कि वह कक्षा शुरू करने से पहले हमेशा “आई लव यू ऑल” बोला करतीं।
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मगर वह जानती थीं कि वह सच नहीं कहती । वह कक्षा के सभी बच्चों से उतना प्यार नहीं करती थीं।
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कक्षा में एक ऐसा बच्चा था जो उनको एक आंख नहीं भाता। उसका नाम राजू था।
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राजू मैली कुचेली स्थिति में स्कूल आ जाया करता है। उसके बाल खराब होते, जूतों के बन्ध खुले, शर्ट के कॉलर पर मैल के निशान।
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व्याख्यान के दौरान भी उसका ध्यान कहीं और होता।
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मिस के डाँटने पर वह चौंक कर उन्हें देखता तो लग जाता.. मगर उसकी खाली खाली नज़रों से उन्हें साफ पता लगता रहता.
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कि राजू शारीरिक रूप से कक्षा में उपस्थित होने के बावजूद भी मानसिक रूप से गायब हे.
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धीरे धीरे मिस को राजू से नफरत सी होने लगी। क्लास में घुसते ही राजू मिस की आलोचना का निशाना बनने लगता।
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सब बुराई उदाहरण राजू के नाम पर किये जाते. बच्चे उस पर खिलखिला कर हंसते. और मिस उसको अपमानित कर के संतोष प्राप्त करतीं।
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राजू ने हालांकि किसी बात का कभी कोई जवाब नहीं दिया था। मिस को वह एक बेजान पत्थर की तरह लगता जिसके अंदर महसूस नाम की कोई चीज नहीं थी।
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प्रत्येक डांट, व्यंग्य और सजा के जवाब में वह बस अपनी भावनाओं से खाली नज़रों से उन्हें देखा करता और सिर झुका लेता ।
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मिस को अब इससे गंभीर चिढ़ हो चुकी थी।
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पहला सेमेस्टर समाप्त हो गया और रिपोर्ट बनाने का चरण आया तो मिस ने राजू की प्रगति रिपोर्ट में यह सब बुरी बातें लिख मारी ।
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प्रगति रिपोर्ट माता पिता को दिखाने से पहले हेड मिसट्रेस के पास जाया करती थी।
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उन्होंने जब राजू की रिपोर्ट देखी तो मिस को बुला लिया।
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मिस प्रगति रिपोर्ट में कुछ तो प्रगति भी लिखनी चाहिए। आपने तो जो कुछ लिखा है इससे राजू के पिता इससे बिल्कुल निराश हो जाएंगे।
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मैं माफी माँगती हूँ, लेकिन राजू एक बिल्कुल ही अशिष्ट और निकम्मा बच्चा है ।
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मुझे नहीं लगता कि मैं उसकी प्रगति के बारे में कुछ लिख सकती हूँ। मिस घृणित लहजे में बोलकर वहां से उठ आईं।
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हेड मिसट्रेस ने एक अजीब हरकत की। उन्होंने चपरासी के हाथ मिस की डेस्क पर राजू की पिछले वर्षों की प्रगति रिपोर्ट रखवा दी।
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अगले दिन मिस ने कक्षा में प्रवेश किया तो रिपोर्ट पर नजर पड़ी। पलट कर देखा तो पता लगा कि यह राजू की रिपोर्ट हैं।
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पिछली कक्षाओं में भी उसने निश्चय ही यही गुल खिलाए होंगे। उन्होंने सोचा और कक्षा 3 की रिपोर्ट खोली।
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रिपोर्ट में टिप्पणी पढ़कर उनकी आश्चर्य की कोई सीमा न रही जब उन्होंने देखा कि रिपोर्ट उसकी तारीफों से भरी पड़ी है।
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“राजू जैसा बुद्धिमान बच्चा मैंने आज तक नहीं देखा।” “बेहद संवेदनशील बच्चा है और अपने मित्रों और शिक्षक से बेहद लगाव रखता है।” ”
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अंतिम सेमेस्टर में भी राजू ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। “मिस ने अनिश्चित स्थिति में कक्षा 4 की रिपोर्ट खोली।”
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राजू ने अपनी मां की बीमारी का बेहद प्रभाव लिया। .उसका ध्यान पढ़ाई से हट रहा है।
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राजू की माँ को अंतिम चरण का कैंसर हुआ है। घर पर उसका और कोई ध्यान रखने वाला नहीं है. जिसका गहरा प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़ा है।
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राजू की माँ मर चुकी है और इसके साथ ही राजू के जीवन की चमक और रौनक भी। उसे बचाना होगा…इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।
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मिस के दिमाग पर भयानक बोझ हावी हो गया। कांपते हाथों से उन्होंने प्रगति रिपोर्ट बंद की । आंसू उनकी आँखों से एक के बाद एक गिरने लगे.
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अगले दिन जब मिस कक्षा में दाख़िल हुईं तो उन्होंने अपनी आदत के अनुसार अपना पारंपरिक वाक्यांश “आई लव यू ऑल” दोहराया।
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मगर वह जानती थीं कि वह आज भी झूठ बोल रही हैं। क्योंकि इसी क्लास में बैठे एक उलझे बालों वाले बच्चे राजू के लिए जो प्यार वह आज अपने दिल में महसूस कर रही थीं. वह कक्षा में बैठे और किसी भी बच्चे से हो ही नहीं सकता था ।
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व्याख्यान के दौरान उन्होंने रोजाना दिनचर्या की तरह एक सवाल राजू पर दागा और हमेशा की तरह राजू ने सिर झुका लिया।
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जब कुछ देर तक मिस से कोई डांट फटकार और सहपाठी सहयोगियों से हंसी की आवाज उसके कानों में न पड़ी तो उसने अचंभे में सिर उठाकर उनकी ओर देखा।
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अप्रत्याशित उनके माथे पर आज बल न थे, वह मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने राजू को अपने पास बुलाया और उसे सवाल का जवाब बताकर जबरन दोहराने के लिए कहा।
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राजू तीन चार बार के आग्रह के बाद अंतत:बोल ही पड़ा। इसके जवाब देते ही मिस ने न सिर्फ खुद खुशान्दाज़ होकर तालियाँ बजाईं बल्कि सभी से भी बजवायी..
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फिर तो यह दिनचर्या बन गयी। मिस हर सवाल का जवाब अपने आप बताती और फिर उसकी खूब सराहना तारीफ करतीं।
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प्रत्येक अच्छा उदाहरण राजू के कारण दिया जाने लगा । धीरे-धीरे पुराना राजू सन्नाटे की कब्र फाड़ कर बाहर आ गया।
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अब मिस को सवाल के साथ जवाब बताने की जरूरत नहीं पड़ती। वह रोज बिना त्रुटि उत्तर देकर सभी को प्रभावित करता और नये नए सवाल पूछ कर सबको हैरान भी।
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उसके बाल अब कुछ हद तक सुधरे हुए होते, कपड़े भी काफी हद तक साफ होते जिन्हें शायद वह खुद धोने लगा था।
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देखते ही देखते साल समाप्त हो गया और राजू ने दूसरा स्थान हासिल कर लिया यानी दूसरी क्लास ।
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विदाई समारोह में सभी बच्चे मिस के लिये सुंदर उपहार लेकर आए और मिस की टेबल पर ढेर लग गये ।
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इन खूबसूरती से पैक हुए उपहार में एक पुराने अखबार में बंद सलीके से पैक हुआ एक उपहार भी पड़ा था।
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बच्चे उसे देखकर हंस पड़े। किसी को जानने में देर न लगी कि उपहार के नाम पर ये राजू लाया होगा।
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मिस ने उपहार के इस छोटे से पहाड़ में से लपक कर उसे निकाला।
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खोलकर देखा तो उसके अंदर एक महिलाओं की इत्र की आधी इस्तेमाल की हुई शीशी और एक हाथ में पहनने वाला एक बड़ा सा कड़ा था जिसके ज्यादातर मोती झड़ चुके थे।
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मिस ने चुपचाप इस इत्र को खुद पर छिड़का और हाथ में कंगन पहन लिया।
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बच्चे यह दृश्य देखकर हैरान रह गए। खुद राजू भी।
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आखिर राजू से रहा न गया और मिस के पास आकर खड़ा हो गया। ।
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कुछ देर बाद उसने अटक अटक कर मिस को बताया कि “आज आप में से मेरी माँ जैसी खुशबू आ रही है।”
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समय पर लगाकर उड़ने लगा। दिन सप्ताह, सप्ताह महीने और महीने साल में बदलते भला कहां देर लगती है ?
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मगर हर साल के अंत में मिस को राजू से एक पत्र नियमित रूप से प्राप्त होता जिसमें लिखा होता कि “इस साल कई नए टीचर्स से मिला।। मगर आप जैसा कोई नहीं था।”
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फिर राजू का स्कूल समाप्त हो गया और पत्रों का सिलसिला भी। कई साल आगे गुज़रे और मिस रिटायर हो गईं।
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एक दिन उन्हें अपनी मेल में राजू का पत्र मिला जिसमें लिखा था:
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इस महीने के अंत में मेरी शादी है और आपके बिना शादी की बात मैं नहीं सोच सकता।
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एक और बात .. मैं जीवन में बहुत सारे लोगों से मिल चुका हूं।। आप जैसा कोई नहीं है………डॉक्टर राजू
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साथ ही विमान का आने जाने का टिकट भी लिफाफे में मौजूद था। मिस खुद को हरगिज़ न रोक सकती थीं।
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उन्होंने अपने पति से अनुमति ली और वह दूसरे शहर के लिए रवाना हो गईं।
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शादी के दिन जब वह शादी की जगह पहुंची तो थोड़ी लेट हो चुकी थीं। उन्हें लगा समारोह समाप्त हो चुका होगा..
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मगर यह देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही कि शहर के बड़े डॉ, बिजनेसमैन और यहां तक कि वहां पर शादी कराने वाले पंडितजी भी थक गये थे.
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कि आखिर कौन आना बाकी है… मगर राजू समारोह में शादी के मंडप के बजाय गेट की तरफ टकटकी लगाए उनके आने का इंतजार कर रहा था।
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फिर सबने देखा कि जैसे ही यह पुरानी शिक्षिका ने गेट से प्रवेश किया राजू उनकी ओर लपका और उनका वह हाथ पकड़ा जिसमें उन्होंने अब तक वह सड़ा हुआ सा कंगन पहना हुआ था और उन्हें सीधा मंच पर ले गया।
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माइक हाथ में पकड़ कर उसने कुछ यूं बोला “दोस्तों आप सभी हमेशा मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछा करते थे और मैं आप सबसे वादा किया करता था कि जल्द ही आप सबको उनसे मिलाउंगा।।।……..यह मेरी माँ हैं
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इस सुंदर कहानी को सिर्फ शिक्षक और शिष्य के रिश्ते के कारण ही मत सोचिएगा ।
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अपने आसपास देखें, राजू जैसे कई फूल मुरझा रहे हैं जिन्हें आप का जरा सा ध्यान, प्यार और स्नेह नया जीवन दे सकता है…

संज गुप्ता