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🙏🙏🙏श्री हरि🙏🙏🙏

एक दिन बाल कृष्ण एक वृक्ष के नीचे बैठे वासुरी बजा रहे थे,तभी उनकी नजर यमुना किनारे खड़े एक छोटे से बछड़े पर पड़ी,बछड़ा पानी नहीं पी रहा था,
भगवान झट उसके पास गए और उसकेसिर पर हाथ फेरते हुए बोले -क्यों रे पानी क्यों नहीं पीता?

बछड़ा वैसे ही खड़ा रहा इतने में दाऊ जी आ गए पूछने लगे तो बालकृष्ण बोले -देखो दाऊ! ये बछड़ा पानी नहीं पीता.दाऊ बोले -कान्हा! तुम अपने पीताम्बर में पानी लेकर आओ, हम इसे यही पानी पिला देते है.
बाल कृष्ण दौडकर गए अपना पीताम्बर यमुना जी नेगीला करके ले आये.अब दाऊ जी पीताम्बर में से पानी निचोडने लगे और बाल कृष्ण हाथो का दौना बनाकर बछड़े के मुह पर लगा कर खड़े हो गए अब जिसे स्वयं कृष्ण इतने लाड से पानी पिलाये वह पानी कैसे नहीं पीता.
बछड़ा तुरंत पानी पीने लगा,जब बछड़े ने पानी पी लिया, तब बाल कृष्ण ने उसके बैठने के लिए धरती साफ़ की,फिर जब वह बैठ गया तब उसके लिए हरि-हरि घास तोडकर अपने हाथो से खिलाने लगे.फिर जब वह तृप्त हो गया तब अपने पीताम्बर से उसे हवा करने लगे.

जब भगवान वासुरी बजाते तो बछड़े जो गाय का दूध पीते, उनके मुह का दूध मुह में ही रह जाता.निष्तब्ध खड़े वासुरी सुनते गाये अपनी सुधबुध भूल जाती. गोपियाँ गायों और बछडो के भाग्य की सराहना करते नहीं थकती

वे कहती ये गईया और बछड़े कितने भाग्यशाली है जो कृष्ण इनसे इतना प्रेम करते है ये तो सारे दिन वन में गायों के साथ ही रहते है.जब तक भगवान की वासुरी गौए सुन नहीं लेती तब तक गौशाला से बाहर नहीं निकलती थी,

भगवान भी एक एक गाय का नामअपनी वासुरी में लेते,धौरी ,श्यामा, नंदिनी,पदमगंधा,गाये अपने-अपने नाम जब वासुरी में सुनती तो दौड दौडकर कृष्ण के चारो और आकर खड़ी हो जाती,और उन्हें अपनी जीभ से चाटकर अपना प्रेम व्यक्त करती. इस तरह भगवान श्री कृष्ण स्वयं सेवा करते थे
🙌🙌🙌जय जय श्री राधे 🙌🙌🙌

संजय गुप्ता

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एक पान वाला था। जब भी पान खाने जाओ ऐसा लगता कि वह हमारा ही रास्ता देख रहा हो। हर विषय पर बात करने में उसे बड़ा मज़ा आता। कई बार उसे कहा की भाई देर हो जाती है जल्दी पान लगा दिया करो पर उसकी बात ख़त्म ही नही होती।

एक दिन अचानक कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई।
तक़दीर और तदबीर की बात सुन मैनें सोचा कि चलो आज उसकी फ़िलासफ़ी देख ही लेते हैं। मैंने एक सवाल उछाल दिया।

मेरा सवाल था कि आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से?

और उसके जवाब से मेरे दिमाग़ के सारे जाले ही साफ़ हो गए।

कहने लगा,आपका किसी बैंक में लाकर तो होगा?
उसकी चाभियाँ ही इस सवाल का जवाब है। हर लाकर की दो चाभियाँ होती हैं। एक आप के पास होती है और एक मैनेजर के पास।
आप के पास जो चाभी है वह है परिश्रम और मैनेजर के पास वाली भाग्य।
जब तक दोनों नहीं लगतीं ताला नही खुल सकता।
आप कर्मयोगी पुरुष हैं ओर मैनेजर भगवान।
अाप को अपनी चाभी भी लगाते रहना चाहिये।पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाभी लगा दे। कहीं ऐसा न हो की भगवान अपनी भाग्यवाली चाभी लगा रहा हो और हम परिश्रम वाली चाभी न लगा पायें और ताला खुलने से रह जाये ।

कर्म और भाग्य का कितना सुंदर विश्लेषण…!

संजय गुप्ता