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भगवान जो उठ कर चल पड़ते हैं भक्तों के साथ बांकेबिहारी जय हो तुम्हारी!!!!!

क्या कभी ऐसा भी हो सकता है, जहां भगवान भक्तों की भक्ति से अभिभूत होकर या उनकी व्यथा से द्रवित हो भक्‍तों के साथ ही चल दें ?

वृदांवन का मशहूर बांके बिहारी मंदिर एक ऐसा ही मंदिर माना जाता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि बांके बिहारी जी भक्‍तों की भक्ति से इतना प्रभावित हो जाते है कि मंदिर मे अपने आसन से उठ कर भक्‍तों के साथ हो लेते है।

इसीलिए मंदिर मे उन्हें परदे मे रख कर उनकी क्षणिक झलक ही भक्तों को दिखाई जाती है।

पुजारियों का एक समूह दर्शन के वक्‍त लगातार मूर्ति के सामने पड़े पर्दे को खींचता , गिराता रहता है और उनकी एक झलक पाने को बेताब श्रद्धालु दर्शन करते रहते है। और बांके बिहारी है जो अपनी एक झलक दिखा कर पर्दे में जा छिपतें हैं।

लोक कथायों के अनुसार कई बार बांके बिहारी कृष्ण ऐसा कर भी चुके हैं,मंदिर से गायब हो चुके है इसीलिये की जाती है ये पर्देदारी …

एक श्रद्धालु के अनुसार’ मंदिर मे दर्शनार्थ आये श्रद्धालु बार बार उनकी झलक पाना चाहते हैं लेकिन पलक झपकते ही वो अंतर्ध्यान हो जाते हैं उनके पास खड़े एक श्रद्धालु बताते है, ऐसे ही है हमारे बांके बिहारी सबसे अलग अनूठे।

ये पर्दा डाला ही है इसलिये कि भक्त बिहारी जी से ज़्यादा देर तक आँखे चार न कर सकें क्योंकि कोमल हृदय बिहारी जी भक्‍तों की भक्ति व उनकी व्यथा से इतना द्रवित हो जाते हैं और  मंदिर मे अपने आसन से उठ कर भक्‍तों के साथ हो लेते है वो कई बार ऐसा कर चुके हैं इसलिये अब ये पर्दा डाल दिया गया है ताकि वे टिककर बैठे उनका भोला सा स्पष्टीकरण है ‘अगर ये एक भक्त के साथ चल दिये तो बाकियों का क्या होगा?..’

विस्मित से भक्‍त बता रहे हैं, एक बार राजस्थान की एक राजकुमारी बांके बिहारी जी के दर्शनार्थ आई लेकिन वो इनकी भक्ति में इतनी डूब गई कि वापस जाना ही नहीं चाहती थी। परेशान घरवाले जब उन्हें जबरन घर साथ ले जाने लगे तो उसकी भक्ति या कहे व्यथा से द्रवित होकर बांके बिहारी जी भी उसके साथ चल दिये।

इधर मंदिर में बांके बिहारी जी के गायब होने से भक्‍त बहुत दुखी थे, आखिरकार समझा बुझाकर उन्हें वापस लाया गया।

भक्‍त बताते हैं यह पर्दा तभी से डाल दिया गया, ताकि बिहारी जी फिर कभी किसी भक्‍त के साथ उठकर नहीं चल दें और भक्‍त उनके क्षणिक दर्शन ही कर पायें, सिर्क झलक ही देख पाये, यह भी कहा जाता है कि उन्हें बुरी नजर से बचाने के लिये पर्दा रखा जाता है, क्‍योंकि बाल कृष्ण को कहीं नजर न लग जाये बंगाल से आये एक भक्त बता रहे हैं’ सिर्फ जनमाष्ट्मी को ही बांके बिहारी जी के रात को महाभिषेक के बाद रात भर भक्तों को दर्शन देते हैं और तड़के ही आरती के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिये जाते हैं।

वैसे मथुरा वृंदावन मे जन्माष्ट्मी का उत्सव पर्व से सात आठ दिन पहले ही शुरू हो जाता है कहा जाता है कि सन १८६३ मे स्वामी हरिदास को बांके बिहारी जी के दर्शन हुए थे तब यह प्रतिमा निधिवन मे थी, पर गोस्वामियों के एक वर्ष बाद इस मंदिर को बनवाने के बाद इस प्रतिमा को इस मंदिर मे प्रतिष्ठापित किया गया।

पूरे वृंदावन मे कृष्णलीला का तिलिस्म चप्पे चप्पे पर बिखरा हुआ है.इतनी कहानिया इतने किस्से कृष्ण का भक्तों के अनन्य प्रेम को लेकर..

राजस्थान के एक अन्य भक्त बताते है कि यह मंदिर शायद अपनी तरह का पहला मंदिर है जहाँ सिर्फ इस भावना से कि कहीं बांकेबिहारी की नींद मे खलल न पड़ जाये इसलिये सुबह घंटे नही बजाये जाते बल्कि उन्हे हौले हौले एक बालक कई तरह दुलार कर उठाया जाता है, इसीतरह सान्ध्य आरती के वक्त भी घंटे नही बजाये जाते ताकि वे शांति से रहे।

गुजरात के एक भक्त बताते है’यह जानकर शायद आप हैरान हो जायेंगे कि बांके बिहारी जी आधी रात को गोपियों के संग रासलीला करने निधिवन मे जाते है और तड़के चार बजे वापस लौट आते हैं’ विस्फरित नेत्रो से अपनी व्याख्या को वे और आगे बढाते हुए बताते हैं।

‘ठाकुर जी का पंखा झलते झलते एक सेवक की अचानक आँख लग गयी,चौंक कर देखा तो ठाकुर जी गायब थे पर भोर चार बजे अचानक वापस आ गये, अगले दिन वही सब कुझ दोबारा हुआ तो सेवक ने ठाकुर जी का पीछा किया और ये राज़ खुला कि ठाकुर जी निधिवन मे जाते हैं तभी से सुबह की मंगल आरती की समय थोड़ा देर से कर दिया जिससे ठाकुर जी की अधूरी नींद पूरी हो सके।

अक्सर भक्तगण कान्हा की बांसुरी की धुन, निधिवन मे नृत्य की आवाज़े आदि के बारे मे किस्से यह कह के सुनाते हैं कि ‘हमे किसी ने बताया है..’…’ ऐसे कितने ही किस्से कहानियां वृंदावन के चप्पे चप्पे पर बिखरी हुई हैं।

कितनी ही “मीरायें” वृंदावन मे आपको कृष्ण के सहारे ज़िंदगी की गाड़ी को आगे बढाती हुई नज़र आयेंगी इस जीवन मे कृष्ण ही इनके जीवन का सहारा है।

अचानक मंदिर मे भक्‍तों के हुजम, राधे राधे, जय हो बांके बिहारी के जयघोष के बीच, मंदिर के प्रांगण के एक कोने से, मद्धम से स्वर मे भजन सुनाई देता है, हमसे परदा करो न हे मुरारी, वृदांवन के हो बांके बिहारी।

चांदी से बाल, , सफेंद धोती दमकते, माथे पर चंदन का टीका, आंखों से बरसते आसुओं के बीच मूर्तिस्थल की तरफ लगातार देखती हुई बहुत धीमी आवाज़ मे भजन गाती एक ऐसी ही एक मीरा, हमसे परदा करो न हे मुरारी, वृदांवन के हो बांके बिहारी।

साध्वी पर्दे के पीछे की बांके बिहारी जी की इसी लुका छिपी से व्यथित होकर ही सम्भवत: बरसती आंखों से गुहार कर रही थीं।

.बांके बिहारी की एक झलक दर्शन के बाद मंदिर से वापसी… मंदिर के बाहर निकलते ही संकरी सी गली मे बनी किसी दुकान पर शुभा मुदगल की आवाज़ मे गाया गया गीत महौल मे एक अजीब सी शांति और अजीब सी बेचैनी बिखेर रहा है ‘वापस गोकुल चल मथुराराज…. , राजकाज मन न लगाओ, मथुरा नगरपति काहे तुम गोकुल जाओ?’.. श्रद्धालुओं के झुंड तेज़ी से मंदिर की ओर बढ रहे हैं।

बांके बिहारी मंदिर में इसी विग्रह के दर्शन होते हैं। बांके बिहारी के विग्रह में राधा कृष्ण दोनों ही समाए हुए हैं। जो भी श्री कृष्ण के इस विग्रह का दर्शन करता है उसकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त के कष्टों दूर कर देते हैं।

Sanjay Gupta

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जब भी कोई पैर छुए तो आपको क्या करना चाहिए
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पुराने समय से ही परंपरा चली आ रही है कि जब भी हम किसी विद्वान व्यक्ति या उम्र में बड़े व्यक्ति से मिलते हैं तो उनके पैर छूते हैं। इस परंपरा को मान-सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। ये बात तो सभी जानते हैं कि बड़ों के पैर छूना चाहिए, लेकिन जब कोई हमारे पैर छुए तो हमें क्या-क्या करना चाहिए?

इस परंपरा का पालन आज भी काफी लोग करते हैं। चरण स्पर्श करने से धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों तरह के लाभ प्राप्त होते हैं। जब भी कोई व्यक्ति चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, हमारे पैर छुए तो उन्हें आशीर्वाद तो देना ही चाहिए, साथ ही भगवान या अपने इष्टदेव को भी याद करना चाहिए। आमतौर पर हम यही प्रयास करते है कि हमारा पैर किसी को न लगे, क्योंकि ये अशुभ कर्म माना गया है। जब कोई हमारे पैर छूता है तो हमें इससे भी दोष लगता है। इस दोष से बचने के लिए मन ही मन भगवान से क्षमा मांगनी चाहिए।

शास्त्रों में लिखा है कि-

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि जो व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श करता है। उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती जाती है।

जब भी कोई हमारे पैर छूता है तो उस समय भगवान का नाम लेने से पैर छूने वाले व्यक्ति को भी सकारात्मक फल मिलते हैं। आशीर्वाद देने से पैर छूने वाले व्यक्ति की समस्याएं खत्म होती हैं, उम्र बढ़ती है और नकारात्मक शक्तियों से उसकी रक्षा होती है। हमारे द्वारा किए गए शुभ कर्मों का अच्छा असर पैर छुने वाले व्यक्ति पर भी होता है। जब हम भगवान को याद करते हुए किसी को सच्चे मन से आशीर्वाद देते हैं तो उसे लाभ अवश्य मिलता है। किसी के लिए अच्छा सोचने पर हमारा पुण्य भी बढ़ता है।

किसी बड़े के पैर क्यों छूना चाहिए?
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पैर छूना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा नहीं है, यह एक वैज्ञानिक क्रिया है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ी है। पैर छूने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता, बल्कि बड़ों के स्वभाव की अच्छी बातें भी हमारे अंदर उतर जाती है। पैर छूने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे शारीरिक कसरत होती है। आमतौर पर तीन तरीकों से पैर छुए जाते हैं।

पहला तरीका👉 झुककर पैर छूना।
दूसरा तरीका- घुटने के बल बैठकर पैर छूना।
तीसरा तरीका- साष्टांग प्रणाम करना।

झुककर पैर छूना👉 झुककर पैर छूने से हमारी कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है।
घुटने के बल बैठकर पैर छूना- इस विधि से पैर छूने पर हमारे शरीर के जोड़ों पर बल पड़ता है, जिससे जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है।

साष्टांग प्रणाम👉 इस विधि में शरीर के सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए सीधे तन जाते हैं, जिससे शरीर का स्ट्रेस दूर होता है। इसके अलावा, झुकने से सिर का रक्त प्रवाह व्यवस्थित होता है जो हमारी आंखों के साथ ही पूरे शरीर के लिए लाभदायक है।

पैर छूने के तीसरे तरीके का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार खत्म होता है। किसी के पैर छूने का मतलब है उसके प्रति समर्पण भाव जगाना। जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार खत्म हो जाता है।
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Dev Sharma

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बच्चा प्रसव के पश्चात् माँ का दूध पीता है। माँ का दूध उपलब्ध न होने से माँ के घरवाले गाय के दूध की व्यवस्था करते हैं। इसलिए मनुष्य जन्म से शाकाहारी है। आयु के बढ़ने के बाद परिवार और समाज के प्रभाव से व्यक्ति मांसाहारी बन जाता है। समाज में विद्यमान कुशिक्षा उस की जड़ है। शरीर की संरचना की दृष्टि से मानव शरीर शाकाहारी भोजन के लायक है। उदाहरण के तौर पर-
१. मांसाहार करनेवाले प्राणी की लार में अम्ल की मात्रा अधिक होती है।
२. मांसाहारी प्राणी के रक्त की रासायनिक स्थिति (पी.एच.) कम है अर्थात् अम्लयुक्त है। शाकाहारी प्राणी के रक्त का पी.एच. ज्यादा है अर्थात् क्षारयुक्त है।
३. मांसाहारी प्राणी के रक्त में स्थित लिपोप्रोटीन शाकाहारी प्राणी से अलग होता है। शाकाहारी प्राणी का लिपोप्रोटीन मनुष्य जैसा होता है।
४. मांस की पाचन क्रिया में मांसाहारी प्राणी के आमाशय में उत्पन्न हाइड्रोक्लोरिक एसिड की मात्रा मनुष्य की तुलना में दस गुणा होती है। मनुष्य और अन्य प्राणियों के आमाश्य में उत्पन्न अम्ल (एसिड) की मात्रा कम होने के कारण मांस की पाचन क्रिया में बाधा उत्पन्न होती है।
५. मांसाहारी प्राणी की आंत्रनली की लम्बाई छोटी और शरीर की लम्बाई के बराबर होती है। आंत्रनलिका छोटी होने के कारण मांस शरीर में विषैला होने से पहले बाहर निकल जाता है, परन्तु मनुष्य और अन्य शाकाहारी प्राणियों की आंत्रनली की लम्बाई शरीर की लम्बाई से चार गुणा अधिक होती है, इसलिए मांसाहार से उत्पन्न विषैला तत्त्व शरीर से सहज ढंग से निकल नहीं सकता है, इसलिए शरीर रोगाक्रान्त हो जाता है। मांसाहार से उत्पन्न प्रमुख रोग हैं-उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदयरोग, गुर्दे का रोग, गठिया, अर्श, एक्जीमा, अलसर, गुदा और स्तन कर्कट आदि।
६. शिकार को सहज ढंग से पकड़ने के लिए मांसाहारी प्राणी की जीभ कंटीली, दाँत पैने और ऊँगलियों में पैने नाखून होते हैं। लेकिन शाकाहारी प्राणी की जीभ चिकनाईयुक्त, चौड़े दाँत और नाखून आयताकार जैसे होते हैं। शाकाहारी प्राणी होंठ के सहारे पानी पीता है, परन्तु मांसाहारी प्राणी जीभ से पानी पीता है।
७. मांसाहारी प्राणी की जीभ ऊपर और नीचे की और गतिशील होती है। इसलिए वे बिना चबाकर भोजन को निगल लेते हैं, इसके विपरीत शाकाहारी प्राणियों की जीभ चारों दिशाओं में गतिशील होती है। इसलिए वे भोजन को चबाकर खाते हैं।
८. मांसाहारी भोजन से शरीर में उत्पन्न अधिक वसा आदि के निर्गत के लिए उनके यकृत और गुर्दे का आकार बड़ा होता है। शाकाहारी प्राणियों के ऐसे अंग-प्रत्यंग छोटे होने की वजह से धमनी में एथेरोक्लेरोसिम जैसे रोग उत्पन्न होते हैं।
९. शाकाहारी की तुलना में मांसाहारी जीव की घ्राणशक्ति तेज तथा आवाज कठोर और भयानक होती हैं। ऐसे गुण उन्हें शिकार के लिए मदद करते हैं।
१०. मांसाहारी प्राणी की संतान जन्म के बाद एक सप्ताह तक दृष्टिहीन होती हैं। मनुष्य की तरह अन्य शाकाहारी पशु की संतान जन्म के बाद देख सकती हैं। ऐसे सभी विश्लेषण से ज्ञात होता है कि मानव शरीर की संरचना अन्य मांसाहारी प्राणियों से भिन्न होती हैं और शाकाहारी प्राणियों के अनुरूप होती हैं। इसलिए मनुष्य हमेशा एक शाकाहारी प्राणी है।
मनुष्य से भिन्न दुनिया का अन्य कोई भी प्राणी अपनी शारीरिक संरचना एवं स्वभाव के विपरीत आचरण नहीं करता है। उदाहरण के रूप में बाघ भूखा रहने पर भी शाकाहारी नहीं बनता है अथवा गाय भूख के कारण मांसाहार नहीं करती है। कारण यह कि ऐसा उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं है, परन्तु मनुष्य जैसे विवेकशील एवं बुद्धिमान् प्राणी में इस तरह के प्रतिकूल स्वभाव पाए जाते हैं। मनुष्य का भोजन केवल पेट भरने तथा स्वाद तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, चरित्रगत तथा बौद्धिक स्वास्थ्य के विकास में मुख्य भूमिका निभाता है। इसके लिए कहा गया है- ‘‘जैसा अन्न, वैसा मन’’। भोजन में रोग उत्पन्न करनेवाला, स्वास्थ्य को बिगाड़नेवाला और उत्तेजक पदार्थ रहने से वह शरीर के लिए हानिकारक होता है तथा शरीर के लिए विजातीय तत्त्वों को बाहर निकालने में रुकावट पैदा करता है। भोजन ऐसा होना चाहिए जिससे कि शरीर से अनावश्यक तत्त्व शीघ्र बाहर निकलने के साथ-साथ रोगनिरोध शक्ति उत्पन्न हो। पेड़ पौधों से बनाए जाने वाले शाकाहारी भोजन में पर्याप्त रेशा (फाइबर) होने के कारण यह कब्ज को दूर करने के साथ-साथ अनावश्यक पदार्थ जैसेः- अत्यधिक वसा (फैट) और सुगर आदि मल के रूप में निर्गत करवाता हैं। इसी वजह से व्यक्ति को मधुमेह और उच्च रक्तचापआदि रोगों से मुक्ति मिलती है। मांसाहारी खाद्य की तुलना में शाकाहारी खाद्य में स्वास्थ्यवर्धक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है। यह व्यक्ति को स्वस्थ, दीर्घायु, निरोग और हृष्टपुष्ट बनाता है। शाकाहारी व्यक्ति हमेशा ठंडे दिमागवाले, सहनशील, सशक्त, बहादुर, परिश्रमी, शान्तिप्रिय आनन्दप्रिय और प्रत्युत्पन्नमति होते हैं। वे अधिक समय बिना भोजन के रहने की क्षमता रखते हैं। इसलिए उनके पास दीर्घ समय तक उपवास करने की क्षमता है।

Yogeshvaranand Sarasvati