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भाई Abhijeet Singh की वाल से।

मैंने एक बार किसी मुस्लिम से पूछा था कि आप ‘या खुदा’ कहतें हैं तो ‘हे भगवान’ भी तो कह सकतें हैं. वो कहने नहीं, ऐसा कहना कुफ्र है. तब मैंने उनको बताया कि अरब की सीमा के बाहर से लेकर सुदूर पूर्व तक के मुसलमान अपने दैनिक इबादत में अल्लाह से अधिक ‘खुदा’ शब्द का प्रयोग करतें हैं, मज़े की बात ये है कि ये है कि ये शब्द न तो आपके कुरान में है, न हदीस में है बल्कि ये तो फ़ारसी भाषा का शब्द है पर आप मुसलमान इस शब्द का धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं तो फिर आपका अकीदा अगर ये है कि ‘हे भगवान’ कहने से आप काफिर हो जायेंगें तो फिर यही कुफ्र तो आप ‘या खुदा’ कहकर भी कर रहें हैं और आपका ये कुफ्र यहीं तक नहीं है, आप ‘नमाज़’ पढ़तें हैं, आप ‘रोज़ा’ रखतें हैं, आप ‘पैगंबर’ शब्द का प्रयोग करतें हैं ये सब तो आपके इस्लाम में नहीं है क्योंकि ये सारे शब्द कुरान में कहीं भी नहीं आयें हैं बल्कि ये तो फारसी भाषा के शब्द हैं तो अगर ये कुफ्र नहीं है तो फिर आप नमाज़ की जगह प्रार्थना शब्द का प्रयोग करिये, रोज़ा की जगह उपवास का प्रयोग करिये.

मेरी बात उनकी समझ में कितनी आई ये तो नहीं पता पर तुर्की के ‘मुस्तफ़ा कमाल पाशा’ ने अपने यहाँ के मजहबी कट्टरपंथी जमातों को ये बड़े अच्छे से समझा दिया था. उन्होंनें अपने देश में सन् 1928 में अरबी लिपि को अवैध घोषित कर दिया जो पवित्र कुरान की भाषा थी और उसकी जगह रोमन लिपि को स्वीकार कर लिया फिर उन्होनें भाषा शुद्धिकरण अभियान चलाते हुए अपनी भाषा में से चुन-चुन कर अरबी शब्दों को निकाल दिया. अजान, कुरान और नमाज़ें तुर्की भाषा में होने लगी. जाहिर था उनका ये कदम कट्टरपंथी जमातों को बड़ा नागवार गुजरा और वो अपना विरोध दर्ज कराने कमाल पाशा के पास आये और उनसे पूछा, आपने ऐसा आदेश दिया है कि नमाज़ और कुरान अब तुर्की भाषा में पढ़ी जायेगी? कमाल पाशा ने कहा, हाँ ! मैंने ऐसा किया है. अगर आप इस आदेश को बदलवाने की मांग लेकर आयें हैं तो पहले मेरे एक प्रश्न का उत्तर दे दीजिये फिर मैं सोचता हूँ. कमाल पाशा ने उन सबसे पूछा, अगर नमाज़ तुर्क भाषा में हो तो क्या अल्लाह इस भाषा में की गई इबादत को नहीं सुनेगा और समझेगा? मौलवी निरुत्तर थे इसलिये वापस लौट आये.

आज जब केन्द्रीय विद्यालय में दुहराई जाने वाली ‘शतपथ ब्राह्मण’ के एक मन्त्र को लेकर विवाद खड़ा हुआ है और सारे सेकुलर, दावती और सर्वधर्म समभाव के अलमबरदार मौन खड़े हैं तो ऐसे में इस विषय पर मंथन आवश्यक हो जाता है.

वंदे-मातरम् से तकलीफ इसलिये थी कि उसे गाते हुये कुछ लोगों के सामने बुत का तसव्वुर आता था, जन-गण-मन से तकलीफ इसलिये थी क्योंकि अल्लाह के अलावा किसी और की शान में खड़ा होना कुफ्र है पर इस ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योर्तिगमय, मृत्योर्माऽमृतम् गमयेति’ से तकलीफ़ क्यों है?

‘असतो मा सद्गमय’ से तकलीफ़ केवल इसलिये है कि क्योंकि ये संस्कृत में है, तकलीफ इसलिये है क्योंकि ये ‘शतपथ-ब्राह्मण’ से लिया गया है, तकलीफ इसलिये है क्योंकि इसमें ‘ईश्वर-अल्लाह-तेरे नाम जैसे’ सेकुलारापे की बू नहीं आती, तकलीफ इसलिये भी है क्योंकि कुछ लोगों के अनुसार इस मंत्र को दुहराना इस मुल्क के सेकुलर ताने-बाने को ध्वस्त कर देगा.

मैं कुरानका अभ्यास लगभग रोज़ ही करता हूँ. इस विवाद के बाद मैंने जब कुरान पलटा तो मेरी नज़र सूरह फ़ातिहा की आयतों पर गई जो कहती हैं,

‘इहदिनसिरातल मुस्तकीम सिरातल्लजी-न अन अम-त अलैहिम गैरिल मगजूबि वल्ज्जालीन’

अर्थात् ‘हमें सीधा मार्ग दिखा। उन लोगों का मार्ग जो तेरे कृपापात्र हुये और जो न प्रकोप के भागी हुये और न पथभ्रष्ट।’ 

इसे पढ़ने के बाद मुझे यजुर्वेद का वो मन्त्र याद आया जिसमें ऋषि कहता है, ‘नय सुपथा राये अस्मान्’ अर्थात् ‘हमें सीधे मार्ग की ओर लेकर चल।’ इसी को विस्तार देते हुये ऋषियों ने ब्राह्मण ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण, (14/3/1/30) में ईश्वर से कहा

‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योर्तिगमय, मृत्योर्माऽमृतम् गमयेति’

अर्थात् ‘आप हमको असत् मार्ग से पृथक् कर सन्मार्ग पर लगाईये।’

सूरह फातिहा की आखिरी आयत में वही दुआ है जो यजुर्वेद के 16वें अध्याय के 15वें मंत्र में है जिसमें कहा गया है- ‘हे रुद्र। हमें ऐसे मार्ग से चलाईये जिससे हम आपके दंडनीय न हों।’ पूरा मंत्र इस प्रकार है-
   
मा नो महान्तमुत मा नोअऽर्भकमा नऽउक्षन्तमुत मा न उक्षितम्।
मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः।

अर्थात् , ‘हे रुद्र। दुष्टों को पाप के दुःखरुप फल को देकर रुलाने वाले परमेश्वर। आप हमारे छोटे, बड़े जन गर्भ माता-पिता और प्रिय बंधुवर्ग तथा शरीरों का हनन करने के लिये प्रेरित मत कीजिये तथा ऐसे मार्ग से हमको चलाईये जिससे हम आपके दंडनीय न हो।’

अगर ये है तो फिर इस प्रसंग पर मौन साधे देश के कथित बुद्धिजीवियों से ये प्रश्न नहीं पूछा जाना चाहिए कि विश्व कल्याण और सदेच्छा के भाव को समेटे इन प्रार्थनाओं के विरोध को उनके हिन्दू-विरोध और द्वेष का परिणाम क्यों न माना जाये? इसी प्रश्न का उत्तर क्या मुस्लिम मौलानाओं से अपेक्षित नहीं है कि उपरोक्त आयतों को अगर वो संस्कृत में अनुवादित करने जायेगें तो उसका भाव क्या इससे अलग होगा? और अगर नहीं तो फिर वो इन प्रार्थनाओं के विरोध को वो आसमानी तालीम का विरोध क्यों नहीं मानते? क्या भाषा बदल जाने से ईश्वर अपनी शिक्षाओं के अपमान की अनुमति दे देता है? क्या ये मौलाना इस बार भी मौन ही रखेंगें और ईश्वर को छलते रहेंगे?

अंतिम प्रश्न माननीयों से भी है. एक मन्त्र है जो वेद में भी आया है, उसी आशय की आयत कुरान में है और ठीक वही भाव बाईबल में भी है. ऋग्वेद के उस मंत्र में आता है –

उतत्वः पष्यन्नः ददर्ष वाचमुत त्वः श्रृण्वन्नः श्रृणोत्येनाम्।
उतो त्वस्मै तन्वं विसस्त्रे जायेव पत्य उषतो सुवासाः ।

अर्थात्,  जो अविद्धान हैं वो सुनते हुये भी नहीं सुनते , देखते हुये भी नहीं देखते और बोलते हुये भी नहीं बोलते।’

कुरान की आयत है जिसमें कहा गया है, – “और निश्चय ही हमने बहुत सारे जिन्नों को व मनुष्यों को जहन्नम ही के लिये फैला रखा है। उनके पास दिल है पर वो उससे समझते नहीं तथा उनके पास आंखें हैं पर वो उससे देखते नहीं और उनके पास कान है पर वो उससे सुनते नहीं। वो पशुओं की तरह हैं, बल्कि ये उससे भी ज्यादा गुमराह हैं। यही लोग हैं जो अचेतावस्था में पड़े हुयें हैं।” (कुरान, 7:157)

और इंजील में मसीह ईसा कहतें हैं, – “so that although they look they may look but not see, and although they hear they may hear but not understand, so they may not repent and be forgiven.”

तो कल को अगर इनमें से किसी को हटाने को लेकर मामला आपके पास गया तो आप किसे रखेंगें और किसे हटायेंगें?

~ अभिजीत

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