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#Who_is_Shudra
केवल 350 साल पहले फ्रांसीसी लेखक द्वारा लिखी गई पुस्तक के तथ्यों और 3000 साल के “कथित” शूद्र अत्याचार की अम्बेडकरवादी कहानी में इतना विरोधाभास क्यों है??
ये क्या चक्कर है?? आखिर टेवर्नियर और आंबेडकर में से कौन झूठ बोल रहा है?? आगे पढ़िए…
http://www.desicnn.com/news/who-were-actually-shudras-defined-by-tavernier-and-ambedkar-both-but-who-is-wrong
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शूद्र मामले में झूठ कौन बोल रहा :– टेवेर्नियर या अम्बेडकर??
Written by डॉक्टर त्रिभुवन सिंह
शुक्रवार, 12 जनवरी 2018
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सबसे पहले टेवेर्नियर (Tavernier) के बारे में… यह व्यक्ति एक फ्रांसीसी यात्री था, जिसने 1630 से 1668 के बीच ईरान और भारत की 6 बार यात्रा की थी, और वह भारत में एक लाख 20 हजार मील से अधिक घूमा.

वह एक हीरों का व्यापारी था. उसने अपने यात्रा वृत्तान्त मे भारत के व्यवसाय और व्यापार तथा भारत मे पैदा होने वाले, और एक्सपोर्ट होने वाले मसालों, हीरा पन्ना जवाहरात, सूती और सिल्क के कपड़े आदि का विस्तृत ब्यौरा दिया है. उसने भारत के हिन्दू समाज के बारे में और निर्यात किए जाने वाले उत्पादों का निर्माण करने वाले लोगों का भी वर्णन किया है. आश्चर्य की बात यह है कि जिन अछूत-शूद्रों को डॉ अंबेडकर (Ambedkar) वेदों के पुरुष-सूक्त से जोड़कर 3000 या 5000 साल से उस अछूतपने का वर्णन करते हैं, और कहते हैं कि इसी कारण शूद्रों को निम्न कार्य करने के लिए बाध्य किया गया, वे “बहुसंख्यक भारतीय अछूत हिन्दू” (Caste System in India) टेवेर्नियर को दिखे ही नहीं? इसका क्या कारण है?

अब सवाल उठता है कि फिर झूठ कौन बोल रहा है? टेवेर्निएर कि अंबेडकर? (Who are Shudras)

टेवेर्नियर ने लिखा है कि “शूद्र” पदाति योद्धा होते थे, यानी पैदल सैनिकों की टुकड़ी. जबकि डॉ आंबेडकर का शूद्र निम्न स्तर के जॉब वाला, लेकिन इतिहास के पन्नों से एक महत्वपूर्ण तबका PAUZCOUR कहाँ गायब हो गया? आश्चर्य होता है जब भारत के इतिहासकार और अछूतोद्धार के योद्धा डॉ अंबेडकर और उनके अवैध वंशज, जो अपने आप को दलित चिंतक कहते हैं, जो भारत मे अछूतों को “3000 साल” से सवर्णों का गुलाम मानते आयें हैं… ब्राह्मणवाद के नाम पर गरीबों को डराकर आज तक मलाई खाते आए इन मूढ़मतियों को फिर से नए अध्ययन की आवश्यकता है.

इस लेख में मैंने Tavernier नाम के एक फ़्रांसिसी की 17वीं शताब्दी के यात्रा वृत्तांत से कुछ पृष्ठों को उद्धृत किया है. भारत के इतिहास लेखन में Tavernier, इतिहासकारों का एक महत्त्वपूर्ण और विश्वस्त सूत्र रहा है. लेकिन न जाने कैसे उसी सूत्र के इन महत्त्वपूर्ण पन्नों को जाने-अनजाने कुछ “कथित इतिहासकारों” ने अपठनीय समझकर छोड़ दिया. आप इस लेख को पढ़ेंगे तो पाएंगे, कि इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को किस तरह उपहासजनक तरीके से लिखा है… उसकी मिसाल दुनिया में आपको कहीं अन्यत्र नहीं मिलेगी. इतिहास और उपन्यास दो अलग विधाएँ हैं. भारतीय इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को उपन्यास विधि से प्रस्तुत किया है. मात्र 338 वर्ष पहले ट्वेर्निएर ने भारत के हिन्दू समाज का वर्णन किया है. और अचम्भे की बात ये है कि उसने लिखा है कि शुद्र भी क्षत्रियों की तरह ही योद्धा हुआ करते थे. डॉ आंबेडकर ने भी यही सिद्ध करने की कोशिश की थी अपने थीसिस – “शूद्र कौन थे” में. उनके तर्कों में दम तो है लेकिन तथ्य नहीं है. आप टेवेर्निएर के इस लेख को पढ़िए, आप को प्रमाणिक साक्ष्य दिख जाएगा कि डॉ आंबेडकर का लेखन “औपन्यासिक विधा” में प्रस्तुत किया गया तार्किक, परंतु तथ्यहीन इतिहास भर है.

टेवेर्नियर लिखता है…. —

“भारत में मूर्तिपूजकों की संख्या इतनी ज्यादा है की एक मुसलमान की तुलना में 5-6 मूर्तिपूजक होंगे. ये अत्यंत आश्चर्यजनक है कि संख्या में इतना ज्यादा होने के बावजूद ये इस्लामिक बादशाहों के गुलाम बने हुए है. लेकिन आपका आश्चर्य तब समाप्त हो जाता है जब आप पाते हैं कि इन मूर्तिपूजकों के अंदर कोई एकता नहीं है. अन्धविश्वास (जो शास्त्र बाइबिल में न फिट बैठे वो Superistition) ने इनके अंदर इतनी वैचारिक और रीति रिवाजों की भिन्नता पैदा कर दी है कि, इनमें एकता संभव ही नहीं है. एक caste के लोग दूसरी caste के घर खाना नहीं खा सकते हैं, और न ही पानी पी सकते हैं, सिर्फ अपने से उच्च सामजिक वर्ग को छोड़कर. अतः सभी लोग ब्राम्हण के घर खाना खा सकते हैं, या सकते थे, और उनके घर समस्त संसार के लिए खुले हुए हैं. इन मूर्तिपूजकों में Caste शब्द का प्रयोग उसी तरह से है, जैसे पहले यहूदियों में एक ट्राइब होती थी. यद्यपि सामान्यतया ये विश्वास किया जाता है कि यह 72 caste हैं परन्तु मैंने ज्ञानी पंडितों से पता किया, तो पता चला कि ये मुख्यतः 4 caste ही हैं, और उन्ही चारों caste से सभी की उत्पत्ति हुई है.

इसमें प्रथम caste को ब्राम्हण के नाम से जाना जाता है, जो उन प्राचीन ब्राह्मणों और दार्शनिकों के वंशज हैं जो खगोल शास्त्र पढ़ा करते थे. ये आज भी उन्ही प्राचीन पुस्तकों के अध्यन मनन में संलिप्त रहते हैं. ये इस विद्या में इतने निपुण हैं कि सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण की सटीक भविष्यवाणी में एक मिनट की भी चूक नहीं करते. इनकी इस विद्या को सुरक्षित रखने के लिए बनारस नाम का एक नगर में विश्वविद्यालय हैं, जहाँ ये लोग मुख्यतः खगोलशास्त्र का अध्ययन करते हैं. यहाँ और विद्वान लोग भी है जो अन्य शास्त्रों को पढ़ते हैं. ये caste सबसे योग्य (नोबेल) इसलिए मानी जाती है, क्योंकि इन्हीं विद्वानों के बीच से पुजारी और शास्त्रों को पढने वाले शास्त्री चुने जाते है.

दूसरी Caste राजपूत या “Khetris (क्षत्रिय)” के नाम से जानी जाती है, अर्थात योद्धा और सैनिक. ये अकेले ऐसे मूर्तिपूजक हैं जो बहादुर हैं और शस्त्रविद्या में निपुण हैं. टेवेर्नियर लिखता है कि… ज्यादातर राजा जिनसे मैंने बात की है वे इसी caste के हैं. यहाँ छोटी छोटी रियासतों वाले राजा हैं, जो आपसी मतभेद की वजह से मुग़लों की छत्रछाया में रहने को मजबूर हैं. लेकिन जो सेवा ये मुग़लों को देते हैं, उसके बदले में इनको भरपूर सम्मान और सैलरी दिया जाता है. ये राजा और उनके संरक्षण में रहने वाले राजपूत ही मुग़ल शक्ति के आधार स्तम्भ हैं. राजा जयसिंघ और जसवंत सिंह ने ही औरंगजेब को गद्दी पर बैठाया था, लेकिन यहाँ ये उल्लेख करना भी उचित होगा कि दूसरी Caste के समस्त लोग इस शस्त्र व्यवसाय में सन्नद्ध नहीं हैं. वो राजपूत अलग हैं जो घुड़सवार सैनिक के रूप में युद्ध में भाग लेते हैं. लेकिन जहाँ तक Khetris (क्षत्रियो) की बात है, वे अपने बहादुर पूर्वजों से निम्न हो चुके हैं, और हथियार त्यागकर व्यापार (Merchandise) के क्षेत्र में उतर चुके हैं.

तीसरी Caste है, बनियों की जो ट्रेड या व्यापार सँभालते हैं. इन्हीं में से कुछ शर्राफ (Shroff ) जो मनी एक्सचैंजिंग या बैंकर का काम करते है, जबकि कुछ लोग ब्रोकर हैं जिनके एजेंसीज के जरिये व्यापारी (मर्चेंट्स) खरीद फरोख्त करते हैं. इस Caste के लोग इतने व्यवहारिक (Subtle) और व्यवसाय प्रवीण हैं कि ये यहूदियों को भी मात दे सकते हैं. ये अपने बच्चों को बालपन से ही आलस्य से दूर रहने कि शिक्षा देते हैं, और हमारे बच्चों कि तरह आवारागर्दी से रोकते हैं. उनको अंकगणित की मुंहजबानी शिक्षा इस तरह से देते हैं कि वे कठिन से कठिन सवाल का जबाब चुटकियों में दे देते हैं. इनके बच्चे हमेशा पिता के साथ रहते हैं, और ये अपने बच्चो को व्यापार के साथ उसके गुण-दोष समझाते जाते हैं और काम करते जाते हैं. ये जिस संख्या (figures ) का इस्तेमाल करते है उसी का प्रयोग पूरे देश में होता है, चाहे कोई भी भाषा का बोलने वाला हो. यदि कोई व्यक्ति इनसे नाराज होता है, तो ये बिना जबाव दिए धैर्य के साथ सुनते हैं, और चुपचाप वहां से खिसक लेते हैं. फिर चार-पांच दिन बाद जब उस व्यक्ति का गुस्सा शांत हो जाता है तब उससे मिलते हैं. ये हर उस चीज को अभक्ष्य मानते हैं जिसमे प्राण हों. किसी प्राणी कि हत्या करने की बजाय ये स्वयं जान देना पसंद करते हैं. यहाँ तक कि ये कीड़े मकोड़ों की भी हत्या पसंद नहीं करते, और अपने धर्म के पक्के हैं. यहाँ ये भी बता दूँ कि ये लोग युद्ध में भाग नहीं लेते.

चौथी caste को Charados या “Soudra” कहते हैं, ये राजपूतों कि तरह ही युद्ध में भाग लेते हैं लेकिन दोनों में मात्र इतना फर्क है कि राजपूत घुड़सवार योद्धा होते हैं, और ये पदाति योद्धा. दोनों ही युद्ध में जान देने में अपना गौरव समझते हैं. एक योद्धा चाहे वो घुड़सवार हो या फिर पैदल, यदि युद्ध के दौरान मैदान छोड़कर भाग जाता है तो वो हमेश के लिए अपना सम्मान खो देता है, और ये पूरे परिवार के लिए लज्जा का विषय बन जाता है.

अब जो बाकी बचे लोग हैं जो इन चारों caste में समाहित नहीं होते, उनको PAUZECOUR के नाम से जाना जाता है ये सब मैकेनिकल आर्ट (अर्टिसन यानि शिल्प और अन्य उद्योग) का कार्य करते हैं. इनमे आपस में कोई भेद नहीं है, सिवा इस बात के कि वे अलग अलग व्यवसाय करते हैं जो इनको अपने पिता से स्वाभाविक रूप से मिलता है. एक अन्य बात ये है कि उदाहरण के तौर पर यदि मान लीजिये कोई दर्जी कितना भी धनवान क्यों न हो उसको अपने बेटे बेटियों की शादी उसी के व्यवसाय वाले के परिवार में करना होता है. इसी तरह यदि उस दर्जी कि मृत्यु होगी, तो श्मशान घाट पार जाने वाले लोग भी उसी पेशे के होंगे. इसके अलावा एक और विशेष caste होती है, जिसको “हलालखोर” के नाम से जाना जाता है. जो घरों की सफाई का काम करते हैं और इनको हर घर से महीने में कुछ दिया जाता है, घर की साइज के अनुसार. भारत में समृद्ध वर्ग में चाहे वो मोहम्डन हो या मूर्तिपूजक, और चाहे उसके पास पचासों नौकर हों… इनमे से कोई भी नौकर झाड़ू लगाने से परहेज करता है कि उसको संक्रमण न हो जाय. अगर आपको किसी कि बेइज्जती करनी हो तो उसको हलालखोर बोल देना ही पर्याप्त है. यहाँ ये भी बताना जरूरी है कि जिस नौकर को जिस कार्य हेतु रखा गया है, वो बस वही काम करेगा. अगर मालिक ने किसी नौकर को किसी अन्य नौकर का काम करने का आदेश दिया तो वो उसको अनसुना कर देगा. लेकिन “गुलामों” को सब काम करने पड़ते हैं. ये हलालखोर Caste के लोग घरों का कूड़ा उठाते हैं, और इनको जो भी खाने को दिया जाता है उसको खा लेते हैं. मात्र इसी Caste के लोग गधों (asses ) का इस्तेमाल करते हैं, जिसकी मदद से ये घरों का कूड़ा खेतों तक पहुचाते है. इनके अलावा गधों को कोई छूता भी नहीं. जबकि मिस्त्र में गधो का इस्तेमाल बोझ ढोने और सवारी ढोने में दोनों तरह ही प्रयोग किया जाता है. एक अन्य बात ये भी है कि मात्र हलालखोर ही सुअर पालने और खाने वाले लोग है…

उपरोक्त विश्लेषण आपने, “TRAVELS IN INDIA by JEAN BAPTISTI TAVERNIER के फ्रेंच से अनुवादित 1676 एडिशन के पृष्ठ 181 – 186 .से पढ़ा….

अब कुछ प्रश्न और आशंकाये ::

(1) टैवेर्नियर अपनी किताब में शूद्रों को “पदाति सैनिक” बता रहा है. कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी शूद्र सेना का जिक्र है, जो ब्राह्मण सेना से श्रेष्ठ एक खास अर्थ में बताई जाती है, तो कम से कम डॉ अंबेडकर का Menial जॉब (निम्न स्तर की नौकरी) वाला “शूद्र” तो वो बिलकुल भी नहीं था.

(2) सबसे बड़ी बात तो ये है कि उसके लंबे समय के भारत प्रवास के दौरान उसको डॉ अंबेडकर और पेरियार द्वारा वर्णित 3000 साल से आबादी का 80% अछूत, शूद्र, अतिशूद्र दलित दिखाई न दिये? जबकि “हलालखोर” तक का वो बारीक जिक्र करता है… जबकि वह मात्र आज से 340 साल पहले आया था. मनुस्मृति का तो पता नहीं, कब किसने लिखी, लेकिन टेवेर्निएर तो इतिहास का एक अंग है, एक जिंदा सबूत.

(3) Pauzecour – एक प्रमुख शब्द है जिसके अंतर्गत आर्टिसन आते हैं, जो चारो वर्णों के लोगों का एक समूह है. यह समूह अनंत काल से भारत की 25% जीडीपी के शेयर होल्डिंग का निर्माता था. अर्थ व्यवस्था नष्ट हुई, तो शब्दों की यात्रा में ये Pariah से होता हुआ Periyar बन जाता है. ज्ञातव्य हो कि Pariah बाइबिल मे वर्णित एक शब्द है, जिसका अर्थ समाज से त्यागा, गुलाम बनाया हुआ वर्ग समूह. 

कहने का मतलब ये है कि प्राचीन भारत में केवल “वर्णाश्रम” पद्धति थी, जाति का नामोनिशान तक नहीं था, लेकिन मुगलों के आगमन के बाद से ही विभिन्न कारणों (क्रूर अत्याचार, युद्ध में पराजय, गुलाम प्रथा इत्यादि) से पहले “शूद्र” शब्द को विकृत किया गया और फिर जातियों में बाँटकर “दलित” शब्द का उदय हुआ. यदि आंबेडकर (अथवा आधुनिक कथित दलित चिन्तक) कहते हैं कि 3000 वर्षों से दलितों(??) पर अन्याय हुआ है, तो या वह साफ़ झूठ बोल रहे हैं या जानबूझकर ऐसे तथ्य आपसे छिपा रहे हैं, जो कि विभिन्न अंगरेजी-फ्रांसीसी-जर्मन लेखकों द्वारा समय-समय पर लिखे जा चुके हैं.

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Vipin khuraana

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तुलसीदास जी जब वृन्दावन आये। तुलसीदास जी जानते थे राम ही कृष्ण है,और कृष्ण ही राम है !
वृन्दावन में सभी भक्त जन राधे-राधे बोलते है। तुलसीदास जी सोच रहे है कोई तो राम राम कहेगा। लेकिन कोई नही बोलता। जहाँ से देखो सिर्फ एक आवाज राधे राधे ! श्री राधे-श्री राधे !
क्या यहाँ राम जी से बैर है लोगो का। देखिये तब कितना सुन्दर उनके मुख से निकला
वृन्दावन ब्रजभूमि में कहाँ राम सो बेर
राधा राधा रटत हैं आक ढ़ाक अरू खैर
जब तुलसीदास ज्ञानगुदड़ी में विराजमान श्रीमदनमोहन जी का दर्शन कर रहे थे। श्रीनाभाजी एवं अनेक वैष्णव इनके साथ में थे !
इन्होंने जब श्रीमदनमोहन जी को दण्डवत प्रणाम किया तो परशुरामदास नाम के पुजारी ने व्यंग किया
अपने अपने इष्टको, नमन करे सब कोय
बिना इष्ट के परशुराम नवै सो मूरख होय।।
श्री गोस्वामीजी के मन में श्रीराम—कृष्ण में कोई भेदभाव नहीं था, परन्तु पुजारी के कटाक्ष के कारण आपने हाथ जोड़कर श्रीठाकुरजी से कहा — हे ठाकुर जी ! हे राम जी ! मैं जनता हूँ की आप ही राम हो आप ही कृष्ण हो लेकिन आज आपके भक्त में मन में भेद आ गया है
आपको राम बनने में कितनी देर लगेगी आप राम बन जाइये ना !
कहा कहों छवि आज की, भले बने हो नाथ
तुलसी मस्तक नवत है, धनुष बाण लो हाथ।।
ये मन की बात बिहारी जी जान गए और फिर देखिये क्या हुआ
कित मुरली कित चन्द्रिका, कित गोपिन के साथ
अपने जन के कारणे, कृष्ण भये रघुनाथ।।
*कहाँ तो कृष्ण जी बांसुरी लेके खड़े होते है गोपियों और श्री राधा रानी के साथ लेकिन आज भक्त की पुकार पर कृष्ण जी साक्षात् रघुनाथ बन गए है और हाथ में धनुष बाण ले लिए है

बृजमोहन ओजा दधीचि

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युग मनीषी की पावन जयंती
पर समस्त राष्ट्रवासियों को
अनंत शुभकामनाये,,
महान विभूति को कृतज्ञ राष्ट्र
का शत शत नमन,,
कोटि कोटि वंदन,,

स्वामी विवेकानन्द और हिन्दू,,

अपने देश में,जो ‘हिन्दुस्थान’
नाम से विख्यात था,’हिन्दू’ शब्द
को बदनाम करने के प्रयास बड़ी
ताकत से किये जा रहे हैं।

आश्चर्य और लज्जा की भी बात
यह है कि जिनको दुनिया ‘हिन्दू’
नाम से पहचानती है,वे लोग ही
इस बदनामी मुहिम में सबसे
आगे हैं।

अपने देश का ‘हिन्दुस्थान’ यह
नाम जानबूझकर भुलाया जा
रहा है।

पौराणिक नाम “भारत” को
भी लोग “India” कहते हैं तथा
भरतीय को “Indian”.

अथर्वेद के निम्न श्लोक में
“भारत” का स्पष्ट उल्लेख है,
रत्नकराधौतपदां
हिमालय किरीटिनीम।
ब्रह्मराजर्षि रत्नाढयां
वंदेभारतमातरम।।

रत्नों का भंडार जिसके चरण
पखारता हो,पर्वतराज हिमालय
जिसका मुकुट हो,ब्रह्मर्षि और
राजर्षि जिसके प्रतिष्ठित पुत्र
हों उस भारत माता को नमन,

Oxford dictionery में
Indian का अर्थ स्पष्ट रूप
में लिखा हुआ है,
Indian = जाहिल,जंगली,
असभ्य,मूर्ख,गंवार आदि..

अपने संविधान की पहली
धारा की शब्दावली ही देखें।

वह बताती है,
India that is Bharat
shall be a union of
States;
इस धारा की शब्दावली का
अर्थ यह होता है कि अपने
देश का मूल नाम ‘इंडिया’ है।

यहां के अनपढ़ लोगों के समझ
में आने के लिये उसका अनुवाद
‘भारत’ किया है।

यह शब्दावली यह भी
अधोरेखित करती है कि यह
देश मूलत: एक नहीं है।
अनेक राज्यों का वह संघ है।

मतलब यहां मूलभूत इकाई
‘राज्य’ है,भारत नहीं।

इस प्रकार के वैचारिक विभ्रम
का मतलब यहां दिखाई देता है
कि हिमालय से लेकर सागर
तक फैला यह देश एक है,
ऐसा आभास तक किसी
को न हो।

भारत और हिन्दुस्थान–

हिन्दू हमारा धर्म है और हिंदुत्व
हमारी राष्ट्रियता।

बृहस्पति आगम;-
हिमालय समारम्भय
यवाद इंदु सरोवरं।
तं देव निर्मितं
देशम् प्रचक्षते।।

हिमालय पर्वत से लेकर इंदु
(हिंद) महासागर तक देव
पुरुषों द्वारा निर्मित क्षेत्र को
हिंदुस्थान कहते हैं।

हमारे माननीय संविधानकर्ताओं
ने विष्णु पुराण का एक श्लोक
भी अपने संज्ञान में लिया होता,
तो संपूर्ण भारत के एकत्व का
बोध उनको हो जाता।

वह श्लोक है-
उत्तरं यत् समुद्रस्य
हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वषंर् तद् भारतं नाम
भारती यत्र सन्तति:।।

श्लोक का अर्थ है-
समुद्र के उत्तर में और हिमाचल
के दक्षिण में जो प्रदेश है उसका
नाम भारत है और वहां रहनेवाले
लोग ‘भारती’ हैं।

संविधानकर्ताओं ने जरा
भी स्वत्व का अभिमान
और आत्मविश्वास होता
तो वे ….

ऐसा शब्द प्रयोग करते ‘भारत’ शब्द,
विष्णु पुराण के वचन के अनुसार इस
देश का विस्तार बतायेगा और
‘हिन्दुस्थान’ शब्द उसका
गुणात्मक आशय (…)
प्रकट करेगा..

“भायं रत: भारत:”
भारत वह पावन भूमि है
जहां के लोग ज्ञान (भायं)
प्राप्त करने तथा ज्ञान बांटने
में सदा रत (रत:)रहते हैं।

ज्ञान की देवी को माँ भारती
(सरस्वती) के रूप में यहां
पूजा होती है।

धर्म और रिलिजन–

हम यह मान लेंगे कि वे लोग
नया संविधान बनाने की जल्दी
में थे या ‘हिन्दू’ शब्द के अर्थ के
जो आयाम है,
उनसे वे अनभिज्ञ थे।

सम्भवत: ईसाई तथा इस्लाम
के समान ‘हिन्दू’ भी केवल
एक मजहब है ऐसा ही वे
मानते होंगे।

यह बौद्घिक संभ्रम तो अभी
भी विद्यमान है।

वे ‘धर्म’ और ‘रिलिजन’ के
अथों का भेद समझने में
असमर्थ दिखाई देते हैं।

‘धर्म’ का अर्थ बहुत व्यापक है।

‘रिलिजन’ ‘धर्म’ का एक अंग
मात्र है।

‘रिलिजन’ केवल परमार्थ तक
सीमित है।

‘धर्म’ ऐहिक भी है और
पारमार्थिक भी है।
वैशेषिकों ने ‘धर्म’ की सही
परिभाषा की है।

‘यतोऽभ्युदयनि:
श्रेयससिद्घि: स धर्म:’
अर्थात  जिस से अभ्युदय यानी
ऐहिक उन्नति और नि: श्रेयस
यानी पारमार्थिक कल्याण की
सिद्घि होती है वह ‘धर्म’ है।

यह वैशेषिकों की परिभाषा है।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन्
ने ठीक ही कहा है कि
Hinduism is not a
religion,it is a common
wealth of many
religions-

मतलब है ‘हिन्दू’ कोई एक
रिलिजन नहीं है,अनेक
रिलिजनों का वह संघ है।

वे आगे कहते हैं-
Hindus,if they accept
the Hindu system of
culture and life,
Hinduism insists not
on religious conformity
but on a spiritual and
ethical outlook of life.

Hinduism is not a sect,
but a fellowship of all
who accept the law of
right and earnestly seek
for truth,,

हिन्दू के इस व्यापक आशय
की अनदेखी कर आज के
हमारे नेताओं ने ‘हिन्दू’ को
इस्लाम और ईसाई मत की
पंक्ति में बिठाकर उसे एक
संप्रदाय बना डाला है।

इसलिये जो कोई ‘हिन्दू’
की बात करता है,उसे वे
सांप्रदायिक,कम्युनल,
संकीर्ण मानते हैं।

हिन्दू;-

शब्द कल्पद्रुम(दूसरी शताब्दी)
में कहा है,
“हीनं दुष्यति इति हिन्दू
जाति विशेष:”।
हीन कर्म का त्याग करने वाले
को हिन्दू कहते हैं।

अद्भुत कोष में कहा है,
“हिन्दू हिंदुश्च प्रसिद्धौ
दुष्टानां च विघर्षने।”
हिन्दू और हिंदु दोनों शब्द दोनों
शब्द दुष्टोम को नष्ट करने वाले
अर्थ में प्रसिद्ध है।

बृहद स्मृति(छठीं शताब्दी);
“हिंसया दुयते यश्च सदाचरण
तत्पर: वेद ..हिंदु मुख शब्द
भाक्।”
जो सदाचारी वैदिक मार्ग पर
चलने वाला,हिंसा से दुःख
मानने वाला है,वह हिन्दू है।

हिन्दू धर्म—

अभी अपने देश में स्वामी
विवेकानंद की जयंती मनाई
जा रही है।

सम्भवत: तथाकथित सेक्युलर
पार्टियों के लोग भी जयंती
समारोह मनायेंगे या दिखाने
के लिये क्यों न जयंती समारोहों
में शामिल भी होंगे।

उनके लिये तथा अन्य सभी
के लिये भी स्वामी जी ने ‘हिन्दू’,
‘हिन्दू धर्म’, ‘हिन्दू राष्ट्र’ इन
विषयों के सम्बन्ध में क्या
कुछ कहा है,यह बताना
मुझे आवश्यक लगता है।

यह बात ध्यान में रखनी
चाहिये कि स्वामी विवेकानंद
के अमरीका तथा अन्य यूरोपीय
देशों में जो भाषण हुये,वे 19 वीं
शताब्दी में हुए थे।

उन लोगों को ‘धर्म’ शब्द का
अर्थ ज्ञात होना असम्भव था।

अंग्रेजी भाषा में ‘धर्म’ शब्द का
सम्यक् और समग्र आशय प्रकट
करने वाला शब्द ही नहीं है।

क्योंकि ऐसी व्यापक अवधारणा
का उनके विचार विश्व में उदय
ही नहीं हुआ था।

उनके बीच में भाषण करते हुये
स्वामी जी ने रिलिजन शब्द का
प्रयोग किया है।

किन्तु उस शब्द के व्यापक
आशय के बारे में उनके मन
में यत्किंचित भी संदेश नहीं था।

इस संदर्भ में उनके कुछ
वचन ध्यान में लेने चाहिये।

1) ईसाई मत ईसा मसीह
पर,इस्लाम मुहम्मद साहब
पर,बौद्घ बुद्घ पर,जैन जिन
पर- ऐसे ये रिलिजन व्यक्ति-
आधारित हैं,लेकिन अपना
धर्म व्यक्ति पर नहीं सिद्घान्तों
पर आधारित है।

भगवान् कृष्ण वेदों से श्रेष्ठ
नहीं हैं।
उनको भी वेद श्रेष्ठ लगते थे।

श्रीकृष्ण का देवत्व इस में है
कि उन्होंने अपने जीवन में
वेदों की सर्वोत्तमता को प्रकट
किया है।

2) हरेक देश की कार्य करने
की एक विशेष रीति होती है।

कुछ राजनीति के द्वारा प्रगति
करते हैं।
हमारे लिये ‘धर्म’ ही एकमात्र
साधन उपलब्ध है,जिसकी
सहायता से हम कुछ हलचल
कर सकेंगे ?

हम हिन्दुओं को राजनीति
भी ‘धर्म’ के द्वारा ही समझ
में आयेगी,समाज शास्त्र का
भी आकलन होगा तो वह भी
‘धर्म’ के द्वारा ही क्योंकि ‘धर्म’
ही यहां की ओंकार ध्वनि है।

अन्य सारे सुर राष्ट्रीय
जीवन-संगीत के संवासुर हैं।

इससे यह स्पष्ट होगा कि
‘धर्म’ केवल उपासना का
कर्मकांड नहीं होता वह
जीवनव्यापी है।

‘धारणाद् धर्म इत्याहु:
धर्मो धारयते प्रजा:’,
यह महाभारत का सुप्रसिद्घ
वचन है-‘धर्म’ प्रजा की यानी
जगत में उत्पन्न सभी को धारणा
करने वाला तत्व है।

अस्मिता का बोधक शब्द—

‘हिन्दू’ शब्द कहां से आया ?
वैदिक साहित्य में उसका
उल्लेख है क्या ?

पराये लोगों ने दिया हुआ
वह अभिधान नहीं हैं क्या ?-
इस निरर्थक चर्चा में स्वामी
विवेकानंद उलझे नहीं।

उन्होंने यही बताया कि सिंधु
से हिन्दू आया है।

अनेक पश्चिमी तथा पूर्व भारतीय
भाषाओं में स का उच्चारण ह होता है।
सप्ताह का हफ्ता बनता है।

हम लोग असम कहते हैं,किन्तु
वहां के लोग आहोम कहते हैं।

मैं एक बार असम के होजाई
नगर में गया था।

मेरा परिचय कराते हुए वक्ता
ने कहा,ये नागपुर से निकलने
वाले तरुण भारत के पूर्व
हम्पादक हैं।

तथापि हिन्दू शब्द का मूल कुछ
भी हो,वह अब हमारी विशेषता
का,विशिष्टता का तथा अस्मिता
का बोधक बन गया है।

हमें उसका अभिमान धारण
करना चाहिये।

विवेकानंद कहते हैं,मुझे हिन्दू
कहने का अभिमान लगता है।

मेरे देशबंधुओं,भगवान् की
कृपा से आप को भी वैसा लगे।

अपने पूर्वजों के बारे में श्रद्घा
हमारे रक्त में होनी चाहिये।

वह हमारे जीवन का अभिन्न
अंग बने और हम संपूर्ण जगत
की मुक्ति के लिये प्रयत्नशील
हों।

मूल अंग्रेजी वचन ऐसा है,
“I am proud to call
myself a Hindu.
Through the grace of
the Lord, may you,my
countrymen,have the
same pride.
May that faith in your
ancestors come into
your blood.

May it become a part
and parcel of your lives.
May it work towards the
salvation of the world.”

हिन्दू इस शब्द पर और हिन्दू
नाम धारण करने वाले हरेक
व्यक्ति को हम अत्यन्त प्रेम
करना सीखें।

वह किसी भी प्रान्त का रहने
वाला हो,कोई भी भाषा बोलने
वाला हो,परिचय होते ही वह
हमको अत्यंत निकटतम और
प्रियतम लगे तभी हम सही अर्थ
में हिन्दू कहलायेंगे।

सन् 1897 में लाहौर में दिये
भाषण में स्वामी जी ने कहा-

“We are Hindus.
I do not use the word
Hindu in any bad sense
at all,nor do I agree with
those that think there is
any bad meaning in it.

Upon us depends
whether the name
Hindu will stand for
everything that is
glorious,everything
that is spiritual………..

Let us be ready to show
that this is the highest
word that any language
can invent.”
(Complete works:Vol III,
Page 368)

हिन्दू राष्ट्र—

हिन्दू,हिन्दू धर्म,इन शब्दों
के साथ हिन्दू राष्ट्र इस शब्द
का भी प्रयोग स्वामी जी ने
अनेकों बार किया है।

अपने एक भाषण में वे कहते हैं,
“So long as they
(Hindus) forgot
the past,the Hindu
Nation remained
in a state of Stupor…….
…The more the Hindus
study the past,more
glorious will be their
future;
and whoever tries to
bring the past to the
door of everyone,is a
great benefactor to his
Nation.”
(Complete works,Vol IV,
Page 329)

और एक भाषण में वे कहते हैं-
हमारी आत्मा हमारे धर्म में है,
उस आत्मा का कोई विनाश
नहीं कर सका।

अत: यह हिन्दू राष्ट्र अभी भी
जीवित है…

“Because no one was
able to destroy, therefore
the Hindu Nation is still living.”
(Complete works: Vol IV, Page 157)

मद्रास(आज का चेन्नई) में
‘रंॅीङ्मा कल्ल्रिं’ इस विषय
पर बोलते हुये उन्होंने कहा-
The sages of India
have been almost
innumerable;
for what has the Hindu
Nation be doing for
thousands of years
except producing
sages ?
(Complete works:
Vol III,Page 248)

आज कल अपने देश मे राष्ट्र
और राज्य इन दो अवधारणाओं
के संबंध में भ्रांतियां नजर आती
हैं।

वस्तुत: राज्य एक राजनीतिक
व्यवस्था है,,
ऐसी व्यवस्था कि जो कानून
द्वारा और कानून के बल पर
चलती है।

उस कानून के पीछे दण्डशक्ति
खड़ी होती है।

राज्य आवश्यक है,इसमें संशय
नहीं,किन्तु राज्य अलग है राष्ट्र
अलग है।

राष्ट्र यानी लोग होते है जो अपने
देश को मातृभूमि मानते हैं,वन्दे
मातरम् कहते हुए जिनका सीना
अभिमान से फूलता है,जिनको
अपने पूर्वज और अपना
इतिहास फिर वह विजय
का हो या पराजय का हो,
अपना लगता है,
और सब से प्रधान बात यह है
कि जिनका अच्छा-बुरा नापने
के मापदण्ड समान होते हैं,
यानी जिनकी मूल्यधारणा
समान होती है,उनका राष्ट्र
बनता है।

यह मूल्यधारणा यानि
संस्कृति होती है।

ऐसे कौन से लोग हैं जिनके
मन में उपरि निर्दिष्ट भावनाओं
का अस्तित्व है ?

उनका नाम हिन्दू है।
इसलिये यह हिन्दू राष्ट्र है।

राष्ट्र और राज्य इन
अवधारणाओं के मौलिक
भेद की अनदेखी कर,कई
लोग बोल जाते हैं कि 15
अगस्त 1947 को नया राष्ट्र
बना।

वस्तुत:, उस दिन नये राज्य
का आविर्भाव हुआ राष्ट्र
तो अति प्राचीन काल से
विद्यमान है।

परावर्तन—

इस राष्ट्र का हिन्दू मुख्य
प्रवाह है।
उन हिन्दुओं को हिम्मत
के साथ खड़ा होना चाहिये,
विस्तार की आकांक्षा रखनी
चाहिये और जगद्गुरु का पद
प्राप्त करना चाहिये,ऐसी स्वामी
जी की इच्छा थी।

किसी भी कारण से हो स्वधर्म
छोड़कर अन्य मत-पंथों में गये
लोगों को फिर से हिन्दू धर्म
में लाएं यह प्रश्न पूछे जाने पर
उन्होंने कहा था अवश्य लाना
चाहिए।

कुछ समय स्वामी जी स्तब्ध
रहे और फिर उन्होंने कहा ऐसा
हुआ नहीं तो हमारी संख्या कम
होगी।

परधर्म में गए लोगों को वापस
लाने की हमारी मानसिकता
चाहिए और उस दिशा में पहल
चाहिये।

पुरुषार्थ संपन्न बनें—

विवेकानंद जी ने समग्र
हिन्दू समाज की एकता
को अधोरेखित कर,अनेक
बार कहा है कि समाज के
हर व्यक्ति को पुरुषार्थ के
साथ खड़ा होना चाहिये।

अरे भाई, दिन-रात जयकार
कर यही प्रार्थना कर कि,हे
जगतजननी,मुझे पुरुषार्थ
का दान दे,
हे शक्तिदेव,मेरी दुर्बलता
का विलय कर,मेरी क्लीबता
नष्ट कर,मुझे पौरुष संपन्न कर’।
–#साभारआलेखश्रीमदनगोपाल_वैद्य,,,,

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,,

सदा सर्वदा सुमंगल,,
हर हर महादेव,,
वंदेभारतमातरम,,,
जय भवानी,,,
जय श्री राम,,,,

Vijay krishna pandey

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स्वामी विवेकानंद के ये 10… अगली कहानी
नरेंद्र के इन्हीं गुणों ने बनाया था उन्हें स्वामी विवेकानंद

प्रत्येक व्यक्ति के भीतर कोई न कोई गुण अथवा प्रतिभा अवश्य होती है। बस, आवश्यकता है तो अपने गुणों को तराश कर उन्हें सही दिशा देने की, साथ ही अपनी बुराइयों पर स्वयं ही विजय प्राप्त कर कोई भी अपने को आम से खास बना सकता है। स्वामी विवेकानंद के भीतर छिपे गुण व ज्ञान पिपासा ने ही उन्हें नरेन्द्र से विवेकानंद बनाया। वे बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे तथा रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य में उनकी प्रतिभा को विकसित होने का समुचित अवसर भी मिला। नरेन्द्र को विवेकानंद बनाने वाले प्रमुख गुणों को जानें इस लेख से –

नरेंद्र के इन्हीं गुणों ने बनाया था उन्हें स्वामी विवेकानंद

विज्ञान और दार्शनिक विचारधारा ने विवेकानंद के हृदय में एक विचित्र स्थिति को जन्म दे दिया। सामाजिक संस्कार और तर्क का मन्थन उन्हें उद्वेलित करने लगे। उनकी इस मन:स्थिति को समझ पाना कठिन था। विभिन्न पाश्चात्य चिन्तकों की विचारधाराओं के अध्ययन से वह सत्य को जानने के लिए व्याकुल हो उठे। उनके मानस में प्रतिपल यही द्वन्द्व चलता रहता था कि इस रूपात्मक विश्व की संचालिका कोई अलौकिक शक्ति है अथवा नहीं। मानव जीवन का लक्ष्य क्या है? अत: वह साहित्य, विज्ञान, इतिहास आदि के अध्ययन के साथ ही इन प्रश्नों का समाधन पाने के लिए भी चिन्तित रहते थे।

यदा-कदा कोई धर्म संबंधी सभा होती और वहां कोई धर्म या ईश्वर पर व्याख्यान देता तो नरेन्द्रनाथ उससे पूछ बैठते, क्या आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं? ऐसे विचित्र प्रश्न सुनकर वह व्यक्ति नरेन्द्रनाथ की ओर देखने लगता। ऐसे में वह पुन: अपना प्रश्न दोहराते। वह व्यक्ति इस प्रश्न का समाधान विभिन्न प्रकार के तर्कों और दृष्टान्तों से करने का प्रयत्न करता, किन्तु इससे नरेन्द्र की जिज्ञासा शान्त न हो पाती। उन्होंने अनुभव किया कि इस प्रकार के सभी धर्म प्रचारक केवल वाणी के पंडित होते हैं, जो केवल खंडन-मंडन पर विश्वास करते हैं। दूसरे धर्मों के दोष ढूंढना ही उनका कार्य होता है। ऐसे प्रचारक भला नरेन्द्रनाथ की ज्ञान पिपासा को क्या शान्त करते। वह समझ गए थे कि ऐसे प्रचारकों से कोई आशा करना बालू से तेल निकालने के समान है। नरेन्द्रनाथ की इसी ज्ञान पिपासा ने उन्हें विवेकानंद बनाया। नरेन्द्रनाथ से विवेकानंद बनने की उनकी यात्रा में उनके विशिष्ट गुणों व प्रतिभा का विशेष योगदान रहा है।

महान राष्ट्र निर्माता

स्वामी विवेकानंद की प्रतिभा सर्वोत्तमुखी थी। ये योगी, तत्त्वदर्शी, गुरु, नेता, ज्ञानी, धर्मप्रचारक और एक महान राष्ट्र निर्माता थे। इन्होंने पाश्चात्य देशों में वहां के निवासियों के समक्ष भारतीय धर्म का खजाना खोलकर देश का सिर ऊंचा किया।

विश्व गुरु बनें

स्वामी विवेकानंद का स्पष्ट मत था कि ‘केवल सर्वधर्म समभाव से मानवता का कल्याण हो सकता है।’ वे धर्म को केवल संप्रदायवाद या कर्मकांड तक ही सीमित नहीं मानते थे। उनके अनुसार- ‘धर्म सत्य का अनुसंधान करने वाली एक संस्था है।’

दयालु और स्नेही

स्वामी विवेकानंद बाल्यकाल से ही दयालु व स्नेही थे। दीन-दुखियों के कष्ट उन्हें द्रवित कर देते थे। साधु-संतों को देखते ही उनके भीतर सेवा-भाव उमड़ आता। घर में सब उन्हें प्यार से नरेंद्र कहते थे। साधुओं को जिस वस्तु की आवश्यकता होती नरेंद्र वह उसी क्षण घर से ले आता। सर्दियों के दिन थे, एक साधु ने आकर गर्म वस्त्र मांगा तो नरेंद्र भीतर से पिता का रेशमी दुपट्टा ले आया। साधु प्रसन्न हो आशीर्वाद दे कर लौट गया। नरेंद्र की बढ़ती दानशीलता से दुखी होकर उसे घर की दूसरी मंजिल पर रखा जाने लगा ताकि वह याचकों को मुंहमांगा दान न दे सके।

अगले दिन द्वार पर कुछ साधु आए और भिक्षा मांगने लगे। घर की नौकरानी ने अन्न देकर द्वार बंद कर लिए। नरेंद्र ने ऊपरी मंजिल से साधुओं को देखा जिनके तन पर पूरे वस्त्र भी नहीं थे उन्होंने उसी क्षण खूंटी पर टंगे पिता के वस्त्र उतारे और बाहर फेंक दिए। इस घटना की चर्चा पिता तक पहुंची तो नरेंद्र की पेशी हुई। बालक ने विनम्र भाव से कहा- ‘पिताजी! आपने ही तो सिखाया है कि दीनों की सहायता करो। फिर यदि मैं सहायता करता हूं तो परिवारजन मुझे रोकते क्यों हैं? क्या कथनी और करनी में अंतर होता है।’
पिता जी निरुत्तर हो गए परंतु कहना न होगा कि उस दिन से नरेंद्र के ऊपर लगे बंधन हटा दिए गए।

विलक्षण प्रतिभा के धनी

नरेंद्र ‘ईश्वरचंद्र विद्यासागर विद्यालय’ का छात्र था। एक दिन कक्षा में वह पीछे बैठे छात्रों से वार्तालाप में व्यस्त था। अध्यापक ने उसी समय पढ़ाए गए पाठ के कुछ प्रश्नों के उत्तर उससे पूछ लिए। नरेंद्र ने बड़ी सहजता से प्रश्नों के उत्तर दे दिए। तब अध्यापक ने कहा- जो लड़के बातें कर रहे थे, वे सब खड़े हो जाएं। नरेंद्र भी खड़ा होने लगा तो वे बोले- तुम तो पाठ सुन रहे थे। तुमने प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं, तुम बैठे रहो। नरेंद्र ने कहा- जी नहीं! मैं भी बातें कर रहा था इसलिए सजा मुझे भी मिलनी चाहिए।

अध्यापक ने आश्चर्य से कहा- तुम तो मेरा पाठ सुन रहे थे। नरेंद्र ने उनके विस्मय को देख कर उत्तर दिया- ‘श्रीमान! मैं यह दोनों काम एक साथ कर रहा था। यदि पूरा ध्यान लगाया जाए तो भिन्न प्रकृति के काम भी एक साथ हो सकते हैं।’ पूरी कक्षा और अध्यापक महोदय नरेंद्र के उत्तर को सुन मुग्ध हो उठे।
एंट्रेस में आते-आते नरेंद्र बंगला व अंग्रेजी साहित्य की अनेक पुस्तकें पढ़ चुका था। जब परीक्षाएं सिर पर आईं तो उसे पता चला कि वह ज्यामिती शास्त्र में कमजोर है। नरेंद्र ने निश्चय किया कि वह ज्यामिति का पाठ्यक्रम पूरा किए बिना उठेगा नहीं। उसने पूरी रात तन्मयता से पढ़ाई की और संबंधित विषय की चार पुस्तकें तैयार कर लीं। परीक्षा में नरेंद्र ने प्रथम स्थान पाया। यह असामान्य प्रतिभा नहीं तो और क्या थी?

स्वाभिमानी संन्यासी

नरेंद्र अपनी युवावस्था में स्वामी विवेकानंद कहलाने लगे। स्वामी विवेकानंद भारत-भ्रमण पर निकले। गुजरात यात्रा में एक भक्त ने उन्हें द्वितीय श्रेणी का रेल टिकट खरीद दिया। उसी डिब्बे में कुछ अंग्रेज यात्री भी बैठे थे। स्वामी जी का गेरुआ वस्त्र देख उन्होंने अंग्रेजी भाषा में टिप्पणियां शुरू कर दीं।

पहला यात्री बोला- जाने कहां-कहां से भिखमंगे गाड़ी में आ जाते हैं?

दूसरे यात्री ने कहा- इन्हीं साधुओं ने पूरे भारत को अंधविश्वासों और पाखंडों में जकड़ रखा है। तभी तो ये मूर्ख हमारे गुलाम हैं।

तीसरा यात्री बोला- जंगलियों का देश है, लोग भी जंगली हैं। इन अनपढ़ साधु-संतों को कोई काम-धंधा तो है नहीं, बस मुफ्त की रोटी और मौज-मस्ती, यही इनका जीवन है।

स्वामी जी चुपचाप सब कुछ सुनते रहे। गाड़ी स्टेशन पर रुकी तो वहां से स्टेशन मास्टर गुजरे। स्वामी जी ने उनसे अंग्रेजी में पानी का प्रबंध करने का आग्रह किया। स्टेशन मास्टर इस अद्वितीय व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ। तत्क्षण पानी की व्यवस्था हो गई। वह गाड़ी चलने तक स्वामी जी से वार्तालाप करता रहा। गाड़ी चलने पर उसने प्रणाम किया। सहयोगी यात्री स्वामी जी के धारा प्रवाह अंग्रेजी वार्तालाप और विद्वता को देख स्मित हो उठे। जिसे वे एक अनपढ़ साधु समझकर छींटाकशी कर रहे थे वह इतना विद्वान निकला। एक यात्री ने साहस कर पूछ ही लिया- आप हमारी सारी बातें समझ रहे थे फिर भी आपको क्रोध नहीं आया? स्वामी जी ने सहज भाव से उत्तर दिया-

‘मित्रों! मेरे साथ तो ऐसा होता ही रहता है। मूर्खों से मेरा पाला पड़ता ही रहता है।’ उत्तर सुन कर उन यात्रियों पर घड़ों पानी पड़ गया और उन्होंने सिर झुका लिया।

सामाजिक भेदभाव से परे

स्वामी विवेकानंद वृंदावन की यात्रा पर थे। गेरुए वस्त्र, हाथ में कमंडल और पुस्तकें, जहां थकते, वहां रुककर विश्राम कर लेते। कोई दयालु कुछ खाने को दे देता तो भोजन कर लेते। एक दिन चलते-चलते थक गए तो सड़क के किनारे बैठे व्यक्ति को चिलम पीते देखा। उससे चिलम लेने के लिए आगे बढ़े तो वह सकुचा कर पीछे हट गया- नहीं महाराज! मैं तो अछूत हूं- आप मेरी चिलम कैसे पीएंगे?

पारंपरिक संस्कारों के कारण स्वामी जी भी दो कदम पीछे हटे और अपने पथ पर चल पड़े। तभी उनके मस्तिस्क में विचार आया- यह मैं क्या कर रहा हूं? मैं तो संन्यासी हूं और संन्यासी मान-मर्यादा, छुआ-छूत और सभी भेद-भावों से परे होता है। मैं मेहतर के हाथ की चिलम क्यों नहीं पी सकता? उसमें और मुझमें क्या भेद है? एक ही ईश्वर ने हमारी रचना की है। हम एक ही पिता के पुत्र हैं।
यह विचार मस्तिष्क में आते ही स्वामी जी लौटे और उस मेहतर से कहा- भाई! मैं तुम्हारी चिलम पीना चाहता हूं।

मेहतर चिलम देने को तैयार नहीं था। भला वह जूठी चिलम एक साधु को कैसे दे सकता था परंतु स्वामी जी ने उसकी एक न मानी और चिलम के दो कश लगा कर ही आगे की यात्रा आरंभ की। इस घटना के बाद वह जाति-पांति और भेदभाव को भूल गए। उनके लिए छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब सब एक समान बन गए। इसी भावना के वशीभूत होकर वे अपने अलवर प्रवास के दौरान राजमहल के शाही पकवान त्याग कर एक गरीब वृद्धा के घर भोजन करने जा पहुंचे और उन मोटी रोटियों को स्वाद से खाते हुए अपने शिष्यों से कहा था- ‘देखो! इन मोटी चपातियों में कैसी सात्विकता छिपी है। मां का वात्सल्य ही तो अपनी थाती है, देश का गौरव है।’

नारियों के प्रति दिल में सम्मान

स्वामी विवेकानंद नारी जाति को बहुत आदर की दृष्टि से देखते थे। उनके जीवनकाल में अनेक देसी-विदेशी स्त्रियां उनके वचनों से प्रभावित हुर्इं और उनकी शिष्याएं कहलार्इं। स्वामी जी ने विदेशी महिलाओं के सम्मुख भारत की गरिमा और महानता का ऐसा खाका खींचा कि वह आजीवन यहीं की होकर रह गर्इं। एक बार वे ‘मादाम काल’ और ‘कुमारी मैक्लीउड’ के साथ मिस्र भ्रमण पर थे। बातचीत करते-करते वे सब ऐसे स्थान पर पहुंच गए जहां वेश्याएं रहती थीं। यहां आधे-अधूरे वस्त्रों में महिलाएं खिड़कियों से झांक रही थीं और बेंचों पर बैठी थीं। यह देखकर मादाम काल सक-पका गर्इं और स्वामी जी से लौटने का अनुरोध किया। बेंच वाली महिलाएं इस भगवा वस्त्र वाले साधु को देख खिलखिला रही थीं और भद्दे-भद्दे इशारे कर रही थीं।

स्वामी जी उन्हीं के पास जा पहुंचे और दुखी स्वर में बोले- ‘जरा देखो तो सही, रूप की उपासना में इन अभागिनों ने ईश्वर को भी भुला दिया परंतु वह इनको नहीं भूला।’ स्वामी जी की आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे। उन स्त्रियों के अध:पतन को देख वे विचलित हो उठे थे। उन स्त्रियों में से कुछ ने लज्जित हो कर प्रणाम किया और कुछ ने लज्जा व ग्लानि से अपना मुख ढक लिया। पहली बार किसी पुरुष ने उनकी देह की बजाय हृदय को छू लिया था।

(साभार – साधना पथ)

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एक बार स्वामी विवेकानंद रेल में यात्रा कर रहे थे। वह जिस कोच में बैठे थे, उसी कोच में एक महिला भी अपने बच्चे के साथ यात्रा कर रही थी। एक स्टेशन पर दो अंग्रेज अफसर उस कोच में चढ़े और महिला के सामने वाली सीट पर आकर बैठ गए। कुछ देर बाद दोनों अंग्रेज अफसर उस महिला पर अभद्र टिप्पणियां करने लगे। वह महिला अंग्रेजी नहीं समझती थी तो चुप रही। उन दिनों भारत अंग्रेजों का गुलाम था। अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति दुर्व्यवहार आम बात थी।

धीरे-धीरे दोनों अंग्रेज महिला को परेशान करने पर उतर आए। कभी उसके बच्चे का कान उमेठ देते, तो कभी उसके गाल पर चुटकी काट लेते। परेशान होकर उस महिला ने अगला स्टेशन आने पर एक दूसरे कोच में बैठे पुलिस के भारतीय सिपाही से शिकायत की। शिकायत पर वह सिपाही उस कोच में आया भी लेकिन अंग्रेजों को देखकर वह बिना कुछ कहे ही वापस चला गया। रेल के फिर से चलने पर दोनों अंग्रेज अफसरों ने अपनी हरकतें फिर से शुरू कर दीं। विवेकानंद काफी देर से यह सब देख-सुन रहे थे। वह समझ गए थे कि ये अंग्रेज इस तरह नहीं मानेंगे। वह अपने स्थान से उठे और जाकर उन अंग्रेजों के सामने खड़े हो गए।

उनकी सुगठित काया देखकर अंग्रेज सहम गए। पहले तो विवेकानंद ने उन दोनों की आंखों में घूरकर देखा। फिर अपने दायें हाथ के कुरते की आस्तीन ऊपर चढ़ा ली और हाथ मोड़कर उन्हें अपने बाजुओं की सुडौल और कसी हुए मांसपेशियां दिखाईं। विवेकानंद के रवैये से दोनों अंग्रेज अफसर डर गए और अगले स्टेशन पर वह दूसरे कोच में जाकर बैठ गए। बाद में विवेकानंद ने अपने एक प्रवचन में यही घटना सुनाते हुए कहा कि जुल्म को जितना सहेंगे, वह उतना ही मजबूत होगा। अत्याचार के खिलाफ तुरंत आवाज उठानी चाहिए।

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[12/01, 12:06 p.m.] संस्कृति ईबुक्स: एक बार स्वामी विवेकानंद रेल में यात्रा कर रहे थे। वह जिस कोच में बैठे थे, उसी कोच में एक महिला भी अपने बच्चे के साथ यात्रा कर रही थी। एक स्टेशन पर दो अंग्रेज अफसर उस कोच में चढ़े और महिला के सामने वाली सीट पर आकर बैठ गए। कुछ देर बाद दोनों अंग्रेज अफसर उस महिला पर अभद्र टिप्पणियां करने लगे। वह महिला अंग्रेजी नहीं समझती थी तो चुप रही। उन दिनों भारत अंग्रेजों का गुलाम था। अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति दुर्व्यवहार आम बात थी।

धीरे-धीरे दोनों अंग्रेज महिला को परेशान करने पर उतर आए। कभी उसके बच्चे का कान उमेठ देते, तो कभी उसके गाल पर चुटकी काट लेते। परेशान होकर उस महिला ने अगला स्टेशन आने पर एक दूसरे कोच में बैठे पुलिस के भारतीय सिपाही से शिकायत की। शिकायत पर वह सिपाही उस कोच में आया भी लेकिन अंग्रेजों को देखकर वह बिना कुछ कहे ही वापस चला गया। रेल के फिर से चलने पर दोनों अंग्रेज अफसरों ने अपनी हरकतें फिर से शुरू कर दीं। विवेकानंद काफी देर से यह सब देख-सुन रहे थे। वह समझ गए थे कि ये अंग्रेज इस तरह नहीं मानेंगे। वह अपने स्थान से उठे और जाकर उन अंग्रेजों के सामने खड़े हो गए।
[12/01, 12:08 p.m.] संस्कृति ईबुक्स: स्वामी विवेकानंद एक बार एक रेलवे स्टेशन पर बैठे थे उनका अयाचक (ऐसा व्रत जिसमें किसी से मांग कर भोजन नहीं किया जाता) व्रत था। वह व्रत में किसी से कुछ मांग भी नहीं सकते थे। एक व्यक्ति उन्हें चिढ़ाने के लहजे से उनके सामने खाना खा रहा था।

स्वामी जी दो दिन से भूखे थे और वह व्यक्ति कई तरह के पकवान खा रहा था और बोलता जा रहा था कि बहुत बढ़िया मिठाई है। विवेकानंद ध्यान की स्थिति में थें और अपने गुरुदेव को याद कर रहे थे।

वह मन ही मन में बोल रहे थे कि गुरुदेव आपने जाे सीख दी है उससे अभी भी मेरे मन में कोई दुख नहीं है। ऐसा कहते विवेकानंद शांत बैठे थे। दोपहर का समय था। उसी नगर में एक सेठ को भगवान राम ने दर्शन दिए और कहा कि रेलवे स्टेशन पर मेरा भक्त एक संत आया है उसे भोजन करा कर आओ उसका अयाचक व्रत है जिसमें किसी से कुछ मांग कर खाना नहीं खाया जाता है तो आप जाओ और भोजन करा कर आओ।

सेठ ने सोचा यह महज कल्पना है। दोपहर का समय था सेठ फिर से करवट बदल कर सो गया। भगवान ने दाेबारा दर्शन दिए और सेठ से कहा कि तुम मेरा व्रत रखते और तुम मेरा इतना सा भी काम नहीं करोगे। जाओ और संत को भोजन करा कर आओ।

तब सेठ सीधा विवेकानंद के पास पहुंच गया और वह उनसे बोला कि मेें आपके लिए भोजन लाया हूं। सेठ बोला में आपको प्रणाम करना चाहता हूं कि ईश्वर ने मुझे सपने में कभी दर्शन नहीं दिए आपके कारण मुझे रामजी के दर्शन सपने में हो गए इसलिए में आपको प्रणाम कर रहा हूं।
विवेकानंद की आंख में आंसू आ गए। कि मैनें याद तो मेरे गुरुदेव को किया था। गुरुदेव और ईश्वर की कैसी महिमा है। स्वामी विवेकानंद की आंख के आंसू रुक नहीं रहे थे। तब उन्हें लगा कि गुरु ही ईश्वर हैं।
संक्षेप में
गुरु का स्थान ईश्वर से बड़ा होता है क्यों कि ईश्वर भी भगवान राम और कृष्ण अवतार में गुरु की शरण में गए हैं।
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धर्म शब्द ‘धृ धारणपोषणयोः ’ इस धातु से औणादिक मन् प्रत्यय करने से सिध्द होता है। सुख प्राप्ति के लिए जिसको धारण किया जाये या जिसका सेवन किया जाये, उसे धर्म कहते हैं। अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि किसको धारण किया जाये? वह क्या हैं? इसका उत्तर देते हुए मनुमहाराज कहते हैं कि धर्म के दश लक्षण हैं, जो इस प्रकार हैं-
धृतिक्षमादमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः।
धीर्विद्यासत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।।
धृति: धृति अर्थात् धैर्य को धारण करना। बड़ी से बड़ी आपत्ति आने पर, अपने आप में धैर्य को बनाये रखना चाहिए।
क्षमा: क्षमा करने के सामथ्र्य को धारण करना। जैसे कोई जीव निर्बल है, उससे कोई गलती होने पर उसे माफ (क्षमा) कर देना ही क्षमा है।
दम: दमन करना अर्थात् रोकना। इन्द्रियाॅं अपने विषयों में बार-बार चली जाती है। आॅंख अच्छा रूप देखना चाहती है परन्तु विषय वस्तुओं में लिप्त हो जाती हैं। इनको रोकना ही दम है।
अस्तेय: चोरी न करना ही अस्तेय है। कोई भी तुच्छ से तुच्छ वस्तु को बिना स्वामी की आज्ञा से हाथ न लगाना अस्तेय कहाता है।
शौच: शुचिता अर्थात् पवित्रता एवं स्वच्छतापूर्वक रहने को शौच कहते है। शुचि रहने से मनुष्य परम शान्ति का अनुभव करता है।
इन्द्रियनिग्रह: इन्द्रियनिग्रह का तात्पर्य यह है कि अपनी इन्द्रियों को अपने नियन्त्रण में रखना। हम कोई भी आकर्षक चीज देखते हैं तो उसे प्राप्त करने के लिए हम अपनी इन्द्रियों के अधीन हो जाते हैं। इसी आकर्षण से बचने का नाम ही इन्द्रियनिग्रह है।
धी: अच्छी मति (बुध्दि) को धी कहते हैं। हमारे शरीर का मुख्य भाग बुध्दि है। वह बुध्दि अच्छी हो, पापाचार से अयुक्त हो तो सम्पूर्ण कार्य अच्छे होते हैं। इसलिए गायत्री मन्त्र में परमपिता परमेश्वर से
‘‘धियो योः न प्रचोदयात्’’ की प्रार्थना करते है।
विद्या: विद्या अर्थात् सत्य ज्ञान को पाकर, मानव अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त होता है। विद्या के वास्तविक स्वरूप को दर्शाते हुए कहा गया है कि
‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’ विद्या वही जो अमृतत्व को प्राप्त कराये।
सत्य: वास्तविकता को सत्य कहते हैं। अर्थात् जो पदार्थ जैसा है उसे वैसा ही मानना, कहना, जानना और उसके अनुरूप कार्य करना ही सत्य है। किसी ने कह दिया और उसे हम सत्य मान ले, तो यह न्यायोचित नहीं है। स्वामी दयानन्द सरस्वती जी लिखते है कि जो प्रत्यक्षादि आठ प्रमाणों से युक्त और पाॅंच प्रकार की परीक्षाओं की कसौटी पर तुला हुआ हो, वही सत्य है।
अक्रोध: ‘‘क्रोधो अमर्षा’’ अर्थात् सहन न करने को क्रोध कहते है। किसी ने कुछ अपशब्द कह दिये तो उसे सहन न करना ही क्रोध है। क्रोध मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। जब हम क्रोध में वशी भूत होकर धर्माधर्म में अन्तर नहीं समझते तब अधर्मयुक्त कुकृत्यों को कर बैठतें है।
ऋषिवर देव दयानन्द जी महाराज धर्म के स्वरूप को दर्शाते हुए आर्योदेश्य रत्नमाला में लिखते हैं कि-जिसका स्वरूप ईश्वर की आज्ञा का यथावत पालन पक्षपात रहित न्याय व सर्वहित करना है, जो कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सुपरीक्षित और वेदोक्त होने से सब मनुष्यों के लिए एक और मानने योग्य है, उसे धर्म कहते हैं।
न लिंगधर्मकारणम्-संसार में विभिन्न मतवालों ने अपने-अपने धर्म के नाम पर विभिन्न चिह्न बना रखे हैं। जैसे कोई केश बढ़ा रहा है, कोई लम्बी दाढ़ी बढ़ाये हुए है, कोई्र केश व दाढ़ी दोनों बढ़ाये हुए है, कोई पांच शिखाएं रखे हुए है, कोई मूंछ कटाकर दाढ़ी बढ़ा रहा है और कोई चन्दन का तिलक लगा रहा है, कोई माथे को अनेक रेखाओं से अंकित किये हुए है और हाथों पर भी चिह्न बनाये हुए है, किन्तु ये सभी धर्म से कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखते हैं। अत एव बाह्यचिह्नों को धर्म नहीं माना गया हैं।
धर्म को धारण करने से ही लौकिक तथा पारलौकिक सुख की प्राप्ति होती है। हमें जानना चाहिए कि सुख-दुःख क्या हैं? सुख और दुःख संस्कृत भाषा के शब्द हैं-
‘सु=शोभनं खेभ्यः=इन्द्रियेभ्यः’ अर्थात् जो इन्द्रियों को अच्छा लगे उसे सुख कहते हैं। और दूर्=दुष्ठु=अशोभनं खेभ्यः=इन्द्रियेभ्यः अर्थात् जो इन्द्रियों को अच्छा न लगे उसे दुःख कहते हैं।
आत्मा भोक्ता है, उसके भोग का आधार शरीर है, भोग के साधन नेत्रादि इन्द्रियाँ है। इन्द्रियों के अर्थ ही भोक्तव्य हैं, बुध्दि ही भोग है, और फल तथा दुःख का स्वरूप समझाते हुए लिखा हैं-ससाधनं सुखदुःखोपभोगः फलम्। जन्म……सुखसाधनस्य दुःखानुषंगगात् विविधबधनायोगाद् दुःखम्।।
अर्थात् सुख-दुःख के साधनों का बुध्दिविषयत्वापन्न भोग ही फल है। सुख के साधनों का दुःख से सम्पर्क होना ही दुःख हैं। इसी बात को इस प्रकार कह सकते हैं कि-
अनुकूलवेदनीयं सुखं प्रतिकूलवेदनीयं दुःखम्।।
अर्थात् आत्मा के अनुकूलता का ही नाम सुख है और प्रतिकूलता दुःख है। महर्षि मनु ने सुख दुःख की व्याख्या इस प्रकार की है-
सर्वं परवश्ंा दुःखम्, सर्वमात्मवशं सुखम्।।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः।।
सुख दुःख का संक्षेप में यही लक्षण जानना चाहिये अर्थात् दूसरों के अधीन होना ही दुःख है और अपने अधीन रहना ही सुख है।
सुख दुःख का प्रत्यक्ष ज्ञान हमें कैसे होता है। इसकी प्रक्रिया समझाते हुए, न्यायदर्शन में वात्स्यायन भाष्य में लिखा है कि ‘‘आत्मादिषु सुखादिषु च प्रत्यक्षलक्षणं वक्तव्यम्।’’ आत्मादि तथा सुखादि का प्रत्यक्ष कैसे होता है उसका प्रकार समझाते है- जीवात्मा प्रथम मन से सम्पर्क करता है, मन इन्द्रियों से तथा इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों से सम्बध्द होकर प्रत्यक्ष कराती है।
वैशेषिक दर्शनकार कणाद कहते हैं –
‘‘यतोऽभ्युदयनिश्रेयस् बुध्दि: स धर्मः’’ इसलिए धर्म करने से ही मनुष्य का जीवन सार्थक है परन्तु आज सम्पूर्ण विश्व में लोगों को यह नहीं पता कि धर्म क्या होता है? मुस्लिम, इसाई, बौध्द, जैन आदि मत-मतान्तरों को कुछ लोग धर्म मान लेते है और उस पर चलना प्रारम्भ कर देते है वे नहीं जानते कि धर्म क्या है अथवा किसे कहते है? मुस्लिम विचार करता है कि मुस्लिमत्व ही मेरा धर्म है, ईसाई विचार करता है कि कृश्चीयन मेरा धर्म है, हिन्दु विचार करता है कि हिन्दुत्व ही मेरा धर्म है परन्तु ये यह नहीं जानते कि जिसका ये धर्म मानकर अनुष्ठान कर रहे है, वे धर्म नहीं मत-सम्प्रदाय है। वास्तव में जब धर्म का स्वरूप ही भ्रान्त हो जाएगा तो, धर्म का अनुष्ठान सर्वथा व्यर्थ है।
व्यक्ति के अवनति व विनाश के साधनों को जुटाने में जो ऊर्जा शक्ति का अपव्यय होता है, उससे आत्मिक बल और जीवनीय शक्ति का भी क्षय होता हैं। भय और हिंसक प्रवृत्ति बढ़ने लगती हे और निश्चित रूप से विवेक में न्यूनता आती है। उस व्यक्ति में स्वार्थ, लिप्सा और मिथ्याहंकार ज्ञान-चक्षुओं के पट खुलने नहीं देते। इसके दुष्परिणाम तत्काल या कालान्तर में उस व्यक्ति, समाज व राष्ट्र को भुगतने पड़ते हैं। इसलिए जीवन में उन्नति के इच्छुक व्यक्ति को विवेक का विकास निरन्तर करते रहना चाहिए। यही यथार्थ में जीवन का पथ हैंै।
आचार्य चाणक्य ने लिखा है –‘‘सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलमिन्द्रियजयः।’’ अर्थात् सुख का मूल धर्म है और धर्म का मूल है-इन्द्रियों को संयम में रखना। संसार में प्रत्येक मनुष्य की इच्छा होती है कि मैं सुखी रहूँ और सुख की प्राप्ति धर्म के बिना नहीं हो सकती। अतः धर्म का आचरण अवश्य ही करना चाहिये। बिना धर्म को अपनाये कोई भी मनुष्य सुखी नहीं हो सकता है। इसीलिए वर्तमान में तथाकथित जो धर्म है, उसे स्वीकार न कर सर्वहितार्थ जो धर्म का स्वरूप यहाॅं बताया है, उसे ही धारण करना चाहिए। इसी से दुःख की निवृत्ति और सुख की प्राप्ति हो सकेगी। धर्म को धारण करने से सुख ही नहीं प्राप्त होगा अपितु भावी जन्म में भी सहायक होगा।
संसार की कोई भी वस्तु सुख का हेतु हो सकती है परन्तु मरणोत्तर किसी के साथ नहीं जा सकती। शास्त्रकार कहते हैं-
‘धर्म एकोऽनुगच्छति’ अर्थात् एक धर्म ही मरणोत्तर मनुष्य के साथ जाता है। नीतिकार भी कहते है-
धनानि भूमौ, पशवश्च गोष्ठे, नारी गृहे बान्धवाः श्मशाने।
देहश्चितायां परलोकमार्गे, धर्मानुगो गच्छति जीवः एकः।।
अर्थात् भौतिक समस्त धन भूमि में ही गड़ा रह जाता है अथवा आजकल बैंकों में या तिजोरियों में ही धरा रह जाता है और गाय आदि पशु गोशाला में ही बन्धे रह जाते हैं । पत्नी घर के द्वार तक ही साथ जाती है और परिवार के भाई-बन्धु व मित्रजन श्मशान तक ही साथ देते है एक मनुष्य का शुभाशुभ कर्म ;धर्मद्ध ही परलोक में मनुष्य का साथ देता है अर्थात् धर्म के अनुसार ही मनुष्य को परलोक में अच्छी-बुरी योनियों में जाना पड़ता है।
यतो धर्मस्ततो जयः गीता के इस श्लोक से इस बात की पुष्टि होती है कि धर्म सदैव विजयी होता है। चाहे अधर्मी कितना ही बलवान् हो उसकी हार अवश्य होती है लोक में भी यह देखा जाता है कि अधर्मी की हार का कारण अधर्म ही बन जाता है। मनुस्मृति में भी सत्य ही कहा गया है-
अधर्मेणैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति।
ततो सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति।।
अर्थात् अधर्माचरण करने से व्यक्ति धन-सम्पदा बढ़ने से बढ़ता हुआ दिखाई देता है, तत्पश्चात् भद्र भी देखता है अर्थात् भौतिक साधनों की समृध्दि होने से बड़े-बड़े महल, कोठियाँ बना लेता हे, अपने विरोधियों पर येन-केन विजय प्राप्त कर लेता है। किन्तु अन्त में उसका सर्वनाश हो जाता है। इसलिए हमें इस शाश्वत सत्य पर अवश्य दृढ़ विश्वास करना चाहिये-
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद् धर्मो न हन्तव्यः मा नो धर्मो हतोऽवधीत्।।
जो धर्म को नष्ट करता है, धर्म उसका नाश कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता हैं धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिए अधर्म से प्राप्त लक्ष्मी कभी भी घर में न आने देवंे। अन्यथा ऐसा धन तीसरी पीढ़ी में अवश्य दुष्परिणाम दिखा देता है। लोक में ऐसे उदाहरण अधिकांशतया प्राप्त हो जाते हैं।
निष्कर्ष रूप में धर्म का ज्ञान तथा उसका आचरण मनुष्य के लिए परमावश्यक है। यही हम सब का आधार है। हम सब के परमलक्ष्य का परम सहायक भी यही धर्म है। आओ! हम सब मिलकर धर्म के यथार्थ स्वरूप को जाने तथा धारण कर सुख-सम्पन्नता के मार्ग को प्राप्त हो, मोक्षपथानुगामी हों।

योगेश्वरानंद सरस्वती