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मासूम वैदेही के बलिदान की सत्य ऐतिहासिक गाथा ……………….. 23 फरवरी 1981 का दिन था वह, जब तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में डाॅक्टर नसरुद्दीन कमाल अपने साथियों के साथ एक दलित परिवार को बंधक बनाए हुए थे। घर के सभी लोगों ने इस्लाम कबूल लिया था, घर के लोग ही क्यों लगभग एक हजार दलित धर्मांतरण करके जबरन मुस्लिम बनाए चुके थे। इसलिए मीनाक्षीपुरम का नाम बदलकर रहमतनगर रख दिया गया था। यह दलित गिने चमार के घर की कहानी है। उसकी 8 वर्ष की पोत्री थी वैदेही…वह किसी भी कीमत पर मुस्लिम बनने को तैयार नहीं हुई, ‘‘मै मर जाऊंगी लेकिन कलमा नहीं पढ़ूंगी,’’ उसने अपने दादा से कहा था, ‘‘बाबा आपने ही तो मुझे गायत्री मत्र सिखाया था ना…आपने ही तो बताया था कि यह परमेश्वर की वाणी वेदों का सबसे सुंदर मंत्र है, इससे सब मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं, फिर मैं उन लोगों का कलमा कैसे पढ़ सकती हूं, जिन्होंने मेरे सहपाठियों का कत्ल कर दिया, क्योंकि वे भी मुस्लिम नहीं बनना चाहते थे। हम ऐसे मजहब हो कैसे अपना सकते हैं, जिसे न अपनाने पर कत्ल का भय हो, मुझे तो गायत्री मंत्र प्रिय है जो मुझे निर्भय बनाता है।’’ ”बेटी जीवन रहेगा तो ही धर्म रहेगा ना…जिद छोड दे और कबूल कर ले इस्लाम।” बाबा ने अंतिम प्रयास किया था। उसने बाबा से सवाल किया था, ”बाबा आपने एक दिन बताया था कि गुरु गोबिंद सिंह के दो बच्चे दीवार में जिंदा चिनवा दिए थे, लेकिन उन्होंने इस्लाम नहीं कबूला था, क्या मैं उन सिख भाइयो की छोटी बहन नहीं? जब वे धर्म से नहीं डिगे तो मैं कैसे डिग सकती हूं?” ‘‘दो टके की लौंडी, कलमा पढ़ने से इंकार करती है,’ डाॅक्टर नसरूद्दीन कमाल के साथ खड़े मौलाना नुरूद्दीन खान ने उसके बाल पकड़ते हुए चूल्हे पर गर्म हो रहे पानी के टब में उसका मुंह डूबा दिया था। पानी भभक रहा था, इतना गर्म था कि बनती भाप धुंए के समान नजर आ रही थी। बालिका के चेहरे की चमड़ी निकल गई थी एक बार ही डुबोते, चीख पड़ी थी, ‘‘भगवान मुझे बचा लो?’’ ‘‘तेरा पत्थर का भगवान तुझे बचाने नहीं आएगा, अब तो इस्लाम कबूल ले लड़की, नहीं तो इस बार तुझे इस खोलते पानी में डुबा दिया जाएगा।’’ मौलवी ने कहा था, फिर उसके दादा ने भी कहा, ‘‘कबूल कर ले बेटी इस्लाम, हम भी सब मुसलमान बन चुके, तू जिंदा रहेगी तो तेरे सहारे मेरा भी बुढ़ापा भी कट जाएगा।’’ मौलवी ने चूल्हे के पास से मिर्च पाउडर उठाकर उसकी आंखों में भरते हुए और चेहरे पर मलते हुए कहा, ‘‘दूध के दांत टूटे नहीं, और इस्लाम नहीं कबूलेगी।’’ एक बार फिर तड़प उठी थी वह मासूम, पर इस बार भी यही कह रही थी, ‘‘नहीं मैं इस्लाम नहीं कबूल करूंगी।’’ मौलवी को भी क्रोध आ गया था, इस बार तो उसका सिर जलते हुए चूल्हें में ही दे डाला था। परंतु प्राण त्यागते हुए भी उस बालिका के मुख से यही निकल रहा था, ‘‘मैं इस्लाम नहीं कबूल करूंगी।’’ अंतिम बार डाॅक्टर नसरूद्दीन कमाल की ओर आशा भरी दृष्टि से देखा था, ‘‘मेरा धर्म बचा लो…डाॅक्टर साहब…पत्थर के भगवान नहीं आएंगे, आज से मैंने तुझे भगवान मान लिया…’’ अब उसमें कुछ नहीं रहा था, वह तो मिट्टी बन चुकी थी, डाॅक्टर नसरूद्दीन कमाल भी तो धर्मांतरण करने वाले लोगों की मंडली में ही शामिल था, लेकिन उस बालिका ने पता नहीं उसमें क्या देखा कि विधर्मी से ही धर्म बचाने की गुहार लगा बैठी थी, उस असहाय बालिका का धर्म के प्रति दृढ़ निश्चय देखकर हृदय चीत्कार कर उठा था नसरूद्दीन कमाल का, ‘‘या अल्लाह ऐसे इस्लाम के ठेकेदारों से तो मर जाना अच्छा है।’’ वह घर की ओर भाग लिया था और डाॅक्टर नसरूद्दीन कमाल पूरे दस दिन अपने घर से नहीं निकला, कुछ खाया पीया नहीं, बस उस बालिका का ध्यान बराबर करता और आंखों में आंसू भर आते उसके…गायत्री मंत्र का अर्थ जानने के लिए उसने एक किताब खरीदी, गलती से वह नूरे हकीकत यानी सत्यार्थ प्रकाश थी। उसने उसका गहराई से अध्ययन किया और 11 नवंबर 1981 को एक जनसमूह के सामने विश्व हिन्दू परिषद और आर्य समाज के तत्वावधान में अपने पूरे परिवार के साथ वैदिक धर्म अंगीकार कर लिया। डाॅक्टर नसरूद्दीन ने अब अपना नाम रखा था आचार्य मित्रजीवन, पत्नी का नाम बेगम नुसरत जहां से श्रीमती श्रद्धादेवी और तीन पुत्रियों शमीम, शबनम और शीरीन का नाम क्रमशः आम्रपाली, अर्चना और अपराजिता रखा गया। 15 नवंबर 1981 को आर्य समाज सांताक्रुज, मुंबई में उनका जोरदार स्वागत हुआ, जहां उन्होंने केवल एक ही बात कही, ‘‘मैं वैदेही को तो वापस नहीं ला सकता, लेकिन हिन्दू समाज से मेरी विनती है, मेरी बेटियों को वह अपनाए, वे हिन्दू परिवारों की बहू बनेंगी तो समझूंगा कि उस पाप का प्रायश्चित कर लिया, जो मेरी आंखों के सामने हुआ। हालांकि वह मैंने नहीं किया, लेकिन मैं भी दोषी था, क्योंकि मेरी आंखों के सामने एक मासूम बालिका की निर्मम हत्या कर दी गई।’’ आचार्य मित्रजीवन ने अपना शेष जीवन वेदों के प्रचार-प्रसार में लगा दिया, इसलिए उन्हें आज बहुत से लोग जानते हैं, उनकी पुस्तकें पढ़ते हैं, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि वे जन्म से मुस्लिम थे और यह तो कोई नहीं जानता कि वैदेही कौन थी? वेद वृक्ष की छाया तले, पुस्तक का एक अंश लेखिका फरहाना ताज ———— स्रोत : वैदेही के संदर्भ के लिए देखें 24 फरवरी 1981 इंडियन एक्सप्रेस वैदिक गर्जना, मासिक पत्रिका 1982

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भगवान श्रीनाथजी का प्राकट्य की कथा,,,,,

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों की विनती पर आशीर्वाद दिया, समस्त दैवीय जीवों के कल्याण के लिये कलयुग में मैं ब्रजलोक में श्रीनाथजी के नाम से प्रकट होउंगा । उसी भावना को पूर्ण करने ब्रजलोक में मथुरा के निकट जतीपुरा ग्राम में श्री गोवर्धन पर्वत पर भगवान श्रीनाथजी प्रकट हुये।

प्राकट्य का समय ज्यों ज्यों निकट आया श्रीनाथजी की लीलाएँ शुरु हो गई । आस पास के ब्रजवासियों की गायें घास चरने श्रीगोवेर्धन पर्वत पर जाती उन्हीं में से सद्द् पाण्डे की घूमर नाम की गाय अपना कुछ दूध श्रीनाथजी के लीला स्थल पर अर्पित कर आती। कई समय तक यह् सिलसिला चलता रहा तो ब्रजवासियों को कौतुहल जगा कि आखिर ये क्या लीला है, उन्होंने खोजबीन की, उन्हें श्रीगिरिराज पर्वत पर श्रीनाथजी की उर्ध्व वाम भुजा के दर्शन हुये।

वहीं गौमाताएं अपना दूध चढा आती थी।उन्हें यह् दैवीय चमत्कार लगा और प्रभु की भविष्यवाणी सत्य प्रतीत होती नजर आयी । उन्होंने उर्ध्व भुजा की पुजा आराधना शुरु कर दी। कुछ समय उपरांत संवत् 1535 में वैशाख कृष्ण 11 को गिरिराज पर्वत पर श्रीनाथजी के मुखारविन्द का प्राकट्य हुआ और तदुपरांत सम्पूर्ण स्वरूप का प्राकट्य हुआ। ब्रजवासीगण अपनी श्रद्धानुसार सेवा आराधना करते रहे।

इधर प्रभु की ब्रजलोक में लीलायें चल रही थी, उधर श्रीमहाप्रभुवल्लभाचार्यजी संवत 1549 की फ़ाल्गुन शुक्ल 11 को झारखण्ड की यात्रा पर शुद्वाद्वैत का प्रचार कर रहे थे। श्रीनाथजी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दे आदेश प्रदान किया कि ब्रजलोक में मेरा प्राकट्य हो चुका है, आप यहाँ आयें और मुझे प्रतिष्ठित करें।

श्रीमहाप्रभुवल्लभाचार्यजी प्रभु की लीला से पुर्व में ही अवगत हो चुके थे, वे झारखण्ड की यात्रा बीच में ही छोड मथुरा होते हुये जतीपुरा पहँचे । जतीपुरा में सददू पाण्डे एवं अन्य ब्रजवासियों ने उन्हें देवदमन के श्रीगोवर्धन पर्वत पर प्रकट होने की बात बताई । श्रीमहाप्रभुवल्लभाचार्यजी ने सब ब्रजवासियों बताया की लीला अवतार भगवान श्रीनाथजी का प्राकट्य हुआ है, इस पर सब ब्रजवासी बडे हर्षित हुये।

श्रीमहाप्रभुवल्लभाचार्यजी सभी को साथ ले श्रीगोवर्धन पर्वत पर पहँचे और श्रीनाथजी का भव्य मंदिर निर्माण कराया और ब्रजवासियों को श्रीनाथजी की सेवा आराधना की विधिवत जानकारी प्रदान कर उन्हें श्रीनाथजी की सेवा में नियुक्त किया।

मुगलों के शासन का दौर था, समय अपनी गति से चल रहा था प्रभु को कुछ और लीलाएं करनी थी। दूसरी और उस समय का मुगल सम्राट औरंगजेब हिन्दू आस्थाओं एवं मंदिरों को नष्ट करने पर आमदा था।

मेवाड में प्रभु श्रीनाथजी को अपनी परम भक्त मेवाड राजघराने की राजकुमारी अजबकुँवरबाई को दिये वचन को पूरा करने पधारना था। प्रभु ने लीला रची।

श्री विट्ठलनाथजी के पोत्र श्री दामोदर जी उनके काका श्री गोविन्दजी, श्री बालकृष्णजी व श्रीवल्लभजी ने औरंगजेब के अत्याचारों की बात सुन चिंतित हो श्रीनाथजी को सुरक्षित स्थान पर बिराजमान कराने का निर्णय किया। प्रभु से आज्ञा प्राप्त कर निकल पडे।

प्रभु का रथ भक्तों के साथ चल पडा, मार्ग में पडने वाली सभी रियासतों (आगरा, किशनगढ कोटा, जोधपुर आदि) के राजाओं से, इन्होने प्रभु को अपने राज्य में प्रतिष्ठित कराने का आग्रह किया, कोई भी राजा मुगल सम्राट ओरंगजेब से दुश्मनी लेने का साहस नही कर सके, सभी ने कुछ समय के लिये, स्थायी व्यवस्था होने तक गुप्त रूप से बिराजने कि विनती की, प्रभु की लीला एवं उपयुक्त समय नही आया मानकर सभी प्रभु के साथ आगे निकल पडे।

मेवाड में पधारने पर रथ का पहिया सिंहाड ग्राम (वर्तमान श्रीनाथद्वारा) में आकर धंस गया, बहुतेरे प्रयत्नों के पश्चात भी पहिया नहीं निकाला जा सका, प्रभु की ऎसी ही लीला जान और सभी प्रयत्न निश्फल मान, प्रभु को यहीं बिराजमान कराने का निश्चय किया गया तत्कालीन महाराणा श्री राजसिंह जी ने प्रभु की भव्य अगवानी कर वचन दिया कि मैं पभु को अपने राज्य में पधारता हूँ।

प्रभु के स्वरूप की सुरक्षा की पूर्ण जिम्मेदारी लेता हूँ आप प्रभु को यही बिराजमान करावें संवत १७२८ फाल्गुन कृष्ण ७ को प्रभु श्रीनाथजी वर्तमान मंदिर मे पधारे एवं भव्य पाटोत्सव का मनोरथ हुआ और सिंहाड ग्राम श्रीनाथद्वारा के नाम से प्रसिद्ध हुआ तब से प्रभु श्रीनाथजी के लाखों, करोंडो भक्त प्रतिवर्ष श्रीनाथद्वारा आते हैं एवं अपने आराध्य के दर्शन पा धन्य हो जाते हैं।

श्रीनाथजी के दर्शन : प्रात – १. मंगला २. श्रृंगार ३. ग्वाल ४. राजभोग सायं ५. उत्थापन ६. भोग ७. आरती ८. शयन (शयन के दर्शन आश्विन शुक्ल १० से मार्गशीर्ष शुक्ल ७ तक एवं माघ शुक्ल ५ से रामनवमी तक, शेष समय निज मंदिर के अंदर ही खुलते हैं, भक्तों के दर्शनार्थ नहीं खुलते हैं ।)

।। क्‍लीं कृष्‍णाय गोविन्‍दाय गोपीजनवल्‍लभाय नम: ।।

।। श्री कृष्‍ण शरणम् मम: ।।

संजय गुप्ता

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एक भक्त हुए  है -जयदेव कवि,”गीत गोविन्द” उनका बने हुआ  बहुत सुन्दर संस्कृत ग्रन्थ है।भगवान जगन्नाथ स्वयं उनके “गीत-गोविन्द” को सुनते थे। भक्त  की बात  भगवान ध्यान देकर सुनते है। एक मालिन थी,उसको  “गीत-गोविन्द” का एक पद यद् हो गया। वह बैगन तोड़ती जाती और पद गाती जाती थी | तो ठाकुर जी उसके पीछे-पीछे चलते और पद सुनते।

उन्होंने पूछा-प्रभो!आपके मंदिर में रहते हुए यह वस्त्र कैसे फट गया|” ठाकुर जी बोले-“बैगन के खेत में उलझ कर फट गया |” पुजारी ने पूछा कि “आप बैगन के खेत में क्या कर रहे थे?” ठाकुर जी ने बता दिया, मालिन “गीत गोविन्द” का पद गा रही थी,अत: सुनाने चला गया।

वह चलती तो मै भी उसके पीछे-पीछे डोलता,जिस से कपड़ा फट गया | ऐसे स्वयं भगवान भी सुनते है | भगवान कि कथा सुनाने के अधिकारी भक्त है,ऐसे ही भक्त कि कथा सुनाने के अधिकारी-भगवान होते है | जहा भक्तो की चर्चा होती है भगवान स्वयं आते है।

सूर्योदय होता है तो अंधकार दूर होता है,किन्तु जब वह बाहरी अंधकार होता है,पर जब सत्संग रूपी सूर्योदय होता है तो उससे भीतर में रहने वाला अँधेरा दूर हो जाता है। पाप दूर हो जाते है, संकाए दूर हो जाती है –

राम माया सतगुरु दया,साधू संग जब होय|
तब प्राणी जाने कछु,रह्यो विषय रस भोय ||
भगवान और संतो की जब पूर्ण कृपा होती है तब सत्संगति   मिलती है-
संत बिसुद्ध मिलही परि तेहि | चितवहीँ राम कृपा करी जेही ||

विभीषण जी ने भी कहा है-
अब मोहि भा भरोस हनुमंता|बिनु हरी कृपा मिलही नहि संता ||
“भरा सत्संग का दरिया,नहा लो जिसका जी चाहे,
हजारो रतन बेकिमत भरे आला से आला है;
लगा कर ज्ञान का गोता,निकालो जिसका जी चाहे ||”

सत्संग रूपी दरिया में बहुत बढ़िया बढ़िया रत्न है|इसमें ज्ञान की डुबकी जितनी लगायेंगे उतनी ही विशेष बाते मिलेगी|सुनाने से तो मिलती ही है और सुनाने से भी मिलती है|सुनाने में भी ऐसी-ऐसी बाते विशेष बाते पैदा होती है की बड़ा भारी लाभ होता है |
संत समागम हरी कथा,तुलसी दुर्लभ दोय|
सूत दारा अरु लक्ष्मी,पापी के भी होय||

भगवान की कथा और सत्संग ये दो दुर्लभ वस्तुए है| पुत्र और स्त्री ओत धन तो पापी मनुष्य के प्रारब्धानुसार होते ही है|रावन का भी बहुत बड़ा राज्य था,ये कोई बड़ी बात नहि |बड़ी बात है प्रभु का स्मरण होना,चिंतन होना|संत तो हमेशा ये मांगते है-
राम जी साधू सांगत मोहि दीजिये|
वारी संगत दो  राम जी पलभर भूल  न होय ||
“हे प्रभु! सत्संगति दीजिये,जिससे आपको एक पल के लिए भी न भूलू |”

सत्संग से जो लाभ होता है वह लाभ साधन से नहि होता|साधन कर के जो परमात्म-तत्त्व को प्राप्त करना है,वह कमाकर धनि होने के सामान है|किन्तु सत्संग सुनना तो गोद में जाना है|गोद में जाने से धन स्वत: मिल जाता है | संतो ने कितने वर्ष लगाये होंगे  ? कितना साधन किया होगा?कितनो का संग किया होगा?उस सब का सर आपको एक घंटे के सत्संग में मिल   जाता है |इसलिए जब सत्संग मिले तो जरुर करना चाहिए।

संत समागम करिए भाई,लोह पलट कंचन हो जय।
नाना विधि बन राय कहिजे,भिन्न-भिन्न सब नाम धराई।।

संजय गुप्ता

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हिन्दुओ का लोकप्रिय तीर्थ श्रीनाथजी का नाथद्वारा !!!!!

भारत के मुगलकालीन शासक बाबर से लेकर औरंगजेब तक का इतिहास पुष्टि संग्रदाय के इतिहास के सामानान्तर यात्रा करता रहा। सम्राट अकबर ने पुष्टि संप्रदाय की भावनाओं को स्वीकार किया था। गुसाईं श्री विट्ठलनाथजी के समय सम्राट की बेगम बीबी ताज तो श्रीनाथजी की परम भक्त थी, तथा तानसेन, बीरबल, टोडरमल तक पुष्टि भक्ति मार्ग के उपासक रहे थे।

इसी काल में कईं मुसलमान रसखान, मीर अहमद इत्यादि ब्रज साहित्य और श्रीकृष्ण के भक्त रहे हैं तभी तो भारतेन्दु हरिशचन्द्र ने कहा है- ”इन मुसलमान कवियन पर कोटिक हिन्दु वारिये” किन्तु मुगल शासन के पतनोन्मुखी शासकों में औरंगजेब अत्यन्त क्रूर एवं असहिष्णु था।

धर्म के नाम पर जजिया कर अथवा मृत्युदंड देना उसका सिद्धान्त रहा था। धर्मानुयायियों का धर्म परिवर्तन कराना उसका शोक रहा था। हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां तोड़ने का कठोर आदेश आये दिन दे दिया करता था।

उसकी आज्ञा की आनुपालना करने वाले दुष्ट अनुचर भी हिन्दुओ के सेव्य विग्रहों को खण्डित करने लगे। मूर्तिपूजा के विरोध में इस दुष्ट शासक की वक्र दृष्टि ब्रज में विराजमान श्रीगोवर्धनगिरि पर स्थित श्रीनाथजी पर भी पडी।

महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य के परम अराध्य ब्रजजनों के प्रिय श्रीनाथजी के विग्रह की सुरक्षा करना उनके वंशज गोस्वामी बालकों का प्रथम कर्तव्य था।

इस दृष्टि से श्री विट्‌ठलनाथजी के पौत्र श्री दामोदर जी एवं उनके काका श्री गोविन्द जी, श्री बालकृष्ण जी एवं श्री वल्लभजी ने श्रीनाथजी के विग्रह को लेकर प्रभुआज्ञा से ब्रज छोड़ देना उचित समझा और समस्त धन इत्यादि को वहीं छोड कर एक मात्र श्रीनाथजी को लेकर वि.स. १७२६ आश्विन शुल्का १५ शुक्रवार की रात्रि के पिछले प्रहर रथ में पधराकर ब्रज से प्रस्थान किया।

यह तिथि ज्योतिष गणना से ठीक सिद्ध हुई। ”श्रीनाथजी का स्वरूप ब्रज में १७७ वर्ष तक रहा था। श्रीनाथजी अपने प्राकट्‌य संवत्‌ १५४९ से लेकर सं. १७२६ तक ब्रज में सेवा स्वीकारते रहे।”

”वार्ता साहित्य मे लिखा है श्रीनाथजी जाने के पश्चात्‌ औरंगजेब की सेना मन्दिर को नष्ट करने के लिए गिरिराज पर्वत पर चढ रही थी उस समय मन्दिर की रक्षा के लिए कुछ ब्रजवासी सेवक तैनात थे, उन्होने वीरता पूर्वक आक्रमणकारियों का सामना किया किन्तु वे सब मारे गए।”

उस अवसर पर मन्दिर के दो जलघरियों ने जिस वीरता का परिचय दिया था उसका सांप्रदायिक ढंग से वर्णन वार्ता में हुआ है। कहते है आक्रमणकारियों ने मन्दिर को नष्ट कर वहां एक मस्जिद बनवाई थी। ”म्लेच्छों के विषय व्यवहारों व अत्याचारों के कारण श्रीनाथजी को लेकर मेवाड की ओर प्रस्थान करना पडा।

श्रीजी मेवाड पधारेंगे की भविष्यवाणी श्री गुसांई विट्‌ठलनाथजी ने द्वारिका यात्रा जाते समय मार्ग में वीरभूमि मेवाड के सिहाड़ नामक स्थान को देखकर अपने शिष्य बाबा हरिवंश के सामने कर दी थी कि या स्थल विशेष कोई इक काल पीछे श्रीनाथजी बिराजेंगे।”

उधर गोवर्धन से श्रीनाथजी के विग्रह को ले रथ के साथ सभी आगरे की ओर चल पडे़। बूढ़े बाबा महादेव आगे प्रकाश करते हुए चल रहें थे ।आगरा हवेली में अज्ञात रूप से पहुँचे। यहां से कार्तिक शुक्ला २ को पुनः लक्ष्य विहीन यात्रा पर चले।

श्रीनाथजी के साथ रथ में परम भक्त गंगाबाई रहती थी। तीनों भाईयों में एक श्री वल्लभजी डेरा (तम्बू) लेकर आगामी निवास की व्यवस्था हेतु चलते साथ में रसोइया, बाल भोगिया, जलधरिया भी रहते थे। श्री गोविन्द जी श्रीनाथजी के साथ रथ के आगे घोड़ें पर चलते और श्रीबालकृष्णजी रथ के पीछे चलते।

बहू-बेटी परिवार दूसरे रथ में पीछे चलते थे। सभी परिवार मिलकर श्रीनाथजी के लिए सामग्री बनाते व भोग धराते। मार्ग में संक्षिप्त अष्टयाम सेवा चलती रही। आगरा से चलकर ग्वालियर राज्य में चंबल नदी के तटवर्ती दंडोतीधार नामक स्थान पर मुकाम किया वहां कृष्णपुरी में श्रीनाथजी बिराजे।

वहां से चलकर कोटा कृष्णविलास की पद्‌मशीला पर श्रीनाथजी चार माह तक विराज मान रहे। कोटा से चलकर पुष्कर होते हुए कृष्णगढ पधराये गये। वहां नगर से दो मील दूर पहाडी पर पीताम्‌, बरजी की गाल में बिराजे। कृष्णगढ से चलकर जोधपुर राज्य में बंबाल और बीसलपुर स्थानों से होते हुए चाँपासनी पहुँचे, जहाँ श्रीनाथजी चार-पांच माह तक बिराजे, तथा संवत्‌ १७२७ के कार्तिक माह में अन्नकूट उत्सव किया।

अंत में मेवाड़ राज्य के सिहाड़ नामक स्थान में पहुँचकर स्थायीरूप से बिराजमान हुए। उस काल में मेवाड़ के राणा श्रीराजसिंह भी सर्वाधिक शक्तिशाली हिन्दू  नरेश था।

उसने औरंगजेब की उपेक्षाकर पुष्टिसंप्रदाय के गोस्वामियों को आश्रय और संरक्षण प्रदान किया था। संवत्‌ १७२८ कार्तिक माह में श्रीनाथजी सिहाड़ पहुँचें वहा मन्दिर बन जाने पर फाल्गुन कृष्ण सप्तमी शनिवार को उनका पाटोत्सव किया गया।

इस प्रकार श्रीनाथजी को गिरिराज के मन्दिर से पधराकर सिहाड़ के मन्दिर में बिराजमान करने तक दो वर्ष चार माह सात दिन का समय लगा था। श्रीनाथजी के नाम के कारण ही मेवाड़ का वह अप्रसिद्ध सिहाड़ ग्राम अब श्रीनाथद्वारा नाम से भारत वर्ष में सुविख्यात है। आगे श्रीनाथजी की उर्ध्वभुजा के प्राकट्‌य से लेकर नाथद्वारा विराजमान तक तिथि पटल दर्शाया गया।

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संजय गुप्ता

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🌷🙏 जय सियाराम🙏🌷
… मीरा जी जब भगवान कृष्ण के लिए गाती थी तो भगवान बड़े ध्यान से सुनते थे।

सूरदास जी जब पद गाते थे तब भी भगवान सुनते थे।

और कहाँ तक कहूँ कबीर जी ने तो यहाँ तक कह दिया:- चींटी के पग नूपुर बाजे वह भी साहब सुनता है।

एक चींटी कितनी छोटी होती है अगर उसके पैरों में भी घुंघरू बाँध दे तो उसकी आवाज को भी भगवान सुनते है।

यदि आपको लगता है की आपकी पुकार भगवान नहीं सुन रहे तो ये आपका वहम है या फिर आपने भगवान के स्वभाव को नहीं जाना।

कभी प्रेम से उनको पुकारो तो सही, कभी उनकी याद में आंसू गिराओ तो सही।

मैं तो यहाँ तक कह सकती हूँ की केवल भगवान ही है जो आपकी बात को सुनता है।

एक छोटी सी कथा संत बताते है:-

एक भगवान जी के भक्त हुए थे, उन्होंने 20 साल तक लगातार भगवत गीता जी का पाठ किया।

अंत में भगवान ने उनकी परिक्षा लेते हुऐ कहा:- अरे भक्त! तू सोचता है की मैं तेरे गीता के पाठ से खुश हूँ, तो ये तेरा वहम है।
मैं तेरे पाठ से बिलकुल भी प्रसन्न नही हुआ।

जैसे ही भक्त ने सुना तो वो नाचने लगा, और झूमने लगा।

भगवान ने बोला:- अरे! मैंने कहा की मैं तेरे पाठ करने से खुश नही हूँ और तू नाच रहा है।

वो भक्त बोला:- भगवान जी आप खुश हो या नहीं हो ये बात मैं नही जानता।
लेकिन मैं तो इसलिए खुश हूँ की आपने मेरा पाठ कम से कम सुना तो सही, इसलिए मैं नाच रहा हूँ।

ये होता है भाव….

थोड़ा सोचिये जब द्रौपदी  जी ने भगवान कृष्ण को पुकारा तो क्या भगवान ने नहीं सुना ?
भगवान ने सुना भी और लाज भी बचाई !

जब गजेन्द्र हाथी ने ग्राह से बचने के लिए भगवान को पुकारा तो क्या भगवान ने नहीं सुना?
बिल्कुल सुना और भगवान अपना भोजन छोड़कर आये !

कबीरदास जी, तुलसीदास जी, सूरदास जी, हरिदास जी, मीरा बाई जी, सेठजी, भाई पोद्दार जी, राधाबाबा जी, श्री रामसुखदास जी और न जाने कितने संत हुए जो भगवान से बात करते थे और भगवान भी उनकी सुनते थे !

इसलिए जब भी भगवान को याद करो उनका नाम जप करो तो ये मत सोचना की भगवान आपकी पुकार सुनते होंगे या नहीं ?

कोई संदेह मत करना, बस ह्रदय से उनको पुकारना, तुम्हे खुद लगेगा की हाँ, भगवान आपकी पुकार को सुन रहे है !

👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏

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दधिची ऋषि ने देश के हित में अपनी हड्डियों का दान कर दिया था !

उनकी हड्डियों से तीन धनुष बने-
१. गांडीव, २. पिनाक और ३. सारंग !
जिसमे से गांडीव अर्जुन को मिला था जिसके बल पर अर्जुन ने महाभारत का युद्ध जीता !

सारंग से भगवान राम ने युद्ध किया था और रावण के अत्याचारी राज्य को ध्वस्त किया था !

और, पिनाक भगवान शिव जी के पास था जिसे तपस्या के माध्यम से खुश रावण ने शिव जी से मांग लिया था !

परन्तु… वह उसका भार लम्बे समय तक नहीं उठा पाने के कारण बीच रास्ते में जनकपुरी में छोड़ आया था !

इसी पिनाक की नित्य सेवा सीताजी किया करती थी ! पिनाक का भंजन करके ही
भगवान राम ने सीता जी का वरण किया था !
ब्रह्मर्षि दधिची की हड्डियों से ही “एकघ्नी नामक वज्र” भी बना था … जो भगवान इन्द्र को प्राप्त हुआ था !
इस एकघ्नी वज्र को इन्द्र ने कर्ण की तपस्या से खुश होकर उन्होंने कर्ण को दे
दिया था! इसी एकघ्नी से महाभारत के युद्ध में भीम का महाप्रतापी पुत्र घतोत्कक्ष कर्ण के हाथों मारा गया था ! और भी कई अश्त्र-शस्त्रों का निर्माण हुआ था उनकी हड्डियों से !

लेकिन ……… दधिची के इस अस्थि-दान का उद्देश्य क्या था ??????
क्या उनका सन्देश यही था कि…..
उनकी आने वाली पीढ़ी नपुंसकों और कायरों की भांति मुंह छुपा कर घर में बैठ जाए और दुश्मन को भाई-भौजाई बना ले….???
अरे शर्म करो अपनी नपुंसकता और बुजदिली पर ………….
हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ से ले कर ऋषि-मुनियों तक का एक दम स्पष्ट सन्देश और आह्वान रहा है कि….
” हे हिन्दू वीरो.शस्त्र उठाओ और अन्याय तथा अत्याचार के विरुद्ध युद्ध करो !”
बस आज भी सबके लिए यही एक मात्र सन्देश है !
राष्ट्र और धर्म रक्षा के लिए बस एक ही मार्ग है !
हथियार उठाओ ..राष्ट्र और धर्म के शत्रुओं से युद्ध करो !

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एक बार यह कहानी जरूर पढिये । आपके जिवन में जरूर बदलाव लाएगी ।
गिद्धों का एक झुण्ड खाने की तलाश में भटक रहा था।
उड़ते – उड़ते वे एक टापू पे पहुँच गए। वो जगह उनके लिए स्वर्ग के समान थी। हर तरफ खाने के लिए मेंढक, मछलियाँ और समुद्री जीव मौजूद थे और इससे भी बड़ी बात ये थी कि वहां इन गिद्धों का शिकार करने वाला कोई जंगली जानवर नहीं था और वे बिना किसी भय के वहां रह सकते थे।

युवा गिद्ध  कुछ ज्यादा ही उत्साहित थे, उनमे से एक बोला, ” वाह ! मजा आ गया, अब तो मैं यहाँ से कहीं नहीं जाने वाला, यहाँ तो बिना किसी मेहनत के ही हमें बैठे -बैठे खाने को मिल रहा है!”

बाकी गिद्ध भी उसकी हाँ में हाँ मिला ख़ुशी से झूमने लगे।

सबके दिन मौज -मस्ती में बीत रहे थे लेकिन झुण्ड का सबसे बूढ़ा गिद्ध इससे खुश नहीं था।

एक दिन अपनी चिंता जाहिर करते हुए वो बोला, ” भाइयों, हम गिद्ध हैं, हमें हमारी ऊँची उड़ान और अचूक वार करने की ताकत के लिए जाना जाता है। पर जबसे हम यहाँ आये हैं हर कोई आराम तलब हो गया है …ऊँची उड़ान तो दूर ज्यादातर गिद्ध तो कई महीनो से उड़े तक नहीं हैं…और आसानी से मिलने वाले भोजन की वजह से अब हम सब शिकार करना भी भूल रहे हैं … ये हमारे भविष्य के लिए अच्छा नहीं है …मैंने फैसला किया है कि मैं इस टापू को छोड़ वापस उन पुराने जंगलो में लौट जाऊँगा …अगर मेरे साथ कोई चलना चाहे तो चल सकता है !”

बूढ़े गिद्ध की बात सुन बाकी गिद्ध हंसने लगे। किसी ने उसे पागल कहा तो कोई उसे मूर्ख की उपाधि देने लगा। बेचारा बूढ़ा गिद्ध अकेले ही वापस लौट गया।

समय बीता, कुछ वर्षों बाद बूढ़े गिद्ध ने सोचा, ” ना जाने मैं अब कितने दिन जीवित रहूँ, क्यों न एक बार चल कर अपने पुराने साथियों से मिल लिया जाए!”

लम्बी यात्रा के बाद जब वो टापू पे पहुंचा तो वहां का दृश्य भयावह था।

ज्यादातर गिद्ध मारे जा चुके थे और जो बचे थे वे बुरी तरह घायल थे।

“ये कैसे हो गया ?”, बूढ़े गिद्ध ने पूछा।

कराहते हुए एक घायल गिद्ध बोला, “हमे क्षमा कीजियेगा, हमने आपकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया और आपका मजाक तक उड़ाया … दरअसल, आपके जाने के कुछ महीनो बाद एक बड़ी सी जहाज इस टापू पे आई …और चीतों का एक दल यहाँ छोड़ गयी। चीतों ने पहले तो हम पर हमला नहीं किया, पर जैसे ही उन्हें पता चला कि हम सब न ऊँचा उड़ सकते हैं और न अपने पंजो से हमला कर सकते हैं…उन्होंने हमे खाना शुरू कर दिया। अब हमारी आबादी खत्म होने की कगार पर है .. बस हम जैसे कुछ घायल गिद्ध ही ज़िंदा बचे हैं !”

बूढ़ा गिद्ध उन्हें देखकर बस अफ़सोस कर सकता था, वो वापस जंगलों की तरफ उड़ चला।

दोस्तों, अगर हम अपनी किसी शक्ति का use नहीं करते तो धीरे-धीरे हम उसे  lose कर देते हैं।

For instance, अगर हम अपने brain का use नहीं करते तो उसकी sharpness घटती जाती है, अगर हम अपनी muscles का use नही करते तो
उनकी ताकत घट जाती है… इसी तरह अगर हम अपनी skills को polish नहीं करते तो हमारी काम करने की efficiency कम होती जाती है!

तेजी से बदलती इस दुनिया में हमें खुद को बदलाव के लिए तैयार रखना चाहिए। पर बहुत बार हम अपनी current job या business में इतने comfortable हो जाते हैं कि बदलाव के बारे में सोचते ही नहीं और अपने अन्दर कोई नयी skills add नहीं करते, अपनी knowledge बढ़ाने के लिए कोई किताब नहीं पढ़ते कोई training program नहीं attend करते, यहाँ तक की हम उन चीजों में भी dull हो जाते हैं जिनकी वजह से कभी हमे जाना जाता था और फिर जब market conditions change होती हैं और हमारी नौकरी या बिज़नेस पे आंच आती है तो हम हालात को दोष देने लगते हैं।

ऐसा मत करिए…अपनी काबिलियत, अपनी ताकत को जिंदा रखिये…अपने कौशल, अपने हुनर को और तराशिये…उसपे धूल मत जमने दीजिये…और जब आप ऐसा करेंगे तो बड़ी से बड़ी मुसीबत आने पर भी आप ऊँची उड़ान भर पायेंगे!
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