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गैरहाज़िर कन्धे—- (एक बार जरूर पढ़े )
विश्वास साहब अपने आपको भाग्यशाली मानते थे। कारण यह था कि उनके दोनो पुत्र आई.आई.टी. करने के बाद लगभग एक करोड़ रुपये का वेतन अमेरिका में प्राप्त कर रहे थे। विश्वास साहब जब सेवा निवृत्त हुए तो उनकी इच्छा हुई कि उनका एक पुत्र भारत लौट आए और उनके साथ ही रहे ; परन्तु अमेरिका जाने के बाद कोई पुत्र भारत आने को तैयार नहीं हुआ, उल्टे उन्होंने विश्वास साहब को अमेरिका आकर बसने की सलाह दी। विश्वास साहब अपनी पत्नी भावना के साथ अमेरिका गये ; परन्तु उनका मन वहाँ पर बिल्कुल नहीं लगा और वे भारत लौट आए।
दुर्भाग्य से विश्वास साहब की पत्नी को लकवा हो गया और पत्नी पूर्णत: पति की सेवा पर निर्भर हो गई। प्रात: नित्यकर्म से लेकर खिलाने–पिलाने, दवाई देने आदि का सम्पूर्ण कार्य विश्वास साहब के भरोसे पर था। पत्नी की जुबान भी लकवे के कारण चली गई थी। विश्वास साहब पूर्ण निष्ठा और स्नेह से पति धर्म का निर्वहन कर रहे थे।
एक रात्रि विश्वास साहब ने दवाई वगैरह देकर भावना को सुलाया और स्वयं भी पास लगे हुए पलंग पर सोने चले गए। रात्रि के लगभग दो बजे हार्ट अटैक से विश्वास साहब की मौत हो गई। पत्नी प्रात: 6 बजे जब जागी तो इन्तजार करने लगी कि पति आकर नित्य कर्म से निवृत्त होने मे उसकी मदद करेंगे। इन्तजार करते करते पत्नी को किसी अनिष्ट की आशंका हुई। चूँकि पत्नी स्वयं चलने में असमर्थ थी , उसने अपने आपको पलंग से नीचे गिराया और फिर घसीटते हुए अपने पति के पलंग के पास पहुँची। उसने पति को हिलाया–डुलाया पर कोई हलचल नहीं हुई। पत्नी समझ गई कि विश्वास साहब नहीं रहे। पत्नी की जुबान लकवे के कारण चली गई थी ; अत: किसी को आवाज देकर बुलाना भी पत्नी के वश में नहीं था। घर पर और कोई सदस्य भी नहीं था। फोन बाहर ड्राइंग रूम मे लगा हुआ था। पत्नी ने पड़ोसी को सूचना देने के लिए घसीटते हुए फोन की तरफ बढ़ना शुरू किया। लगभग चार घण्टे की मशक्कत के बाद वह फोन तक पहुँची और उसने फोन के तार को खींचकर उसे नीचे गिराया। पड़ोसी के नंबर जैसे तैसे लगाये। पड़ौसी भला इंसान था, फोन पर कोई बोल नहीं रहा था, पर फोन आया था, अत: वह समझ गया कि मामला गंभीर है। उसने आस–पड़ोस के लोगों को सूचना देकर इकट्ठा किया, दरवाजा तोड़कर सभी लोग घर में घुसे। उन्होने देखा -विश्वास साहब पलंग पर मृत पड़े थे तथा पत्नी भावना टेलीफोन के पास मृत पड़ी थी। पहले विश्वास और फिर भावना की मौत हुई। जनाजा दोनों का साथ–साथ निकला। पूरा मोहल्ला कंधा दे रहा था परन्तु दो कंधे मौजूद नहीं थे जिसकी माँ–बाप को उम्मीद थी। शायद वे कंधे करोड़ो रुपये की कमाई के भार के साथ अति महत्वकांक्षा से पहले ही दबे हुए थे।
लोग बाग लगाते हैं फल के लिए
औलाद पालते हैं बुढापे के लिए
लेकिन ……
कुछ ही औलाद अपना फर्ज निभा पाते हैं ।।
अति सुन्दर कहा है एक कवि ने….
“मत शिक्षा दो इन बच्चों को चांद- सितारे छूने की।
चांद- सितारे छूने वाले छूमंतर हो जाएंगे।
अगर दे सको, शिक्षा दो तुम इन्हें चरण छू लेने की,
जो मिट्टी से जुङे रहेंगे, रिश्ते वही निभाएंगे….

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मनकी वासना का कर्म ही कारण है एक वैश्या मरी और उसी दिन उसके सामने रहने वाला बूढ़ा सन्यासी भी मर गया,संयोग की बात है।देवता लेने आए सन्यासी को नरक में और वैश्या को स्वर्ग में ले जाने लगे।संन्यासी एक दम अपना डंडा पटक कर खड़ा हो गया,तुम ये कैसा अन्याय कर रहे हो?मुझे नरक में और वैश्या को स्वर्ग में ले जा रहे हो,जरूर कोई भूल हो गई है तुमसे,कोई दफ्तर की गलती रही होगी, पूछताछ करो..मेरे नाम आया होगा स्वर्ग का संदेश और इसके नाम नर्क का।मुझे परमात्मा का सामना कर लेने दो, दो दो बातें हो जाए,सारा जीवन बीत गया शास्त्र पढ़ने में–और ये परिणाम।मुझे नाहक परमात्मा ने धोखे में डाला।उसे परमात्मा के पास ले जाया गया,परमात्मा ने कहा इसके पीछे एक गहन कारण है,वैश्या शराब पीती थी,भोग में रहती थी,पर जब तुम मंदिर में बैठकर भजन गाते थे,धूप दीप जलाते थे,घंटियां बजाते थे,,,तब वह सोचती थी कब मेरे जीवन में यह सौभाग्य होगा,मैं मंदिर में बैठकर भजन कर पाऊंगी कि नहीं,वह ज़ार जार रोती थी,और तुम्हारे धूप दीप की सुगंध जब उसके घर मेम पहुंचती थी तो वह अपना अहोभाग्य समझती थी,घंटियों की आवाज सुनकर मस्त हो जाती थी।लेकिन तुम्हारा मन पूजापाठ करते हुए भी यही सोचता कि वैश्या है तो सुंदर पर वहां तक कैसे पंहुचा जाए?तुम हिम्मत नही जुटा पाए,,तुम्हारी प्रतिष्ठा आड़े आई–गांव भर के लोग तुम्हें संयासी मानते थे।जब वैश्या नाचती थी,शराब बंटती थी,तुम्हारे मन में वासना जगती थी तुम्हें रस था खुद को अभागा समझते रहे..इसलिए वैश्या को स्वर्ग लाया गया और तुम्हें नरक में।वेश्या को विवेक पुकारता था तुम्हें वासना,वह प्रार्थना करती थी तुम इच्छा रखते थे वासना की।वह कीचड़ में थी पर कमल की भांति ऊपर उठती गईऔर तुम कमल बनकर आए थे कीचड़ में धंसे रहे।असली सवाल यह नहीं कि तुम बाहर से क्या हो,,,असली सवाल तो यह है कि तुम भीतर से क्या हो?
भीतर ही निर्णायक है।

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द्वारा …….

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भारत के ये 11 अजब गज़ब गाँव जहाँ आप एक बार जरूर जाना चाहेंगे👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻

  
1. एक गाँव जहां दूध दही मुफ्त मिलता है👇🏻

यहां के लोग कभी दूध या उससे बनने वाली चीज़ो को बेचते नही हैं बल्कि उन लोगों को मुफ्त में दे देते हैं जिनके पास गएँ ये भैंसे नहीं हैं धोकड़ा गुजरात के कक्ष में बसा ऐसा ही अनोखा गाँव है आज जब इंसानियत खो सी गयी है लोग किसी को पानी तक नही पूछते श्वेत क्रांति के लिए प्रसिद्ध ये गाँव दूध दही ऐसे ही बाँट देता है, यहां पर रहने वाले एक पुजारी बताते हैं की उन्हें महीने में करीब 7,500 रुपए का दूध गाँव से मुफ्त में मिलता है।

  1. इस गाँव में आज भी राम राज्य है👇🏻

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के नेवासा तालुके में शनि शिन्ग्नापुर भारत का एक ऐसा गाँव है जहाँ लोगों के घर में एक भी दरवाजा नही है यहाँ तक की लोगों की दुकानों में भी दरवाजे नही हैं, यहाँ पर कोई भी अपनी बहुमूल्य चीजों को ताले – चाबी में बंद करके नहीं रखता फिर भी गाँव में आज – तक कभी कोई चोरी नही हुई |

  1. एक अनोखा गाँव जहाँ हर कोई संस्कृत बोलता हैं👇🏻

आज के समय में हमारे देश की राष्ट्र भाषा हिंदी भी पहचान के संकट से जूझ रही हैं , कर्नाटक के शिमोगा शहर के कुछ ही दूरी पर एक गाँव ऐसा बसा हैं जहाँ ग्रामवासी केवल संस्कृत में ही बात करते हैं। शिमोगा शहर से लगभग दस किलोमीटर दूर मुत्तुरु अपनी विशिष्ठ पहचान को लेकर चर्चा में हैं। तुंग नदी के किनारे बसे इस गांव में संस्कृत प्राचीन काल से ही बोली जाती है।

करीब पांच सौ परिवारों वाले इस गांव में प्रवेश करते ही “भवत: नाम किम्?” (आपका नाम क्या है?) पूछा जाता है “हैलो” के स्थान पर “हरि ओम्” और “कैसे हो” के स्थान पर “कथा अस्ति?” आदि के द्वारा ही वार्तालाप होता हैं। बच्चे, बूढ़े, युवा और महिलाएं- सभी बहुत ही सहज रूप से संस्कृत में बात करते हैं। भाषा पर किसी धर्म और समाज का अधिकार नहीं होता तभी तो गांव में रहने वाले मुस्लिम परिवार के लोग भी संस्कृत उतनी ही सहजता से बोलते हैं जैसे दूसरे लोग।

गाँव की विशेषता हैं कि गाँव की मातृभाषा संस्कृत हैं और काम चाहे कोई भी हो संस्कृत ही बोली जाती हैं जैसे इस गांव के बच्चे क्रिकेट खेलते हुए और आपस में झगड़ते हुए भी संस्कृत में ही बातें करते हैं। गांव में संस्कृत में बोधवाक्य लिखा नजर आता है। “मार्गे स्वच्छता विराजते। ग्रामे सुजना: विराजते।” अर्थात् सड़क पर स्वच्छता होने से यह पता चलता है कि गाँव में अच्छे लोग रहते हैं। कुछ घरों में लिखा रहता है कि आप यहां संस्कृत में बात कर कर सकते हैं। इस गांव में बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत में होती है

  1. एक गांव जो हर साल कमाता है 1 अरब रुपए👇🏻

यूपी का एक गांव अपनी एक खासियत की वजह से पूरे देश में पहचाना जाता है। आप शायद अभी तक इस गांव की पहचान से दूर रहे हों, लेकिन देश के कोने-कोने में इस गांव ने अपने झंडे गाड़ दिए हैं।

अमरोहा जनपद के जोया विकास खंड क्षेत्र का ये छोटा सा गांव है सलारपुर खालसा। 3500 की आबादी वाले इस गांव का नाम पूरे देश में छाया है और इसका कारण है टमाटर। गांव में टमाटर की खेती बड़े पैमाने पर होती है और 17 साल में टमाटर आसपास के गांवों जमापुर, सूदनपुर, अंबेडकरनगर में भी छा गया है।

देश का शायद ही कोई कोना होगा, जहां पर सलारपुर खालसा की जमीन पर पैदा हुआ टमाटर न जाता हो। गांव में 17 साल से चल रही टमाटर की खेती का क्षेत्रफल फैलता ही जा रहा है और अब मुरादाबाद मंडल में सबसे ज्यादा टमाटर की खेती इसी गांव में होती है। कारोबार की बात करें, तो पांच माह में यहां 60 करोड़ का कारोबार होता है।

जनपद में 1200 हेक्टेयर में होने वाली टमाटर की खेती में इन चार गांवों में ही अकेले 1000 हेक्टेयर में खेती होती है। जिसके चलते यह गांव मुरादाबाद मंडल में भी अव्वल नंबर पर है। जबकि सूबे में भी टमाटर खेती में आगे रहने वाली जगहों में इस गांव का नाम शामिल है।

इस साल की बात करें, तो प्रदेश में डेढ़ क्विंटल टमाटर बीज की बिक्री हुई थी। जिसमें अकेले सलारपुर खालसा में ही 80 किलो बीज बिका था।

  1. ये है जुड़वों का गाँव, रहते है 350 से ज्यादा जुड़वाँ👇🏻

केरल के मलप्पुरम जिले में स्तिथ कोडिन्ही गाँव (Kodihni Village)  को जुड़वों के गाँव (Twins Village) के नाम से जाना जाता है। यहाँ पर वर्तमान में करीब 350 जुड़वा जोड़े रहते है जिनमे नवजात शिशु से लेकर 65 साल के बुजुर्ग तक शामिल है। विशव स्तर पर हर 1000 बच्चो पर 4 जुड़वाँ पैदा होते है, एशिया में तो यह औसत 4  से भी कम है। लेकिन कोडिन्ही में हर 1000 बच्चों पर 45 बच्चे जुड़वा पैदा होते है। हालांकि यह औसत पुरे विशव में दूसरे नंबर पर , लेकिन एशिया में पहले नंबर पर आता है।  विशव में पहला नंबर नाइज़ीरिआ के इग्बो-ओरा को प्राप्त है जहाँ यह औसत 145 है। कोडिन्ही गाँव एक मुस्लिम बहुल गाँव है जिसकी आबादी करीब 2000 है। इस गाँव में घर, स्कूल, बाज़ार हर जगह हमशक्ल नज़र आते है।

  1. एक गाँव जिसे कहते है भगवान का अपना बगीचा👇🏻

जहाँ एक और सफाई के मामले में हमारे अधिकांश गाँवो, कस्बों और शहरों की हालत बहुत खराब है वही यह एक सुखद आश्चर्य की बात है की एशिया का सबसे साफ़ सुथरा गाँव भी हमारे देश भारत है। यह है मेघालय का मावल्यान्नॉंग गांव जिसे की भगवान का अपना बगीचा (God’s Own Garden) के नाम से भी जाना जाता है। सफाई के साथ साथ यह गाँव शिक्षा में भी अवल्ल है।  यहाँ की साक्षरता दर 100 फीसदी है, यानी यहां के सभी लोग पढ़े-लिखे हैं। इतना ही नहीं, इस गांव में ज्यादातर लोग सिर्फ अंग्रेजी में ही बात करते हैं।

खासी हिल्स डिस्ट्रिक्ट का यह गांव मेघालय के शिलॉंन्ग और भारत-बांग्लादेश बॉर्डर से 90 किलोमीटर दूर है। साल 2014 की गणना के अनुसार, यहां 95 परिवार रहते हैं। यहां सुपारी की खेती आजीविका का मुख्य साधन है। यहां लोग घर से निकलने वाले कूड़े-कचरे को बांस से बने डस्टबिन में जमा करते हैं और उसे एक जगह इकट्ठा कर खेती के लिए खाद की तरह इस्तेमाल करते हैं।

  1. एक श्राप के कारण 170 सालों से हैं वीरान – रात को रहता है भूत प्रेतों का डेरा👇🏻

हमारे देश भारत के कई शहर अपने दामन में कई रहस्यमयी घटनाओ को समेटे हुए है ऐसी ही एक घटना हैं राजस्थान के जैसलमेर जिले के कुलधरा(Kuldhara) गाँव कि, यह गांव पिछले 170 सालों से वीरान पड़ा हैं।कुलधरा(Kuldhara) गाँव के हज़ारों लोग एक ही रात मे इस गांव को खाली कर के चले गए थे  और जाते जाते श्राप दे गए थे कि यहाँ फिर कभी कोई नहीं बस पायेगा। तब से गाँव वीरान पड़ा हैं।

कहा जाता है कि यह गांव रूहानी ताकतों के कब्जे में हैं, कभी एक हंसता खेलता यह गांव आज एक खंडहर में तब्दील हो चुका है| टूरिस्ट प्लेस में बदल चुके कुलधरा गांव घूमने आने वालों के मुताबिक यहां रहने वाले पालीवाल ब्राह्मणों की आहट आज भी सुनाई देती है। उन्हें वहां हरपल ऐसा अनुभव होता है कि कोई आसपास चल रहा है। बाजार के चहल-पहल की आवाजें आती हैं, महिलाओं के बात करने उनकी चूडिय़ों और पायलों की आवाज हमेशा ही वहां के माहौल को भयावह बनाते हैं। प्रशासन ने इस गांव की सरहद पर एक फाटक बनवा दिया है जिसके पार दिन में तो सैलानी घूमने आते रहते हैं लेकिन रात में इस फाटक को पार करने की कोई हिम्मत नहीं करता हैं।

  1. इस गांव में कुछ भी छुआ तो लगता है 1000 रुपए का जुर्माना👇🏻

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के अति दुर्गम इलाके में स्तिथ है मलाणा गाँव। इसे आप भारत का सबसे रहस्यमयी गाँव कह सकते है। यहाँ के निवासी खुद को सिकंदर के सैनिकों का वंशज मानते है। यहां पर भारतीय क़ानून नहीं चलते है यहाँ की अपनी संसद है जो सारे फैसले करती है। मलाणा भारत का इकलौता गांव है जहाँ मुग़ल सम्राट अकबर की पूजा की जाती है।

हिमाचल के मलाणा गांव में लगे नोटिस बोर्ड।
कुल्लू के मलाणा गांव में यदि किसी बाहरी व्यक्ति ने किसी चीज़ को छुआ तो जुर्माना देना पड़ता है। जुर्माने की रकम 1000 रुपए से 2500 रुपए तक कुछ भी हो सकती है।
अपनी विचित्र परंपराओं लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण पहचाने जाने वाले इस गांव में हर साल हजारों की संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। इनके रुकने की व्यवस्था इस गांव में नहीं है। पर्यटक गांव के बाहर टेंट में रहते हैं। अगर इस गांव में किसी ने मकान-दुकान या यहां के किसी निवासी को छू (टच) लिया तो यहां के लोग उस व्यक्ति से एक हजार रुपए वसूलते हैं।

ऐसा नहीं हैं कि यहां के निवासी यहां आने वाले लोगों से जबरिया वसूली करते हों। मलाणा के लोगों ने यहां हर जगह नोटिस बोर्ड लगा रखे हैं। इन नोटिस बोर्ड पर साफ-साफ चेतावनी लिखी गई है। गांव के लोग बाहरी लोगों पर हर पल निगाह रखते हैं, जरा सी लापरवाही भी यहां आने वालों पर भारी पड़ जाती है।

मलाणा गांव में कुछ दुकानें भी हैं। इन पर गांव के लोग तो आसानी से सामान खरीद सकते हैं, पर बाहरी लोग दुकान में न जा सकते हैं न दुकान छू सकते हैं। बाहरी ग्राहकों के दुकान के बाहर से ही खड़े होकर सामान मांगना पड़ता है। दुकानदार पहले सामान की कीमत बताते हैं। रुपए दुकान के बाहर रखवाने के बाद सामन भी बाहर रख देते हैं।

  1. यह गाँव कहलाता है ‘मिनी लंदन’👇🏻

झारखंड की राजधानी रांची से उत्तर-पश्चिम में करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित एक कस्बा गांव है मैक्लुस्कीगंज। एंग्लो इंडियन समुदाय के लिए बसाई गई दुनिया की इस बस्ती को मिनी लंदन भी कहा जाता है।

घनघोर जंगलों और आदिवासी गांवों के बीच सन् 1933 में कोलोनाइजेशन सोसायटी ऑफ इंडिया ने मैकलुस्कीगंज को बसाया था। 1930 के दशक में रातू महाराज से ली गई लीज की 10 हजार एकड़ जमीन पर अर्नेस्ट टिमोथी मैकलुस्की नामक एक एंग्लो इंडियन व्यवसायी ने इसकी नींव रखी थी। चामा, रामदागादो, केदल, दुली, कोनका, मायापुर, महुलिया, हेसाल और लपरा जैसे गांवों वाला यह इलाका 365 बंगलों के साथ पहचान पाता है जिसमें कभी एंग्लो-इंडियन लोग आबाद थे। पश्चिमी संस्कृति के रंग-ढंग और गोरे लोगों की उपस्थिति इसे लंदन का सा रूप देती तो इसे लोग मिनी लंदन कहने लगे।
मैकलुस्की के पिता आइरिश थे और रेल की नौकरी में रहे थे। नौकरी के दौरान बनारस के एक ब्राह्मण परिवार की लड़की से उन्हें प्यार हो गया। समाज के विरोध के बावजूद दोनों ने शादी की। ऐसे में मैकलुस्की बचपन से ही एंग्लो-इंडियन समुदाय की छटपटाहट देखते आए थे। अपने समुदाय के लिए कुछ कर गुजरने का सपना शुरू से उनके मन में था। वे बंगाल विधान परिषद के मेंबर बने और कोलकाता में रियल एस्टेट का कारोबार भी खूब ढंग से चलाया।कोलकाता में प्रॉपर्टी डीलिंग के पेशे से जुड़ा टिमोथी जब इस इलाके में आया तो यहां की आबोहवा ने उसे मोहित कर लिया। यहां के गांवों में आम, जामुन, करंज, सेमल, कदंब, महुआ, भेलवा, सखुआ और परास के मंजर, फूल या फलों से सदाबहार पेड़ उसे कुछ इस कदर भाए कि उसने भारत के एंग्लो-इंडियन परिवारों के लिए एक अपना ही चमन विकसित करने की ठान ली।

1930 के दशक में साइमन कमीशन की रिपोर्ट आई जिसमें एंग्लो-इंडियन समुदाय के प्रति अंग्रेज सरकार ने किसी भी तरह की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया था। पूरे एंग्लो-इंडियन समुदाय के सामने खड़े इस संकट को देखते हुए मैकलुस्की ने तय किया कि वह समुदाय के लिए एक गांव इसी भारत में बनाएंगे। बाद ऐसा ही हुआ। कोलकाता और अन्य दूसरे महानगरों में रहने वाले कई धनी एंग्लो-इंडियन परिवारों ने मैकलुस्कीगंज में डेरा जमाया, जमीनें खरीदीं और आकर्षक बंगले बनवाकर यहीं रहने लगे।
इंसानों की तरह मैकलुस्कीगंज को भी कभी बुरे दिन देखने पड़े थे। यहां के लोग उस दौर को भी याद करते हैं जब एक के बाद एक एंग्लो-इंडियन परिवार ये जगह छोड़ते चले गए। कुछ 20-25 परिवार रह गए, बाकी ने शहर खाली कर दिया। इसके बाद तो खाली बंगलों के कारण भूतों का शहर बन गया था मैकलुस्कीगंज।

लेकिन, और अब यह दौर है जब गिने-चुने परिवार मैकलुस्कीगंज को आबाद करने में जुटे हैं। यहां कई हाई प्रोफाइल स्कूल खुल गए हैं, जिनमें पड़ने के लिए दूर-दूर से छात्र आ रहे हैं। पक्की सड़कें बनी हैं, जरूरत के सामान की कई दुकानें भी खुल गई हैं। एक के बाद कई स्कूल खुल गए हैं। साथ ही बस्ती की अधिकतर गलियों या बंगलों में छात्रावास होने के साइनबोर्ड भी मिलेंगे। ये सब एक नए मैकलुस्कीगंज की ओर मिनी लंदन को ले जा रहे हैं।

  1. एक गाँव जहाँ छत पर रखी पानी की टंकियों से होती है घरो की पहचान👇🏻

यह कहानी है पंजाब के जालंधर शहर के एक गांव उप्पलां की। इस गाँव में अब लोगों की पहचान उनके घरों पर बनी पानी की टंकियों से होती है। अब आप सोच रहे होंगे की पानी की टंकियों में ऐसी क्या विशेषता है तो हम आपको बता दे की यहाँ के मकानो की छतो पर आम वाटर टैंक नहीं है, बल्कि यहाँ पर शिप, हवाईजहाज़, घोडा, गुलाब, कार, बस आदि अनेकों आकर की टंकिया है।

इस गांव के अधिकतर लोग पैसा कमाने लिए विदेशों में रहते है। गांव में खास तौर पर एनआरआईज की कोठियां में छत पर इस तरह की टंकिया रखी है। अब कोठी पर रखी जाने वाली टंकियो से उसकी पहचानी जा रही हैं। नामी परिवार अपने घरों पर तरह तरह की टंकियां बनवा रहे हैं। कोई गुलाब का फूल बना खुशहाली का संकेत देता है तो कोई घोड़ा बनाकर रुआबदार परिवार का संदेश देता है। कोई शेर बनाकर अपनी बहादुरी जाहिर करता है तो कोई बाज बनाकर अपनी पहचान को दमदार रूप से प्रस्तुत करता है।
तरसेम सिंह उप्पल जब 70 साल पहले हांगकांग गए थे तो उन्होंने सफर शिप से किया था। अपने बेटों को अपनी पहली यात्रा के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा था कि हम भी अपने घर पर शिप बनवाएंगे। 1995 में यह शिप बनाई गई।
82 साल के गुरदेव सिंह द्वारा बनाया गया बब्बर शेर भी कई सालों तक चर्चा का विषय बना रहा। क्यों जो गुरदेव सिंह ने शेर पर खुद की मूरत बनाकर बिठा दी थी। कहा जाता है कि ऐसे करते ही गांव में लोग इकट्‌ठा होना शुरू हो गए। कहा गया कि शेर पर तो शेरां वाली माता ही बैठ सकती है। आनन फानन में मूरत हटा ली गई। शेर की मूरत वैसे की वैसी ही है। हटाई गई गुरदेव सिंह की मूरत अब भी कोठी में पड़ी है।

  1. इसे कहते है मंदिरों का गाँव और गुप्त काशी👇🏻

झारखंड के दुमका जिले में शिकारीपाड़ा के पास बसे एक छोटे से गांव ” मलूटी” में आप जिधर नज़र दौड़ाएंगे आपको प्राचीन मंदिर नज़र आएंगे। मंदिरों की बड़ी संख्या होने के कारण इस क्षेत्र को गुप्त काशी और मंदिरों का गाँव भी कहा जाता है। इस गांव का राजा कभी एक किसान हुआ करते था। उसके वंशजों ने यहां 108 भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया।

ये मंदिर बाज बसंत राजवंशों के काल में बनाए गए थे।  शुरूआत में कुल 108 मंदिर थे, लेकिन संरक्षण के आभाव में अब सिर्फ 72 मंदिर ही रह गए हैं। इन मंदिरों का निर्माण 1720 से लेकर 1840 के मध्य हुआ था। इन मंदिरों का निर्माण सुप्रसिद्व चाला रीति से की गयी है। ये छोटे-छोटे लाल सुर्ख ईटों से निर्मित हैं और इनकी ऊंचाई 15 फीट से लेकर 60 फीट तक हैं। इन मंदिरों की दीवारों पर रामायण-महाभारत के दृश्यों का चित्रण भी बेहद खूबसूरती से किया गया है।

मलूटी पशुओं की बली के लिए भी जाना जाता है। यहां काली पूजा के दिन एक भैंस और एक भेड़ सहित करीब 100 बकरियों की बली दी जाती है। हालांकि पशु कार्यकर्ता समूह अक्सर यहां पशु बली का विरोध करते रहते हैं। जहां तक बात है मंदिरों के संरक्षण की तो बिहार के पुरातत्व विभाग ने 1984 में गांव को पुरातात्विक प्रांगण के रूप में विकसित करने की योजना बनाई थी। इसके तहत मंदिरों का संरक्षण कार्य शुरू किया गया था और आज पूरा गांव पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो रहा है। लेकिन मूलभूत सुविधाओं के अभाव के कारण पर्यटक यहां रात में रुकने से घबराते हैं।

मलूटी गांव में इतने सारे मंदिर होने के पीछे एक रोचक कहानी है। यहां के राजा महल बनाने की बजाए मंदिर बनाना पसंद करते थे और राजाओं में अच्‍छे से अच्‍छा मंदिर बनाने की होड़ सी लग गई। परिणाम स्‍वरूप यहां हर जगह खूबसूरत मंदिर ही मंदिर बन गए और यह गांव मंदिर के गांव के रूप में जाना जाने लगा। मलूटी के मंदिरों की यह खासियत है कि ये अलग-अलग समूहों में निर्मित हैं। भगवान भोले शंकर के मंदिरों के अतिरिक्त यहां दुर्गा, काली, धर्मराज, मनसा, विष्णु आदि देवी-देवताओं के भी मंदिर हैं। इसके अतिरिक्त यहां मौलिक्षा माता का भी मंदिर है, जिनकी मान्यता जाग्रत शाक्त देवी के रूप में है।

यह गांव सबसे पहले ननकार राजवंश के समय में प्रकाश में आया था। उसके बाद गौर के सुल्तान अलाउद्दीन हसन शाह (1495–1525) ने इस गांव को बाज बसंत रॉय को इनाम में दे दिया था। राजा बाज बसंत शुरुआत में एक अनाथ किसान थे। उनके नाम के आगे बाज शब्‍द कैसे लगा इसके पीछे एक अनोखी कहानी है। एक बार की बात है ज‍ब सुल्तान अलाउद्दीन की बेगम का पालतू पक्षी बाज उड़ गया और बाज को उड़ता देख गरीब किसान बसंत ने उसे पकड़कर रानी को वापस लौटा दिया। बसंत के इस काम से खुश होकर सुल्तान ने उन्‍हें मलूटी गांव इनाम में दे दिया और बसंत राजा बाज बसंत के नाम से पहचाने जाने लगे।

संजय गुप्ता

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बोर्ड एग्जाम में बेहतर सफलता
Competing for Board examination ?

लखनऊ, जानेमाने वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य विचारक श्रीधीरजी (9721699900) के अनुसार, ग्रह अध्ययन. बालक हो अथवा बालिका, प्रत्येक जातक का भविष्य ‘आधान’ अर्थात् गर्भधारण के साथ ही सुनिश्चित हो जाता है। उस समय की कुंडली ‘आधान’ कुंडली कहलाती है। जन्म के समय जो ग्रह-नक्षत्र होते है, उस समय की कुंडली ‘जन्म कुंडली’ कही जाती है। इन कुंडलियों के आधार पर ही प्रत्येक जातक की ‘मेधा’ (बुद्धि) सुनिश्चित होती है। माता-पिता तथा अनेक पीढ़ियों के ‘जींस’ भी जातक के भविष्य के साथ जुड़े होते हैं। ‘जातक’ के रक्त तथा उसकी संरचना में इनका प्रभाव देखने को मिलता है। बालक-बालिका के पूर्व जन्म के कर्म, संस्कार, जिस घर में उसका जन्म हुआ है, उसके कुल तथा वर्तमान परिवेश यानी ग्रह-नक्षत्रों के प्रभाव से बुद्धि, आयु, कर्म आदि का निर्धारण होता है।

👉 पढाई स्थान महत्व, दिशा महत्व
इसी आधार पर हमें स्कूल-कॉलेजों की परीक्षा दे रहे विद्यार्थियों के भविष्य का भी अध्ययन करना चाहिए। बच्चों की पढ़ाई में स्थान विशेष का महत्व अधिक होता है। यदि उनका पढ़ाई का कक्ष अध्ययन की दृष्टि से अच्छा नहीं है, उसमें ‘वास्तुदोष’ है तो निश्चय ही इसका उनके मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ेगा। विद्यार्थियों को ऐसे दोषों से बचना चाहिए। उन्हें पूर्व की ओर सिर करके सोना चाहिए, इससे उन्हें विद्या प्राप्त होगी।

प्राक शिर: शयने विद्याद्धन मायुंचदक्षिणो।
पश्चिमे प्रबलाचिंता हानिमृत्युरथोत्तरे।।

दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने से धन तथा आयु की वृद्धि, पश्चिम की ओर सिर करके सोना चिन्ताकारक तथा उत्तर में सिर करके सोने से हानि तथा आयु क्षीण होती है, विद्यार्थी इस बात का ध्यान रखें। परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए विद्यार्थी को पूर्व अथवा ईशान कोण की ओर मुख करके मंजन अथवा दातून करना चाहिए इससे उनमें धैर्य बढ़ेगा एवं शरीर निरोग रहेगा। कामनाओं की सिद्धि होगी।

प्राड्मुखस्य धृति:सौख्यं शरीरारोग्य मेवचं..
पूवरेत्तरें तु दिग्भागें सर्वान्कामान् वाप्नुयात्।।

इसी प्रकार पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से बल और बुद्धि बढ़ेगी। अधिकतर विद्यार्थी परीक्षा से भयभीत होते हैं। जिन छात्र-छात्राओं का चंद्रमा कमजोर है व पाप ग्रहों के साथ अथवा पाप ग्रहों की दृष्टि से युक्त है, उन्हें मानसिक दुर्बलता के कारण परीक्षा से भय लगने लगता है। ऐसे विद्यार्थियों को चाहिए कि वे शिव मंदिर में दर्शन कर परीक्षा में जाएं। बेल पत्र, दुग्ध आदि से पूजन कर सकें तो ज्यादा अच्छा होगा। वे मोतीयुक्त चांदी निर्मित चंद्र्यंत्र विशेष मुहूर्त में धारण कर सकते हैं। चौथा घर मेधा तथा पंचम विद्या के आत्मसात करने का है। इन दोनों घरों में किसी पाप ग्रह की दृष्टि है तो उसे दूर कर लेना चाहिए।

👉 दोष निवारण
वार के दोष को दूर करने के लिए सोम को दर्पण में मुख देखना और मंगलवार को धनिया को प्रयोग कर जाना चाहिए। बुध को मीठा, बृहस्पति को राई, शनि को घी आदि का सेवन कार्य में सिद्धि प्रदान करते हैं। परीक्षा में जाने से पूर्व माता-पिता, गुरु का पैर छूकर जाना बल-बुद्धि प्रदान करने में सहायक होता है। प्रात:काल उठकर स्वयं की हथेली का दर्शन करना भी शुभ है। परीक्षा में जाते समय इष्ट देवता को चढ़े हुए फूल को अपनी जेब में रखें, इससे आपके मन का विश्वास बना रहेगा और घबराहट भी नहीं होगी। आप वार की दृष्टि से अपने अंदरूनी कपड़े भी पहन सकते हैं। वार का संबंध ग्रहों से है। रविवार को गुलाबी, सोमवार को सफेद, मंगलवार को लाल, बुधवार को हरे, गुरुवार को पीले, शुक्रवार को आसमानी व चमकदार सफेद तथा शनिवार को काले वस्त्र धारण कर विद्यार्थी परीक्षा देने जा सकते हैं।

👉 अध्ययन में मुहूर्त का प्रभाव
किसी भी शुभ कार्य में मुहूर्त का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। प्रात:काल चार से छह बजे को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। इस काल में अध्ययन करने से विद्या अर्जन की क्षमता में वृद्धि होती है और वाणी में प्रखरता आती है। बुद्धि के स्वामी गणोश हैं जबकि बुध वाणी का ग्रह है। वाक परीक्षा के लिए जाएं तो गणोश जी का ध्यान करें।

👉 ग्रह प्रभाव से करियर चुनाव
राहु इंजीनियरिंग की दिशा में ले जाता है। शुक्र कॉमर्स, व्यावसायिक शिक्षा तथा कला से जोड़ता है। सूर्य प्रशासन, मंगल सेना व पुलिस विभाग से जोड़ता है। इसी तरह गुरु उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सहायक होता है। शनि व बुध, तकनीकी क्षेत्र व कंप्यूटर आदि से, चंद्रमा रसायन व वनस्पति तथा मंगल व शनि मेडिकल क्षेत्र से संबंधित हैं। विद्यार्थियों को ग्रहों के अनुकूल ही फल प्राप्त होता है। फल की प्राप्ति नवें घर से मिलती है।

👉 परीक्षा पूर्व
परीक्षा में जाते समय वार अर्थात दिन का ध्यान रखें, यदि दिन अच्छा नहीं है तो दोष का वैदिक विधि पूर्वक परिहार कर दही, पेड़ा का सेवन शुभ माना गया है। 
ॐ शिव पार्वती नमः

सत्य है शिव है सुन्दर है

संजय गुप्ता

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(((((((( पाप का गुरू कौन ? ))))))))
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एक पंडित जी कई वर्षों तक काशी में शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद गांव लौटे. पूरे गांव में शोहरत हुई कि काशी से शिक्षित होकर आए हैं और धर्म से जुड़े किसी भी पहेली को सुलझा सकते हैं.
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शोहरत सुनकर एक किसान उनके पास आया और उसने पूछ लिया-, पंडित जी आप हमें यह बताइए कि पाप का गुरु कौन है ?
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प्रश्न सुन कर पंडित जी चकरा गए. उन्होंने धर्म व आध्यात्मिक गुरु तो सुने थे, लेकिन पाप का भी गुरु होता है, यह उनकी समझ और ज्ञान के बाहर था.
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पंडित जी को लगा कि उनका अध्ययन अभी अधूरा रह गया है. वह फिर काशी लौटे. अनेक गुरुओं से मिले लेकिन उन्हें किसान के सवाल का जवाब नहीं मिला.
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अचानक एक दिन उनकी मुलाकात एक गणिका (वेश्या) से हो गई. उसने पंडित जी से परेशानी का कारण पूछा, तो उन्होंने अपनी समस्या बता दी.
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गणिका बोली- पंडित जी ! इसका उत्तर है तो बहुत सरल है, लेकिन उत्तर पाने के लिए आपको कुछ दिन मेरे पड़ोस में रहना होगा.
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पंडित जी इस ज्ञान के लिए ही तो भटक रहे थे. वह तुरंत तैयार हो गए. गणिका ने अपने पास ही उनके रहने की अलग से व्यवस्था कर दी.
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पंडित जी किसी के हाथ का बना खाना नहीं खाते थे. अपने नियम-आचार और धर्म परंपरा के कट्टर अनुयायी थे.
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गणिका के घर में रहकर अपने हाथ से खाना बनाते खाते कुछ दिन तो बड़े आराम से बीते, लेकिन सवाल का जवाब अभी नहीं मिला. वह उत्तर की प्रतीक्षा में रहे.
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एक दिन गणिका बोली- पंडित जी ! आपको भोजन पकाने में बड़ी तकलीफ होती है. यहां देखने वाला तो और कोई है नहीं. आप कहें तो नहा-धोकर मैं आपके लिए भोजन तैयार कर दिया करूं.
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पंडित जी को राजी करने के लिए उसने लालच दिया- यदि आप मुझे इस सेवा का मौका दें, तो मैं दक्षिणा में पांच स्वर्ण मुद्राएं भी प्रतिदिन आपको दूंगी.
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स्वर्ण मुद्रा का नाम सुनकर पंडित जी विचारने लगे. पका-पकाया भोजन और साथ में सोने के सिक्के भी ! अर्थात दोनों हाथों में लड्डू हैं.
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पंडित जी ने अपना नियम-व्रत, आचार-विचार धर्म सब कुछ भूल गए. उन्होंने कहा- तुम्हारी जैसी इच्छा. बस विशेष ध्यान रखना कि मेरे कमरे में आते-जाते तुम्हें कोई नहीं देखे.
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पहले ही दिन कई प्रकार के पकवान बनाकर उसने पंडित जी के सामने परोस दिया. पर ज्यों ही पंडित जी ने खाना चाहा, उसने सामने से परोसी हुई थाली खींच ली.
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इस पर पंडित जी क्रुद्ध हो गए और बोले, यह क्या मजाक है ? गणिका ने कहा, यह मजाक नहीं है पंडित जी, यह तो आपके प्रश्न का उत्तर है.
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यहां आने से पहले आप भोजन तो दूर, किसी के हाथ का पानी भी नहीं पीते थे, मगर स्वर्ण मुद्राओं के लोभ में आपने मेरे हाथ का बना खाना भी स्वीकार कर लिया. यह लोभ ही पाप का गुरु है.
(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))

संजय गुप्ता

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भक्त के वश में भगवान्


(((((( भक्त के वश में भगवान् ))))))

एक गरीब बालक था जो कि अनाथ था।
एक दिन वो बालक एक संत के आश्रम मेँ आया और बोला के बाबा आप सबका ध्यान रखते है, मेरा इस दुनिया मेँ कोई नहीँ हैँ तो क्या मैँ यहाँ आपके आश्रम मेँ रह सकता हूँ ?
बालक की बात सुनकर संत बोले बेटा तेरा नाम क्या है ?
उस बालक ने कहा मेरा कोई नाम नहीँ हैँ।
तब संत ने उस बालक का नाम रामदास रखा और बोले की अब तुम यहीँ आश्रम मेँ रहना।
रामदास वही रहने लगा और आश्रम के सारे काम भी करने लगा।
उन संत की आयु 80 वर्ष की हो चुकी थी। एक दिन वो अपने शिष्यो से बोले की मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना हैँ तुम मेँ से कौन कौन मेरे मेरे साथ चलेगा और कौन कौन आश्रम मेँ रुकेगा ?
संत की बात सुनकर सारे शिष्य बोले की हम आपके साथ चलेंगे.! क्योँकि उनको पता था की यहाँ आश्रम मेँ रुकेंगे तो सारा काम करना पड़ेगा इसलिये सभी बोले की हम तो आपके साथ तीर्थ यात्रा पर चलेंगे।
अब संत सोच मेँ पड़ गये की किसे साथ ले जाये और किसे नहीँ क्योँकि आश्रम पर किसी का रुकना भी जरुरी था।
बालक रामदास संत के पास आया और बोला बाबा अगर आपको ठीक लगे तो मैँ यहीँ आश्रम पर रुक जाता हूँ।
संत ने कहा ठीक हैँ पर तुझे काम करना पड़ेगा… आश्रम की साफ सफाई मे भले ही कमी रह जाये पर ठाकुर जी की सेवा मे कोई कमी मत रखना।
रामदास ने संत से कहा की बाबा मुझे तो ठाकुर जी की सेवा करनी नहीँ आती आप बता दिजीये की ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है ? फिर मैँ कर दुंगा।
संत रामदास को अपने साथ मंदिर ले गये वहाँ उस मंदिर मे राम दरबार की झाँकी थी।
श्रीराम जी, सीता जी, लक्ष्मणजी और हनुमान जी थे।
संत ने बालक रामदास को ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है सब सिखा दिया।
रामदास ने गुरु जी से कहा की बाबा मेरा इनसे रिश्ता क्या होगा ये भी बता दो क्योँकि अगर रिशता पता चल जाये तो सेवा करने मेँ आनंद आयेगा।
उन संत ने बालक रामदास कहा की तु कहता था ना की मेरा कोई नहीँ हैँ तो आज से ये रामजी और सीताजी तेरे माता-पिता हैँ।
रामदास ने साथ मेँ खड़े लक्ष्मण जी को देखकर कहा अच्छा बाबा और ये जो पास मेँ खड़े है वो कौन है ?
संत ने कहा ये तेरे चाचा जी है और हनुमान जी के लिये कहा की ये तेरे बड़े भैय्या है।
रामदास सब समझ गया और फिर उनकी सेवा करने लगा। संत शिष्योँ के साथ यात्रा पर चले गये।
आज सेवा का पहला दिन था रामदास ने सुबह उठकर स्नान किया और भिक्षा माँगकर लाया और फिर भोजन तैयार किया फिर भगवान को भोग लगाने के लिये मंदिर आया।
रामदास ने श्रीराम सीता लक्ष्मण और हनुमान जी आगे एक-एक थाली रख दी और बोला अब पहले आप खाओ फिर मैँ भी खाऊँगा।
रामदास को लगा की सच मेँ भगवान बैठकर खायेंगे.
पर बहुत देर हो गई रोटी तो वैसी की वैसी थी।
तब बालक रामदास ने सोचा नया नया रिशता बना हैँ तो शरमा रहेँ होँगे।
रामदास ने पर्दा लगा दिया बाद मेँ खोलकर देखा तब भी खाना वैसे का वैसा पडा था।
अब तो रामदास रोने लगा की मुझसे सेवा मे कोई गलती हो गई इसलिये खाना नहीँ खा रहेँ हैँ !
और ये नहीँ खायेंगे तो मैँ भी नहीँ खाऊँगा और मैँ भुख से मर जाऊँगा..!
इसलिये मैँ तो अब पहाड़ से कूदकर ही मर जाऊँगा।
रामदास मरने के लिये निकल जाता है तब भगवान रामजी हनुमान जी को कहते हैँ हनुमान जाओ उस बालक को लेकर आओ और बालक से कहो की हम खाना खाने के लिये तैयार हैँ।
हनुमान जी जाते हैँ और रामदास कूदने ही वाला होता हैँ की हनुमान जी पीछे से पकड़ लेते हैँ और बोलते हैँ क्याँ कर रहे हो ?
रामदास कहता हैँ आप कौन ?
हनुमान जी कहते है मैँ तेरा भैय्या हूँ इतनी जल्दी भूल गये ?
रामदास कहता है अब आये हो इतनी देर से वहा बोल रहा था की खाना खालो तब आये नहीँ अब क्योँ आ गये ?
तब हनुमान जी बोले पिता श्री का आदेश हैँ अब हम सब साथ बैठकर खाना खायेँगे।
फिर रामजी, सीताजी, लक्ष्मणजी, हनुमान जी साक्षात बैठकर भोजन करते हैँ।
इसी तरह रामदास रोज उनकी सेवा करता और भोजन करता।
सेवा करते 15 दिन हो गये एक दिन रामदास ने सोचा की कोई भी माँ बाप हो वो घर मेँ काम तो करते ही हैँ.
पर मेरे माँ बाप तो कोई काम नहीँ करते सारे दिन खाते रहते हैँ. मैँ ऐसा नहीँ चलने दूँगा।
रामदास मंदिर जाता हैँ ओर कहता हैँ पिता जी कुछ बात करनी हैँ आपसे।
रामजी कहते हैँ बोल बेटा क्या बात हैँ ?
रामदास कहता हैँ की अब से मैँ अकेले काम नहीँ करुंगा आप सबको भी काम करना पड़ेगा,
आप तो बस सारा दिन खाते रहते हो और मैँ काम करता रहता हूँ अब से ऐसा नहीँ होगा।
राम जी कहते हैँ तो फिर बताओ बेटा हमेँ क्या काम करना है ?
रामदास ने कहा माता जी (सीताजी) अब से रसोई आपके हवाले. और चाचा जी (लक्ष्मणजी) आप सब्जी तोड़कर लाओँगे.
और भैय्या जी (हनुमान जी) आप लकड़ियाँ लायेँगे. और पिता जी (रामजी) आप पत्तल बनाओँगे।
सबने कहा ठीक हैँ।
अब सभी साथ मिलकर काम करते हुऐँ एक परिवार की तरह सब साथ रहने लगेँ।
एक दिन वो संत तीर्थ यात्रा से लौटे तो सीधा मंदिर मेँ गये और देखा की मंदिर से प्रतिमाऐँ गायब हैँ.
संत ने सोचा कहीँ रामदास ने प्रतिमा बेच तो नहीँ दी ? संत ने रामदास को बुलाया और पुछा भगवान कहा गये ?
रामदास भी अकड़कर बोला की मुझे क्या पता रसोई मेँ कही काम कर रहेँ होंगे।
संत बोले ये क्या बोल रहा ?
रामदास ने कहा बाबा मैँ सच बोल रहा हूँ जबसे आप गये हैँ ये चारोँ काम मेँ लगे हुऐँ हैँ।
वो संत भागकर रसोई मेँ गये और सिर्फ एक झलक देखी की सीता जी भोजन बना रही हैँ रामजी पत्तल बना रहे है और फिर वो गायब हो गये और मंदिर मेँ विराजमान हो गये।
संत रामदास के पास गये और बोले आज तुमने मुझे मेरे ठाकुर का दर्शन कराया तु धन्य हैँ।
और संत ने रो रो कर रामदास के पैर पकड़ लिये…!

भक्त मित्रोँ कहने का अर्थ यही हैँ की ठाकुर जी तो आज भी तैयार हैँ दर्शन देने के लिये पर कोई रामदास जैसा भक्त भी तो होना चाहीये…
राम जी हमारे बापू सीता जी मेरी मैय्या हैँ,
लक्ष्मण जी है चाचा हमारे हनुमान जी मेरे भैय्या हैं.
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(((((((((( जय जय श्री राम ))))))))))

संजय गुप्ता

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श्रीमदभगवदगीता
[अध्याय 4 श्लोक 13]
भाग =1
चातुवर्ण्यं मया सृष्टं गुण कर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।

चातुः-वर्ण्यम्-मानव समाज के चार विभाग;  मया-मेरे द्वारा; सृष्टम्-उत्पन्न किये हुए;  गुण-गुण;  कर्म-तथा कर्म का; विभागशः-विभाजन के अनुसार;  तस्य-उसका;
कर्तारम्-जनक;  अपि-यद्यपि;  माम्-मुझको;  विद्धि-जानो; अकर्तारम्-न करने के रूप में;  अव्ययम्-अपरिवर्तनीय को।

प्रकृति के तीनों गुणों और उनसे सम्बद्ध कर्मों के अनुसार इस सृष्टि में दृष्टिगोचर होने वाले मनुष्य समाज के मेरे द्वारा चार विभाग रचे गये हैं।
यद्यपि मैं इस व्यवस्था का सृष्टा हूँ, किन्तु तुम यह स्पष्ट रूप से  जान लो कि मैं अविनाशी ब्रह्म इस सृष्टि के रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी वास्तविक रूप से इससे सम्पूर्ण रूप से अलिप्त, अव्यय, अकर्ता ही हूँ।

भगवान् ही प्रत्येक वस्तु के स्त्रष्टा हैं।
प्रत्येक वस्तु उनसे ही उत्पन्न है।
प्रत्येक जीव उनसे ही उत्पन्न है।
प्रत्येक जीव उनके द्वारा ही पालित है।
प्रत्येक जीव व वस्तु  प्रलय के बाद उन्हीं में समा जाती है।
अतः वे ही वर्णाश्रम व्यवस्था के स्त्रष्टा हैं।
जिसमें सर्वप्रथम बुद्धिमान् मनुष्यों का वर्ग आता है।
जो सत्वगुण प्रधान तथा शम-दमादि सात्विक कर्मों में रत रहने  के कारण ब्राह्मण कहलाते हैं।
द्वितीय शौर्य तेजादि लक्षणों वाला प्रशासक वर्ग होता है जिन्हें सत्वमिश्रित रजोगुणी होनेके कारण क्षत्रिय कहा जाता है।
कृषि व गौरक्षा जैसे कार्य करने वाले तमोमिश्रित रजोगुण युक्त
वणिक वर्ग या वैश्य कहलाते हैं।
और तमोगुण की प्रचुरता वाले (शुद्र अर्थात छोटा, लघु बुद्धि में भी, बल में भी, धन में भी, साहस में भी, हरेक प्रकार से जो दुर्बल है वह शुद्र अर्थात छोटा होता है) सेवक व श्रमिक वर्ग के होते हैं।
तमोगुण प्रकृति के मनुष्य तमोगुण की अधिकता के कारण सर्वथा गुणहीन ही होते हैं केवल व केवल इसलिए इस प्रकार के मनुष्य सेवा परायणता के बल पर सरलता से जीवन यापन कर सकता है।
इसी कारण भगवान श्रीकृष्ण इन्हें सेवापारायण भी कहते हैं।
मानव समाज के इन चार विभागों की रचना करने पर भी भगवान् श्रीकृष्ण इनमें से किसी विभाग (वर्ण) में नहीं आते।
क्योंकि वे उन बद्धजीवों में से नहीं हैं जिनका एक अंश मानव समाज के रूप में है।
इस प्रकार इस जगत् मे निरंतर चलने वाली भगवान के द्वारा गुणकर्मविभाग पुर्वक चतुर्वर्ण की रचना होती है।
मानव समाज भी अन्य पशुसमाज के तुल्य ही होता है।
किन्तु मनुष्यों को पशु-स्तर से ऊपर उठाने के लिए ही उपर्युक्त वर्णाश्रम की रचना की गई है।
जिससे क्रमिक रूप से मनुष्य सभ्यता विकसित हो सके।
यह केवल मनुष्यों के अधिकार क्षेत्र में आने वाला कर्म और उपासना का विषय है।
जिसे मनुष्य को लक्षित करके कहा गया है। 
किसी विशेष व्यक्ति की किसी कार्य के प्रति प्रवृत्ति का निर्धारण उसके द्वारा अर्जित प्रकृति के गुणों द्वारा किया जाता है।
गुणों के अनुसार जीवन के लक्षणों का वर्णन इस ग्रंथ के अठारहवें अध्याय में हुआ है।
यद्यपि पुर्वजन्म के संस्कार तथा वर्तमान के कर्म व जन्म तीनों ही वर्णके अंग होने के कारण तीनों अंगों की संलिप्तता के कारण ही वर्ण की पुर्णता सिद्ध होती है किन्तु इनमें भी विद्वानों ने जन्म को ही प्राथमिकता देकर जन्म को ही वर्ण का प्रमुख आधार कहा है।
किन्तु संगदोष के कारण कर्मों में व्यतिक्रम होने पर वर्णरक्षा तो संभव होती है।
परन्तु इसमें कर्मशुद्धि भी अति आवश्यक होती है।
क्योंकि कर्मदोषों के कारण वर्ण रक्षा अति कठिन हो जाती है।
जैसे पापकर्म करने वाला मनुष्य जन्म से ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय होने पर भी कल्याण का अधिकारी नही होता।
उसी प्रकार यज्ञ हवन विवाह व अन्य अनुष्ठानिक कर्मों को आजीविका का साधन बनाकर जीवन यापन करने वाला ब्राह्मण भी कल्याण को प्राप्त नही होता हां इस प्रकार के कर्म करने से उसे कोई दोष नही होता परन्तु कल्याण की कामना करने वाला ब्राह्मण इस प्रकार के कार्यों से दूर रहकर शम,दमादि क्रियाओं द्वारा परब्रह्मपरमात्मा की प्राप्ति मे ही रत रहता है।
और वास्तव मे परब्रह्मपरमात्मा की प्राप्ति हेतु साधना में रत व्यक्ति ही ब्राह्मण होता है।
यद्यपि सत्वगुण के कारण ही मनुष्य परब्रह्मपरमात्मा की ओर सहज रूप से ही आकर्षित होता है तथा सतत उसकी प्राप्ति के उपाय करते रहने के कारण ही उस मनुष्य को ब्राह्मण कहते हैं।
मनुष्य को ब्रह्म या परमसत्य के विषय में ज्ञान होना ही चाहिए। किन्तु सहस्त्रों साधकों में से अधिकांश साधक भगवान् के निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप को ही प्राप्त कर पाते हैं।
इसी कारण उन्हें ब्राह्मण कहते हैं।
किन्तु जो मनुष्य अपने स्वयं के सीमित ज्ञान को लाँघकर परब्रह्मपरमात्मा के असीम ज्ञान तक पहुँच जाता है।
वही शुद्ध रूप से मन, कर्म, वचन से सात्विक होता है।
अर्थात् वही शुद्ध रूप से सत्वगुणी ब्राह्मण होता है।
और जिस तरह कृष्ण मानव समाज की इस चातुर्वर्ण्य प्रणाली से परे हैं।
ठीक उसी प्रकार कर्म के सिद्धांत को ठीक से समझकर आचरण करने वाला व्यक्ति भी इस चातुर्वर्ण्य प्रणाली से परे होता है।
क्रमशः
सर्वे भवन्तुः सुखीनाः
श्री श्री 1008 महामण्डलेश्र्वर
स्वामी सहजानन्द गिरिजी महाराज।

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सौतेली माँ 🤔

एक व्यक्ति था उसकी पत्नी का देहांत प्रसव के दौरान ही हो गया था परन्तु किसी तरह बच्चा हो गया था।
छोटा बच्चा माँ के बिना कैसे संभाला जाएगा ये एक बहुत ही चिंता का विषय हो गया था।
कई मित्रों व सगे सम्बन्धियों के कहने पर उसने पुनः विवाह किया, बच्चे को नई माँ मिल गयी।

नयी माँ बच्चे की सार सम्भार करने लगी बच्चे को भी लगा जैसे की उसकी माँ फिर से मिल गयी।
कुछ ही वर्षों में उस युवती को भी एक पुत्र हुआ और उसका ध्यान अपने नए बच्चे पर अधिक रहने लगा।
धीरे धीरे उसकी दृष्टि में दोष आने लगा और वो पक्षपात से ग्रसित हो गयी।
अब उसे लगने लगा की इस घर का वारिस तो बड़ा लड़का है और संपत्ति पर भी अधिक हक़ इसी लड़के का है।

उसे अपने पुत्र के भविष्य की बहुत चिंता रहने लगी।
उसने अपने पति को समझा बुझाके राज़ी किया और बड़े लड़के की पढाई लिखाई सब छुड़वा दी और घर के नौकर को भी हटा दिया तथा सब काम उसी लड़के से कराने लगी।
बच्चे के ऊपर बहुत बड़ी विपदा आ पड़ी वो अभी दूसरी कक्षा में ही था और दुनियादारी कुछ नहीं जानता था।
उसे यही लगता था माँ ने सही किया होगा घर का सारा काम करते करते उसका पूरा दिन बीत जाता था।

धीरे धीरे माँ ने उसे समझा दिया कि उसका असली कार्य अपने छोटे भाई की सेवा ही है और उसका छोटा भाई ही असली मालिक है।
बच्चे ने माँ की आज्ञा मान ली और सदा ही अपने भाई की सेवा सम्भार में तत्पर रहने लगा।
अब वो बड़े लड़के को ज़रा ज़रा सी ग़लती होने पर डांटने मारने भी लगी थी ताकि उस पर एक भय बना रहे। वो कोई अच्छे से अच्छे काम भी करता तो उसकी सौतेली माँ उसे बिलकुल बेकार बताती लेकिन फिर भी बालक के मन में माता के लिए प्यार ही उभरता वो उसे सौतेली नहीं मान पाता था।

उस औरत ने घर के पूजा पाठ का जिम्मा भी उसी बच्चे को दे रखा था अतः उस बालक की बुद्धि धीरे धीरे आध्यात्मिक होने लगी।
जैसे जैसे वो बड़ा होने लगा उसे सच्चाई समझ में आने लगी लेकिन वो अपना सब दुःख भगवान से ही कह कर संतोष कर लेता था और उसका सारा दुःख समाप्त हो जाता था।
पिता से वो बहुत प्रीती करता था और जानता था की पिता उसकी स्थति से बहुत दुखित रहते हैं लेकिन वो उनसे हमेशा माँ की बढ़ाई ही करता था।

पिता का होना ही उसके लिए बहुत था परन्तु उसके पिता भी एक बिमारी में चल बसे और वो बिलकुल अकेला हो गया।
बस भगवान ही उसके रह गए । समय बीतने लगा और दोनों बच्चे बड़े हो गए । अब घर का सारा अधिकार सौतेली माँ के हाथ में था।

योजना के अनुसार बड़े बच्चे की शादी उस औरत ने बहुत ही गरीब घर में व् अनपढ़ औरत से करी तथा अपने पुत्र की बहुत बड़े घर में व पढ़ी लिखी युवती से करी।
उसने बड़े लड़के को नौकरों वाले घर में से एक घर दे दिया और उसकी पत्नी को भी बता दिया की उसका असली कार्य मालकिन यानी छोटी बहु की सेवा करना ही है।
छोटे लड़के के लिए उसने बहुत बड़ा भवन बनवाया था और स्वयं उसी में उन्ही के साथ निवास करने लगी।

बड़ा लड़का ख़ुशी से अपना जीवन व्यतीत करने लगा और पत्नी के साथ माँ व छोटे भाई के परिवार की सेवा करने लगा ।
छोटे लड़के की स्त्री को उसकी माँ बहुत अखरती थी उसे लगता था की मालकिन उसे होना चाहिए।
अब सास बीमार भी रहती थी और साथ में रहने के कारण रात बिरात सेवा उस छोटी बहु को ही करनी पड़ती थी जो उसे बिलकुल नापसंद था।
एक दिन पता चला की सास को छूत की बिमारी हो गयी है ये जानकर तो छोटी बहु और दूर दूर रहने लगी। उसकी आँखों में सास खटकने लगी।

उसने अपने पति से कह दिया की इस घर में या तो वो रहेगी या उसकी माँ।
छोटे लड़के पर अपनी पत्नी का जादू चढ़ा हुआ था उसने अपनी ही माँ को घर से बाहर निकाल दिया और उसे वहीँ नौकरों के घर में रहने को कह दिया।
अब माँ भी वृद्ध हो गयी थी और अचानक हुए इस घटनाक्रम से एकदम बदहवास हो गयी।

उसे अपने जीवनभर की पूँजी व्यर्थ जाती दिखी वो तो अपने इस बेटे के ऊपर पूरी तरह निर्भर थी उसने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था।
उसे लगने लगा की अब उसकी सेवा कौन करेगा, उसने आत्महत्या करने का निर्णय ले लिया और गंगा जी में डूबने चल दी।
बड़ा लड़का कहीं बाहर गया था और उसे कुछ पता नहीं था, वो एक घाट से गुज़र रहा था शोर सुना तो देखा कोई नदी में डूब रहा है।
उसने भी छलांग लगा दी और जब बचाके लाया तो देखा की ये ये तो उसकी ही सौतेली माँ है।

जब सारी बात पता चली उसे तो वो बहुत दुखित हुआ और अपने पत्नी व माँ के साथ घर त्याग दिया व दूसरे गाँव में रहने लगा।
उसने अपने पत्नी के साथ माँ की बहुत सेवा करी और वो ठीक हो गयी। वो लोग अच्छे से जीवन बसर करने लगे।

एक दिन उसकी माँ से बड़ी बहु ने पूछा माँ मुझे कुछ शिक्षा दें तो सास कि आँखों में आँसू भर आये उसने मात्र इतना कहा कि बेटी तुम्हारा पति तो भगवान के समान है शिक्षा तुम्हे उससे ही लेनी चाहिए। मैं तो इतना ही कहूँगी कि किसी को भी पराया नहीं समझना चाहिए और जीवन में किसी के साथ इतना बुरा मत करना कि जब वो तुम्हारे साथ फिर भी भलाई करे तो तुम्हारी आत्मा को गंवारा न हो।

Laxmikant Varshnay