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भारत का गौरवशाली अतीत !

★तक्षशिला विश्वविद्यालय★

‘तक्षशिला विश्वविद्यालय’ वर्तमान पाकिस्तान की राजधानी रावलपिण्डी से 18 मील
उत्तर की ओर स्थित था।

जिस नगर में यह विश्वविद्यालय था उसके बारे में कहा जाता है कि श्री राम के भाई
भरत के पुत्र तक्ष ने उस नगर की स्थापना की थी।

यह विश्व का प्रथम विश्विद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी।

तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे।

यहां 60 से भी अधिक विषयों को पढ़ाया जाता था।

326 ईस्वी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार का
सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के चिकित्सा शास्त्र का एक
मात्र सर्वोपरि केन्द्र था।

तक्षशिला विश्वविद्यालय का विकास विभिन्न रूपों में हुआ था।

इसका कोई एक केन्द्रीय स्थान नहीं था,अपितु यह विस्तृत भू भाग में फैला हुआ था।

विविध विद्याओं के विद्वान आचार्यो ने यहां अपने विद्यालय तथा आश्रम बना रखे थे।

छात्र रुचिनुसार अध्ययन हेतु विभिन्न आचार्यों के पास जाते थे।

महत्वपूर्ण पाठयक्रमों में यहां वेद-वेदान्त,अष्टादश विद्याएं,दर्शन,व्याकरण,अर्थशास्त्र,
राजनीति,युद्धविद्या,शस्त्र-संचालन, ज्यतिष,आयुर्वेद,ललित कला,हस्त विद्या,अश्व-विद्या,
मन्त्र-विद्या,विविध भाषाएं,शिल्प आदि की शिक्षा विद्यार्थी प्राप्त करते थे।

प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार पाणिनी,कौटिल्य,चन्द्रगुप्त,जीवक,कौशलराज,
प्रसेनजित आदि महापुरुषों ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की।

तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेतनभोगी शिक्षक नहीं थे और न ही कोई निर्दिष्ट
पाठयक्रम था।

आज कल की तरह पाठयक्रम की अवधि भी निर्धारित नहीं थी और न कोई विशिष्ट
प्रमाणपत्र या उपाधि दी जाती थी।

शिष्य की योग्यता और रुचि देखकर आचार्य उनके लिए अध्ययन की अवधि स्वयं
निश्चित करते थे।

परंतु कहीं-कहीं कुछ पाठयक्रमों की समय सीमा निर्धारित थी।

चिकित्सा के कुछ पाठयक्रम सात वर्ष के थे तथा पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद प्रत्येक
छात्र को छ: माह का शोध कार्य करना पड़ता था।

इस शोध कार्य में वह कोई औषधि की जड़ी-बूटी पता लगाता तब जाकर उसे डिग्री
मिलती थी।

★यह विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में
की गई थी।★

★तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन
करते थे।★

★यहां 60 से भी अधिक विषयों को पढ़ाया जाता था।★

★326 ईस्वी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार
का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के’चिकित्सा शास्त्र’का
एकमात्र सर्वोपरि केन्द्र था।★

★आयुर्वेद विज्ञान का
सबसे बड़ा केन्द्र★

500 ई. पू. जब संसार में चिकित्सा शास्त्र की परंपरा भी नहीं थी तब तक्षशिला’आयुर्वेद
विज्ञान’का सबसे बड़ा केन्द्र था।

जातक कथाओं एवं विदेशी पर्यटकों के लेख से पता चलता है कि यहां के स्नातक
मस्तिष्क के भीतर तथा अंतड़ियों तक का ऑपरेशन बड़ी सुगमता से कर लेते थे।

अनेक असाध्य रोगों के उपचार सरल एवं सुलभ जड़ी बूटियों से करते थे।

इसके अतिरिक्त अनेक दुर्लभ जड़ी-बूटियों का भी उन्हें ज्ञान था।

शिष्य आचार्य के आश्रम में रहकर विद्याध्ययन करते थे।
एक आचार्य के पास अनेक विद्यार्थी रहते थे।

इनकी संख्या प्राय: सौ से अधिक होती थी और अनेक बार 500 तक पहुंच जाती थी।

अध्ययन में क्रियात्मक कार्य को बहुत महत्त्व दिया जाता था।
छात्रों को देशाटन भी कराया जाता था।

★शुल्क और परीक्षा★

शिक्षा पूर्ण होने पर परीक्षा ली जाती थी।

तक्षशिला विश्वविद्यालय से स्नातक होना उससमय अत्यंत गौरवपूर्ण माना जाता था।

यहां धनी तथा निर्धन दोनों तरह के छात्रों के अध्ययन की व्यवस्था थी।

धनी छात्र आचार्य को भोजन,निवास और अध्ययन का शुल्क देते थे तथा निर्धन छात्र
अध्ययन करते हुए आश्रम के कार्य करते थे।

शिक्षा पूरी होने पर वे शुल्क देने की प्रतिज्ञा करते थे।

प्राचीन साहित्य से विदित होता है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले उच्च वर्ण
के ही छात्र होते थे।

सुप्रसिद्ध विद्वान,चिंतक,कूटनीतिज्ञ,अर्थशास्त्री चाणक्य ने भी अपनी शिक्षा यहीं
पूर्ण की थी।

उसके बाद यहीं शिक्षण कार्य करने लगे। यहीं उन्होंने अपने अनेक ग्रंथों की रचना की।

इस विश्वविद्यालय की स्थिति ऐसे स्थान पर थी,जहां पूर्व और पश्चिम से आने वाले
मार्ग मिलते थे।

चतुर्थ शताब्दी ई. पू. से ही इस मार्ग से भारतवर्ष पर विदेशी आक्रमण होने लगे।

विदेशी आक्रांताओं ने इस विश्वविद्यालय को काफ़ी क्षति पहुंचाई।

अंतत: छठवीं शताब्दी में यह आक्रमणकारियों द्वारा पूरी तरह नष्ट कर दिया।

★पाठ्यक्रम★

★उस समय विश्वविद्यालय कई विषयों के पाठ्यक्रम उपलब्ध करता था,
जैसे – भाषाएं,व्याकरण,दर्शन शास्त्र,चिकित्सा,शल्य चिकित्सा, कृषि,भूविज्ञान,
ज्योतिष,खगोल शास्त्र,ज्ञान-विज्ञान,समाज-शास्त्र,धर्म,तंत्र शास्त्र,मनोविज्ञान तथा
योगविद्या आदि।

★विभिन्न विषयों पर शोध का भी प्रावधान था।

★शिक्षा की अवधि 8 वर्ष तक की होती थी।

★विशेष अध्ययन के अतिरिक्त वेद,तीरंदाजी,घुड़सवारी,हाथी का संधान व एक दर्जन
से अधिक कलाओं की शिक्षा दी जाती थी।

★तक्षशिला के स्नातकों का हर स्थान पर बड़ा आदर होता था।

★यहां छात्र 15-16 वर्ष की अवस्था में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने आते थे।

स्वाभाविक रूप से चाणक्य को उच्च शिक्षा की चाह तक्षशिला ले आई।
यहां चाणक्य ने पढ़ाई में विशेष योग्यता प्राप्त की

जय महाकाल !!
जय जय श्री राम !!

★#प्रत्यंचासनातनसंस्कृति★

★पंकज मिथिलेश व्दिवेदी★
(मेरे अनुज अत्यंत प्रिय मित्र
दि• श्री मिथिलेश द्विवेदी
“अन्ना” जी)
—-यों तो गांधार की चर्चा ऋग्वेद से ही मिलती है[तथ्य वांछित]
किंतु तक्षशिला की जानकारी सर्वप्रथम वाल्मीकि रामायण से होती है।

अयोध्या के राजा रामचंद्र की विजयों के उल्लेख के सिलसिले में हमें यह ज्ञात होता है
कि उनके छोटे भाई भरत ने अपने नाना केकयराज अश्वपति के आमंत्रण और उनकी
सहायता से गंधर्वो के देश (गांधार) को जीता और अपने दो पुत्रों को वहाँ का शासक
नियुक्त किया।

गंधर्व देश सिंधु नदी के दोनों किनारे, स्थित था (सिंधोरुभयत: पार्श्वे देश: परमशोभन:,
वाल्मिकि रामायण, सप्तम, 100-11) और उसके दानों ओर भरत के तक्ष और पुष्कल
नामक दोनों पुत्रों ने तक्षशिला और पुष्करावती नामक अपनी-अपनी राजधानियाँ बसाई।
(रघुवंश पंद्रहवाँ, 88-9; वाल्मीकि रामायण, सप्तम, 101.10-11; वायुपुराण, 88.190,
महा0, प्रथम 3.22)।

तक्षशिला सिंधु के पूर्वी तट पर थी। उन रघुवंशी क्षत्रियों के वंशजों ने तक्षशिला पर कितने
दिनों तक शासन किया, यह बता सकना कठिन है।

महाभारत युद्ध के बाद परीक्षित के वंशजों ने कुछ पीढ़ियों तक वहाँ अधिकार बनाए रखा
और जनमेजय ने अपना नागयज्ञ वहीं किया था (महा0, स्वर्गारोहण पर्व, अध्याय 5)।

गौतम बुद्ध के समय गांधार के राजा पुक्कुसाति ने मगधराज विंबिसार के यहाँ अपना
दूतमंडल भेजा था।

छठी शती ई0 पूर्व फारस के शासक कुरुष ने सिंधु प्रदेशों पर आक्रमण किया और बाद
में भी उसके कुछ उत्तराधिकारियों ने उसकी नकल की। लगता है, तक्षशिला उनके कब्जे
में चली गई और लगभग 200 वर्षों तक उसपर फारस का अधिपत्य रहा।

मकदूनिया के आक्रमणकारी विजेता सिकंदर के समय की तक्षशिला की चर्चा करते
हुए स्ट्रैबो ने लिखा है (हैमिल्टन और फाकनर का अंग्रेजी अनुवाद, तृतीय, पृष्ट 90)
कि वह एक बड़ा नगर था,अच्छी विधियों से शासित था,घनी आबादीवाला था और
उपजाऊ भूमि से युक्त था।

वहाँ का शासक था बैसिलियस अथवा टैक्सिलिज।
उसने सिकंदर से उपहारों के साथ भेंट कर मित्रता कर ली।

उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र भी,जिसका नाम आंभी था,सिकंदर का मित्र बना रहा,
किंतु थोड़े ही दिनों पश्चात् चंद्रगुप्त मौर्य ने उत्तरी पश्चिमी सीमाक्षेत्रों से सिकंदर के
सिपहसालारों को मारकर निकाल दिया और तक्षशिला पर उसका अधिकार हो गया।
वह उसके उत्तरापथ प्रांत की राजधानी हो गई और मौर्य राजकुमार मत्रियों की सहायता
से वहाँ शासन करने लगे।

भारत का तक्षशिला विश्वविद्यालय विश्व का सबसे पुराना विश्वविद्यालय है।

भारत में कुछ ऐसे विश्वविद्यालय हैं जिनका इतिहास काफी पुराना रहा है,जिन्होंने
गुलाम भारत से स्वंत्रत भारत को भी देखा।

आज भी दुनिया में भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में लोहा मनवाया है।
#साभार_संकलित★

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,

सदा सर्वदा सुमंगल,,,
हर हर महादेव,
वंदेभारतमातरम,,,
जय श्री राम,,

image

विजय कृष्णा पांडेय

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————— #The_end_of_peshwai ————-

             ————#कोरेगांवकासच ————–

#भारतीयइतिहासकारोका_झूठ  —

500 वीर महार योद्धा
        वनाम
28000 पेशवा योद्धा

रिजल्ट — पेशवा की हार और ब्रिटिश सेना की जीत  ।।
     
                          — #सच्चाई —

हम भारतीयों की एक समस्या है कि हम आसानी से किसी की भी बात मान लेते है और उसपे 2 तीन झूठे तथ्य कोई रख दे तो हम उसका सोर्स भी कन्फर्म नही करते कि सच भी या सिर्फ झूठ का पुलिंदा ।।

कोरेगांव की लड़ाई मराठो और ब्रिटिश शासन के बीच लड़ी गयी तीसरी लड़ाई थी जिसमे न तो किसी की जीत हुई न हार फिर मराठा हार गए ये कहना सरासर गलत है आइये इसकी सच्चाई तथ्यों और आकड़ो के आईने से देखते है —

#मराठा_संघ (साम्राज्य) —
पुणे के पेशवा , ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होल्कर, बड़ौदा के गायकवाड़ और नागपुर के भोसले शासित राज्यों को एक साथ मराठा साम्राज्य बोला जाता था ।।
और सभी पेशवा के आदेशों का पालन करते थे । ब्रिटिश हुकुमत ने 2 लड़ाइयों में बुरी तरह हारने के बाद शांति समझौता कर लिया था , लेकिन अपना  “devide and rule” थीम के तहत लोगो को पेशवा के खिलाफ भड़काना नही छोड़ा और इसी के फलस्वरूप पेशवा और गायकवाड़ के बीच राजस्व-साझाकरण विवाद हो गया और गायकवाड़ ने ब्रिटिश हुकूमत से मदद मांगी तो  13 जून 1817 को, कंपनी ने पेशवा बाजी राव द्वितीय को  समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया जिसमे ये लिखा था कि पेशवा गायकवाड़ राजस्व जो अब ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा है उसपे उनका कोई नियंत्रण नही होगा। पुणे की इस संधि ने औपचारिक रूप से अन्य मराठा प्रमुखों पर पेशवा की उपनिष्ठा समाप्त कर दी, इस प्रकार आधिकारिक तौर पर मराठा संघ का अंत हो गया।

#कोरेगांवकीलड़ाई —

5 नवंबर 1817 को पुणे के पास खड़की में पेशवा और ब्रिटिश सेना की मुठभेड़ हुई और जब बाजीराव को लगा कि वो बंदूखो और तोपो के सामने तलवारों से नही लड़ सकते तो उन्होंने पीछे हटने का निर्णय लिया और कोंकड कि ओर बढ़ने की सोची सतारा से हटने के बाद भीमा नदी के सहारे उन्होंने कोंकड की ओर बढ़ना शुरू किया और कोरेगांव के पास नदी जब पार करने जा रहे थे तभी उन्हें ब्रिटिश सेना द्वारा देख लिया गया जो शिरूर से भेजे जा रहे थे पुणे में पेशवा से लड़ने के लिए लेकिन उनकी मुठभेड़ कोरेगांव में ही हो गयी ।

#सेनाओंकेसंख्याबल —

अब आते है उस मुद्दे पर जिसपर राजनीति की रोटी सेकी जाती है कहा जाता है कि 28000 मराठा से 500 महार लड़े लेकिन ये सिर्फ झूठ है बॉम्बे गजेटियर की एक रिपोर्ट मैंने पिक डाल रखी है उसके अनुसार ,

पेशवा की सेना में 20,000 घुड़सवार और 8,000 पैदल सेना शामिल थीं। इनमें से लगभग 1200 पुरुषों को लड़ने के लिए भेजा गया जिनमे 300 गोसाई 300 अरब और 600 मराठा योद्धा थे यानी कुल 1200 पेशवा लड़ाके हमला बापू गोखले, अप्पा देसाई और त्रिंबकजी डेंगले की अगुवाई में लड़ा गया।। जिनके पास सिर्फ तलवार भाले और तीर कमान ही थे ।।

ब्रिटिश सेना में बॉम्बे नेशनल इन्फैंट्री की पहली रेजिमेंट के दूसरे बटालियन के 500 सैनिक (महार कितने इसका कोई उल्लेख कही नही मिलता) ,लेफ्टिनेंट और एडजंटेंट पैटिसन लेफ्टिनेंट जोन्स सहायक-सर्जन विंगेट लेफ्टिनेंट स्वानस्टोन के तहत करीब 300 सहायक सवार थे 24 यूरोपीय और 4 निवासी मद्रास आर्टिलरीमेन, जो छह 6 पौंड बंदूकें के साथ यानी 834 कि संख्या में वो भी 28 टोपे और 300 बंदूखो के साथ ।।

#युद्धकापरिणाम —
600 मराठाओ ने 300 अरब योद्धाओं के साथ नदी पार करने और कोरेगांव में स्थित ऊँचाई पर खड़े पहली पंक्ति की आर्टिलरी पर कब्जा करने का लक्ष्य रखा ताकि उसके पीछे स्थित कच्ची मिट्टी की दीवार के पीछे तैनात तोप के गोलों का जवाब तोप के गोलों से और बन्दूको से दिया जा सके नही तो पहली पंक्ति जीतने के बावजूद सब मारे जाते ।। इस नदी को पार करने और ब्रिटिश आर्टिलरी तक पहुँचने में 400 मारे गए जिनमे से 150 के आसपास अरब योद्धा थे , बाकी बचे 500 सैनिकों में अगुवाई कर रहे सभी योद्धाओं में सिर्फ त्र्यंबकजी ही जीवित बच पाए और 300 सैनिक जो गोसाई थे पिछली पंक्ति में वो आगे आ गये ,और ब्रिटिश सेना के पहली पंक्ति में तैनात सभी 150 सैनिक मारे गए ।।
दूसरी बार जब दीवार के पीछे के फायर कर रहे सैनिकों तक पहुँचने को कोसिस में 800 सैनिकों में से 150 मारे गए और छीनी गयी तोपो और बंदूखो के हमले से ब्रिटिश सेना के 200 सैनिक मारे गए ।। और सेना की छती को देखते हुए त्र्यंबकजी ने बचे हुए 650 सैनिकों के साथ पीछे हटने का निर्णय लिया , और पेशवा के साथ नासिक के ओर बढ़ने का निर्णय लिया मतलब साफ है — 1200 तलवारों के सामने 800 सैनिक तोपो और बंदूखो क साथ फिर भी वो डटे रहे युद्ध में किसी भी पक्ष ने निर्णायक जीत हासिल नहीं की।

#ब्रिटिशबॉम्बेगजेटियर कहता है कि – 
834 कम्पनी सैनिकों में से 275 लोग मारे गए, घायल हो गए या लापता हो गए। मृतों में दो अधिकारी शामिल थे – सहायक-सर्जन विंगेट और लेफ्टिनेंट चिशोल्म; लेफ्टिनेंट पैटिसन बाद में शिरूर में उनके घावों के कारण मृत्यु हो गई। पैदल सैनिकों में से 50 मारे गए और 105 घायल हुए। तोपखाने में 12 लोग मारे गए और 8 घायल हुए।
पेशवा के लगभग 500 से 600 सैनिक युद्ध में मारे गए या घायल हुए।

माउंटस्टुआर्ट एलफिन्स्टन ने इसे पेशवा के लिए “छोटी सी जीत” बताया फिर ये महारो के शौर्य का प्रतीक किस इतिहासकार ने बनाया ऊपर वाला ही जाने ।।

#विशेष — अपने मृत सैनिकों की स्मृति में, कंपनी ने कोरेगांव में “विजय स्तंभ” (एक ओबिलिस्क) का निर्माण किया। स्तंभ के शिलालेख घोषित करता है कि कप्तान स्टॉन्टन की सेना ने “पूर्व में ब्रिटिश सेना की गर्वित विजय हासिल की।”

फिर ये विजय स्तम्भ और महार संबंध कहा से आये तो इसका जवाब है अम्बेडकर की राजनैतिक महत्वाकांक्षा 1 जनवरी 1927 तक इस विजय स्तम्भ पर कोई नाम महार या महार योद्धा जैसा कुछ नही था इसी दिन अम्बेडकर ने उस विजय स्तम्भ पर महारो के नाम खुदवाए हुए संगमरमर एक एक शिलालेख लगवाया जिसका किसी ने विरोध नही किया क्योंकि सब राजनीति की रोटी सेकना चाहते थे ।। उसका परिणाम हम आज भुगत रहे है गलत इतिहास का खंडन छोटे स्तर से ही सही लेकिन हो चुका है ।।
कोरेगांव की लड़ाई कही से भी महार शौर्य का प्रदर्शन नही करती है ये बस राजनैतिक महत्वाकांक्षा में हमे आपस मे लड़ाने का एक सुनियोजित प्रोपेगैंडा है ।।

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गज़ब का संदेश

किसी समय दुनिया के सबसे धनवान व्यक्ति बिल गेट्स से किसी न पूछा – ‘क्या इस धरती पर आपसे भी अमीर कोई है ?
बिल गेट्स ने जवाब दिया – हां, एक व्यक्ति इस दुनिया में मुझसे भी अमीर है.
कौन —!!!!!
बिल गेट्स ने बताया –
एक समय में जब मेरी प्रसिद्धि और  अमीरी के दिन नहीं थे, न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर था.. वहां सुबह सुबह अखबार देख कर, मैंने एक अखबार खरीदना चाहा,पर मेरे पास खुदरा पैसे नहीं थे.. सो, मैंने अखबार लेने का विचार त्याग कर उसे वापस रख दिया.. अखबार बेचने वाले काले लड़के ने मुझे देखा, तो मैंने खुदरा पैसे/सिक्के न होने की बात कही.. लड़के ने अखबार देते हुए कहा – यह मैं आपको मुफ्त में देता हूँ.. बात आई-गई हो गई.. कोई तीन माह बाद संयोगवश उसी एयरपोर्ट पर मैं फिर उतरा और अखबार के लिए फिर मेरे पास सिक्के नहीं थे. उस लड़के ने मुझे फिर से अखबार दिया, तो मैंने मना कर दिया. मैं ये नहीं ले सकता.. उस लड़के ने कहा, आप इसे ले सकते हैं,मैं इसे अपने प्रॉफिट के हिस्से से दे रहा हूँ.. मुझे नुकसान नहीं होगा. मैंने अखबार ले लिया……
19 साल बाद अपने प्रसिद्ध हो जाने के बाद एक दिन मुझे उस लड़के की याद आयी और मैन उसे ढूंढना शुरू किया. कोई डेढ़ महीने खोजने के बाद आखिरकार वह मिल गया. मैंने पूछा – क्या तुम मुझे पहचानते हो ?
लड़का – हां, आप मि. बिल गेट्स हैं.
गेट्स – तुम्हे याद है, कभी तुमने मुझे फ्री में अखबार दिए थे ?
लड़का – जी हां, बिल्कुल.. ऐसा दो बार हुआ था..
गेट्स- मैं तुम्हारे उस किये हुए की कीमत अदा करना चाहता हूँ.. तुम अपनी जिंदगी में जो कुछ चाहते हो, बताओ, मैं तुम्हारी हर जरूरत पूरी करूंगा..
लड़का – सर, लेकिन क्या आप को नहीं लगता कि, ऐसा कर के आप मेरे काम की कीमत अदा नहीं कर पाएंगे..
गेट्स – क्यूं ..!!!
लड़का – मैंने जब आपकी मदद की थी, मैं एक गरीब लड़का था, जो अखबार बेचता था..
आप मेरी मदद तब कर रहे हैं, जब आप इस दुनिया के सबसे अमीर और सामर्थ्य वाले व्यक्ति हैं.. फिर, आप मेरी मदद की बराबरी कैसे करेंगे…!!! 😊😊
बिल गेट्स की नजर में, वह व्यक्ति दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति से भी अमीर था, क्योंकि—–
“किसी की मदद करने के लिए, उसने अमीर होने का इंतजार नहीं किया था “….
😊😊😊

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कोरिया की एक भिक्षुणी, एक संन्यासिनी एक रात एक गाँव में भटकी हुई पहुँची। रास्ता भटक गयी थी, जिस गाँव पहुँचना चाहती थी, वहाँ न पहुँच कर दूसरे गाँव पहुँच गयी ! उसने जाकर एक द्वार पर दरवाजा खटखटाया। आधी रात है। दरवाजा खुला। लेकिन उस गाँव के लोग दूसरे धर्म को मानते थे। वह भिक्षुणी दूसरे धर्म की थी। उस दरवाजे के मालिक ने दरवाजा बन्द कर लिया और कहा : देवी! यह द्वार तुम्हारे लिए नहीं है। हम इस धर्म को नहीं मानते। तुम कहीं और खोज करो। और चलते वक्त यह भी कहा कि इस गाँव में शायद ही कोई दरवाजा तुम्हारे लिए खुले। क्योंकि इस गाँव के लोग दूसरे ही धर्म को मानते हैं, और हम तुम्हारे धर्म के शत्रु हैं।         आप तो जानते ही हैं, धर्म धर्म आपस में बड़े शत्रु हैं ! एक गाँव का अलग धर्म है, दूसरे गाँव का अलग धर्म है। एक धर्म वाले को दूसरे धर्म वाले के यहाँ कोई शरण नहीं, कोई प्रेम नहीं, कोई आशा नहीं, कोई हमदर्दी नहीं !                                                   द्वार बन्द हो जाते हैं। द्वार बन्द हो गये उस गाँव में ! उसने दो- चार दरवाजे खटखटाये, लेकिन कोई दरवाजा नहीं खुला। सर्द रात है, वह अकेली स्त्री है, कहाँ जायेगी ? लेकिन धार्मिक लोग इस तरह की बात नहीं सोचते। धार्मिक लोगों ने ‘ मनुष्यता ‘ जैसी बात कभी सोची ही नहीं ! वे हमेशा सोचते हैं, हिन्दू है या मुसलमान। बौद्ध है, या जैन। आदमी का सीधा कोई मूल्य उनकी दृष्टि में कभी नहीं होता। उस स्त्री को गाँव छोड़ना पड़ा ! आधी रात जाकर गाँव के बाहर वो एक पेड़ के नीचे  सो गयी ! कोई दो घंटे बाद ठंड के कारण उसकी नींद खुली। उसने आँखें खोलीं। ऊपर आकाश तारों से भरा था। उस वृक्ष पर फूल खिल गये हैं। रात के खिलने वाले फूल, उनकी सुगन्ध चारों तरफ फैल गयी है। वृक्ष के फूल चटक रहे हैं। आवाज आ रही है। और फूल खिलते जा रहे हैं। वह आधी घड़ी तक मौन उस फूल को, उन वृक्ष के फूलों को देखती रही। आकाश के तारों को देखती रही। फिर दौड़ी गाँव की तरफ, जाकर फिर उसने उन दरवाजों को खटखटाया, जिन दरवाजों को उनके मालिकों ने बन्द कर लिया था। आधी रात फिर कौन आया ? उन्होंने दरवाजे खोले, वही भिक्षुणी खड़ी है! उन्होंने कहा : हमने मना कर दिया, यह द्वार तुम्हारे लिए नहीं है। फिर दोबारा क्यों आयी हो ?                                          लेकिन भिक्षुणी की आँखों से आँसू बहे जाते हैं। उसने कहा : नहीं! अब द्वार खुलवाने नहीं आयी, अब ठहरने नहीं आयी, केवल धन्यवाद देने आयी हूँ। काश ! तुम आज मुझे अपने घर में ठहरा लते, तो  रात आकाश के तारे और फूलों का चटककर खिल जाना – मैं देखने से वंचित ही रह जाती। मैं सिर्फ धन्यवाद देने आयी हूँ कि तुम्हारी बड़ी कृपा थी कि तुमने द्वार बन्द कर लिये और मैं आकाश के नीचे सो सकी। तुम्हारी बड़ी कृपा थी कि तुमने घर की दीवालों से मुझे बचा लिया और खुले आकाश में मुझे भेज दिया।                                                     जब तुमने मुझे भेजा था, तब तो मेरे मन को लगा था कि कैसे बुरे लोग हैं। अब मैं यह कहने आयी हूँ कि कैसे भले लोग हैं इस गाँव के। मैं धन्यवाद देने आयी हूँ, परमात्मा तुम पर कृपा करे। जैसी तुमने मुझे अनुभव की रात दे दी, जो आनन्द मैंने आज जाना है, जो फूल मैंने आज खिलते देखे हैं – जैसे मेरे भीतर भी कोई प्राणों की कली चिटक गयी हो, खुल गयी हो। जैसी आज अकेली रात में मैंने आकाश के तारे देखे हैं, जैसे मेरे भीतर ही कोई आकाश स्पष्ट हो गया हो, और तारे खिल गये हों। मैं उसके लिये धन्यवाद देने आयी हूँ। भले लोग हैं तुम्हारे गाँव के‌।                                                      परिस्थिति कैसी है, इस पर कुछ निर्भर नहीं करता। हम परिस्थिति को कैसे लेते हैं, सब इस पर निर्भर करता है। हर एक व्यक्ति को परिस्थिति कैसी लेनी है, यह सीख लेना चाहिए। तब तो राह पर पड़े पत्थर भी सीढियाँ बन जाते हैं। और जब हम परिस्थितियों को गलत ढँग से लेने के आदी हो जाते हैं, तो सीढ़ियाँ भी ‘ पत्थर ‘ मालूम पड़ने लगती हैं।

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तुरंत उत्तर न देना जीवन का परम सूत्र ।

गुरजिएफ एक फकीर हुआ, यूनान में। उसने अपनी आत्म-कथा में लिखा कि मेरा पिता मृत्यु-शय्या पर था, उसने मुझे अपने पास बुलाया, तब चौदह वर्ष की मेरी उम्र थी, मुझसे कान में उसने कहा: कि अगर मैं कोई सलाह दूं तो तुम बुरा नहीं मानोगे? बहुत समझदार आदमी रहा होगा वह, क्योंकि सलाह देने वाले यह कभी पूछते नहीं कि बुरा मानोगे कि नहीं मानोगे? सलाह देने वाले मुफ्त सलाह बांटते हैं। और दुनिया में जो चीज सबसे ज्यादा दी जाती है और सबसे कम ली जाती है, वह सलाह ही है। उस बूढ़े आदमी ने जिसकी नब्बे वर्ष उम्र थी, चौदह वर्ष के बच्चे से पूछा कि क्या मैं तुम्हें सलाह दूं तो तुम बुरा नहीं मानोगे? और अगर मैं तुम्हें सलाह दूं तो कभी तुम जीवन में मेरे प्रति रुष्ट तो नहीं रहोगे? उस युवक ने कहा कि आप कैसी बात करते हैं? आप कहें, आपको मुझे क्या कहना है? उस बूढ़े आदमी ने कहा: मेरे पास न तो संपत्ति है तुम्हें देने को, न मेरे पास और किसी तरह की यश और प्रतिष्ठा है, लेकिन जीवन भर अनुभव से मैंने एक बात पहचानी और जानी, वह मैं तुम्हें देना चाहता हूं। और वह यह है कि तुम खुद को खुद से जरा दूर रख कर देखना सीखना। अगर रास्ते पर तुम्हें कोई मिल जाए और तुम्हें गाली दे, तो जल्दी से उसकी गाली का उत्तर मत देना, घर लौट आना, दूर खड़े होकर देखना कि उसने जो गाली दी वह कहीं ठीक ही तो नहीं है? अगर वह ठीक हो, तो उसको जाकर धन्यवाद दे आना कि तुमने मुझ पर बड़ी कृपा की और एक बात मुझे बताई जिसका मुझे पता नहीं था। अगर वह ठीक न हो, तो उसकी चिंता छोड़ देना। क्योंकि जो बात ठीक नहीं है उससे तुम्हें प्रयोजन ही क्या?

गुरजिएफ ने लिखा है: फिर मैंने जीवन भर–उसी रात पिता उसका मर गया–इस बात की फिकर की, उसने लिखा है कि मेरे जीवन में फिर लड़ने का कोई मौका नहीं आया। गालियां तो मुझे लोगों ने बहुत बार दीं, लेकिन पहले मैंने उनसे कहा कि मित्र रुको, मैं जरा घर जाऊं, सोच-समझ कर आऊं, और फिर मैं आकर तुम्हें बताऊं। जब मैं घर गया और मैंने सोचा-समझा, तो मैंने पाया, कोई गाली इतनी बुरी नहीं हो सकती जितना बुरा मैं हूं। मैंने जाकर धन्यवाद दिया और कहा कि मित्र बहुत-बहुत धन्यवाद, और सदा स्मरण रखना, और जब भी जरूरत पड़े और तुम्हारे मन में कोई गाली आ जाए, तो छिपाना मत, मुझे दे देना।

जैसे-जैसे व्यक्ति का आत्म-निरीक्षण गहरा होगा, वह कुछ और ही दिशा में अपने विवेक को जगता हुआ पाएगा।

लेकिन आत्म-निरीक्षण है बिलकुल सोया हुआ हमारा। हम कभी देखते नहीं–हम क्या कर रहे हैं, क्या हो रहे हैं, क्या चल रहा है। अगर कोई हमको बताए भी, तो हम लड़ने को खड़े हो जाते हैं। स्मरण रखना, अगर किसी गाली पर आप लड़ने को खड़े हो गए, तो पक्का समझ लेना कि आप उस गाली के योग्य थे, नहीं तो आप लड़ने को तैयार नहीं होते। आप लड़ने को तैयार नहीं होते। आपको यह फिकर पड़ गई फौरन की मैं सिद्ध कर दूं कि यह गाली गलत है, इसीलिए कि आप बहुत भीतर जानते हैं कि यह गाली सही है। और अगर मैंने सिद्ध न किया कि गलत है, तो दुनिया को पता चल जाएगा। तो जब भी आप यह सिद्ध करने की कोशिश में लगे हैं कि फलां दोष मुझमें नहीं है, तो बहुत शांति से समझ लेना, वह दोष जरूर आपमें होगा। नहीं तो आप उसे गलत सिद्ध करने की फिकर न करते। कोई फिक्र आपमें पैदा न होती।

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एक बालक मदरसे से पढकर आया और अपनी अम्मी से पूछा, ‘अम्मी मैंने सुना है कि मुझे नवजात अवस्था में किसी काफिर औरत ने अपना दूध पिलाया था।’’
‘‘हां मेरे लाल।’’
‘‘मैं उसे देखना चाहता हूं, आजकल कहां रहती हैं।’’
‘‘मगर क्यों?’’
‘‘दूध का कर्ज अदा करना है।’’
‘‘अच्छी बात है।’’ उस औरत ने दायी का पता बता दिया। उस बालक ने जाकर उस औरत से कहा कि ‘मैंने सुना है कि तुमने मुझे अपना दूध पिलाया है, इसका कर्ज मुझे चुकाना है, इसलिए आप इस्लाम कबूल करें।’
उस औरत ने इस्लाम कबूलने से मना कर दिया तो उस बालक ने उस औरत के स्तन काटकर उसकी हत्या करते हुए कहा, ‘‘हरामजादी मुझे अपना दूध पिलाकर काफिरों के प्रति मेरे दिल में हमदर्दी भरना चाहती थी। भला हो उस्ताद का कि उसने मुझे अल्लाह का सही रास्ता बता दिया…’’ उसके बाद उसने अपनी अम्मी का सिर भी कलम किया और कहा, ‘‘बुढिया अपना दूध नहीं पिला सकी और काफिर का दूध मेरी नसों में भरवा दिया, मैंने गुनाह करने वाले और करवाने वाले दोनों को ही मार दिया, अब दुनिया के काफिरों का खात्मा करने के लिए मेरे हाथ नहीं कांपेंगे।’’
इस घटना के वर्षो बाद वह लुटेरा और आतंकवादी बन गया और कई राजाओं को मारकर अपनी तानाशाही स्थापित की और इस्लाम की तरक्की में जी जान से जुटकर काफिरों का कत्लेआम करने लगा।
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जानते है ये तानाशाह कौन था…….???
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तैमूर लंग

विष्णुगुप्त चाणक्य

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ત્યારે એવી ખબર ન્હોતી કે પોષી પૂનમ એટલે મા અંબાના પ્રાગટ્યનો દિવસ . અમારા ઘરમાં નિયમિત પૂજાપાઠનું વાતાવરણ નહીં. મમ્મી working woman. ઘર નાનું . રુમ રસોડું. એમાં મંદિર જેવી જગ્યા નહીં. પછી અનુકૂળતા થઇ ત્યારે પાણિયારે એક ગોખલામાં દીવો કરતા. પણ નવરાત્રમાં ગરબાનું સ્થાપન તો પરિવારમાં પરંપરા છે.
  
પણ, પોષી પૂનમનો પરિચય જૂદી રીતે. એને અમે એક અવસર તરીકે ઓળખતા.. બ્હેન પર ભાઇગીરીનો અવસર. આ તહેવારે બ્હેન દિવસે ઉપવાસ રાખે ને રાતે ચંદ્ને જોઇને ઉપવાસ છોડે. પણ એની ય એક રીત. રોટલીમાં કાણું પાડીને ચંદ્રને જોવાનો ને ભાઇને પૂછવાનું,
     ” ચાંદા, તારી ચાનકી,
         મારી પોષી પૂનમ
          ભાઇની બ્હેન રમે કે જમે ? “
ને આ નિર્ણય કરવાનો અધિકાર ભાઇને. આ અધિકારની રુએ બ્હેનને આખો દિવસ ડરાવાય. જો ” રમે ” કહીએ તો બ્હેને ભૂખ્યા રહીને જાગરણ કરવું પડે!  જોકે, પપ્પા એ બાબતે વિશેષાધિકાર વાપરતા. ભાઇઓને કહેવાતું કે બ્હેનને ” જમે ” જ કહેવાનું .
          આ જ બ્હેન જ્યારે પરણવાની હોય ને હાથે મેંદી મૂકી હોય ત્યારે એને હેતથી કોળિયો જમાડતા ને પાલવમાં જવતલ આપતા ભાઇને આ સમજ કેળવાય છે કે બ્હેનને અપાય,લેવાય નહીં.
            બ્હેન સાથેના સંબંધમાં કટુતાનો વિચાર પણ આવે તો ખેતરની ધારે ઉગતા હાથિયા થોરનો વિચાર કરવો. એ એવા જ કોઇ ભાઇનો હાથ છે..ન સમજો તો હાથમાં કાંટા ઉગે !તુષાર શુક્લ