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आज हम आपको भारत  के कुछ ऐसे रहस्यों के बारे में बताने जा रहे है जिनके के बार में अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया है तथा जो अभी तक अनसुलझे है!!!!•

हमारे धर्म  के पवित्र ग्रंथो में कुछ ऐसे प्रचलित रहस्य बताए गये हेै जो सदियों से एक पहेली बने हुए है तथा उनमे से भी कुछ ऐसे रहस्य जिनके बारे में जानना असम्भव है। भारत देश अपने अत्यन्त प्राचीन सभ्यताओं एवं संस्कृति के साथ ही यहाँ उपस्थित अनेको रहस्य एवं रोमांच के लिए भी जाना जाता है।

भारत   ही वह पहला ऐसा देश था जहाँ प्रथम भाषा एवं सभी भाषाओं की जननी कहि जाने वाली संस्कृत भाषा उत्प्पन हुई थी। इसके अलावा भारत में दुनिया की सर्वप्रथम लिपि ब्राह्मी लिपि का जन्म होने के साथ दुनिया के सबसे पहले विश्वविद्यालय नालंदा और तक्षिला की स्थापना हुई. भारत में अनेको मुख्य सिद्धांतो का आविष्कार हुआ, ”शून्य” भी भारत के ही प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर्यभट्ट की खोज थी।

ऋषि कश्यप तथा उनकी पत्नियों से जुड़ा रहस्य :- प्रारम्भ में पृथ्वी में सिर्फ एक द्वीप था फिर धीरे पृथ्वी का यह एक द्वीप दो भागो में बटा तथा अंत में यह सात द्वीपों में बट गया. सृष्टि के निर्माण के दौरान ब्र्ह्मा जी ने पृथ्वी में समुद्र तथा धरती पर कई प्रकार के जीवो को उतपन्न करा. उसी दौरान उन्होंने अपने कई मानस पुत्र भी जन्मे जिनमे से एक थे ऋषि मारीच. ऋषि मारीच का एक बहुत ही विद्वान पुत्र था जिसका नाम उन्होंने कश्यप रखा था।

ऋषि कश्यप को अष्टनेमि के नाम से भी जाना जाता है. रहस्य की बात यह ही की क्या कोई इसान सर्प, पशु, पक्षी आदि तरह के जातियों को जन्म दे सकता है. जिव विकासवादियों के इस तरह का शोध जरूर करना चाहिए।

भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ है तथा गरुड़राज ऋषि कश्यप एवं उनकी पत्नी विनीता के पुत्र थे।

ऐसे तो कश्यप ऋषि की कई पत्नियां थीं जबकि प्रमुख रूप से 17 का हम उल्लेख करना चाहेंगे- 1. अदिति, 2. दिति, 3. दनु, 4. काष्ठा, 5. अरिष्टा, 6. सुरसा, 7. इला, 8. मुनि, 9. क्रोधवशा, 10. ताम्रा, 11. सुरभि, 12. सुरसा, 13. तिमि, 14. विनीता, 15. कद्रू, 16. पतांगी और 17. यामिनी आदि पत्नियां बनीं।

अदिति से 12 अदितियो का जन्म हुआ जो सभी देवता कहलाए तथा इनका निवास स्थान हिमालय के उत्तर दिशा में था।

दिति से कश्यप ऋषि की तीन संताने जन्मी जिनमे दो पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष थे तथ एक पुत्री सिंहिका थी. ये दैत्य कहलाए तथा इनका स्थान हिमालय में दक्षिण की ओर था।

दनु से ऋषि कश्यप को 61 महान पुत्रों का जन्म हुआ जो दानव कहलाए।

रानी काष्ठा से घोड़े आदि के खुर वाले पुत्र उतपन्न हुए, रानी सुरसा से असुर पुत्रों की प्राप्ति हुई, रानी इला से लता अदि पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ. मुनि के गर्भ से अप्सराएं जन्मीं. कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप, बिच्छू आदि विषैले जंतु पैदा किये।

मणिधारी एवं इच्छाधारी सांप होते है ?

हिन्दू धर्म में पशुओं में सर्वप्रथम पूजनीय गाय को माना जाता है तथा गाय के बाद दूसरे नंबर पर सर्पो की पूजा करी जाती है।

सांप एक बहुत ही रहस्मय प्राणी है तथा इसे महादेव शिव के प्रमुख गणो में से एक माना जाता है. वैकुंठ धाम में भगवान विष्णु शेषनाग के ऊपर लेटकर विश्राम करते है।

ऐसा कहा जाता है की जो सर्प सौ वर्षो से अधिक जीता है उसमे उड़ने की शक्ति आ जाती है. सर्प भी कई तरह के होते है जैसे इच्छाधारी, मणिधारी, एक फनी, दो फनी तथा शेषनाग दस फनी है . मणि धारण करने वाले सर्पो निल मणि धारण करने वाले सर्प को सबसे उत्तम माना गया है. तथा इच्छाधारी सर्पो के विषय में यह कहा जाता है की यह मनुष्य, पशु, पक्षी किसी का भी रूप धारण कर सकते है।

पुराणों में शेषनाग को 10 फनी बताया गया है परन्तु शेषनाग का वास्तविकता में होना यह अभी भी रहस्य है क्योकि वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी में 10 फनी नाग अभी तक नहीं पाया गया है।

क्या पारसमणि वास्तव में अस्तित्व में है :- मणि एक प्रकार का चमकीला पत्थर होता है तथा इसे भी हिरे के श्रेणी में ही रखा जाता है . पारसमणि के बारे में बताया जाता है की यह बहुत ही अद्भत एवं रहस्यमयी मणि है जो भी यह मणि अपने पास रखता है वह अपनी मनचाही इच्छा पूर्ण कर सकता है।

मणियों के सबंध में अनेको बाते पुराणों में लिखी गई है. अश्वथामा के पास ऐसी मणि थी जिसे वह बहुत ही शक्तिशाली एवं अमर हो गया. रावण ने कुबेर से चंद्रकांत नाम की मणि छीन ली थी।

एक पौराणिक किस्से के अनुसार पारसमणि के बारे में बताया है की इसे किसी भी लोहे पर छुआने से वह सोने की बन जाती तथा कौवे को इस मणि की पहचान होती है. यह मणि हिमालय के पास पाई जाती है।rpd

संजीवनी बूटी का रहस्य :- एक बार युद्ध में देवताओ द्वारा मारे गए असुरो को गुरु शुक्राचार्य ने अपनी संजीवनी विद्या से पुनः जीवित कर दिया थी. इस विद्या के बारे में जान्ने के लिए बृहस्पति ने अपने शिष्य को छल से शुक्राचार्य के आश्रम में भेज था. जब इस बात का पता शुक्राचार्य को लगा तो उन्होंने उस शिष्य का वध कर दिया।

रामायण में यह उल्लेख मिलता है की जब एक मेघनाद ने लक्ष्मण पर अपने शक्ति बाण का प्रयोग किया था तो वे इससे मूर्क्षित हो गए थे. तब उन्होंने मूर्छा से उड़ाने के लिए वैद्य सुषेण के आदेश पर हनुमान जी दोणाचार्य पर्वत से संजीवनी बूटी का पूरा पर्वत ही उठा लाये थे. सुषेण ने लक्ष्मण पर चार वनस्प्तियो का प्रयोग किया था।

1 . मृत संजीवनी ( मृत व्यक्ति को जिन्दा करने के लिए ), 2 . विशालयकरणी ( तीर निकालने वाली ), 3 .सन्धानकरणी ( शरीर में रक्त की पूर्ति करने वाली ), 4 . सवंरयकरणी ( त्वचा को स्वस्थ करने वाली )

इन 4 वनस्पतियों में से मृत संजीवनी (या सिर्फ संजीवनी कहें) सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह व्यक्ति को मृत्युशैया से पुनः स्वस्थ कर सकती है. लेकिन सवाल यह है कि यह चमत्कारिक पौधा कौन-सा है! और इस बारे में कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, बेंगलुरु और वानिकी महाविद्यालय, सिरसी के डॉ. केएन गणेशैया, डॉ. आर. वासुदेव तथा डॉ. आर. उमाशंकर ने बेहद व्यवस्थित ढंग से इस पर शोध कर 2 पौधों को चिह्नित भी किया है।

इन 6 में से भी 3 प्रजातियां ऐसी थीं, जो ‘संजीवनी’ या उससे मिलते-जुलते शब्द से सर्वाधिक बार और सबसे ज्यादा एकरूपता से मेल खाती थी : क्रेसा क्रेटिका, सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस और डेस्मोट्रायकम फिम्ब्रिएटम. इनके सामान्य नाम क्रमशः रुदन्ती, संजीवनी बूटी और जीवका हैं. इन्हीं में से एक का चुनाव करना था. अगला सवाल यह था कि इनमें से कौन-सी पर्वतीय इलाके में पाई जाती है, जहां हनुमान ने इसे तलाशा होगा. क्रेसा क्रेटिका नहीं हो सकती, क्योंकि यह दखन के पठार या नीची भूमि में पाई जाती है.

सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस कई महीनों तक एकदम सूखी या ‘मृत’ पड़ी रहती है और एक बारिश आते ही ‘पुनर्जीवित’ हो उठती है. डॉ. एनके शाह, डॉ. शर्मिष्ठा बनर्जी और सैयद हुसैन ने इस पर कुछ प्रयोग किए हैं और पाया है कि इसमें कुछ ऐसे अणु पाए जाते हैं, जो ऑक्सीकारक क्षति व पराबैंगनी क्षति से चूहों और कीटों की कोशिकाओं की रक्षा करते हैं तथा उनकी मरम्मत में मदद करते हैं. तो क्या सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस ही रामायण काल की संजीवनी बूटी है?

संजय गुप्ता

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भारतवासी गुलाम बनाने वाले नववर्ष की बधाई देने में #अमरशहीदवीर_गोकुल _सिंह (गोकुला जाट) को ही भूल गए।

1669 की क्रान्ति के जननायक, परतंत्र भारत में असहयोग आन्दोलन के जन्मदाता, राष्ट्रधर्म रक्षक वीर गोकुल सिंह जी और उनके सात हजार क्रान्तिकारी साथियों के बलिदान दिवस 1 जनवरी शत्-शत् नमन् ।

सरदार गोकुल सिंह कैसे वीर थे वो अलबेले,कैसी अमर है उनकी कहानी।
सरदार गोकुल सिंह जी की, आओ याद करें कुर्बानी।।

सन् 1666 का समय में इस्लामिक राक्षस औरंगजेब के अत्याचारोँ से हिँदू जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। मंदिरोँ को तोड़ा जा रहा था, हिँदू स्त्रियोँ की इज़्ज़त लूटकर उन्हेँ मुस्लिम बनाया जा रहा था।
औरंगजेब और उसके सैनिक पागल हाथी की तरह हिँदू जनता को मथते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे।

हिँदुओं को दबाने के लिए औरंगजेब ने अब्दुन्नवी नामक एक कट्टर मुसलमान को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया। अब्दुन्नवी के सैनिकों का एक दस्ता मथुरा जनपद में चारों ओर लगान वसूली करने निकला।

सिनसिनी गाँव के सरदार गोकुल सिंह के आह्वान पर किसानों ने लगान देने से इंकार कर दिया, परतन्त्र भारत के इतिहास में वह “पहला असहयोग आन्दोलन” था ।

दिल्ली के सिँहासन के नाक तले समरवीर धर्मपरायण हिन्दू वीर योद्धा गोकुल सिंह और उनकी किसान सेना ने आतताई औरंगजेब को हिँदुत्व की ताकत का अहसास दिलाया।

मई 1669 मेँ अब्दुन्नवी ने सिहोरा गाँव पर हमला किया। उस समय वीर गोकुल सिंह गाँव मेँ ही थे। भयंकर युद्ध हुआ लेकिन इस्लामी शैतान अब्दुन्नवी और उसकी सेना सिहोरा के वीर हिन्दुओं के सामने टिक ना पाई और सारे इस्लामिक पिशाच गाजर-मूली की तरह काट दिए गए।

गोकुल सिंह की सेना मेँ जाट, राजपूत, गुर्जर, यादव, मेव, मीणा इत्यादि सभी जातियों के हिन्दू थे। इस विजय ने मृतप्राय हिन्दू समाज मेँ नए प्राण फूँक दिए थे।

इसके बाद पाँच माह तक भयंकर युद्ध होते रहे । मुग़लों की सभी तैयारियां और चुने हुए सेनापति प्रभावहीन और असफल सिद्ध हुए । क्या सैनिक और क्या सेनापति सभी के ऊपर गोकुलसिंह का वीरता और युद्ध संचालन का आतंक बैठ गया। अंत में सितंबर मास में, बिल्कुल निराश होकर, शफ शिकन खाँ ने गोकुलसिंह के पास संधि-प्रस्ताव भेजा । गोकुल सिंह ने औरंगेजब का प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए कहा कि “औरंगजेब कौन होता है हमें माफ करने वाला, माफी तो उसे हम हिन्दुओं से मांगनी चाहिए उसने अकारण ही हिन्दू धर्म का बहुत अपमान किया है।

अब औरंगजेब 28 नवम्बर 1669 को दिल्ली से चलकर खुद मथुरा आया गोकुल सिंह से लङने के लिए। औरंगजेब ने मथुरा मेँ अपनी छावनी बनाई और अपने सेनापति होशयार खाँ को एक मजबूत एवं विशाल सेना के साथ युद्ध के लिए भेजा।

आगरा शहर का फौजदार होशयार खाँ 1669 सितंबर का अंतिम सप्ताह में अपनी-अपनी सेनाओं के साथ आ पहुंचे । यह विशाल सेना चारों ओर से गोकुलसिंह को घेरा लगाते हूए आगे बढ़ने लगी । गोकुलसिंह के विरुद्ध किया गया यह अभियान, उन आक्रमणों से विशाल स्तर का था, जो बड़े-बड़े राज्यों और वहां के राजाओं के विरुद्ध होते आए थे। इस वीर के पास न तो बड़े-बड़े दुर्ग थे, न अरावली की पहाड़ियाँ और न ही महाराष्ट्र जैसा विविधतापूर्ण भौगोलिक प्रदेश । इन अलाभकारी स्थितियों के बावजूद, उन्होंने जिस धैर्य और रण-चातुर्य के साथ, एक शक्तिशाली साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति का सामना करके, बराबरी के परिणाम प्राप्त किए, वह सब अभूतपूर्व है।

औरंगजेब की तोपोँ, धर्नुधरोँ, हाथियोँ से सुसज्जित तीन लाख की विशाल सेना और गोकुल सिंह की किसानोँ की 20000 हजार की सेना मेँ भयंकर युद्ध छिड़ गया।
चार दिन तक भयंकर युद्ध चलता रहा और गोकुल सिंह की छोटी सी अवैतनिक सेना अपने बेढंगे व घरेलू हथियारोँ के बल पर ही अत्याधुनिक हथियारोँ से सुसज्जित और प्रशिक्षित मुगल सेना पर भारी पड़ रही थी।

भारत के इतिहास में ऐसे युद्ध कम हुए हैं जहाँ कई प्रकार से बाधित और कमजोर पक्ष, इतने शांत निश्चय और अडिग धैर्य के साथ लड़ा हो । हल्दी घाटी के युद्ध का निर्णय कुछ ही घंटों में हो गया था। पानीपत के तीनों युद्ध एक-एक दिन में ही समाप्त हो गए थे, परन्तु वीरवर गोकुलसिंह का युद्ध तीसरे दिन भी चला ।

इस लड़ाई मेँ सिर्फ पुरुषोँ ने ही नही बल्कि उनकी स्त्रियों ने भी पराक्रम दिखाया।

चार दिन के युद्ध के बाद जब गोकुल की सेना युद्ध जीतती हुई प्रतीत हो रही थी तभी हसन अली खान के नेतृत्व मेँ एक नई विशाल मुगलिया टुकङी आ गई और इस टुकङी के आते ही गोकुल की सेना हारने लगी। युद्ध मेँ अपनी सेना को हारता देख हजारोँ नारियोँ जौहर की पवित्र अग्नि मेँ खाक हो गई।

गोकुल सिंह और उनके ताऊ उदय सिँह को सात हजार साथियोँ सहित बंदी बनाकर आगरा में औरंगजेब के सामने पेश किया गया। औरंगजेब ने कहा “जान की खैर चाहते हो तो इस्लाम कबूल कर लो और रसूल के बताए रास्ते पर चलो।

बोलो क्या इरादा है इस्लाम या मौत?

अधिसंख्य धर्म-परायण हिन्दुओं ने एक सुर में कहा – “औरंगजेब, अगर तेरे खुदा और रसूल मोहम्मद का रास्ता वही है जिस पर तू चल रहा है तो धिक्कार है तुझे,
हमें तेरे रास्ते पर नहीं चलना l”

इतना सुनते ही औरंगजेब के संकेत से गोकुल सिंह की बलशाली भुजा पर जल्लाद का बरछा चला।
गोकुल सिंह ने एक नजर अपने भुजाविहीन रक्तरंजित कंधे पर डाली और फिर बङे ही घमण्ड के साथ जल्लाद की ओर देखा और कहा दूसरा वार करो।
दूसरा बरछा चलते ही वहाँ खङी जनता आंर्तनाद कर उठी और फिर गोकुल सिंह के शरीर के एक-एक जोड़ काटे गए। गोकुल सिंह का सिर जब कटकर धरती माता की गोद मेँ गिरा तो मथुरा मेँ केशवराय जी का मंदिर भी भर भराकर गिर गया। यही हाल उदय सिँह और बाकि साथियों का भी किया गया। उनके छोटे- छोटे बच्चों को जबरन मुसलमान बना दिया गया ।

1 जनवरी 1670 ईसवी का दिन था वह।
ऐसे अप्रतिम वीर का कोई भी इतिहास नही पढ़ाया जाता और नही कोई सम्मान दे सके, उनके नाम पर न कोई विश्वविद्यालय है और न कोई केन्द्रीय या राजकीय परियोजना। कितना अहसान फ़रामोश कितना कृतघ्न है हिंदू समाज।

कैसे वीर हुए इस धरा पर,जिन्होंने धर्म के लिए प्राण न्यौछावर कर दिये पर इस्लाम नही अपनाया।

गोकुलसिंह सिर्फ़ जाटों के लिए शहीद नहीं हुए थे न उनका राज्य ही किसी ने छीना लिया था, न कोई पेंशन बंद करदी थी, बल्कि उनके सामने तो अपूर्व शक्तिशाली मुग़ल-सत्ता, दीनतापुर्वक, संधी करने की तमन्ना लेकर गिड़-गिड़ाई थी। शर्म आती है कि हम ऐसे अप्रतिम वीर को कागज के ऊपर भी सम्मान नहीं दे सके। कितना अहसान फ़रामोश कितना कृतघ्न्न है हमारा हिंदू समाज ! शाही इतिहास कारों ने उनका उल्लेख तक नही किया। केवल जाट पुरूष ही नही बल्कि उनकी वीरांगनायें भी अपनी ऐतिहासिक दृढ़ता और पारंपरिक शौर्य के साथ उन सेनाओं का सामना करती रहीं। दुर्भाग्य की बात है कि भारत की इन वीरांगनाओं और सच्चे सपूतों का कोई उल्लेख शाही टुकडों पर पलने वाले तथा कथित इतिहासकारों ने नहीं किया।
अब तो जागो भारतवासियों।

सतीश शशांक

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#सबसेकीमतीचीज – प्रेरणादायक कहानियां ॥
एक जाने-माने स्पीकर ने हाथ में पांच सौ का नोट लहराते हुए अपनी सेमीनार शुरू की. हाल में बैठे सैकड़ों लोगों से उसने पूछा ,” ये पांच सौ का नोट कौन लेना चाहता है?” हाथ उठना शुरू हो गए.

फिर उसने कहा ,” मैं इस नोट को आपमें से किसी एक को दूंगा पर  उससे पहले मुझे ये कर लेने दीजिये .” और उसने नोट को अपनी मुट्ठी में चिमोड़ना शुरू कर दिया. और  फिर उसने पूछा,” कौन है जो अब भी यह नोट लेना चाहता है?” अभी भी लोगों के हाथ उठने शुरू हो गए.

“अच्छा” उसने कहा,” अगर मैं ये कर दूं ? ” और उसने नोट को नीचे गिराकर पैरों से कुचलना शुरू कर दिया. उसने नोट उठाई , वह बिल्कुल चिमुड़ी और गन्दी हो गयी थी.

” क्या अभी भी कोई है जो इसे लेना चाहता है?”. और एक  बार  फिर हाथ उठने शुरू हो गए.

” दोस्तों  , आप लोगों ने आज एक बहुत महत्त्वपूर्ण पाठ सीखा है. मैंने इस नोट के साथ इतना कुछ किया पर फिर भी आप इसे लेना चाहते थे क्योंकि ये सब होने के बावजूद नोट की कीमत घटी नहीं,उसका मूल्य अभी भी 500 था.

जीवन में कई बार हम गिरते हैं, हारते हैं, हमारे लिए हुए निर्णय हमें मिटटी में मिला देते हैं. हमें ऐसा लगने लगता है कि हमारी कोई कीमत नहीं है. लेकिन आपके साथ चाहे जो हुआ हो या भविष्य में जो हो जाए , आपका मूल्य कम नहीं होता. आप स्पेशल हैं, इस बात को कभी मत भूलिए.

कभी भी बीते हुए कल की निराशा को आने वाले कल के सपनो को बर्बाद मत करने दीजिये. याद रखिये आपके पास जो सबसे कीमती चीज है, वो है आपका जीवन.”

~ सबसे कीमती चीज – प्रेरणादायक कहानियां

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रामचरितमानस की चौपाइयों में ऐसी क्षमता है कि इन चौपाइयों के जप
से ही मनुष्य बड़े-से-बड़े संकट में भी मुक्त हो जाता है।
इन मंत्रो का जीवन में प्रयोग अवश्य करे प्रभु श्रीराम आप के जीवन को
सुखमय बना देगे।

1. रक्षा के लिए
मामभिरक्षक रघुकुल नायक |
घृत वर चाप रुचिर कर सायक ||

2. विपत्ति दूर करने के लिए
राजिव नयन धरे धनु सायक |
भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक ||

3. *सहायता के लिए
मोरे हित हरि सम नहि कोऊ |
एहि अवसर सहाय सोई होऊ ||

4. सब काम बनाने के लिए
वंदौ बाल रुप सोई रामू |
सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू ||

5. वश मे करने के लिए
सुमिर पवन सुत पावन नामू |
अपने वश कर राखे राम ||

6. संकट से बचने के लिए
दीन दयालु विरद संभारी |
हरहु नाथ मम संकट भारी ||

7. विघ्न विनाश के लिए
सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही |
राम सुकृपा बिलोकहि जेहि ||

8. रोग विनाश के लिए
राम कृपा नाशहि सव रोगा |
जो यहि भाँति बनहि संयोगा ||

9. ज्वार ताप दूर करने के लिए
दैहिक दैविक भोतिक तापा |
राम राज्य नहि काहुहि व्यापा ||

10. दुःख नाश के लिए
राम भक्ति मणि उस बस जाके |
दुःख लवलेस न सपनेहु ताके ||

11. खोई चीज पाने के लिए
गई बहोरि गरीब नेवाजू |
सरल सबल साहिब रघुराजू ||

12. अनुराग बढाने के लिए
सीता राम चरण रत मोरे |
अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे ||

13. घर मे सुख लाने के लिए
जै सकाम नर सुनहि जे गावहि |
सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं ||

14. सुधार करने के लिए
मोहि सुधारहि सोई सब भाँती |
जासु कृपा नहि कृपा अघाती ||

15. विद्या पाने के लिए
गुरू गृह पढन गए रघुराई |
अल्प काल विधा सब आई ||

16. सरस्वती निवास के लिए
जेहि पर कृपा करहि जन जानी |
कवि उर अजिर नचावहि बानी ||

17. निर्मल बुद्धि के लिए
ताके युग पदं कमल मनाऊँ |
जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ ||

18. मोह नाश के लिए
होय विवेक मोह भ्रम भागा |
तब रघुनाथ चरण अनुरागा ||

19. प्रेम बढाने के लिए
सब नर करहिं परस्पर प्रीती |
चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती ||

20. प्रीति बढाने के लिए
बैर न कर काह सन कोई |
जासन बैर प्रीति कर सोई ||

21. सुख प्रप्ति के लिए
अनुजन संयुत भोजन करही |
देखि सकल जननी सुख भरहीं ||

22. भाई का प्रेम पाने के लिए
सेवाहि सानुकूल सब भाई |
राम चरण रति अति अधिकाई ||

23. बैर दूर करने के लिए
बैर न कर काहू सन कोई |
राम प्रताप विषमता खोई ||

24. मेल कराने के लिए
गरल सुधा रिपु करही मिलाई |
गोपद सिंधु अनल सितलाई ||

25. शत्रु नाश के लिए
जाके सुमिरन ते रिपु नासा |
नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा ||

26. रोजगार पाने के लिए
विश्व भरण पोषण करि जोई |
ताकर नाम भरत अस होई ||

27. इच्छा पूरी करने के लिए
राम सदा सेवक रूचि राखी |
वेद पुराण साधु सुर साखी ||

28. पाप विनाश के लिए
पापी जाकर नाम सुमिरहीं |
अति अपार भव भवसागर तरहीं ||

29. अल्प मृत्यु न होने के लिए
अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा |
सब सुन्दर सब निरूज शरीरा ||

30. दरिद्रता दूर के लिए
नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना |
नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना |

31. प्रभु दर्शन पाने के लिए
अतिशय प्रीति देख रघुवीरा |
प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा ||

32. शोक दूर करने के लिए
नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी |
आए जन्म फल होहिं विशोकी ||

33. क्षमा माँगने के लिए
अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता |
क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता ||
🙏🌹जयश्रीराम🌹
🙏

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अर्थशास्त्र के एक प्रोफेसर ने अपने एक बयान में बताया …
– “उसने पहले कभी किसी छात्र को फेल नहीं किया, पर हाल ही में उसने एक पूरी की पूरी क्लास को फेल कर दिया है l” 
क्यों … … ….
क्योंकि उस क्लास ने दृढ़ता पूर्वक यह कहा था कि 
“समाजवाद सफल होगा और न कोई गरीब होगा और न कोई धनी होगा” सबको सामान करने वाला एक महान सिद्धांत ! 
तब प्रोफेसर ने कहा – अच्छा ठीक है ! आओ हम क्लास में समाजवाद के अनुरूप एक प्रयोग करते हैं “सफलता पाने वाले सभी छात्रों के विभिन्न ग्रेड का औसत निकाला जाएगा और सबको वही एक ग्रेड दी जायेगी ” 
पहली परीक्षा के बाद, सभी ग्रेडों का औसत निकाला गया और प्रत्येक छात्र को B ग्रेड प्राप्त हुआl 
जिन छात्रों ने कठिन परिश्रम किया था वे परेशान हो गए और जिन्होनें कम ही पढ़ाई की थी वे खुश हुए l 
दूसरी परीक्षा के लिए कम पढ़ने वाले छात्रों ने पहले से भी और कम पढ़ाई की और जिहोनें कठिन परिश्रम किया था उन्होंने यह तय किया कि वे भी मुफ्त की ग्रेड प्राप्त करेंगे और उन्होंने भी कम पढ़ाई की l 
दूसरी परीक्षा की ग्रेड D थी l 
इसलिए कोई खुश नहीं था l 
जब तीसरी परीक्षा हुई तो ग्रेड F हो गई l 
जैसे-जैसे परीक्षाएँ आगे बढ़ने लगीं स्कोर कभी ऊपर नहीं उठा, बल्कि आपसी कलह, आरोप-प्रत्यारोप, गाली-गलौज और एक-दूसरे से नाराजगी के परिणाम स्वरूप कोई भी नहीं पढ़ता था क्योंकि कोई भी छात्र अंपने परिश्रम से दूसरे को लाभ नहीं पहुंचाना चाहता था l अंत में सभी आश्चर्यजनक रूप से फेल हो गए और प्रोफेसर ने उन्हें बताया कि इसी तरह “समाजवाद” भी अंततोगत्वा फेल हो जाएगा क्योंकि ईनाम जब बहुत बड़ा होता है तो सफल होने के लिए किया जाने वाला उद्यम भी बहुत बड़ा होगा l परन्तु जब सरकार सारे अवार्ड छीन लेगी तो कोई भी न तो सफल होना चाहेगा और न ही सफल होने की कोशिश करेगा l
निम्नलिखित पाँच सर्वश्रेष्ठ उक्तियाँ इस प्रयोग पर लागू होती हैं l 
1. आप समृद्ध व्यक्ति को उसकी समृद्धि से बेदखल करके गरीब को समृद्ध बनाने का क़ानून नहीं बना सकते l 
2. जो व्यक्ति बिना कार्य किए कुछ प्राप्त करता है, अवश्य ही परिश्रम करने वाले किसी अन्य व्यक्ति के ईनाम को छीन कर उसे दिया जाता है l 
3. सरकार तब तक किसी को कोई वस्तु नहीं दे सकती जब तक वह उस वस्तु को किसी अन्य से छीन न ले l 
4. आप सम्पदा को बाँट कर उसकी वृद्धि नहीं कर सकते l 
5. जब किसी राष्ट्र की आधी आबादी यह समझ लेती है कि उसे कोई काम नहीं करना है, क्योंकि बाकी आधी आबादी उसकी देख-भाल जो कर रही है और बाकी आधी आबादी यह सोच कर कुछ अच्छा कार्य नहीं कर रही कि उसके कर्म का फल किसी दूसरे को मिल रहा है – तो वहीँ उस राष्ट्र के अंत की शुरुआत हो जाती है।