Posted in Uncategorized

              आरण्यक मुनि
              ☆☆☆☆☆
           महर्षि लोमश जी ने कहा — ‘हे वत्स ! पूर्ण सनातन परात्पर परमात्मा ही श्री राम हैं ।समस्त विश्व–ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति इन्हीं से हुयी है ; यही सबके आधार, सबमें फैले हुए, सबके स्वामी, सबके सृजन, पालन और संहार करने वाले हैं ।सारा विश्व इन्हीं की लीला का विकास है ।समस्त योगेश्वरों के भी परम ईश्वर दयासागर ये प्रभु जीवों की दुर्गति देखकर उन्हें घोर नरक से बचाने के लिए जगत में अपनी लीला और गुणों का विस्तार करते हैं, जिनका गान करके पापी से पापी मनुष्य भी तर जाते हैं ।ये श्री राम इसी हेतु अवतार धारण करते हैं ।’
          इसके बाद लोमश जी ने भगवान श्री राम का पवित्र चरित्र संक्षेप में सुनाया और कहा — ‘त्रेता के अन्त में भगवान श्री राम अवतार धारण करेंगे ।उस समय जब वे अश्वमेध यज्ञ करने लगेंगे, तब अश्व के साथ उनके छोटे भाई शत्रुघ्न जी आपके आश्रम में पधारेंगे।तब आप श्री राम के दर्शन करके उनमें लीन हो सकेंगे ।’
          महर्षि लोमश के उपदेशानुसार आरण्यक मुनि रेवा नदी के किनारे एक कुटिया बनाकर रहने लगे ।वे निरंतर राम नाम का जप करते थे और श्री राम के पूजन ध्यान में ही लगे रहते थे ।बहुत समय बीत जाने पर जब अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम ने श्री राघवेन्द्र के रूप में अवतार धारण करके लंका-विजय आदि लीलाएँ सम्पन्न कर लीं और अयोध्या में वे अश्वमेध यज्ञ करने लगे, तब यज्ञ का अश्व छोड़ा गया ।अश्व के पीछे पीछे उसकी रक्षा करते हुए बड़ी भारी सेना के साथ शत्रुघ्न जी चल रहे थे ।अश्व जब रेवा तट पर मुनि के आश्रम के समीप पहुँचा, शत्रुघ्न जी ने अपने साथी सुमति से पूछा  —- ‘यह किसका आश्रम है? ‘ सुमति से परिचय प्राप्त कर वे मुनि की कुटिया पर गये।मुनि ने उनका स्वागत किया और शत्रुघ्न जी का परिचय पाकर तो वे आनन्दमग्न हो गये ।’अब मेरी बहुत दिनों की इच्छा पूरी होगी ।अब मैं अपने नेत्रों से भगवान श्री राम के दर्शन करूँगा ।मेरा जीवन धारण करना अब सफल हो जायगा।’ इस प्रकार सोचते हुए मुनि अयोध्या की ओर चल पड़े ।
          आरण्यक मुनि देवदुर्लभ परम रमणीय अयोध्या नगरी में पहुँचे।उन्होंने सरयू के तट पर यज्ञशाला में यज्ञ की दीक्षा लिये, नियम के कारण आभूषणरहित, मृगचर्म का उत्तरीय बनाये, हाथ में कुश लिये, नवदूर्वादलश्याम श्री राम को देखा।वहाँ दीनदरिद्रों को मनमानी वस्तुएँ दी जा रही थीं ।विप्रों का सत्कार हो रहा था ।ऋषिगण मन्त्रपाठ कर रहे थे ; परंतु आरण्यक मुनि तो एकटक श्री राम की रूपमाधुरी देखते हुए जहाँ के तहाँ खड़े रह गये।उनका शरीर पुलकित हो गया ।वे वेसुध से होकर उस भुवनमंगल छवि को देखते ही रहे ।मर्यादा पुरुषोत्तम ने मुनि को देखा और देखते ही वे उठ खड़े हुए ।इन्द्रादि देवता तथा लोकपाल भी जिनके चरणों में मस्तक झुकाते हैं, वे ही सर्वेश्वर श्री राम ‘मुनिवर ! आज आपके पधारने से मैं पवित्र हो गया ।’ यह कहकर मुनि के चरणों पर गिर पड़े ।तपस्वी आरण्यक मुनि ने झटपट अपनी भुजाओं से उठाकर श्री राम को हृदय से लगा लिया ।इसके पश्चात मुनि को उच्चासन पर बैठाकर राघवेन्द्र ने स्वयं अपने हाथों से उनके चरण धोये और वह चरणोदक अपने मस्तक पर छिड़क लिया ।भगवान ब्रह्मण्यदेव हैं ।उन्होंने ब्राह्मण की स्तुति की — ‘मुनिश्रेष्ठ ! आपके चरणजल से मैं अपने बन्धु-बान्धवों के साथ पवित्र हो गया ।आपके पधारने से मेरा अश्वमेध यज्ञ सफल हो गया ।अब निश्चय ही मैं आपकी चरणरज से पवित्र होकर इस यज्ञ द्वारा रावण–कुम्भकर्णादि ब्राह्मण संतान के वध के दोष से छूट जाऊँगा ।’
          भगवान की प्रार्थना सुनकर मुनि ने कुछ हँसते हुए कहा — ‘प्रभो ! मर्यादा के आप ही रक्षक हैं, वेद तथा ब्राह्मण आपकी ही मूर्ति हैं ।अतएव आपके लिए ऐसी बातें करना ठीक ही है ।दूसरे राजाओं के सामने उच्च आदर्श रखने के लिए ही आप ऐसा आचरण कर रहे हैं ।ब्रह्महत्या के पाप से छूटने के लिए आप अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं, यह सुनकर मैं अपनी हँसी रोक नहीं पाता।मर्यादा पुरुषोत्तम ! आपका मर्यादा पालन धन्य है ।सारे शास्त्रों के विपरीत आचरण करने वाला सर्वथा मूर्ख और महापापी भी जिसका नाम स्मरण करते ही पापों के समुद्र को भी लाँघकर परमपद पा जाता है, वह ब्रह्महत्या के पाप से छूटने के लिए अश्वमेध यज्ञ करे—- यह क्या कम हँसी की बात है?  भगवन् !  जब तक मनुष्य आपके नाम का भलीभाँति उच्चारण नहीं करता, तभी तक उसे भय देने के लिए बड़े बड़े पाप गरजा करते हैं ।राम नाम रूपी सिंह की गर्जना सुनते ही महापापरूपी गजों का पता तक नहीं लगता।मैंने मुनियों से सुना है कि जब तक राम नाम का भलीभाँति उच्चारण नहीं होता, तभी तक पापी मनुष्यों को पाप-ताप भयभीत करते हैं ।श्री राम  ! आज मैं धन्य हो गया ।आज आपके दर्शन पाकर मैं संसार के ताप से छूट गया ।’
           भगवान श्री राम ने मुनि के बचन सुनकर उनका पूजन किया ।सभी ऋषि -मुनि भगवान की यह लीला देखकर ‘धन्य-धन्य ‘ कहने लगे।आरण्यक मुनि ने भावावेश में सबसे कहा — ‘मुनिगण ! आपलोग मेरे भाग्य को तो देखें कि सर्वलोकमहेश्वर मुझे प्रणाम करते हैं ।ये सबके परमाराध्य मेरा स्वागत करते हैं ।श्रुतियाँ जिनके चरण-कमलों की खोज करती हैं, वे मेरा चरणोदक लेकर अपने को पवित्र मानते हैं ।मैं आज धन्य हो गया ।’ यह कहते–कहते सबके सामने ही मुनि का ब्रह्मरन्ध्र फट गया ।बड़े जोर का धड़ाका हुआ ।स्वर्ग में दुन्दुभियाँ बजने लगीं ।देवता फूलों की वर्षा करने लगे ।ऋषि मुनियों ने देखा कि आरण्यक मुनि के मस्तक से एक विचित्र तेज निकला और वह श्री राम के मुख में प्रविष्ट हो गया ।
              (भक्त चरितांक)
              (कल्याण -40)

Author:

Buy, sell, exchange books

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s