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****** #तुम #कहां #हो #कृष्ण ********

कृष्ण पर जब भी चिंतन करता हूँ मैं भ्रमित हो जाता हूँ कि मैं उनके किस रूप पर मोहित हूँ ?

— एक ओर वह कृष्ण जो  गोपियों को छेड़ता है तो दूसरी ओर रास नृत्य में ही ” एक और मार्शल आर्ट स्कूल ” की नींव रख देता है ।

— एक ओर माखन चोरी करता है और दूसरी ओर इन्हीं ग्वाल बालों से अजेय ” नारायणी सेना ” खड़ी कर देता  है

— एक ओर अपनी बांसुरी से पाषाणों को पिघला देता है तो दूसरी ओर पाञ्चजन्य से धर्म का उद्घोष करता है ।

— एक ओर मुँह पर माखन लपेटे हुए भी मैया से माखन ना खाने की झूठी सौगंध खाता है तो दूसरी ओर कुरुक्षेत्र में समस्त ब्रह्मांड की व्याख्या ” गीता ” के रूप में करता है

— एक ओर राधा के साथ प्रेम में डूबकर  सामाजिक मान्यताओं को नकार देता है तो दूसरी ओर नरकासुर के ‘ हरम ‘ में बंदिनी  16000 स्त्रियों और उनकी अवैध संतानों को सामाजिक स्वीकृति दिलवाने के लिये स्वयं विवाह कर उन्हें पत्नियों का सम्मान व उनके बच्चों को पिता के रूप में अपना नाम देता है ।

— एक ओर आठ विवाह करता है तो दूसरी ओर अपने अखंड ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा की साक्षी में मृत बालक परीक्षित को जीवित कर देता है ।

— एक ओर स्वयं राजसिंहासन अस्वीकार कर ” गणतंत्र पद्धति ” की श्रेष्ठता स्थापित करता है तो दूसरी ओर स्वयं युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ के लिये प्रेरित कर भारत को साम्राज्य के रूप में एकसूत्र में बांध देता है ।

— एक ओर खुद जरासंध को बलराम के हाथों मरने से बचा लेता है  और फिर खुद ही भीम के हाथों उसे मरवा देता है ।

— एक ओर शस्त्र ना उठाने की प्रतिज्ञा करता है और दूसरी ओर खुद दारुक से समस्त अस्त्र शस्त्रों सहित रथ तैयार रखने को कहता है ।

— एक ओर इंद्र जैसे भ्रष्ट सत्ताधारियों का विरोध करता है तो दूसरी ओर खोखले और जनशोषक कर्मकांडी ब्राह्मणों  का तिरस्कार कर गोवर्धनपूजन के रूप पुनःप्रकृतिपूजन की परंपरा स्थापित करता है ।

— एक ओर राजसूय यज्ञ में ऋषियों के चरण पखारता है तो दूसरी ओर काशी के ब्राह्मणों के पाखंड पर क्रुद्ध होकर काशी को जलाकर राख कर देता है ।

इनमें कौन सा है कृष्ण का रूप , उनका वास्तविक स्वरूप ?

और फिर खुद ही अपनी मूर्खता पर हँस पड़ता हूँ  कि  कृष्ण के भाई , सखा , शिष्य उद्धव व नरावतार  अर्जुन ,  साक्षात नारायणावतार वेदव्यास , साक्षात शिव के अंश जगद्गुरु शंकराचार्य और ज्ञानशिरोमणि नवद्वीप विजेता निमाई भी नहीं समझ सके कि वे किस कृष्ण पर मुग्ध हैं तो मैं फिर हूँ भी क्या ? 

बस इतना ज्ञान हो सका है मुझे कि उसे ज्ञान और तर्क से तो नहीं ही जाना जा सकता है ।

उसे समझा जा सकता है तो सिर्फ यशोदा बनकर और तब वो ‘ लल्ला ‘ बनकर कर्माबाई का बासी खीचड़ा जीमने आ जाता है ।

उसे समझा जा सकता है सिर्फ नंदबाबा बनकर , और तब वो पुत्र बनकर  सूरदास की लाठी पकड़ने और उनका भजन सुनने आ जाता है ।

उसे समझा जा सकता है सिर्फ श्रीदामा बनकर और फिर वो गोविंद जैसे बालक के साथ सखा बनकर गिल्ली डंडा खेलने ही नहीं आ जाता बल्कि उसकी मार भी खाता है ।

उसे समझा जा सकता है तो सुदामा बनकर और तब वो सांवलदास बनकर नरसी का भात दे जाता है ।

उसे समझा जा सकता है तो सिर्फ एक गोपी बनकर और तब वो ‘ बांकेबिहारी ‘ के विग्रह स्वरूप में प्रकट हो  जाता है ।

उसे समझा जा सकता है सिर्फ राधा बनकर और तब वो मीरा का सांवरा  बनकर आ जाता है ।

बस इतना ही जान पाया हूँ मैं ।
Pramod Kumar

Author:

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