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महारानी पद्मिनी की चित्तौड़ गौरव गाथा
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          ठाकुर हिम्मत सिंह हाडा
                    इतिहासकार
   यह मेरी कल्पना के बाहर  की बात थी!
कि मैं रानी पद्मिनी जैसी वीरांगना एवं सती स्त्री के व्यक्तित्व पर कुछ लिख सकूं?? परंतु कहावत है जब प्रेरणा सोत्र बलवान हो तो फिर कौन सा कार्य है जो पूर्ण नहीं हो सकता
भारतीय दुर्गों में चित्तौड़ दुर्ग का नाम विशेष सम्मान के साथ केवल इसलिए ही नहीं लिया जाता की पर्वतीय दुर्ग संस्कृति के सभी निवशो को अपने में समाहित किए हुए अन्य दुर्गा से वृहदाकार है| बल्कि इसलिए भी याद किया जाता है कि यह दुर्ग देश के शौर्य और अस्मिता की अनेक कहानियों का साक्षी रहा है और इस से जुड़ा है लंबा इतिहास| इस दुर्ग ने अपनी आन बान और शान के खिलाफ कोई सौदा नहीं किया वरन सम्मान के लिए खून की होली और प्रचंड अग्नि की ज्वालाएं को अंगीकार करना श्रेष्ठ समझा| आज भी दुर्ग के कण-कण से वीरों की शहादत की ध्वनि गूंजती है| रानी पद्मिनी और कर्मावती के अभूतपूर्व त्याग की महक अनायास ही पर्यटक को रोमांचित कर देती है| मैं हिम्मत हाडा गरव के साथ यह कहता हूं कि धन्य हैं यह चित्तौड़गढ़ का दुर्ग जिसने स्वाभिमान और हिंदुत्व के प्रतीक इस दुर्ग की माटी को सभी ने सोने चांदी से भी मूल्यवान माना है|
आवै न सौनो ओल मे,हूये न चान्दी  होड़ |
रगत थाप नंदी रही, माटी गढ़ चितौड़ ||
शाका——-
स्वाभिमान की रक्षार्थ केसरिया  पहन मरने मारने के उद्देश्य से निकलकर युद्ध करते हुए प्राणोत्सर्ग करने को  शाका अथार्थ जोहर कहा जाता है|
भारतवर्ष में सबसे प्राचीन और प्रथम जौहर सन 327 ईसवी पूर्व में सिकंदर के आक्रमण के समय पंजाब के अगल सोई गणराज्य में हुआ| दूसरा सिंध के राजा दाहर सोडा की रानी लाडो बाई ने सन 792 मैं किया इस क्रम में गढ़ तनोट मैं भी  सन 841  और सन 1294 में भयंकर  जोहर हुए|–
राजस्थान में प्रमुख जोहर की घटनाएं–
सन 1295 ईस्वी जैसलमेर रावल मूलराज भाटी का
सन 1295 ईस्वी गढ़ पावा फंता जी चौहान
सन 1295 इस वि गढ आबू अडसी पंवार
सन 1301 रणथंबोर हम्मीर चौहान राजकुमारी देवल
सन 1303 ईसवी चित्तौड़गढ़ रावल रतन सिंह रानी पद्मिनी
सन 1308 ईसवी सिवाना सातल देव का सोम चौहान
सन 1314 ईस्वी जालौर कानड़दैव वीरमदैव सौनगरा
सन 1315 ईस्वी जैसलमेर रावल दूदा जसोड़ भाटी
सन 1423 ईसवी गागरोन अचलदास खींची
सन 1535 चित्तौड़गढ़ महारानी कर्णावती का
चित्तौड़ का तीसरा जोहर अंतिम जोहर 23 फरवरी 1568 को हुआ था|
पिंगल पुत्री पदमिणी,मारवाणी तिणी नाम|
जौडी जोई विचारयँउ,घना विधाता काम||
नल राजा नरवर तपै,सूत तिण सालहकुमार|
पिगंल पति पद्ममणी सुता, भरवण गीत संचार||
रानी पद्मिनी का चरित्र हिमगिरी से ज्यादा पवित्र और समुद्र से ज्यादा गराई लिए हुए था| वह दिव्य सौंदर्य की अपार निधि होने के उपरांत भी एक शील व्रत सती नारी का अनुकरण करते हुए अग्नि के धधकते अंगारों पर प्राणोत्सर्ग करने में भी जरा नहीं हिचकी| ऐसी देवी स्वरूपा रानी के कृत्य से देवताओं के नेत्रों में अंजन टपकने लगा| मां सरस्वती के सपूतों की लेखनीयो मै भूचाल आ गया जो शीघ्रता से करबद्ध हो नमन करने को तैयार हो गई|
रानी पद्मिनी के सौंदर्य ने जहां श्रृंगार काव्य को उत्साहित किया वही उम्र की साधना के बलिदान ने नारी जाति को सतीत्व का पाठ पढ़ाया| आज इस दुर्ग का नाम किसी नगर शहर अथवा दुर्ग विशेष से नहीं जुड़ा है बल्कि राष्ट्र की संस्कृति समृद्धि और गरिमा का प्रतीक बन समूचे देश में फैला हुआ है|
पगी पगी पांगी पंत सिर,ऊपरी अम्बर छाहं|
पावस परकट्ऊ पदमनि,कह उत पुगंल जाहँ||
महारानी पद्मिनी का यह विश्व प्रसिद्ध जोहर 23 मार्च सन 1303 को हुआ था| जिसमें रानी पद्मिनी ने अपने साथ 16000 रानियों के साथ अग्नि स्नान किया था ठीक उसके कुछ समय बाद आताताई अल्लाउद्दीन खिलजी के अपवित्र कदम चित्तौड़ दुर्ग पर पड़े और चित्तौड़ दुर्ग का नाम बदलकर अपने पुत्र खिज्र खां के नाम से खिजराबाद रख दिया———–
धन्य है वह समस्त क्षत्राणी या जो नारी धर्म की रक्षा करती संसार को सतीत्व का पाठ पढ़ा गई सभी वंदनीय वीरांगनाएं अपने अपने पतियों से स्वर्ग में ऐसी विभूषित हुई जैसे शचि इंद्रदेव के साथ शोभा पाती है 23 मार्च 1303 के इस महा जोहर का मार्मिक चित्रण निम्न कविता के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए हर्ष होता है|
रण में झुझार बणया सगला,महला मै अगनी धधक उठी|
सतिया री लाज बचावण नै,
                 जौहर री ज्वाला भभक उठी||
सत री अगनी तन माही,
                      धरती की अगनी साख भरै|
हर हर करती पदमा कुदी,
                    सतिया अब कुण गिणणै ||
पुष्पांजलि———
रावल युद्ध में खेत रहे, पाई मुक्ति महान |
रानियों  ने उत्सर्ग किए, गढ़ चित्तौड़ में प्राण
अमर यह दोनों हो गए ,दे के अपनी जान|
गढ़ चित्तोड़ को मिल गया, स्वाभिमान का दान||
लाज रखी कुल वंश की ,और क्षत्राणी को मान|
धन्य रानी तू पद्मिनी ,तुझे शत शत बार प्रणाम||
चित्तौड़ दुर्ग की वेदना
चित्तौड़ का नाम किसने नहीं सुना अथवा ऐसा कौन अभागा होगा जो इस के दर्शन को उत्साहित ना रहा हो यह वही दुर्ग है जो कभी बप्पा रावल के शौर्य से आकाश को नाप रहा था यह वही दुर्ग है जो रानी पद्मिनी के साथ हजारों रमणियों की दर्दभरी दास्तान को अपने हृदय में समेटे हुए हैं आज श्रीहीन होने के बाद भी सादर आमंत्रित कर रहा है आओ मेरे प्यारे पथिक यदि तुम पत्थरो की कारीगिरी के पारखी हो तो भीतर आकर परीक्षा करो कि पत्थर बड़े हैं अथवा  इन पर उकेरी गई कला,? यदि तुम मानव हृदय की पीड़ा को समझते हो तो मेरे हृदय में व्याप्त  तड़पन को देखो! आओ—
डरो मत….. भीतर आओ टटोलो शायद मिले तुम्हारा कोई निशान……. अभी अभी वह आग बुझी हुई राख के ढेर को देखो ढूंढो तुम्हारी किसी  मां बहन की गली हुई चूड़ियां इधर-उधर बिखरी न पडी हो|___
अभी तक यह दीवारें बोलती थी देखो उन पर तुम्हारा कोई शब्द तो अंकित नहीं है बेबसी दुर्ग की मुख्य वेदना तो अंकित नहीं है बेबसी दुर्ग की मुक वैदना कहती है टटोलो देखो यहां का एक एक पत्थर  में अदमय साहसी वीर है यह जयमल कल्ला के स्मारक है कर्तव्य जैसे दुर्भाग्य से पछाड़ खाकर जमीन पर कराह रहा हो| वैसे ही इन विरांतक योद्धाओं कि यह यादगार है जयमल जिसने घायल होने पर भी अपने कर्तव्य को नहीं छोड़ा जब वह घोड़े पर चढ़ने में असमर्थ रहा तो कल्ला के कंधों पर चढ़कर युद्ध करने लगा उस केसरिया बाने की यादगार जिस पर  बहता खून ऐसा चमक रहा था मानो शोर्य  के घोड़े पर क्रोध सवार हो यह वही स्थल है जहां जयमल ने महाकाल की पूजा में अपने जीवन पुष्प को सदा के वास्ते अर्पण कर दिया था यह वह दुर्ग का वह द्वार हैं जहां प्राणों की बाजी लग जाया करती थी जवानी मृत्यु को धाराशाई कर दिया करती थी कर्तव्य यहां योवन की कलाइयों को पकड़ मरोड़ दिया करता था  |  उमंगे यहां तलवार की धार पर नाचने लग जाया करती थी तथा उत्साह यहां खून से स्नान कर अठखेलियां किया करता था एवं विलास वैभव और सुख यहां उदासीन हो कर धक्के खाया करते थे ?
यह वह अंतिम द्वार है जहां मस्ती भी एक बार मस्त हो जाया करती थी |अब सिर्फ यादगार बड़ी हो कर सिसक रही है चूकि
समय नहीं हे इसका मुकुट सुहाग छीन लिया है यह देखो वीर वर फत्ता का स्मारक है  जो काल की कलुषित छाया में समा गया है .यह मासूम परवाना टहनी पर खिलने से  पहले ही मुरझाया हुआ फूल हैं शत्रु का जिसने खुली छाती से मुकाबला किया हो आज उसी की वेदना यहां सो रही है मत जगाओ  पथिक कहीं फिर आंसू Aag Ke Sholay न बन जाए
आगे बढ़ो पथिक यह कुंभा के महलों का भग्नावशेष और यह पास ही खड़ा उस वीर का कीर्तिस्तंभ एक चेहरे की  यह दो आंखें जिनमें एक में पीड़ा के आंसू तो दूसरी में मुस्कुराहट वास कर रही है देखो  पथिक एक ही भाग्य विधाता की यह दो कृतियां जिनमें एक आकाश को छूते हुऐ इठला रही है| तो दूसरी धरती पर वीरान पड़ी है यानी एक ही जीवन के दो पहलू एक स्मृति की अट्टालिका तो दूसरी विस्मृति की उपमा बन बीते हुए वैभव पर आंसू बहा रही है|
है इस्लामी बॉलीवुड का भांड मां के दूध को कलंकित करने वाला लीला भंसाली भांड यहां  त्याग की तपोभूमि चित्तौड़ आकर देख यह वह  सती का जोहर स्थल है ?जहां वीरांगनाओं ने अपने लाडलों को बलि चढ़ा कर अपने पतिव्रता नारी धर्म का पालन किया था…..?
यहां वीर  माताओं ने मौत का जहर पीकर जिंदगी के लिए अमृत का उपहार दिया था! अब भी जमीन में ज्वाला  धधक रही है लपटों में अग्नि स्नान हो रहा है? मिट्टी से बने शरीर को सतीत्व की रक्षार्थ पुन: मिट्टी में मिला दिया था |यह वीरांगनाएं योम की अज्ञात गहराइयों से प्रकट होकर अनंत गहराई में समा गई है शत्रु इन के रूप सौंदर्य के पिपासु बन कर आते परंतु उन्हें मिलती अनंत सौंदर्य से युक्त गर्म राख की ढेरी….
इस जीवट भरी कहानी पर शत्रु भी उसी राख को मस्तक पर लगा कर दो आंसू बहा दिया करते हैं|…………
पर है ? विधर्मी नीच लीला भंसाली भांड तेरा मन मेरी इस कलम की वेदना से भी नहीं पसीजा क्या?………..
हे रखेल पुत्र भांड भंसाली यह चित्तौड़ का विहंगम स्थल है जिस को कलंकित करने की तुझ में औकात कहां से आई? यह   महान स्थल  तो महान स्त्रियों का  पावन स्थान है,जिसके कण कण की महिमा का मंडन विदेशी इतिहासकारों , साहित्यकारों ने भी अपनी पुस्तकों में किया है|
हे राही ! यह गोरा बादल की छतरिया है,
जहां मस्तानों की होली रंग लाया करती थी| दीवानों की जिंदगी दीवाना बन जाया करती थी | यहां सौभाग्य और दुर्भाग्य की आंख मिचौनी में साम्राजयो के  भविष्य बनते और बिगड़ते थे| यह सुख विधाता की भूल और भोग उस भूल का  कोड माना जाता था |
यहां पराजयो की छाती रौन्दकर  विज्योतस्व  मनाऐ जाते थै| यहां देश धर्म और कर्तव्य की बलिवेदी पर शहीदों के मेले लगा करते थे|  आज भी उन शहीदों के उत्तेजनापूर्ण भाव  इन टूटती जा रही गुमटियों से टकराकर कहते हैं’ ” ठहरो पथिक लो,  हमारे शोर्य से प्रेरणा,  अमर कर दो अपना नाम! सच्चाई है हमारी आंखों में अब आंसू भी नहीं बचे जो इन की याद में बहाए जा सके ?
मैं मेरे अंतर्मन से यह कहना चाहता हूं जो अधर्मी राष्ट्रद्रोही जो अपना इतिहास नहीं जानते उनसे मैं यह कहता हूं——–
जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं|
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं||
है इस्लामी बॉलीवुड का भांड संजय लीला भंसाली क्या तुझनै?मेरे चित्तौड़ की गौरव  गाथा का गुणगान नहीं सुना हो तो मैं कवि प्रदीप की वह ऐतिहासिक कविता के कुछ अंश तुझे और तेरे जैसे मां पद्मावती के सतीत्व का अपमान करने वालों को इस लेख के माध्यम से सुनाना चाहता हूं ? सुनिए भांड लीला भंसाली………..
यह है अपना राजपूताना,
                          नाज इसे तलवारों पर|
इसने अपना जीवन सिंचा ,
                        बरछी तीर कटारों पै||
यह प्रताप का वतन पनाह है,
                     आजादी के नारों पै |
कूद पड़ी थी यहां हजारों ,ललनाएं अंगारों पै||
बोल रही है कण कण में ,कुर्बानी राजस्थान की|
इस माटी से तिलक करो ,यह माटी है, बलिदान की ?
वन्दे मातरंम  वन्दे मातरंम ——–
मां शक्ति स्वरूपा पद्मनी पर मूवी बनाने वाले विधर्मी पथभ्रष्ट लीला भंसाली भांड मेरे चित्तौड़ की धधकती ज्वाला की तपोभूमि पर आ कर तो देख मैं हिम्मत हाडा तुझे सती स्वरूपा माता पद्मिनी का सत्य इतिहास बताता हूं
हां यही रानी पद्मिनी के महल है जो चारों ओर से जल से गिरे हुए है ,ऐसे प्रतीत हो रहे हैं मानो पत्थरों ने रो-रो कर आंसुओं के सरोवर मैं गाथाओ को घेर लिया हो|
दुख दर्द और वेदना पिघल पिघल कर पानी हो गई जो अब रूक रूक कर फिर पर हो रही हो| जल के मध्य खड़े यह मन ऐसा लग रहा हैं  जैसे  वियोगी मुमुक्ष बनकर जलसमाधि के लिए तैयार हो रहे हो अथवा सृष्टि के दर्पण में अपने सौंदर्य के पानी को मिलाकर योगाभ्यास कर रहे हो | यह वह महल है जिनके सौंदर्य के समक्ष देवलोक की सात्विकता बेहोश हो जाया करती थी|
जिसकी खुशबू चुराकर फूल आज भी संसार में प्रसन्नता की सौरभ बरसाते हैं| यहां भी कर्तव्य पालन की कितनी कीमत चुकानी पड़ी है?  सब राख की ढेर हो गई |
बस अब उसकी महक ही भटक रही है!
क्षत्राणी होने का दंड कोई क्या चुका पाएगी जो रानी पद्मिनी ने भोग-विलास सुख सौंदर्य को एक झटके में लात मारकर जोहर व्रत का अनुष्ठान किया ! यह वही महल है जहां रानी ने राज परिवार की समस्त नारियों को सतीत्व का पाठ पढ़ाया और मदहोश रावल को क्षत्रिय धर्म की प्रेरणा देखकर युद्ध को विदा किया——…….
राष्ट्र की अस्मिता रखने वाले मेरे करणी सेना के साहसी युवाओं ? मां पदमनी की तरह तुम भी अपने हृदय को वज्र के तुल्य कठोर कर लो ? चित्तौड़ दुर्ग आगे अपनी आप बीती कहता है देखो ? मेरी अस्मिता को बचाने वालों भारत वासियों…………
देख लो  आज भी मैं खड़ा हूं ?
देखो मै पिघला  और जला भी नहीं फिर भी इन वेदनाओं को सहन करने के वास्ते अडिग  खड़ा हूं| है मेरे दर्शनों के अभिलाषी पथिक इधर जरा मुड़ कर देख यह  खीचण रानी पन्ना दाय  का महल है जिसने राजवंश की रक्षार्थ अपने पुत्र की बलि देकर चित्तौड़ का मान बढ़ाया था यह  मेवाड़ वंश का रक्षक  बिखरता अतीत के बादलों मै झांक रहा है|
तुम्हें क्या शिक्षा दी जाए पथिक|  तुम्हारे पूर्वजों के खून ने तुम्हें कोई शिक्षा नहीं दी|
तुम्हारी माता बहिनों के बलिदान ने तुम्हें कुछ नहीं सिखाया ?
तुम्हारे जाज्वल्यमान इतिहास से भी तुम कुछ नहीं सीख सके तो अब मैं तुम्हें(लीला  भंशाली  भांड ) जैसे विधर्मियों को क्या शिक्षा दे सकता हूं?  जो मै उस जीवित इतिहास का  मूक स्मारक हूं | पर हां,
मेरी भी मर्यादा है | जिसका मस्तक    झुक गया है तुम उन्हें जा कर कहना,  मेरे सामने आकर अपना मस्तक ना झुकाऐ है |  जिन्होंने एक जीवित जाति और जीवित इतिहास का स्मारक बना दिया है उन्हें  कह देना कि मैं उन्हें देखना भी नहीं चाहता ,
वे  कदम कभी इधर ना आए जो हार कर शत्रुओं के टुकड़ों पर जीवित रहने के लिए चल  पढ़े हो ?……..,……….

मैंने तलवार उठाना सिखाया,
दुश्मन के लौहू से रंगने को  |
वीरों को मैंने उत्साहित किना ,
दुश्मन की नाक रगड़ने को ||
शहीदों को मैंने सम्मान दिया,
रमणीयो  का बना में तीर्थ स्थल |
आओ मेरे वीर सपूतों
पद्मिनी की आत्मा करती कल कल ||
नमन करो तुम उस भूमि को
जिसने राष्ट्र का मान बढाया |
मैं वही चित्तौड़ निराला हूं
जिसने स्वाभिमान को नहीं गिराया ||
            ……. जय जय चित्तौड़गढ़
……. ….. जय जय राजपूताना

   **** ठा•   हिम्मत सिंह हाडा
         [ इतिहासकार]
            झालावाड

Author:

Buy, sell, exchange old books

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