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अति रोचक एवम ज्ञानवर्धक प्रसंग, श्रीमद्भागवत के बारे में,,,,

  • पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।
    सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥

प्रभुश्रीराम कागभुशुण्डि से कहते हैं,वह पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो अथवा चर-अचर कोई भी जीव हो, कपट छोड़कर जो भी सर्वभाव से मुझे भजता है, वही मुझे परम प्रिय है॥

भागवत् श्रवण की प्यास कभी नहीं बुझती, बल्कि श्रवण की भूख और भी बढ़ जाती है, भाई-बहनों भागवत् रूपी खजाने से एक प्रसंग का चिन्तन करेंगे, सरस्वती के किनारे एक ज्ञानी भक्त और दूसरा नीतीज्ञ भक्त, दोनों भक्तों का मिलन हुआ, यहीं से भागवत में आरम्भ होता हैं, विदुरजी और उद्धवी का संवाद।

उद्धवजी ने भगवान् श्री कृष्णजी की बाल लीलायें, भगवान् श्री कृष्णजी का दिव्य किशोर चरित्र श्री विदुरजी को सुनायी, सुनकर विदुरजी उत्कंठित हो गये और कुछ जानने के लिये आग्रह किया, तब महात्मा उद्धवजी ने कहा, हरिद्वार में एक संत रहते हैं नाम हैं मैत्रेय मुनि, मैत्रेय मुनि ब्राह्मण हैं, विदुरजी दासी पुत्र हैं, लेकिन परमात्मा से सम्बन्ध जिसका जुड़ गया, फिर वहाँ जातिपाँति क्या होती है? जो हरि का भजन करे वो हरि का हो गया, मैत्रेय मुनि ने दौड़कर विदुरजी को अंक में भर लिया।

जाति पाति पूछहिं नहीं कोई।
हरि को भजे सो हरि का होई।।

शुकदेवजी कहते है राजन्! मैत्रेय मुनि बोले, आज इस गरीब ब्राह्मण की कुटिया पर आप जैसे परम संत का आगमन कैसे हो गया?

विदुरजी ने कहा भगवन् मैं शास्त्रों में शंका नहीं करता, सज्जनों! शास्त्रों में कभी कुतर्क मत करो, कुतर्क करना अपराध है, किन्तु जानकारी के लिये जिज्ञासा करना अपराध नहीं है।

विदुरजी संत श्री मैत्री मुनी से कहते हैं- मैं यह जानना चाहता हूँ कि सारी सृष्टि को परमात्मा क्यों बनाता है? सृष्टि में कोई दुःखी क्यों? और कोई सुखी क्यों होता है? परमात्मा अनेक प्रकार के अवतार लेकर क्यों आते है? उन अवतारों में कभी नृसिंह अवतार, कभी वामन अवतार, मैंने सुना है, भगवान् ने शूकर का रूप ले लिया, वाराह बन गये, ये कैसे?

मैत्रेय मुनि ने सृष्टि के प्रसंग को विस्तार से कहा और अन्त में विदुरजी से बोले, संसार में जो कुछ भी परिलक्षित होता है, जो कुछ भी संसार में दिखायी देता है वो परमात्मा की क्रीड़ा है, वो उसकी सुन्दर लीला है और ये संसार उसकी क्रीड़ा भूमि हैं, यहाँ वो कई-कई प्रकार की लीला से प्रमुदित होता हैं।

दूसरी बात, कोई दुःखी क्यों कोई सुखी क्यों? परमात्मा किसी को दुःख नहीं देता, तो परमात्मा किसी को सुख भी नहीं देता, ये सुख और दुःख तो अपने कर्म के अनुसार जीव भोगता है, इस संसार में जो कुछ भी हम लोग भोगते है, अपने कर्म और प्रारब्ध के अनुसार भोगते है, पहले हम क्या कर चुके इसकी चिन्ता मत करो, आगे हमें क्या करना है, उसके बारे में विचार मत करो।

काउ न कहु सुख दुःख करि दाता।
निज कृत कर्म भोग सबु भ्राता।।

सज्जनों! प्रयास करो कि वर्तमान में मेरा समय व्यर्थ में चला नहीं जावे, वर्तमान का जिसने सदुपयोग किया है, उसका भूतकाल भी श्रेष्ठ हो जाता है, और भविष्य भी उज्ज्वल हो होता है, इसलिये वर्तमान तो हम आजकल टी वी देखने में व्यतीत कर देते है, अब तो बिगड़ने के लिये टि वी में सैकड़ो चैनल हो गये हैं।

आज के समय में टीवी पर विज्ञापन के ऐसे-ऐसे खराब दृश्य आते हैं कि माँ-बाप, बेटा व बेटी एक जगह बैठ कर टि वी भी नहीं देख सकते, ऐसे-ऐसे खराब दृश्य आते है, अब उनका छोटे बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इसलिये भाई-बहनों!  वर्तमान को पंडितजी की पोस्ट पढ़ने लगाओं टी वी में नहीं, वर्तमान तो हम इसमें निकाल देते हैं, फिर रोते हैं, पहले हमने ऐसा क्यों नहीं किया? अब क्या होगा? तो अब रोने के सिवाय मिलेगा क्या?

तीसरी बात विदुरजी ने मैत्री मुनी से पूछी की परमात्मा अवतार क्यों लेते है?

वेद के अनुसार जो व्यक्ति कर्म कर रहा है, वेद के आधार पर जो सत्कर्म कर रहा है, आचरण कर रहा है, उस सत्कर्म करने वाले व्यक्ति को कोई कष्ट पहुँचाता है, तो उस व्यक्ति की सुरक्षा करने के लिये परमात्मा अवतार लेकर आते है, अर्थात अपने भक्तों को सुख, आनन्द प्रदान करने के लिये प्रभु अवतार लेते हैं।

अवतारों में भगवान् ने वाराह का रूप धारण किया, भगवान् ने शूकर का रूप धारण किया, इसका भी एक विचित्र कारण है, कश्यपजी महाराज की तेरह पत्नियाँ थीं, उनमें दिति सबसे बड़ी थी, एक दिन दिति ने कश्यपजी से कहा, मेरी जितनी भी अन्य बहनें है सब ही पुत्रवती है, मुझे भी पुत्र होना चाहिये, सहवास की कामना की।

तब कश्यपजी ने दिति से कहा, देवी यह सायंकाल का समय है, यह समय पुत्र सुख के लिए उपयुक्त नहीं, इस समय साक्षात् भगवान् शिव शंकर अपने गणों के साथ आकाश में विचरण करते हैं, इस समय किया हुआ जो गर्भाधान उस गर्भस्थ शिशु पर अशुभ प्रभाव डाल सकता है, लेकिन कश्यपजी की धार्मिक बातों का दिति ने अनादर कर दिया।

कश्यपजी भी दिति के दुराग्रह के आगे झुक गये और दिति के साथ रहे और वह समय बितने पर कहा देवी तुम्हें दो पुत्र होंगे, परन्तु दोनों ही दुष्ट होंगे, दुराचारी होंगे, माता दिति तो एकदम भयभीत हो गयीं, बोली मुझे दुराचारी पुत्र नहीं चाहिये, मुझे तो सुशील पुत्र चाहिये, नारायण का भक्त पुत्र चाहिये।

कश्यप ऋषि बोले- अब समय का असर मैं कहां लेकर जाऊँ? इतना हो सकता है कि तुम्हारे पुत्र तो दोनों ही दुष्ट राक्षस होंगे लेकिन तुम्हारे पुत्रों का संहार करने के लिये भगवान् नारायण को आना पड़ेगा, कश्यपजी ने दिति से कहा कि तुम्हारा जो पौत्र होगा वह बड़ा गुणवान होगा, उसका नाम प्रह्लाद होगा, वो शीलवान होगा, अलम्पट होगा, तेजस्वी, यशस्वी, मनस्वी, और भगवान् का परम भक्त होगा।

इसे सुनकर माता दिति के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई, देवताओं ने ब्रह्माजी से कहा, दिति के गर्भस्थ जो शिशु हैं, उनका प्रकाश अभी से बढ़ रहा है, दैत्यों की माता का पता नहीं क्या होगा?

ब्रह्माजी ने कहा, दिति के गर्भ में जो बालक है, वो साधारण मानव नहीं है, ये दोनों भगवान के दिव्य पार्षद है, जय और विजय, विदुरजी ने मैत्री भुनी से जिज्ञासा प्रकट की, जय और विजय दोनों राक्षस क्यों बने?

एतौ तौ पार्षदौ महहां जयो विजय एव च।
कदथींकृत्य मां यद्वो ब्रहकाता मतिक्रमम्।।

मैत्री मुनि विदुरजी से कहते हैं  ब्रह्माजी के चार मानस पुत्र हैं, सनक, सुनन्दन, सनातन और सनत्कुमार, ये चारों ही मानस पुत्र एक बार भगवान् श्री हरि के दर्शनों के लिए गये, बैकुणठ में प्रवेश करने लगे तो जय-विजय ने रोक दिया और कहा- क्षमा करे, अभी हमारे प्रभु के विश्राम का समय है, आप अन्दर नहीं जा सकते।

सनत्कुमार बोले- हमारे माता-पिता से मिलने से तुम कैसे रोक सकते हो? धक्के देकर जाने लगे, जय-विजय का कोई दोष तो नहीं था, क्योंकि वो तो अपने कार्य का निर्वाह कर रहे थे, लेकिन सनत्कुमार जबर्दस्ती अन्दर जाने लगे तो जय-विजय ने रोक दिया, सनत्कुमारों ने क्रोधित होकर श्राप दे दिया, और कहा, तुम भगवान् के पार्षद होकर हमें भगवान् से मिलने से वंचित करते हो, जाओ तुम दोनों सात जन्म तक राक्षस हो जाओ।

जय-विजय चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगे कि हम आपको पहचान नहीं पाये, राक्षस बन जायेंगे तो बड़ी तकलीफें भोगनी होंगी, यह वार्तालाप हो रहा था तब तक भगवान् श्री हरि आ गये और पार्षदों की तरफ से माफी मांगी, तब तक सनत्कुमार भगवान् के दोनों पार्षदों को श्राप दे चुके थे, सनत्कुमारों ने कहा, दैत्य तो तुम दोनों बनोगे, यदि तुम प्रभु को प्रित से भजोगे तो सात जन्म लेने पडे़ंगे, यदि बेर से भजोगे तो तीन जन्म में ही तुम्हारी मुक्ति हो जायेगी।

तीन जन्म तक इतने बड़े राक्षस बनोगे कि तुम्हें मारने के लिये भी भगवान् को ही आना पड़ेगा, दोनों ने कहा हम बेर से ही भजेंगे, सनत्कुमारों के मन में बड़ी ग्लानि हुई, हमने क्रोध क्यों किया? इसलिये बार-बार देत्यों से देवताओं और मानव रक्षा के लिये भगवान् श्री विष्णुजी अवतार लेते हैं।

Sanjay Gupta

Author:

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