Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

रथ यात्रा के समय में पुरी के जगन्नाथ मंदिर का भी जिक्र होगा |


रथ यात्रा के समय में पुरी के जगन्नाथ मंदिर का भी जिक्र होगा | कई पुरानी किताबों में भी इस मंदिर का जिक्र है | R H Major द्वारा संकलित पुस्तक “Narratives of Voyages in India in Fifteenth Century”, नामक पुस्तक में भी पुरी के मंदिर का वर्णन है | इस किताब को आप मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | किताब के मुताबिक उस समय तक मंदिर में किसी भी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित नहीं था | यानि कोई अछूत टाइप चीज़ का जिक्र नहीं है ! इसके कारणों को देखेंगे तो आपको आर्थिक इतिहास देखना होगा |

सन 1750 तक भारत, आर्थिक रूप से , विश्व का (चीन के बाद) सबसे ताकतवर राष्ट्र था और पूरी दुनिया का 25 % GDP का उत्पादन करता था | इस दौर में अमेरिका और ब्रिटेन मिलकर मात्र 2% GDP का उत्पादन करते थे | ब्रिटिश नीतियों कि वजह 1900 आते आते भारत का हिस्सा घटकर मात्र 2% रह गया , और अमेरिका और ब्रिटेन का शेयर बढ़कर 41 % हो गया | मात्र डेढ़ सौ सालों में, भारत का per capita industrialization, 700% घट गया | जाहिर है इस से भीषण बेरोजगारी भी हुई होगी | इसी बेरोजगार और बेरोजगारी से तबाह दरिद्र जनसमुद्र को दल हित चिन्तक “दलित” बुलाते हैं |

अब अगर इतिहास लिखने के तरीके को देखिएगा तो नजर आएगा कि किताबों में जगह जगह कुछ नंबर सुपरस्क्रिप्ट में लिखे होते हैं | ये वो रिफरेन्स होते हैं जिन किताबों का सन्दर्भ इतिहासकार दे रहा होता है | जैसे मेरा ऊपर वाला पैराग्राफ Augus Madisson की किताब Contours of the World Economy I-2003 AD से लिया हुआ है | ऐसे सन्दर्भ देने में भारत का हर आर्थिक इतिहासकार डॉ. हैमिल्टन बूचनान का सन्दर्भ जरूर दे रहा होता है | उन्होंने सन 1807 मे पूरे भारत का लेखा जोखा लिया था | आश्चर्यजनक तथ्य है कि उन्होंने भी भारत में किन्हीं अछूतों का वर्णन नहीं किया है | क्यो ? क्या वो अंधे थे? कि अछूत थे ही नहीं ?

यदि यह हिन्दू धर्म की आदिकालीन परंपरा है , तो ये इन ऐतिहासिक दस्तावेजों से क्यों गायब है ?

पुराने ज़माने में शिक्षा पूरी करने का एक हिस्सा घूमना भी होता था । बिहार में कुछ समय पहले सरकारी विद्यालयों के छात्र-छात्रों को एक शैक्षणिक यात्रा पर ले जाने की भी शुरुआत हुई थी । उसके बाद से यहाँ पटना के चिड़ियाघर के बाहर कई बसें खड़ी दिखती हैं, स्कूल के बच्चों से भरी हुई । उसमें बच्चे कितना, क्या सीखते हैं ये विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन ना घूमने की वजह से भारतीय काफी कुछ नहीं सीखते ये तो पक्का है । चलिए ये देखने के लिए एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल चलते हैं । वजह ये है कि बुड्ढे होने पर आपकी प्रश्न करने की क्षमता, शौक सब कम हो जाते हैं तो जवानी में जहाँ आप देखकर सीखेंगे, वहीँ बुढ़ापे में आप सिर्फ अपनी स्थापित धारणाओं को पुष्ट कर रहे हों, इसकी संभावना बढ़ जाती है । तो हम जरा जल्दी चले गए । लेकिन इस साल क्यों सोच रहे हैं, तो 2015 में एक ख़ास बात है ।

दरअसल हिन्दुओं के कलैंडर यानि कि पञ्चांग में हर 14 से 19 साल में एक महीना जोड़ना पड़ता है । 2015 ऐसा ही एक साल है । इस साल पुरी के जग्गनाथ मंदिर में जो मूर्तियां रखी हैं उन्हें बदला जाता है । मंदिर प्रांगण में जिन मूर्तियों की पूजा होती है उन्हें लकड़ी से बनाया जाता है । मुख्यतः इसमें नीम की लकड़ी इस्तेमाल होती है । इन चारों मूर्तियों में भगवान जगन्नाथ की मूर्ती 5 फुट 7 इंच की होती है और उनके फैले हुए हाथ 12 फुट का घेरा बनाते हैं । इनका वजन इतना ज्यादा होता है कि पांच-पांच लोग इनके एक एक हाथ पर, बीस लोग उन्हें पीठ की तरफ से उठाते हैं और करीब पचास लोग उन्हें आगे से खींचते हैं । बलभद्र की मूर्ती इस से कहीं हल्की होती है । उनकी मूर्ती 5 फुट 5 इंच ऊँची होती है और उनके हाथ भी 12 फुट का घेरा बनाते हैं । सुभद्रा की मूर्ती 5 फुट से थोड़ी सी काम होती है, वो भी वजन में हलकी होती है । सुदर्शन की मूर्ती में कोई नक्काशी इत्यादि नहीं होती । लेकिन इसकी ऊंचाई 5 फुट 10 इंच होती है ।

समस्या है इसके लिए नीम का पेड़ ढूंढना । किसी भी पेड़ से मूर्ती नहीं बनाई जा सकती । भगवान जगन्नाथ सांवले हैं इसलिए उनकी मूर्ती जिस पेड़ से बनेगी उसे भी गहरे रंग का होना चाहिए । लेकिन उनके भाई और बहनों की मूर्तियों के लिए हलके रंग वाली लकड़ी ढूंढी जाती है । जिस पेड़ से भगवान जगन्नाथ की मूर्ती बनेगी, उस पेड़ में चार मुख्य डाल होनी चाहिए, जो भगवान के चार हाथों का प्रतीक हैं । पेड़ को किसी श्मशान के पास होना चाहिए । उसके पास कोई तालाब या जलाशय भी होना चाहिए । पेड़ या तो किसी तिराहे के पास हो, या वो तीन पहाड़ों से घिरा हुआ होना चाहिए । पेड़ पर कोई लताएँ चढ़ी हुई नहीं होनी चाहिए । उसके पास वरुण, सहदा और विल्व (बेल) के पेड़ भी होने चाहिए । इनके अलावा पेड़ के आस पास किसी साधु की कुटिया-आश्रम भी होनी चाहिए । कोई न कोई शिव मंदिर भी पास ही होना चाहिए । इस पेड़ पर किसी चिड़िया का घोंसला नहीं होना चाहिए । ख़ास बात ये भी है कि पेड़ की जड़ में किसी सांप की बांबी हो और पास ही कहीं चीटियों का घोंसला भी जरुरी है । अब सबसे जरूरी चीज़ ! पेड़ के तने पर प्राकृतिक रूप से बने हुए शंख और चक्र के निशान होने चाहिए । इतनी शर्तें पूरी करने वाले पेड़ के तने से ही भगवान जगन्नाथ की मूर्ती बन सकती है ।

आप अब कहेंगे कि इतनी शर्तों को पूरा करने वाला पेड़ मिलेगा कहाँ ? तो हर बार ऐसा पेड़ मिला है । पिछले सौ साल का रिकॉर्ड आप कभी भी देख सकते हैं, लम्बा रिकॉर्ड देखना हो तो दो चार दिन का समय लगेगा ।

ऐसे नियम कायदों के बारे में ना जानने वाले एक सज्जन थे भीमराव रामजी आंबेडकर जिन्होंने अपनी किसी किताब में लिखा कि मंदिर का पुजारी बनने के लिए कोई नियम कायदे नहीं हैं । अतः मंदिर के पुजारियों की नियुक्ति के नियम होने चाहिए । वो निस्संदेह पुरी के जगन्नाथ मंदिर नहीं गए होंगे । अगर गए होते तो उन्हें पता होता की इन नियमों के श्लोक जैसे लिखे होते हैं । उन्हें याद भी करना होता है, साथ ही दर्जनों बार उनका अभ्यास भी करना होता है । मतलब जिसे minimum requirement कहते हैं वो करीब 12-15 साल की प्रैक्टिस के बाद आएगी । खैर बेचारे जा के देखते तो मुझे या मेरे जैसे अन्य लोगों को उनपर सवाल करने का मौका भी नहीं मिलता ।

ओह याद आया, इस मंदिर में गैर हिन्दुओं को प्रवेश नहीं करने दिया जाता है । मगर जो विज्ञ जन ये जानते ही कहने वाले हैं कि इस मंदिर में दलितों को प्रवेश नहीं मिलता होगा इसलिए भीमराव रामजी आंबेडकर नहीं गए यहाँ, वो अपनी आपत्ति जरूर दर्ज़ कराएं ! आपके ऐसा बोलते ही इस मंदिर के पुजारियों की भी बात होगी !

✍🏻 आनंद कुमार

#सेकुलरिज्म का नँगे स्वरूप का दर्शन कीजिये।

1806 में #रेगुलेशन V में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लुटेरों ने पहले जगन्नाथ पुरी के तीर्थयात्रियों पर टैक्स लगाया।
टैक्स का रेंज था 10 रुपये से 2 रुपये तक।
उसी में हिन्दुओ के एक वर्ग का उन्होंने मंदिर में प्रवेश वर्जित किया।
ये काम ब्रिटिश दरोगा ने किया न कि मंदिर के पुजरियों ने।
इसी तथ्य को आधार बनाकर 1932 में सवा सौ साल बाद मंदिर में शूद्रों का प्रयोग वर्जित है , का ह्ल्ला अपने लार्ड एंड मास्टर के कहने पर मचाया, जिससे हिंदुत्व की तौहीन हो और भारत में जीसस का झंडा बुलंद हो।
1810 आते आते उन्होंने उन्होंने पूरी मंदिर को हिन्दुओ के द्वारा चढ़ाए हुए धन पर कब्जा कर लिया।

उसी लूट को बाद में परतंत्र भारत के हजारो मन्दिरो पर कब्जा किया गया।
स्वतंत्र भारत में भी वो लूट जारी है।

ये कैसा सेकुलरिज्म है जो सिर्फ हिन्दुओ के मन्दिरो के दान और मंदिर की संपत्ति पर कब्जा करता है ।
और उस पैसे को हज में सब्सिडी में खर्च किया जाता है या दक्षिण भारत में द्रविड़ रेस की झूंठ कहानी रचने  वाले पादरियों की मरीना बीच पर विशाल मूर्ति बनाने में खर्च होता है।

राम मंदिर से सरकार का क्या लेना देना।
लेना देना होता तो 1806 के रेगुलेशन iv के आधार पर बना हिन्दू टेम्पल एंडोमेंट एक्ट खत्म न करती मोदी सरकार।
1806 रेगुलेशन iv को अंग्रेजों ने जगन्नाथ पुरी के मंदिर की संपत्ति हड़पने के लिए बनाया था।

“1806 में अंग्रेजो ने लूट मार की अपनी नीति और नियत के तहत एक कानून बनाया जिसके तहत मंदिर के रख रखाव के बहाने पूरी आने वाले धर्मयात्रियो से टैक्स वसूलती थी।
और वहाँ पर दान होने वाली संपत्ति को कब्जिया लेती थी ।
वहीँ से मंदिरों में शूद्रों के न घुसने देने का ड्रामाई लेख अम्बेडकर जी ने 1932 के आसपास लिखा, जो आज भी एक आजमाया हुवा हथकन्डा है ,जिसको अभी कुछ दिन पूर्व कांगेस की एक दलित सांसद ने संसद में भी आजमाया कि फला मंदिर में उसकी जाति पूँछी गयी थी जो 100% झूँठ है ।
इसी रेगुलेशन को आधार बनाकर 1952 में हिन्दू टेम्पल एंडोमेंट एक्ट बनाया गया जिसके अनुसार मंदिरों में दान का पैसा सरकारी है जबकि ईसाईयों और मुसलमानों के लिए ऐसा कोई कानून नही हैं।”

✍🏻 डॉ त्रिभुवन सिंह

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