Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ऐसा हुआ कि तिब्बत का एक फकीर


👏 ऐसा  हुआ  कि  तिब्बत  का एक फकीर  अपने  गुरु  के  पास  गया।
गुरु  की  बड़ी  ख्याति  थी।  और यह फकीर  बड़ा  श्रद्धालु  था।  और गुरु जो  भी  कहता,  सदा  मानने  को तैयार  था।  इसकी  प्रतिष्ठा  बढ़ने लगी।  और  शिष्यों  को  पीड़ा  हुई।

उन्होंने  एक  दिन  इससे  छुटकारा पाने  के  लिए-एक  पहाड़ी  के  ऊपर बैठे थे- इससे  कहा  कि  अगर  तुम्हें गुरु  में  पूरी  श्रद्धा  है  तो  कूद  जाओ।

तो  वह  कूद  गया।  उन्होंने  तो  पक्का माना  कि  हुआ  खतम।  नीचे जाकर देखा  तो  वह  पद्यासन  में  बैठा  था।
और  ऐसा  सौंदर्य  और  ऐसी  सुगंध उन्होंने  कभी  किसी  व्यक्ति  के  पास न  देखी  थी,  जो  उसके  चारों तरफ बरस  रही  थी।

वे  तो  बड़े  हैरान  हुए।  सोचा  संयोग है।संदेह  ज्यादा  से  ज्यादा संयोग  तक  पहुंच  सकता  है, कि  संयोग की बात  है  कि  बच  गया। कोई  फिकर नहीं।

एक  मकान  में  आग’  लगी थी,उन्होंने  कहा  कि  चले जाओ, अगर  गुरु  पर पूरा  भरोसा  है, शिष्यों  ने  कहां।  वह चला   गया  भीतर।

मकान  तो  जलकर  राख  हो  गया।
जब  वे  भीतर  गए  तो  आशा  थी कि
वह  भी  जलकर  राख  हो  चुका होगा। वह  तो  वहां  ऐसे  बैठा  था, जल में कमलवत। आग  ने  छुआ  ही  नहीं।
उन्होंने  सुनी  थीं  अब  तक  ये  बातें
कि  ऐसे  लोग  भी  हुए  हैं-जल  में कमलवत,  पानी  में  होते  हैं  और पानी  नहीं  छूता। आज  जो  देखा, वह अदभुत  चमत्कार  था! आग  में था और  आग  ने  भी  न  छुआ। पानी  न छुए, समझ  में  आता  है!

अब  संयोग  कहना  जरा मुश्किल मालूम  पड़ा। गुरु  के  पास  ये खबरें पहुंची। गुरु  को  भी  भरोसा  न  आया, क्योंकि गुरु  खुद  ही  इतनी
श्रद्धा  का  आदमी  न  था।गुरु ने सोचा  कि  संयोग  ही  हो  सकता  है, क्योंकि  मेरे  नाम  से  हो  जाए! अभी  तो  मुझे ही  भरोसा  नहीं  कि  अगर  मैं जलते मकान  में  जाऊं  तो  बचकर  लौटूंगा, कि  मैं  कूद  पड  पहाड़  से  और
कोई  हाथ  मुझे  सम्हाल  लेंगे  अज्ञात के।

तो  गुरु  ने  कहा  कि  देखेंगे। एक दिन नदी  के  तट  से  सब  गुजरते  थे।
गुरु  ने  कहा  कि  तुझे  मुझ  पर इतना भरोसा  है   कि  आग  में  बच  गया, पहाड़  में  बच  गया, तू  नदी  पर चल जा।

वह  शिष्य  चल  पड़ा। नदी  ने  उसे न डुबाया। वह  नदी  पर  ऐसा  चला जैसे  जमीन  पर  चल  रहा  हो।

गुरु  को  लगा  कि  निश्चित  ही मेरे नाम  का  चमत्कार है। अहंकार भयंकर  हो  गया। कुछ  था  तो  नहीं पास।तो  उसने  सोचा, जब  मेरा नाम लेकर  कोई  चल  गया, तो मैं तो चल ही  जाऊंगा। वह  चला,पहले  ही कदम  पर  डुबकी  खा  गया। किसी  तरह बचाया  गया।

उसने  पूछा  कि  यह  मामला  क्या है
मैं  खुद  डूब  गया! वह  शिष्य  हंसने लगा। उसने  कहा, मुझे  आप  पर श्रद्धा  है, आपको  अपने  पर  नहीं।
श्रद्धा  बचाती  है।

कभी- कभी  ऐसा  भी  हुआ है कि जिन पर  तुमने  श्रद्धा  की उनमें  कुछ भी न था, फिर  भी  श्रद्धा  ने बचाया। और कभी-कभी  ऐसा  भी  हुआ  है, जिन पर  तुमने  श्रद्धा  न  की उनके पास सब  कुछ  था, लेकिन  अश्रद्धा ने डुबाया  है।

कभी  बुद्धों  के  पास  भी  लोग संदेह करते  रहे  और  डूब गए। और कभी इस  तरह  के   पास  भी  लोगों  ने श्रद्धा  की  और  पहुंच  गए।

तो  मैं  आप लोगों से कहना चाहता हूं
गुरु  नहीं  पहुंचाता, श्रद्धा  पहुंचाती है। इसलिए  मैं  आप लोगों से  कहता  हूं  श्रद्धा  ही  गुरु  है। और   जहां तुम्हारी  श्रद्धा  की आंख  पड़  जाए वहीं  गुरु  पैदा  हो  जाए। परमात्मा नहीं  पहुंचाता, प्रार्थना  पहुंचाती है।
और  जहां  हृदयपूर्वक  प्रार्थना  हो
जाए  वहीं  परमात्मा  मौजूद  हो  जाता है। मंदिर  नहीं  पहुंचाते, भाव  पहुंचाते हैं। जहां  भाव  है  वहां  मंदिर  है।

इसलिए आप लोगों से कहता हूं कि वृंदावन में मंदिर न बना कर घर को वृंदावन बनाइए

👏👏👏👏👏👏👋👏👏राधे राधे जय श्री कृष्णा जय राधा रानी👏👏?👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏?👏👏👏
Ramdayal jadiya

Author:

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