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सेकुलरिज्म का पोस्टमार्टम !

सेकुलरिज्म एक भ्रामक और कुपरिभाषित शब्द है.
अधिकाँश लोग इस शब्द का सही अर्थ भी नहीं जानते .

इस शब्द की न तो कोई सटीक परिभाषा है,और न ही कोई व्याख्या है।
लेकिन कुछ धूर्तों और सत्ता लोलुप लोगों ने सेकुलर शब्द का अर्थ “धर्मनिरपेक्ष “कर दिया,
जिसका मूल अंग्रेजी शब्द से दूर का भी सम्बन्ध नहीं है.

यही नहीं इन मक्कार लोगों ने सेकुलर शब्द का एक विलोम शब्द भी गढ़ लिया “साम्प्रदायवाद “।

आज यह सत्तालोभी ,हिंदुद्रोही नेता अपने सभी अपराधों पर परदा डालने और हिन्दुओं को कुचलने व् उन्हें फ़साने के लिए इन शब्दों का ही उपयोग करते हैं।

इन कपटी लोगों की मान्यता है की कोई व्यक्ति चाहे वह कितना ही बड़ा अपराधी हो, भ्रष्टाचारी हो ,या देशद्रोही ही क्यों न हो,
यदि वह ख़ुद को सेकुलर बताता है ,
तो उसे दूध का धुला ,चरित्रवान ,देशभक्त,और निर्दोष मानना चाहए.इस तरह से यह लोग अपने सारे अपराधों को सेकुलरिज्म की चादर में छुपा लेते हैं .

सेकुलर का वास्तविक अर्थ और इतिहास बहुत कम लोगों को पता है.इस सेकुलरिज्म रूपी राक्षस को इंदिरा गांधी ने जन्म दिया था।

इमरजेंसी के दौरान (1975-1977) इंदिरा ने अपनी सत्ता को बचाने ओर लोगों का मुंह बंद कराने के लिए पहिली बार सेकुलरिज्म का प्रयोग किया था।

इसके लिए इंदिरा ने दिनांक 2 नवम्बर 1976 को संविधान में 42 वां संशोधन करके उसमे सेकुलर शब्द जोड़ दिया था .
जो की एक विदेश से आयातित शब्द है, हिन्दी में इसके लिए धर्मनिरपेक्ष शब्द बनाया गया.यह एक बनावटी शब्द है.

भारतीय इतिहास में इस शब्द का कोई उल्लेख नहीं मिलता है .
वास्तव में इस शब्द का सीधा सम्बन्ध ईसाई धर्म और उनके पंथों के आपसी विवाद से है।

सेकुलर शब्द लैटिन भाषा के सेकुलो(Seculo) शब्द से निकला है। जिसका अंग्रेजी में अर्थ है ‘इन दी वर्ल्ड (in the world) ‘कैथोलिक ईसाइयों में संन्यास लेने की परम्परा प्रचलित है।

इसके अनुसार संन्यासी पुरुषों को मौंक (Monk) और महिलाओं को नन (Nun)कहा जाता है। लेकिन जो व्यक्ति संन्यास लिए बिना ,समाज में रहते हुए संयासिओं के धार्मिक कामों में मदद करते थे उन्हें ही सेकुलर(secular) कहा जाता था।
साधारण भाषा में हम ऐसे लोगों को दुनियादार कह सकते हैं .

1-सेकुलरिज्म की उत्पत्ति
सभी कैथोलिक ईसाई पॉप को अपना सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक गुरु मानते हैं .
15 वीं सदी में उसे असीमित अधिकार थे।
उसे यूरोप के किसी भी राजा को हटाने ,नए राजा को नियुक्त करने,और किसी को भी धर्म से बहिष्कृत करने के अधिकार थे।

यहाँ तक की पॉप की अनुमति के बिना कोई राजा शादी भी नहीं कर सकता था।

जब इंग्लैंड के राजा हेनरी 8 वें (1491-1547)ने 1533 में अपनी रानी कैथरीन को तलाक देने,और एन्ने बोलेन्न
(Anne Blolen) नामकी विधवा से शादी करने के लिए पॉप क्लीमेंट 7 से अनुमति मांगी
तो पॉप ने साफ़ मना कर दिया।
और हेनरी को धर्म से बहिष्कृत कर दिया।
इस पर नाराज़ होकर हेनरी ने पॉप से विद्रोह कर दिया,और अपने राज्य इंग्लैंड को पॉप की सता से अलग करके ,’चर्च ऑफ़ इंग्लैंड -Church ofEngland)”की स्थापना कर दी.

इसके लिए उसने 1534 में इंग्लैंड की संसद में ‘एक्ट ऑफ़ सुप्रीमैसी -Act of Supremacy”नामका कानून पारित किया .जिसका शीर्षक था “सेपरेशन ऑफ़ चर्च एंड स्टेट-separation of church and state “इसके मुताबिक चर्च न तो राज्य के कामों में हस्तक्षेप कर सकता था ,और न ही राज्य चर्च के कामों में दखल दे सकता था।

इस चर्च और राज्य के विलगाव के सिध्धांत का नाम उसने सेकुलरिज्म-Secularism रखा
.
आज अमेरिका में सेकुलरिज्म का यही अर्थ माना जाता है.
परन्तु यूरोप के कैथोलिक देशों में सेकुलर शब्द का अर्थ “स्टेट अगेंस्ट चर्च –
state against church”किया जाता है .

हेनरी और इंदिरा के उदाहरणों से यह स्पष्ट है की इन लोगों ने सेकुलर शब्द का उपयोग अपने निजी स्वार्थों के लिए ही किया था .

आज सेकुलरिज्म के नाम पर स्वार्थी लोगों ने कई शब्द बना रखे हैं जो भ्रामक और परस्पर विरोधी हैं।
कुछ प्रचलित शब्द इस प्रकार हैं –
2-धर्म निरपेक्षता -अर्थात धर्म की अपेक्षा न रखना ,धर्म हीनता,या नास्तिकता.इस परिभाषा के अनुसार धर्म निरपेक्ष व्यक्ती उसको कहा जा सकता है ,जिसको अपने बाप का पता न हो ,और जो हर आदमी को अपना बाप मानता हो.या ऎसी औरत जो हर व्यक्ति को अपना पति मानती हो अर्थात वेश्या। आजकल के अधिकाँश वर्ण संकर नेता इसी श्रेणी में आते हैं।

3-सर्व धर्म समभाव- अर्थात सभी धर्मों को एक समान मानना। अक्सर ईसाई और मुसलमान सेकुलर का यही मतलब बताते हैं।
यदि ऐसा ही है तो यह लोग धर्म परिवर्तन क्यों कराते हैं?

धर्म परिवर्तन को अपराध घोषित क्यों नहीं कराते,और धर्म परिवर्तन कराने वालों को सज़ा देने की मांग क्यों नहीं करते?

ईसाई मिशनरियां हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन के लिए क्यों लगी रहती हैं ?
या तो यह लोग स्वीकार करें की सभी धर्म समान नहीं है।

मुसलमान तो साफ़ कहते हैं की “अल्लाह के नजदीक सिर्फ इस्लाम ही धर्म है
“इन्नाद्दीन इन्दाल्लाहे इस्लाम “(انّ الدّين عند الله الاسلام )
Quan 3:19
सभी धर्मों के समान होने की बात मात्र छलावा है और कुछ नहीं।

4-पंथ निरपेक्षता -अर्थात सभी पंथों,सप्रदायों,और मतों को एक समान मानना-वास्तव में यह परिभाषा केवल भारतीय पंथों ,जैसे बौध्ध ,जैन,और सिख,जैसे अन्य पंथों पर लागू होती है।

क्योंकि यह सभी पंथ एक दूसरे को समान रूप से आदर देते हैं .लेकिन इस परिभाषा में इस्लामी फिरके नहीं आते.शिया और सुन्निओं की अलग अलग शरियतें हैं
वे एक दूसरे को कभी बराबर नहीं मानते ,यही कारण है की यह लोग हमेशा आपस में लड़ते रहते हैं.

उक्त परिभाषा के अनुसार केवल हिन्दू ही स्वाभाविक रूप से सेकुलर हैं.उन्हें सेकुलरिज्म का पाठ पढाने की कोई जरूरत नहीं है।

5-ला मज़हबियत मुसलमान सेकुलरिज्म का अर्थ यही करते है।
इसका मतलब है कोई धर्म नहीं होना,निधर्मी पना .मुसलमान सिर्फ़ दिखावे के लिए ही सेकुलरिज्म की वकालत करते हैं.
और इसकी आड़ में अपनी कट्टरता ,देश द्रोह, अपना आतंकी चेहरा छुपा लेते हैं.इस्लाम में सभी धर्मो को समान मानना -शिर्क यानी महा पाप है.

ऐसे लोगों को मुशरिक कहा जाता है,और शरियत में मुशरिकों के लिए मौत की सज़ा का विधान है। इसीलिए मुसलमान भारत को “दारुल हरब “यानी धर्म विहीन देश कहते हैं।
और सभी मुस्लिम देशों में सेकुलर का यही मतलब है।
6-सूडो सेकुलर-अर्थात छद्म धर्म निरपेक्ष.या कपताचारी .यह ऐसे लोग हैं जो धर्म का ढोंग करते हैं.

हालांकि इन लोगों को धर्म से कोई लेना देना नही होता .इनका ख़ुद का कोई धर्म नहीं होता,लेकिन यह लोग सभी धर्म स्थानों पर जाकर लोगों को मूर्ख बनाते हैं।

यह सभी लोग वर्ण संकर ,अर्थात हिन्दू,मुसलमान,ईसाई,और देशी विदेशी नस्लों की मिश्रित संतान हैं।

देश में ऐसे लोगों की एक बड़ी संख्या मौजूद है।

इसका एक उदाहरण नेहरू- गांधी-सोनिया परिवार है।

7-सम्प्रदायवाद-यह एक कृत्रिम शब्द है जो सेकुलरिज्म के विपरीतार्थ में प्रयुक्त किया जाता है.इसका शाब्दिक अर्थ है
की अपने सम्प्रदाय को मानना .इस शब्द का प्रयोग सेकुलर लोग हिदुओं को गाली देने,और अपराधी बताने में करते हैं।

इन सेकुलरों की दृष्टी में सभी हिन्दू सम्प्रदायवादी अर्थात अपराधी होते हैं .मुसलमान और ईसाई कभी सम्प्रदायवादी नहीं हो सकते.नीचे दी गयी सूची से यह स्पष्ट हो जायेगा .

8-सेकुलर- सम्प्रदायवादी
(सूची में पहले वाले सेकुलर और उसकेसामने वाले सम्प्रदायवादी हैं )

इमाम बुखारी -प्रवीन तोगडिया

मदरसा- सरस्वती मन्दिर

मुस्लिम- लीग बी जे पी

अलाहो अकबर- जय श्रीराम

मुल्ले मौलवी- साधू संत

सिम्मी- बजरंग दल

मस्जिद दरगाह- मन्दिर मठ

उर्दू- संस्कृत

इन सभी विवरणों से स्पष्ट हो जाता है
की सेकुलरिज्म एक ऐसा हथियार है
जिसका प्रयोग हिन्दुओं को कुचलने के लिए किया जाता है.

ताकि इस देश से हिंदू धर्म और संस्कृती को मिटा कर यहाँ विदेशी वर्ण संकर राज कर सकें।

हिंदू सदा से सेकुलर रहे हैं.
इतिहास गवाह है हिन्दुओं ने न तो कभी दूसरे धर्मों के लोगो पर आक्रमण किया न उन का धर्म परिवर्तन किया।

न हिन्दुओं ने किसी के धर्म स्थल ही तोडे।

फ़िर यह कांग्रेसी हिदुओं को सेकुलरिज्म पढाने की क्या जरूरत पड़ गयी थी।

मतलब साफ़ है की यह हिन्दुओं के विरूद्ध एक साजिश है।

अगर सेकुलरिज्म का पाठ पढाना है
तो ईसाइयों और मुसलमानों को पढाया जाय।
जो वास्तव में कट्टर सम्प्रदायवादी हैं।

जागो हिंदू !! 🚩🚩

विकास खुराना

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शस्त्र द्वारा रक्षित राष्ट्र में ही शास्त्रचर्चा हो सकती है।

शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचर्चा प्रवर्तते। यह सूत्रवाक्य आज के समय की मांग है। यह सम-सामयिक ही नहीं, अपितु एक सार्वकालिक और सार्वभौमिक सत्य है। वीरभोग्या वसुन्धरा। यह धरती कायरों-कमजोरों की नहीं। वीर जातियां ही इतिहास की रक्षा करती हैं, इतिहास रचती भी हैं। का पुरुषों-दुर्बलों को तो समय इतिहास के पृष्ठों में लपेटकर कूड़ा-दान में फेंक देता है। शक्ति द्वारा श्रेयस्‌ की प्राप्ति होती है। शक्ति और श्रेयस्‌ एक दूसरे के पूरक ही नहीं, एक दूसरे पर अवलम्बित भी हैं। शस्त्र में और शास्त्र विभाजक रेखा खींचने वाले लोग व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के सर्वतोमुखी विकास में कभी सफल नहीं हो सकते।

कृष्ण शक्ति के साथ अर्जुन शक्ति भी अनिवार्य है। योद्धा अर्जुन के गांडीव के बिना योगेश्वर कृष्ण के कर्मयोग के उपदेश-तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चयः और युद्धाय युज्यस्व का कोई अर्थ नहीं। अन्याय, अत्याचार, अधर्म, उत्पीड़न का प्रतिरोध करके न्याय और धर्म की विजय के लिए अर्जुन की गांडीव-शक्ति अनिवार्य और अपरिहार्य है। जब-जब इस तथ्य की उपेक्षा हुई हम पराजित हुए, अपमानित हुए, पीड़ित और प्रताड़ित हुए। “अहिंसा परमो धर्मः’ वैदिक धर्म में अभिप्रेत नहींहै। यह तो अन्याय और अत्याचार को प्रश्रय देना है। अहिंसा निरपवाद नहीं। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र द्वारा दानव-कुल का हनन करके रामराज्य की स्थापना तथा योगीराज श्रीकृष्ण द्वारा कंस-शिशुपाल-जरासन्ध का वध करके न्याय की स्थापना की संगति अहिंसा से नहीं बैठतीऔर गीता में श्रीकृष्ण का “विनाशाय च दुष्कृताम्‌’ का प्रण भी असंगत हो जाता है। हम “सत्यं ब्रह्म जगन्मिथ्या’ का जाप करते रहे तथा विदेशी आक्रान्ताओं ने हमारी भूमि पर अधिकार करके हमारी सभ्यता और संस्कृति को ध्वस्त कर दिया। अतीत के गौरव का विस्मरण करके आत्महीनता से ग्रसित होकर हम अपनी ही संस्कृति से घृणा करने लगे। इसी दौर्बल्य के कारण पश्चिमी शक्तियों के नुकीले कदमों ने भारत मॉं के वक्षःस्थल को क्षत-विक्षत कर लहुलुहान कर दिया। राजनीतिक दृष्टि से पराधीन, सामाजिक दृष्टि से अपमानित, सांस्कृतिक दृष्टि से वंचित, आर्थिक दृष्टि से पीड़ित, शोषित, निःसहाय भारतवासी इसी को अपनी नियति मान बैठे।

समय-समय पर भारत माता के वीर सपूतों ने इस पराधीनता का प्रतिरोध भी किया तथा अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल फूंका। वीर-पुंगव महाराणा प्रताप, छत्रपति वीर शिवाजी तथा पजाब के रणबॉंकुरे बहादुर सिपाहियों ने स्वातन्त्र्य वेदी पर अपने प्राणों की बलि चढ़ाई। 1857 के स्वातन्त्र्य समर के वीर सेनानियों के बलिदान की रोमांचक गौरव-गाथाएँ मुर्दादिलों में भी प्राण फूंकती हैं। यद्यपि इस क्रान्ति को क्रूरता से कुचला गया, तथापि असन्तोष और विरोध के स्वर दबे नहीं, अपितु निरन्तर तीव्र से तीव्रतर होते गए। राष्ट्रीय भावनाओं की आँधी जोर पकड़ती गई। बंगाल, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र के वीर सपूतों ने स्वातन्त्र्य दीपक की वर्तिका को अपने रक्त रूपी तेल से सिंचित किया। वेदों के पुनरुद्धारक महर्षि दयानन्द सरस्वती की विचारधारा ने ऐसे क्रांतिवीर उत्पन्न किए, जिन्होंने विदेशी शासन की जड़ें उखाड़ने के लिए सिर पर कफन बांध लिए। महाराष्ट्र में चाफेकर बन्धुओं और सावरकर बन्धुओं के बलिदान, त्याग तथा राष्ट्र के प्रति निष्ठा और दृढ़ संकल्प ने स्वातन्त्र्य आन्दोलन में नए प्राण फूंक दिए। अण्डेमान के सैलुलर कारागार में असह्य कष्ट और क्रूरतम यातनाएं सहने वाले विनायक दामोदर सावरकर, उनके बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर, वामनराव जोशी, इन्दुभूषण, उल्हासकर दत्त, नानी गोपाल जैसे क्रांतिवीरों ने राष्ट्रप्रेम और बलिदान के अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत किए। सरफरोशी की तमन्ना लिए बसन्ती चोला पहने आजादी के परवानों ने हॅंसते-हॅंसते फॉंसी के फन्दों को चूमा। स्वातन्त्र्य देवी के दर्शन केवल अहिंसक आन्दोलन के बल पर नहीं हुए हैं, अपितु इसके लिए असंख्य बहुमूल्य प्राणों की बलि दी गई।

आज हम यह सोचने को विवश हैं कि क्या इन दीवानों ने ऐसे स्वतन्त्र भारत की कल्पना की थी? सत्तालोलुप, बेईमानी के रोग से पीड़ित, जनता से कटी इन राजनीतिक पार्टियों ने उन क्रांतिवीरों का कोई मूल्यांकन नहीं किया, बल्कि उनके किए कराए पर पानी फेर दिया।

देशहित के प्रति गाफिल आज की राजनीतिक पैंतरेबाजी ने देश की गरिमा को तो खण्डित किया ही, इसे अन्दर और बाहर से असुरक्षित भी बना दिया। देश की छवि को घूलि धूसरित कर दिया। आज भारत की जनता दुनिया की नजरों में कायर, मजबूर, दब्बू बन गई। सदियों से संसार को प्रेम, शान्ति, सहिष्णुता और सद्‌भावना के सन्देश देने वाले भारत को आज योरोपीय समुदाय के देश नसीहत देने चले हैं। “जीओ और जीने दो’ के मन्त्र को स्वयं सिद्ध करने वाले देश को अब स्वयम्भू दरोगे सहिष्णुता का पाठ पढ़ाने की हिमाकत कर रहे हैं। कमजोर की जोरू सबकी भाभी। शैतान और शातिर दिमाग वाले फिर से भारत को गुलाम बनाने का साजो-सामान तैयार कर रहे हैं। भारत को अपनी मातृभूमि, पितृभूमि और पुण्यभूमि मानने वाले हिन्दू आज अपने ही घर में असुरक्षित हैं, उपेक्षित हैं, अपमानित और आतंकित हैं। हिन्दुत्व किसी विशेष जाति, मत या सम्प्रदाय का नाम नहीं, बल्कि यह तो एक भू-सांस्कृतिक अवधारणा है। भारतीयता के बिना हिन्दुत्व नहीं, हिन्दुत्व के बिना भारतीयता नहीं। खेद का विषय है कि हिन्दुत्व की सहिष्णुता और उदारता को दुर्बलता समझा गया। बलात्‌ धर्मान्तरण के दुष्परिणाम राष्ट्र की एकता और अखण्डता को भुगतने पड़ रहे हैं।

गोधरा में क्या हुआ? साबरमती एक्सप्रेस की बोगी में 60 जीवित लोगों को चिताग्नि दी गई। मासूम, मजलूम, निरीह बच्चों, बूढ़ों, स्त्री-पुरुषों की होली जलाई गई। दयानन्द और गांधी का गुजरात धू-धू करके जल उठा। हिन्दुत्व की, भारत की गरिमा की धज्जियॉं उड़ाई जा रही हैं तथा देश की छवि धूमिल की जा रही है।

छाज तो बोलें, पर आज छलनियॉं भी चिल्ला रही हैं, जिनमें असंख्य छेद हैं। “सिमी’ (प्रतिबन्धित-भूमिगत) संस्था का समर्थन करने वाले तथा आई.एस.आई. से जुड़े तारों वाले दल भी बोलने की हिम्मत कर सकते हैं? देश के दुश्मन इन जयचन्दों और मीर जाफरों को बेनकाब करने का अभियान चलाना होगा। तथाकथित पन्थनिरपेक्षतावादियों का दुमुँहापन देखो। जिन्दा जलाए गए लोगों के प्रति इतने संवेदनहीन कि होंठ भी न खुलें और वोटों के गुलाम तथा तुष्टीकरण करने में इतने विक्षिप्त कि छाती पीटते न थकें। सभी का जीवन कीमती है। खून किसी भी समुदाय का हो, उसका रंग एक होता है। आज हमें संघर्ष करना है, अन्दर से भी और बाहर से भी। आज देश चारों ओर से संकट में घिरा है। उत्तर सुलग रहा है, पूर्व जल रहा है, दक्षिण भड़क रहा है। जेहादी आतंकवाद, उल्फा उग्रवाद, माओवादी नक्सली एम. सी.सी., पी.डब्ल्यू.जी. आदि हिंसा का ताण्डव कर रहे हैं। देश की स्वतन्त्रता खतरे में है। अब तो संग्राम महान भीषण होगा, याचना नहीं अब रण होगा,की तर्ज पर लम्बी लड़ाई लड़नी होगी। एतदर्थ वीर विनायक दामोदर सावरकर ने भारतीय छात्रों के सैनिकीकरण पर बल दिया था। देश की सीमाओं की सुरक्षा हेतु देश के नौजवान तैनात हैं उन्हें भरपूर समर्थन, प्रोत्साहन, सहयोग देना होगा। सैन्य शक्ति का दुरुस्त-चुस्त करने के साथ पुलिस प्रशासन को भी चाक चौबन्द करना होगा। आतंकवादी तो ए.के. 47, ऐ.के. 56, राकेट लांचर, बारूदी सुरंगें बिछाने की आधुनिकतम तकनीक से लैस हैं परन्तु हमारी पुलिस के पास पुराने माडल की जंग लगी बन्दूकें हों, तो कैसे मुकाबला होगा।

अब समय आ गया है कि शहीदी रक्त में उबाल आए। ‘1857 का स्वातन्त्र्य समर’ जैसे ओजस्वी देशभक्ति साहित्य का फिर से सृजन हो, अनुशीलन हो, जो भारत की नई पौध को राष्ट्र-भक्ति के जज्बे से लबरेज कर दे ।

आज आवश्यकता है स्वामी श्रद्धानन्द और स्वामी दर्शनानन्द जैसे गुरुकुल अधिष्ठाताओं के उत्साह और अध्यवसाय की, जिससे हमारी शिक्षण संस्थाओं में ऐसे शक्तिशाली देशभक्त नौजवान तैयार हों, जिनसे शत्रु थरथरा उठे। आज देश के रंगमंच पर लाला हरदयाल, श्यामजी कृष्ण वर्मा, भाई परमानन्द, मदनलाल ढींगरा, उधमसिंह, बिस्मिल, भगतसिंह, अशफाक जैसे बलिदानी वीरों को अवतरित करना होगा। आज राजनैतिक शिखण्डियों ने भारत के संविधान रूपी भीष्म पितामह को रक्तरंजित करके शरशैय्या पर लिटा रखा है। इसके लिए गाण्डीवधारी अुर्जनों की प्रतीक्षा है। चोर, डकैतों, अपराधियों, तस्करों, माफिया गिरोहों से देश की रक्षा करनी होगी। यह तभी संभव होगा जब देश की नई पीढ़ी सबल होगी, सशक्त होगी, देशभक्ति की भावनाएँ जोर मारेंगी, वैरी से लोहा लेने के लिए भारतीय सपूतों की भुजाएँ फड़क उठेंगी। अन्याय, अत्याचार, जुल्म-ओ-सितम से टक्कर लेने के लिए वैदिक संस्कृति का आदर्श है-

अग्रतः चतुरो वेदान्‌ः पृष्ठत सशरं धनुः।
इदं शास्त्रमिदं शस्त्रं शापादपि, शरादपि।।

सामने चारों वेदों हों, पीठ पर बाण सहित धनुष हो, यह (इधर) शास्त्र हो, यह (इधर) शस्त्र हो, तर्क से भी, तीर से भी। ब्राह्म तेज के साथ क्षात्र तेज भी आवश्यक है। राष्ट्र की अस्मिता (संस्कृति, कला, साहित्य, भाषा) की रक्षा हेतु देशवासियों को सर्वतः सन्नद्ध रहना होगा। याद रहे, राष्ट्र-द्रोह से बढ़कर कोई बड़ा पाप या अपराध नहीं। राष्ट्र-रक्षा के संकल्प से बढ़कर कोई संकल्प बड़ा नहीं। कायर-दुर्बल बनकर मानसिक गुलामी से ग्रस्त रहेंगे, तो रगों का खून पानी बन जाएगा। बार-बार उपस्थित होने वाली चुनौतियों का यदि डटकर वीरतापूर्वक सामना नहीं किया जाएगा, तो आने वाली पीढ़ियॉं हमें माफ नहीं करेंगी। जब मॉं की आबरू पर अन्दर और बाहर से घात-प्रतिघात किए जा रहे हों, तो मॉं के सपूतों का क्या कर्तव्य हो सकता है, यह समझना होगा। कवि “नीरज’ के शब्दों में-

दे रहा है आदमी का दर्द अब आवाज दर-दर।
अब न जागे तो कहो सारा जमाना क्या कहेगा?
जब बहारों को खड़ा नीलाम पतझड़ कर रहा है
तुम कहीं फिर भी उठे तो आशियाना क्या कहेगा ?

जय हिन्द
वंदेमातरम ¡¡¡

विपन खुराना

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धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ।

मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित किया हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है इसलिए धर्म का हनन कभी न करना, इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले ।

‘‘जो पुरूष धर्म का नाश करता है, उसी का नाश धर्म कर देता है, और जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी धर्म भी रक्षा करता है । इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले, इस भय से धर्म का हनन अर्थात् त्याग कभी न करना चाहिए ।’’

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्

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(((( श्रद्धा और अहंकार ))))
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ये बात उस समय की है जब महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद पांडवो ने अश्मेघ यज्ञ किया !
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भगवान् श्रीकृष्ण जी ने कहा :- ये यज्ञ तब पूरा माना जायेगा जब इस धरा के सभी ऋषि यहाँ भोजन ग्रहण करेंगे और आसमान में घंटा बजेगा !
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तब पांडवो ने सभी ऋषियों को भोजन करवाया परन्तु घंटा नहीं बजा,
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तब उन्होंने “भगवान् श्रीकृष्ण” जी से पूछा की कहाँ कमी रह गई !
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तब “भगवान् श्रीकृष्ण” जी ने अंतर्ध्यान हो कर देखा और कहा की :-
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दूर एक जंगल में सुपच नाम के महामुनि बैठे है वो रह गए है इसलये घंटा नहीं बजा !
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पांडवो ने दूत भेज कर महामुनि को भोजन के लिए निमंत्रण भेजा
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ऋषि सुपच ने दूत को कहा की उनको स्वयं आना चाहिए था और दूत को वापिस भेज दिया !
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तब पांडवो ने स्वयं महामुन को भोजन के लिए निमंत्रण दिया !
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परन्तु ऋषि सुपच ने शर्त रखी की वे तब ही जायेंगे जब उन्हें १०० अश्वमेघ यज्ञो का फल मिलेगा
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पांडव परेशान हो कर वापिस आ गए सारी बात “भगवान् श्रीकृष्ण” जी को बताई !
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जब ये बात द्रौपदी को पता लगी तो द्रौपदी ने कहा ये मेरे ऊपर छोड दो !
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तब द्रौपदी ने नंगे पैर कुए से पानी लाकर खाना पकाया और नंगे पैर चल कर ऋषि सुपच को बुलाने के लिए गई
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वहा ऋषि सुपच ने फिर वही शर्त बताई तो द्रौपदी ने कहा की मैंने आप जैसे किसी साधू से सुना है की..
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जब कोई नंगे पैर आप जैसे किसी महान संत के दर्शन करने जाता है तो उसका एक एक कदम एक एक अश्वमेघ यज्ञ के बराबर है इस तरह आप अपने १०० अश्वमेघ यज्ञ का फल लेकर बाकि मुझे दे दे!
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इस तरह मुनि सुपच जी द्रौपदी की बात सुनकर द्रोपदी के साथ आ गए
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जब उनको खाना परोसा गया तो उन्होंने पांडवो और सारी रानियों द्वारा बनाये गए खाने को मिला लिया और खाना शुरू कर दिया ,
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ये सब देखकर द्रौपदी के मन आया की अगर एक एक करके खाते तो द्रौपदी द्वारा बनाये गए खाने के स्वाद का भी पता लगता की कितना स्वादिष्ट बना है !
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इस दोरान ऋषि ने खाना समाप्त कर दिया परन्तु घंटा फिर भी नहीं बजा !
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तो पांडवो ने “भगवान् श्रीकृष्ण” जी से पूछा की अब क्या कमी रह गई ?
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“भगवान् श्रीकृष्ण” ने कहा की ये तो सुपच जी ही बतायेगे !
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इस पर ऋषिसुपच ने उन्हे जवाब दिया की ये तो द्रौपदी से पूछ लो की घंटा क्यों नहीं बजा !
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इस तरह जब द्रौपदी को इस बात का अहसास हुआ तो उन्होंने सुपच जी से अपने अहंकार के लिए माफ़ी मांगी तो असमान में घंटा बजा और उनका यज्ञ पूरा हुआ !
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इस वृतांत के ज़रिये संतो द्वारा बताया गया है की संत
महात्मा स्वाद को महत्व न देकर श्रधा को देखते है और प्रभु से आत्मा के मिलाप में अहंकार सबसे बड़ा रोड़ा है….

(( जय जय श्री राधे ))
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सामवेद में ऒजोन परत का विवरण

हमारी धरती का वातावरण ,धरती के चारों और एक गिलाफ (आवरण) की तरह चढ़ा हुआ है जो सबसे नीचे धरती की सतह से ,१० कि.मी तक टोपोस्फीअर, १० से ५० किमी तक स्ट्रेटोस्फीअर व ऊपर आयेनो स्फीअर कहलाता है| स्ट्रेटो स्फीअर में ओजोन गैस की सतह होती है जो धरती का एक तरह से सुरक्षा कवच है और सूर्य की घातक अल्ट्रा -वायलेट किरणों से हमारी रक्षा करता है । इसी को धरती की ओजोन छतरी कहा जाता है।
ओजोन गैस(O ३) , प्राण-वायु आक्सीजन का (O २ ) का एक अपर-रूप है जो सारी प्रथ्वी का लगभग ९३% ओजोन सतह में पाई जाती है एवं स्वयं शरीर के लिए आक्सीजन की तरह लाभकारी नहीं है। यह गैस स्ट्रेटो स्फीअर में उपस्थित ऑक्सीजन के सूर्य की अल्ट्रा वायलेट किरणों की क्रिया से बनती है —O2 -+-अ -वा किरणें = 0+0 ;0 + 02 =03- -, यह एक अस्थिर गैस है, इस प्रकार , ओजोन-आक्सीजन चक्र बना रहता है।
अल्ट्रा वायलेट किरणें शरीर के लिए घातक होतीं है , ये सन-बर्न , मोतिया-बिन्दु, त्वचा के रोग व केंसर तथा आनुवंसिक हानियाँ पहुचातीं हैं। नाइट्रस आक्साइड ,क्लोराइड-ब्रोमाइड आदि ओर्गानो-हेलोजन ,जो मुख्यतः री फ्रिरेटर ,ऐ सी ,यूरोसोल पदार्थ ,कोल्ड-स्तोराज से निस्रत सी ऍफ़ सी ( क्लोरो-फ्लोरो कार्बन) के रेडिकल हैं ;ओजोन गैस को केटालाइज करके ओजोन सतह को नष्ट करते हैं और इस सुरक्षा छतरी में छिद्र का कारण बनते हैं। अति-भौतिकता की आधुनिक जीवन शैली के कारण आज उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों के ऊपर बड़े -बड़े छिद्र बन चुके हैं जो मानव जीवन व प्राणी, वनस्पति जीवन के लिए भी घातक हैं। हमें समय रहते अपने पर्यावरण को बछाने हेतु चेतना होगा। इस रक्षक आवरण के बारे में सदियों पूर्व वैदिक -विज्ञान द्वारा चेतावनी दी जा चुकी है। इस ओजोन-छतरी का वर्णन साम-वेद की इस ऋचा में देखिये–

“इमं भ्रूर्णायु वरुणस्य नाभिं ,त्वचं पशूनां द्विपदा चतुश्पदायाँ । त्वस्तुं
-प्रजानां प्रथमं जानित्रमाने मां हिंसी परमे व्योमन॥”—साम वेद १३/५०।

अर्थात –यह प्रथ्वी के चारों और रक्षक आवरण जो स्रष्टि में सर्वप्रथम उत्पन्न वरुणस्य नाभि रूप (उत्पत्ति स्थल -जल ) तथा त्वचा की तरह रहकर, छन्ने की तरह अन्तरिक्ष कणों को प्रविष्ट न होने देकर प्राणियों की रक्षा करता है; उसे ऊर्जा के अनियमित व अति उपयोग से नष्ट न करें ।

विक्रम प्रकाश रईसों य