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कुए का विवाह– तैनालीराम

एक बार राजा कॄष्णदेव राय और तेनालीराम के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया। तेनालीराम रुठकर चले गए। आठ-दस दिन बीते, तो राजा का मन उदास हो गया। राजा ने तुरन्त सेवको को तेनालीराम को खोजने भेजा। आसपास का पूरा क्षेत्र छान लिया पर तेनालीराम का कहीं अता-पता नहीं चला। अचानक राजा को एक तरकीब सूझी। उसने सभी गांवों में मुनादी कराई राजा अपने राजकीय कुएं का विवाह रचा रहे हैं, इसलिए गांव के सभी मुखिया अपने-अपने गांव के कुओं को लेकर राजधानी पहुंचे। जो आदमी इस आज्ञा का पालन नहीं करेगा, उसे जुर्माने में एक हजार स्वर्ण मुद्राएं देनी होंगी। मुनादी सुनकर सभी परेशान हो गए। भला कुएं भी कहीं लाए-ले जाए जा सकते हैं।
जिस गांव में तेनालीराम भेष बदलकर रहता था, वहां भी यह मुनादी सुनाई दी। गांव का मुखिया परेशान था। तेनालीराम समझ गए कि उसे खोजने के लिए ही महाराज ने यह चाल चली हैं। तेनालीराम ने मुखिया को बुलाकर कहा “मुखियाजी, आप चिंता न करें, आपने मुझे गांव में आश्रय दिया हैं, इसलिए आपके उपकार का बदला में चुकाऊंगा। मैं एक तरकीब बताता हूं आप आसपास के मुखियाओं को इकट्ठा करके राजधानी की ओर प्रस्थान करें”। सलाह के अनुसार सभी राजधानीकी ओर चल दिए। तेनालीराम भी उनके साथ थे।

राजधानी के बाहर पहुंचकर वे एक जगह पर रुक गए। एक आदमी को मुखिया का संदेश देकर राजदरबार में भेजा। वह आदमी दरबार में पहुंचा और तेनालीराम की राय के अनुसार बोला “महाराज! हमारे गांव के कुएं विवाह में शामिल होने के लिए राजधानी के बाहर डेरा डाले हैं। आप मेहरबानी करके राजकीय कुएं को उनकी अगवानी के लिए भेजें, ताकि हमारे गांव के कुएं ससम्मान दरबार के सामने हाजिर हो सकें।

राजा को उनकी बात समझते देर नहीं लगी कि ये तेनालीराम की तरकीब हैं। राजा ने पूछा सच-सच बताओ कि तुम्हें यहाक्ल किसने दी हैं? राजन! थोडे दिन पहले हमारे गांव में एक परदेशी आकर रुका था। उसी ने हमें यह तरकीब बताई हैं आगंतुक ने जवाब दिया। सारी बात सुनकर राजा स्वयं रथ पर बैठकर राजधानी से बाहर आए और ससम्मान तेनालीराम को दरबार में वापस लाए। गांव वालो को भी पुरस्कार देकर विदा किया।।।
साभार- Anjani Lal Arora Mathaniya

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प्रणाम किया तो बचे पांडव-

महाभारत का युद्ध चल रहा था। एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर “भीष्म पितामह” घोषणा कर देते हैं कि -“मैं कल पांडवों का वध कर दूँगा” उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई। भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए|

तब श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा अभी मेरे साथ चलो। श्रीकृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुँच गए -शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रौपदी से कहा कि – अन्दर जाकर पितामह को प्रणाम करो। द्रौपदी ने अन्दर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने – “अखंड सौभाग्यवती भव” का आशीर्वाद दे दिया। फिर उन्होंने द्रोपदी से पूछा कि “वत्स, तुम इतनी रात में अकेली यहाँ कैसे आई हो, क्या तुमको श्री कृष्ण यहाँ लेकर आये है” ?

तब द्रोपदी ने कहा कि -“हां और वे कक्ष के बाहर खड़े हैं” तब भीष्म भी कक्ष के बाहर आ गए और दोनों ने एक दूसरे से प्रणाम किया। भीष्म ने कहा – “मेरे एक वचन को मेरे ही दूसरे वचन से काट देने का काम श्री कृष्ण ही कर सकते है”। शिविर से वापस लौटते समय श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि -“तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीवनदान मिल गया है।

अगर तुम प्रतिदिन भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य, आदि को प्रणाम करती होती और दुर्योधन- दुःशासन, आदि की पत्नियां भी पांडवों को प्रणाम करती होंती, तो शायद इस युद्ध की नौबत ही न आती ” –
……तात्पर्य्……वर्तमान में हमारे घरों में जो इतनी समस्याए हैं उनका भी मूल कारण यही है कि -जाने-अनजाने अक्सर घर के बड़ों की उपेक्षा हो जाती है। यदि घर के बच्चे और बहुएँ प्रतिदिन घर के सभी बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लें तो, शायद किसी भी घर में कभी कोई क्लेश न हो। बड़ों के दिए आशीर्वाद कवच की तरह काम करते हैं, उनको कोई “अस्त्र-शस्त्र” नहीं भेद सकता।

प्रणाम प्रेम है।
प्रणाम अनुशासन है।
प्रणाम शीतलता है।
प्रणाम आदर सिखाता है।
प्रणाम से सुविचार आते है।
प्रणाम झुकना सिखाता है।
प्रणाम क्रोध मिटाता है।
प्रणाम आँसू धो देता है।
प्रणाम अहंकार मिटाता है।
प्रणाम हमारी संस्कृति है।

बचपन से समझाएं
बच्चों को समझाएं कि जो अपनत्व प्रणाम में है वह हाथ मिलाने के आधुनिक व्यवहार में नहीं होता। पाश्चात्य संस्कृति का दुरूपयोग करने के नकरात्मक प्रभाव आते हैं। स्वास्थ्य के लिए भी खतरा साबित हो सकते हैं। हेल्लो, हाय, बाय व हाथ मिलाने से ऊर्जा प्राप्त नहीं होती। हमारी आज की युवा पीढ़ी अपनी स्वस्थ परम्परा को ठुकराकर अपने लिए उन्नति के द्वार स्वय बंद कर रहे है। हाथ मिलाने से बचें, दोनों हाथ जोड़ कर या पाँव पर झुक कर अभिवादन की आदत डालें। हाथ मिलाने से जहाँ तक हो सके बचें, क्यूंकि यह स्वास्थ्य के मार्ग में और अाध्यात्मिक उत्थान के मार्ग में अवरोधक है।
अच्छे संस्कारों में सर्वप्रथम बच्चों को बड़ों का सम्मान करना सिखाईये। बच्चों को प्रणाम का महत्व समझाईये। बच्चों के जीवन की सम्पन्नता प्रणाम में ही संचित होती है। जो बच्चे नित्य बड़ों को, वृद्ध जनों को व गुरुजनों को प्रणाम करते हैं और उनकी सेवा करते हैं, उसकी आयु, विद्या, यश और बल सभी साथ साथ बढ़ते हैं। हमारे कर्म और व्यवहार ऐसे होने चाहिए कि बड़ों के ह्रदय से हमारे लिए आशीर्वाद निकले। हमारे व्यवहार से किसी के ह्रदय को ठेस न पहुंचे। प्रणाम करने से हमारे भावनात्मक और वैचारिक मनोभावों पर प्रभाव पड़ता है, जिससे सकारात्मकता बढ़ती है।

आचार्य विकाश शर्मा

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महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद
श्रीकृष्ण द्वारका जा रहे थे। तभी मार्ग में उनकी भेंट उत्तंग मुनि से हुई। युद्ध की घटना से अनजान उत्तंग मुनि ने जब श्रीकृष्ण से हस्तिनापुर की कुशलता पूछी, तो उन्होंने उन्हें कौरवों के नाश का समाचार सुनाया। यह सुनकर उत्तंग मुनि ने क्रोध में कहा, “वासुदेव! यदि आप चाहते, तो यह विनाश रुक सकता था। मैं आपको अभी शाप दूंगा।” श्रीकृष्ण बोले, “मुनिवर! पहले आप शांतिपूर्वक मेरा पक्ष सुन लें, फिर चाहें तो शाप दे दें।” यह कहकर श्रीकृष्ण ने उत्तंग मुनि को अपना विराट रूप दिखाया और धर्म की रक्षा के लिए कौरवों के नाश की आवश्यकता बताई। तत्पश्चात श्रीकृष्ण ने उनसे वर मांगने को कहा। मुनि बोले, “जब भी मुझे प्यास लगे, जल तत्काल मिल जाए।” श्रीकृष्ण वर देकर चले गए। एक दिन वन में उत्तंग मुनि को बड़ी प्यास लगी। तभी वहां मैले-कुचैले वस्त्रों में एक चांडाल दिखाई दिया। वह हाथ में धनुष और पानी की मशक लिए हुए था। वह मुनि को देखकर बोला, “लगता है, आप प्यासे हैं। लीजिए, पानी पी लें।” यह कहकर उसने मशक का मुंह आगे कर दिया। लेकिन घृणा के कारण मुनि ने जल नहीं पिया। उन्हें
श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए वर के इस स्वरूप पर भी क्रोध आया। तभी वह चांडाल हंसते हुए अंतर्धान हो गया। उत्तंग मुनि को एहसास हुआ कि उनकी परीक्षा ली गई है। तभी वहां श्रीकृष्ण प्रकट हो गए। उत्तंग मुनि ने उनसे कहा, “प्रभु! आपने मेरी परीक्षा ली। मैं ब्राह्मण होकर चांडाल की मशक का जल कैसे पीता?”
श्रीकृष्ण ने कहा, “आपने जल की इच्छा की, तो मैंने इंद्र से आपको अमृत पिलाने को कहा। मैं निश्चित था कि आप जैसा ज्ञानी ब्राह्मण एवं चांडाल के भेद से ऊपर उठ चुका होगा और आप अमृत प्राप्त कर लेंगे। परंतु आपने मुझे इंद्र के सामने लज्जित किया।” यह कहकर श्रीकृष्ण अंतर्धान हो गए।
यथार्थ ज्ञान होने पर जाति और वर्ण का कोई भेद नहीं रह जाता। समत्व के ज्ञान से पूर्व व्यक्ति प्राप्त हो रहे अमृत को भी नहीं ग्रहण कर पाता।

K L Kakkad

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जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पत्नी के साथ जो किया वो इतना भयावह था की जान कर आप नेहरु से नफरत करने लगेंगे..
टीवी चैनेल पर कांग्रेस पार्टी के नेताओ के द्वारा अक्सर ये आरोप लगते हुए सुना जाता है की प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया .
लेकिन आज आपको कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े नेता नेहरु का वो सच्चाई बतायेंगे जिसे जान कर आप इस नेता से नफरत करने लगेंगे.. जानिए नेहरु ने अपनी पत्नी कमला के साथ क्या किया
जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पत्नी के साथ जो किया वो इतना भयावह था की जान कर आप नेहरु से नफरत करने लगेंगे.
जवाहर लाल नेहरु की पत्नी कमला नेहरु को टीबी हो गया था .. उस जमाने में टीबी का दहशत ठीक ऐसा ही था जैसा आज एड्स का है .. क्योकि तब टीबी का इलाज नही था और इन्सान तिल तिल तडप तडप कर पूरी तरह गलकर हड्डी का ढांचा बनकर मरता था … और कोई भी टीबी मरीज में पास भी नही जाता था क्योकि टीबी सांस से फैलती थी … लोग पहाड़ी इलाके में बने टीबी सेनिटोरियम में भर्ती कर देते थे ..
नेहरु में अपनी पत्नी को युगोस्लाविया [आज चेक रिपब्लिक] के प्राग शहर में दुसरे इन्सान के साथ सेनिटोरियम में भर्ती कर दिया ..
कमला नेहरु पुरे दस सालो तक अकेले टीबी सेनिटोरियम में पल पल मौत का इंतजार करती रही.. लेकिन नेहरु दिल्ली में एडविना बेंटन के साथ इश्क करते थे.. सबसे शर्मनाक बात तो ये है की इस दौरान नेहरु कई बार ब्रिटेन गये लेकिन एक बार भी वो प्राग जाकर अपनी धर्मपत्नी का हालचाल नही लिया .
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को जब पता चला तब वो प्राग गये .. और डाक्टरों से और अच्छे इलाज के बारे में बातचीत की .. प्राग के डाक्टरों ने बोला की स्विट्जरलैंड के बुसान शहर में एक आधुनिक टीबी होस्पिटल है जहाँ इनका अच्छा इलाज हो सकता है..
तुरंत ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने उस जमाने में 70 हजार रूपये इकट्ठे किये और उन्हें विमान से स्विटजरलैंड के बुसान शहर में होस्पिटल में भर्ती किये ..
लेकिन कमला नेहरु असल में मन से बेहद टूट चुकी थी.. उन्हें इस बात का दुःख था की उनका पति उनके पास पिछले दस सालो से हाल चाल लेने तक नही आया और गैर लोग उनकी देखभाल कर रहे है..दो महीनों तक बुसान में भर्ती रहने के बाद 28 February 1936 को बुसान में ही कमला नेहरु की मौत हो गयी..
उनके मौत के दस दिन पहले ही नेताजी सुभाषचन्द्र ने नेहरु को तार भेजकर तुरंत बुसान आने को कहा था .. लेकिन नेहरु नही आया..फिर नेहरु को उनकी पत्नी के मौत का खबर भेजा गया .. फिर भी नेहरु अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार में भी नही आया ..
अंत में स्विटजरलैंड के बुसान शहर में ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने नेहरु की पत्नी कमला नेहरु का अंतिम संस्कार करवाया. जिस व्यक्ति ने अपनी पत्नी के साथ ऐसा व्यवहार किया उसे हम चाचा नेहरू कहते हैं । 😢😢😢😢😢

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  • ( શાંત મન )-

એક વાર એક અમીર માણસની ઘડીયાળ ઘાસથી ભરેલા વાડામાં ખોવાઈ ગઈ.

જે બહુ કિંમતી ઘડીયાળ હતી,
એટલે –
તે માણસે તેની ઘણી શોધ કરી…
પણ,
તે ઘડીયાળ ન મળી !

તેના ઘરની બહાર થોડા છોકરાઓ રમી રહ્યા હતા…
અને,
તેને બીજા એક કામ માટે બહાર જવાનું હતું…

તેથી,
તે માણસે વિચાર કર્યો કે –
આ છોકરાઓથી ઘડીયાળ શોધવાનું કહું…

તેણે છોકરાઓને કહ્યું કે –
જે પણ છોકરો ઘડીયાળ શોધી દેશે…
તેને તે સરસ મજાનું ઇનામ દેશે.

આ સાંભળીને –
છોકરાઓ ઈનામની લાલચમાં વાડાની અંદર દોડી ગયા…
અને,
અહીં-તહીં ઘડીયાળ શોધવા લાગ્યા…

પરંતુ,
કોઈ પણ છોકરાને ઘડીયાળ મળી નહી !

ત્યારે,
એક છોકરાએ તે અમીર માણસની પાસે આવીને કહ્યું –
તે ઘડીયાળ શોધીને લાવી શકે તેમ છે…
પણ,
બધા છોકરાઓને વાડાની બહાર જવું પડશે !

અમીર માણસે તેની વાત માની લીધી.

તે અમીર માણસ અને બાકીના છોકરાઓ બહાર ચાલ્યા ગયા…

થોડી વાર બાદ –
તે છોકરો બહાર આવ્યો અને તેના હાથમાં તે કિંમતી ઘડીયાળ હતી.

તે અમીર માણસ પોતાની ઘડીયાળ જોઈને આશ્ચર્યચકિત થઈ ગયો !

તેણે છોકરાથી પૂછ્યું –
“તેં ઘડીયાળ કેવી રીતે શોધી !?

જ્યારે બાકી છોકરાઓ અને હું પોતે પણ આ કામમાં નાકામ રહ્યો હતો !??”

છોકરાએ જવાબ આપ્યો –
“મેં કાંઈ કર્યું નથી…

બસ ‘શાંત’ મનથી જમીન પર બેસી ગયો…
અને,
ઘડીયાળનો ‘અવાજ’ સાંભળવાની કોશીશ કરવા લાગ્યો…

કેમ કે –
‘વાડા’ માં શાંતિ હતી…

એટલે –
મેં તેનો અવાજ સાંભળી લીધો…
અને,
તે દિશામાં જોયું !

સારાંશ –
એક ‘શાંત’ મગજ ‘સારો’ વિચાર કરી શકે છે,
એક ‘થાકેલા’ મગજની તુલનામાં !

માટે –
દિવસમાં થોડા સમયના માટે…
આંખો બંધ કરીને,
શાંતિથી બેસજો !

પોતાના મસ્તકને શાંત થવા દેજો…
પછી,
જૂઓ !
તે આપની જિંદગી કેવી રીતથી ‘વ્યવસ્થિત’ કરી દે છે !!

કેમકે –
દરેક આત્મા –
હમેશા પોતાની જાતને ઠીક કરવાનું જાણે છે…
બસ,
મનને શાંત કરવુ જ ‘પડકાર’ છે.

આ પડકાર –
થોડું અઘરું જરૂર છે…
પણ,
‘અસંભવ’ જરાય નથી !!

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पहली बात जो रावण ने लक्ष्मण को बताई वह ये
थी कि शुभ कार्य
जितनी जल्दी हो कर डालना और अशुभ
को जितना टाल सकते हो टाल देना चाहिए
यानी शुभस्य शीघ्रम्। मैंने
श्रीराम को पहचान नहीं सका और
उनकी शरण में आने में देरी कर
दी, इसी कारण मेरी यह
हालत हुई।
दूसरी बात यह कि अपने प्रतिद्वंद्वी,
अपने शत्रु को कभी अपने से
छोटा नहीं समझना चाहिए, मैं यह भूल कर गया।
मैंने जिन्हें साधारण वानर और भालू समझा उन्होंने
मेरी पूरी सेना को नष्ट कर दिया। मैंने जब
ब्रह्माजी से अमरता का वरदान मांगा था तब मनुष्य
और वानर के अतिरिक्त कोई मेरा वध न कर सके
ऐसा कहा था क्योंकि मैं मनुष्य और वानर को तुच्छ समझता था।
यही मेरी गलती हुई।
रावण ने लक्ष्मण को तीसरी और अंतिम
बात ये बताई कि अपने जीवन का कोई राज हो तो उसे
किसी को भी नहीं बताना चाहिए।
यहां भी मैं चूक गया क्योंकि विभीषण
मेरी मृत्यु का राज जानता था।

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दिपावली पर करेँ ये अदभुत टोटके – धन प्राप्ति के
लिये -महालक्ष्मी की पूजा मेँ एक
छः मुखी रुद्राक्ष
चांदी की कटोरी मेँ रखे ।
पूजन और मां के चरणोँ मेँ अर्पित करने के उपरान्त आने
वाली द्धितिया तिथि को उसे श्रद्धा से गले मेँ धारण करे
। चमत्कार आप स्वंय अनुभव करेँ किस प्रकार धनागमन शुरु
हो जायेगा । भाग्यवृद्धि के लिए- धनतेरस
को चांदी की दो ठोस गोलियाँ कम से कम 6
ग्राम की बनवाकर
दीपावली पर माता के चरणो मे रख कर
पूजा अर्चना करेँ और फिर सदैव अपने पास रखेँ धीरे
धीरे सभी कार्य सफल होते जायेँगेँ । 3-
अगर आप धन संचय नहिँ कर पा रहे हैँ
तो दीपावली पर रेशमी लाल
रुमाल मेँ गोमती चक्र 7 ,लौँग 11 और थोड़ा कपूर एक
साथ बांधकर अपने हाथ से तिजोरी मे रखे । धन मेँ
निरन्तर बढ़ोत्तरी होगी 4-
दीपावली की शाम
को काली उड़द के दो पापड़ पर दही और
सिन्दुर लगाकर रख पीपल के नीचे रख
आयेँ पीछे ना देखे सीधे घर आ जाये ।
धनागमन मेँ आ रहीँ बाधाऐँ दूर
होँगी 5-
दीपावली की रात्री मेँ
साबुत फिटकरी के एक टूकड़े को दुकान प्रतिष्ठान मे
घूमाने के बाद चौराहे पर जाकर उसे उत्तर दिशा मेँ फेँक देँ व्यापार
व्यवसाय मेँ तेजी से लाभ होना आरम्भ होगा

विक्रम प्रकाश रेसोंय

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जय श्री राधे कृष्ण बाल गोपाल🌷🙏
शदर पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं
🌷🌹🌷🌹🌷🌹🌷🌹🌷🌹🌹🌷
निष्काम प्रेम………………

अपने इष्ट मे एकनिष्टता का एक बहुत ही सुंदर दृष्टांत एक संत जी ने दिया है।

एक बुढ़िया माई को उनके गुरु जी ने बाल-गोपाल की एक मुर्ति देकर कहा:- “माई ये तेरा बालक है।

इसका अपने बच्चे के समान प्यार से लालन-पालन करती रहना।”
बुढ़िया माई बड़े लाड़-प्यार से ठाकुर जी का लालन-पालन करने लगी।

एक दिन गाँव के बच्चों ने देखा माई मुर्ति को अपने बच्चे की तरह लाड़ कर रही है।

बच्चो ने माई से हँसी की और कहा :- “अरी मैय्या सुन यहाँ एक भेड़िया आ गया है, जो छोटे बच्चो को उठाकर ले जाता है।

मैय्या अपने लाल का अच्छे से ध्यान रखना कही भेड़िया इसे उठाकर ना ले जाये…..!”

बुढ़िया माई ने अपने बाल-गोपाल को उसी समय कुटिया मे विराजमान किया और स्वयं लाठी (छड़ी) लेकर दरवाजे पर बैठ गयी।

अपने लाल को भेड़िये से बचाने के लिये बुढ़िया माई भुखी-प्यासी दरवाजे पर पहरा देती रही।

पहरा देते-देते एक दिन बीता, फिर दुसरा, तीसरा, चौथा और पाँचवा दिन बीत गया।
बुढ़िया माई पाँच दिन और पाँच रात लगातार बगैर पलके झपकाये भेड़िये से अपने बाल-गोपाल की रक्षा के लिये पहरा देती रही।

उस भोली-भाली मैय्या का यह भाव देखकर ठाकुर जी का ह्रदय प्रेम से भर गया।
अब ठाकुर जी को मैय्या के प्रेम का प्रत्यक्ष रुप से आस्वादन करने का लोभ हो आया।

भगवान बहुत ही सुंदर रुप धारण कर, वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर माई के पास आये।

ठाकुर जी के पाँव की आहट पाकर मैय्या ड़र गई कि “कही दुष्ट भेड़िया तो नहीं आ गया मेरे लाल को उठाने।”
मैय्या ने लाठी उठाई और भेड़िये को भगाने के लिये उठ खड़ी हूई।

तब श्यामसुंदर ने कहा :- “मैय्या मैं हूँ, मैं तेरा वही बालक हूँ जिसकी तुम रक्षा करती हो।”
माई ने कहा :-“क्या?

चल हट तेरे जैसे बहुत देखे है, तेरे जैसे सैकड़ो अपने लाल पर न्यौछावर कर दूँ, अब ऐसे मत कहियो।
चल भाग जा यहा से…!”

( बुढ़िया माई ठाकुर जी को भाग जाने के लिये कहती है क्योकि माई को ड़र था की कही ये बना-ठना सेठ ही उसके लाल को ना उठा ले जाये। )

ठाकुर जी मैय्या के इस भाव और एकनिष्टा को देखकर बहुत ज्यादा प्रसन्न हो गये।
ठाकुर जी मैय्या से बोले :- “अरी मेरी भोली मैय्या, मैं त्रिलोकीनाथ भगवान हूँ।

मुझसे जो चाहे वर मांग ले, मैं तेरी भक्ती से बहुत प्रसन्न हूँ।”

बुढ़िया माई ने कहा :- “अच्छा आप भगवान हो, मैं आपको सौ-सौ प्रणाम् करती हूँ।

कृपाकर मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे प्राण प्यारे लाल को भेड़िया न ले जाय।”

अब ठाकुर जी और ज्यादा प्रसन्न होते हुए बोले:- “तो चल मैय्या मैं तेरे लाल को और तुझे अपने निज धाम लिए चलता हूँ , वहाँ भेड़िये का कोई भय नहीं है।”

इस तरह प्रभु बुढ़िया माई को अपने निज धाम ले गये।
जय हो भक्त और भगवान की…!!

ठाकुर जी को पाने का सबसे सरल मार्ग है ठाकुर जी को प्रेम करो निष्काम प्रेम जैसे बुढ़िया माई ने किया।

आशा है आपको यह प्रसंग पसंद आयेगा और ठाकुर जी के प्रति आपके भाव दृढ़ होंगे।

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यह हनुमान मंत्र रखता है आजीवन सुरक्षित :

जीवन में शक्ति और
सिद्धि की कामना को पूरी करने के लिए
श्रीहनुमान उपासना अचूक
मानी जाती है। दरअसल,
श्रीहनुमान व उनका चरित्र जीवन में
संकल्प, बल, ऊर्जा, बुद्धि, चरित्र शुद्धि, समर्पण, शौर्य,
पराक्रम, दृढ़ता के साथ जीवन में हर
चुनौतियों या कठिनाइयों का सामना करने व उनसे पार पाने
की अद्भुत प्रेरणा है।
श्री हनुमान
चिरंजीवी भी माने जाते हैं।
ऐसी अद्भुत शक्तियों व गुणों के
स्वामी होने से ही वे जाग्रत देवता के
रूप में पूजनीय हैं। इसलिए
किसी भी वक्त हनुमान
की भक्ति संकटमोचन के साथ ही तन,
मन व धन से संपन्न बनाने
वाली मानी गई है। यहां बताए जा रहे
विशेष हनुमान मंत्र का स्मरण संकटमुक्त रहने
की कामनासिद्धि के साथ मंगलकारी साबित
होगा।
* स्नान के बाद श्री हनुमान
की पंचोपचार पूजा यानी सिंदूर, गंध,
अक्षत, फूल, नैवेद्य चढ़ाकर करें।
* गुग्गल धूप व दीप जलाकर नीचे
लिखा हनुमान मंत्र लाल आसन पर बैठ साल और
जीवन को सफल व पीड़ामुक्त बनाने
की इच्छा से बोलें और अंत में
श्री हनुमान
की आरती करें।
MANTRA:
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय
विश्वरूपाय अमित विक्रमाय
प्रकटपराक्रमाय महाबलाय
सूर्य कोटिसमप्रभाय रामदूताय स्वाहा।।

विक्रम प्रकाश रैसिनी

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जिन महर्षिवृन्द को छोटी जाति का बतलाकर दलित-राजनीति की जा रही है, वह महर्षि वाल्मीकि, प्रचेता (वरुण) के दसवें पुत्र अर्थात् ब्रह्मा के पौत्र थे। भगवती सीता को श्रीरामदरबार में लाकर श्रीराम को करीब-करीब फटकारते हुए महर्षि वाल्मीकि ने कहा था— ‘प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन।’ (वाल्मीकीयरामायण, उत्तरकाण्ड, 96.19, गीताप्रेस-संस्करण)। ‘बहुवर्ष सहस्राणि तपष्चर्या मया कृता।।’ (मैंने हज़ारों वर्ष तप किया है)। शिवपुराण में कहा गया है कि प्राचेतस वाल्मीकि ब्रह्मा के पुत्र ने श्रीमद्रामायण की रचना की— ‘पुरा स्वायम्भुवो ह्यासीत् प्राचेतस महाद्युतिः। ब्रह्मात्मजस्तु ब्रह्मर्षि तेन रामायणं कृतम्।।’

महर्षि वाल्मीकि भी व्यास थे, 24वें व्यास। विष्णुपुराण (3.3.18) में 28 चतुर्युगों के वेदव्यासों की सूची दी हुई है, उससे प्रमाणित होता है कि महर्षि वाल्मीकि ने अपने समय में, परंपरा से चले आ रहे वेद का संपादन किया था— ऋक्षोऽभूद्भार्गववस्तस्माद्वाल्मीकिर्योऽभिधीयते। वही वेद, परंपरा से 25वें द्वापर में शक्ति (अर्वाक्) को, 26वें द्वापर में पराशर ऋषि को, 27वें द्वापर में जातुकर्ण को और २८वें द्वापर में कृष्णद्वैपायन को प्राप्त हुआ था। इसलिए सनातन हिन्दू संस्कृति के सनातनत्व के लिए महर्षि वाल्मीकि का उतना ही योगदान है जितना महर्षि कृष्णद्वैपायन का।

महर्षि वाल्मीकि ने 24,000 श्लाकों में ‘रामायण’ की रचना की और समूचे विश्व को आदर्श पुरुष मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के उदात्त जीवनचरित से परिचित करवाया। इतना ही नहीं, महर्षि वाल्मीकि ने ‘आनन्दरामायण’, ‘अद्भुतरामायण’ और ‘योगवासिष्ठ’ (श्रीराम और महर्षि वसिष्ठ का दार्शनिक वार्तालाप) नामक ग्रंथों की भी रचना की थी।

गुंजन अग्रवाल