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भाग्य को शीघ्र जागृत करता हैं- कपूर !

प्राचीन काल से चली आ रही है परंपरा
प्राचीन काल से ही हमारे देश में देशी घी
के दीपक व कर्पूर से देवी-देवताओं की आरती करने की परंपरा चली आ रही है।

भूल चूक हेतु भगवान से क्षमा याचना आरती के माध्यम से किये जाने का
विधान हैं।

आरती के होने के बाद ही हमारी पूजा
पूर्ण मानी जाती हैं।

ऐसा माना जाता हैं की आरती के पश्चात ही हम पूजन के द्वारा उत्पन्न फल पाने के योग्य होते हैं।

कर्पूर का ज्योतिष;-

कर्पूर अति सुगंधित पदार्थ होता है।

इसके दहन से वातावरण सुगंधित हो
जाता है।

आरती में प्रयोग होने वाले कपूर को
कई तरीके से प्रयोग में लाया जाता हैं।

कर्पूर का ज्योतिष,पूजन विधान,मंत्र,
तंत्र तथा औषधी के रूप में काफी
प्रयोग बताये गये हैं।

इसके अतिरिक्त वैज्ञानिको ने भी कर्पूर
के कई लाभ बताये हैं ।

ज्योतिष शास्त्र में कर्पूर के लाभ !

1 – दरिद्र्ता नाश एवम स्थिर लक्ष्मी के लिये – जिनके घर में धन की समस्या बनी रहती हैं।
वे कर्पूर के द्वारा नित्य सुबह शाम भगवान आरती करें।

2 – नजर दोष व वास्तु दोष नाशक- आरती होने के पश्चात घर के प्रत्येक
कमरे के कोने में आरती दर्शन करायें।

3 – देवदोष व भूत प्रेत दोष नाशक – अखंड घी का दीपक जलाये तथा कर्पूर
से भगवान आरती करें।

4 – भाग्य हीनता नाशक – कर्पूर को
घी में डुबाये उसके बाद आरती करें।

5 – कलह कलेश नाशक – कर्पूर के
साथ दो लांग जलायें।

6 – रोग व कर्ज नाशक – अशोक के
वृक्ष के नीचे कर्पूर बाती जलायें।

औषधि के रूप में उपयोग :-

1- बालो के झडने व गंजे पन के लिये कपूर का प्रयोग आति लाभकारी होता हैं।

2- कर्पूर का तेल त्वचा में रक्त संचार को सहज बनाता है। दमा खांसी में भी इसका प्रयोग किया जाता हैं।

3- पपीते के गूदे को दही और कपूर में मिलाकर लेप तैयार करें और इसे रोज चेहरे पर लगाने से चेहरे से झुर्रियां हट जाती हैं।

मिलता है दर्द से आराम;-

4- सूजन,मुहांसे और तैलीयत्वचा के उपचार में इसका उपयोग किया जाता है।

5- कफ की वजह से छाती में होने वाली जकड़न में कर्पूर का तेल मलने से राहत मिलती है।

6- चोट पर कर्पूर का सेकन करने से दर्द
से अराम तथा सूजन नही आती।

7- कर्पूर का प्रयोग कामोतेजक दवाईयो के हेतु भी प्रयोग किया जाता हैं।

इसकी सुगंध से जीवाणु,विषाणु आदि बीमारी फैलाने वाले जीव नष्ट हो जाते
हैं जिससे वातावरण शुद्ध हो जाता है
तथा बीमारी होने का भय भी नहीं रहता।

अत: कर्पूर की सुगंध के द्वारा आप भी अपने घर को महकाइये।
#साभार_संकलित;

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,
जयति पुण्य भूमि भारत,

सदा सर्वदा सुमंगल,
हर हर महादेव,
जय भवानी,
जय श्री राम,

विजय कृष्णा पांडेय

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भारत को आखिर बॉलीवुड ने दिया क्या है ?
निवेदन एक बार जरूर पढे
👇👇👇👇👇👇👇👇👇
बॉलीवुड ने भारत को इतना सब कुछ दिया है, तभी तो आज देश यहाँ है …

  1. बलात्कार गैंग रेप करने के तरीके।
  2. विवाह किये बिना लड़का लड़की का शारीरिक सम्बन्ध बनाना।
  3. विवाह के दौरान लड़की को मंडप से भगाना
  4. चोरी डकैती करने के तरीके।
  5. भारतीय संस्कारो का उपहास उडाना।
  6. लड़कियो को छोटे कपडे पहने की सीख देना….
    जिसे फैशन का नाम देना।
  7. दारू सिगरेट चरस गांजा कैसे पिया और लाया जाये।
  8. गुंडागर्दी कर के हफ्ता वसूली करना।
  9. भगवान का मजाक बनाना और अपमानित करना।
  10. पूजा पाठ यज्ञ करना पाखण्ड है व नमाज पढ़ना ईश्वर की सच्ची पूजा है।
  11. भारतीयों को अंग्रेज बनाना।
  12. भारतीय संस्कृति को मूर्खता पूर्ण बताना और पश्चिमी संस्कृति को श्रेष्ठ बताना।
  13. माँ बाप को वृध्दाश्रम छोड़ के आना।
  14. गाय पालन को मज़ाक बनाना और कुत्तों को उनसे श्रेष्ठ बताना और पालना सिखाना।
  15. रोटी हरी सब्ज़ी खाना गलत बल्कि रेस्टोरेंट में पिज़्ज़ा बर्गर कोल्ड ड्रिंक और नॉन वेज खाना श्रेष्ठ है।
  16. पंडितों को जोकर के रूप में दिखाना, चोटी रखना या यज्ञोपवीत पहनना मूर्खता है मगर बालो के अजीबो गरीब स्टाइल (गजनी) रखना व क्रॉस पहनना श्रेष्ठ है उससे आप सभ्य लगते है।
  17. शुद्ध हिन्दी या संस्कृत बोलना हास्य वाली बात है और उर्दू या अंग्रेजी बोलना सभ्य पढ़ा-लिखा और अमीरी वाली बात…
    हमारे देश की युवा पीढ़ी बॉलीवुड को और उसके अभिनेता और अभिनेत्रियों का अपना आदर्श मानती है…..
    अगर यही बॉलीवुड देश की संस्कृति सभ्यता दिखाए ..
    तो सत्य मानिये हमारी युवा पीढ़ी अपने रास्ते से कभी नही भटकेगी…
    समझिये ..जानिए और आगे बढिए…

ये संदेश उन हिन्दू छोकरों के लिए है
जो फिल्म देखने के बाद
गले में क्रोस मुल्ले जैसी छोटी सी दाड़ी रख कर
खुद को मॉडर्न समझते हैं
हिन्दू नौजवानौं के रगो में धीमा जहर भरा जा रहा है
फिल्म जेहाद


सलीम – जावेद की जोड़ी की लिखी हुई फिल्मो को देखे, तो उसमे आपको अक्सर बहुत ही चालाकी से हिन्दू धर्म का मजाक तथा मुस्लिम / इसाई / साईं बाबा को महान दिखाया जाता मिलेगा. इनकी लगभग हर फिल्म में एक महान मुस्लिम चरित्र अवश्य होता है और हिन्दू मंदिर का मजाक तथा संत के रूप में पाखंडी ठग देखने को मिलते है.

फिल्म “शोले” में धर्मेन्द्र भगवान् शिव की आड़ लेकर “हेमामालिनी” को प्रेमजाल में फंसाना चाहता है जो यह साबित करता है कि – मंदिर में लोग लडकियां छेड़ने जाते है. इसी फिल्म में ए. के. हंगल इतना पक्का नमाजी है कि – बेटे की लाश को छोड़कर, यह कहकर नमाज पढने चल देता है.कि- उसे और बेटे क्यों नहीं दिए कुर्बान होने के लिए.

“दीवार” का अमिताभ बच्चन नास्तिक है और वो भगवान् का प्रसाद तक नहीं खाना चाहता है, लेकिन 786 लिखे हुए बिल्ले को हमेशा अपनी जेब में रखता है और वो बिल्ला भी बार बार अमिताभ बच्चन की जान बचाता है. “जंजीर” में भी अमिताभ नास्तिक है और जया भगवान से नाराज होकर गाना गाती है लेकिन शेरखान एक सच्चा इंसान है.

फिल्म ‘शान” में अमिताभ बच्चन और शशिकपूर साधू के वेश में जनता को ठगते है लेकिन इसी फिल्म में “अब्दुल” जैसा सच्चा इंसान है जो सच्चाई के लिए जान दे देता है. फिल्म “क्रान्ति” में माता का भजन करने वाला राजा (प्रदीप कुमार) गद्दार है और करीमखान (शत्रुघ्न सिन्हा) एक महान देशभक्त, जो देश के लिए अपनी जान दे देता है.

अमर-अकबर-अन्थोनी में तीनो बच्चो का बाप किशनलाल एक खूनी स्मग्लर है लेकिन उनके बच्चों अकबर और अन्थोनी को पालने वाले मुस्लिम और ईसाई महान इंसान है. साईं बाबा का महिमामंडन भी इसी फिल्म के बाद शुरू हुआ था. फिल्म “हाथ की सफाई” में चोरी – ठगी को महिमामंडित करने वाली प्रार्थना भी आपको याद ही होगी.

कुल मिलाकर आपको इनकी फिल्म में हिन्दू नास्तिक मिलेगा या धर्म का उपहास करता हुआ कोई कारनामा दिखेगा और इसके साथ साथ आपको शेरखान पठान, DSP डिसूजा, अब्दुल, पादरी, माइकल, डेबिड, आदि जैसे आदर्श चरित्र देखने को मिलेंगे. हो सकता है आपने पहले कभी इस पर ध्यान न दिया हो लेकिन अबकी बार ज़रा ध्यान से देखना.

केवल सलीम / जावेद की ही नहीं बल्कि कादर खान, कैफ़ी आजमी, महेश भट्ट, आदि की फिल्मो का भी यही हाल है. फिल्म इंडस्ट्री पर दाउद जैसों का नियंत्रण रहा है. इसमें अक्सर अपराधियों का महिमामंडन किया जाता है और पंडित को धूर्त, ठाकुर को जालिम, बनिए को सूदखोर, सरदार को मूर्ख कामेडियन, आदि ही दिखाया जाता है.

“फरहान अख्तर” की फिल्म “भाग मिल्खा भाग” में “हवन करेंगे” का आखिर क्या मतलब था ? pk में भगवान् का रोंग नंबर बताने वाले आमिर खान क्या कभी अल्ला के रोंग नंबर 786 पर भी कोई फिल्म बनायेंगे ? मेरा मानना है कि – यह सब महज इत्तेफाक नहीं है बल्कि सोची समझी साजिश है एक चाल है ।

यदि सहमत हों तो सर्वत्र फैलायें
🙏�🙏�🙏�🙏�🙏�🙏�🙏

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करवा चौथ का जश्न महत्व और किंवदंतियॉ

महिलाओं द्वारा हर साल करवा चौथ का जश्न मनाने के पीछे कई किंवदंतियॉ, पारंपरिक कथाऍ और कहानियाँ जुड़ी है। । उनमें से कुछ के नीचे उल्लेख कर रहे हैं:

एक बार, वीरवती नामक एक सुंदर राजकुमारी थी। वह अपने सात भाइयों की इकलोती प्यार बहन थी। । उसकी शादी हो गयी और अपने पहले करवा चौथ व्रत के दौरान अपने माता पिता के घर पर ही थी। उसने सुबह सूर्योदय से ही उपवास शुरू कर दिया था। उसने बहुत सफलतापूर्वक उसका पूरा दिन बिताया हालांकि शाम को उसने बेसब्री से चंद्रोदय के लिए इंतज़ार करना शुरू कर दिया क्योंकि वह गंभीर रूप से भूख और प्यास पीड़ित थी। क्योंकि यह उसका पहला करवा चौथ व्रत था,उसकी यह दयनीय दशा उसके भाईयों के लिये असहनीय थी क्योंकि वे सब उससे बहुत प्यार करते थे। उन्होंने उसे समझाने का बहुत कोशिश की कि वह बिना चॉद देखे खाना खा ले हालांकि उसने मना कर दिया। तब उन्होंने पीपल के पेड़ के शीर्ष पर एक दर्पण से चाँद की झूठी समानता बनायी और अपनी बहन से कहा कि चंद्रमा निकल आया। वह बहुत मासूम थी और उसने अपने भाइयों का अनुकरण किया। गलती से उसने झूठे चाँद को देखा, अर्घ्य देकर उसने अपना व्रत तोङ लिया। उसे अपने पति की मौत का संदेश मिला। उसने जोर जोर से रोना शुरु कर दिया उसकी भाभी ने उसे बताया कि उसने झूठे चांद को देखकर व्रत तोड़ दिया जो उसके भाईयों ने उसे दिखाया था, क्योकि उसके भाई उसे भूख और प्यास की हालत को देखकर बहुत संकट में थे। उसका दिल टूट गया और वह बहुत ज्यादा रोई। जल्द ही देवी शक्ति उसके सामने प्रकट हुई और उससे पूछा कि आप क्यों रो रहे हो? । उसने पूरी प्रक्रिया के बारे में बताया और फिर देवी द्वारा निर्देश दिया गया कि उसे पूरी भक्ति के उसकी करवा चौथ का व्रत दोहराना चाहिए। जल्द ही व्रत पूरा होने के बाद, यमराज को उसके पति के जीवन वापस करने के लिए मजबूर किया गया।
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कहीं कहीं यह माना जाता है, पीपल के पेड़ के शीर्ष पर एक दर्पण रखकर एक झूठे चाँद बनाने के बजाय रानी वीरवती के भाईयों ने(अपनी बहन को झूठा चन्द्रमा दिखाने के लिये) पर्वत के पीछे बहुत बडी आग लगायी। उस झूठी चाँद चमक के बारे में (पहाड़ के पीछे एक बड़ी आग) उन्होंने अपनी बहन को बहन राजी कर लिया। उसके बाद उसने बड़ी आग के झूठे चंद्रमा को देखकर अपना उपवास तोड़ दिया और उसे संदेश मिला कि उसने अपने पति को खो दिया। वह अपने पति के घर की ओर भागी हालांकि मध्य रास्ते में, शिव-पार्वती उसे दिखाई दिये और उसे उसके भाइयों के सभी प्रवंचनाके बारे में बताया। उसे तब देवी द्वारा बहुत ही ध्यान से उसे फिर से उपवास पूरा करने के लिए निर्देश दिये गये। उसने वैसा ही किया और उसे उसका पति वापस मिल गया।
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इस त्योहार का जश्न मनाने के पीछे एक और कहानी सत्यवान और सावित्री का इतिहास है। एक बार, यम सत्यवान के पास उसकी जिंदगी हमेशा के लिए लाने के लिये पहुंच गये। सावित्री उस के बारे में पता चला, तो उसने अपने पति का जीवन देने के लिए यम से विनती की लेकिन यम से इनकार कर दिया। तो उसने अपने पति का जीवन पाने के लिये बिना कुछ खाये पीये यम का पीछा करना शुरु कर दिया। यम ने उसे अपने पति के जीवन के बदले कुछ और वरदान माँगने को कहा। वह बहुत चालाक थी उसने यमराज से कहा कि वह एक पतिव्रता स्त्री है और अपने पति के बच्चों की माँ बनना चाहती है। यम को उसके बयान ने सहमत होने के लिए मजबूर कर दिया और उसे उसके पति के साथ लंबी उम्र का आशीर्वाद दिया।
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एक बार करवा नामक एक औरत थी, जो अपने पति के लिए पूर्ण रुप से समर्पित थी जिसके कारण उसे महान आध्यात्मिक शक्ति प्रदान की गयी। एक बार, करवा का पति नदी में स्नान कर रहा था और तभी अचानक एक मगरमच्छ ने उसे पकड़ लिया। उसने मगरमच्छ बॉधने के लिए एक सूती धागे का इस्तेमाल किया और यम को मगरमच्छ को नरक में फेंकने के लिए कहा। यम ने ऐसा करने से इनकार कर दिया,हांलाकि उन्हें ऐसा करना पडा क्योंकि उन्हें पतिव्रता स्त्री करवा के शाप लगने का भय था। उसे उसके पति के साथ लम्बी आयु का वरदान दिया। उस दिन से, करवा चौथ का त्यौहार भगवान से अपने पति की लंबी उम्र पाने के लिए आस्था और विश्वास के साथ महिलाओं द्वारा मनाना शुरू किया गया।
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महाभारत की कथा इस करवा चौथ उत्सव को मनाने के पीछे एक और कहानी है। बहुत पहले, महाभारत के समय में, अर्जुन की अनुपस्थिति में जब वो (कौन वो) नीलगिरी पर तपस्या के लिए दूर गया हुआ था तब पांड़वो को द्रौपदी सहित कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था। द्रौपदी ने भगवान कृष्ण से मदद के लिये प्रार्थना कि तब उसे भगवान द्वारा देवी पार्वती और भगवान शिव की एक पूर्व कथा का स्मरण कराया गया। उसे भी उसी तरह करवा चौथ का व्रत पूर्ण करने की सलाह दी गयी। उसने सभी रस्मों और र्निदेशों का पालन करते हुये व्रत को पूर्ण किया। जैसे ही उसका व्रत पूरा हुआ, पांड़वों सभी समस्याओं से आजाद हो गये।
पहला करवा चौथ

करवा चौथ का त्यौहार नव विवाहित हिन्दू महिलाओं के लिये बहुत महत्व रखता है।यह उसकी शादी के बाद पति के घर पर बहुत बङा अवसर होता है। करवा चौथ के अवसर के कुछ दिन पहले से ही वह और उसके ससुराल वाले बहुत सारी तैयारियॉ करते है। वह सभी नयी वस्तुओं से इस प्रकार तैयार होती है जैसे उसकी उसी पति से दुबारा शादी हो रही हो। सभी ( मित्र, परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और पङोसी) एक साथ इकट्ठे होकर इसे त्यौहार की तरह मनाते है। उसे उसके विवाहित जीवन में समृद्धि के लिये अपने पति, मित्रों, परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और पङोसियों से बहुत सारे आशीर्वाद और उपहार मिलते है।

उसे अपनी पहली करवा चौथ पर अपनी सास से पहली सरगी मिलती है। पहली सरगी में साज सज्जा का सामान, करवा चौथ से एक दिन पहले का खाना और अन्य बहुत सारी वस्तुऍ ढेर सारे प्यार और खुशहाल जीवन के लिये आशीर्वाद शामिल होता है।वह आशीर्वाद पाने के लिये घऱ के बङों और रिश्तेदारों के पैर छूती है।

पहला बाया देने की भी प्रथा है। यह सूखे मेवे, उपहार, मीठी और नमकीन मठरी, मिठाई, कपङे, बर्तन आदि का समूह होता है, लङकी की माँ द्वारा लङकी की सास और परिवार के अन्य सदस्यों के लिये भेजा जाता है। यह एक बेटी के लिये बहुत महत्वपूर्ण होता है जो पहली करवा चौथ पर इसका बेसब्री से इंतजार करती है। करवा चौथ की पूजा के बाद पहला बाया सभी परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और पङोसियों के बीच बॉटा जाता है।

अंत में, नविवाहित दुल्हन को अपने पति से रात्री भोजन के समय चन्द्रोदय के समारोह के बाद बहुत ही खास उपहार मिलता है। इस दिन उनके बीच प्यार का बंधन मजबूती के साथ बढता है, पति अपनी प्रिय पत्नी के लिये बहुत गर्व महसूस करते है क्योंकि वे उनके लिये बहुत कठिन व्रत रखती है। वे अपनी पत्नी को बहुत सारा प्यार और सम्मान देते है और बहुत सारी देखभाल औऱ करवा चौथ के उपहार द्वारा उन्हें खुश रखते है। इस दिन वे अपनी पत्नी को पूर्ण आनन्द करने और स्वादिष्ट भोजन करने कराने के लिये किसी अच्छी दिलचस्प जगह लेकर जाते है जिस से कि कम से कम साल में उन्हें एक दिन के लिये घर की जिम्मेदारियों से आराम मिलें।

करवा चौथ व्रत विधि

करवा चौथ व्रत को करक चतुर्थी व्रत के नाम से भी जाना जाता है जोकि विवाहित महिलाओं के लिये बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार है विशेष रुप से पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान और यू0 पी0 में। यह कार्तिक महीने में कृष्ण पक्ष के चौथे दिन पपडता है। इस व्रत के दौरान, महिलाऍ देवी पार्वती, भगवान गणेश और चन्द्रमा की पूजा करती है। यह व्रत बिना पानी के अर्थात् “ र्निजला व्रत” है हालाकिं, कुछ औरतें (गर्भवती और अस्वस्थ महिलाऍ) इसे दूध, फल, मेवा, खोया आदि लेकर भी व्रत रखती है। इस व्रत में पूरी पूजा प्रक्रिया के दौरान भगवान के लिये दिल से समर्पण, आस्था और विश्वास की आवश्यकता है। देवी देवताओं को समर्पित करने के लिये खीर, पूआ, दहीवडा, दने की दाल की पूङी, गुङ का हलवा आदि बनाया जाता है। पूजा पूर्व की ओर चेहरा करके की जानी चाहिये, और देवा देवताओं की मूर्ति का चेहरा पश्चिम की ओऱ होना चाहिये। ऐसा माना जाता है कि इस दिन दान दक्षिणा देने से बहुत सारी शान्ति, सुरक्षा, पति के लिये लंबे जीवन, धन और घर के लिये बेटा के साथ साथ पूजा करने वाले की अन्य इच्छाओं की पूर्ति होती है। यह माना जाता है कि पूजा का उद्देश्य करक का दान और चन्द्रमा को अर्घ्य देकर ही पूरा होता है।

करवा चौथ व्रत कथा

करवा चौथ का व्रत रखने वाली महिलाओँ के लिये करवा चौथ व्रत कथा सुनने का बहुत महत्व है।बिना कथा सुने, व्रत पूरा नहीं माना जाता है। करवा चौथ व्रत की बहुत सारी कथाऍ है, जिसमें से विवाहित महिलाओं को व्रत के पूजा समारोह के दौरान एक कथा सुनना आवश्यक है । कुछ व्रत कथा और कहानियों का शीर्षक “करवा चौथ उत्सव का महत्व और किंवदंतियॉ” के तहत उल्लेख किया गया हैं।

करवा चौथ पूजा की प्रक्रिया

करवा चौथ से एक दिन पहले विवाहित महिलाऍ बहुत सारी तैयारियॉ करती है क्योंकि अगले दिन उसे बिना भोजन और पानी के पूरे दिन व्रत रखना होता है। वह बहुत सुबह सूरज निकलने से पहले ही कुछ खा लेती है और पानी पी लेती है क्योंकि उन्हें अपना पूरा दिन बिना कुछ खाये बिताना होता है। सुबह से दोपहर तक वह त्यौहार की बहुत सी गतिविधियों में व्यस्त रहती है जैसे हाथों और पैरों पर मेंहदी लगाना, खुद सजना, पूजा की थाली तैयार करना( सिन्दूर, फूल, कुमकुम, चावल के दानें, घी का दिया, धूपबत्ती और अन्य पूजा सामग्री के साथ) और अपने सगे सम्बधिंयों से मिलना आदि।

पूजा शुरु होने से पहले, निम्नलिखित पूजा की सामग्री एकत्र करने जरुरत होती है,गणेश जी, अम्बिका गौरी माँ, श्री नन्दीश्वर, माँ पार्वती, भगवान शिव जी और श्री कार्तिकेय की मूर्ति। पूजा का सामान (जैसे करवा या धातु के बर्तन, धूप, दीप, कपूर, सिंदूर, घी दीया, रोली, चंदन, काजल, फल, मेवा, मिठाई, फूल और माचिस) को इकट्ठा करने का जरुरत होती है।

शाम को नहाकर, तैयार होकर, वे अपने पङोसियों और मित्रों के यहॉं करवा चौथ की कहानी सुनने के लिये जाती है।समुदाय या समाज की विवाहित महिलाऍ एक साथ होकर जैसे बगीचे, मंदिर या किसी के घर आदि एक आम जगह पर पूजा की व्यवस्था करती है। बड़ी महिलाओं में से एक करवा चौथ की कहानी सुनाना शुरू करती है। केंद्र में एक विशेष मिट्टी का गेहूं अनाज से भरा बर्तन(भगवान गणेश के प्रतीक के रूप में माना जाता है), पानी से भरा एक धातु का बर्तन , कुछ फूल, माता पार्वती की मूर्ति के साथ में रखने के लिए, अंबिका गौर माता, मिठाई, मठ्ठी, फल और खाद्य अनाज। देवी के लिये अर्पित सभी वस्तुओं का छोटा सा भाग कथावाचक के लिये रखा जाता है।

पहले मिट्टी और गाय के गोबर का प्रयोग करके गौर माता की मूर्ति बनाने की रिवाज थी, हालाकिं इन दिनों, महिलाऍ देवी पार्वती की धातु या कागज मूर्ति रखती है। सभी महिलाएं कथा या कहानी सुनने से पहले थाली में मिट्टी का दीपक जलाती है। महिलाऍ रंगीन साड़ी पहनती हैं और खुद को उनकी शादी की लाल या गुलाबी चुनरी के साथ ढकती है। वे पूजा गीत गाती हैं और आशीर्वाद के लिए भगवान और देवी से प्रार्थना करती हैं। वे सात बार एक घेरे में एक दूसरे को अपनी पूजा थाली को स्थानांतरित करती है और गीत गाती हैं। पूजा पूरी हो जाने के बाद, हर कोई अपनी पूजा थाली के साथ अपने घर के लिए चली जाती है और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए परिवार में बड़ें, पड़ोसियों और रिश्तेदारों के पैर छूती है।

चंद्रोदय समारोह

महिलाऍ चंद्रोदय समारोह की रस्म के लिए अपनी पूजा थाली को तैयार करती है। पूजा थाली में घी का दीया, चावल के दाने, पानी भरे बर्तन, माचिस, मिठाई, पानी का एक गिलास और एक छलनी शामिल है। एक बार आकाश में चंद्रमा उगने के बाद, महिलाऍ चाँद देखने के लिए अपने घरों से बाहर आती है। सब से पहले वे चन्द्रमा को अर्घ्य देती है, चाँद की ओर चावल के दाने डालती है, छलनी के अन्दर घी का दिया रखकर चॉद को देखती है। वे अपने पतियों की समृद्धि, सुरक्षा और लंबे जीवन के लिए चंद्रमा से प्रार्थना करती हैं। चाँद की रस्म पूरी करने के बाद, वे अपने पति,सासु मॉ और परिवार अन्य बडों के पैर छू कर सदा सुहागन और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद लेती हैं। कहीं कहीं चाँद को सीधे देखने के स्थान पर उसकी परछाई को पानी में देखने का रिवाज है। पैर छूने के बाद, पति अपने हाथों से अपनी पत्नी को मिठाई खिलाकर पानी पिलाता है।

करवा चौथ के उपहार

करवा चौथ के बहुत सारे उपहार पति, माँ, सासु माँ और परिवार के अन्य सदस्यों और मित्रों द्वारा उन महिलाओं को विशेष रुप से दिये जाते है जो अपना पहला करवा चौथ का व्रत रखती है। यह माना जाता है कि करवा चौथ का व्रत बहुत कठिन है,बिना कुछ खाये पीये पूरा दिन व्यतीत करना पडता है। यह हर विवाहित महिला के लिए अपने पति के लिए उपवास रखकर उनसे कुछ खूबसूरत और महंगे तोहफे पाने जैसे आभूषण, चूड़ियाँ, साड़ी, लहंगे, फ्रॉक सूट, नए कपड़े, और मिठाई और अन्य पारंपरिक उपहार पाने का सुनहरा मौका होता है। महिलाऍ बहुत सारे प्यार और स्नेह के साथ अविस्मरणीय उपहार प्राप्त करती है जो खुशी के साथ साथ उनके पति के साथ उनके रिश्ते को मजबूती प्रदान करता है।

प्रसाद देवरानी

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विद्यालय में ‘पृथ्वी दिवस’ मनाया जा रहा था। मुख्य अतिथि के भाषण के पश्चात सभी प्रतिभागी बच्चों को रिफ्रेशमेंट के लिए पंक्तिबद्ध कर दिया गया। एक-एक करके सभी को मीठे दूध की बोतल बाँटी जा रही थी।

“भई, कोई बच्चा दोबारा लेने मत आये, लाइन मत तोड़े।” मेरे सहकर्मी अध्यापकों के हिदायत भरे स्वर हाल में गूँज रहे थे। वह बच्चा सभी वर्दीधारी बच्चों की पंक्ति में अलग ही चमक रहा था। गहरे लाल रंग की कमीज घुटनों को छू रही थी, मैली-सी जींस की पैंट और पाँव में बेमेल काले जूते। मैं पहले उसे दूध की बोतल दे चुका था। जाहिर था वह फिर से लाइन में लगा था।

“अरे, अभी तो तू दूध की बोतल लेकर गया था, फिर से लाइन में लग गया! चल भाग यहाँ से, वरना दूँगा एक…” मैं कड़क लहजे में बोला। वह सहमा-सा हाल से बाहर निकल गया।

रिफ्रेशमेंट बाँटकर मैं एडजस्टमेंट पीरियड में नौंवी कक्षा में गया तो मेरी नजर फिर से उस बच्चे पर पड़ी। वह पैंट की जेब में कुछ डाल रहा था।
“क्यों बे, तेरी वर्दी कहाँ है? और ये जेब में क्या डाल रखा है?” मैं तल्खी से बोला।

“कुछ नहीं सर!” वह घबराते हुए बोला।

“निकाल बाहर जेब में क्या है? वरना…” उसने सहमते हुए जेब से दूध की बोतल निकाली ही थी कि मैं उस पर बरस पड़ा, ” तू हेराफेरी करके दूसरी बोतल ले ही आया न?”

“नहीं सर, ये मेरे वाली ही है।”

“झूठ बोलता है, तेरे वाली है तो अब तक पी क्यों नहीं?”

“सर, आज मेरा जन्मदिन है। ये बोतल माँ को पिलाऊँगा, जब से पापा गये हैं, माँ ने कभी दूध नहीं पिया।” उसका जवाब सुनकर अगले शब्द मेरे गले में ही रुँध गये।

कुणाल शर्मा, अम्बाला शहर

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एक थका-माँदा शिल्पकार लंबी यात्रा के बाद किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिये बैठ गया।अचानक उसे सामने एक पत्थर का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया। उस शिल्पकार ने उस सुंदर पत्थर के टुकड़े को उठा लिया, सामने रखा और थैले से छेनी-हथौड़ी निकाली ! उसे तराशने की ग़रज़ से जैसे ही पहली चोट की, पत्थर जोर से चिल्ला पड़ा:- “ अरे मुझे मत मारो।”
शिल्पकार ने उस पत्थर को छोड़ दिया और पास ही पड़े अपनी पसंद का एक अन्य टुकड़ा उठाया और उसे छैनी – हथौड़ी से तराशने लगा। वह टुकड़ा चुपचाप वार सहता गया और देखते ही देखते उस पत्थर के टुकड़े मे से एक देवी की प्रतिमा उभर आई।
उस प्रतिमा को वहीं पेड़ के नीचे रख वह शिल्पकार अपनी राह पकड़ आगे चला गया।
कुछ वर्षों बाद वो शिल्पकार फिर उसी रास्ते से गुजरा तो देखा कि उसकी बनाई उस मूर्ती की पूजा अर्चना हो रही है,और जिस पत्थर के टुकड़े को उसने उसके रोने चिल्लाने पर फेंक दिया था लोग उसके सिर पर नारियल फोड़कर मूर्ती पर चढ़ा रहे है।
यह छोटी सी कहानी हमें बताती है कि — “जीवन में कुछ बनने के लिए जो व्यक्ति शुरु में अपने जीवन के शिल्पकार (माता-पिता, और गुरु आदि) का सत्कार कर, उनके द्वारा नेक इरादे से दिए गए क्षणिक कष्ट झेल लेता है तो इस तरह जो जीवन निर्मित होता है, उसका सत्कार बाद में समाज और देश ही नहीं पूरा विश्व युगों तक करता है, और जो जीवन निर्माण के क्षणिक कष्ट से बचकर भागना चाहते हैं वे बाद में जीवन भर कष्ट झेलते हैं !

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शरद पूर्णिमा विशेष
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कल अक्टूबर 5 को समस्त भारत वर्ष में शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जायेगा।
इस दिन श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया था। साथ ही माना जाता है कि इस दिन मां लक्ष्मी रात के समय भ्रमण में निकलती है यह जानने के लिए कि कौन जाग रहा है और कौन सो रहा है। उसी के अनुसार मां लक्ष्मी उनके घर पर ठहरती है। इसीलिए इस दिन सभी लोग जगते है । जिससे कि मां की कृपा उनपर बरसे और उनके घर से कभी भी लक्ष्मी न जाएं।
इसलिए इसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा ही शरद पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है। ज्‍योतिष के अनुसार,ऐसा कई वर्षों में पहली बार हो रहा है जब शरद पूर्णिमा और शनिवार का संयोग बना है। इस दिन पूरा चंद्रमा दिखाई देने के कारण इसे महापूर्णिमा भी कहते हैं।
पूरे साल में केवल इसी दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। हिन्दी धर्म में इस दिन कोजागर व्रत माना गया है। इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। मान्यता है इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। तभी इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चाँदनी में रखने का विधान है।

शरद पूर्णिमा विधान
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इस दिन मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे और ब्रह्मचर्य भाव से रहे।इस दिन ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए १०० दीपक जलाए। इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। जब एक प्रहर (३ घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें। तत्पश्चात भक्तिपूर्वक सात्विक ब्राह्मणों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। तदनंतर अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्य को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी।

शरद पूर्णिमा पर खीर खाने का महत्व
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शरद पूर्णिमा की रात का अगर मनोवैज्ञानिक पक्ष देखा जाए तो यही वह समय होता है जब मौसम में परिवर्तन की शुरूआत होती है और शीत ऋतु का आगमन होता है। शरद पूर्णिमा की रात में खीर का सेवन करना इस बात का प्रतीक है कि शीत ऋतु में हमें गर्म पदार्थों का सेवन करना चाहिए क्योंकि इसी से हमें जीवनदायिनी ऊर्जा प्राप्त होगी।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा
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एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी। दोनो पुत्रियाँ पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है।

उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से पकडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा। बडी बहन बोली-” तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।“ तब छोटी बहन बोली, ” यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। “उसके बाद नगर में उसने पुर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।

इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।

शरद पूर्णिमा की रात को क्या करें, क्या न करें ?
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दशहरे से शरद पूनम तक चन्द्रमा की चाँदनी में विशेष हितकारी रस, हितकारी किरणें होती हैं । इन दिनों चन्द्रमा की चाँदनी का लाभ उठाना, जिससे वर्षभर आप स्वस्थ और प्रसन्न रहें । नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए दशहरे से शरद पूर्णिमा तक प्रतिदिन रात्रि में 15 से 20 मिनट तक चन्द्रमा के ऊपर त्राटक करें।

अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य हैं। जो भी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयी हों, उनको पुष्ट करने के लिए चन्द्रमा की चाँदनी में खीर रखना और भगवान को भोग लगाकर अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करना कि ‘हमारी इन्द्रियों का बल-ओज बढ़ायें ।’ फिर वह खीर खा लेना।

इस रात सूई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से नेत्रज्योति बढ़ती है ।

शरद पूनम दमे की बीमारी वालों के लिए वरदान का दिन है।

चन्द्रमा की चाँदनी गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है। शरद पूनम की चाँदनी का अपना महत्त्व है लेकिन बारहों महीने चन्द्रमा की चाँदनी गर्भ को और औषधियों को पुष्ट करती है।
अमावस्या और पूर्णिमा को चन्द्रमा के विशेष प्रभाव से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है। जब चन्द्रमा इतने बड़े दिगम्बर समुद्र में उथल-पुथल कर विशेष कम्पायमान कर देता है तो हमारे शरीर में जो जलीय अंश है, सप्तधातुएँ हैं, सप्त रंग हैं, उन पर भी चन्द्रमा का प्रभाव पड़ता है । इन दिनों में अगर काम-विकार भोगा तो विकलांग संतान अथवा जानलेवा बीमारी हो जाती है और यदि उपवास, व्रत तथा सत्संग किया तो तन तंदुरुस्त, मन प्रसन्न और बुद्धि में बुद्धिदाता का प्रकाश आता है ।

सुख समृद्धि के लिए राशि अनुसार करे ये उपाय
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मेष🐐
शरद पूर्णिमा पर मेष राशि के लोग कन्याओं को खीर खिलाएं और चावल को दूध में धोकर बहते पानी में बहाएं। ऐसा करने से आपके सारे कष्ट दूर हो सकते हैं।

वृष🐂
इस राशि में चंद्रमा उच्च का होता है। वृष राशि शुक्र की राशि है और राशि स्वामी शुक्र प्रसन्न होने पर भौतिक सुख-सुविधाएं प्रदान करते हैं। शुक्र देवता को प्रसन्न करने के लिए इस राशि के लोग दही और गाय का घी मंदिर में दान करें।

मिथुन💏
इस राशि का स्वामी बुध, चंद्र के साथ मिल कर आपकी व्यापारिक एवं कार्य क्षेत्र के निर्णयों को प्रभावित करता है। उन्नति के लिए आप दूध और चावल का दान करें तो उत्तम रहेगा।

कर्क🦀
आपके मन का स्वामी चंद्रमा है, जो कि आपका राशि स्वामी भी है। इसलिए आपको तनाव मुक्त और प्रसन्न रहने के लिए मिश्री मिला हुआ दूध मंदिर में दान देना चाहिए।

सिंह🐅
आपका राशि का स्वामी सूर्य है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर धन प्राप्ति के लिए मंदिर में गुड़ का दान करें तो आपकी आर्थिक स्थिति में परिवर्तन हो सकता है।

कन्या👩
इस पवित्र पर्व पर आपको अपनी राशि के अनुसार 3 से 10 वर्ष तक की कन्याओं को भोजन में खीर खिलाना विशेष लाभदाई रहेगा।

तुला⚖
इस राशि पर शुक्र का विशेष प्रभाव होता है। इस राशि के लोग धन और ऐश्वर्य के लिए धर्म स्थानों यानी मंदिरों पर दूध, चावल व शुद्ध घी का दान दें।

वृश्चिक🦂
इस राशि में चंद्रमा नीच का होता है। सुख-शांति और संपन्नता के लिए इस राशि के लोग अपने राशि स्वामी मंगल देव से संबंधित वस्तुओं, कन्याओं को दूध व चांदी का दान दें।

धनु🏹
इस राशि का स्वामी गुरु है। इस समय गुरु उच्च राशि में है और गुरु की नौवीं दृष्टि चंद्रमा पर रहेगी। इसलिए इस राशि वालों को शरद पूर्णिमा के अवसर पर किए गए दान का पूरा फल मिलेगा। चने की दाल पीले कपड़े में रख कर मंदिर में दान दें।

मकर🐊
इस राशि का स्वामी शनि है। गुरु की सातवी दृष्टि आपकी राशि पर है जो कि शुभ है। आप बहते पानी में चावल बहाएं। इस उपाय से आपकी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं।

कुंभ🍯
इस राशि के लोगों का राशि स्वामी शनि है। इसलिए इस पर्व पर शनि के उपाय करें तो विशेष लाभ मिलेगा। आप दृष्टिहीनों को भोजन करवाएं।

मीन🐳
शरद पूर्णिमा के अवसर पर आपकी राशि में पूर्ण चंद्रोदय होगा। इसलिए आप सुख, ऐश्वर्य और धन की प्राप्ति के लिए ब्राह्मणों को भोजन करवाएं।

पं देवशर्मा
9411185552
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गाय का घी ,,,,,,,,,,,
कहते है पुराना घी गुणी होता है जी हाँ ये सच है जितना ही गाय का घी पुराना हो उतना ही गुणी हो जाता है पुराना घी तीक्ष्ण, खट्टा, तीखा, उष्ण, श्रवण शक्ति को बढ़ाने वाला घाव को मिटाने वाला, योनि रोग, मस्तक रोग, नेत्र रोग, कर्ण रोग, मूच्छा, ज्वर, श्वांस, खांसी, संग्रहणी, उन्माद, कृमि, विष आदि दोषों को नष्ट करता है। दस वर्ष पुराने घी को कोंच, ग्यारह वर्ष पुराने घी को महाघृत कहते हैं-
स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए प्रतिदिन रात्रि को सोते समय गो-दो बूंद देशी गाय का गुनगुना घी दोनों नाक के छेदों में डालें। यह घी रात भर मस्तिष्क को प्राणवायु पहुंचाता रहता है और विद्युत तरंगों से मस्तिष्क को चार्ज करता रहता है। इससे मस्तिष्क की शक्ति बहुत बढ़ जाती है। यदि यह क्रिया प्रातः, अपराह्न और रात को सोते समय कई माह तक की जाती रहे तो श्वास के प्रवाह में आने वाली बाधाएं दूर हो जाती हैं और अनेक पुराने रोग ठीक हो जाते हैं-
शुष्कता, सूजन, रक्तस्राव, सर्दी, सायनस संक्रमण, नासिका गिल्टी आदि ठीक हो जाते हैं और वायु मार्ग खुल जाने से श्वास की बाधा दूर हो जाती है। नाक में घी डालने के साथ-साथ दो बूंद घी नाभि में डालें और फिर अंगुली से दोनों ओर थोड़ी देर घुमाएं। गाय का घी अपने हाथ से पांव के तलवों पर मालिश करें, इससे बहुत अच्छी नींद आती है, शांति और आनन्द प्राप्त होता है-
देसी गाय के घी को रसायन कहा गया है। जो जवानी को कायम रखते हुए, बुढ़ापे को दूर रखता है। काली गाय का घी खाने से बूढ़ा व्यक्ति भी जवान जैसा हो जाता है-
गाय के घी में स्वर्ण छार पाए जाते हैं जिसमे अदभुत औषधिय गुण होते है, जो की गाय के घी के इलावा अन्य घी में नहीं मिलते । गाय के घी से बेहतर कोई दूसरी चीज नहीं है-
गाय के घी में वैक्सीन एसिड, ब्यूट्रिक एसिड, बीटा-कैरोटीन जैसे माइक्रोन्यूट्रीस मौजूद होते हैं। जिस के सेवन करने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचा जा सकता है। गाय के घी से उत्पन्न शरीर के माइक्रोन्यूट्रीस में कैंसर युक्त तत्वों से लड़ने की क्षमता होती है-
यदि आप गाय के 10 ग्राम घी से हवन अनुष्ठान (यज्ञ) करते हैं तो इसके परिणाम स्वरूप वातावरण में लगभग 1 टन ताजा ऑक्सीजन का उत्पादन कर सकते हैं। यही कारण है कि मंदिरों में गाय के घी का दीपक जलाने कि तथा , धार्मिक समारोह में यज्ञ करने कि प्रथा प्रचलित है। इससे वातावरण में फैले परमाणु विकिरणों को हटाने की अदभुत क्षमता होती है-
गाय के घी के उपयोग-
गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है-
गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बहार निकल कर चेतना वापस लोट आती है-गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है। गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है-
आयुर्वेद विशेषज्ञो के अनुसार अनिद्रा का रोगी शाम को दोनों नथुनो में गाय के घी की दो – दो बूंद डाले और रात को नाभि और पैर के तलुओ में गौघृत लगाकर लेट जाय तो उसे प्रगाढ़ निद्रा आ जायेगी-
नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तारो ताजा हो जाता है- गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है-
गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है-
आपको यदि अगर अधिक कमजोरी लगे तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें-
गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है-
गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है याददाश्त तेज होती है इसलिए पहले के लोगो में उर्जा और ज्ञान का अभाव नहीं था मुंह-जबानी पूरा ग्रन्थ रट लिया करते थे
हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए-हिचकी स्वयं रुक जाएगी
गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है-
हथेली और पांव के तलवो में जलन होने पर गाय के घी की मालिश करने से जलन में आराम आयेगा-
गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है और इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है। देसी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है। इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है-
गाय के पुराने घी से बच्चों को छाती और पीठ पर मालिश करने से कफ की शिकायत दूर हो जाती है-
हाथ पाव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ढीक होता है-
बीस से पच्चीस ग्राम घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांझे का नशा कम हो जाता है-
सांप के काटने पर 100 150 ग्राम घी पिलायें उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा
फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है।गाय के घी की झाती पर मालिस करने से बच्चो के बलगम को बहार निकालने मे सहायक होता है-
दो बूंद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ढीक होता है। सिर दर्द होने पर शरीर में गर्मी लगती हो, तो गाय के घी की पैरों के तलवे पर मालिश करे, सर दर्द ठीक हो जायेगा-
जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाइ खाने की मनाही है तो गाय का घी खाएं, हर्दय मज़बूत होता है-
शरीर में कमजोरी आने पर एक गिलास गर्म दूध में एक चम्मच देसी गाय का घी मिलाकर पी लें। इससे थकान बिल्कुल कम हो जाएगी-
एक बात याद रहे कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। वजन भी नही बढ़ता, बल्कि वजन को संतुलित करता है । यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है, मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है-
एक चम्मच गाय का शुद्ध घी में एक चम्मच बूरा और 1/4 चम्मच पिसी काली मिर्च इन तीनों को मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है-
गाय का घी एक अच्छा(LDL)कोलेसट्रॉल है। उच्च कोलेस्ट्रॉल के रोगियों को गाय का घी ही खाना चाहिए। यह एक बहुत अच्छा टॉनिक भी है। अगर आप गाय के घी की कुछ बूँदें दिन में तीन बार,नाक में प्रयोग करेंगे तो यह त्रिदोष (वात पित्त और कफ) को संतुलित करता है-
गाय के घी को ठन्डे जल में फेंट ले और फिर घी को पानी से अलग कर ले यह प्रक्रिया लगभग सौ बार करे और इसमें थोड़ा सा कपूर डालकर मिला दें। इस विधि द्वारा प्राप्त घी एक असर कारक औषधि में परिवर्तित हो जाता है जिसे जिसे त्वचा सम्बन्धी हर चर्म रोगों में चमत्कारिक मलहम कि तरह से इस्तेमाल कर सकते है। यह सौराइशिस के लिए भी कारगर है-
घी और छिलका सहित पिसा हुआ काला चना और पिसी शक्कर (बूरा) तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड्डू बाँध लें। प्रातः खाली पेट एक लड्डू खूब चबा-चबाकर खाते हुए एक गिलास मीठा कुनकुना दूध घूँट-घूँट करके पीने से स्त्रियों के प्रदर रोग में आराम होता है, पुरुषों का शरीर मोटा ताजा यानी सुडौल और बलवान बनता है –
तो फिर अभी भी सोच रहे है आप आज से ही गाय का शुध घी घर लाये कुछ खाए और कुछ पुराना होने को रख दे ये सोच कर कि कभी न कभी आपको इसकी जरुरत पड़ सकती है