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🔴सिकंदर ने जब सारी दुनिया जीतने का सपना करीब-करीब पूरा कर लिया, तो वह एक फकीर को मिला–भारत से बाहर जाते वक्त। उस फकीर से उसने कहा कि मैंने दुनिया को जितने का सपना पूरा कर लिया। वह फकीर हंसने लगा। उसने कहा: सिकंदर, तुझे अभी भी होश नहीं आया! अगर तू एक मरुस्थल में भटक जाए और तुझे प्यास लगी हो, तो एक गिलास पानी के लिए तू कितना राज्य का हिस्सा देगा?

सिकंदर ने कहा, अगर ऐसी हालत हो कि मैं मर रहा होऊं, तो आधा राज्य दे दूंगा। लेकिन फकीर ने कहा कि समझ कि मैं आधे राज्य में बेचने को तैयार न होऊं। तो सिकंदर ने कहा: पूरा राज्य दे दूंगा। तो वह फकीर हंसने लगा; कहा, फिर सोच एक गिलास पानी के लिए आदमी पूरे साम्राज्य को दे सकता है–पूरी पृथ्वी के साम्राज्य को–जीने के लिए। और जीना मिला है, उसके लिए परमात्मा को तूने धन्यवाद दिया है? मुफ्त मिला है। सारे जगत का राज्य देने को तू तैयार है, कि अगर थोड़ी देर और जीने को मौका मिल जाए। लेकिन जीवन तुझे मिला है, वर्षों से तू जी रहा है और तूने कभी धन्यवाद दिया?

एक श्वास लेने के लिए तुम क्या देने को राजी न हो जाओगे!

और ऐसी घड़ी आयी कि सिकंदर जब चला गया, तो वह सोच-विचार में मग्न था। बात तो ठीक थी। वह अपने घर नहीं पहुंच पाया; बीच में उसकी मौत हो गई। और बीच में जब उसकी मौत करीब आयी और चिकित्सकों ने कह दिया कि वह बच न सकेगा। तब वह अपने गांव से केवल चौबीस घंटे के फासले पर था। चौबीस घंटे बाद वह अपनी मां को मिल लेगा, अपनी पत्नी को मिल लेगा, अपने परिवार को मिल लेगा। उसकी आकांक्षा थी। उसने अपने चिकित्सकों से कहा कि जो भी खर्च हो, उसकी फिक्र न करो। लेकिन मुझे चौबीस घंटे जिला लो। मैं अपने घर तो पहुंच जाऊं। वहां जाकर मर जाऊं। उन्होंने कहा, हम असमर्थ हैं। चौबीस घंटे तो दूर, चौबीस मिनट भी हम न जिला सकेंगे।

सिकंदर ने कहा।: मैं सब देने को तैयार हूं। तब उस फकीर की बात याद आयी–कि वह ठीक ही कह रहा था। वह कल्पना न थी–मरुस्थल की। वह घटी जा रही है बात। लेकिन क्या करेगा चिकित्सक!

सिकंदर ने कहा कि मैं अपना सारा राज्य देने को तैयार हूं; मुझे चौबीस घंटे बचा लो। मैं अपनी मां की गोद तक पहुंच जाऊं। वह देख तो ले अपने बेटे को–दुनिया जीत कर आ गया। फिर मैं मर जाऊं, कोई बात नहीं। लेकिन चिकित्सक ने कहा, क्षमा करें। हम क्या कर सकते हैं! मौत अब आ ही गई द्वार पर।

घर नहीं पहुंच पाया सिकंदर। चौबीस घंटे का फासला था। सारा राज्य देने को तैयार था। लेकिन तुम्हें यह जीवन मिला, इसके लिए कभी परमात्मा को धन्यवाद दिया?

ओशो – कन थोरे कांकर घने, प्रवचन~३
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