Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

कामेश्वर धाम कारो – बलिया – यहाँ भगवान शिव ने कामदेव को किया था भस्म


कामेश्वर धाम कारो – बलिया – यहाँ भगवान शिव ने कामदेव को किया था भस्म
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में है कामेश्वर धाम। इस धाम के बारे में मान्यता है कि यह, शिव पुराण मे वर्णित वही जगह है जहा भगवान शिव ने देवताओं के सेनापति कामदेव को जला कर भस्म कर दिया था। यहाँ पर आज भी वह आधा जला हुआ, हरा भरा आम का वृक्ष (पेड़) है जिसके पीछे छिपकर कामदेव ने समाधी मे लीन भोले नाथ को समाधि से जगाने के लिए पुष्प बाण चलाया था।

कामेश्वर धाम कारो
आखिर क्यों महादेव शिव ने कामदेव को भस्म किया ? :
भगवान शिव द्वारा कामदेव को भस्म करने कि कथा (कहानी) शिव पुराण मे इस प्रकार है। भगवान शिव कि पत्नी सती अपने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ मे अपने पति भोलेनाथ का अपमान सहन नही कर पाती है और यज्ञ वेदी मे कूदकर आत्मदाह कर लेती है। जब यह बात शिवजी को पता चलती है तो वो अपने तांडव से पूरी सृष्टि मे हाहाकार मचा देते है। इससे व्याकुल सारे देवता भगवान शंकर को समझाने पहुंचते है। महादेव उनके समझाने से शान्त होकर, परम शान्ति के लिए, गंगा तमसा के इस पवित्र संगम पर आकर समाधि मे लिन हो जाते है।

कामेश्वर धाम कारो
इसी बीच महाबली राक्षस तारकासुर अपने तप से ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके ऐसा वरदान प्राप्त कर लेता है जिससे की उसकी मृत्यु केवल शिव पुत्र द्वारा ही हो सकती थी। यह एक तरह से अमरता का वरदान था क्योकि सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव समाधि मे लीन हो चुके थे।
इसी कारण तारकासुर का उत्पात दिनो दिन बढ़ता जाता है और वो स्वर्ग पर अधिकार करने कि चेष्टा करने लगता है। यह बात जब देवताओं को पता चलती है तो वो सब चिंतित हो जाते है और भगवान शिव को समाधि से जगाने का निश्चय करते है। इसके लिए वो कामदेव को सेनापति बनाकर यह काम कामदेव को सोपते है। कामदेव, महादेव के समाधि स्थल पहुंचकर अनेकों प्रयत्नो के द्वारा महादेव को जगाने का प्रयास करते है, जिसमे अप्सराओ के नृत्य इत्यादि शामिल होते है, पर सब प्रयास बेकार जाते है।
अंत में कामदेव स्वयं भोले नाथ को जगाने लिए खुद को आम के पेड़ के पत्तो के पीछे छुपाकर शिवजी पर पुष्प बाण चलाते है। पुष्प बाण सीधे भगवान शिव के हृदय मे लगता है, और उनकी समाधि टूट जाति है। अपनी समाधि टूट जाने से भगवान शिव बहुत क्रोधित होते है और आम के पेड़ के पत्तो के पिछे खडे कामदेव को अपने त्रिनेत्र से जला कर भस्म कर देते है।

आम का पेड़ , कामेश्वर धाम कारो
कई संतो कि तपोभूमि रहा है कामेश्वर धाम :
त्रेतायुग में इस स्थान पर महर्षि विश्वामित्र के साथ भगवान श्रीराम लक्ष्मण आये थे जिसका उल्लेख बाल्मीकीय रामायण में भी है। अघोर पंथ के प्रतिष्ठापक श्री कीनाराम बाबा की प्रथम दीक्षा यहीं पर हुर्इ थी। यहां पर दुर्वासा ऋषि ने भी तप किया था।
बताते हैं कि इस स्थान का नाम पूर्व में कामकारू कामशिला था। यही कामकारू पहले अपभ्रंश में काम शब्द खोकर कारूं फिर कारून और अब कारों के नाम से जाना जाता है।

रानी पोखरा – कामेश्वर धाम कारो Image Credit
कामेश्वर धाम कारो मे तीन प्राचीन शिवलिंग व शिवालय स्थापीत है।

श्री कामेश्वर नाथ शिवालय :
यह शिवालय रानी पोखरा के पूर्व तट पर विशाल आम के वृक्ष (पेड़) के नीचे स्थित है। इसमें स्थापित शिवलिंग खुदाई में मिला था जो कि ऊपर से थोड़ा सा खंडित है।

सूर्य प्रतिमा कामेश्वर धाम कारो
श्री कवलेश्वर नाथ शिवालय :
इस शिवालय कि स्थापना अयोध्या के राजा कमलेश्वर ने कि थी। कहते है की यहां आकर उनका कुष्ट का रोग सही हो गया था इस शिवालय के पास मे हि उन्होने विशाल तालाब बनवाया जिसे रानी पोखरा कहते है।

नंदी कामेश्वर धाम कारो
श्री बालेश्वर नाथ शिवालय :
बालेश्वर नाथ शिवलिंग के बारे मे कहा जाता है कि यह एक चमत्कारिक शिवलिंग है। किवदंती है की जब 1728 में अवध के नवाब मुहम्मद शाह ने कामेश्वर धाम पर हमला किया था तब बालेश्वर नाथ शिवलिंग से निकले काले भौरो ने जवाबी हमला कर उन्हे भागने पर मजबूर कर दिया था।

http://ajabgajob.blogspot.com/2014/06/blog-post_13.html

 


कामेश्वर धाम, कारो, बलिया

कामदहन भूमि कामाश्रम

यह तीर्थ स्थान बलिया वाराणसी रेलमार्ग पर चितबड़ागांव एवं ताजपुर डेहमा रेलवे स्टेशनों के बीच में सिथत है। मान्यता है कि कामेश्वर धाम वह स्थान है, जहां भगवान शिव ने देव सेनापति कामदेव को जला कर भस्म कर दिया था। यहां आज भी वह प्राचीन आम का वृृक्ष जला हुआ हरा-भरा खड़ा है। जिसके पत्तों में छिपकर कामदेव जी ने समाधिस्थ शिव पर वाण चलाया था।

त्रेतायुग में इस स्थान पर महर्षि विश्वामित्र के साथ भगवान श्रीराम लक्ष्मण भी आये थे जिसका उल्लेख बाल्मीकीय रामायण में भी है। अघोर पंथ के प्रतिष्ठापक श्री कीनाराम बाबा की प्रथम दीक्षा यहीं पर हुर्इ थी। यहां दुर्वासा ऋषि ने भी तप किया था। यहां पहुंच कर स्वत: ही इसकी दिव्यता महसूस हो जाती है । मान्यता है कि इस तीर्थ पर त्रयोदशी युक्त शनिवार को दर्शन करने वालों की सारी मनोकामनायें पूर्ण हो जाती हैं

शिवपुराण के अनुसार महाबली तारकासुर ने तप करके ब्रह्राा जी से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया जिसके तहत उसकी मृत्यु केवल शिवपुत्र के हाथों हो सकती थी। यह लगभग अमरता का वरदान था क्यों कि उस समय भगवान शिव की भार्या सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपने पतिदेव भगवान भोलेनाथ के अपमान से रूष्ट होकर यज्ञ भूमि में आत्मदाह कर चुकी थीं । इस घटना से क्रोधित भगवान शिव तांडव नृत्य कर देवगणों के प्रयास से शान्त होकर परम शानित के निमित्त विमुकित भूमि गंगा तमसा के पवित्र संगम पर आकर समाधिस्थ हो चुके थे।

तारकासुर के दिनों – दिन बढ़ते उत्पात के चलते देवताओं ने भगवान शिव को समाधि से जगाने का निर्णय किया। इसके निमित्त भगवान कामदेव को सेनापति बनाया गया। कामदेव ने महादेव के समाधि स्थान पर पहुंच कर विभिन्न प्रकार के आयोजन किये जिसमें कि मनमोहनी अप्सराओं का नृत्य इत्यादि शामिल था लेकिन सारे प्रयास असफल रहे।

महादेव की समाधि पर कोर्इ प्रभाव नहीं पड़ा। विफल होने पर कामदेव ने आम के पेड़ के पत्तों में खुद को छुपाकर महादेव भगवान शिव पर पुष्प धनुष से प्रहार किया। शिव के हृदय में पुष्प मोहिनी बाण लगते ही उनकी समाधि भंग हो गयी।

इस प्रकार संक्रोधित भगवान शिव ने कामदेव को जला कर भस्म कर दिया। इस दिव्य घटना का साक्षी यह पवित्र धाम सभी के लिए पूजनीय है । बताते हैं कि इस स्थान का नाम पूर्व में कामकारू कामशिला था। यही कामकारू पहले अपभ्रंश में काम शब्द खोकर कारूं फिर कारून और अब कारों के नाम से जाना जाता है।

कारों के दक्षिण गंगिया के छाडन मोहन आदि स्थल एवं उत्तर में प्रवाहित तमसा छोटी सरयू और दक्षिण में प्रवाहित गंगा नदी की भू परिसिथतियां इंगित करती हैं कि काफी समय तक कारों में ही इन नदियों का संगम स्थल रहा है । बाल्मीकीय रामयण के बाल खण्ड में भी कामदहन भूमि की प्रमाणिकता मिलती है।

कामेश्वर धाम पहुंचने का मार्ग

बलिया जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दक्षिण पशिचम दिशा में बलिया वाराणसी मार्ग पर सिथत है । बलिया से आटो रिक्शा चलते हैं, जो बहेरी पुल बलिया से चितबड़ागांव होकर जाते हैं।

सड़क मार्ग से फेफना चितबड़ागांव होकर धर्मापुर पहुंचने पर कामेश्वर धाम के दिव्य स्वागत द्वार के दर्शन हो जाते हैं रेल मार्ग से यहां आने हेतु ताजपुर स्टेशन उतरना होगा। यहां से कामेश्वर धाम 3 किलोमीटर दक्षिण पूर्व दिशा में सिथत है। चितबड़ागांव रेलवे स्टेशन उतरना भी उपयुक्त होगा। यहां से कामेश्वर धाम जाने के लिए आटो रिक्शा आसानी से मिल जाते हैं।

कामेश्वर धाम दर्शन

श्री कामेष्वरनाथ षिवालय एवं प्राचीन आम वृक्ष

कामाश्रम का यह प्रसिद्ध शिवलिंग रानी पोखरा के पूर्व तट पर पांच फीट गडडे में विशाल आम वृक्ष की जड़ में अवसिथत है। यह शिवलिंग खुदार्इ में मिला था। यह उपर से खंडित है । इस शिवलिंग एक पवित्र आम के पेड़ के विषय में कारों के बुजुर्ग नागरिकों का कहना हे कि बचपन में भी हमने इस आम के पेड़ एवं शिव लिंग को ज्यों का त्यों देखा है । काफी हद तक जला किन्तु हरा भरा यह आम वृक्ष एक दिव्य स्थान है काबिले गौर हे कि इस प्राचीन आम वृक्ष पर अब भी आम लगते हैं ।

श्री कामेश्वर धाम झील एवं कवलेश्वर ताल

मंदिर क्षेत्र के प्रवेश द्वार के पास ही इस सुरम्य झील के दर्शन होते हैं । गंगा तमसा सरयू द्वारा खराद कर बनी यह झील प्रकृति के मनोहर दृश्यों से सजिजत है । लाल कमल फूलों के लिए झील काफी प्रसिद्ध है ।

श्री कवलेश्वर नाथ शिवालय

प्राचीन शिवलिंग के ठीक सामने सिथत इस देवालय की स्थापना अध्योध्या के राजा कवलेश्वर ने कराया था। बताते हैं कि यहां आकर उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया था। उन्होंने शिवालय के पास ही विशाल तालाब बनवाया जिसे रानी पोखरा कहा जाता है।

जिसका वर्तमान में सुन्दर तरिके से जीर्णोद्धार 2001 र्इ. से शुरु कराया गया। जो आज भी जारी है।

श्री बालेश्वर नाथ शिवालय

कामेश्वर धाम कारों में सिथत बालेश्वर नाथ शिवलिंग एक चमत्कारी देवालय है। इस मनिदर के सभी प्रतिमायें लाल पत्थर की बनी हैं।

बताते हैं कि सन 1728 में मुहम्मदशाह नामक एक शासक अवध का नबाब बना। उसने एक बार कामेश्वर धाम पर हमला बोल दिया तब श्री बालेश्वर महादेव शिवलिंग से लोगों की संख्या में निकले काले भौंरो ने नबाब की सेना पर हमला बोल दिया। सेना को मुंह छुपा कर भागना पड़ा

———————————-

भगवान शिव की साधना स्थली कारो कामेश्वर धाम,पुराणों में वर्णित यह वही स्थान है जहां भगवान भोले नाथ ने कामदेव को भष्म किया था ………………..और भी बहुत कुछ है धर्म की इस महा गाथा में , ज़रूर पढ़ें !!

भगवान शिव की साधना स्थली कारो कामेश्वर धाम,पुराणों में वर्णित यह वही स्थान है जहां भगवान भोले नाथ ने कामदेव को भष्म किया था।पुराणों में, वेदों में और शास्त्रों में भगवान शिव-महाकाल के महात्म्य को प्रतिपादित किया गया है। भगवान शिव हिन्दू संस्कृति के प्रणेता आदिदेव महादेव हैं। हमारी सांस्कृतिक मान्यता के अनुसार 33 करोड़ देवताओं में ‘शिरोमणि’ देव शिव ही हैं। सृष्टि के तीनों लोकों में भगवान शिव एक अलग, अलौकिक शक्ति वाले देव हैं।
भगवान शिव पृथ्वी पर अपने निराकार-साकार रूप में निवास कर रहे हैं। भगवान शिव सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान हैं। महाशिवरात्रि पर्व भगवान शिवशंकर के प्रदोष तांडव नृत्य का महापर्व है। शिव प्रलय के पालनहार हैं और प्रलय के गर्भ में ही प्राणी का अंतिम कल्याण सन्निहित है। शिव शब्द का अर्थ है ‘कल्याण’ और ‘रा’ दानार्थक धातु से रात्रि शब्द बना है, तात्पर्य यह कि जो सुख प्रदान करती है, वह रात्रि है।
शिवस्य प्रिया रात्रियस्मिन व्रते अंगत्वेन विहिता तदव्रतं शिवरात्र्‌याख्याम्‌।’
इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ होता है, वह रात्रि जो आनंद प्रदायिनी है और जिसका शिव के साथ विशेष संबंध है। शिवरात्रि, जो फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को है, उसमें शिव पूजा, उपवास और रात्रि जागरण का प्रावधान है। इस महारात्रि को शिव की पूजा करना सचमुच एक महाव्रत है।
ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति महाशिवरात्रि के व्रत पर भगवान शिव की भक्ति, दर्शन, पूजा, उपवास एवं व्रत नहीं रखता, वह सांसारिक माया, मोह एवं आवागमन के बँधन से हजारों वर्षों तक उलझा रहता है। यह भी कहा गया है कि जो शिवरात्रि पर जागरण करता है, उपवास रखता है और कहीं भी किसी भी शिवजी के मंदिर में जाकर भगवान शिवलिंग के दर्शन करता है, वह जन्म-मरण पुनर्जन्म के बँधन से मुक्ति पा जाता है। शिवरात्रि के व्रत के बारे में पुराणों में कहा गया है कि इसका फल कभी किसी हालत में भी निरर्थक नहीं जाता है।
शिवरात्रि व्रत धर्म का उत्तम साधन :
शिवरात्रि का व्रत सबसे अधिक बलवान है। भोग और मोक्ष का फलदाता शिवरात्रि का व्रत है। इस व्रत को छोड़कर दूसरा मनुष्यों के लिए हितकारक व्रत नहीं है। यह व्रत सबके लिए धर्म का उत्तम साधन है। निष्काम अथवा सकाम भाव रखने वाले सांसारिक सभी मनुष्य, वर्णों, आश्रमों, स्त्रियों, पुरुषों, बालक-बालिकाओं तथा देवता आदि सभी देहधारियों के लिए शिवरात्रि का यह श्रेष्ठ व्रत हितकारक है।
शिवरात्रि के दिन प्रातः उठकर स्नानादि कर शिव मंदिर जाकर शिवलिंग का विधिवत पूजन कर नमन करें। रात्रि जागरण महाशिवरात्रि व्रत में विशेष फलदायी है।
गीता में इसे स्पष्ट किया गया है-
या निशा सर्वभूतानां तस्या जागर्ति संयमी।
यस्यां जागृति भूतानि सा निशा पश्चतो सुनेः
तात्पर्य यह कि विषयासक्त सांसारिक लोगों की जो रात्रि है, उसमें संयमी लोग ही जागृत अवस्था में रहते हैं और जहाँ शिवपूजा का अर्थ पुष्प, चंदन एवं बिल्वपत्र, धतूरा, भाँग आदि अर्पित कर भगवान शिव का जप व ध्यान करना और चित्त वृत्ति का निरोध कर जीवात्मा का परमात्मा शिव के साथ एकाकार होना ही वास्तविक पूजा है। शिवरात्रि में चार प्रहरों में चार बार अलग-अलग विधि से पूजा का प्रावधान है।
महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में भगवान शिव की ईशान मूर्ति को दुग्ध द्वारा स्नान कराएँ, दूसरे प्रहर में उनकी अघोर मूर्ति को दही से स्नान करवाएँ और तीसरे प्रहर में घी से स्नान कराएँ व चौथे प्रहर में उनकी सद्योजात मूर्ति को मधु द्वारा स्नान करवाएँ। इससे भगवान आशुतोष अतिप्रसन्न होते हैं। प्रातःकाल विसर्जन और व्रत की महिमा का श्रवण कर अमावस्या को निम्न प्रार्थना कर पारण करें –
संसार क्लेश दग्धस्य व्रतेनानेन शंकर।
प्रसीद समुखोनाथ, ज्ञान दृष्टि प्रदोभव
तात्पर्य यह कि भगवान शंकर! मैं हर रोज संसार की यातना से, दुःखों से दग्ध हो रहा हूँ। इस व्रत से आप मुझ पर प्रसन्न हों और प्रभु संतुष्ट होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।
ॐ नमः शिवाय’ कहिए और देवाधिदेव प्रसन्न होकर सब मनोरथ पूर्ण करेंगे। शिवरात्रि के दिन शिव को ताम्रफमल (बादाम), कमल पुष्प, अफीम बीज और धतूरे का पुष्प चढ़ाना चाहिए एवं अभिषेक कर बिल्व पत्र चढ़ाना चाहिए।जनगण के देवाधिदेव शिव ने यहीं भस्म किया था कामदेव को॥ जन गण मन के आराध्य भगवान शिव एवं शिवरात्रि सहज उपलब्धता और समाज के आखरी छोर पर खडे ब्यक्ति के लिए भी सिर्फ कल्याण की कामना यही शिव है, किरात भील जैसे आदिवासी एवं जनजाति से लेकर कुलीन एवम अभिजात्य वर्ग तक अनपढ़ गंवार से लेकर ज्ञानी अज्ञानी तक सांसारिक मोहमाया में फंसे लोगो से लेकर तपस्वियों, योगियों, निर्धन, फक्कडों, साधन सम्पन्न सभी तबके के आराध्य देव है भगवान शिव, भारत वर्ष में अन्य देवी देवताओं के मन्दिरों की तुलना में शिव मन्दिर सर्वाधिक है।
हर गली मुहल्ले गांव देहात घाट अखाडे बगीचे पर्वत नदी जलाशय के किनारे यहां तक की बियाबान जंगलों मे भी शिवलिंग के दर्शन हो जाते है। यह इस बात का साक्ष्य है कि हमारे श्रृजनता का भगवान शिव में अगाध प्रेम भरा है। वस्तुत: इनका आशुतोष होना अवघडदानी होना केवल वेलपत्र या जल चढानें मात्र से ही प्रशन्न होना आदि कुछ ऐसी विशेषताए हैं जो इनको जन गण मन का देव अर्थात् महादेव बनाती है। हिन्दू धर्म में भगवान शिव को मृत्युलोक का देवता माना गया है। शिव को अनादि अनन्त अजन्मां माना गया है। यानि उनका न आरम्भ है न अन्त ।न उनका जन्म हुआ है न वे मृत्यु को प्राप्त होते है। इस तरह से भगवान शिव अवतार न होकर साक्षात ईश्वर है। शिव की साकार यानि मुर्ति रूप एवम निराकार यानि अमूर्त रूप में आराधना की जाती है। शास्त्रों में भगवान शिव का चरित्र कल्याण कारी माना गया है।
धार्मिक आस्था से इन शिव नामों का ध्यान मात्र ही शुभ फल देता है। शिव के इन सभी रूप और नामों का स्मरण मात्र ही हर भक्त के सभी दु:ख और कष्टों को दूर कर उसकी हर इच्छा और सुख की पूर्ति करने वाला माना गया है।इसी का एक रूप गाजीपुर जनपद के आखिरी छोर पर स्थित कामेश्वर नाथ धाम कारो (जनपद बलिया) का है।रामायण काल से पूर्व में इस स्थान पर गंगा सरजू का संगम था और इसी स्थान पर भगवान शिव समाधिस्थ हो तपस्यारत थे। उस समय तारकासुर नामक दैत्य राज के आतंक से पूरा ब्रम्हांड व्यथित था। उसके आतंक से मुक्ति का बस एक ही उपाय था कि किसी तरह से समाधिस्थ शिव में काम भावना का संचार हो और शिव पुत्र कार्तिकेय का जन्म हो जिनके हाथो तारकासुर का बध होना निश्चित था। देवताओं के आग्रह पर देव सेनापति कामदेव समाधिस्थ शिव की साधना भूमिं कारो की धरती पर पधारे।
सर्वप्रथम कामदेव ने अप्सराओं ,गंधर्वों के नृत्य गान से भगवान शिव को जगाने का भरपूर प्रयास किया ।विफल होने पर कामदेव ने आम्र बृक्ष के पत्तों मे छिपकर अपने पुष्प धनुष से पंच बाण हर्षण प्रहस्टचेता सम्मोहन प्राहिणों एवम मोहिनी का शिव ह्रदय में प्रहार कर शिव की समाधि को भंग कर दिया। इस पंच बाण के प्रहार से क्रोधित भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र से कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया। तभी से वह जला पेंड युगो युगो से आज भी प्रमाण के रूप में अपनी जगह पर खडा है।आज भी उस आम के पेंड की उम्र के बारे में किसी को जानकारी नहीं है। पिढी दर पिढी इस आम के पेंड के मौजूद रहने की सभी को जानकारी है।इस कामेश्वर नाथ का वर्णन बाल्मीकि रामायण के बाल सर्ग के 23 के दस पन्द्रह में मिलता है। जिसमे अयोध्या से बक्सर जाते समय महर्षि विश्वामित्र भगवान राम को बताते है की देखो रघुनंदन यही वह स्थान है जहां तपस्या रत भगवान शिव ने कामदेव को भस्म किया था।
कन्दर्पो मूर्ति मानसित्त काम इत्युच्यते बुधै: तपस्यामि: स्थाणु: नियमेन समाहितम्।इस स्थान पर हर काल हर खण्ड में ऋषि मुनी प्रत्यक्ष एवम अप्रत्यक्ष रूप से साधना रत रहते है। इस स्थान पर भगवान राम अनुज लक्ष्मण एवम महर्षि विश्वामित्र के साथ रात्रि विश्राम करने के पश्चात बक्सर गये थे।स्कन्द पुराण के अनुसार महर्षि दुर्वासा ने भी इसी आम के बृक्ष के नीचे तपस्या किया था।महात्मां बुद्ध बोध गया से सारनाथ जाते समय यहां पर रूके थे। ह्वेन सांग एवम फाह्यान ने अपने यात्रा बृतांत में यहां का वर्णन किया है। शिव पुराण देवीपुराण स्कंद पुराण पद्मपुराण बाल्मीकि रामायण समेत ढेर सारे ग्रन्थों में कामेश्वर धाम का वर्णन मिलता है।
महर्षि वाल्मीकि गर्ग पराशर अरण्य गालव भृगु वशिष्ठ अत्रि गौतम आरूणी आदि ब्रह्म वेत्ता ऋषि मुनियों से सेवित इस पावन तीर्थ का दर्शन स्पर्श करने वाले नर नारी स्वयं नारायण हो जाते है। मन्दिर के ब्यवस्थापक रमाशंकर दास के देख रेख में करोणो रूपये खर्च कर धाम का सुन्दरीकरण किया गया है। शिव रात्रि के अवसर पर और सावन में लाखो लोग यहा आकर बाबा कामेश्वर नाथ का दर्शन पूजन करते है।शिवरात्रि के दिन यहां पर बिशाल मेले का आयोजन किया जाता है।
Advertisements

Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s