Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक साधु हुआ।


एक साधु हुआ।
वह जीवनभर इतना प्रसन्न था कि लोग हैरान थे।
लोगों ने कभी उसे उदास नहीं देखा,
कभी पीड़ित नहीं देखा।

उसके मरने का वक्त
आया और उसने कहा कि
‘अब मैं तीन दिन बाद मर जाऊंगा।
और यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि तुम्हें
स्मरण रहे कि जो आदमी जीवन भर हंसता था,

उसकी कब्र पर कोई रोए नहीं।
यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि जब मैं मर जाऊं,
तो इस झोपड़े पर कोई उदासी न आए।
यहां हमेशा आनंद था, यहां हमेशा खुशी थी।
इसलिए मेरी मौत को एक उत्सव बनाना।
मेरी मौत को दुख मत बनाना,
मेरी मौत को एक उत्सव बनाना।’

लोग तो दुखी हुए, बहुत दुखी हुए।
वह तो अदभुत आदमी था।
और जितना अदभुत आदमी हो,
उतना उसके मरने का दुख घना था।
और उसको प्रेम करने वाले बहुत थे,
वे सब तीन दिन से इकट्ठे होने शुरू हो गए।
वह मरते वक्त तक लोगों को हंसा रहा था
और अदभुत बातें कह रहा था और
उनसे प्रेम की बातें कर रहा था।

सुबह मरने के पहले उसने एक गीत गाया।
और गीत गाने के बाद उसने कहा,
‘स्मरण रहे, मेरे कपड़े मत उतारना।
मेरी चिता पर मेरे पूरे शरीर को चढ़ा
देना कपड़ों सहित। मुझे नहलाना मत।’

उसने कहा था, आदेश था। वह मर गया।
उसे कपड़े सहित चिता पर चढ़ा दिया।
वह जब कपड़े सहित चिता पर रखा गया,
लोग उदास खड़े थे, लेकिन देखकर हैरान हुए।
उसके कपड़ों में उसने फुलझड़ी
और फटाखे छिपा रखे थे।

वे चिता पर चढ़े और फुलझड़ी
और फटाखे छूटने शुरू हो गए।
और चिता उत्सव बन गयी।
और लोग हंसने लगे।
और उन्होंने कहा,
‘जिसने जिंदगी में हंसाया,
वह मौत में भी हमको हंसाकर गया है।’

जिंदगी को हंसना बनाना है।
जिंदगी को एक खुशी और
मौत को भी एक खुशी।

और जो आदमी ऐसा
करने में सफल हो जाता है,
उसे बड़ी धन्यता मिलती है
और बड़ी कृतार्थता उपलब्ध होती है।
और उस भूमिका में जब कोई
साधना में प्रवेश करता है,

तो गति वैसी होती है,
जिसकी हम कल्पना
भी नहीं कर सकते।
तीर की तरह विकास होता है।

💐💐💐💐💐ओशो 💐💐💐💐💐 !!!!!

!!!!!ध्यान-सूत्र !!!!!, (प्रवचन ५,)

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बुद्ध के जीवन में उल्लेख है अंगुलीमाल का।


बुद्ध के जीवन में उल्लेख है अंगुलीमाल का। एक आदमी जो नाराज हो गया सम्राट से और उसने घोषणा कर दी कि वह एक हजार आदमियों की गर्दन काटकर उनकी अंगुलियों की माला बनाकर पहनेगा। उसका नाम ही अंगुलमाल हो गया। उसका असली नाम ही भूल गया। उसने लोगों को मारना शुरू कर दिया। वह बड़ा मजबूत आदमी था, खूंखार आदमी था। वह राजधानी के बाहर ही एक पहाड़ी पर अड्डा जमाकर बैठ गया। जो वहां से गुजरता उसको काट देता, उसकी अंगुलियों की माला बना लेता। वह रास्ता चलना बंद हो गया। औरों की तो बात छोड़ो राजा के सैनिक और सिपाही भी उस रास्ते से जाने को राजी नहीं थे। राजा खुद थर—थर कांपता था।

नौ सौ निन्यानबे आदमी उसने मार डाले, वह हजारवें की तलाश कर रहा था। उसकी मां भर उसको मिलने जाती थी, अब तो वह भी डरने लगी। लोगों ने उससे पूछा कि अब तू नहीं जाती अंगुलीमाल को मिलने? उसने कहा: अब खतरा है; अब उसको एक की ही कमी है। अब वह किसी को भी मार सकता है। वह मुझे भी मार सकता है। वह बिलकुल अंधा है। उसको हजार पूरे करने ही हैं। पिछली बार उसकी आंखों में मैंने जो देखा तो मुझे लगा अब यहां आना खतरे से खाली नहीं है। पिछली बार मैंने उसकी आंखों में शुद्ध पशुता देखी। अब मेरी जाने की हिम्मत नहीं पड़ती।

और तभी बुद्ध का आगमन हुआ उस राजधानी में और वे उसी रास्ते से गुजरने वाले थे, लोगों ने रोका कि वहां न जाएं क्योंकि वहां अंगुलीमाल है। आपने सुना होगा, वह हजार आदमियों की गर्दन काटने की कसम खा चुका है। नौ सौ निन्यानबे मार डाले उसने, एक की ही कमी है। उसकी मां तक डरती है। तो वह आपको भी छोड़ेगा नहीं। उसको क्या लेना बुद्ध से और गैर—बुद्ध से।

बुद्ध ने कहा: अगर मुझे पता न होता तो शायद मैं दूसरे रास्ते से भी चला गया होता लेकिन अब जब तुमने मुझे कह ही दिया कि वह ही आदमी की प्रतीक्षा में बैठा है… उसका भी तो कुछ ख्याल करना पड़ेगा। कितना परेशान होगा। जब उसकी मां भी नहीं जा रही और रास्ता बंद हो गया है तो उसकी प्रतिज्ञा का क्या होगा? मुझे जाना ही होगा। और फिर इस आदमी की सम्भावना अनंत है। जिसमें इतना क्रोध है, इतनी प्रज्वलित अग्नि है; जिसमें इतना साहस है, इतना अदम्य साहस है कि सम्राट के सामने, राजधानी के किनारे बैठकर नौ सौ निन्यानबे आदमी मार चुका है और सम्राट बाल बांका नहीं कर सके। वह आदमी साधारण नहीं है, उसके भीतर अपूर्व ऊर्जा है, उसके भीतर बुद्ध होने की सम्भावना है।

बुद्ध के शिष्य भी उस दिन बहुत घबड़ाये हुए थे। रोज तो साथ चलते थे, साथ ही क्यों चलते थे प्रत्येक में होड़ होती थी कि कौन बिलकुल करीब चले, कौन बिलकुल बायें—दायें चले। मगर उस दिन हालत और हो गयी, लोग पीछे—पीछे सरकने लगे। और जैसे—जैसे अंगुलीमाल की पहाड़ी दिखाई शुरू हुई कि शिष्यों और बुद्ध के बीच फलाँगों का फासला हो गया। शिष्य ऐसे घसटने लगे जैसे उनके प्राणों में प्राण ही नहीं रहे, श्वासों में श्वास नहीं रही, पैरों में जाने नहीं रही।

बुद्ध अकेले ही पहुंचे। अंगुलीमाल तो बहुत प्रसन्न हुआ कि कोई आ रहा है। लेकिन जैसे—जैसे बुद्ध करीब आये, बुद्ध की आभा करीब आयी…गुरु—परताप साध की संगति…वह सद्गुरु की आभा करीब आयी वैसे—वैसे अंगुलीमाल के मन में एक चमत्कृत कर देने वाला भाव उठने लगा कि नहीं इस आदमी को नहीं मारना। अंगुलीमाल चौंका; ऐसा उसे कभी नहीं हुआ था। उसने गौर से देखा, देखा भिक्षु है, पीत वस्त्रों में। सुंदर है, अद्वितीय है। उसके चलने में भी एक प्रसाद है। नहीं—नहीं, इसको नहीं मारना। मगर अंगुलीमाल का पशु भी बल मारा। उसने कहा: ऐसे छोड़ते चलोगे तो हजार कैसे पूरे होंगे? द्वंद्व उठा भारी, चिंता उठी भारी—क्या करूं, क्या न करूं? मगर जैसे बुद्ध करीब आने लगे, वैसे अंगुलीमाल की अंतरात्मा से एक आवाज उठने लगी कि नहीं—नहीं, यह आदमी मारने योग्य नहीं है। यह आदमी सत्संग करने योग्य है। यह आदमी पास बैठने योग्य है।

तुम अंगुलीमाल की मुसीबत समझ सकते हो। एक तो उसका व्रत, उसकी प्रतिज्ञा, और एक इस आदमी का आना जिसको देखकर उसके भीतर अपूर्व प्रेम उठने लगा, प्रीति उठने लगी। द्वंद्व तो हुआ होगा वीणा, बहुत द्वंद्व हुआ होगा, महाद्वंद्व हुआ होगा, तुमुलनाद छिड़ गया होगा, महाभारत छिड़ गया होगा उसके भीतर। एक उसके जीवन—भर की आदत, संस्कार और यह एक बिलकुल नयी बात, एक नयी किरण, एक नया फूल खिला, जहां कभी फूल नहीं खिले थे।

जैसे बुद्ध करीब आने लगे कि वह चिल्लाया कि बस रुक जाओ, भिक्षु वहीं रुक जाओ। शायद तुम्हें पता नहीं कि मैं अंगुलीमाल हूं, मैं सचेत कर दूं। मैं आदमी खतरनाक हूं, देखते हो मेरे गले में यह माला, यह नौ सौ निन्यानबे आदमियों की अंगुलियों की माला है! देखते हो मेरा वृक्ष जिसमें मैंने नौ सौ निन्यानबे आदमियों की खोपड़ियां टांग रखी हैं? सिर्फ एक की कमी है, मेरी मां ने भी आना बंद कर दिया है। मैं अपनी मां को भी नहीं छोड़ूंगा, अगर वह आएगी तो उसकी गर्दन काट लूंगा मगर मेरी हजार की प्रतिज्ञा मुझे पूरी करनी है, मैं क्षत्रियों हूं।

बुद्ध ने कहा: क्षत्रिय मैं भी हूं। और तुम अगर मार सकते हो तो मैं मर सकता हूं। देखें कौन जीतता है!

ऐसा आदमी अंगुलीमाल ने नहीं देखा था। उसने दो तरह के आदमी देखे थे। एक—जो उसे देखते ही भाग खड़े होते थे, पूंछ दबाकर और एकदम निकल भागते थे; दूसरे—जो उसे देखते ही तलावार तलवार निकाल लेते थे। यह एक तीसरे ही तरह का आदमी था। न इसके पास तलवार है, न यह भाग रहा है। करीब आने लगा। अंगुलीमाल का दिल थरथराने लगा। उसने कहा कि देखो भिक्षु, मैं फिर से कहता हूं रुक जाओ, एक कदम और आगे बढ़े कि मेरा यह फरसा तुम्हें दो टुकड़े कर देगा।

बुद्ध ने कहा: अंगुलीमाल, मुझे रुके तो वर्षों हो गये, अब तू रुक।

अंगुलीमाल ने तो अपना हाथ सिर से मार लिया। उसने कहा: तुम पागल भी मालूम होते हो। मुझ बैठे हुए को कहते हो तू रुक, और अपने को, खुद चलते हुए को, कहते हो मुझे वर्षों हो गये रुके हुए!

बुद्ध ने कहा: शरीर का चलना कोई चलना नहीं, मन का चलना चलना है। मेरा मन चलता नहीं। मन की गति खो गयी है। वासना खो गयी है। मांग खो गयी है। कोई ईच्छा नहीं बची। कोई विचार नहीं रहा है। मन के भीतर कोई तरंगें नहीं उठतीं। इसलिए मैं कहता हूं कि अंगुलीमाल मुझे रुके वर्षों हो गये, अब तू भी रुक।

और कोई बात चोट कर गयी तीर की तरह अंगुलीमाल के भीतर। बुद्ध करीब आये, अंगुलीमाल बड़ी दुविधा में पड़ा करे क्या! मारे बुद्ध को कि न मारे बुद्ध को?

बुद्ध ने कहा: तू चिंता में न पड़, संदेह में न पड़ दुविधा में न पड़; मैं तुझे परेशानी में डालने नहीं आया। तू मुझे मार, तू अपनी हजार की प्रतिज्ञा पूरी कर ले। मुझे तो मरना ही होगा—आज नहीं कल, कल नहीं परसों। आज तू मार लेगा तो तेरी प्रतिज्ञा पूरी हो जाएगी, तेरे काम आ जाऊंगा। और फिर कल तो मरूंगा ही। मरना तो है ही। किसी की प्रतिज्ञा पूरी नहीं होगी, किसी के काम नहीं आऊंगा। जिंदगी काम आ गयी, मौत भी काम आ गयी; इससे ज्यादा शुभ और क्या हो सकता है! तू उठा अपना फरसा, मगर सिर्फ एक शर्त।

अंगुलीमाल ने कहा: वह क्या शर्त?

बुद्ध ने कहा: पहले तू यह वृक्ष से एक शाखा तोड़ कर मुझे दे दे। अंगुलीमाल ने फरसा उठाकर वृक्ष से एक शाखा काट दी। बुद्ध ने कहा: बस, आधी शर्त पूरी हो गयी, आधी और पूरी कर दे—इसे वापिस जोड़ दे।

अंगुलीमाल ने कहा: तुम निश्चित पागल हो। तुम अद्भुत पागल हो। तुम परमहंस हो मगर पागल हो। टूटी शाखा को कैसे मैं जोड़ सकता हूं

तो बुद्ध ने कहा: तोड़ना तो बच्चे भी कर सकते हैं, जोड़ने में कुछ कला है। अब तू मेरी गर्दन काट मगर गर्दन जोड़ सकेगा एकाध की? नौ सौ निन्यानबे गर्दनें काटीं, एकाध जोड़ सका? काटने में क्या रखा है अंगुलीमाल, यह तो कोई भी कर दे, कोई भी पागल कर दे। मेरे साथ आ, मैं तुझे जोड़ना सिखाऊं। मौत में क्या रखा है, मैं तुझे जिंदगी सिखाऊं। देह में क्या रखा है, मैं तुझे आत्मा सिखाऊं। ये छोटी—मोटी प्रतिज्ञाओं में, अहंकारों में क्या रखा है, मैं तुझे महा प्रतिज्ञा का पूरा होना सिखाऊं। मैं तुझे बनाऊं। मैं आया ही इसलिए हूं कि या तो तू मुझे मारेगा या मैं तुझे मारूंगा। निर्णय होना है, या तो तू मुझे मार या मैं तुझे मारूं।

वीणा, यही मैं तुझसे कहता हूं। मेरे पास जो आये हैं, निर्णय होना है: या तो मैं उन्हें समाप्त करूंगा या वे मुझे समाप्त करेंगे। इस से कम में कुछ हल होने वाला नहीं है। और मुझे समाप्त वे नहीं कर सकेंगे, क्योंकि समाप्त हुए को क्या समाप्त करोगे!

अंगुलीमाल बुद्ध पर हाथ नहीं उठा सका। उसका फरसा गिर गया। वह बुद्ध के चरणों में गिर गया। उसने कहा: मुझे दीक्षा दें। आदमी मैंने बहुत देखे मगर तुम जैसा आदमी नहीं देखा। मुझे दीक्षा दें। बुद्ध ने उसे तत्क्षण दीक्षा दी। और कहा आज से तेरा व्रत हुआ—करुणा। उसने कहा: आप भी मजाक करते हैं, मुझ क्रोधी को करुणा! बुद्ध ने कहा: तुझ जैसा क्रोधी जितना बड़ा करुणावान हो सकता है उतना कोई और नहीं।

गांव भर में खबर फैल गयी, दूर—दूर तक खबरें उड़ गयीं कि अंगुलीमाल भिक्षु हो गया है। खुद सम्राट प्रसेनजित, बुद्ध के दर्शन को तो नहीं आया था लेकिन यह देखने आया कि अंगुलीमाल भिक्षु हो गया है तो बुद्ध के दर्शन भी कर आऊं और अंगुलीमाल को भी देख आऊं कि यह आदमी है कैसा, जिसने थर्रा रखा था राज्य को! उसने बुद्ध के चरण छुए और उसने फिर बुद्ध को पूछा कि मैंने सुना है भन्ते कि वह दुष्ट अंगुलीमाल, वह महाहत्यारा अंगुलीमाल, आपका भिक्षु हो गया, मुझे भरोसा नहीं आता। वह आदमी और संन्यासी हो जाए, मुझे भरोसा नहीं आता।

बुद्ध ने कहा: भरोसा, नहीं भरोसे का सवाल नहीं। यह मेरे दायें हाथ जो व्यक्ति बैठा है जानते हो यह कौन है? अंगुलीमाल है। अंगुलीमाल पीत वस्त्रों में बुद्ध के दायें हाथ पर बैठा था। जैसे ही बुद्ध ने यह कहा कि अंगुलीमाल है, प्रसेनजित ने अपनी तलवार निकाल ली घबड़ाहट के कारण।

बुद्ध ने कहा: अब तलवार भीतर रखों; यह वह अंगुलीमाल नहीं जिससे तुम परिचित हो, तलवार की कोई जरूरत नहीं है। तुम घबड़ाओ मत, कंपो मत, डरो मत; अब यह चींटी भी नहीं मारेगा; इसने करुणा का व्रत लिया है।

और जब पहले दिन अंगुलीमाल भिक्षा मांगने गया गांव में तो जैसे लोग सदा से रहे हैं—छोटे, ओछे, निम्न; जैसी भीड़ सदा से रही है—मूढ़, जो अंगुलीमाल से थर—थर कांपते थे उन सबने अपने द्वार बंद कर लिए, उसे कोई भिक्षा देने को तैयार नहीं। नहीं इतना, लोगों ने अपनी छतों पर, छप्परों पर पत्थरों पर पत्थरों के ढेर लगा लिए और वहां से पत्थर मारे अंगुलीमाल को। इतने पत्थर मारे कि यह राजपथ पर लहूलुहान होकर गिर पड़ा लेकिन उसके मुंह से एक बद्दुआ न निकली।

बुद्ध पहुंचे, लहूलुहान अंगुलीमाल के माथे पर उन्होंने हाथ रखा। अंगुलीमाल ने आंख खोली और बुद्ध ने कहा: अंगुलीमाल लोग तुझे पत्थर मारते थे, तेरे सिर से खून बहता था, तेरे हाथ—पैर में चोट लगती थी, तेरे मन को क्या हुआ?

अंगुलीमाल ने कहा: आपके पास जाकर मन नहीं बचा। मैं देखता रहा साक्षीभाव से। जैसा आपने कहा था हर चीज साक्षीभाव से देखना, मैं देखता रहा साक्षीभाव से।

बुद्ध ने उसे गले लगाया और कहा: ब्राह्मण अंगुलीमाल, अब से तू क्षत्रिय न रहा, ब्राह्मण हुआ। ऐसों को ही मैं ब्राह्मण कहता हूं। अब तेरा ब्रह्म—कुल में जन्म हुआ। अब तूने ब्रह्म को जाना।

मेरे पास तुम आओगे तो पहले तो समस्याएं उठेंगी, दुविधाएं उठेंगी, चिंताएं उठेंगी, द्वंद्व उठेंगे। और यह द्वंद्व बिलकुल स्वाभाविक है कि आपके पास आकर मुझे समाधान मिलेगा या नहीं! यह तो जल पीओ तो ही पता चले। जल बिना पिये कैसे पता चलेगा कि प्यास बुझेगी या नहीं! और दीया जलाये बिना कैसे पता चलेगा कि अंधेरा मिटेगा या नहीं! कोई उपाय नहीं है। एक ही उपाय है अनुभव।

वीणा, अपने को स्वीकार करो। मेरा संन्यास स्वीकार का संन्यास है—इसमें त्याग नहीं है, इसमें पलायन नहीं है, इसमें भगोड़ापन नहीं है, इसमें जीवन को अंगीकार करना है क्योंकि जीवन परमात्मा की देन है, इसमें से कुछ भी निषेध नहीं करना है। हां, रूपान्तरित करना है बहुत, मगर काटना कुछ भी नहीं है, एक पत्ता भी नहीं काटकर गिराना है। इसके पत्ते—पत्ते पर राम लिखा है। इसके पत्ते—पत्ते पर उसके हस्ताक्षर हैं। इस पूरे के पूरे जीवन को ही उसके चरणों के योग्य बनाना है। न कहीं भागना, न कहीं जाना है—यहीं, जहां हो वहीं, जैसे हो वैसे ही तुम्हें परमात्मा के योग्य बनाने की कला मैं सिखाऊंगा।

-ओशो
गुरू प्रताप साध की संगति–

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संकल्प का क्या अर्थ है?*


संकल्प का क्या अर्थ है?*

एक व्यक्ति ने किसी फकीर से पूछा कि प्रभु को पाने का मार्ग क्या है? उस फकीर ने उसकी आंखों में झांका। वहां प्यास थी। वह फकीर नदी जाता था। उसने उस व्यक्ति को भी कहा’ मेरे पीछे आओ। हम स्नान कर लें, फिर बताऊंगा।’ वे स्नान करने नदी में उतरे।

वह व्यक्ति जैसे ही पानी में डूबा, फकीर ने उसके सिर को जोर से पानी में ही दबा कर पकड़ लिया। वह व्यक्ति छटपटाने लगा। वह अपने को फकीर की दबोच से मुक्त करने में लग गया। उसके प्राण संकट में थे। वह फकीर से बहुत कमजोर था, पर क्रमश: उसकी प्रसुप्त शक्ति जागने लगी।

फकीर को उसे दबाए रखना असंभव हो गया। वह पूरी शक्ति से बाहर आने में लगा था और अंततः वह पानी के बाहर आ गया। वह हैरान था! फकीर के इस व्यवहार को समझ पाना उसे संभव नहीं हो रहा था। क्या फकीर पागल था? और फकीर जोर से हंस भी रहा था।

उस व्यक्ति के स्वस्थ होते ही फकीर ने पूछा :’ मित्र, जब तुम पानी के भीतर थे, तो कितनी आकांक्षाएं थीं? वह बोला’ आकांक्षाएं? आकांक्षाएं नहीं, बस एक ही आकांक्षा थी कि एक श्वास, हवा कैसे मिल जाए?’ वह फकीर बोला.’ प्रभु को पाने का रहस्य—सूत्र, सीक्रेट यही है। यही संकल्प है। संकल्प ने तुम्हारी सब सोई शक्तियां जगा दीं। संकल्प के उस क्षण में ही शक्ति पैदा होती है और व्यक्ति संसार से सत्य में संक्रमण करता है।

संकल्प से ही संसार से सत्य में संक्रमण होता और संकल्प से ही स्वप्न से सत्य में जागरण होता है। विदा के इन क्षणों में मैं यह स्मरण दिलाना चाहता हूं।

संकल्प चाहिए। और क्या चाहिए? और चाहिए साधना सातत्य। साधना सतत होनी चाहिए। पहाड़ों से जल को गिरते देखा है? सतत गिरते हुए जल के झरने चट्टानों को तोड़ देते हैं।

व्यक्ति यदि अज्ञान की चट्टानों को तोड्ने में लगा ही रहे तो जो चट्टानें प्रारंभ में बिलकुल राह देती नहीं मालूम होती हैं, वे ही एक दिन रेत हो जाती हैं, और राह मिल जाती है।

राह मिलती तो निश्चित है, पर वह बनी बनाई नहीं मिलती है। उसे स्वयं ही, अपने ही श्रम से बनाना होता है। और यह मनुष्य का कितना सम्मान है! यह कितना महिमापूर्ण है कि सत्य को हम स्वयं अपने ही श्रम से पाते हैं!

साधनापथ

ओशो

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एक संत था, बहुत वृद्ध और बहुत प्रसिद्ध।


एक संत था, बहुत वृद्ध और बहुत प्रसिद्ध।
दूर—दूर से लोग जिज्ञासा लेकर आते, लेकिन वह सदा चुप ही रहता। हा, कभी—कभी अपने डंडे से वह रेत पर जरूर कुछ लिख देता था। कोई बहुत पूछता, कोई बहुत ही जिज्ञासा उठाता, तो लिख देता—संतोषी सुखी; भागो मत, जागो; सोच मत, खो; मिट और पा, इस तरह के छोटे —छोटे वचन। जिज्ञासुओं को इससे तृप्ति न होती, और प्यास बढ जाती। वे शास्त्रीय निर्वचन चाहते थे। वे विस्तारपूर्ण उत्तर चाहते थे। और उनकी समझ में न आता था कि यह परम संत बुद्धत्व को उपलब्ध होकर भी उनके प्रश्नों का उत्तर सीधे —सीधे क्यों नहीं देता। यह भी क्या बात है कि रेत पर डंडे से उलटबासिया लिखना! हम पूछते हैं, सीधा—सीधा समझा दो। वे चाहते थे कि जैसे और महात्मा जप —तप, यज्ञ —याश, मंत्र —तंत्र, विधि —विधान देते थे, वह भी दे। लेकिन वह मुस्काता, चुप रहता, ज्यादा से ज्यादा फिर कोई उसे खोदता—बिदीरता तो वह फिर लिख देता—संतोषी सदा सुखी, भागो मत, जागो, बस उसके बंधे —बंधाये शब्द थे। बड़े —बड़े पंडित आए और थक गये और हार गये और उदास होकर चले गये, कोई उसे बोलने को राजी न कर सका। कोई उसे ज्यादा विस्तार में जाने को भी राजी न कर सका।लेकिन एक दिन ऐसा हुआ, एक युवक आया और बजाय इसके कि वह कुछ पूछे, उसने के के हाथ से डंडा छीन लिया। उसकी आंखों में कुतूहल भी नहीं था, उसके चेहरे पर जिज्ञासा भी नहीं थी, उसके सिर पर पांडित्य का बोझ भी नहीं था, वह बड़ा भोला— भाला युवक था, बड़ा शात। एक गहरी मुमुक्षा थी। जीवन को दाव पर लगाने की आकांक्षा थी। खोजी था।
उसने डंडा हाथ में ले लिया और उसने भी मौन का व्रत लिया था, वह मौन ही रहता था, उसने डंडे से रेत पर लिखा—आपकी ज्योति मेरे अंधेरे को कैसे दूर करेगी? उसने रेत पर लिखा। संत ने उत्तर में रेत पर लिखा—कैसा अंधेरा, अंधेरा है कहां? क्या तुम अंधेरे में खोए हो? यह पहला मौका था कि संत ने इतनी बात लिखी। भीड़ इकट्ठी हो गयी पृ गांव भर में खबर पहुंच गयी कि कोई आदमी आया है जिसने सोए संत को जगा लिया मालूम होता है। उसने कुछ लिखा है जैसा कभी नहीं लिखा था। उसने लिखा है, कैसा अंधेरा? अंधेरा है कहां? क्या तुम अंधेरे में खोए हो? वह युवक थोड़ा ठिठका और उसने फिर लिखा—क्या खो जाना वस्तुत: खो जाना है? क्या खो जाना मार्ग से वस्तुत: स्मृत हो जाना है? संत ने युवक की आंखों में झांका, अनंत प्रेम और करुणा और आशीष से और फिर रेत पर लिखा—नहीं, खो जाना भी खो जाना नहीं, बस विस्मृतिमात्र। याद भर खो गयी है और कुछ खो नहीं गया है। खो जाना भी खो जाना नहीं है, बस विस्मृति।
अब तक तो दर्शकों की बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी। यह उत्तर पढ़ कर भीड़ में हंसी का फव्वारा फूट पड़ा। और संत ने जो लिखा था उसे तब्धण पोंछ डाला और पुन: लिखा—कौन सी इच्छा तुम्हें यहां ले आयी है, युवक? डंडा सतत हाथ बदलता रहा। युवक ने लिखा—इच्छा? इच्छाएं? नहीं मेरी कोई इच्छा शेष नहीं है। ऐसा सुनते ही संत उठकर खड़ा हो गया, दायां पैर उठाकर भूमि पर तीन बार थाप दी, फिर आंखें कंद करके सांस को रोककर मूर्तिवत खड़ा हो गया। सन्नाटा छा गया। भीड़ भी ग्रतइrवत हो गयी, युवक भी कुछ समझा नहीं, इस पर युवक भूल गया कि उसने मौन का व्रत लिया है और बोल उठा. यह आपने क्या किया और क्यों किया? संत हंसा’ और उसने पुन: रेत पर लिखा—कुतूहल इच्छा का ही एक रूप है। इस पर युवक चाख उठा मैंने सुना है कि एक ऐसा महामंत्र है जिसके उच्चार मात्र से व्यक्ति विश्व के साथ एक हो जाता है, ब्रह्म के साथ एक हो जाता है, मैं उसी मंत्र की खोज में आया हूं। ज्यादा मुझे कहना नहीं। और मुझे पता है कि वह मंत्र आपके पास है—मैं देख रहा हूं, उसकी ध्वनि मुझे सुनायी पड़ रही है।
संत ने शीघ्रता से लिखा—तत्वमसि। वह तू ही है। वह मंत्र तू ही है। और क्या तू एक क्षण को भी ब्रह्म से भिन्न हुआ है? और तब उस के संत ने अचानक डंडा उठाया और उस युवक के सिर पर दे मारा। युवक की आंखों के सामने तारे घूम गये। लेकिन वह किसी अनिर्वचनीय समाधि में भी डूब गया। उसकी आंखों से अविरल आनंद के आंसू बहने लगे। पल पर पल बीते, घडियां बीती, दिन
बीता, दिन बीते, वह युवक अपूर्व आनंद में डूबा रहा तो डूबा ही रहा।
और तब तीसरे दिन के संत ने न—मालूम किस अनिर्वचनीय क्षण में भूल गया कि मौन का व्रत लिया है, मौन टूट गया के संत का और उसने कहा. सो अंततः तुम घर वापिस आ ही गये! सो अंततः तुम घर वापिस आ ही गये? पर युवक बोला नहीं और बिना बोले ही अनंत कृतज्ञता से के की आंखों में देखता रहा और तब उसने डंडा उठाकर रेत पर लिखा —केवल स्मृति लौट आयी, कौन गया था, कौन लौटा? सिर्फ स्मृति लौट आयी।

ओशो

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मैं एक घर के करीब से गुज़र रहा था की अचानक से मुझे उस घर के अंदर से एक बच्चे की रोने की आवाज़ आई।


मैं एक घर के करीब से गुज़र रहा था की अचानक से मुझे उस घर के अंदर से एक बच्चे की रोने की आवाज़ आई। उस बच्चे की आवाज़ में इतना दर्द था कि अंदर जा कर वह बच्चा क्यों रो रहा है, यह मालूम करने से मैं खुद को रोक ना सका।

अंदर जा कर मैने देखा कि एक माँ अपने दस साल के बेटे को आहिस्ता से मारती और बच्चे के साथ खुद भी रोने लगती। मैने आगे हो कर पूछा बहनजी आप इस छोटे से बच्चे को क्यों मार रही हो? जब कि आप खुद भी रोती हो।

उस ने जवाब दिया भाई साहब इस के पिताजी भगवान को प्यारे हो गए हैं और हम लोग बहुत ही गरीब हैं, उन के जाने के बाद मैं लोगों के घरों में काम करके घर और इस की पढ़ाई का खर्च बामुश्किल उठाती हूँ और यह कमबख्त स्कूल रोज़ाना देर से जाता है और रोज़ाना घर देर से आता है।

जाते हुए रास्ते मे कहीं खेल कूद में लग जाता है और पढ़ाई की तरफ ज़रा भी ध्यान नहीं देता है जिस की वजह से रोज़ाना अपनी स्कूल की वर्दी गन्दी कर लेता है। मैने बच्चे और उसकी माँ को जैसे तैसे थोड़ा समझाया और चल दिया।

इस घटना को कुछ दिन ही बीते थे की एक दिन सुबह सुबह कुछ काम से मैं सब्जी मंडी गया। तो अचानक मेरी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना घर से मार खाता था। मैं क्या देखता हूँ कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और जो दुकानदार अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो उन से कोई सब्ज़ी ज़मीन पर गिर जाती थी वह बच्चा उसे फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता।

मैं यह नज़ारा देख कर परेशानी में सोच रहा था कि ये चक्कर क्या है, मैं उस बच्चे का चोरी चोरी पीछा करने लगा। जब उस की झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह सड़क के किनारे बैठ कर उसे ऊंची ऊंची आवाज़ें लगा कर वह सब्जी बेचने लगा। मुंह पर मिट्टी गन्दी वर्दी और आंखों में नमी, ऐसा महसूस हो रहा था कि ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में पहली बार देख रहा हूँ ।

अचानक एक आदमी अपनी दुकान से उठा जिस की दुकान के सामने उस बच्चे ने अपनी नन्ही सी दुकान लगाई थी, उसने आते ही एक जोरदार लात मार कर उस नन्ही दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाज़ुओं से पकड़ कर उस बच्चे को भी उठा कर धक्का दे दिया।

वह बच्चा आंखों में आंसू लिए चुप चाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा करने लगा और थोड़ी देर बाद अपनी सब्ज़ी एक दूसरे दुकान के सामने डरते डरते लगा ली। भला हो उस शख्स का जिस की दुकान के सामने इस बार उसने अपनी नन्ही दुकान लगाई उस शख्स ने बच्चे को कुछ नहीं कहा।

थोड़ी सी सब्ज़ी थी ऊपर से बाकी दुकानों से कम कीमत। जल्द ही बिक्री हो गयी, और वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाली दुकान में दाखिल हुआ और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे वापस स्कूल की और चल पड़ा। और मैं भी उस के पीछे पीछे चल रहा था।

बच्चे ने रास्ते में अपना मुंह धो कर स्कूल चल दिया। मै भी उस के पीछे स्कूल चला गया। जब वह बच्चा स्कूल गया तो एक घंटा लेट हो चुका था। जिस पर उस के टीचर ने डंडे से उसे खूब मारा। मैने जल्दी से जा कर टीचर को मना किया कि मासूम बच्चा है इसे मत मारो। टीचर कहने लगे कि यह रोज़ाना एक डेढ़ घण्टे लेट से ही आता है और मै रोज़ाना इसे सज़ा देता हूँ कि डर से स्कूल वक़्त पर आए और कई बार मै इस के घर पर भी खबर दे चुका हूँ।

खैर बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठ कर पढ़ने लगा। मैने उसके टीचर का मोबाइल नम्बर लिया और घर की तरफ चल दिया। घर पहुंच कर एहसास हुआ कि जिस काम के लिए सब्ज़ी मंडी गया था वह तो भूल ही गया। मासूम बच्चे ने घर आ कर माँ से एक बार फिर मार खाई। सारी रात मेरा सर चकराता रहा।

सुबह उठकर फौरन बच्चे के टीचर को कॉल की कि मंडी टाइम हर हालत में मंडी पहुंचें। और वो मान गए। सूरज निकला और बच्चे का स्कूल जाने का वक़्त हुआ और बच्चा घर से सीधा मंडी अपनी नन्ही दुकान का इंतेज़ाम करने निकला। मैने उसके घर जाकर उसकी माँ को कहा कि बहनजी आप मेरे साथ चलो मै आपको बताता हूँ, आप का बेटा स्कूल क्यों देर से जाता है।

वह फौरन मेरे साथ मुंह में यह कहते हुए चल पड़ीं कि आज इस लड़के की मेरे हाथों खैर नही। छोडूंगी नहीं उसे आज। मंडी में लड़के का टीचर भी आ चुका था। हम तीनों ने मंडी की तीन जगहों पर पोजीशन संभाल ली, और उस लड़के को छुप कर देखने लगे। आज भी उसे काफी लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े, और आखिरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल दिया।

अचानक मेरी नज़र उसकी माँ पर पड़ी तो क्या देखता हूँ कि वह बहुत ही दर्द भरी सिसकियां लेकर लगा तार रो रही थी, और मैने फौरन उस के टीचर की तरफ देखा तो बहुत शिद्दत से उसके आंसू बह रहे थे। दोनो के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्हों ने किसी मासूम पर बहुत ज़ुल्म किया हो और आज उन को अपनी गलती का एहसास हो रहा हो।

उसकी माँ रोते रोते घर चली गयी और टीचर भी सिसकियां लेते हुए स्कूल चला गया। बच्चे ने दुकानदार को पैसे दिए और आज उसको दुकानदार ने एक लेडी सूट देते हुए कहा कि बेटा आज सूट के सारे पैसे पूरे हो गए हैं। अपना सूट ले लो, बच्चे ने उस सूट को पकड़ कर स्कूल बैग में रखा और स्कूल चला गया।

आज भी वह एक घंटा देर से था, वह सीधा टीचर के पास गया और बैग डेस्क पर रख कर मार खाने के लिए अपनी पोजीशन संभाल ली और हाथ आगे बढ़ा दिए कि टीचर डंडे से उसे मार ले। टीचर कुर्सी से उठा और फौरन बच्चे को गले लगा कर इस क़दर ज़ोर से रोया कि मैं भी देख कर अपने आंसुओं पर क़ाबू ना रख सका।

मैने अपने आप को संभाला और आगे बढ़कर टीचर को चुप कराया और बच्चे से पूछा कि यह जो बैग में सूट है वह किस के लिए है। बच्चे ने रोते हुए जवाब दिया कि मेरी माँ अमीर लोगों के घरों में मजदूरी करने जाती है और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं कोई जिस्म को पूरी तरह से ढांपने वाला सूट नहीं और और मेरी माँ के पास पैसे नही हैं इस लिये अपने माँ के लिए यह सूट खरीदा है।

तो यह सूट अब घर ले जाकर माँ को आज दोगे? मैने बच्चे से सवाल पूछा। जवाब ने मेरे और उस बच्चे के टीचर के पैरों के नीचे से ज़मीन ही निकाल दी। बच्चे ने जवाब दिया नहीं अंकल छुट्टी के बाद मैं इसे दर्जी को सिलाई के लिए दे दूँगा। रोज़ाना स्कूल से जाने के बाद काम करके थोड़े थोड़े पैसे सिलाई के लिए दर्जी के पास जमा किये हैं।

टीचर और मैं सोच कर रोते जा रहे थे कि आखिर कब तक हमारे समाज में गरीबों और विधवाओं के साथ ऐसा होता रहेगा उन के बच्चे त्योहार की खुशियों में शामिल होने के लिए जलते रहेंगे आखिर कब तक।

क्या ऊपर वाले की खुशियों में इन जैसे गरीब विधवाओंं का कोई हक नहीं ? क्या हम अपनी खुशियों के मौके पर अपनी ख्वाहिशों में से थोड़े पैसे निकाल कर अपने समाज मे मौजूद गरीब और बेसहारों की मदद नहीं कर सकते।

आप सब भी ठंडे दिमाग से एक बार जरूर सोचना ! ! ! !

और हाँ अगर आँखें भर आईं हो तो छलक जाने देना संकोच मत करना..😢

यह प्रेरक बोध कथा

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मैंने सुना, एक सज्जन ने एक बार कव्वाली आयोजित करवायी।


मैंने सुना, एक सज्जन ने एक बार कव्वाली आयोजित करवायी। जो कव्वाल था, एक सूफी मस्त फकीर था। स्त्रियों के बैठने के लिए पर्दे के पीछे अलग प्रबंध था।उक्त महाशय की पत्नी और अन्य महिलाएं पर्दे के पीछे बैठी कव्वाली सुन रही थीं। कव्वाल तो फकीर था, मस्त फकीर था—वह अपनी मस्ती में आकर बार—बार एक ही मिसरे की रट लगाने लगा—पदें के पीछे कौन है। अरे, पर्दे के पीछे कौन है? इस नीले पर्दे के पीछे कौन है?अब वह तो आकाश की बात कर रहा है—नीला पर्दा—इस पर्दे के पीछे कौन है? और जो उसको परमात्मा की याद आ गयी तो धुन बंध गयी, वह कहने लगा—अरे, इस पर्दे के पीछे कौन है? नीले पर्दे के पीछेकौन है? संयोगवश वह पर्दा भी नीला था, जिसके पीछे स्त्रियां बैठी थीं।जब कव्वाल ने दस—बारह बार यही मिसरा दोहराया, तो वह महाशय बिगड़ पड़े जिन्होंने कव्वाली आयोजित करवायी थी, गरजकर बोले—अरे कमबख्त, तेरा ध्यान बस पर्दे के पीछे लगा हुआ है! तेरी मां—बहनेंहैं पर्दे के पीछे, और कौन है!अपनी—अपनी दृष्टि है।सूफी फकीर उस विराट पर्दे की बात कर रहा है जो आकाश है, और उसके पीछे कौन है उसकी बात कर रहा है। सूफी फकीर मस्ती की बात कर रहा है, भक्ति की बात कर रहा है।मगर इस आदमी को बेचैनी हो रही है। इसको न तो परमात्मा का कोई बोध है, न आकाश की कोई स्मृति है; न इस सूफी की मस्ती का कुछ अनुभव है। और जब यह ज्यादा मस्त होने लगा और जब ज्यादा दोहराने लगा तो उसकी बेचैनी बढ़ने लगी, उसने कहा—यह तो हद हो गयी, यह तो बदतमीज मालूम होता है।यह भी कोई बात उठाने की है कि पर्दे के पीछे कौन है! तेरी मां—बहनें हैं! तुम्हाराप्रीति का विषय क्या है, बस उतना ही तुम समझ पाओगे। तुम्हारी जो प्रीति की धारा है, जिस तरफ जा रही है, उतना ही तुम समझ पाओगे।इसलिए अक्सर ऐसा हो गया है कि भक्तों के वचनों को बहुत गलत समझा गया है। फ्रायड और उसके अनुयायीतो समझते हैं कि यह भक्तों की वाणी सब कामवासना का ही विक्षिप्त रूप है—पदें के पीछे कौन है?अरे! नीले पर्दे के पीछे कौन है? फ्रायड समझता है कि यह सब स्त्रियों की बातें हो रही हैं। तुम्हारी मां—बहनें हैं, और कौन है!तुम उतना ही समझ सकते हो जितनी तुम्हारी प्रीति है, जहां तुम्हारी प्रीति है। प्रीति को मुका करो। अगर पति—पत्नी वाली प्रीति है, तो थोड़ा वात्सल्य को जगाओ, थोड़ा स्नेह को जगाओ। अगर स्नेहजग गया है तो थोड़ी श्रद्धा जगाओ। अगर श्रद्धा जग गयी है, तो भक्ति में छलाग लगाओ।बंद शीशों के परे देख दरीचों के उधरसब्ज पेड़ों पे घनी शाखों पे फूलों पे वहांकैसे चुपचाप बरसताहै मुसल्सलपानीकितनी आवाजें हैं, ये लोग हैं, बातें हैं मगरजहन के पीछे किसी और हीसतह पे कहींजैसे चुपचाप बरसता है तसब्यूर तेरासब तरफ वही बरस रहा है—जैसे चुपचाप बरसता है तसब्यूर तेरा—देखने की आंख चाहिए। प्रीति को कामना से मुका करो—कामना के कारण हीदेखने की आंख नहीं मिलती; कामना अंधा बनाती है; कामना अंधीहै।अथातो भक्ति जिज्ञासा (भाग-1) प्रवचन–2 ओशो..

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एक बच्चे ने समंदर में अपना जूता खो दिया तो बिलकते हुवे बच्चे ने समंदर के साहिल पर लिख दिया…ये समंदर चोर है


एक बच्चे ने समंदर में अपना जूता खो दिया तो बिलकते हुवे बच्चे ने समंदर के साहिल पर लिख दिया…ये समंदर चोर है

कुछ ही फासले पर एक शिकारी ने जाल फेंका और बुहत सी मछलियों का शिकार किया तो ख़ुशी के आलम में इसने साहिल पर लिख दिया…ये समंदर दानवीर है.

नौजवान गोताखोर ने समंदर में गोता लगाया वो गोता उसका आखरी साबित हुआ किनारे पर बैठी ग़मज़दा माँ ने रेत पर टपकते हुवे आंसुओं के साथ लिख दिया ….ये समंदर क़ातिल है

एक बूढ़े शख्स को समंदर ने मोती का तोहफा दिया उसने ख़ुशी के जज़्बात के साथ लिख दिया…..ये समंदर करीम है,करामात इससे है और ये करामात की मिसाल है

फिर एक बड़ी लहेर आयी और इसने सबका लिखा मिटा दिया——-
~
लोगों की बातों पर सर मत धरो,हर शख्स वो कहता है जहाँ से वो देखता है,ख़ताओं और ग़लतियों को मिटा दो ताकि इंसानियत बाक़ी रहे !
———————-
भलाई और बुराई कभी बराबर नहीं होसकती, बुराई को भलाई से दूर करो

ओशो

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शास्त्रों से नहीं, केवल अनुभव से सत्य जाना जा सकता है


शास्त्रों से नहीं, केवल अनुभव से सत्य जाना जा सकता है ◆

मैंने सुना है,

एक अमरीकी निर्जन
रास्ते पर दो यात्री रुके। रुकना
पड़ा, क्योंकि सामने ही बड़ी तख्ती
लगी थी: ‘द रोड इज क्लोज्ड।’ रास्ता
बंद है। लेकिन तख्ती के पास से ही उन्होंने
देखा कि अभी – अभी गई गाड़ी के, कार के निशान
हैं। तो फिर उन्होंने तख्ती की फिक्र न की। फिर उन्होंने
उन निशानों का पीछा किया। वे आगे बढ़ गये। तीन मील बाद वह रास्ता टूट गया था, पुल गिर गया था, और उन्हें वापिस लौटने के सिवाय कोई उपाय न था। उनमें से एक ने दूसरे
को कहा, हमने तख्ती पर भरोसा क्यों नहीं किया?

दोनों
वापिस लौटे तो तख्ती की दूसरी तरफ नजर पड़ी,
जहां लिखा था, ‘अब भरोसा आया न कि रास्ता
बंद है?’

तुम्हारी जिंदगी भी
करीब – करीब ऐसी है।
तख्तियों पर सब लिखा है।
वे तख्तियां ही शास्त्र हैं। लेकिन
तुम उनकी न सुनोगे, जब तक तुम्हारा
अनुभव ही तुम्हें न बता दे कि वे सच हैं।
अनुभव के अतिरिक्त सच को जानने का कोई
उपाय भी नहीं है।

|| ओशो ||

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एक व्यक्ति का दिन बहुत खराब गया. उसने रात को ईश्वर से फ़रियाद की.


एक व्यक्ति का दिन बहुत खराब गया. उसने रात को ईश्वर से फ़रियाद की.
व्यक्ति ने कहा,
‘भगवान, ग़ुस्से न हों तो एक प्रश्न पूछूँ ?
भगवान ने कहा,
‘पूछ, जो पूछना हो पूछ;
व्यक्ति ने कहा,
‘भगवान, आपने आज मेरा पूरा दिन एकदम खराब क्यों किया ?
भगवान हँसे ……
पूछा, पर हुआ क्या ?
व्यक्ति ने कहा,
‘सुबह अलार्म नहीं बजा, मुझे उठने में देरी हो गई……’
भगवान ने कहा, अच्छा फिर…..’
व्यक्ति ने कहा,
देर हो रही थी,उसपर स्कूटर बिगड़ गया. मुश्किल से रिक्षा मीली .’
भगवान ने कहा, अच्छा फिर……’
व्यक्ति ने कहा,
टिफ़िन ले नहीं गया था, वहां केन्टीन बंध थी….एक सेन्डविच पर दिन निकाला, वो भी खराब थी ;
भगवान केवल हँसे…….
व्यक्ति ने फ़रियाद आगे चलाई , ‘मुझे काम का एक महत्व का फ़ोन आया था और फ़ोन बंध हो गया ;
भगवान ने पूछा…..’ अच्छा फिर….’
व्यक्ति ने कहा,
विचार किया कि जल्दी घर जाकर AC चलाकर सो जाऊं , पर घर पहुँचा तो लाईट गई थी .
भगवान…. सब तकलीफें मुझे ही. ऐसा क्यों किया मेरे साथ ?
भगवान ने कहा,
‘ देख , मेरी बात ध्यान से सुन .
आज तुझपर कोई आफ़त थी.
मेरे देवदूत को भेजकर मैंने रुकवाई . अलार्म बजे ही नहीं ऐसा किया . स्कूटर से एक्सीडेंट होने का डर था इसलिए स्कूटर बिगाड़ दिया . केन्टीन में खाने से फ़ूड पोइजन हो जाता .
फ़ोन पर बड़ी काम की बात करने वाला आदमी तुझे बड़े गोटाले में फँसा देता . इसलिए फ़ोन बंध कर दिया .
तेरे घर में आज शार्ट सर्किट से आग लगती, तू सोया रहता और तुझे ख़बर ही नहीं पड़ती . इसलिए लाईट बंध कर दी !
मैं हूं न …..,
मैंने से सब तुझे बचाने के लिए किया;
व्यक्ति ने कहा,
भगवान मुझसे भूल हो गई . मुझे माफ किजीए . आज के बाद फ़रियाद नहीं करूँगा ;
भगवान ने कहा,
माफी माँगने की ज़रूरत नहीं , परंतु विश्वास रखना कि मैं हूं न….,
मैं जो करूँगा , जो योजना बनाऊँगा वो तेरे अच्छे के लिए ही ।
जीवन में जो कुछ अच्छा – खराब होता है उसकी सही असर लम्बे वक़्त के बाद समझ में आती है.
मेरे कोई भी कार्य पर शंका न कर , श्रदा रख .
जीवन का भार अपने ऊपर लेकर घूमने के बदले मेरे कंधों पर रख दे .
मैं हूं न…..

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चश्मा- एक लघुकथा


चश्मा- एक लघुकथा

जल्दी -जल्दी घर के सारे काम निपटा, बेटे को स्कूल छोड़ते हुए ऑफिस जाने का सोच, घर से निकल ही रही थी कि…
फिर पिताजी की आवाज़ आ गई,

“बहू, ज़रा मेरा चश्मा तो साफ़ कर दो ।”

और बहू झल्लाती हुई….सॉल्वेंट ला, चश्मा साफ करने लगी। इसी चक्कर में आज फिर ऑफिस देर से पहुंची।

पति की सलाह पर अब वो सुबह उठते ही पिताजी का चश्मा साफ़ करके रख देती, लेकिन फिर भी घर से निकलते समय पिताजी का बहू को बुलाना बन्द नही हुआ।

समय से खींचातानी के चलते अब बहू ने पिताजी की पुकार को अनसुना करना शुरू कर दिया ।

आज ऑफिस की छुट्टी थी तो बहू ने सोचा –

घर की साफ- सफाई कर लूँ ।
अचानक,

पिताजी की डायरी हाथ लग गई । एक पन्ने पर लिखा था-
दिनांक 23/2/15 आज की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, घर से निकलते समय, बच्चे अक्सर बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं। बस इसीलिए, जब तुम चश्मा साफ कर मुझे देने के लिए झुकती तो मैं मन ही मन, अपना हाथ तुम्हारे सर पर रख देता । वैसे मेरा आशीष सदा तुम्हारे साथ है बेटा…।
⛈👁
आज पिताजी को गुजरे ठीक 2 साल बीत चुके हैं। अब मैं रोज घर से बाहर निकलते समय पिताजी का चश्मा साफ़ कर, उनके टेबल पर रख दिया करती हूँ। 😱उनके अनदेखे हाथ से मिले आशीष की लालसा में…..।💍
💦
जीवन में हम कुछ महसूस नहीं कर पाते और जब तक महसूस करते हैं तब तक वह हमसे बहुत दूर जा चुकी होती हैं ……