Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक पार्क मे दो बुजुर्ग बातें कर रहे थे


एक पार्क मे दो बुजुर्ग बातें कर रहे थे…. पहला :- मेरी एक पोती है, शादी के लायक है… BE किया है, नौकरी करती है, कद – 5″2 इंच है.. सुंदर है कोई लडका नजर मे हो तो बताइएगा.. दूसरा :- आपकी पोती को किस तरह का परिवार चाहिए…?? पहला :- कुछ खास नही.. बस लडका ME /M.TECH किया हो, अपना घर हो, कार हो, घर मे एसी हो, अपने बाग बगीचा हो, अच्छा job, अच्छी सैलरी, कोई लाख रू. तक हो… दूसरा :- और कुछ… पहला :- हाँ सबसे जरूरी बात.. अकेला होना चाहिए.. मां-बाप,भाई-बहन नही होने चाहिए.. वो क्या है लडाई झगड़े होते है… दूसरे बुजुर्ग की आँखें भर आई फिर आँसू पोछते हुए बोला – मेरे एक दोस्त का पोता है उसके भाई-बहन नही है, मां बाप एक दुर्घटना मे चल बसे, अच्छी नौकरी है, डेढ़ लाख सैलरी है, गाड़ी है बंगला है, नौकर-चाकर है.. पहला :- तो करवाओ ना रिश्ता पक्का.. दूसरा :- मगर उस लड़के की भी यही शर्त है की लडकी के भी मां-बाप,भाई-बहन या कोई रिश्तेदार ना हो… कहते कहते उनका गला भर आया.. फिर बोले :- अगर आपका परिवार आत्महत्या कर ले तो बात बन सकती है.. आपकी पोती की शादी उससे हो जाएगी और वो बहुत सुखी रहेगी…. पहला :- ये क्या बकवास है, हमारा परिवार क्यों करे आत्महत्या.. कल को उसकी खुशियों मे, दुःख मे कौन उसके साथ व उसके पास होगा… दूसरा :- वाह मेरे दोस्त, खुद का परिवार, परिवार है और दूसरे का कुछ नही… मेरे दोस्त अपने बच्चो को परिवार का महत्व समझाओ, घर के बडे ,घर के छोटे सभी अपनो के लिए जरूरी होते है… वरना इंसान खुशियों का और गम का महत्व ही भूल जाएगा, जिंदगी नीरस बन जाएगी… पहले वाले बुजुर्ग बेहद शर्मिंदगी के कारण कुछ नही बोल पाए… दोस्तों परिवार है तो जीवन मे हर खुशी, खुशी लगती है अगर परिवार नही तो किससे अपनी खुशियाँ और गम बांटोगे. संदीप यादव

Posted in गणेश देवा, भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

गजाननं भूत गणाधिपति सेवितं कपित्थजंबू फल चारूभक्षणं। उमासुतं शोकविनाश कारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजं।।


गजाननं भूत गणाधिपति सेवितं

कपित्थजंबू फल चारूभक्षणं।

उमासुतं शोकविनाश कारकं

नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजं।।

आप सभी का दिवस बरस मंगलमय हो,,, समस्त मनोकामनायें पूर्ण हों,,, गणतंत्र के देवता हैं गणपति ! सर्वत्र होती है गणपति की पूजा ! विश्व भर में पूज्य भगवान गणपति गणतंत्र भारत के देवता हैं,क्योंकि भारत को स्वतन्त्रता दिलाने में भगवान गणेश का भी आशीर्वाद रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोकमान्य तिलक ने गणेश उत्सवों के माध्यम से ही स्वाधीनता का अलख जगाया था। भगवान गणेश के आशीर्वाद से भारत में गणतंत्र की स्थापना हुई। इसलिए वे देश के प्रमुख देवता हैं। भारत भर में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। कहा गया है कि गणेश की आराधना सरल है,साथ ही वे शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता भी हैं। उन्हें मोदक प्रिय भी कहा गया है। इसलिए उनके भोग में मोदक अवश्य रखा जाता है। विश्व भर में विराजित हैं !! श्रीगणेश प्रथम पूज्य मंगलमूर्ति गणपति की उपासना दुनिया और देश-विदेश में भी कई स्थानो पर की जाती है। जापान में स्थित गणपति की महिमा ! जापान के एक हिन्दू मंदिर में तो गणेश जी की हाथी पर सवार एक दुर्लभ प्रतिमा के दर्शन होते हैं। यहां बसे हिन्दू के अलावा जापानी लोग भी इस देवता के प्रति श्रद्धा रखते हैं। यहां के भक्तगण अपनी मनौती पूर्ण करने के लिए यहां आकर अपने सिर के बाल कटवाते हैं। जापान में बसे लोग अपनी मनौती पूर्ण होने पर गरीबों को सोने-चांदी के गहनों का दान देते हैं। हाथी को मोटे-मोटे रोट और गन्ने खिलाते हैं,ताकि गणपति बाबा की सभी पर असीम कृपा सदा बनी रहे। इंडोनेशिया :- – इंडोनेशिया के सरकारी नोटों पर तो मंगलमूर्ति ‘गणेश’ का चित्र छपा है। – उसी के बगल में यहां के चर्चित राष्ट्रपुरुष का भी चित्र छपा है। – हालांकि यह एक मुस्लिम मुल्क है, परंतु हिन्दू रीति-रिवाज यहां आज भी लोकप्रिय हैं। अमेरिका : – – सन् 1968 में अमेरिका के डाक विभाग ने दो डॉलर का जो डाक टिकट जारी किया था,उसमें चूहे पर गणपति विराजमान थे। – वर्तमान में यह डाक टिकट दुर्लभ है तथा दो डॉलर के इस टिकट की कीमत सात हजार डॉलर है। अफ्रीका ;- – अफ्रीका में गजानंद की महिमा से प्रकृति इतनी प्रभावित हुई कि एक विशाल वृक्ष की शाख पर उसने गणपति की आकृति की रचना कर दी। – प्रकृति की इस दुर्लभ आकृति को यहां के आदिवासी अपना लोक देवता मानते हैं। – वोर्निया में गणपति की चार भुजाएं हैं और यह गहरे पीले रंग के आसन पर बाघ चर्म लपेट कर पालथी मारकर विराजमान हैं। – यहां गणेश चतुर्थी पर ‘गणेशजी’ की सुंदर झांकी बनती है। – लोग खूब ढोल और बांसुरी बजाते हैं और बच्चे जमकर आतिशबाजी करते हैं। श्रीलंका के हिन्दू देवालयों में गणेश चतुर्थी के दिन गणपति का नया चोला बदला जाता है तथा पुराने चोलों को पानी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इस दिन लोगों द्वारा गणपति की पूजा जंगली फलों-फूलों से की जाती है। मलय देश में ‘गणपति’ को ‘गज्जू’ नाम से जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन यहां के खंडहर हिन्दू मंदिरों में ‘गणपति’ मंत्र जपा जाता है,फिर गणेशजी की सवारी निकाली जाती है। सुमात्रा द्वीप में गणेश चतुर्थी पर घर-आंगन को लीप-पोत कर साफ-सुथरा बनाया जाता है। फिर पेड़ों के पत्तों और फूलों से एक शानदार मंडप बनाया जाता है। इसमें माटी से निर्मित ‘गणपति’ की स्थापना शुभ-समय में की जाती है। दीप और सुगंधित बत्तियां जलाकर गणपति को प्रसन्न किया जाता है। 24 घंटे रखने के पश्चात श्रीगणेश की प्रतिमा किसी जलाशय में विसर्जित कर दी जाती है। गजाननं भूत गणाधिपति सेवितं कपित्थजंबू फल चारूभक्षणं। उमासुतं शोकविनाश कारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजं।। विघ्नेश्वराय वरदाय लंबोदराय सकलाय जगद्धिताय। नागाननाय सुरयज्ञ विभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमोस्तुते।। समस्त चराचर प्राणियों एवं सकल विश्व का कल्याण करो प्रभु श्री गणेश !! जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,, जयति पुण्य भूमि भारत,,, सदा सर्वदा सुमंगल,,, हर हर महादेव,, ॐ गं गणपतये नम:,,, ॐ वं वक्रतुण्डाय हुम जय भवानी,,, जय श्री राम,,

विजय कृष्णा पांडेय

Posted in रामायण - Ramayan

रामायण और महाभारत जैसी घटनाएं कभी हुई ही नहीं थी.


रामायण और महाभारत जैसी घटनाएं कभी हुई ही नहीं थी….. और, वे बस काल्पनिक महाकाव्य हैं…! दरअसल… वे ऐसे कर के …. भगवान और कृष्ण के को काल्पनिक बताना चाहते हैं… और, साथ ही ये भी प्रमाणित करना चाहते हैं कि….. हम हिन्दू काल्पनिक दुनिया में जीते हैं…! लेकिन…. हम हिन्दू भी हैं कि…. ऐसे सेक्यूलरों के मुंह पर तमाचा जड़ने के लिए….. कहीं न कहीं से ….. सबूत जुगाड़ कर ही लाते हैं….! जिन्होंने थोड़ी भी महाभारत पढ़ी होगी उन्हें वीर बर्बरीक वाला प्रसंग जरूर याद होगा….! उस प्रसंग में हुआ कुछ यूँ था कि….. महाभारत का युद्घ आरंभ होने वाला था और भगवान श्री कृष्ण युद्घ में पाण्डवों के साथ थे……. जिससे यह निश्चित जान पड़ रहा था कि कौरव सेना भले ही अधिक शक्तिशाली है, लेकिन जीत पाण्डवों की ही होगी। ऐसे समय में भीम का पौत्र और घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक ने….. अपनी माता को वचन दिया कि… युद्घ में जो पक्ष कमज़ोर होगा वह उनकी ओर से लड़ेगा ! इसके लिए, बर्बरीक ने महादेव को प्रसन्न करके उनसे तीन अजेय बाण प्राप्त किये थे। परन्तु, भगवान श्री कृष्ण को जब बर्बरीक की योजना का पता चला तब वे …… ब्राह्मण का वेष धारण करके बर्बरीक के मार्ग में आ गये। श्री कृष्ण ने बर्बरीक को उत्तेजित करने हेतु उसका मजाक उड़ाया कि….. वह तीन वाण से भला क्या युद्घ लड़ेगा…????? कृष्ण की बातों को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि ……उसके पास अजेय बाण है और, वह एक बाण से ही पूरी शत्रु सेना का अंत कर सकता है ..तथा, सेना का अंत करने के बाद उसका बाण वापस अपने स्थान पर लौट आएगा। इस पर श्री कृष्ण ने कहा कि….. हम जिस पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हैं… अगर, अपने बाण से उसके सभी पत्तों को छेद कर दो तो मैं मान जाउंगा कि…. तुम एक बाण से युद्घ का परिणाम बदल सकते हो। इस पर बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार करके……भगवान का स्मरण किया और बाण चला दिया.। जिससे, पेड़ पर लगे पत्तों के अलावा नीचे गिरे पत्तों में भी छेद हो गया….। इसके बाद वो दिव्य बाण भगवान श्री कृष्ण के पैरों के चारों ओर घूमने लगा… क्योंकि, एक पत्ता भगवान ने अपने पैरों के नीचे दबाकर रखा था…। भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि धर्मरक्षा के लिए इस युद्घ में विजय पाण्डवों की होनी चाहिए….. और, माता को दिये वचन के अनुसार अगर बर्बरीक कौरवों की ओर से लड़ेगा तो अधर्म की जीत हो जाएगी। इसलिए, इस अनिष्ट को रोकने के लिए ब्राह्मण वेषधारी श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान की इच्छा प्रकट की….। जब बर्बरीक ने दान देने का वचन दिया… तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उसका सिर मांग लिया… जिससे बर्बरीक समझ गया कि ऐसा दान मांगने वाला ब्राह्मण नहीं हो सकता है। और, बर्बरीक ने ब्राह्मण से वास्तविक परिचय माँगा…..और, श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि वह कृष्ण हैं। सच जानने के बाद भी बर्बरीक ने सिर देना स्वीकार कर लिया लेकिन, एक शर्त रखी कि, वह उनके विराट रूप को देखना चाहता है ….तथा, महाभारत युद्घ को शुरू से लेकर अंत तक देखने की इच्छा रखता है,,,,। भगवान ने बर्बरीक की इच्छा पूरी करते हुए, सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का सिर काटकर सिर पर अमृत का छिड़काव कर दिया और एक पहाड़ी के ऊंचे टीले पर रख दिया… जहाँ से बर्बरीक के सिर ने पूरा युद्घ देखा। ============ और, ये सारी घटना …….. आधुनिक वीर बरबरान नामक जगह पर हुई थी…. जो हरियाणा के हिसार जिले में हैं…! अब ये …. जाहिर सी बात है कि …. इस जगह का नाम वीर बरबरान…….. वीर बर्बरीक के नाम पर ही पड़ा है…! आश्चर्य तो इस बात का है कि….. अपने महाभारत काल की गवाही देते हुए….. वो पीपल का पेड़ आज भी मौजूद है….. जिसे वीर बर्बरीक ने श्री कृष्ण भगवान के कहने पर… अपने वाणों से छेदन किया था… और, आज भी इन पत्तो में छेद है । ( चित्र संलग्न) साथ ही….. सबसे बड़ी बात तो ये है कि……. जब इस पेड़ के नए पत्ते भी निकलते है ……तो उनमे भी छेद होता है ! सिर्फ इतना ही नहीं…. बल्कि, इसके बीज से उत्पन्न नए पेड़ के भी पत्तों में छेद होता है…!

विक्रम प्रकाश राइसोनि

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दुर्गा सप्तशती के सिद्ध चमत्कारी मंत्र मार्कण्डेय पुराण में


दुर्गा सप्तशती के सिद्ध चमत्कारी मंत्र मार्कण्डेय पुराण में ब्रह्माजी ने मनुष्यों के रक्षार्थ परमगोपनीय साधन, कल्याणकारी देवी कवच एवं परम पवित्र उपाय संपूर्ण प्राणियों को बताया, जो देवी की नौ मूर्तियां-स्वरूप हैं, जिन्हें ‘नवदुर्गा’ कहा जाता है, उनकी आराधना आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी तक की जाती है। श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ मनोरथ सिद्धि के लिए किया जाता है, क्योंकि श्री दुर्गा सप्तशती दैत्यों के संहार की शौर्य गाथा से अधिक कर्म, भक्ति एवं ज्ञान की त्रिवेणी हैं। यह श्री मार्कण्डेय पुराण का अंश है। यह देवी महात्म्य धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने में सक्षम है। सप्तशती में कुछ ऐसे भी स्रोत एवं मंत्र हैं, जिनके विधिवत पारायण से इच्छित मनोकामना की पूर्ति होती है। * सर्वकल्याण हेतु – सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥ * बाधा मुक्ति एवं धन-पुत्रादि प्राप्ति के लिए इस मंत्र का जाप फलदायी है- सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः। मनुष्यों मत्प्रसादेन भव‍िष्यंति न संशय॥ * आरोग्य एवं सौभाग्य प्राप्ति के चमत्कारिक फल देने वाले मंत्र को स्वयं देवी दुर्गा ने देवताओं को दिया है- देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्‌। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ * विपत्ति नाश के लिए- शरणागतर्द‍िनार्त परित्राण पारायणे। सर्व स्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽतुते॥ * ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, संपदा प्राप्ति एवं शत्रु भय मुक्ति के लिए- ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः। शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै॥ * विघ्ननाशक मंत्र- सर्वबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी। एवमेव त्याया कार्य मस्माद्वैरि विनाशनम्‌॥ जाप विधि- नवरात्रि के प्रतिपदा के दिन घटस्थापना के बाद संकल्प लेकर प्रातः स्नान करके दुर्गा की मूर्ति या चित्र की पंचोपचार या दक्षोपचार या षोड्षोपचार से गंध, पुष्प, धूप दीपक नैवेद्य निवेदित कर पूजा करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें। शुद्ध-पवित्र आसन ग्रहण कर रुद्राक्ष या तुलसी या चंदन की माला से मंत्र का जाप एक माला से पांच माला तक पूर्ण कर अपना मनोरथ कहें। पूरी नवरात्रि जाप करने से वांच्छित मनोकामना अवश्य पूरी होती है। समयाभाव में केवल दस बार मंत्र का जाप निरंतर प्रतिदिन करने पर भी मां दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं।

विक्रम प्रकाश रसनोई

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सन्यासी की जड़ी-बूटी


सन्यासी की जड़ी-बूटी – बहुत समय पहले की बात है , एक वृद्ध सन्यासी हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहता था. वह बड़ा ज्ञानी था और उसकी बुद्धिमत्ता की ख्याति दूर -दूर तक फैली थी. एक दिन एक औरत उसके पास पहुंची और अपना दुखड़ा रोने लगी , ” बाबा, मेरा पति मुझसे बहुत प्रेम करता था , लेकिन वह जबसे युद्ध से लौटा है ठीक से बात तक नहीं करता .” ” युद्ध लोगों के साथ ऐसा ही करता है.” , सन्यासी बोला. ” लोग कहते हैं कि आपकी दी हुई जड़ी-बूटी इंसान में फिर से प्रेम उत्पन्न कर सकती है , कृपया आप मुझे वो जड़ी-बूटी दे दें.” , महिला ने विनती की. सन्यासी ने कुछ सोचा और फिर बोला ,” देवी मैं तुम्हे वह जड़ी-बूटी ज़रूर दे देता लेकिन उसे बनाने के लिए एक ऐसी चीज चाहिए जो मेरे पास नहीं है .” ” आपको क्या चाहिए मुझे बताइए मैं लेकर आउंगी .”, महिला बोली. ” मुझे बाघ की मूंछ का एक बाल चाहिए .”, सन्यासी बोला. अगले ही दिन महिला बाघ की तलाश में जंगल में निकल पड़ी , बहुत खोजने के बाद उसे नदी के किनारे एक बाघ दिखा , बाघ उसे देखते ही दहाड़ा , महिला सहम गयी और तेजी से वापस चली गयी. अगले कुछ दिनों तक यही हुआ , महिला हिम्मत कर के उस बाघ के पास पहुँचती और डर कर वापस चली जाती. महीना बीतते-बीतते बाघ को महिला की मौजूदगी की आदत पड़ गयी, और अब वह उसे देख कर सामान्य ही रहता. अब तो महिला बाघ के लिए मांस भी लाने लगी , और बाघ बड़े चाव से उसे खाता. उनकी दोस्ती बढ़ने लाफि और अब महिला बाघ को थपथपाने भी लगी. और देखते देखते एक दिन वो भी आ गया जब उसने हिम्मत दिखाते हुए बाघ की मूंछ का एक बाल भी निकाल लिया. फिर क्या था , वह बिना देरी किये सन्यासी के पास पहुंची , और बोली ” मैं बाल ले आई बाबा .” “बहुत अच्छे .” और ऐसा कहते हुए सन्यासी ने बाल को जलती हुई आग में फ़ेंक दिया ” अरे ये क्या बाबा , आप नहीं जानते इस बाल को लाने के लिए मैंने कितने प्रयत्न किये और आपने इसे जला दिया ……अब मेरी जड़ी-बूटी कैसे बनेगी ?” महिला घबराते हुए बोली. ” अब तुम्हे किसी जड़ी-बूटी की ज़रुरत नहीं है .” सन्यासी बोला . ” जरा सोचो , तुमने बाघ को किस तरह अपने वश में किया….जब एक हिंसक पशु को धैर्य और प्रेम से जीता जा सकता है तो क्या एक इंसान को नहीं ? जाओ जिस तरह तुमने बाघ को अपना मित्र बना लिया उसी तरह अपने पति के अन्दर प्रेम भाव जागृत करो.” महिला सन्यासी की बात समझ गयी , अब उसे उसकी जड़ी-बूटी मिल चुकी थी. विक्रम प्रकाश रसनोई

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एक संत हुए थे


#एक संत हुए थे..हरिद्वार में निवास करते थे।कहते है उनकी वाणी में ऐसी अद्भुत शक्ति थी कि जब वो रामायण बांचते थे तब किसी का ध्यान पल भर के लिए भी इधर उधर भटक न पाता था।गीताप्रेस के कर्णधारो में से एक थे।नाम क्या था उनका..बाद में बताता हूँ पहले कुछ बातें। कलकत्ता में वो रामायण पाठ कर रहे थे…ये 90 के दशक की बात है।उनकी आदत थी रामायण बांचते समय रामायण के पास श्रीराम जी की तस्वीर रखते थे और उसी के बगल में लकड़ी से बना एक बैठने के लिए आसन, जो खाली रहता था।कई भक्त जिज्ञासु थे कि ये आसन का माज़रा क्या है..एक दिन हिम्मत करके किसी ने पूछ लिया।संत बोले रामायण का पाठ ह्रदय से करो तो देवता खुद विराजते है पाठ सुनने खातिर।कई हंसे…तो संत मुस्कुराये व बोले आओ, इस आसन को हटाओ।कई गए, लंबे चौड़े, दुबले पतले…कोई आसन को हिला भी न पाया..उन्हें ऐसा लगा कोई अदृश्य शक्ति यहाँ बैठी है ।हर कर वो संत के सामने नतमस्तक हुए। पर ये संत आखिर थे कौन…थोड़ा सा सब्र रखिये फिर बताता हूँ। इन्होंने अपनी मृत्यु से एक सप्ताह पहले भक्तो से कहा था कि फलाना तारीख को मैं देह त्याग दूंगा, और हुआ वही..उसी दिन उन्होंने ब्रह्म मूहर्त में देह त्याग दिया। आपको ये बातें दकियासुनी लग सकती है पर मेरी बातों पर यकीन न कीजिये, हरिद्वार जाइये, वहाँ किसी बुजुर्ग से जिन्होंने इन्हें सुना या देखा हो उनसे पूछिये फिर आपको भी यकीन हो चलेगा।मुझे इसलिए पता है क्योंकि मेरे दादाजी ने बहुत सा वक़्त इनके प्रवचनों को सुनते हुए गुज़ारा है,उनके हर सत्संग में जाते थे दादाजी so मेको पता है । इस संत ने अपनी एक तस्वीर आज तक किसी को लेने नहीं दी, कहते थे मेरी तस्वीर की पूजा करने की कोई जरुरत नहीं।मेरी वाणी सुनो और उसे अमल में लाओ।दादाजी इन्हें सुनने जाते तो वॉकमैन लेके जाते थे और रिकॉर्ड करके लाते थे इनकी आवाज़ जो आज भी मेरे पास है।आप संस्कार टीवी पर सवेरे 7 बजे सुन सकते पशर तस्वीर इस संसार के किसी के पास नहीं इनकी।आज तक अपने चरण छूने न दिए किसी को, कभी अपने लिए दानपेटी न रखवाई, किसी से चढ़ावे में एक पैसा न लिया।जो किया निस्वार्थ भाव से एकदम निशुल्क। ये संत थे हरिद्वार के श्री रामसुखदास जी महाराज।कइयों ने सुना होगा कइयों ने नहीं भी।पर ऐसे लोग संत कहलाने लायक है न कि रामपाल,आशाराम,गुरमीत राह रहीम जैसे जिनका ईमान ही नहीं।बस ये दुर्भाग्य है कि ऐसे महान संतो को जानने वाले कम है और गुरमीत रामरहीम जैसो को पूजने वाले बहुतायत में।

लष्मीकांत वर्शनय

Posted in सुभाषित - Subhasit

किसी पंजाबी पीर ने क्या खूब कहा है |


किसी पंजाबी पीर ने क्या खूब कहा है |

वेख फरीदा मिट्टी खुल्ली (कबर),

मिट्टी उत्ते मिट्टी डुली (लाश);

मिट्टी हस्से मिट्टी रोवे (इंसान),

अंत मिट्टी दा मिट्टी होवे (जिस्म);

ना कर बन्दया मेरी मेरी,

ना आये तेरी ना आये मेरी;

चार दिना दा मेला दुनिया,

फ़िर मिट्टी दी बन गयी ढेरी;

ना कर एत्थे हेरा फेरी,

मिट्टी नाल ना धोखा कर तू,

तू वी मिट्टी ओ वी मिट्टी;

जात पात दी गल ना कर तू,

जात वी मिट्टी पात वी मिट्टी,

जात सिर्फ खुदा दी उच्ची,

बाकी सब कुछ मिट्टी मिट्टी।

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

श्रीनगर (कशमीर) शत्रू तेज गति से आगे बढ रहे थे


श्रीनगर (कशमीर) शत्रू तेज गति से आगे बढ रहे थे कशमीर को शीघ्र सैन्य मदद चाहिए थी। दिल्ली के सेना कार्यालय से श्रीनगर को संदेश प्राप्त हुआ कि किसी भी परिस्थिति में श्रीनगर के हवाई अड्डे पर शत्रु का कब्जा नहीं होना चाहिए।शत्रु नगर को जीत ले ,तो भी चलेगा,किन्तु हवाई अड्डा बचना चाहिए। हम हवाई जहाज से सेना के दस्ते भेज रहे है। ”हवाई अड्डे पर सर्वत्र हिम के ढेर लगे हैं।हवाई जहाज उतारना अत्यंत कठिन है।” श्रीनगर सें यह प्रतिउतर आया। “मजदुर लगाकर तुरन्त हटाइए।चाहे कितनी भी मजदूरी देनी पड़े और इस काम के लिए कितने भी मजदूर लगाने पड़े,व्यवस्था कीजिए।” ‘मजदूर नही मिल रहे हैं।मुसलमान मजदूरो पर इस समय भरोसा नही किया जा सकता।’ और ऐसे समय में सेना के प्रमुखों को संघ याद आया । रात्रि के ग्यारह बजे थे। एक सैन्य जीप संघ- कार्यालय के आगे आकर रूकी ।उसमें से एक अधिकारी उतरे। कार्यालय में प्रमुख स्वंय सेवकों की बैठक चल रही थी।प्रेमनाथ डोगरा व अर्जुन जीं वही बैठे थें। सेनाधिकारी ने गंभीर स्थिति का संदेश दिया।फिर उसने पूछा- “आप हवाई अड्डे पर लगे हिम के ढेर हटानें का कार्य कर सकेंगे क्या?” अर्जुन जी ने कहा- “अवश्य!कितने व्यक्ति सहायता के लिए चाहिए।” ‘कम से कम डेढ़ सौ,जिससे तीन-चार घंटों में सारी बरफ हट जाये।” अर्जुन जी ने कहा – “हम छः सौ स्वयंसेवक देते है।” “इतनी रात्रि में आप इतने…..?” सैन्य अधिकारी ने आश्चर्य से कहा “आप हमें ले जाने के लिए वाहनों की व्यवस्था कीजिए।४५ मिनट में हम तैयार है ।” संघ कि पद्धति का कमाल था कि तय समय पर सभी 600 स्वयंसेवक कार्यालय पर एकत्र होकर साथ साथ चले गये। दिल्ली को संदेश भेजा गया-“बरफ हटाने का काम प्रारंम्भ हो गया है।हवाई जहाज कभी भी आने दें।” “इतनी जल्दी मजदूर मिल गये क्या” ‘हाँ, पर वे मजदूर नही ,सभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हैं।’ रात्रि के डे़ढ बजे वे काम पर लग गये।२७अक्टुम्बर को प्रातः के समय प्रथम सिख रेजीमेन्ट के ३२९ सैनिक हवाई जहाज से श्रीनगर उतरे और उन्होने बड़े प्रेम से स्वंय सेवको को गले लगाया । फिर क्या था एक के बाद एक ऐसे आठ हवाई जहाज उतरे। उन सभी में प्रयाप्त मात्रा में शस्त्रास्त्र थे। सभी स्वंयसेवको ने वे सारे शस्त्रास्त्र भी उतार कर ठिकाने पर रख दिये । हवाई अड्डा शत्रु के कब्जे में जाने से बच गया। जिसका सामरिक लाभ हमें प्राप्त हुआ। हवाई पट्टी चौड़ी करने का कार्य भी तुरन्त करना था, इसलिए विश्राम किये बिना ही स्वंयसेवक काम में जुट गये। संदर्भ पुस्तक :- न फूल चढे न दीप जले। ।। नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे।।

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जोज़फ इस्टालिन एक बार अपने साथ संसद में एक मुर्गा लेकर आये,


जोज़फ इस्टालिन एक बार अपने साथ संसद में एक मुर्गा लेकर आये, और सबके सामने उसका एक-एक पंख नोचने लगे, मुर्गा दर्द से बिलबिलाता रहा मगर, एक-एक करके इस्टालिन ने सारे पंख नोच दिये, फिर मुर्गे को फर्श पर फेंक दिया, फिर जेब से कुछ दाने निकालकर मुर्गे की तरफ फेंक दिए और चलने लगा, तो मुर्गा दाना खाता हुआ इस्टालिन के पीछे चलने लगा, इस्टालिन बराबर दाना फेंकता गया और मुर्गा बराबर दाना मु्ँह में ड़ालता हुआ उसके पीछे चलता रहा, आखिरकार वो मुर्गा इस्टालिन के पैरों में आ खड़ा हुआ, इस्टालिन स्पीकर की तरफ देखा और एक तारीख़ी जुमला बोला,………….. …. “लोकतांत्रिक देशों की जनता इस मुर्गे की तरह होती है, उनके राजनेता जनता का पहले सब कुछ लूट कर उन्हें अपाहिज कर देते हैं, और बाद में उन्हें थोड़ी सी खुराक देकर उनका मसीहा बन जाते हैं” It is our position at present…