Posted in संस्कृत साहित्य

हनुमान की जन्म तिथि- पंचांग में हनुमान जयन्ती की कई तिथियों दी गई हैं


हनुमान की जन्म तिथि- पंचांग में हनुमान जयन्ती की कई तिथियों दी गई हैं पर उनका स्रोत मैंने कहीं नहीं देखा है। पंचांग निर्माताओं के अपने अपने आधार होंगे। पराशर संहिता, पटल 6 में यह तिथि दी गई है- तस्मिन् केसरिणो भार्या कपिसाध्वी वरांगना। अंजना पुत्रमिच्छन्ति महाबलपराक्रमम्।।29।। वैशाखे मासि कृष्णायां दशमी मन्द संयुता। पूर्व प्रोष्ठपदा युक्ता कथा वैधृति संयुता।।36।। तस्यां मध्याह्न वेलायां जनयामास वै सुतम्। महाबलं महासत्त्वं विष्णुभक्ति परायणम्।।37।। इसके अनुसार हनुमान जी का जन्म वैशाख मास कृष्ण दशमी तिथि शनिवार (मन्द = शनि) युक्त पूर्व प्रोष्ठपदा (पूर्व भाद्रपद) वैधृति योग में मध्याह्न काल में हुआ। बाल समय रवि भक्षि लियो तब तीनहु लोक भयो अन्धियारो। = यदि इसका अर्थ है कि हनुमान जी के जन्म दिन सूर्य ग्रहण हुआ था तो उनका जन्म अमावस्या को ही हो सकता है। दिन के समय ही सूर्य ग्रहण उस स्थान पर दृश्य होगा। युग सहस्त्र योजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। = सूर्य युग सहस्त्र या 2000 योजन पर नहीं है। तुलसीदास जी ने सूर्य सिद्धांत पढ़ा था जिसमें सूर्य का व्यास 6500 योजन (13,92,000 किमी) दिया है। इन दोनों को मिला कर अर्थ- सूर्य की दैनिक गति हमको पूर्व क्षितिज से पश्चिमी क्षितिज तक दीखती है। इसमें सूर्योदय को बाल्यकाल, मध्याह्न में युवा तथा सायंकाल को वृद्धावस्था कहते हैं। सूर्य के अंश रूप गायत्री की इसी प्रकार प्रार्थना होती है। पूर्व तथा पश्चिमी क्षितिज पृथ्वी सतह पर दृश्य आकाश के दो हनु हैं। इन दो हनु के बीच सूर्य की दैनिक गति का पूरा जीवन समाहित है। जब हमको सूर्य उदय होते दीखता है तब वह वास्तव में क्षितिज से नीचे होता है, पर वायुमंडल में किरण के आवर्तन से मुड़ने के कारण पहले ही दीखने लगता है। इसको सूर्य सिद्धांत में वलन कहा गया है। सूर्य का व्यास सूर्य सिद्धांत में 6500 योजन है जहाँ योजन का मान प्रायः 214 किमी है। जब व्यास का 2000 योजन क्षितिज के नीचे रहता है तभी पूरा सूर्य बिम्ब दीखने लगता है। यही युग (युग्म) सहस्त्र योजन पर भानु है जिसको क्षितिज रूपी हनु निगल जाता है।

अरुण उपाध्याय

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