Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

तब और अब.


*…तब और अब…”*

तब:—
एक तौलिया से पूरा घर नहाता था।
दूध का नम्बर बारी-बारी आता था।
छोटा माँ के पास सोकर इठलाता था।
पिताजी से मार का डर सबको सताता था।
बुआ के आने से माहौल शान्त हो जाता था।
पूड़ी-खीर से पूरा घर रविवार मनाता था।
बड़े भाई के कपड़े छोटे होने का इन्तजार रहता था।
स्कूल में बड़े की ताकत से, ‘छोटा’ रौब जमाता था।
बहन-भाई के प्यार का सबसे बड़ा नाता था।
धन का महत्व कभी सोच भी न पाता था।
बड़े का- बस्ता, किताबें, साईकिल, कपड़े, खिलौने, पेन्सिल, स्लेट स्टाईल चप्पल, इन सब से मेरा नाता था।
मामा-मामी, नाना-नानी पर हक जताता था।
एक छोटी से सन्दूक को अपनी जान से ज्यादा प्यारी तिजोरी बताता था।

और अब:—
तौलिया अलग हुआ, दूध अधिक हुआ,
माँ तरसने लगी,
पिताजी डरने लगे,
बुआ से कट गये,
खीर की जगह पिज्जा बर्गर मोमो आ गये,
कपड़े भी व्यक्तिगत हो गये,
भाईयों से दूर हो गये,
बहन के प्रेम की जगह गर्लफ्रेण्ड आ गई,
धन प्रमुख हो गया,
अब सब नया चाहिए,
नाना आदि औपचारिक हो गये।
बटुऐ में नोट हो गये।
कई भाषायें तो सीखे, मगर संस्कार भूल गए।
बहुत पाया पर कुछ खो गए।
रिश्तों के अर्थ बदल गए,
हम आज जीते हुए भी…
एहसास व संवेदनाहीन हो गए…!

कृपया सोचें 😇
हम कहाँ से कहाँ पहुँच गए?
क्या थे क्या हो गए??
🙏🙏
~(योगिअंश रमेश चन्द्र भार्गव)

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