Posted in કવિતા - कविता - Kavita

बजने दो अब रणभेरी तुम रणचंडी का आह्वान


बजने दो अब रणभेरी तुम रणचंडी का आह्वान

करो दुष्टदलन को सज्जित होकर काल भैरव का स्तुतगान

करो मत गिनो मृत्यु के कौरों को अब समर प्रासंगिक गीता का सम्मान

करो गांडीव उठाओ पार्थ प्रथम अब स्थगित विकास के सौपान

करो बुद्ध महावीर को भूलो कुछ दिन बन महाकाल खलप्राण हरो

करो चिताभस्म से श्रृंगार अरि की समर भयंकर धनु पिनाक शरसंधान

करो खोलो त्रिनेत्र अब तांडव करो हर चंडीके अब हो प्रसन्न यथेष्ट रक्तपान

करो हिन्दू हृदय की सहज सौम्यता त्यागो शोकरहित हो रक्षकों में अभिमान भरो जा डटो वीर भूमि में कुछ दिन सकल सैन्य संस्थानों में जान भरो व्याकुल पांचजन्य अब वायु मांगे शक्ति साधना अपरिहार्य अब ध्यान धरो वाणी से नहीं फलता पौरुष भव रणधीर अब रिपुदमन के अभियान करो पुष्प नहीं होते अभीष्ट उत्सर्गियों को अथाह अरि शोणित से उनका पिंडदान करो हर वस्तु अवलंबित है कालगति पर सृजन, विकास तज रणभूमि को प्रस्थान करो धरो कवच! आभूषण तजकर नयनो में अब क्रोध भरो किस उलझन में पड़े हो राजन! तत्काल कटी कृपाण धरो।। बजने दो अब रणभेरी तुम रणचंडी का आह्वान करो।।

। pramod kumar

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Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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