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स्वामी श्रद्धानन्द और मोहनदास करमचंद गाँधी हिन्दू-मुस्लिम दंगे फैले थे। गाँधी जी स्वामी श्रद्धानन्द जी से मिलने के लिए उनके आवास पर जाते है। दोनों में अभिवादन हुआ। गाँधी जी – स्वामी जी आपसे कुछ बात करनी थी, एकांत में। स्वामी जी – आइये फिर दोनों के सेवक बाहर रुकते है और स्वामी जी गाँधी जी को अंदर ले जाते है। गाँधी जी – स्वामी जी दंगो के कारण हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बड़ा बुरा असर पड़ रहा है। आपके कहने से दंगे रुक सकते है। आप हिन्दुओ को कहिये कि वो मुसलमानो को न मारे। हिन्दू-मुस्लिम एकता आवश्यक है। स्वामी जी – और इस हिन्दू-मुस्लिम एकता का स्वरुप क्या होगा गाँधी जी? एकता परस्पर होती है। प्रेम और एकता एक दूसरे के भावनाओ के सम्मान पर टिकी होती है। गाँधी जी – स्वामी जी हिन्दू-मुस्लिम एकता के बिना “स्वराज” नहीं मिल पायेगा। स्वामी जी – ये भ्रम क्यों फैलाया जा रहा है गाँधी जी? गाँधी जी – स्वामी जी आप अपने संगठन “भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा” (घर वापसी के लिए स्थापित) को बंद कर दीजिये। स्वामी जी – ठीक है! यदि आप चाहते है की मैं “भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा” को बंद कर दूँ, शुद्धि सभा का अभियान बंद कर दूँ, तो मैं कर देता हूँ, किन्तु क्या आप इतने ही अधिकारपूर्वक मुसलमानो से ये बात कह पाएंगे कि वो ज़बरदस्ती हिन्दुओ का धर्म-परिवर्तन बंद कर दें। गाँधी जी – स्वामी जी हमे आपका सहयोग चाहिए। स्वामी श्रद्धानन्द – मैंने तो सदैव ही आपके साथ सहयोग किया है। जब आप साऊथ अफ्रीका में आंदोलन चला रहे थे उस समय हमने और हमारे गुरुकुल के बच्चों ने सर पर मिटटी ढो के आपके आंदोलन के सहयोग के लिए पैसे भेजे थे। बच्चों ने घी-दूध तक पीना-खाना छोड़ दिया था। गाँधी जी – इस बात के लिए मैं सदैव आपका ऋणी रहूँगा। स्वामी जी – तो आपके साथ तो असहयोग की कोई बात ही नहीं है, किन्तु आज आवश्यकता इस बात की है कि इस देश की बहुसंख्यक जनता की भावनाओ को भी समझा जाए। गाँधी जी लौट गए। फिर समाचार पत्रो में छपा की “गाँधी जी अनशन पर गए”। 21 दिन के बाद गाँधी जी ने अनशन तोडा। गाँधी जी इसी प्रकार “ब्लैकमेल” की राजनीति करते थे। इस बात पर स्वामी श्रद्धानन्द जी बहुत दुखी हुए और गंगा किनारे संध्या के समय ईश्वर से प्रार्थना की और कहा- “हे ईश्वर! मुझे शक्ति दो। मुझे शक्ति दो की मैं राजनितिक अवसरवादिता से लड़ सकूँ। तुम्हारी सृष्टि में पल रहे मानवमात्र की सेवा कर सकूँ। अपने जीवन की हर सांस उनके उत्थान में अर्पित करूँ। चाहे जितना भी षड्यंत्र हो, जितना भी विरोध हो मैं सत्य के मार्ग से कभी न डिगु और सदैव मानवता की सेवा करता रहूँ। मुझे शक्ति दो ईश्वर, मुझे शक्ति दो।” कुछ कुछ अज्ञानी लोग गाँधी जी के लेख दिखाकर कहते है कि गाँधी जी कहते थे कि आर्य समाज साम्प्रदायिकता और झगड़ें फैलाता है। क्या वो सभी गाँधी जी के प्रत्येक कार्य से सहमत है। गाँधी जी एक सर्वमान्य नेता बनने की चाह में बहुसंख्यको की भावनाओ को नज़रअंदाज़ करते थे। उन्होंने हिन्दू समाज, दलितों, विधवाओ की आवाज ही नहीं उठाई सहारा भी दिया, फिर भी स्वामी जी को गाँधी जी की अवसरवादिता भरी राजनीति का शिकार होकर मुसलमानो से सीने में गोली खानी पड़ी और बलिदान दिया। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने अछूत शब्द को जातिसूचक मानते हुए दलित शब्द को प्राथमिकता देते हुए कहा कि आर्थिक स्थिति का सूचक शब्द दलित है अतः अछूतों को दलित कहा गया। स्वामी श्रद्धानन्द, पंडित लेखराम, महाशय राजपाल, महात्मा फूल सिंह ये महापुरुष वैदिक धर्म की रक्षा करते हुए मुसलमानो की गोली और खंजर का शिकार हुए। यदि हिन्दू समाज उसी समय सचेत होता और आर्य समाज का साथ देता तो केरल, बंगाल, कश्मीर, कैराना जैसी स्थिति कभी न आती।

नीरज एय अँधेड़ी

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