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वधू किसकी ?


वधू किसकी ?

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यमुना के किनारे धर्मस्थान नामक एक नगर था। उस नगर में गणाधिप नाम का राजा राज करता था। उसी में केशव नाम का एक ब्राह्मण भी रहता था। ब्राह्मण यमुना के तट पर जप-तप किया करता था। उसकी एक लड़की थी, जिसका नाम मालती था। वह बड़ी रूपवती थी। जब वह ब्याह के योग्य हुई तो उसके माता, पिता और भाई को चिन्ता हुई।

एक दिन जब ब्राह्मण अपने किसी यजमान की बारात में गया था और भाई पढ़ने गया था, तभी उनके घर में एक ब्राह्मण का लड़का आया। लड़की की माँ ने उसके रूप और गुणों को देखकर उससे कहा कि मैं तुमसे अपनी लडकी का ब्याह करूँगी।

उधर ब्राह्मण पिता को भी एक दूसरा लड़का मिल गया और उसने उस लड़के को भी यही वचन दे दिया।

ब्राह्मण का लड़का जहाँ पढ़ने गया था, वहाँ वह एक लड़के से यही वादा कर आया।

कुछ समय बाद बाप-बेटे घर में इकट्ठे हुए तो देखते क्या हैं कि वहाँ एक तीसरा लड़का और मौजूद है। दो उनके साथ आये थे। अब क्या हो? ब्राह्मण, उसका लड़का और ब्राह्मणी बड़े सोच में पड़े।

दैवयोग से हुआ क्या कि लड़की को साँप ने काट लिया और वह मर गयी। उसके बाप, भाई और तीनों लड़कों ने बड़ी भाग-दौड़ की, ज़हर झाड़नेवालों को बुलाया, पर कोई नतीजा न निकला। सब अपनी-अपनी करके चले गये।

दु:खी होकर वे उस लड़की को श्मशान में ले गये और क्रिया-कर्म कर आये। तीनों लड़कों में से एक ने तो उसकी हड्डियाँ चुन लीं और फकीर बनकर जंगल में चला गया। दूसरे ने राख की गठरी बाँधी और वहीं झोपड़ी डालकर रहने लगा। तीसरा योगी होकर देश-देश घुमने लगा।

एक दिन की बात है, वह तीसरा लड़का घूमते-घामते किसी नगर में पहुँचा और एक ब्राह्मणी के घर भोजन करने बैठा। जैसे ही उस घर की ब्राह्मणी भोजन परोसने आयी कि उसके छोटे लड़के ने उसका आँचल पकड़ लिया। ब्राह्मणी ने आँचल छुड़ाना चाहा मगर लड़का आँचल को छोड़ता ही नहीं था। ब्राह्मणी को बड़ा गुस्सा आया। उसने अपने लड़के को झिड़का, मारा-पीटा, फिर भी वह न माना तो ब्राह्मणी ने उसे उठाकर जलते चूल्हें में पटक दिया। लड़का जलकर राख हो गया। ब्राह्मण बिना भोजन किये ही उठ खड़ा हुआ। घरवालों ने बहुतेरा कहा, पर वह भोजन करने के लिए राजी न हुआ। उसने कहा जिस घर में ऐसी राक्षसी हो, उसमें मैं भोजन नहीं कर सकता।

इतना सुनकर वह आदमी भीतर गया और संजीवनी विद्या की पोथी लाकर एक मन्त्र पढ़ा। जलकर राख हो चुका लड़का फिर से जीवित हो गया।

यह देखकर ब्राह्मण सोचने लगा कि अगर यह पोथी मेरे हाथ पड़ जाये तो मैं भी उस लड़की को फिर से जिला सकता हूँ। इसके बाद उसने भोजन किया और वहीं ठहर गया। जब रात को सब खा-पीकर सो गये तो वह ब्राह्मण चुपचाप वह पोथी लेकर चल दिया।

जिस स्थान पर उस लड़की को जलाया गया था, वहाँ जाकर उसने देखा कि दूसरे लड़के वहाँ बैठे बातें कर रहे हैं। इस ब्राह्मण के यह कहने पर कि उसे संजीवनी विद्या की पोथी मिल गयी है और वह मन्त्र पढ़कर लड़की को जिला सकता है, उन दोनों ने हड्डियाँ और राख निकाली। ब्राह्मण ने जैसे ही मंत्र पढ़ा, वह लड़की जी उठी। अब तीनों उसके पीछे आपस में झगड़ने लगे।

इतना कहकर बेताल बोला, “राजा, बताओ कि वह लड़की किसकी स्त्री होनी चाहिए?”

राजा ने जवाब दिया, “जो वहाँ कुटिया बनाकर रहा, उसकी।”

बेताल ने पूछा, “क्यों?”

राजा बोला, “जिसने हड्डियाँ रखीं, वह तो उसके बेटे के बराबर हुआ। जिसने विद्या सीखकर जीवन-दान दिया, वह बाप के बराबर हुआ। जो राख लेकर रमा रहा, वही उसका पति के रूप में अधिकारी है है।”

राजा का यह जवाब सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका।

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दारिद्र्यदहन शिवस्तोत्र ॥


दारिद्र्यदहन शिवस्तोत्र ॥
Daaridryadahana Shiva Stotram

विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय,
कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय ।
कर्पूरकांतिधवलाय जटाधराय,
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥

गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय,
कालांतकाय भुजगाधिपकंकणाय ।
गंगाधराय गजराजविमर्दनाय,
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥

भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय,
उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय ।
ज्योतिर्मयाय गणनाथसुनृत्यकाय,
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥

चर्माम्बराय शवभस्मविलेपनाय,
भालेक्षणाय मणिकुंडलमंडिताय ।
मंजिरपादयुगलाय जटाधराय,
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥

पंचाननाय फणिराजविभूषणाय,
हेमांशुकाय भुवनत्रयमंडिताय ।
आनंदभूमिवरदाय तपोमयाय,
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥

भानुप्रियाय भवसागरतारणाय,
कालांतकाय कमलासनपूजिताय ।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षणलक्षिताय,
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥

रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय,
नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय ।
पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय,
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥

मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय,
गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय ।
मातंगचर्मवसनाय महेश्वराय,
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥

वसिष्ठेन कृतं स्तोत्र सर्वरोगनिवारणम्,
सर्वसंपत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनं ।
त्रिसंध्ययः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात्,
दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥

इति वसिष्ठविरचितं दारिद्र्यदहन स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥॥ हर हर महादेव ॥

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,
जयति पुण्य भूमि भारत,

समस्त चराचर प्राणियों एवं
सकल विश्व का कल्याण करो प्रभु !!

सदा सर्वदा सुमंगल,

कष्ट हरो,,,काल हरो,,,
दुःख हरो,,,दारिद्र्य हरो,,,
हर हर महादेव
जय उमा भवानी
जय श्री राम

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एक सिद्ध पुरुष नदी में स्नान कर रहे थे।


एक सिद्ध पुरुष नदी में स्नान कर रहे थे। एक चुहिया पानी में बहती हुई आई। उनने उसे निकाल लिया। कुटिया में ले आये और वहीं वह पलकर बड़ी होने लगी।
चुहिया सिद्ध पुरुष की करामातें देखती रही, सो उसके मन में भी कुछ वरदान पाने की इच्छा हुई। एक दिन अवसर पाकर बोली- मैं बड़ी हो गई, किसी बड़े से मेरा विवाह करा दीजिए।
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सन्त ने उसे खिड़की में से झाँकते सूरज को दिखाया और कहा- इससे करा दें। चुहिया ने कहा- यह तो आग का गोला। मुझे तो ठंडे स्वभाव का चाहिए। सन्त ने बादल की बात कही- वह ठंडा भी है और सूरज से बड़ा भी। वह आता है तो सूरत को आँचल में छिपा लेता है। चुहिया को यह प्रस्ताव भी रुचा नहीं। वह इससे बड़ा दूल्हा चाहती थी।
सन्त ने पवन को बादल से बड़ा बताया जो देखते-देखते उसे उड़ा ले जाता है। इससे बड़ा पर्वत बताया जो हवा को रोककर खड़ा हो जाता है। जब चुहिया ने यह दोनों भी अस्वीकार कर दिये तो सिद्ध पुरुष ने पूरे जोश के साथ कहा- चूहा पर्वत से बड़ा है, वह बिल बनाकर पर्वतों की जड़ खोखली करने और उन्हें इधर से उधर लुढ़का देने में समर्थ रहता है।

 

चुहिया रजामन्द हो गई। एक मोटा चूहा बुलाकर सन्त ने शादी रचा दी। उपस्थित दर्शकों को सम्बोधन करते हुए सन्त ने कहा- सुख और बड़प्पन की खोज लोग अपने स्तर और दृष्टिकोण के अनुरूप ही करते हैं।
Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

यही गौ हत्या के चलते इंदिरा गांधी ने लाखों संतो के ऊपर दिल्ली में गोलियां चार्ज करवाई थी


यही गौ हत्या के चलते इंदिरा गांधी ने लाखों संतो के ऊपर दिल्ली में गोलियां चार्ज करवाई थी वो दिन था गोपाष्टमी उसी के चलते उसे एक महान संत कृपात्रि जी महाराज ने उसी दिन सराफ दिया था दिल्ली में और बोला था जा तूने गोपाष्टमी के दिन में ही संतो को मारी है उसी दिन तेरा बिनास होगा तो सच में हो भी गया तो इंद्रा मरी दिल्ली में दिन था गोपाष्टमी राजीव मरे मद्रास में दिन था गोपाष्टमी संजय मरे आकाश में दिन था वह भी गोपाष्टमी आप सोचो किसी ने कभी यह बातें बताई भारत बचाओ आंदोलन

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छत्तीसगढ़ में मिला काशी विश्वनाथ जैसा 2 हजार साल पुराना शिवलिंग


छत्तीसगढ़ में मिला काशी विश्वनाथ जैसा 2 हजार साल पुराना शिवलिंग

महासमुंद . खुदाई के दौरान सिरपुर में द्वादश ज्योतिर्लिंगों वाले पौरुष पत्थर से बना
शिवलिंग मिला है।
छत्तीसगढ़ के पुरातत्व सलाहकार अरुण कुमार शर्मा का दावा है कि यह दो हजार
साल पुराना है और राज्य में मिला सबसे प्राचीन व विशाल शिवलिंग है।

वाराणसी के काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकालेश्वर शिवलिंग जैसा है सिरपुर
में मिला शिवलिंग।
बेहद चिकना।
पहली शताब्दी में सरभपुरिया राजाओं के द्वारा बनाए गए मंदिर के प्रमाण भी मिले।
इस शिवलिंग में विष्णु सूत्र (जनेऊ) और असंख्य शिव धारियां हैं।

साइट नंबर 15 में मिला

साइट नंबर 15 की खुदाई के दौरान मिले मंदिर के अवशेषों के बीच 4 फीट लंबा 2.5
फीट की गोलाई वाला यह शिवलिंग निकला है।

बारहवीं शताब्दी में आए भूकंप और बाद में चित्रोत्पला महानदी की बाढ़ में पूरा मंदिर
परिसर ढह गया था।
मंदिर के खंभे नदी के किनारे चले गए।
सिरपुर में कई सालों से चल रही खुदाई में सैकड़ों शिवलिंग मिले हैं।
इनमें से गंधेश्वर की तरह यह शिवलिंग भी साबूत निकला।

भूकंप और बाढ़ से गंधेश्वर मंदिर भी पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था।
पर यहां मौजूद सफेद पत्थर से बना शिवलिंग सुरक्षित बच गया।
सिरपुर में मिले गंधेश्वर शिवलिंग की विशेषता उससे निकलने वाली तुलसी के पौधे
जैसी सुगंध से है।

सबसे प्राचीन मिलना बाकी

पुरातत्व सलाहकार अरुण कुमार शर्मा ने बताया कि ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता बैडलर ने
1862 में लिखे संस्मरण में एक विशाल शिवमंदिर का जिक्र किया है।
लक्ष्मण मंदिर परिसर के दक्षिण में स्थित एक टीले के नीचे राज्य के संभवत: सबसे
बड़े और प्राचीन शिव मंदिर की खुदाई होना बाकी है।

ऐसे हुई वक्त की गणना

पुरातत्व के जानकारों के अनुसार भूकंप और बाढ़ ने सिरपुर शहर को 12वीं सदी में
जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया था।
कालांतर में नदी की रेत और मिट्टी की परतें शहर को दबाती चलीं गईं।
टीलों को कई मीटर खोदकर शहर की संरचना को निकाला गया।

खुदाई में मिले सिक्कों,प्रतिमाओं,ताम्रपत्र,बर्तन,शिलालेखों के आधार पर उस काल की
गणना होती गई।
साइट पर खुदाई की गहराई जैसे-जैसे बढ़ती है,प्राचीन काल के और सबूत मिलते जाते हैं।
जमीन में जिस गहराई पर शिवलिंग मिला, उसके आधार पर इसे दो हजार साल पुराना
माना गया है।

भारत में मौजूद चार सबसे ऊंचे शिवलिंग

– 108 फीट कर्नाटक का कोटिलिंगेश्वर
– 108 फीट सिकंदराबाद का महाशिवलिंग
– 65 फीट झारखंड का हरिहर धाम मंदिर
– 22 फीट मध्यप्रदेश के भोजपुर में
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http://www.bhaskar.com/…/CHH-RAI-found-4-feet-high-shivalin…
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शिव महिमा –

न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता न जन्मः ।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यं चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

न (मेरी) मृत्यु है, न इसकी कोई शंका है,न मेरे लिए कोई जातिभेद है,
न (मेरे) कोई पिता है,न ही माता है,न (मेरा) जन्म है |
न (मेरा) भाई है,न दोस्त है न ही कोई गुरु या शिष्य है,
मैं कल्याणकारी, चिदानंद रूप शिव हूँ|

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,जयति पुण्य भूमि भारत,,,
सदा सुमंगल,,,जय महाकाल

कष्ट हरो.,,,काल हरो,,,,दुःख हरो,,,,,दारिद्र्य हरो,,,,
हर हर महादेव,

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अक्सर सत्संग का लाभ वो उठा लेते हैं


अक्सर सत्संग का लाभ वो उठा लेते हैं
जो कभी भी सत्संग में नही जाते।

एक समय की बात हैं, एक सेठ और सेठानी रोज सत्संग में जाते थे। सेठजी के एक घर एक पिंजरे में तोता पाला हुआ था। तोता रोज सेठ-सेठानी को बाहर जाते देख एक दिन पूछता हैं कि सेठजी आप रोज कहाँ जाते है। सेठजी बोले कि भाई सत्संग में ज्ञान सुनने जाते है। तोता कहता है सेठजी फिर तो कोई ज्ञान की बात मुझे भी बताओ। तब सेठजी कहते हैं की ज्ञान भी कोई घर बैठे मिलता हैं। इसके लिए तो सत्संग में जाना पड़ता हैं। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी आप मेरा एक काम करना। सत्संग जाओ तब संत महात्मा से एक बात पूछना कि में आजाद कब होऊंगा।

सेठजी सत्संग ख़त्म होने के बाद संत से पूछते है की महाराज हमारे घर जो तोता है उसने पूछा हैं की वो आजाद कब होगा? संत को ऐसा सुनते हीं पता नही क्या होता है जो वो बेहोश होकर गिर जाते है। सेठजी संत की हालत देख कर चुप-चाप वहाँ से निकल जाते है।

घर आते ही तोता सेठजी से पूछता है कि सेठजी संत ने क्या कहा। सेठजी कहते है की तेरे किस्मत ही खराब है जो तेरी आजादी का पूछते ही वो बेहोश हो गए। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी में सब समझ गया।

दूसरे दिन सेठजी सत्संग में जाने लगते है तब तोता पिंजरे में जानबूझ कर बेहोश होकर गिर जाता हैं। सेठजी उसे मरा हुआ मानकर जैसे हीं उसे पिंजरे से बाहर निकालते है तो वो उड़ जाता है। सत्संग जाते ही संत सेठजी को पूछते है की कल आप उस तोते के बारे में पूछ रहे थे ना अब वो कहाँ हैं। सेठजी कहते हैं, हाँ महाराज आज सुबह-सुबह वो जानबुझ कर बेहोश हो गया मैंने देखा की वो मर गया है इसलिये मैंने उसे जैसे ही बाहर निकाला तो वो उड़ गया।

तब संत ने सेठजी से कहा की देखो तुम इतने समय से सत्संग सुनकर भी आज तक सांसारिक मोह-माया के पिंजरे में फंसे हुए हो और उस तोते को देखो बिना सत्संग में आये मेरा एक इशारा समझ कर आजाद हो गया।

दोस्तों इस कहानी से तात्पर्य ये है कि हम सत्संग में तो जाते हैं ज्ञान की बाते करते हैं या सुनते भी हैं, पर हमारा मन हमेशा सांसारिक बातों में हीं उलझा रहता हैं। सत्संग में भी हम सिर्फ उन बातों को पसंद करते है जिसमे हमारा स्वार्थ सिद्ध होता हैं। जबकि सत्संग जाकर हमें सत्य को स्वीकार कर सभी बातों को महत्व देना चाहिये और जिस असत्य, झूठ और अहंकार को हम धारण किये हुए हैं उसे साहस के साथ मन से उतार कर सत्य को स्वीकार करना…चाहिये.

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क्रोध पर विजय प्राप्त करने का सरल उपाय


क्रोध पर विजय प्राप्त करने का सरल उपाय ….. एक बार श्री कृष्ण बलदेव एवं सात्यकि रात्रि के समय रास्ता भटक गये !सघन वन था ;न आगे राह सूझती थी न पीछे लौट सकते थे ! निर्णय हुआ कि घोड़ो को बांध कर यही रात्रि में विश्राम किया जाय ! तय हुआ कि तीनो बारी-बारी जाग कर पहरा देंगे ! सबसे पहले सात्यकि जागे बाकी दोनो सो गये ! एक पिशाच पेड़ से उतरा और सात्यकि को मल्ल-युद्ध के लिए ललकारने लगा !पिशाच की ललकार सुन कर सात्यकि अत्यंत क्रोधित हो गये ! दोनो में… मल्लयुद्ध होने लगा ! जैसे -जैसे पिशाच क्रोध करता सात्यकि दुगने क्रोध से लड़ने लगते !सात्यकि जितना अधिक क्रोध करते उतना ही पिशाच का आकार बढ़ता जाता !मल्ल-युद्ध में सात्यकि को बहुत चोटें आईं ! एक प्रहर बीत गया अब बलदेव जागे !सात्यकि ने उन्हें कुछ न बताया और सो गये !बलदेव को भी पिशाच की ललकार सुनाई दी !बलदेव क्रोध-पूर्वक पिशाच से भिड़ गये !लड़ते हुए एक प्रहर बीत गया उनका भी सात्यकि जैसा हाल हुआ ! अब श्री कृष्ण के जागने की बारी थी !बलदेव ने भी उन्हें कुछ न बताया एवं सो गये !श्री कृष्ण के सामने भी पिशाच की चुनौती आई !पिशाच जितने अधिक क्रोध में श्री कृष्ण को संबोधित करता श्री कृष्ण उतने ही शांत-भाव से मुस्करा देते ;पिशाच का आकार घटता जाता ! अंत में वह एक कीड़े जितना रह गया जिसे श्री कृष्ण ने अपने पटुके के छोर में बांध लिया !प्रात:काल सात्यकि व बलदेव ने अपनी दुर्गति की कहानी श्री कृष्ण को सुनाई तो श्री कृष्ण ने मुस्करा कर उस कीड़े को दिखाते हुए कहा -यही है वह क्रोध-रूपी पिशाच जितना तुम क्रोध करते थे इसका आकार उतना ही बढ़ता जाता था ! पर जब मैंने इसके क्रोध का प्रतिकार क्रोध से न देकर तो शांत-भाव से दिया तो यह हतोत्साहित हो कर दुर्बल और छोटा हो गया !अतः क्रोध पर विजय पाने के लिये संयम से काम ले ! लष्मीकांत वर्शनय

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एक आदमी ने देखा की एक शेर लड़की पर अटैक कर रहा है.


एक आदमी ने देखा की एक शेर लड़की पर अटैक कर रहा है.. वो लड़की को बचाने के लिए शेर से भीड़ गया और शेर को मार दिया!! मीडिया- बहादूर लोकल हीरो ने एक लड़की को शेर से बचाया.!😊 आदमी- मैं कोई लोकल हिरो नहीं हूँ.. सीधासाधा इंसान हूँ !🙏🏻 मीडिया-विदेशी हीरो ने लड़की को शेर से बचाया.!!🤔 आदमी- अरे मैं विदेशी नहीं भारत माँ का ही लाल हुं, हिन्दु बेटा हुं,, हमारे पुर्वज शेरों को जबड़ों से पकड़ कर चीर दिया करते थे़ इसमें हिरो वाली क्या बात है?? इसे बचाना मेरा धर्म था,,,!! मीडिया- एक भगवा आतंकी ने एक मासूम शेर को मार डाला जब शेर एक लड़की के साथ खेल रहा था !! 😂😂 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🚩⛅😌😡

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एक आदमी ने दुकानदार से पूछा


*एक आदमी ने दुकानदार से पूछा – केले और सेवफल क्या भाव लगाऐ हैं ? केले 20 रु.दर्जन और सेव 100 रु. किलो । उसी समय एक गरीब सी औरत दुकान में आयी और बोली मुझे एक किलो सेव और एक दर्जन केले चाहिये – क्या भाव है भैया ? दुकानदार: केले 5 रु दर्जन और सेब 25 रु किलो। औरत ने कहा जल्दी से दे दीजिये । दुकान में पहले से मौजूद ग्राहक ने खा जाने वाली निगाहों से घूरकर दुकानदार को देखा । इससे पहले कि वो कुछ कहता – दुकानदार ने ग्राहक को इशारा करते हुये थोड़ा सा इंतजार करने को कहा।* *औरत खुशी खुशी खरीदारी करके दुकान से निकलते हुये बड़बड़ाई – हे भगवान तेरा लाख- लाख शुक्र है , मेरे बच्चे फलों को खाकर बहुत खुश होंगे । औरत के जाने के बाद दुकानदार ने पहले से मौजूद ग्राहक की तरफ देखते हुये कहा : ईश्वर गवाह है भाई साहब ! मैंने आपको कोई धोखा देने की कोशिश नहीं की यह विधवा महिला है जो चार अनाथ बच्चों की मां है । किसी से भी किसी तरह की मदद लेने को तैयार नहीं है। मैंने कई बार कोशिश की है और हर बार नाकामी मिली है।तब मुझे यही तरीकीब सूझी है कि जब कभी ये आए तो मै उसे कम से कम दाम लगाकर चीज़े दे दूँ। मैं यह चाहता हूँ कि उसका भरम बना रहे और उसे लगे कि वह किसी की मोहताज नहीं है। मैं इस तरह भगवान के बन्दों की पूजा कर लेता हूँ ।* *थोड़ा रूक कर दुकानदार* *बोला : यह औरत हफ्ते में एक बार आती है। भगवान गवाह है जिस दिन यह आ जाती है उस दिन मेरी बिक्री बढ़ जाती है और उस दिन परमात्मा मुझपर मेहरबान होजाता है । ग्राहक की आंखों में आंसू आ गए, उसने आगे बढकर दुकानदार को गले लगा लिया और बिना किसी शिकायत के अपना सौदा खरीदकर खुशी खुशी चला गया ।* *कथा का मर्म :-* *खुशी अगर बांटना चाहो तो तरीका भी मिल जाता है l*

दिलीप पटेल

Posted in संस्कृत साहित्य

संस्कृत से क्यों डरते हैं ?


संस्कृत से क्यों डरते हैं ? न्यूटन से पहले हजारों सेब गिर चुके हैं. आज हमें पढ़ाया जाता है कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त न्यूटन (1642 -1726) ने दिया. यदि विद्यार्थी संस्कृत पढेंगे तो जान जाएंगे कि यह झूठ है. — प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ भास्कराचार्य (1114 – 1185) के द्वारा रचित एक मुख्य ग्रन्थ *सिद्धान्त शिरोमणि* है हैं। भास्कराचार्य ने अपने सिद्धान्तशिरोमणि में यह कहा है- *आकृष्टिशक्तिश्चमहि तया यत् खस्थं गुरूं स्वाभिमुखं स्वशक्त्या ।* *आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे ।।* – सिद्धान्त० भुवन० १६ अर्थात – पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है जिसके कारण वह ऊपर की भारी वस्तु को अपनी ओर खींच लेती है । वह वस्तु पृथ्वी पर गिरती हुई सी लगती है । पृथ्वी स्वयं सूर्य आदि के आकर्षण से रुकी हुई है,अतः वह निराधार आकाश में स्थित है तथा अपने स्थान से हटती नहीं है और न गिरती है । वह अपनी कील पर घूमती है। ——————- वराहमिहिर ( 57 BC ) ने अपने ग्रन्थ *पञ्चसिद्धान्तिका*में कहा है- *पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोलः।* *खेयस्कान्तान्तःस्थो लोह इवावस्थितो वृत्तः ।।* – पञ्चसिद्धान्तिका पृ०३१ अर्थात- तारासमूहरूपी पंजर में गोल पृथ्वी इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहा । ——————– अपने ग्रन्थ सिद्धान्तशेखर में आचार्य श्रीपति ने कहा है – *उष्णत्वमर्कशिखिनोः शिशिरत्वमिन्दौ,.. निर्हतुरेवमवनेःस्थितिरन्तरिक्षे ।।* – सिद्धान्तशेखर १५/२१ ) नभस्ययस्कान्तमहामणीनां मध्ये स्थितो लोहगुणो यथास्ते । आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोलः ।। –सिद्धान्तशेखर १५/२२ अर्थात -पृथ्वी की अन्तरिक्ष में स्थिति उसी प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूर्य्य में गर्मी, चन्द्र में शीतलता और वायु में गतिशीलता । दो बड़े चुम्बकों nके बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार पृथ्वी भी अपनी धुरी पर रुकी हुई है । ऐसे अनेकों प्रामाणिक उदाहरण हैं परन्तु भारतीयों के तन्द्रावस्था में लीन होने के कारण प्राचीन भारतीय विज्ञान के स्रोत विलुप्त प्रायः हैं । विष्णु खुराना