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क्यों कहलाते हैं हम दाधीच कहां से आया यह दाधीच शब्द


क्यों कहलाते हैं हम दाधीच कहां से आया यह दाधीच शब्द कैसे बना दाधीच शब्द जानिए अपने बारे म ें जय श्री कृष्ण गोठ और मांगलोद नामक गाँवों के मध्य नागौर जिला मुख्यालय से उत्तर पूर्व में लगभग 44 किमी दूरी पर जायल तहसील में एक प्राचीन शक्ति पीठ स्थित है जो दधिमति माता के मंदिर के नाम से विख्यात है। ‘दाहिमा’ (दाधीच) ब्राह्मण दधिमति माता को अपनी कुलदेवी मानते हैं तथा इस मंदिर को अपने पूर्वजों द्वारा निर्मित मंदिर मानते हैं। यहाँ से प्राप्त एक अभिलेख के अनुसार इस मंदिर का निर्माण विक्रम संवत 665 (608 ई.) के लगभग माना जाता है, जिसके अनुसार इस मंदिर के निर्माण के लिए दाधीच ब्राह्मणों द्वारा दान किया गया था, जिसका मुखिया ‘अविघ्न नाग’ था। कुछ विद्वान अभिलेख लिपि के अक्षर तथा राजस्थान में गुप्त राजाओं का शासन क्षेत्र के आधार पर इस मंदिर का निर्माण गुप्त शासनकाल के अंतिम दिनों में चौथी शताब्दी में हुआ मानते हैं। कुछ विद्वान उपरोक्त काल से असहमत होते हुए, इसे 9 वीं शताब्दी का मानते हैं। दधिमति दधिची ऋषि की बहन थी। दधिमति माता को महालक्ष्मी का अवतार माना जाता है। दधिमति का जन्म माघ शुक्ल सप्तमी (रथ सप्तमी) को आकाश के माध्यम से हुआ माना जाता है। दधिमति माता का मंदिर देवी महामात्य का वर्णन करता उत्तर भारत का सबसे पुराना मंदिर माना जाता है, जो कोल्हापुर (महाराष्ट्र) के महालक्ष्मी मंदिर से भी पुराना है। दधिमति माता की कथा- जगत के प्राणियों को अभय प्रदान करने के लिए तथा विकटासुर राक्षस का वध करने के लिए “योगमाया महालक्ष्‍मी” महर्षि अथर्वा के घर में भगवती नारायणी दधिमति माता के रूप में प्रकट हुई थी। देवी के भय से विकटासुर दधिसागर में छिप गया, तब भगवती ने दधिसागर का मन्‍थन कर माघ शुक्‍ला अष्‍टमी को संध्‍याकाल में विकटासुर का वध किया। इसी वजह से वही तिथि जयाष्‍टमी के नाम से विख्‍यात है। दधिसागर का मन्‍थन करके विकटासुर को मारने के कारण ब्रह्माजी ने उनका नाम दधिमथी रखा तथा महर्षि अथर्वा को पुत्र प्राप्‍ति का वरदान दिया। ब्रह्माजी ने भगवती दधिमथी को अपने भाई दधीचि के वंश की रक्षा करते हुए उनकी कुलदेवी होने का आशीर्वाद दिया। अथर्वा के पुत्र तथा दधिमति के भाई महर्षि दधिची द्वारा विश्‍वकल्‍याण एवं धर्म की रक्षा हेतु दैत्‍यराज वृत्रासुर के वध के लिए अपनी अस्थियाँ देवताओं को प्रदान कर दी। तब दधिची की गर्भवती पत्‍नी स्वर्चा सती होने के लिए तत्‍पर हुई। तब देवताओं ने स्‍मरण कराया कि आपके गर्भ में जो ऋषि का तेज है, वह रूद्र अवतार है। पहले आप उसे जन्म दें। इस पर ऋषि पत्‍नी ने अपना गर्भ निकाल कर आश्रम में ऋषि द्वारा स्‍थापित अश्‍वत्‍थ वृक्ष को सौंपा और भगवती दधिमथी से प्रार्थना की कि आप हमारी कुलदेवी है, इस बालक की रक्षा करें। कुलदेवी दधिमथी के सानिध्‍य में पीपलवृक्ष के नीचे पलने के कारण महर्षि दधिची के पुत्र का नाम पिपलाद हुआ। भगवान विष्‍णु द्वारा सुदर्शन चक्र से सती देह को खण्डित करने पर जहां-जहां सती के शरीर के अंग गिरे, वे 52 स्‍थान पवित्र 52 शक्तिपीठ कहलाए। भगवती सती काकपाल पुष्‍कर क्षेत्र से 96 किमी दूर उत्तर में गोठ मांगलोद नाम के दो गांवों के बीच में गिरा जो “कपाल सिद्ध पीठ” नाम से प्रसिद्ध हुआ। ‘कपाल पीठ तीर्थ’ गोठ मांगलोद नागौर के पूर्व में 44 किमी दूर जायल तहस ील में है। आपसे अनुरोध है कि सभी दाधीच भाइयों को इस मैसेज से अवगत कराएं …… 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏

ब्रिंमोहन ओजा दधीच

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